एक लगभग अभेद्य आम्रकुंज के भीतर से एक सँकरा-सा टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता गुज़रता था। उसी राह पर वह युवती तेज़, सधे हुए क़दमों से आगे बढ़ रही थी, और पीछे-पीछे वंदियादेवन जी-जान से उसके साथ ताल मिलाने की कोशिश कर रहा था। यह कोई सरल कार्य न था। सिर के ऊपर पत्तों का घना छज्जा-सा बना था, और दोनों ओर झाड़-झंखाड़ की घनी बाढ़ उसके पाँवों से लिपट रही थी। अँधेरे में वह कई बार ठोकर खाकर गिरते-गिरते बचा। एक बार तो एक पेड़ के तने से मुँह टकराने से बाल-बाल बचा, और फिर ठिठककर खड़ा हो गया। युवती ने उसकी ओर मुड़कर देखा।
“इतनी देर क्यों कर रहे हो?” उसने तीखी, फुसफुसाती आवाज़ में पूछा। “राह भूल गए क्या? तुम्हारी आँखें तो अँधेरे को भी भेद सकती हैं, नहीं?”
जवाब में वंदियादेवन ने केवल होंठों पर उँगली रखी। कुछ देर पहले युवती ने ही जो चेतावनी उसे दी थी, वही लौटा दी — “चुप!”
ठीक उसी क्षण, प्रासाद की चहारदीवारी के ठीक बाहर से खुरचने जैसी ध्वनियों की एक लड़ी और एक दबा हुआ कोलाहल उन दोनों के कानों में पड़ा। ऐसा लगा मानो कुछ लोग धूल में गुत्थमगुत्था हो रहे हों। वे छाया के आवरण में कुछ और आगे बढ़ गए। कुछ क्षणों बाद वंदियादेवन के मुख पर एक धीमी, गर्मजोशी भरी हँसी खिल उठी।
युवती फिर घूमी, और अँधेरे में एक भौंह उठाकर पूछा, “कुछ मज़ेदार नज़र आया क्या?”
“नज़र तो कुछ नहीं आया,” उसने उत्तर दिया। “बस कानों ने जो सुना।”
“क्या सुना?”
“जो लोग इतनी गरमी के साथ मेरे पीछे दौड़ रहे थे, उनके क़दमों की आहट तुमने नहीं सुनी क्या? उनकी घोर निराशा के बारे में सोचकर मैं अपनी हँसी रोक न सका।”
भय की एक छाया सहसा उसके चेहरे पर दौड़ गई। “कोई तुम्हारे पीछे लगा है? पर क्यों?”
“तो और क्या सोच रही थीं आप, कि मैं एक दीवार के नीचे उकडूँ बैठकर अँधेरे में काने पंछी की तरह क्यों टटोल रहा था?”
अचानक हवा का एक झोंका आम के पेड़ों के बीच से गुज़र गया, सिर के ऊपर की भारी डालियाँ हिल उठीं, और चाँदनी की एक रुपहली फाँक आकर वंदियादेवन के चेहरे पर पड़ी। युवती मुँह बाए उसकी ओर ताकती रह गई, उसके चेहरे पर घोर आश्चर्य का भाव था।
“इस तरह क्या देख रही हो?” उसने हल्के कौतुक से पूछा।
“मैं सोच रही थी कि तुम, मतलब… सच में तुम ही हो या नहीं,” वह हकला उठी।
“अगर मैं, मैं नहीं हूँ, तो और कौन होऊँगा?”
“नहीं, मतलब, पिछली बार जब तुम आए थे, तुम्हारी तो बड़ी-सी मूँछें थीं, है न?”
“कितनी बुद्धिमती हो तुम,” उसने नरम स्वर में छेड़ा। “मैं तो गहरी रातों में दीवारों पर चढ़-उतरकर अपनी दो जून की रोटी कमाता हूँ। तुम ही बताओ, हर हाल के हिसाब से भेष बदले बिना मुझ जैसा आदमी ज़्यादा दिन टिक सकता है क्या?”
“और तुम दिख भी रहे हो… पहले से कम उम्र के।”
“उस विषय में बताऊँ,” वह हँसा, “जब मिज़ाज अच्छा हो, तो इंसान हमेशा यौवन के झरने से पानी पीता है।”
“तुम्हारा मिज़ाज अच्छा है? क्यों?”
“तुम्हारी सुंदरी महारानी की करुणामयी, उदार कृपा जिसे मिल जाए, उस किसी भी मनुष्य का सुख तो निश्चित ही है।”
“ख़बरदार, उनका उपहास मत करना,” वह प्रबल निष्ठा से झंकार उठी। “वे अभी युवती रानी हैं, किंतु एक दिन वे पूर्ण रूप से साम्राज्ञी बनेंगी, इस विषय में कोई संदेह नहीं।”
“मैं भी ठीक यही मानता हूँ।”
“हाँ, तो तुम सहमत हो? और बाद में यह कहने से तुम्हें कौन रोकेगा कि तुम्हारे जादू और करतबों के बल पर ही उन्होंने वह आसन पाया है? बल्कि बदले में आधा साम्राज्य माँगने में भी तुम्हें कोई हिचक नहीं होगी!”
अब तक जो कुछ वह जानना चाहता था, उसमें से काफ़ी कुछ वंदियादेवन जान चुका था। चलते-चलते अब वह चुप रहा, और अपना समय घूमती, प्रबल चिंताओं में बिताने लगा। वह वास्तव में किससे मिलने जा रहा है? क्या यह नंदिनी हैं, पऴुवूर की युवती रानी? या फिर छोटे पऴुवेत्तरायर की वह बेटी, जिनका हाल ही में युवराज मधुरान्तक तेवर से विवाह हुआ है?
उसकी युवती पथप्रदर्शिका उसे सधे हुए क़दमों से प्रासाद की ओर लिए जा रही थी — उस लड़की को स्पष्ट रूप से दृढ़ विश्वास था कि वह एक घुमंतू जादूगर है। और अब उसे उस रहस्यमयी इलैया रानी से मिलना था। किंतु उनके सामने वह स्वयं को सँभालेगा कैसे? आह, बस भी करो, मेरे धड़कते हृदय! उसने स्वयं से कहा। जब तक मनुष्य का साहस बना रहता है, तब तक आशा भी बनी रहती है। इसके अतिरिक्त, यदि कोई गड़बड़ हो भी गई तो भाग निकलने की चालाक युक्तियों की भी कोई कमी नहीं होगी। अतीत में विपत्ति के समय उसके तेज़ दिमाग़ ने उसे कभी धोखा नहीं दिया था। तो अब क्यों देगा — विशेषकर जब प्रतिद्वंद्वी एक स्त्री हो?
वे एक बड़े, राजकीय प्रासाद के निकट आ पहुँचे। किंतु वे न तो उसके भव्य मुख्य द्वार की ओर गए, और न ही सादे पिछले दरवाज़े की ओर। बल्कि सीधे मुख्य भवन से निकले एक महीन उपांग की ओर बढ़े — एक मनोहर, अद्भुत कारीगरी से सजा हुआ लतामंडप। चाँदनी में निकट से देखने पर स्पष्ट हुआ कि यह कलात्मक बरामदा वास्तव में एक ढका हुआ मार्ग था, जो दो विशाल प्रासादों को जोड़ रहा था। तथापि, दोनों भवन जैसे सर्वथा भिन्न स्वभाव के थे। दाहिनी ओर वाला भवन रात के आकाश में जगमगा रहा था, दीपकों की गर्म रोशनी से भरा हुआ, मनुष्यों के कंठस्वरों की मंद प्रतिध्वनि और दैनंदिन कार्यों के आश्वस्तिकारक शब्दों से गुंजायमान था। किंतु बाईं ओर के प्रासाद में एक भी दीपक नहीं जल रहा था, खिड़की के पास एक छोटा-सा मिट्टी का दीया भी नहीं। उसकी विशाल दीवारें आकाश तक उठी हुई थीं, चाँदनी में पीली और भयावह, नैःशब्दय और गहरे अंधकार में सम्पूर्ण रूप से डूबी हुई।
लतामंडप के प्रवेश द्वार पर पहुँचकर युवती ने वंदियादेवन को वहीं खड़े रहने का इशारा किया। उसने आदेश का पालन किया और ठिठक गया, फिर एक लंबी, गहरी साँस ली — और साथ ही चारों ओर पुष्पों की प्रबल, अप्रतिरोध्य उपस्थिति का अनुभव किया। कैसी सुगंध! कैसी गहरी, मदहोश कर देने वाली रात्रि-गंध! चमेली और चंपा की मीठी महक गर्म हवा में लिपटकर उसके मस्तिष्क तक पहुँच रही थी, अपनी मादकता से उसे लगभग अवाक् कर दिया। युवती तब तक बरामदे के भीतर प्रवेश कर चुकी थी और धीमे स्वर में बात करने लगी थी — क्योंकि एक और कंठ, मधुर, सुरीला, निःसंदेह एक नारी का, तुरंत उसके साथ जुड़ गया था।
“पूछने की क्या आवश्यकता है? उसे तुरंत भीतर ले आओ; मैं कब से प्रतीक्षा कर रही हूँ!”
वह स्वर! एक मादक लता की भाँति सीधा उसकी अनुभूतियों में लिपटता चला गया, एक आकस्मिक, सुखद प्रतीक्षा में उसका सिर घुमा दिया। यह पऴुवूर की युवती रानी ही हैं — इसमें वंदियादेवन को अब लेशमात्र भी संदेह नहीं रहा। और कुछ ही क्षणों में वह ठीक उनके समक्ष खड़ा होगा। वह इस परिस्थिति को सँभालेगा कैसे? और वे क्या करेंगी, जब वे देखेंगी कि सामने खड़ा व्यक्ति वह बूढ़ा जादूगर नहीं है जिसकी वे प्रतीक्षा कर रही थीं, बल्कि वही धृष्ट तरुण है, जिसने अपना घोड़ा उनकी रेशमी पालकी से टकरा दिया था? क्या वे चौंककर सिहर उठेंगी? शायद, बस शायद, प्रसन्न ही होंगी? या फिर मुख पर कोई भाव ही नहीं आने देंगी?
किंतु ठहरो — यह तो उसकी युवती पथप्रदर्शिका पत्तों से ढके मंडप के प्रवेश द्वार पर पुनः लौट आई है। वह उसे भीतर आने का इशारा कर रही है। वंदियादेवन धीरे-धीरे आगे बढ़ा और बरामदे के भीतर झाँका। केवल एक क्षण — और सामने का दृश्य उसकी आँखों से होकर उसके मस्तिष्क में उतर गया, सदा के लिए स्मृति में अंकित हो गया।
एक ऊँचा दीया उज्ज्वल लौ के साथ जल रहा था, पॉलिश किए हुए सोने के एक भारी दीवट पर रखा हुआ, जो बरामदे के हर अँधेरे कोने में एक घनी, गर्म दीप्ति बिखेर रहा था। दीये के तेल में स्पष्ट रूप से कोई मूल्यवान धूप मिलाई गई थी; एक मीठी, भारी गंध हवा में अपना मार्ग बना रही थी। मध्य में एक नक्काशीदार शय्या रखी थी — खुदे हुए पायों वाला नीचा, चौड़ा लकड़ी का पलंग — जो ताज़े, सुगंधित पुष्पों से उदारतापूर्वक ढका हुआ था। और उस पर एक ऐसी युवती लेटी थी, जिसके सर्वांग पर महिमा और सहज लावण्य अंकित था।
हाँ, यही थीं नंदिनी, पऴुवूर की युवती रानी। दिन के रूखे, धूल भरे प्रकाश में पालकी में बैठी हुई वे सुंदरी तो लगी थीं, किंतु रात्रि में वे जैसे अनुपम सौंदर्य की ही प्रतिमूर्ति थीं। लग रहा था मानो कोई देवी अपने सम्पूर्ण दिव्य वैभव के साथ धरती पर उतर आई हो, पुष्पों की शय्या पर सहारा लेकर लेटी हो, और दीये की सुनहरी दीप्ति में उसका अद्भुत पार्श्वमुख स्पष्ट उभर आया हो। उस सुनहरी रोशनी की झलक, धूप की मंद, शांतिदायक धूनी की लकीर, और युवती रानी का अलौकिक, चमत्कृत कर देने वाला सौंदर्य—सबने मिलकर वंदियादेवन को पूरी तरह डाँवाडोल कर दिया। उसकी इंद्रियाँ बेकाबू हो गईं, सिर चकरा गया, और दृश्य के निरे ऐश्वर्य में वह पूर्णतया मत्त हो गया।
सावधान, वंदियादेवन! उसने स्वयं को सचेत किया। जीवन में केवल एक बार तुमने देसी मदिरा चखने का साहस किया था। याद है न, तुम्हारी सजग इन्द्रियों पर उसकी कैसी भयानक पकड़ थी? कैसे उसने तुम्हें बिल्कुल जड़ बना दिया था, घुटने कँपा दिए थे, और तुम्हें एक मूर्ख की भाँति मतवाला कर दिया था? तब तो तुमने शपथ ली थी कि फिर कभी एक बूँद भी नहीं छुओगे। उस दृढ़ प्रतिज्ञा को अब स्मरण रखो, स्वयं को मज़बूत करो। इस अद्भुत नई मादकता के आगे हार मत मानना—यह तो किसी भी कड़ी-से-कड़ी मदिरा से कई, कई गुना अधिक शक्तिशाली है!
नंदिनी उसकी ओर ताकती रहीं। उनके कोमल, प्रवाल-रंगी होंठ विस्मय में हल्के-से खुल गए, और भीतर मोतियों-से शुभ्र दाँतों की एक झलक दिखी। सच कहें तो, उनकी वह क्षणिक वाक्-शून्यता वंदियादेवन के ही काम आई, उसे अपनी बिखरती हुई बुद्धि को सँजोने का एक क्षण मिल गया। एक मंद, सहज मुस्कान के साथ वह सीधा उनकी ओर देखता रहा।
“रानीमाँ,” उसने कहा, “बाहर अँधेरे में आपकी यह दासी मेरे बारे में एक विचित्र संदेह पाल रही थी। जानना चाहती थी कि मैं जादूगर हूँ या नहीं। और जानती हैं यह बात कैसे उठाई? पेड़ के नीचे मेरी ओर मुड़कर पूछा, ‘क्या तुम, तुम ही हो?’”
उस स्मृति को याद करके वह फिर मंद-मंद मुस्कुराया। नंदिनी भी मुस्कुराईं। वंदियादेवन को लगा जैसे अचानक बिजली की एक कौंध ने उसकी दृष्टि चौंधिया दी हो; जैसे एक मीठे, गर्म जंगली मधु की वर्षा ने उसे सिर से पाँव तक भिगो दिया हो।
“लड़की तरह-तरह के अजीब ख़यालों में पड़ जाती है, क्या करूँ,” मंदिर की घंटी जैसे कंठ में रानी बोलीं। “वासुकी, अभी तक पेड़ की तरह जड़ें जमाए क्यों खड़ी है? अपनी जगह पर लौट जा। और बाहर ज़रा भी पदचाप सुनाई दे तो दरवाज़ा तुरंत बंद कर देना।”
“जैसी आज्ञा, अम्मा,” दासी ने धीमे स्वर में कहा।
वासुकी विदा हुई, और पत्तों से ढके बरामदे से होते हुए प्रकाश-दीप्त प्रासाद की ओर जाने वाले मार्ग पर निःशब्द चली गई। धुँधले प्रकाश वाले प्रवेश द्वार के पास, अपनी निर्धारित जगह पहुँचकर वह अपना घाघरा सँभालकर पहरे पर बैठ गई।
नंदिनी ज़रा-सा झुककर अपना गला धीमा कर बोलीं। “तुम कह रहे हो कि उसे विश्वास नहीं हुआ कि तुम जादूगर हो? मूर्ख लड़की है। मैं तुम्हें बता दूँ, इस नगर में जितने भी पुरुष स्वयं को जादूगर होने का दावा करते हैं, उनमें से आधे से अधिक तो केवल ठग हैं। किंतु तुम — तुम सच्चे जादूगर हो। आज आधी रात को यहाँ अचानक प्रकट होने के लिए कौन-सा मंत्र पढ़ा, सुनाओ तो?”
“इतना नाटकीय कुछ नहीं, रानीमाँ,” वंदियादेवन ने विनम्रता से मुस्कुराते हुए कहा। “मैं तो बस दीवार के पास सुविधा से रखी एक लकड़ी की सीढ़ी चढ़कर ऊपर आ गया।”
“वह तो स्पष्ट ही है,” उन्होंने आँखों में चमक लिए उत्तर दिया। “मैं तो यह कह रही थी कि इस बेचारी युवती को फुसलाने के लिए तुमने कौन-सा जादू चलाया?”
“मैंने अपनी मनमोहक मुस्कान का पूरा ज़ोर उस पर डाला, और साथ में सुंदर चाँद की रोशनी की सहायता ली,” उसने आँख नचाकर घोषणा की। “यदि उससे भी काम न बनता, तो मैंने सोचा था कि आपकी वह सोने की ताड़-चिह्न वाली अँगूठी उसे दिखाऊँगा, जो आपने बड़ी दया करके मुझे दी थी।”
“अर्थात् वह तुम्हारे पास सुरक्षित है? तब तो तुम दिन-दहाड़े गर्व से मुख्य द्वार से ही भीतर आ सकते थे। इस दमघोंटू अँधेरे में बाग़ में चोरी-छिपे क्यों घूम रहे हो?”
“यदि आप बुरा न मानें तो एक बात बताने की बड़ी इच्छा है, रानीमाँ — आपके देवर, छोटे पऴुवेत्तरायर के लोग चोर-उचक्कों के सिवा और कुछ नहीं हैं। पहले उन्होंने मेरे वस्त्र और सामान हथियाने का प्रयास किया। फिर हाट-बाज़ार में, राह-गलियों में, एक क्षण के लिए भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। आह, उनकी निगरानी के जाल को भेदने के लिए मुझे कैसी-कैसी धूर्त युक्तियाँ लगानी पड़ीं, आप विश्वास ही नहीं करेंगी! किसी तरह उन्हें चकमा दिया, जितनी धूल-भरी गलियाँ और सँकरे उपमार्ग याद आए, सबसे दौड़ा, गली के कुत्तों की तरह दरारों में घुस गया, और अंततः थके हुए पैरों से आपके प्रासाद की चहारदीवारी तक पहुँचा, चारों ओर घूम-घूमकर देखा। तभी पत्थर के सहारे टिकी हुई वह सीढ़ी नज़र आई। मैंने राहत की एक बड़ी साँस ली, सोचा कि आपने इस दीन प्राणी को याद रखा है, और मेरी सहायता के लिए ही उसे वहाँ रखवाया है। अब समझ रहा हूँ, मैंने ग़लत सोचा था। कृपया क्षमा करें।”
“क्षमा माँगने की कोई आवश्यकता नहीं देख रही,” उन्होंने नरम स्वर में कहा।
“किंतु… क्यों नहीं, अम्मणि?” उसने पूछा, किसी भद्र महिला के प्रति सम्मानपूर्ण किंतु स्नेहिल संबोधन का प्रयोग करते हुए।
“क्योंकि तुम्हारा अनुमान बहुत ग़लत नहीं था। जानती हो, मैंने पहले-पहल जादूगर की खोज क्यों की थी?”
“नहीं, मैं नहीं जानता। स्वीकार करना ही होगा कि मुझे जादू-टोने या नक्षत्र-विद्या का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है।”
“कल सुबह से मैं तुम्हारे ही बारे में सोच रही थी, जानते हो,” उन्होंने मंद स्वर में कहा। “सोच रही थी कि तुम अभी तक मुझसे मिलने क्यों नहीं आए। इसी कारण मैं एक जादूगर से परामर्श करना चाहती थी।”
“सचमुच, यह तो चकित करने वाली बात है,” वह सचमुच हक्का-बक्का होकर बोला।
“कौन-सी बात?”
“यही जो आपने अभी-अभी कहा। क्योंकि सच कहूँ तो, मैं भी तो कल सुबह से आपके ही बारे में सोच रहा था!”
उन्होंने खोजी दृष्टि से उसकी ओर देखा। “क्या तुम पूर्वजन्म में विश्वास करते हो? उस अदृश्य सूत्र में, जो हमें बाँधे रखता है, एक जन्म से दूसरे जन्म तक खींच ले जाता है?”
“इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है?”
“ज्ञानी-गुणी जनों के मुख से सुना है कि यदि दो व्यक्ति एक जन्म में मित्रता या किसी गहरे संबंध में दृढ़ता से बँध जाएँ, तो वही बंधन कभी-कभी अगले जन्म में भी उन्हें एक साथ खींच लाता है।”
“कल तक भी ऐसी मनमौजी बात सुनता तो ठहाका मारकर हँस पड़ता,” वंदियादेवन ने मृदु स्वर में स्वीकार किया। “किंतु अब… अनुभव कर रहा हूँ कि मैं इन सब पर विश्वास करने लगा हूँ।”
बाहरी आँखों के लिए वंदियादेवन केवल एक सुंदर, सुविधाजनक झूठ बोल रहा था, एक सुंदरी रानी को प्रसन्न करने के लिए। किंतु यह स्वीकार करना ही होगा कि ठीक उसी क्षण उसकी मन की आँखों में कुडंदै के ज्योतिषी के सादे-से घर में पहले दिखी उस मधुर-मुख वाली युवती की एक जीवंत स्मृति कौंध गई। नंदिनी को तो उसके मन के भीतर के विचार जानने का कोई उपाय था नहीं। इसलिए पऴुवूर की युवती रानी ने स्वाभाविक रूप से मान लिया कि वह सुंदर तरुण एकान्त उन्हीं की बात कर रहा है।
“किंतु मुझसे मिलने की तुम्हारी असली वजह यह तो नहीं थी, है न?” उन्होंने एक छोटी, ज्ञान-गर्भित मुस्कान के साथ पूछा। “आऴ्वारक्काडियान नंबि के किसी संदेश की बात जैसे कही गई थी…”
“जी हाँ, ठीक कहा, अम्मणि। वह संदेश पहुँचाना ही मेरा प्रथम और प्रमुख उद्देश्य था। किंतु सच कहूँ तो, एक बार आपको आँखों से देखने के बाद मैं सब… मतलब सब कुछ भूल गया।”
“आऴ्वारक्काडियान से तुम्हारी भेंट कहाँ हुई? और मेरे लिए उसका संदेश क्या है?”
“वीर नारायणपुरम नगर के कुछ बाहर। वे ठीक तब कुछ अत्यंत क्रुद्ध प्रतिपक्षियों के साथ अपनी लकड़ी की लाठी के ठोस बल पर जी-जान से अपने वैष्णव धर्म की परम श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। उसी क्षण महान बड़े पऴुवेत्तरायर की भव्य शोभायात्रा कडम्बूर के मार्ग पर हमारे पास से गुज़र रही थी। उनके तर्क की प्रबल ध्वनि निश्चय ही आपके कानों तक पहुँची होगी, क्योंकि आपने एक पतला-सा सुनहरा हाथ बढ़ाकर पालकी के रेशमी पर्दे को हटाकर देखने का प्रयास किया। तभी आऴ्वारक्काडियान ने आपको पहचान लिया, और एक संदेश भेजना चाहा। उन्होंने सोचा कि मैं वह पहुँचा सकूँगा, क्योंकि सौभाग्य से उस रात मैं कडम्बूर के प्रासाद में ही ठहर रहा था। किंतु दुर्भाग्य मेरा, मैं तांजावुर के उस महान दुर्ग के ठीक बाहर आने तक आपका साक्षात न पा सका — वह भी केवल इसलिए कि आपकी पालकी ठीक आकर मेरे बेचारे घोड़े से ज़ोर से टकरा गई!”
नंदिनी अब तक विचारमग्न आँखों से छाया में अपने ऊपर किसी एक बिंदु की ओर देख रही थीं; उनके शांत मुख का जितना अंश दिख रहा था, उससे वंदियादेवन उनके वास्तविक विचारों या भावनाओं का ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा सका। किंतु उसकी बात समाप्त होते ही वे उसकी ओर मुड़ीं।
“हाँ,” उन्होंने मंद स्वर में कहा, और उनका मुख सहसा एक अद्भुत, मनमोहिनी मुस्कान से भर गया। “मैं जिस भी पालकी में बैठती हूँ, वह हमेशा ही बड़ी दुष्ट और उपद्रवी निकलती है, है न?”
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