अभी कुछ ही क्षण पूर्व हमने देखा कि राजकुमारी कुंदवै और उनकी प्रिय सखी बानति रथ पर सवार हो कुडंदै की धूल-भरी राह पर निकल पड़ीं। किन्तु आइए, हम कुछ देर नदी-तट पर ही रुक जाएँ। घर की स्वामिनी के निकलते ही पीछे क्या गुल खिलते हैं, यह देखने का आनंद ही कुछ और है। डगमगाती नौका में जो युवतियाँ पीछे रह गईं, उनकी बातों पर तनिक कान लगाएँ — कहानी में अब तक ख़ासा रस घुल चुका है।
“कोडुम्बालूर की उस लड़की की क़िस्मत तो देखो!” अपना घाघरा सँभालते हुए एक परिचारिका ने ऊँचे स्वर में कहा। “तारकै, बहन — हमारी इलैया पिराट्टि उस पर इतना स्नेह क्यों लुटाती हैं, बताओ तो?”
“स्नेह-वेह कुछ नहीं,” तारकै ने सिर झटककर दृढ़ता से उत्तर दिया। “सुनो वारिणि, बात वैसी है नहीं। वह मूर्ख लड़की पिछले चार महीनों से किसी भटकी हुई आत्मा की भाँति घूम रही है, एक पत्ता भी खड़के तो वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ती है। बेचारी के माता-पिता नहीं हैं। उसे कुंदवै देवी के हाथों में सौंपा गया है। यदि वे उसकी चिंता नहीं करेंगी तो और कौन करेगा? मुझे तो लगता है, यही उनकी चिंता का असली कारण है। इसीलिए वे उसे गाँव के ज्योतिषी के पास ले गई हैं — जैसा कि बड़े-बूढ़े कहते हैं, ज़रा खोज-ख़बर लेने के लिए।”
“तुम्हें क्या लगता है, उसे किसी भूत या पेड़ के प्रेत ने पकड़ लिया है?” एक अन्य युवती ने पूछा। “उसे उतारने के लिए तो कितने ही मंत्र-तंत्र, ऊँचे स्वरों में कितने ही अनुष्ठान करने पड़ेंगे, नहीं?”
“भूत! प्रेत!” वारिणि ने घोर घृणा से गला भारी कर थूकने की मुद्रा में कहा। “उन अभागी चीज़ों में से किसकी इतनी हिम्मत कि जाकर उसे धर दबोचे? वह तो अपनी धूर्तता से ही अकेले सौ भूतों को भगा सकती है!”
“और बानति का वह मूर्छित होने का रोग? वह तो कंठस्थ किया हुआ अभिनय है,” नदी के शीतल जल में उँगलियाँ डुबोकर खेलते हुए एक और लड़की बोली। “यही तो उसका सबसे बड़ा प्रपंच है। अपना जाल फेंककर हमारे भोले-भाले राजकुमार को धीरे-धीरे अपने लालची पंजों में खींचना चाहती है।”
“नीरवती ने बिलकुल ठीक कहा,” वारिणि ने सहमति जताई। “उस दिन की बात याद है? जब उसने जान-बूझकर अपनी पवित्र आरती की थाली गिरा दी थी — बुरी नज़र उतारने के लिए घुमाई जाने वाली, जलती लौ से सजी, पीतल की वह भारी-भरकम थाल? मैं शर्त लगाकर कह सकती हूँ कि वह राजकुमार की आँखों में आने की एक चाल थी। भला बताओ तो, दोनों हाथों से मज़बूती से पकड़ी हुई भारी पीतल की थाल फिसल कैसे सकती है? और राजकुमार को देखकर ऐसा काँपना, थरथराना — मानो वे जंगल से निकलकर आया कोई हिंसक पशु, कोई बाघ-भालू हों। उफ़्!”
“और थाल गिराते ही इतनी ख़ूबसूरती से मूर्छित हो जाना — सोचो तो ज़रा, लड़की की धूर्तता! पर मानना पड़ेगा, काम उसने बड़ी सफ़ाई से किया था।”
“मेरा क्रोध उसके इस चालाकी-भरे अभिनय पर नहीं है,” सेंदिरु नाम की एक चमकती आँखों वाली लड़की चिल्ला उठी। “क्रोध इस बात पर है कि कुंदवै देवी और हमारे राजकुमार उसके जाल में पूरी तरह फँस गए। वे इतने अंधे कैसे हो गए?”
“सचमुच, हम झूठों और धोखेबाज़ों के युग में आ पहुँचे हैं,” मंदाकिनी नाम की एक गंभीर युवती ने सिर हिलाते हुए दुःख से कहा। “आजकल लोग लेशमात्र पश्चाताप के बिना छल-कपट करते हैं।”
“पर उसका काम तो बन गया, है न?” वारिणि ने प्रश्न उठाया। “राजकुमार तो हाथी पर चढ़कर लगभग युद्ध के लिए निकल ही पड़े थे, पर तुरंत लौटकर बानति की ख़बर लेने को व्याकुल हो उठे। छल से उसका प्रयोजन भली-भाँति सिद्ध हो गया।”
“बिलकुल नहीं। उन्होंने ख़बर ली, इससे केवल इतना ही सिद्ध होता है कि वे कितने सहानुभूतिशील, कितने दयालु हैं,” तारकै ने प्रतिवाद किया। “क्या तुमने सच में सोचा था कि उनकी आँखों के सामने एक बेचारी लड़की धड़ाम से मूर्छित होकर गिर पड़े और वे एक बार भी मुड़कर देखे बिना सीधे चले जाएँगे? सामान्य-सी बात को व्यर्थ में तूल देने का कोई अर्थ नहीं।”
“मैं कुछ बना-बनाकर नहीं कह रही। पर राजकुमार के विषय में तुमने ठीक ही कहा — चौदह भुवनों में उन जैसा करुणामय हृदय दूसरा नहीं। हमारे प्राचीन महाकाव्यों की कथाओं में भी उनके समकक्ष कोई नहीं!” वारिणि उत्साह से बोल उठी, एक क्षण को उसकी आँखें कोमल हुईं, फिर तीक्ष्ण। “किन्तु मैं वह बात नहीं कह रही। यह बानति — जानती हो, वह वास्तव में इतनी बार मूर्छित क्यों होती है? इसके लिए पूरे रास्ते धूल फाँककर ज्योतिषी से परामर्श लेने जाने की आवश्यकता ही नहीं थी। मैं स्वयं ही कुंदवै देवी को बिना मूल्य लिए बता सकती थी!”
“तो उसका रोग क्या है, तुम जानती हो क्या?” सेंदिरु ने उत्सुकता से झुककर पूछा। “क्या, बताओ न?”
वारिणि आगे झुकी, मुख पर दुष्टता-भरी मुस्कान थी, और उसने अपनी सखी के कान में धीमे स्वर में कुछ कहा।
“तुम लोग फुसफुसाकर क्या बातें कर रही हो?” नीरवती ने ज़रा छूट जाने के भाव से पूछा। “हम सबको भी तो बता सकती थीं?”
“बानति का रोग साधारण नहीं है, समझी,” पीछे हटकर, काली आँखों में शरारत की उज्ज्वल चमक के साथ सेंदिरु ने रहस्य खोला। “वह तो कामना के मारे बेहोश होती है!”
वह पुरानी लकड़ी की नौका तुरंत खिलखिलाहटों की खनक से गूँज उठी। जल पर झुके विशाल वटवृक्षों की छाया में जो पक्षी विश्राम कर रहे थे, उस आकस्मिक कोलाहल से पंख फड़फड़ाकर उड़ गए।
“यह धूर्त शायद राजकुमार पर फिर कोई जादू-टोना चलाएगी। इलंकै के युद्ध से लौटने पर वह संभवतः उनके शरीर पर जादुई धूल छिड़क देगी,” नीरवती ने कहा, उसकी हँसी लुप्त हो गई और भृकुटि तन गई। “हम उसे यूँ ही तो नहीं छोड़ देंगे, क्यों?”
“मैं इतना कह सकती हूँ — राजकुमार के चोल देश लौटने से पहले ही बानति अपने सारे बाल नोंचकर पागल हो जाएगी,” तारकै ने ज़ोर से सिर हिलाकर भविष्यवाणी की। “यदि ऐसा न हुआ तो मैं अपना नाम बदलकर ताड़गै रख लूँगी — प्राचीन महाकाव्य की वह भयंकर वनवासिनी राक्षसी!”
“अहा, अब उसकी बात रहने दो, और जो काम सचमुच इलैया पिराट्टि ने करने को कहा है, उस पर ध्यान दो। उनके नगर से लौटने से पहले हमें यह काम पूरा कर लेना चाहिए, नहीं क्या?” मंदाकिनी उन्हें काम पर वापस लाई। “चलो, शीघ्र करो!”
दो युवतियाँ तुरंत नीचे झुकीं और नौका के तल में तिरछे पड़े एक भारी लकड़ी के तख़्ते को खींचकर उठाया। उसके नीचे एक अंधकारमय, खोखला स्थान था — एक लंबे संदूक के आकार का — और वहाँ चुपचाप एक मगरमच्छ लेटा हुआ था! मृत मगरमच्छ, जो जाने कब का सूख चुका था। उसे यत्न से सुखाकर रखा गया था, और उसकी खुरदरी खाल के भीतर रुई और नारियल का जूट ठूँस-ठूँसकर भरा गया था — अब वह देखने में बिलकुल किसी जीवित मगरमच्छ की ही तरह वास्तविक और भयावह लग रहा था।
कष्ट से कराहते हुए उन्होंने उसे तख़्ते पर उठाया। फिर नौका का बंधन खोलकर जल-किनारे धीरे-धीरे चप्पू चलाने लगीं। नदी की मंद छप-छप ध्वनि सुनते-सुनते वे अंततः तट पर एक विशाल, प्राचीन वृक्ष के पास पहुँचीं। उसकी मोटी, गाँठदार जड़ें जल तक उतरी हुई थीं, एक-दूसरे पर भारीपन से आड़ी-तिरछी लिपटी हुईं — जैसे विश्राम करते साँपों का कोई झुंड हो।
धक्का-मुक्की कर, बल लगाकर उन्होंने मगरमच्छ को नौका से उतारा, और इस चतुराई से टिकाया कि उसका आधा धड़ कीचड़-भरे पानी में और आधा बाहर रहे। जड़ों पर निश्चल पड़ा, अपने विशाल जबड़े खोले — वह शिकार की घात में बैठे किसी सजीव जंतु की ही भाँति भयंकर दिखा। प्रवाह में बहकर कहीं चला न जाए, इसलिए मगरमच्छ का एक छोटा पैर पतली रस्सी से जल के नीचे एक जड़ के साथ कसकर बाँध दिया गया। युवतियों ने बड़े ध्यान से यह कार्य किया, भली-भाँति देख लिया कि रस्सी जल के नीचे ही छिपी रहे।
“मंदाकिनी, बहन,” हाथ झाड़ते हुए तारकै ने आरंभ किया। “तुम्हें क्या लगता है, इलैया पिराट्टी ने हमें इतना आयोजन करके भय दिखाने का यह नाटक रचने को क्यों कहा?”
“तुम नहीं जानतीं? ताकि बानति इतनी डरपोक न रहे। मुझे तो लगता है, कुंदवै देवी उसे डराकर उसके भीतर थोड़ा साहस भरना चाहती हैं।”
“क्यों — देखकर तो लगभग ऐसा लगता है मानो…” नीरवती रुक गई, ठोड़ी पर हाथ रखकर सोचने लगी। “क्या राजकुमारी ने अंततः यह निश्चय कर लिया है कि बानति ही हमारे राजकुमार की आदर्श पत्नी होगी, और इसीलिए वे उसे इस योग्य बना रही हैं?”
“यदि ऐसा कोई विचार सच में है, तो मैं अपने इन्हीं हाथों से उस धूर्त चुहिया को विष देकर मार डालूँगी, देख लेना!” वारिणि ने शपथ ली — उसके स्वभाव में ईर्ष्या की ओर एक स्वाभाविक झुकाव था।
“अहा, यह सब सोचकर मन दुखी मत करो, बहन। इसकी आवश्यकता नहीं,” मंदाकिनी ने सांत्वना के स्वर में उसके हाथ पर धीरे-से थपकी दी। “मैंने सुना है, मणियखेडम के रट्टै मंडल चक्रवर्ती से लेकर वेंगी के राजा, कलिंग के सम्राट, और यहाँ तक कि दूर कनौज के शासक भी अपनी पुत्रियों का विवाह हमारे राजकुमार से कराने के लिए रीतिमतो होड़ लगाए हुए हैं। जब क्षितिज पर इतने भव्य, अत्यंत शुभ संबंध झिलमिला रहे हों, तब कोडुम्बालूर की एक तुच्छ-सी लड़की के पीछे भला कौन अपना समय नष्ट करेगा?”
“पृथ्वी के समस्त सम्राट भले ही हाथ जोड़कर चोल वंश की कृपा की प्रतीक्षा करते रहें — किंतु वास्तव में तो केवल हमारे राजकुमार का अपना मत ही महत्त्व रखता है, है न?” सेंदिरु ने ज्ञानियों की भाँति कहा। “मैंने सुना है कि विवाह को लेकर उनका विचार बड़ा स्पष्ट है। ‘यदि विवाह करूँगा, तो केवल तमिऴगम की कन्या से ही करूँगा’ — उन्होंने कथित रूप से ऐसा ही कहा है। तुम सब निश्चय ही यह बात जानती हो?”
“तब तो बहुत उत्तम। हम सबको भी एक-एक करके अपना-अपना जादू चलाना होगा, दिखा देना होगा कि हममें से कौन क्या कर सकती है। यदि वह नन्ही डायन बानति राजकुमार पर इतना डोरे डाल सकती है, तो हम क्यों नहीं?” तारकै ने आँखों में संकल्प की चमक लिए घोषणा की। “संभवतः हम उससे कहीं बेहतर कर पाएँगी। हम सब की झोली में भी तो अपने-अपने हिस्से की जादुई धूल है, है कि नहीं?”
उस नौका में बैठी प्रत्येक युवती के होठों से ऐसा विष झरने के पीछे पर्याप्त कारण था। इन सबके मूल में एक घटना थी — उसी ने उनके भीतर का सबसे कुत्सित पक्ष उघाड़कर रख दिया था। प्रिय पाठक, अब हम उसी घटना को देखेंगे।
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