इधर हमारे युवा मित्र वंदियादेवन का क्या हुआ? वह तो जैसे कोई निशान छोड़े बिना हवा में ही विलीन हो गया था। आपको स्मरण होगा — कुछ ही क्षण पहले वह उस भव्य, पर किंचित विषाद-ग्रस्त पुरातन प्रासाद के स्याह सायों में विलीन हो गया था। दो एक मिनट तक स्वयं को अंधकार में छिपाये, वह कान लगाए खड़ा रहा, नंदिनी और उस मंत्रवादी — उस ओझा — की दबी-दबी बातों को सुनने का यत्न करता रहा। पर एक शब्द भी उसके कानों तक न पहुँचा। निराशा तो हुई, पर उसने उसे अधिक तूल न दिया। उसके शीश पर और भी कई चिंताएँ सवार थीं।
इल्ैया रानी के साथ बात करते समय उसने स्पष्ट अनुभव किया था कि उसकी चिर-परिचित पैनी बुद्धि जैसे उसका साथ छोड़ रही थी। मन के भीतर एक अजीब-सी तंद्रा-भरी विवशता रेंगती हुई घुस रही थी, सारी धार कुंद कर रही थी, जैसे कोई नशा कराकर उसे विवश आत्मसमर्पण की ओर धकेल रहा हो। अब पीछे मुड़कर सोचने पर वह समझ गया कि यह वास्तव में क्या था — उसे निरस्त्र करने का एक चतुर, कोमल मायाजाल। और यह समझने के बाद, चाहे जो हो जाए, नंदिनी के सम्मुख लौटना उचित न था। उस रेशमी जाल में पूरी तरह फँसने से पहले अभी यहाँ से हट जाना ही श्रेयस्कर था।
पऴुवेत्तरायर बंधु भयंकर थे, यह ठीक था। किन्तु युवती रानी के फंदे में फँसना एक ऐसा संकट था, जिसे वह किसी भी मोल पर स्वीकार नहीं कर सकता था। उन वृद्ध योद्धा-अधिपतियों के सम्मुख उसका मस्तिष्क एकदम स्पष्ट रहता था। ज़रा-सी भी उत्तेजना पर उसके चौड़े कंधे लड़ाई के लिए तन जाते थे, हाथ कमर पर लटकती मज़बूत तलवार की मूठ पर चला जाता था। बुद्धि का युद्ध हो या इस्पात का संघर्ष — वह दोनों के लिए प्रस्तुत था। पर युवती रानी? आह, वह तो सर्वथा भिन्न प्रकरण था। उसका तीव्र, लचीला मन रानी के सम्मुख मोम की तरह पिघल जाता था; उस मोहिनी के हाव-भाव के आगे उसकी रही-सही बुद्धि भी लोप हो जाती थी। और छुरी चलाने में माहिर उसका वह प्रसिद्ध हाथ? रानी के सम्मुख वह काँपने लगता था, सुन्न पड़ जाता था — इस विषय में जितना कम कहा जाए, उतना ही अच्छा। अब यदि वह उसके पास लौट गया तो क्या अनर्थ होगा, यह तो केवल ईश्वर ही जानता था।
इसके अतिरिक्त, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच, वह आधी रात को एक ओझा के साथ बैठकर क्या कर रही थी? बाहर बैठकर वे कौन-सा शैतानी, कौन-सा छाया-रचित षड्यंत्र बुन रहे थे? और कुंदवै के प्रति उसकी वह तीव्र घृणा — हाय, राजकुमारी का नाम मुख पर आते ही उसकी बड़ी-बड़ी आँखें जिस तरह केवल विद्वेष से जल उठी थीं, क्या उसे भुलाया जा सकता था! कौन जाने रानी क्या कर बैठे? उसने स्वयं को स्मरण कराया — स्त्रियों का स्वभाव भावुक, उनके निर्णय आकस्मिक और उतावले होते हैं। नंदिनी सहज ही सारी बातचीत भूलकर उसे सीधे बड़े पऴुवेत्तरायर के भारी हाथों की दया पर सौंप सकती है।
इसलिए, रानी की आँखों में दोबारा पड़े बिना उसे यहाँ से भागना ही होगा। पर कैसे? उद्यान और बाहरी दीवार ही एकमात्र निकास-मार्ग प्रतीत होते थे। किन्तु यदि उसके पीछे लगे लोग अब भी बाहर झाड़ियों में घात लगाए बैठे हों? क्या और कोई मार्ग नहीं? एक भी नहीं?
‘तेरी बुद्धि कहाँ घास चरने चली गई रे, वंदियादेवन?’ वह मन-ही-मन बुदबुदाया। ‘वह प्रसिद्ध भाग्य, जो सदा तेरे साथ खड़ा रहा, उसका क्या हुआ? सोच रे मन, थोड़ा मस्तिष्क पर ज़ोर डाल।’ उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। अरे, पार्श्व में ही तो यह विषाद-ग्रस्त प्रासाद खड़ा है। यह भला ऐसे गहन, अपलक अंधकार में क्यों डूबा है? भीतर कोई है भी — या कुछ और? किसी अन्य द्वार से बाहर निकलने का कोई मार्ग तो हो सकता है? इसके छाया-रचित परिसर में पग रखने का साहस क्या वह करेगा? यदि इसका कोई रहस्य ज्ञात हो जाए तो काम आ सकता है, क्या कहते हो?
किन्तु भीतर प्रवेश करना ही एक और समस्या थी। कैसा विशाल काष्ठ का द्वार, और उस पर कैसा दैत्याकार ताला! सब कुछ भयानक रूप से भारी, अविश्वसनीय रूप से चौड़ा। किन्तु ठहरो, यह क्या है? बड़े द्वार के भीतर ही जड़ा हुआ एक छोटा-सा द्वार? यह तो चमत्कार था — हल्के से धकेलते ही वह खुल गया! भला, एक व्यक्ति और क्या चाह सकता है? इसे सौभाग्य न कहें तो किसे कहें, वह नहीं जानता था। अब इस रहस्यमयी, निस्तब्ध स्थान में पग रखने का समय है, देखा जाए इसने अपने भीतर क्या छिपा रखा है।
वंदियादेवन ने उस छोटी-सी खिड़कीनुमा द्वार को धकेलकर खोला। बड़े द्वार में वह ऐसी चतुराई से जड़ा था कि सहसा दृष्टि में ही न आता था। फिर वह सरक कर भवन के अंधकारपूर्ण गर्भ में प्रविष्ट हो गया। उसका पहला विचार बहुत व्यावहारिक था — नंदिनी को कभी यह पता न चले कि वह कहाँ गया। इसलिए उसने बहुत धीरे से, बिना ज़रा भी चरमराए, द्वार को पीछे धकेलकर बंद कर दिया।
बाहर से प्रासाद जितना छायामय प्रतीत हो रहा था, द्वार बंद करते ही अंधकार जैसे दुगुना हो गया। उसे धुँधला-सा स्मरण था कि द्वार बंद करने से ठीक पहले, गोधूलि के म्लान प्रकाश में कुछ मोटे पाषाण-स्तंभ उसकी दृष्टि में पड़े थे। किन्तु अब कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, यह कहने की आवश्यकता नहीं। यह एक दमघोंटू अँधेरा था। ऐसा स्याह, श्वासरोधी अंधकार कोई कल्पना भी नहीं कर सकता — छी! उसने स्वयं को एक मानसिक झटका दिया। सँभल जा, मन। अँधेरा तो घोर होगा ही; संध्या के प्रकाश से एक बंद कक्ष में पग रखने पर ऐसा ही तो होता है, है न? थोड़ा प्रतीक्षा करने पर आँखें अँधेरे की अभ्यस्त हो जाएँगी। तब वे स्तंभ पुनः दिखने लगेंगे — चाहे धुँधले ही सही, पर चलने योग्य तो होंगे।
इतना तो उसके अनुभव ने ही उसे सिखाया था, फिर भी आज वह स्वयं अंधकार से भयभीत किसी शिशु की भाँति काँप रहा था! सचमुच हास्यास्पद। ‘पत्थर के खंभे की नकल करते हुए यहाँ खड़े रहने के बजाय तनिक चलना-फिरना आरम्भ करूँ,’ उसने मन-ही-मन सोचा। ‘दोनों हाथ फैलाकर टटोलते-टटोलते आगे बढ़ता हूँ। उन आशीषित ढाँचों में से एक तो यहीं कहीं होगा ही।’
कुछ क्षण वंदियादेवन अंधे की भाँति दोनों हाथ सामने फैलाए, ठोकरें खाता हुआ आगे बढ़ा। शीघ्र ही उसकी उँगलियों ने एक स्तंभ की खुरदुरी, ठंडी सतह को छुआ — ठीक जैसा उसने सोचा था। आह, पाषाण का क्या अद्भुत नमूना, मोटा और विश्वास जगाने वाला। ‘इसकी सतह के सहारे-सहारे टटोलकर आगे बढ़ता हूँ,’ उसने सोचा, और आगे चल दिया। शीघ्र ही एक और स्तंभ से टकराया। किन्तु विचित्र बात, अब भी एक भी वस्तु दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी। इतने समय में तो प्रकाश की कोई क्षीण-सी आभा दिखनी चाहिए थी? क्या वह सहसा सर्वथा अंधा हो गया? नहीं-नहीं, मूर्खों-सी बात मत सोच, उसने स्वयं से कहा; मनुष्य बिना कारण सहसा अपनी आँखों की ज्योति नहीं खो देता।
उसने तनिक और आगे बढ़ने का निश्चय किया। इस बार वह किसी स्तंभ से तो नहीं टकराया, किन्तु सहसा पैरों के नीचे एक अजीब नीचे उतरने का खिंचाव महसूस हुआ — ठहरो, यह तो एक सीढ़ी है! जीना! ईश्वर को धन्यवाद कि पैर फिसलने से वह मुँह के बल शून्य में नहीं गिरा। किन्तु सचमुच, प्रकाश की एक किरण के बिना वह और कितनी देर इस प्रकार टटोलता फिरेगा?
एक ठंडी, नम आतंक की उँगली ने सहसा वंदियादेवन के प्रफुल्ल हृदय को दबोच लिया। उसे लगा कि वह एक पग भी और आगे नहीं बढ़ पाएगा। उसे लौटना होगा, लता-मंडप में लौटकर नंदिनी का सामना करना होगा। इस दमघोंटू समाधि में अंतहीन ठोकरें खाने से तो रानी चाहे जो भी षड्यंत्र रचे, उसे स्वीकार कर लेना कहीं अच्छा है। वह क्या वचन चाहेगी, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता; वह दे देगा। उसके बाद — खैर, परिस्थितियाँ स्वयं ही कोई-न-कोई मार्ग खोज लेती हैं।
यह बुद्धिमत्तापूर्ण विचार मन में लिए हमारे नायक ने वापसी का मार्ग खोजना चाहा। कम-से-कम उसने यथासंभव प्रयास तो किया। क्या वह सचमुच सही मार्ग पर था? स्याही के इस सागर में भला यह कौन बता सकता था? इस बार उसका मार्ग अवरुद्ध करने के लिए कुछ भी खड़ा न हुआ। वे विशाल, विश्वास जगाने वाले स्तंभ कहाँ गए? क्या वह प्रवेश-द्वार अब कभी नहीं खोज पाएगा? या इस भयंकर स्थान में किसी खोए हुए भूत की भाँति पूरी रात्रि भटकते रहना ही उसकी नियति है? हे ईश्वर, इस बार वह किस अनर्थ में फँस गया?
ठहरो। वह भला कैसी ध्वनि है?
सड़-सड़-सड़ — जैसे सूखे पंखों के फड़फड़ाने की ध्वनि। कहाँ से आ रही है? चमगादड़? इसमें कोई आश्चर्य नहीं; ऐसे विषाद-ग्रस्त, परित्यक्त स्थानों पर वे चमड़े के पंखों वाले छोटे जीव घर बनाना पसंद करते हैं। किन्तु नहीं, ठहरो — यह केवल चमगादड़ों के पंखों की खड़खड़ाहट नहीं है। उसके साथ-साथ किसी के धीमे, स्पष्ट कदमों की आहट भी थी। कोई यहाँ चल रहा है। पर कौन? मनुष्य? या... या...
वंदियादेवन के सदा-चंचल विचार जैसे बर्फ की भाँति जम गए। जिह्वा तालू से चिपक गई, जो पल भर में ग्रीष्म की धूल-सी सूख गई थी। और ठीक तभी अंधकार में कुछ आकर उसके मुख से छू गया!
योद्धा की सारी शक्ति एकत्र कर उसने हाथ चलाया, और उस अदृश्य आक्रमणकारी पर अपनी मुट्ठी कस दी।
धड़ाम! उसकी वीर भुजा ऐसी पीड़ा से झनझना उठी, जैसे हड्डी टूट गई हो। अपनी कुचली हुई, टीसती हुई उँगलियों को छाती से दबाकर वंदियादेवन ने सावधानी से अपने तथाकथित आक्रमणकारी को टटोला — और पाया कि वह एक विशाल, अचल पाषाण-स्तंभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। वह न केवल एक दैत्याकार स्तंभ से टकराकर गिरते-गिरते बचा था, बल्कि उसने उसे मुक्केबाज़ी की चुनौती भी दे डाली थी!
अपनी इस मूर्खता पर वंदियादेवन ठहाका मारकर हँस पड़ता — यदि उसका हाथ पीड़ा से फटा न जा रहा होता।
इस अकस्मात आई पीड़ा ने उसके भय को कुछ कम तो कर दिया, पर पूरी तरह मिटाया नहीं। क्योंकि वह कोमल, भयावह पदचाप अब भी सुनाई दे रही थी। कभी लगता बहुत दूर है, कभी लगता ठीक उसी की ओर बढ़ी आ रही है। वंदियादेवन ठंडे पत्थर के फर्श पर पैर जमाए खड़ा रहा, और प्राणपण से कान लगाए रहा। ध्वनि की दिशा में बड़ी-बड़ी आँखें घुमाकर उसने अंधकार में कठोर दृष्टि से ताका।
आह! प्रकाश!
सामने एक उष्ण पीली आभा थी, जो प्रतिक्षण उज्ज्वल होती जा रही थी, और अटल रूप से उसी की ओर बढ़ रही थी। साथ में कुंडली बनाकर उठ रही थी धूसर धुएँ की एक पतली लकीर; कोई आ रहा था, हाथ में तेल की मशाल लिए। कहीं नंदिनी तो नहीं, उसे खोजने आ रही है? तब तो कोई बात न थी। किन्तु यदि कोई और हुआ तो? स्वयं को छिपा लेना ही अधिक बुद्धिमानी होगी। वैसे भी, इस गुफानुमा कक्ष में छिपने के स्थानों की कोई कमी नहीं थी।
धुएँ भरी मशाल और निकट आई। उसके काँपते प्रकाश में वंदियादेवन ने देखा कि वह एक विशाल, प्रतिध्वनित होते कक्ष में खड़ा है, जिसमें चारों ओर भीमकाय पाषाण-स्तंभ फैले हैं। हर स्तंभ पर भारी नक्काशी से उकेरे हुए भयंकर भूतगण थे — पुराणों के वे अलौकिक, भूत-प्रेत जैसे जीव, जो देवताओं की सेवा में नियुक्त रहते हैं। पृथ्वी के अतल गर्भ से एक लंबी पाषाण-सीढ़ी जैसे उठकर इस कक्ष में मिल रही थी, और वह समझ गया कि मशाल का प्रकाश उसी सीढ़ी के निचले सिरे से आ रहा है।
खैर, इससे नंदिनी की संभावना तो समाप्त हो गई; यह तो हो ही नहीं सकता था कि युवती रानी किसी भूमिगत कक्ष से चुपके से ऊपर आ रही हो। तो क्या यह तंजावुर के उस किंवदंती-प्रसिद्ध, भयावह कारागार का गुप्त मार्ग है, जिसके विषय में उसने इतनी काली अफवाहें सुनी हैं? क्या वे ठीक इसी प्रासाद के नीचे हैं? और क्या उन कुख्यात, निष्ठुर कारा-रक्षकों में से कोई एक अभी सीढ़ियों से ऊपर आ रहा है?
वंदियादेवन की त्वचा के हर रोमकूप से पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें फूट पड़ीं। इस महान दुर्ग-नगर के कारागार के विषय में उसने अलाव के पास बैठकर बहुत-सी भयावह कथाएँ सुनी थीं। उसने फुर्ती से एक विशेष रूप से चौड़ा, भारी नक्काशीदार स्तंभ चुना और निःशब्द उसके पीछे छिप गया। साहसी होते हुए भी, उस क्षण वीर योद्धा वल्लभरायन के घुटने भी तनिक काँप रहे थे।
तीन छाया-मूर्तियाँ सीढ़ियों से ऊपर उदित हुईं, और उसके असीम संतोष के लिए — वे सर्वथा रक्त-मांस के मनुष्य थे। सबसे आगे मार्ग दिखाते हुए आ रहे व्यक्ति के हाथ में एक मज़बूत भाला था; उसके पीछे जो आ रहा था, उसके हाथ में धधकती मशाल थी। बीच में सुरक्षित चल रहे व्यक्ति के हाथ में कुछ भी नहीं था।
वंदियादेवन के हृदय से आतंक का अंतिम चिह्न भी मिट गया, और उसके स्थान पर विशुद्ध, तीव्र विस्मय की एक लहर आ टकराई — क्योंकि मशाल का प्रकाश क्रमशः उज्ज्वल होकर उनके चेहरों को आलोकित कर गया।
सामने भाला लिए चल रहा व्यक्ति और कोई नहीं, उसका प्रिय पुराना मित्र कंदमारन था!
और बीच का व्यक्ति... क्षण भर के लिए वंदियादेवन को एक भ्रामक, सिर चकराने वाली अनुभूति हुई, जैसे वह किसी विचित्र जाग्रत-स्वप्न में फँस गया हो। चेहरा आश्चर्यजनक रूप से नंदिनी जैसा था। किन्तु अगले ही पल काँपता हुआ प्रकाश हटा, और उसने देखा कि वह एक पुरुष था। वास्तव में वह सुंदर, सुकुमार-मुख राजकुमार मधुरान्तकन था, जिसे उसने कडम्बूर के शंबुवरायर प्रासाद में दूर से एक झलक देखा था। तीसरा व्यक्ति अपरिचित था — संभवतः कोई साधारण-सा निष्ठावान सेवक या हृष्ट-पुष्ट सैनिक।
वल्लभरायन का तीव्र मस्तिष्क असाधारण गति से घूमने लगा। कुछ ही क्षणों में उसने इस छोटी-सी त्रिमूर्ति का रहस्य सुलझा लिया — स्याह सीढ़ियों से चुपचाप ऊपर आते इन तीन व्यक्तियों का रहस्य। पऴुवूर की युवती रानी ने दुर्ग में एक दिन पहले प्रवेश किया था; बड़े पऴुवेत्तरायर उससे भी पिछली रात आए थे। दोनों दुर्ग छोड़कर सार्वजनिक रूप से, जनसमूह की भरी दृष्टि के सामने नगर में लौटे थे। किन्तु राजकुमार मधुरान्तकन सर्वथा भिन्न थे; उनकी आवाजाही को संसार की दृष्टि से कठोरतापूर्वक छिपाए रखना आवश्यक था। इसीलिए यह गुप्त भूमिगत सुरंग थी। और निःसंदेह यही इस छायामय प्रासाद की भारी निस्तब्धता का वास्तविक कारण था।
और उसका प्रिय मित्र कंदमारन? कोल्लिडम के कीचड़-भरे तट पर वंदियादेवन को विदा करने के पश्चात कडम्बूर का वह युवा वंशज संभवतः शीघ्रता से जाकर बड़े पऴुवेत्तरायर से मिल गया था। वृद्ध अधिपति ने फुर्ती से उस युवक को अपनी व्यक्तिगत सेवा में नियुक्त कर लिया था। और उसके अति-गुप्त उत्तरदायित्वों में से एक संभवतः यही था — गुप्त मार्ग से राजकुमार मधुरान्तकन को पथ दिखाकर ले जाना।
आह! अब वंदियादेवन को स्मरण आया। कंदमारन ने तो तंजावुर में उसकी प्रतीक्षा कर रहे एक विशेष कार्य के विषय में बड़े ही धुँधले, गर्वित ढंग से बताया था। “शीघ्र ही मैं तुम्हें वहाँ मिलूँगा — एक विशेष कार्य के भार से…” उसने कहा था। निःसंदेह यही वह महान दायित्व था।
अच्छा, यदि यह वंदियादेवन सहसा एक पाषाण-भूत के पीछे से निकलकर स्वयं को प्रस्तुत कर दे, तो उसका प्रिय मित्र क्या सोचेगा? कुछ क्षण वह इस विचार से खेला, फिर शीघ्र ही अपना मत बदल लिया। कंदमारन के सम्मुख स्वयं को प्रकट करना — यह उसका सबसे बड़ा अनर्थकारी कार्य होगा, जो उसे कदापि नहीं करना चाहिए। इस तनावपूर्ण परिस्थिति में, और जब दोनों अलग-अलग स्वामियों के प्रति गंभीर शपथ से बँधे हैं, तब दो भयंकर घटनाओं में से एक अवश्य घटेगी। या तो कर्तव्य की विवशता में कंदमारन उसे मार डालना चाहेगा, या फिर वंदियादेवन को ही अपने मित्र से लड़ना होगा। दोनों ही मार्ग अकल्पनीय थे, यह कहने की आवश्यकता नहीं। ऐसी वीभत्स, करुण उलझन को वह भला क्यों पनपने देता?
तब तक वह गुप्त त्रिमूर्ति सीढ़ियों के शीर्ष पर पहुँचकर चुपचाप कक्ष को पार करती हुई दृष्टि से ओझल हो चुकी थी। पीली मशाल का प्रकाश धीरे-धीरे पुनः अंधकार में विलीन हो गया। वंदियादेवन ने क्षण भर के लिए उनका पीछा करने का विचार किया, फिर शीघ्र ही उसे झटक दिया। निश्चय ही वे सीधे छोटे पऴुवेत्तरायर के भारी-पहरे वाले प्रासाद की ओर जा रहे थे। उस भिड़ों के छत्ते में वापस लौटने का वल्लभरायन के लिए क्या अर्थ था? उससे तो कहीं अच्छा था कि वह अपना शीश स्वेच्छा से सिंह के खुले जबड़े में डाल दे — जहाँ से उसने अभी-अभी बड़ी कठिनाई से स्वयं को बाहर खींचा था।
नंदिनी के उद्यान-मंडप में लौटने का भी कोई अर्थ नहीं था। कौन जाने, तब तक शायद स्वयं बड़े पऴुवेत्तरायर वहाँ आ पहुँचे हों, और हर छायादार कोने में संकट घात लगाए बैठा हो।
तो फिर, एक व्यक्ति और कर ही क्या सकता है? खैर, उसने मन-ही-मन सोचा, उसी सीढ़ी से नीचे उतर जाने में क्या हानि है? जैसा सोचा, वैसा ही किया। हमारे युवा, अदम्य योद्धा ने सावधानी से स्तंभ की ओट से निकलकर पहला पाषाण-सोपान खोजा, और अँधेरे में उसने अपना लंबा, सतर्क अवरोहण आरम्भ कर दिया।
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