उस अल्प समय के विश्राम से वंदियादेवन का घोड़ा पूर्ण रूप से तरोताज़ा हो उठा था। तेज़, एक समान लय में दौड़ते हुए वह युवक एक नाड़िगै (समय की एक पारम्परिक इकाई, लगभग चौबीस मिनट) के भीतर ही कड़म्बूर प्रासाद के विराट फाटक के सम्मुख आ पहुँचा।
चोल-साम्राज्य के सुविस्तृत ध्वज तले अनेक प्राचीन सामंत-प्रमुख सत्ता का भोग करते थे; सेंगण्णर सम्बुवरायर उन्हीं में से एक थे। और उनका निवास-स्थान मानो इसी बात का डंका पीट रहा था। प्रासाद का प्रवेश-द्वार देखकर ऐसा लगता था, मानो किसी महानगर के भीमकाय, भयावह तोरणद्वार से होड़ ले रहा हो। दोनों ओर की दीवारें मोटी और अदम्य थीं, जो मंदिर की सुरक्षित प्राचीर (मदिल) की भाँति मुड़ती-बल खाती हुई फैली थीं।
ढलती संध्या के प्रकाश में वह स्थान प्राणों के कोलाहल से गूँज रहा था। हाथी, घोड़े और हृष्ट-पुष्ट बैल एक-दूसरे से सटे धूल में भारी साँसें ले रहे थे। उनके सईस जल भरने आए लोगों के साथ जगह के लिए धक्कम-धक्का कर रहे थे। मशालची अपनी लौ ऊँची उठाए उन लोगों को हाँक लगा रहे थे, जो भारी पीतल के पात्रों में तेल लिए दौड़-भाग कर रहे थे।
प्रांगण उत्साही चीत्कारों और उत्सव के आनंदमय कलरव से गूँज रहा था। वंदियादेवन खुले स्थान के किनारे ठिठक गया। उसके हृदय में सहसा एक दुविधा और विषाद की सिहरन दौड़ गई। यह स्पष्ट था कि वह किसी महोत्सव के ठीक बीचोबीच आ पहुँचा है। न जाने क्यों, उसे लगा कि यह बात उसके पक्ष में नहीं जाएगी।
फिर भी, एक बालसुलभ कौतूहल उसे अपनी ओर खींच रहा था। इतने आमोद-प्रमोद का कारण जानने के लिए वह अधीर हो उठा। विराट फाटक खुला तो था, किन्तु उसकी रक्षा में भारी कवच पहने भीमकाय प्रहरियों का दल खड़ा था, जिनकी तलवारें और भाले एकदम तैयार थे। सच तो यह है कि उछलती मशालों की रोशनी में वे मनुष्य कम, पाताल लोक के द्वार की रक्षा करते हिंसक दैत्यों का झुंड अधिक लग रहे थे।
यों ही खड़े-खड़े दुविधा में पड़े रहने से कोई लाभ नहीं — हमारे साहसी युवक ने मन-ही-मन निश्चय किया। धीमे-धीमे, छिपकर आगे बढ़ने की चेष्टा की तो तुरन्त पकड़ लिया जाएगा, उसे रोक दिया जाएगा। भीतर घुसने का एक ही उपाय है — एक साहसी मुखौटा ओढ़कर पूरे वेग से सैनिकों की ओर घोड़ा दौड़ाकर सीधे भीतर घुस पड़ना।
वंदियादेवन के लिए सोचना ही करना था। उसने तुरन्त घोड़े को आगे बढ़ाया। किन्तु हाय, कैसी निराशा! जैसे ही वह खट-खट करता हुआ प्रवेश-द्वार पर पहुँचा, दो हृष्ट-पुष्ट प्रहरियों ने कुशलतापूर्वक अपने लम्बे भाले आड़े करके उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया, और चार अन्य ने घोड़े की लगाम कसकर पकड़ ली। एक ने गर्दन बढ़ाकर, आँखें सिकोड़कर उस घुसपैठिए को देखा। दूसरे ने युवक के मुख के समीप एक तेल की मशाल लाकर उसे भली-भाँति परखना चाहा।
"अरे—ओ!" वंदियादेवन का गला कृत्रिम क्रोध से भर्रा उठा। "यही है तुम्हारे सम्मानित अतिथियों से व्यवहार करने का ढंग? यही है तुम्हारी अतिथि-सेवा का महान उदाहरण?"
"और तू कौन है रे, तंबि, जिसके सिर पर ऐसी अद्भुत ढीठ ज़बान चढ़ी है?" एक प्रहरी ने पूछा। भयभीत होने के स्थान पर उसके स्वर में कौतुक था।
"मेरा नाम और परिचय जानना चाहते हो? तो सुनो!" वंदियादेवन ने छाती फुलाकर गर्जना की। "मेरा देश वानगप्पाड़ि है, और मैं तिरुवल्लम को अपना नगर कहता हूँ। एक समय था, जब तुम्हारे लोग गर्व से मेरे वीर पूर्वजों के नाम अपनी छाती पर गुदवाते थे! मैं वल्लभरायन वंदियादेवन हूँ। क्या इससे तुम्हारी तृप्ति हुई?"
"वाह! क्या कहने!" एक प्रहरी मुँह भरकर हँसते हुए बोला। "तो यह बताओ, आने से पहले अपनी ये बड़ी-बड़ी उपाधियाँ सुनाने के लिए एक कट्टियक्कारन (राजकीय उद्घोषक) साथ क्यों नहीं लाए?" बाकी सैनिक भी सौहार्दपूर्ण हँसी से खिलखिला उठे।
"तुम्हारी उपाधियाँ चाहे जितनी ऊँची हों, इस समय तुम प्रासाद की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते," प्रहरी-प्रमुख ने घोषणा की, उसका स्वर कठोर हो गया। "हमारे सभी अपेक्षित अतिथि आ चुके हैं, और स्वामी का कड़ा आदेश है — कि एक भी अन्य प्राणी को भीतर न आने दिया जाए।"
तब तक फाटक पर इस छोटी-सी हलचल ने कुछ ध्यान खींच लिया था। दीवार के ठीक भीतर कुछ प्रहरी आलस्य से गप्पें हाँक रहे थे; वे यह देखने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़े कि यह क्या तमाशा है। उनमें से एक ने नवागंतुक को बहुत देर तक तीक्ष्ण दृष्टि से घूरा, फिर अचानक चौंक उठा।
"अरे, यह तो वही व्यक्ति है, जिसे आज शाम हमने मंदिर-प्रांगण से खच्चर समेत खदेड़ दिया था, है न?"
"खच्चर मत कह, गधा कह, अरे मूर्ख," एक घरेलू मसखरे ने बात जोड़ी।
"आह, मेरे मित्रों," तीसरे ने नाटकीय मुद्रा में खड़े होकर घोषणा की, "इस कुलीन गधे के स्वामी की अत्यंत गर्वित चाल पर तनिक ध्यान तो दो!"
इन कटाक्षों को सहते हुए, वहाँ बैठे-बैठे वंदियादेवन का मस्तिष्क तेज़ी से चल रहा था। भीतर घुसने के लिए इन लोगों से हाथापाई करने में कोई लाभ नहीं। घोड़ा घुमाकर लौट जाना भी मूर्खता होगी। सबसे उत्तम युक्ति एक ही है — अंगरखे के भीतर हाथ डालकर युवराज आदित्य करिकालन का राजकीय चिह्न इन हँसमुख मूर्खों के सामने एक बार चमका दिया जाए। फिर इनकी मुख-मुद्रा ही बदल जाएगी। उत्तर चोल सशस्त्र सेना के प्रधान सेनापति का चिह्न जो धारण करता हो, उसका मार्ग रोकने का साहस किसमें है? पेन्नै नदी के उत्तरी तट से लेकर तमिऴगम के धुर दक्षिणी छोर कुमारी तक एक भी प्राणी स्वप्न में भी ऐसा नहीं सोच सकता।
पऴुवूर के प्रहरियों का अन्तिम कटाक्ष उसके कानों में आकर गूँजा। और उसी ने उसे एक आकस्मिक, दुस्साहसी निर्णय की ओर धकेल दिया।
"लगाम छोड़ो," एक लम्बी साँस लेकर उसने कहा। "मैं जा रहा हूँ।"
उसके इस अचानक आत्मसमर्पण से चकित होकर सैनिकों ने चमड़े की लगामों से अपने हाथ ढीले कर दिए।
पलक झपकते ही वंदियादेवन ने घोड़े की पसलियों में ज़ोर से एड़ लगा दी। ठीक उसी क्षण, एक तीखी धात्विक सीटी की-सी ध्वनि के साथ उसकी तलवार म्यान से बाहर आ गई। उसने एक चौड़े, सनसनाते वृत्त में अपना अस्त्र घुमाया, और काँपती मशाल की लौ फलक पर नाच उठी। वह ऐसी आकस्मिक गति और निपुणता से हिला कि एक पल के लिए वह अत्यंत महिमावान दिखा — मानो स्वयं भगवान तिरुमाल परम और भयावह आत्मविश्वास से अपना दिव्य चक्र चला रहे हों।
भारी फलक एक भयावह सांय-सांय की ध्वनि के साथ संध्या की वायु को चीर गया। चौंका हुआ घोड़ा आगे की ओर एक ज़ोरदार छलाँग मारकर, सीधे फाटक को भेदता हुआ भीतर घुस गया। दोनों ओर के प्रहरी पीछे की ओर छिटककर जा गिरे, धूल में बेढंगे ढंग से हाथ-पैर फैलाए। एक क्षण पहले जो दर्जन भर लम्बे भाले इतनी मज़बूती से तने हुए थे, वे खटाखट की ध्वनि के साथ पाषाण-प्रांगण में व्यर्थ के ढेर में बदल गए। जब घोड़ा उनके बीच कूदा, तो पऴुवूर के लोग केवल खड़े होकर मुँह बाए ताकते रह गए। यह विद्युत-गति का प्रत्याक्रमण उनकी कल्पना से भी परे था। और जब उन्हें लगा कि अभी उनकी खोपड़ी दो फाँक हो जाएगी, तब वे अपनी जगह छोड़कर जिसको जिधर मार्ग मिला, भाग निकले।
दर्जनों घटनाएँ जैसे एक साथ घट गईं। दुर्ग का भीमकाय, भारी फाटक कँकरियाकर धड़ाम से बन्द हो गया। प्रवेश-मार्ग के चारों ओर क्रुद्ध चीत्कारें फूट पड़ीं।
"पकड़ो इसे! अभी गिरा दो!"
गिरे हुए भाले उठा लिए गए, हड़बड़ी में म्यानों से तलवारें खींची गईं, धातु से धातु टकराई; अस्त्रों की तीक्ष्ण झंकार और संघर्ष पूरे प्रांगण में प्रतिध्वनित होने लगा। ऊपर दीवार पर प्रासाद के नगाड़चियों ने संकट की गंध पाकर तुरन्त रात्रि के अंधकार में एक उन्मत्त, गगनभेदी चेतावनी बजानी आरम्भ कर दी: दड़दम्! दड़दम्!
बीस, फिर तीस, फिर पचास भारी सशस्त्र सैनिक छाया से झुंड बनाकर बाहर निकले, और एक पल में वंदियादेवन और उसके फुफकारते घोड़े को घेर लिया। युवक ने एक क्षण भी संकोच नहीं किया। वह जीन से कूदकर नीचे उतरा, उसके बूट पत्थरों पर पड़े, और वह अपनी चमचमाती तलवार को विशाल, नाटकीय वृत्तों में घुमाने लगा।
"कंदमारा!" रात्रि के अंधकार में वह गरजा। "कंदमारा! बचाओ! तुम्हारे अपने ही सैनिक मेरी हत्या कर रहे हैं!"
घेरते हुए लोग जहाँ के तहाँ रुक गए, अचानक बड़े दुविधाग्रस्त दिखे।
"तत्काल रुको!" प्रासाद के ऊपरी काष्ठ-गलियारे से एक गहरा, वज्र-गंभीर स्वर गरजकर नीचे आया। "नीचे यह निरर्थक कोलाहल कैसा?"
नक्काशीदार जंगले के पास लोगों का एक समूह एकत्र हो गया था, जो प्रांगण की धूमिल रोशनी की ओर नीचे झुककर देख रहा था।
"स्वामी — एक दुष्ट अभी-अभी प्रहरियों को तोड़कर बलपूर्वक प्रासाद-प्रांगण में घुस आया है!" नीचे से एक सैनिक ने चिल्लाकर उत्तर दिया। "और वह बार-बार हमारे छोटे स्वामी का नाम लेकर चीख रहा है!"
"कंदमारा!" वह गहरा स्वर फिर गरजा। "नीचे जाकर देखो यह हंगामा क्या है!"
वह आदेशपूर्ण गर्जना सम्भवतः स्वयं वृद्ध सामंत-प्रमुख सेंगण्णर सम्बुवरायर की ही थी — साँस रोककर वंदियादेवन ने अनुमान लगाया। फिर कुछ मिनटों तक कोई नहीं हिला। हमारा नायक और उसे घेरे हुए सैनिकों का कसा हुआ चक्र अपनी-अपनी जगह पर खड़े रहे, सतर्क दृष्टि से एक-दूसरे को तौलते हुए।
"तो, यहाँ हो क्या रहा है?" इस बार एक बहुत युवा, और अधिक परिचित स्वर ने पुकारा।
सैनिक तुरन्त दो भागों में बँट गए और एक साफ़-सुथरा मार्ग बना दिया। एक युवक तीव्र गति से पंक्ति के बीच से आगे आया, किन्तु सामने का असाधारण दृश्य देखकर एकदम हक्का-बक्का होकर ठिठक गया। शत्रु-घेरे के ठीक मध्य में खड़ा वंदियादेवन मशाल की रोशनी में निर्द्विग्न भाव से तलवार घुमा रहा था — देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे वीर युवा प्रभु सुब्रह्मण्य अपना दिव्य भाला प्रदर्शित कर रहे हों।
"हे भगवान, मेरे मित्र — क्या सचमुच तुम हो?" कंदमारन आनन्द से दौड़कर चिल्लाया। उसने युवा योद्धा को अपनी दोनों भुजाओं में जकड़ लिया, एक प्रबल आलिंगन में उसे लगभग पीस ही डाला।
"तुमने ही तो बार-बार आग्रह किया था कि मैं आकर तुमसे मिलूँ," वंदियादेवन ने तलवार की नोक से चारों ओर खड़े सकपकाए हुए लोगों की ओर संकेत करते हुए कहा, "और जब अन्ततः मैं आया, तो देखो कैसा ज़बरदस्त वीरोचित स्वागत पाया।"
"अरे मूर्खों के दल! तुम्हारी खोपड़ी एक उलक्कै पर उगी पत्ती जितनी ही बेकार है!" कंदमारन ने सैनिकों को डाँटा। (उसने परिहास में एक पुरानी तमिल गाली का प्रयोग किया था — उलक्कै धान कूटने वाला भारी, लोहे से मढ़ा लकड़ी का मूसल होता है, जिसके जीवित होने या पत्तियाँ उगाने की लेशमात्र भी सम्भावना नहीं होती। उसने संकेत किया कि सैनिकों की बुद्धि भी ठीक वैसी ही थी: एकदम शून्य।) "दूर हो जाओ सब!"
और एक क्षण भी नष्ट न करते हुए, कंदमारन ने मित्र का हाथ गर्मजोशी से पकड़कर उसे लगभग खींचते हुए फाटक से दूर, प्रासाद के उष्ण, विस्तृत अंतःपुर की ओर ले गया।
युवा गृहस्वामी के पैर जैसे धरती को नहीं छू रहे थे। उत्साह से उसका हृदय नाच रहा था, वह अतिथि को शीघ्रता से लिए जा रहा था, प्रत्येक छोटा-बड़ा दृश्य दिखाने के लिए व्यग्र था। यौवन के सच्चे मित्र से पुनर्मिलन के क्षणों में सब कुछ इतना ही सुन्दर, इतना ही सरल होता है। प्रेम नामक एक वस्तु है अवश्य — आह! किन्तु प्रेम, अपने समस्त मादक आनन्द के बावजूद, अपने हिस्से की पीड़ा, कटु ईर्ष्या और निद्रारहित हृदय-विदारक रात्रियाँ भी साथ लाता है। किन्तु किशोरावस्था की गहरी मित्रता… आह, वह तो एक स्वर्ण-वस्तु है। निश्छल आनन्द, हल्का मन — दुःख की लेशमात्र छाया भी वहाँ प्रवेश नहीं कर पाती।
"अच्छा, कंदमारा," एक चौड़े गलियारे में तेज़ी से चलते हुए वंदियादेवन ने पूछा, पूर्ण रूप से शांत दिखने का प्रयास करते हुए। "देख रहा हूँ कि आज रात तुम्हारा घर बड़े-बड़े अतिथियों और उनके दल-बल से उमड़ रहा है। यह विशेष अवसर क्या है? और प्रहरी चारों ओर झुंड बनाकर घूम रहे हैं, इतनी कड़ी पहरेदारी क्यों है?"
"सब अभी तुम्हें बताता हूँ," कंदमारन मुँह भरकर मुस्कुराया। "लेकिन पहले यह बताओ — पेन्नै नदी के तट पर उस सैनिक छावनी में हमारे पुराने दिनों की बात याद है? तुम तो बस यही कहते रहते थे कि महान सामंत-प्रमुखों से मिलने के लिए तुम अपनी जान दे सकते हो। पऴुवेत्तरायर, मऴवरायर, यह प्रसिद्ध योद्धा, वह प्रबल सेनापति... तो, आज रात तुम उन सभी को देखोगे! एक को भी छोड़े बिना सभी को — उनके सेवकों, अंगरक्षकों, साथ लाए गए हर लाठी-पत्थर तक को। सब यहीं हैं, मेरी छत के नीचे!" उसने उल्लास से कहा।
पुनर्मिलन का पहला उत्साह जब शांत हुआ, तो कंदमारन स्वभावतः अपने प्रिय मित्र को सबसे पहले सबसे सम्मानित अतिथियों के लिए रखे गए विशाल सभा-कक्ष में ले गया। तथापि, अतिथियों से मिलने से पहले गृहस्वामी को श्रद्धा अर्पित करना आवश्यक था।
"अप्पा (पिता), क्या मैंने आपसे अक्सर अपने प्राणप्रिय मित्र, प्राचीन वानर वंश के वंदियादेवन के विषय में नहीं कहा? यह देखिए, वह स्वयं साक्षात उपस्थित है," कंदमारन ने गर्व से युवक को अपने पिता के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए घोषणा की।
वंदियादेवन सदा ही अपने सद्वंश और शिक्षा के प्रति निष्ठावान था; उसने झुककर श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर अभिवादन किया। किन्तु किसी अव्यक्त कारण से वृद्ध सामंत-प्रमुख सम्बुवरायर उसके इस आकस्मिक आगमन से विशेष प्रसन्न नहीं दिखे।
"अच्छा?" वृद्ध व्यक्ति गरजकर बोले। "अभी कुछ देर पहले प्रांगण में वह लज्जाजनक उपद्रव तुमने ही मचाया था क्या?"
"नहीं, अप्पा — उसका कारण हमारे ये मोटी बुद्धि वाले प्रहरी थे," कंदमारन मित्र का पक्ष लेने को उत्सुक होकर बीच में ही बोल पड़ा।
"सच में?" सम्बुवरायर ने एक घनी, संशयपूर्ण भौंह उठाई। "यदि तुम जानना ही चाहते हो, कंदमारा, तो मैं कहता हूँ — आज की इस विशेष संध्या पर सूर्यास्त के आधे जामम (समय की पुरानी इकाई, लगभग डेढ़ घण्टा) बाद तुम्हारे मित्र का यहाँ पहुँचना, वह भी ऐसा अव्यवस्थित हो-हल्ला मचाते हुए — इसका कोई अच्छा कारण मुझे नहीं सूझता।"
कंदमारन का युवा मुखड़ा थोड़ा सिकुड़ गया। किन्तु यह स्पष्ट था कि इतने लोगों के सामने अपने दुर्धर्ष पिता से तर्क करने की उसकी लेशमात्र भी इच्छा नहीं थी। अपना गर्व निगलकर वह झटपट मित्र की बाँह पकड़कर उसे महान पऴुवेत्तरायर के पास ले गया — जो एकत्रित अधिपतियों के ठीक मध्य में एक भव्य नक्काशीदार आसन पर महिमा के साथ विराजमान थे।
"चाचा," कंदमारन ने गर्मजोशी से आरम्भ किया, "यह मेरा प्रिय मित्र वंदियादेवन है, जो यशस्वी वानर वंश का वंशज है। उत्तरी सीमा पर, पेन्नै नदी के किनारे शिविर में हम एक साथ कार्य करते थे। इसकी कितने समय से अभिलाषा थी, आपसे मिलने की — आप जो निर्विवाद वीरश्रेष्ठ हैं। मुझे याद है," युवक ने एक सरल, स्नेहभरी हँसी के साथ जोड़ा, "वह कैसे मेरे पीछे पड़ता था, पूछता था — क्या सचमुच आपकी छाती पर चौंसठ युद्ध-चिह्न हैं। और मैं सदैव कहता था, 'यदि इतना ही संदेह है, तो जाकर स्वयं मिलो और गिन लो!'"
"अच्छा, तंबि?" नवागंतुक पर अपनी शीतल, भारी दृष्टि स्थिर करके उस वृद्ध योद्धा ने उसे आपादमस्तक धीरे-धीरे देखा। "तो, मेरे घावों के निशान वास्तव में हैं भी या नहीं, इस पर तुम्हें विश्वास नहीं होता? या तुम्हारा यह विचित्र दावा है — कि पृथ्वी पर तुम्हारे अपने वानर वंश के अतिरिक्त और किसी परिवार की छाती में सच्चा साहस नहीं हो सकता?"
दोनों युवा मित्र एकदम हतप्रभ होकर उनकी ओर ताकते रह गए। इस छोटी-सी कहानी में थोड़ी अतिरंजित चाटुकारिता के अतिरिक्त और कुछ भी व्यक्त करने का दोनों में से किसी का भी आशय नहीं था। यह बात कि महान व्यक्ति इससे अपमानित अनुभव कर सकते हैं — उनके निष्पाप मन में एक क्षण के लिए भी नहीं आई थी। वंदियादेवन ने अपने हृदय में एक गर्म झुँझलाहट की चुभन अनुभव की, किन्तु क्रोध के प्रकट होने से पहले ही उसे शीघ्रता से दबा दिया, और अपना मुखड़ा चिकना बना लिया।
"अय्या," उसने सबसे संयत, श्रद्धापूर्ण स्वर में उत्तर दिया, "पऴुवेत्तरायरों की कीर्ति तो इस देश के कोने-कोने में फैली है — इमयम् (हिमालय) के बर्फीले शिखरों से लेकर कुमारी के धुर दक्षिणी छोर तक। मैं, एक नगण्य युवक, कौन होता हूँ जो आपकी किंबदन्तीतुल्य वीरता पर लेशमात्र भी संदेह करूँ?"
"बुरा नहीं," इस सहज उत्तर से शांत होकर पऴुवेत्तरायर गरजकर बोले। "देख रहा हूँ, उस सिर में थोड़ी बुद्धि तो है तुम्हारे।"
इसके बाद सचमुच कहने को और कुछ नहीं बचा। वंदियादेवन और कंदमारन शिष्टतापूर्वक, शीघ्रता से वहाँ से निकल गए — हृदय में उतनी राहत लिए, जितनी वे मुख से स्वीकार करने को तैयार न थे। पहला अवसर पाते ही वृद्ध सम्बुवरायर ने अपने पुत्र को खींचकर छाया में कर लिया।
"अपने उस अमूल्य मित्र को ले जाकर भली-भाँति खिलाओ, और फिर सबके रास्ते से दूर कहीं एकांत में सुला देना," पिता ने तीक्ष्ण स्वर में फुसफुसाकर कहा। "दिन भर की इतनी लम्बी यात्रा के बाद निश्चय ही थक गया होगा।"
कंदमारन (जिसे मारवन भी कहा जाता था) ने रूखे, संक्षिप्त ढंग से सिर हिलाया। यह स्पष्ट था कि वह इस अपमान से क्रुद्ध था।
कुछ देर बाद, मन बहलाने को उत्सुक कंदमारन अतिथि को अंतःपुर (स्त्रियों के लिए आरक्षित भीतरी व्यक्तिगत कक्ष) में ले गया, जहाँ राजपरिवार की रमणियाँ एक भव्य, खचाखच सभा में एकत्रित थीं। वंदियादेवन ने यहाँ भी कर्तव्यनिष्ठा से श्रद्धा अर्पित की, मित्र की कोमल हृदया माता के चरण स्पर्श कर उनका मूक, स्नेहपूर्ण आशीर्वाद लिया।
वृद्धा रमणी के पीछे आधी छिपी, एक मीठी लज्जा में पूर्णतः डूबी हुई एक युवती खड़ी थी। यही निश्चय ही कंदमारन की बहन होगी, वंदियादेवन ने अनुमान लगाया। छावनी के लम्बे महीनों में कड़म्बूर के राजकुमार ने उस कन्या का वर्णन ऐसी दीप्त, काव्यात्मक भाषा में किया था कि हमारे नायक की कुछ अति-सक्रिय कल्पना में उसने एक देवी की असम्भव दीप्ति धारण कर ली थी। अब अन्ततः उस कन्या को साक्षात देखकर वंदियादेवन ने एक छोटी, गुप्त निराशा की चुभन अनुभव की। वह यथेष्ट सुन्दरी थी, किन्तु किसी भी दृष्टि से कोई स्वर्गीय सत्ता नहीं थी।
उसकी काली आँखें कोमलता से रमणियों की सभा के ऊपर से गुज़रीं, दीपों के प्रकाश में एकत्रित, देदीप्यमान वेशभूषा में सजी मूर्तियों को तीक्ष्ण दृष्टि से देखती रहीं। होठों पर एक शिष्ट मुस्कान लाकर वह यह सोचे बिना न रह सका — इनके मध्य कौन है वह रहस्यमयी, सुन्दरी रमणी, जो महान पऴुवेत्तरायर के ठीक पीछे पर्दानशीन पालकी में चल रही थी?
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