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पोन्नियिन सेल्वन Matribhasa Hindi · चौदहवाँ अध्याय — नदी-तट का मगरमच्छ
A historical fiction-themed illustration for पोन्नियिन सेल्वन

चौदहवाँ अध्याय — नदी-तट का मगरमच्छ

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उस युग में, कुडंदै से तंजावुर जाने वाले यात्रियों का एक सुनिश्चित मार्ग हुआ करता था। वे अरिसिलारु — यानी अरिसिल नदी — के हरित तट के किनारे-किनारे, अथवा महानदी पोन्नि के आँचल से लगकर तिरुवैयारु की ओर बढ़ जाते थे। वहाँ से दक्षिण की ओर मुड़कर राजधानी का पथ पकड़ते थे। इस मार्ग को चुनने का कारण भी सीधा-सादा था। यहाँ नौकाओं का अभाव न था, इसलिए मार्ग को आड़ा-तिरछा काटती एक के बाद एक नदियाँ — कुडामुरुट्टि, वेट्टारु, वेण्णारु, वडवारु — पार करने में कोई कष्ट न होता।

वंदियादेवन ने भी कोई भिन्न मार्ग नहीं चुना। कुडंदै से निकलते ही उसने सबसे पहले अरिसिलारु की ओर घोड़ा दौड़ा दिया। और एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है — चोल देश का जितना ऐश्वर्य उसने अब तक देखा था, वह उसकी दुस्साहसी से दुस्साहसी कल्पनाओं को भी पार कर गया था। ऐसा रूप-सौंदर्य पहली बार आँखों के सामने आए तो किसी का भी श्वास विस्मय में अटक जाएगा, है न? अदरक और हल्दी की सघन, मृदा-गन्ध से भरे समृद्ध खेतों के पास से वह घोड़ा दौड़ाता चला गया। दिगंत-विस्तृत ईख और केलों के खेत, लंबे नारियल और पतले सुपारी के वृक्षों की छाया से ढके वन सरसराती ध्वनि में झूम रहे थे। कोमल जलधाराएँ, कल-कल करती बहती नदियाँ, शांत छोटे-छोटे सरोवर, बहती नहरें — जैसे एक-दूसरे के पीछे-पीछे आनंद से दौड़ रही हों।

नदियों में जलकुम्भी और कुमुदिनी एक-दूसरे से गुँथकर जंगली ढंग से खिल रही थीं। सरोवर लाल और श्वेत कमलों से उमड़ रहे थे, जिनके साथ लाल कुमुद सेन्गाझुनी और नीलकमल नीलोत्पलम मिलकर रंग और गंध का एक अद्भुत समागम रच रहे थे। सारसों के झुंड आकाश में उठ रहे थे, नीचे की धरती के उज्ज्वल रंगों पर तैरते हुए विशाल, धुँधले-श्वेत धब्बों के समान। लंबे, सुडौल बगुले ‘नारै’ उथले जल में एक लाल पाँव पर स्थिर खड़े थे, मानो गहरे ध्यान में डूबे हों। कृषि-भूमि के बीच से आड़ी-तिरछी कटी छोटी नहरें ठंडे जल से कलकल कर रही थीं। खेतों में गोबर, झरे पत्ते और नव-अंकुरों की खाद मिलकर मिट्टी को गहरी, श्यामल और उर्वर कीचड़ से भर रही थी। किसान भोर से संध्या तक सुखपूर्वक खेतों में परिश्रम कर रहे थे, एक समान लय में मिट्टी कोड़ते हुए। स्त्रियाँ धरती पर झुकी हुई नन्हें पौधे रोप रही थीं और उसी के साथ वायु में अपने भरे हुए कंठों से अद्भुत लोकगीत तैरा रही थीं।

पिछले वर्ष रोपे गए हृष्ट-पुष्ट लंबे गन्ने खेतों से काटकर निकट के कोल्हुओं में ले जाए जा रहे थे। वहाँ उन्हें तुरंत निचोड़कर मीठा, चिपचिपा रस निकाला जा रहा था। आस-पास ही बड़ी-बड़ी कड़ाहियों में ताज़ा गुड़ पकाया जा रहा था, और वह मीठी, भारी गंध वायु में मिलकर इंद्रियों पर ऐसा प्रहार कर रही थी कि मन बेचैन हो उठता था।

छोटी-छोटी मनोरम कुटियाएँ — किसी की छत पर फूस का सादा छप्पर, तो किसी की सजीली खपरैल — नारियल वनों के वैभव के मध्य से लज्जालु मुख से झाँक रही थीं। सामने का आँगन धोकर यत्नपूर्वक ताज़े गोबर से लीपा हुआ था, इतना स्वच्छ कि प्रातः के प्रकाश में दर्पण की भाँति चमक रहा था। किसी-किसी घर के आँगन में पीला धान सूखने को फैलाया हुआ था। मोटे-ताज़े मुर्गे प्रायः उन बिखरे दानों पर चोंच मार रहे थे, तृप्ति में गला फाड़कर "कुक्कूड़ूँ कूँ!" की बांग दे रहे थे, फिर इठलाती चाल से टहलते चले जा रहे थे। धान की रखवाली का भार जिन ग्राम-बालकों पर था, वे मुड़कर भी नहीं देख रहे थे। वे तब कौड़ियों के खेल में व्यस्त थे, या फिर पल्लांगुऴि में डूबे हुए थे — लकड़ी के फलक पर गड्ढे खोदकर कौड़ियों से खेला जाने वाला वह पारंपरिक घरेलू खेल, जिसकी लयबद्ध चाल बड़ी मनमोहक होती है। शायद वे सोच रहे थे, मुट्ठी भर मुर्गे आख़िर कितना ही खा लेंगे! जो भी हो, चोर पक्षियों को अपनी इच्छानुसार ही चलने दिया जा रहा था।

कुटियों की छतों से मंद काष्ठ-धूम्र कुंडलित होकर उठ रहा था। भात के उबलने, बाजरा और कंबु के भुनने तथा माँस के सिंकने की घरेलू, सुखद गंध मार्ग तक तैरकर आ रही थी, और उस गंध से वंदियादेवन की जिह्वा पर सचमुच पानी आ गया। उस युग के अधिकांश योद्धा सोलह आने मांसाहारी थे, और यह क्षुधातुर तरुण भी उन्हीं में से एक था।

मार्ग के किनारे निश्चित दूरियों पर लुहार की भट्ठियाँ थीं, जिनके अंधकारपूर्ण गर्भ में जलते लाल कोयले प्रचंड तेज से धधक रहे थे। ठनाठन! ठनाठन! — तप्त लोहे को पीटने की वह झंकारयुक्त ध्वनि। भारी हल, लोहे के फावड़े, कुदाल — इन साधारण कृषि उपकरणों के साथ ही ढेर लगे थे नवनिर्मित तलवारों, चौड़ी ढालों, तने हुए धनुषों और तीक्ष्ण भालों के। नेक किसान और साहसी सैनिक — सभी उष्ण धूल में अपनी पसंद के औजार और अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने के लिए एक-दूसरे से कंधे-से-कंधा रगड़ रहे थे।

उस छोटे-से ग्राम के भी अपने सजे-सँवरे, यत्नपूर्वक रखे गए मंदिर थे, जो अपने विनम्र आकार के साथ गर्व से मेल खाते थे। इन पुण्यस्थलों में पीतल के चपटे घंटों ‘सेमक्कलम’ की शुभ ठुनठुनाहट, मंदिर के बड़े ढोल ‘नगारा’ की गहरी गूँज, पवित्र मंत्रोच्चार और शिव-भक्ति के पवित्र स्तोत्र ‘तेवारम’ का मधुर, सुरीला तान गूँज रहा था। ग्राम-देवियों, जैसे माँ मारियम्मन, को भक्तिपूर्वक नरम गद्दियों पर बिठाकर पथों पर शोभायात्रा में ले जाया जा रहा था। पुरोहित शोभायात्रा में आनंद से नृत्य कर रहे थे, प्रायः सिर पर रंगीन ‘करगम’ — नृत्य के लिए सिर पर संतुलन बनाकर धारण किया जाने वाला वह सजा हुआ कलश — उठा लेते, या फिर डमरू के आकार के छोटे ढोलक ‘उडुक्कै’ पर तीव्र ताल छेड़ देते, जो उनकी भक्ति का आनंदमय चिह्न था। और स्वभावतः, ग्रामवासियों से उन्हें ताज़े धान का नैवेद्य उदारतापूर्वक प्राप्त हो रहा था।

शांत गाय-बैल धीरे-धीरे ग्राम की गलियों से गुज़र रहे थे, उनके गले में बँधी पीतल की घंटियाँ सुर में बज रही थीं, और नन्हें ग्वाल-बालक उन्हें हरे-भरे चरागाहों की ओर हाँकते ले जा रहे थे। कुछ तो बाँस की बाँसुरी पर मीठी धुन भी मिला रहे थे। ईमानदार पसीने से चमकते मुख वाले किसान परिश्रम करते-करते ललाट पोंछ रहे थे, और विशाल वट तथा इमली के वृक्षों की ठंडी, छायादार छाँह में थोड़ा विश्राम कर रहे थे। इसी अवकाश में वे कोलाहलपूर्ण भेड़-युद्ध में मग्न हो जाते — सुदृढ़ सींगों वाले दो पशुओं को आमने-सामने खड़ा कर ऊँचे स्वर में चिल्लाकर उन्हें उत्तेजित करते।

फूस की छतों के ऊपर से मोरनियाँ खुले कंठ से पुकार रही थीं। मोर उस पुकार पर सर्वथा मोहित होकर, अपने भव्य, भारी पंखों को कुछ कष्टपूर्वक खींचते हुए, बेडौल ढंग से शून्य में डोलकर, अंततः अपनी संगिनियों के पास आ बैठ रहे थे। सुंदर धूसर कपोत इधर-उधर टहल रहे थे, अपनी छरहरी छोटी गर्दन को मोड़कर उज्ज्वल, जिज्ञासु आँखों से चारों ओर देख रहे थे। और बाँस के पिंजरों में बंदी वे रंगीन तोते और मीठे कंठ वाली बुलबुलें — आह, काष्ठ-कारागार के भीतर से वे असहाय छोटे प्राणी सबसे करुण गीत गा रहे थे।

हाँ, देखने को बहुत कुछ था, और वंदियादेवन उस अद्भुत दृश्य को प्राण भरकर पी रहा था, जबकि उसका घोड़ा धूल-भरे मार्ग पर टगबग-टगबग करता हुआ धीमी, अलस गति से चल रहा था। उसने अपने मन को सजग रखा था, इस जीवंत प्राण-चंचलता को जितना संभव हो सके, पकड़कर संजो लेने के लिए। फिर भी, बाहरी कोलाहलपूर्ण संसार में स्वयं को खो देने का वह जितना भी अथक प्रयास करे, मन के गभीरे, चेतना के निभृत कोने में, एक छवि अटकी हुई थी — वह स्पष्ट अनुभव कर रहा था। नव-स्मृति के बदलते हुए कुहासे में ढँका एक सुंदरी तरुणी का मुख।

आह, प्रवाल जैसे होंठों को तनिक खोलकर दो-चार सहज शब्द क्या वह उसे नहीं कह सकती थी? उससे उसका विशेष कुछ बिगड़ तो न जाता। कौन हो सकती है वह? ख़ैर, वंदियादेवन ने स्वयं को समझाया — उस कन्या में स्पष्टतः शिष्टाचार का विशेष ज्ञान नहीं था। अन्यथा उसकी ओर तनिक ध्यान तो देती। वह, यह वल्लभरायन वंदियादेवन, क्या इतना तुच्छ मनुष्य का नमूना है कि उसे इस प्रकार सर्वथा उपेक्षित किया जाए?

और उस धूर्त बूढ़े ज्योतिषी ने भी उस कन्या की वास्तविक पहचान के विषय में एक शब्द तक नहीं कहा! सचमुच बुद्धिमान, चतुर वृद्ध था — कितनी सरलता से उसने उस तरुण योद्धा का मन दूसरी, बड़ी-बड़ी चिंताओं की ओर मोड़ दिया। कितना अद्भुत सूक्ष्मदर्शी था वह व्यक्ति, और कितना विशाल था उसका सांसारिक अनुभव! सच कहा जाए तो, वह व्यक्ति काम की एक भी बात कहे बिना ही बच निकला था। राज-कार्य को लेकर उसकी विभिन्न भविष्यवाणियाँ अत्यंत धुँधली थीं, एक वृद्ध की सावधानी में लिपटी हुई। जो दो-चार बातें वह कहने को राज़ी हुआ था, उनमें से अधिकांश तो सर्वविदित थीं।

फिर भी ज्योतिषी ने स्पष्ट रूप से कहा था, कि वंदियादेवन के अपने ग्रह अब ऊर्ध्वमुखी हैं। केवल उस सांत्वना के लिए ही उस वृद्ध का भाग्य थोड़ा प्रसन्न होना चाहिए। कुडंदै के ज्योतिषी की जय हो!

इसी प्रकार वंदियादेवन आगे बढ़ता रहा, उसका अस्थिर मन यात्रा-पथ पर अब तक सुनी और देखी सभी बातों में व्यस्त था। कभी-कभी बाहरी जीवंत संसार उसका बिखरा हुआ ध्यान खींच लेता, और वह कुछ सुखद क्षणों के लिए अपना मन वृक्षों और पक्षियों को सौंप देता।

अंततः मार्ग उसे उसके अभीष्ट गंतव्य — अरिसिलारु के पर्ण-छाया वाले तट — पर ले आया। निकट ही कुछ स्पष्ट शब्द कानों में पड़े, और उसने तत्काल घोड़ा रोक दिया। नारी-कंठ का हास — उज्ज्वल और स्बच्छ — जिसके साथ काँच की चूड़ियों की सुरीली टुनटुनाहट थी। वंदियादेवन ने भारी कौतूहल से नदी के तट की ओर देखा, किंतु वृक्षों के घने हरे पत्तों ने उन कन्याओं को मार्ग से भली-भाँति छिपा रखा था। उन्हें ढूँढ़ निकालने की एक आकस्मिक इच्छा उस पर हावी हो गई, और वह चुपके से घोड़ा लेकर नदी के किनारे-किनारे दुलकी चाल से आगे बढ़ने लगा, वृक्षों के झुरमुट से उत्सुकतापूर्वक झाँककर देखने लगा कि वे कहाँ छिपी हैं।

सहसा दोपहर की निस्तब्धता को चीरती हुई एक तीक्ष्ण आर्तनाद उठी।

"आइयो! आइयो! एक मगरमच्छ — बचाओ, बचाओ!"

क्षण भर में वंदियादेवन ने घोड़ा दौड़ा दिया, उस भयार्त कंठ के स्रोत की ओर भागा। वह रहा! घनी वनस्पतियों के एक छोटे से खुले स्थान से उसने कुछ कन्याओं को एकत्र देखा। उनके मुखों पर चरम आतंक की गहरी छाप थी — और आह, क्या आश्चर्य! उनमें से दो तो वही तरुणियाँ थीं, जिन्हें उसने कुछ ही समय पूर्व ज्योतिषी के घर पर देखा था।

यह सब देखने में वंदियादेवन को केवल कुछ ही क्षण लगे — पर उसने केवल कन्याओं को ही नहीं देखा। एक बड़े वृक्ष की फैली हुई डाल के नीचे, नदी-तट की भीगी, गहरी छाया में ढका, पड़ा था एक विशाल, भयंकर मगरमच्छ। आधा कीचड़ पर, आधा उथले जल में — देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह उस विशाल वृक्ष की ही मोटी, गाँठदार जड़ों का कोई अंग हो। उसका भीमकाय मुँह खुला हुआ था, छुरे की भाँति तीक्ष्ण दाँतों की पंक्ति दिखा रहा था।

ऐसा ही एक भयंकर सरीसृप वंदियादेवन ने स्वयं कोल्लिडम के कीचड़-भरे जल में देखा था। वे कितने भयावह, निष्ठुर शिकारी होते हैं, इसके विषय में उसने अनेक कथाएँ भी सुनी थीं। छाया में इस प्रकार चुपचाप बैठा यह जंतु उसके समस्त दबे हुए भयों को जैसे सतह पर ले आया, और एक आकस्मिक खिंचाव से उसकी नसें झनझना उठीं। वह प्राणी मनुष्य के भोज के लिए सर्वथा तत्पर तो लग ही रहा था, यहाँ तक कि कुछ ही समय पूर्व जो तरुणियाँ हँस रही थीं, उनके बिलकुल निकट ही वह स्थित था, मुँह खुला हुआ, मानो उन्हीं पर आक्रमण करने को उद्यत हो। बस एक छलाँग की प्रतीक्षा थी — और कन्याएँ छिन्न-भिन्न हो जातीं!

यहाँ नदी का तट गुँथे हुए वृक्षों के झुरमुटों और काँटेदार झाड़ियों से भरा था। भयार्ता कन्याओं के लिए उन झाड़ियों को भेदकर भाग निकलने का कोई खुला मार्ग ही नहीं था। कुछ समय पूर्व उसका हृदय चाहे जितनी भी उलझनभरी, प्रेम-सघन भावनाओं से धुँधलाया हुआ क्यों न हो, वंदियादेवन का साहस और संकल्प एक क्षण के लिए भी नहीं डगमगाया। क्या करना है, इस पर उसने अमूल्य समय भी व्यर्थ नहीं किया। एक ही निर्बाध, चिकने प्रवाह में उसने अपना विश्वसनीय, तीक्ष्ण भाला उठाया, सावधानी से निशाना साधा, और अपनी संपूर्ण शक्ति से उसे फेंक दिया।

भारी अस्त्र दोपहर की वायु को चीरता हुआ मगरमच्छ के शरीर पर अचूक, अब्यर्थ लक्ष्य से जा लगा। वह उस जंतु के मोटे, चर्म-सदृश कवच को भेदकर थोड़ा-सा भीतर धँस गया। साथ ही, वंदियादेवन ने तलवार खींचकर घोड़े से छलाँग लगा दी, यह दृढ़ निश्चय करके — कि अब वह उस दानव को सदा के लिए छिन्न-भिन्न कर देगा।

किंतु — ये तरुणियाँ सहसा फिर क्यों हँस रही हैं, ठीक वैसे ही जैसे कुछ समय पूर्व हँस रही थीं? वंदियादेवन उस हँसी को लगभग सह ही नहीं पा रहा था। ऐसे समय में वे खिलखिलाकर क्यों हँस रही हैं, ईश्वर ही जाने!

वह ठिठककर खड़ा हो गया, सहसा अपने ही विषय में अनिश्चित होकर। उसके चारों ओर एकत्र हुई कन्याओं के सुंदर मुखों पर भय की एक लकीर भी शेष नहीं थी। बल्कि उन्हें बड़ा आनंद आ रहा था, उनकी काली आँखों में दबी हुई हँसी की झिलमिलाहट थी। कुछ ही क्षण पूर्व जिन्होंने इतने विश्वसनीय आतंक में चीत्कार किया था, ये वे असहाय तरुणियाँ लग ही नहीं रही थीं।

उनमें से एक — वही राजकीय, आदेशपूर्ण भंगिमा वाली तरुणी, जिसे ज्योतिषी के घर पर देखकर वह इतना मुग्ध हुआ था — स्पष्ट, सुरीले कंठ में बोल उठी।

"लड़कियो, चुप हो जाओ, सब! ऐसे समय में हँसना —!"

उसके कठोर, सुंदर शब्द वंदियादेवन के कानों में कुछ धुँधले-से गूँजे, मानो वह किसी अद्भुत स्वप्न के भीतर फँस गया हो। तलवार तब भी ऊँची उठी हुई थी, उसने धीरे-धीरे अपना ध्यान वापस उस मगरमच्छ की ओर केंद्रित किया। फिर घूमकर तीक्ष्ण दृष्टि से हँसी में काँपती हुई कन्याओं के दल की ओर ताकने लगा। उसके मन में एक मंद, भयानक संदेह सिर उठाने लगा — एक ऐसा संदेह जिसने उसे सर्वथा जमा दिया, लज्जा से उसका मन और शरीर दोनों ही तीव्र, जलन-भरे संकोच में सिकुड़ गए।

वह राजकीय तरुणी फिर से सुडौल भंगिमा में आगे आई, और उस भयंकर मगरमच्छ के ठीक सम्मुख आकर खड़ी हो गई, इस प्रकार मानो वह उस मगरमच्छ की ही रक्षा कर रही हो।

"आपको बहुत-बहुत धन्यवाद, अय्या — किंतु सच में कष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं।"

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