Skip to content
Back to story
पोन्नियिन सेल्वन Matribhasa Hindi · सत्तावनवाँ अध्याय — माया मोहिनी
A historical fiction-themed illustration for पोन्नियिन सेल्वन

सत्तावनवाँ अध्याय — माया मोहिनी

12.3K 1.8K 0

शुरू में तो करिकालन की कहानी पार्थिवेन्द्रन को ख़ास छू नहीं पायी थी। लेकिन अब, अपनी भीगी आँखों को चुपचाप पोंछते हुए, वे अनजाने में ही गहरे तक हिल चुके थे।

"किसी नारी का प्रेम मनुष्य को ऐसी सर्वनाशी हृदय-पीड़ा में खींच ले जा सकता है, यह मैंने सपने में भी नहीं सोचा था," उन्होंने नर्म स्वर में स्वीकार किया। "आपके पट्टाभिषेक के दिन आपको ऐसा गहरा आघात लगा था, इसका हममें से किसी को अंदाज़ा तक न था। आपके उदास मन को देखकर हम हैरान अवश्य हुए थे। मुझे याद है कैसे हमने ढेरों बेमतलब की ठिठोली और सरल छेड़छाड़ से आपको बहलाने की कोशिश की थी।"

"चाहा था," आदित्य करिकालन ने सहमति दी। "तुमने मेरे भविष्य के सारे महान कृत्यों का बखान कर मेरा मन बहलाना चाहा था—कि एक बार उस जगमगाते सिंहासन पर बैठ जाऊँगा तो क्या-क्या होगा। एक ही दिन में तुमने चोल साम्राज्य को इमयम् की बर्फ़ीली चोटियों से लेकर सीधे इलंगै तक फैला दिया था! फिर पूरा समुद्र पार कर दूर-दराज़ के राज्यों पर विजय पायी… ओह हाँ, तुम्हारी वे सारी ओजस्वी बातें मुझे याद हैं। और यह भी याद है कि भारी मन से—ऐसी बातें सुनकर मुझे कितनी पीड़ा होती थी।

"बाद में, एक दिन, नंदिनी ने मुझे पऴुवूर के प्रासाद में उससे मिलने को कहा। जाऊँ या न जाऊँ, मेरे सीने में बहुत देर तक एक घमासान लड़ाई चलती रही। अंत में मैंने उसकी विनती रखने का निश्चय किया। मेरे मन में अनगिनत संदेह और अंधकार भरे विचार गुँथे पड़े थे, मैं उस उलझन को सुलझाना चाहता था। स्वीकार करता हूँ, मैं उसके जन्म की असली सच्चाई भी जानना चाहता था। मेरे मन में यह भी आया कि कहीं उस दिन अंतःपुर में उसकी अकस्मात् उपस्थिति और मेरे पिता की उस अचानक, रहस्यमयी मूर्च्छा में कोई संबंध तो नहीं। तुम्हें शायद याद होगा, सम्राट की चेतना जल्दी लौट तो आई, पर वे फिर कभी पूरी तरह पहले जैसे न हो सके। उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा, वह पुराना शरीर फिर कभी वापस न मिला।

"एक बार बस उससे बात हो जाए तो शायद इन कष्टदायक रहस्यों का उत्तर मिल जाएगा—मैंने मन को यही समझाया। कम-से-कम अपनी अंतरात्मा को तो यही सफ़ाई दी थी। लेकिन असल में मैं उससे क्यों मिलना चाहता था? आह, कारण एक ही था—एक उन्मादी, अप्रतिरोध्य शक्ति मुझे सिर झुकाए उसके सामने खींचकर ले जा रही थी। वह विचित्र, भयंकर शक्ति, मुझ पर अपना सारा प्रबल खिंचाव डाल रही थी। बाकी सब तो छल था, खोखले तर्कों का एक ढेर, जो बस उससे मिलने की उस बेतहाशा इच्छा को दबाने के लिए था। मैंने केवल अपने हृदय की, और नंदिनी के आदेश की तामील की। बड़े पऴुवेत्तरायर तब नगर में नहीं थे। उनके विशाल प्रासाद में मेरे प्रवेश को रोकने की क्षमता या अधिकार किसी में न था, और हमारी पुरानी मित्रता की बात भी कोई नहीं जानता था। बहुतों ने यही मान लिया कि सिंहासन के नव-उत्तराधिकारी, युवा राजकुमार अंतःपुर की राजमाताओं का आशीर्वाद लेने एक औपचारिक, शिष्टाचार भेंट करने आए हैं।

"मैं नंदिनी से उसके प्रासाद के बाग में एक लता-मंडप के नीचे मिला। पार्थिवेन्द्रन—तुम तो मंझे हुए, धूप में तपे कई यात्रियों के मुँह से समुद्री यात्राओं की कहानियाँ सुन चुके हो, है न? समुद्र की उन विशाल, छिपी हुई धाराओं के बारे में वे क्या कहते थे, याद है? समुद्र में कुछ ऐसे अंधकारमय स्थान होते हैं, जो अपनी प्रचंड शक्ति से भँवर उठाते हैं, उफनते हैं—जहाज़ एक बार उनके हिंसक फेर में फँस जाएँ तो अक्सर टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। नंदिनी के सामने खड़े होकर मेरी ठीक वही दशा हुई। मैं जैसे एक असहाय जहाज़ था, जो छिन्न-भिन्न, पीड़ा से तड़पता हुआ, एक भयंकर भँवर में डूबता जा रहा था। शरीर, हृदय, आत्मा—सब जैसे हज़ारों टूटे टुकड़ों में चूर-चूर हो गए। अपने ही मुँह से जो शब्द निकल रहे थे, उनसे मैं स्वयं ही आतंकित था। आइयो, मैं यह सब क्या अनाप-शनाप बक रहा हूँ, मैंने मन-ही-मन सोचा—लेकिन अपनी जीभ को किसी भी तरह रोक न सका। ऐसा लगा, मानो उसने स्वयं ही एक उन्मत्त प्राण पा लिया हो, और असहाय प्रलाप का एक ताँता उगल रही हो।

"नंदिनी ने शुरुआत बड़े औपचारिक ढंग से की, ठंडे और नितांत संयमित स्वर में, मेरे पट्टाभिषेक पर बधाई देकर। 'इस अवसर पर आनंद का कोई कारण नहीं दिख रहा,' मैंने कड़वे स्वर में उत्तर दिया। 'ऐसा क्या? क्यों नहीं?' आँखें बड़ी करके उसने पूछा। 'वाह, क्या प्रश्न है! तुम्हारे विश्वासघात के बाद मुझे आनंद कैसे मिल सकता है?' उसने ऐसा अभिनय किया मानो मेरी बात समझ ही न पा रही हो। हमारी बातें शीघ्र ही और अधिक उत्तप्त, और अधिक कटु हो गईं। मैंने उसे दोष दिया—कि उसने मेरे गहरे प्रेम के साथ विश्वासघात किया है, स्वयं को वीर पाण्ड्यन की लोलुप इच्छाओं की पूर्ति करने दिया है। उस बूढ़े गिद्ध, बड़े पऴुवेत्तरायर से विवाह करने के विषय में भी मैंने क्रूर बातें कहकर उसे चोट पहुँचाई।

"'आपने ही तो शुरुआत की थी, मेरे प्रति अपने प्रेम को नष्ट करके, युवराज,' क्रोध से काँपते स्वर में उसने पलटकर जवाब दिया। 'फिर जो मनुष्य मुझसे प्रेम करता था, उसे आपने मार डाला, मेरी आँखों के सामने। लगता है, जब तक आप मुझे भी टुकड़े-टुकड़े नहीं कर देंगे, आपको शांति नहीं मिलेगी। ठीक है, तो यही सही।' एक फुर्तीली भंगिमा में उसने कमर के वस्त्र की तह से एक छोटा, चमचमाता छुरा निकालकर मेरी ओर बढ़ा दिया। 'किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं?'

"'तुम्हें मारूँगा?' मेरा गला कर्कश और टूटा हुआ था। 'तुम ही तो मुझे धीरे-धीरे यन्त्रणा देकर मार रही हो, है न?' और फिर—और फिर, मेरे होठों ने ऐसे शब्द कहे, जो आज भी याद आने पर मैं गहरी लज्जा से सिकुड़ जाता हूँ। 'अभी भी देर नहीं हुई है, नंदिनी,' मैंने विनती की। 'बस एक बात कहो। कहो कि तुम इस बूढ़े गधे को छोड़ दोगी—और मैं इसी क्षण अपना पद, इस महान सिंहासन पर अपना हर दावा त्याग दूँगा! चलो, अभी इसी वक़्त इस राज्य को छोड़कर चले जाएँ। हम महासागर पार कर किसी बहुत दूर देश में जा सकते हैं, और अपना शेष जीवन असीम सुख में बिता सकते हैं!'

"मेरे उस उन्मुक्त, आवेग-भरे प्रलाप को नंदिनी ने सुना—और फिर वह हँस पड़ी। एक भयंकर, खोखली हँसी, जिसने मेरी हड्डियों के मज्जा तक को जमा दिया। उस ध्वनि की याद आज भी मेरे रोंगटे खड़े कर देती है। 'समुद्र पार की यात्रा, अनजाने नए देश में घर बसाना—और फिर वहाँ करेंगे क्या? रोज़गार के लिए लकड़ियाँ काटेंगे?' उसने व्यंग्य किया, उसकी आँखें चमक उठीं। 'या फिर आपने यह सपना देखा था कि हम दोनों मिलकर विनम्रतापूर्वक केले के पेड़ों की खेती करेंगे? बड़ा मनोरम होगा, नहीं?'

"'तुम्हें यह पसंद नहीं आएगा, है न?' उसके उपहास से बिंधकर मैंने भी पलटकर ताना मारा। 'एक साधारण पुरोहित की बेटी अब पऴुवूर की भव्य कनिष्ठ रानी जो है, क्यों?'

"'ओह, अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट रहने की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है,' स्वर को धीमा कर एक ख़तरनाक फुसफुसाहट में वह बोली। 'मेरी नज़र इससे भी बड़ी चीज़ पर है। बहुत महत्वाकांक्षी कुछ। इस साम्राज्य के रत्नजड़ित सिंहासन से कम कुछ भी नहीं। समझे आप, मैं चक्रवर्तिनी बनना चाहती हूँ। बताइए तो—मेरी इच्छा पूरी करने में आप सक्षम हैं, और राज़ी भी? एक ही वार में पऴुवेत्तरायर भाइयों को मार डालिए, सम्राट सुंदर चोल को एक अंधकारमय कारागार में फेंक दीजिए, स्वयं सिंहासन पर आरूढ़ होइए—और मुझे अपनी बना लीजिए। अपनी रानी। अपनी पट्टमहिषी!'

"'आइयो, तुम यह कैसे... यह क्या कह रही हो?' उसकी आँखों की उस हिम-शीतल महत्वाकांक्षा से आतंकित होकर मैं हकलाया। 'ऐसे क्रूर, पाषाण-हृदय विचार—'

"'और मेरी आँखों के सामने एक घायल वीर पाण्ड्यन की हत्या करना?' अचानक क्रोध में स्वर ऊँचा कर उसने पूछा। 'वह क्या आपको क्रूर नहीं लगा?'

"तब मेरे अपने क्रोध की भी कोई सीमा न रही। विशुद्ध क्रोध गर्म और तेज़ होकर मेरी नसों में खौलने लगा, जिसने मेरी आँखों और हृदय को अंधा कर दिया। मैं क्या कह रहा था, मुझे नहीं पता, बस इतना जानता हूँ कि मैंने उन्मत्त क्रोधी, विषैले शब्दों की एक बाढ़ छोड़ दी, जिसने उसके चरित्र को तार-तार कर दिया। मैं मुड़कर जाने ही वाला था—लेकिन उसकी एक आख़िरी बात कहनी अभी बाक़ी थी। 'कभी अगर आपका मन बदले, महाराजकुमार, तो अवश्य लौट आइएगा,' गले में एक विचित्र, व्यंग्यात्मक माधुर्य लौटाकर वह महीन स्वर में बोली। 'जब आपका मन और हृदय मुझे अपनी चक्रवर्तिनी बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाएँ—तब मेरे पास लौट आइएगा!' मैं तब, अंततः, उसे छोड़कर चला आया," आदित्य करिकालन ने बात समाप्त की, लड़ाई की शक्ति चुक जाने से उनके चौड़े कंधे झुक गए। "वही उसे मेरा अंतिम बार देखना था।"

"हे भगवान, अय्या," पार्थिवेन्द्रन ने दबे स्वर में कहा। उन्होंने पूरी कहानी बढ़ते हुए आतंक और विस्मय के साथ, और उतनी ही गहरी वितृष्णा से सुनी थी; अब छाती को कंपाती हुई एक भारी, गहरी साँस छोड़ी। "कैसी भयंकर, कैसी आतंकित करने वाली नारी है! ऐसी हिंसक राक्षसी क्या सचमुच इस पृथ्वी पर, वास्तविकता में रहती है? बहुत अच्छा हुआ कि बाद में आप उससे कभी नहीं मिले।"

"नहीं मिला—लेकिन वह मुझे कभी छोड़ेगी नहीं," युवराज ने कहा, उनके स्वर में घोर निराशा थी। "नंदिनी का मुख, उसका अलौकिक रूप, उसकी हर छोटी भंगिमा—दिन-रात एक क्षण के लिए भी मुझे चैन नहीं लेने देती, मेरे प्रिय पल्लव मित्र। दिन के उजाले में वह मेरी चेतना की सीमाओं पर मँडराती रहती है, और रात को मेरे अंधकारमय स्वप्नों में मुझे यंत्रणा देती है। एक क्षण वह एक सुमधुर मुस्कान लिए आगे बढ़ती है, वह मुस्कान जो पूरी पृथ्वी को मोहित कर सकती है, एक गर्म चुम्बन में मुझे बाँध लेने को आतुर। अगले ही पल वह मेरे सामने हाथ में एक चमचमाता छुरा लिए खड़ी होती है, उसे सीधा मेरे हृदय में घोंप देने को दृढ़-संकल्प। कभी वह रोती है, सिसकती है, मानो उसका हृदय फट जाएगा। कभी उसकी चीख़ें जैसे पूरी पृथ्वी को चूर-चूर कर देंगी—वह पागलों की तरह प्रलाप करती है, उसके लंबे काले केश अस्त-व्यस्त उड़ते रहते हैं, वह अपने नाख़ूनों से अपने गोरे गालों को तब तक खरोंचती है जब तक वे क्षत-विक्षत होकर लहूलुहान न हो जाएँ। एक जंगली, उन्मत्त जीव की तरह वह हँसती और चीख़ती है—और फिर पलक झपकते ही एक प्रशांत, सेवापरायण देवी में बदल जाती है, जो शांत-कोमल-निर्दोष सहानुभूति के शब्द फुसफुसाने को उत्सुक हो। हे भगवान, हे भगवान—उस भयंकर डायन के हाथों मैं कैसी अंतहीन, असीम यंत्रणा भोगता हूँ! इस सीने की जलन को कहाँ से कहना शुरू करूँ, समझ नहीं पाता। आज दोपहर मेरे पितामह के वे ज्ञानी शब्द याद हैं? तांजावूर मुझे क्यों नहीं जाना चाहिए, इसके कितने तर्कसंगत कारण उन्होंने गिनाए थे। लेकिन सच तो यह है कि उस नगर में प्रवेश करने की मेरी इस गहरी अनिच्छा, और अपने पिता को यहाँ कांची की सुरक्षा में मेरे पास ले आने की बेतहाशा इच्छा का, असली कारण केवल एक है। उस कारण का नाम नंदिनी है।"

"बस यही आपका तुच्छ कारण है?" पार्थिवेन्द्रन ने उनकी ओर देखकर पूछा। "आप काँप रहे हैं, एक अकेली नारी के लिए अपनी ही राजधानी में पाँव रखने से डर रहे हैं? आपको क्या लगता है वह क्या कर सकती है—किसी अंधकारमयी चाल से आपके भोजन में विष मिला देगी?"

"बिल्कुल नहीं, पार्थिवेन्द्रन। तुम्हारी यह नासमझी मुझे कष्ट देती है," करिकालन ने दुखी स्वर में उत्तर दिया। "मैं उसके हाथों मृत्यु से नहीं डरता। मैं तो बस इस बात से डरता हूँ—कि वह मुझसे कुछ ऐसा करवा सकती है, जो मेरी सहज प्रवृत्ति के सर्वथा विरुद्ध हो। उससे दोबारा मिलने पर वह बड़ी आसानी से मुझे आदेश दे सकती है: 'अपने पिता को बंदी बनाओ—अपनी बहन कुंदवै को इस देश से निकाल दो—उस बूढ़े गधे पति को मार डालो, और बलपूर्वक सिंहासन पर कब्ज़ा कर लो!' और मैं—पार्थिवेन्द्रन, मुझे बहुत भय है, कि उसके कंठ से एक बार फिर ये शब्द सुनकर… मैं सच में शायद उसके आदेश का पालन करना चाहूँगा। हममें से किसी एक को मरना होगा, प्रिय मित्र। या नहीं तो, मृत्यु हम दोनों को ही अपना ले," करिकालन ने पीड़ा से कराहते हुए, दोनों हाथों से अपना मुँह ढँक लिया। "वरना इस जीवन में मेरी शांति की कोई आशा नहीं!"

"सच कह रहा हूँ, युवराज—यह मरने-मारने की बातें क्या हैं?" पल्लव राजकुमार ने मृदु भर्त्सना के साथ कहा। "आप क्यों मरेंगे? आप बस एक शब्द कहिए, और मैं सहर्ष इलंगै-यात्रा टाल दूँगा। मेरा पहला काम ही उस दुष्ट डायन को ढूँढ़कर मारना होगा। और यदि इससे स्त्री-हत्या का महापाप मेरे सिर पर चढ़ता है—तो ठीक है, वही सही। उस अभिशाप को मैं सहर्ष ढोऊँगा।"

"ऐसा कुछ भी करने का प्रयास किया, पार्थिवेन्द्रन, तो उसी क्षण से मैं तुम्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु मानूँगा," करिकालन ने चेतावनी दी, उनकी आँखें एक अकस्मात्, प्रचंड रक्षात्मक तेज से जल उठीं। "यदि हत्या करनी ही है, तो मैं ही करूँगा—अपने इन दो हाथों से। नंदिनी का गला मैं स्वयं घोंटूँगा—और फिर स्वयं को भी मार डालूँगा! एक क्षण के लिए भी किसी और को उसे छूने नहीं दूँगा, उसके कनिष्ठिका के नख को भी क्षति नहीं पहुँचाने दूँगा। नहीं, उसे भूल जाओ, मित्र, और आज रात मैंने जो कुछ भी कहा है, सब भूल जाओ। बस हमारे पितामह के निर्देशों का पालन करो। कल सुबह इलंगै के लिए प्रस्थान करो, और किसी भी तरह मेरे छोटे भाई अरुलमोऴि वर्मन को वापस ले आओ। हम उसे यहाँ कांची में रहने के लिए मनाने का प्रयास करेंगे। पितामह और पौत्र एक साथ बैठकर एकांत में पूरे देश के भविष्य पर चर्चा करें, अपने-अपने निर्णय पर पहुँचें। इस बीच, तुम और मैं इलंगै लौटेंगे। पूर्वी समुद्र में हम भव्य, गगनचुम्बी जहाज़ों पर पाल चढ़ाएँगे, और साबगम, पुष्पकम और कडरम जैसे प्राचीन राज्यों के विरुद्ध विशाल, व्यापक विजय प्राप्त करेंगे। उन देशों की धरती पर हम दृढ़ता से गाड़ देंगे महान चोलों का विजय-ध्वज। और फिर, मित्र, हम पश्चिम की ओर पाल तानेंगे! वहाँ भी तो गौरवशाली, किंवदंतियों वाले साम्राज्य हैं, है न? अरबिया, पारस और मिसिरम? हम उन्हें असली तमिऴ साहस का स्वाद चखाएँगे, क्या कहते हो? उस मरुभूमि की हवा में भी बाघ का ध्वज ऊँचा, गर्व से फहराएँगे। क्या तुम जानते हो, हमारी यहाँ की स्त्रियों को जो कर्पु—वह कठोर सतीत्व का व्रत—ऐसे कड़े बंधन में बाँधता है, उन देशों में उसका नामोनिशान भी नहीं है?" करिकालन का स्वर अचानक एक बालक-सुलभ, स्वप्निल विस्मय से भर गया। "राजा जिस भी नारी पर चाहें, दृष्टि डाल सकते हैं, और सीधा अपने अंतःपुर में ले आ सकते हैं!"

इन उन्मुक्त, गौरवमयी कल्पनाओं का कोई उपयुक्त उत्तर सोचकर पार्थिवेन्द्रन मुँह से निकाल पाते, उससे पहले ही, तिरुक्कोविलूर के वे वृद्ध मलयमान चुपचाप वहाँ आ पहुँचे, मानो छाया से निकला हुआ एक मज़बूत, समय की छाप वाला वृक्ष हों।

"आह, अरावन की उस अद्भुत कहानी की तुलना पृथ्वी पर और कहीं नहीं है—उन अलौकिक, विचित्र देशों में भी नहीं जिनकी बात तुम अभी कर रहे थे," उन्होंने टिप्पणी की, झुर्रीदार चेहरे पर एक स्नेहमयी, किंचित कौतुक भरी मुस्कान थी। "लेकिन बताओ तो—इस शांत रात्रि के इतने पहर बीत जाने पर भी तुम दोनों जागकर बातें क्यों कर रहे हो?" धुँधली रोशनी में उनकी ओर आँखें सिकोड़कर उन्होंने पूछा। "कल सुबह तुम्हारी इलंगै-यात्रा की बात याद है न, पार्थिवेन्द्रन?"

"ठीक इसी कारण से तो हम अभी तक सोने नहीं गए, अय्या," पल्लव राजकुमार ने एक गर्मजोशी भरी, थकी हुई मुस्कान के साथ चुटकी ली। "इतनी देर से हम उसी के बारे में तो बात कर रहे हैं!"

0
That's the end (so far) Follow this author to know when the next part arrives.
Previous part

Recommended for you

Comments (0)

Log in to join the conversation.