पहले भारी बाहरी पर्दे में एक हरकत हुई। उस पर कशीदाकारी से बना वह ताड़ का वृक्ष—पऴुवेत्तरायरों के गौरव का प्रतीक, जो राजकोष का भार सँभालते हैं। फिर भीतरी रेशमी परदे से एक धीमी-सी सरसराहट की ध्वनि आई। और तभी, वंदियादेवन की मंत्रमुग्ध आँखों के सामने, ढलते दिन की म्लान रोशनी में एक सोने-सा हाथ बाहर निकला—ठीक वैसा ही जैसा उसने एक बार पहले देखा था, उस धूल-भरी राह पर।
राजवंश के किसी व्यक्ति से बात करते समय घोड़े की पीठ पर बैठे रहना शोभा नहीं देता—यह सोचकर वह झट से नीचे कूद पड़ा, और लगभग दौड़ता हुआ पालकी की ओर गया। “महारानी! मेरे राजकुमार! आपके कहार—!” खिड़की की ओर मुँह उठाकर वह चीख़ पड़ा।
नीचे झाँकते हुए उस चेहरे को वह अपलक निहारता रहा। उसने पलकें झपकाईं, आँखें मलीं, और फिर से देखा। उसकी चकित आँखों के सामने जो रूप प्रकट हुआ, उसकी विशुद्ध दीप्ति और आभा में वह जैसे लगभग अंधा हो गया।
“नहीं, नहीं… मैं—” वंदियादेवन की जीभ जैसे भारी और बेकाम हो गई; गला अचानक बिलकुल सूख गया। “मतलब… नहीं, यह जो… आप तो पऴुवूर की रानी… अरे, पऴुवूर के राजकुमार हैं। आपके… अरे, आपके कहारों के घोड़ों ने मेरी पालकी में टक्कर मार दी है!” एक साँस में वह कह गया, और वाक्य को परम घबराहट के एक अद्भुत प्रदर्शन के साथ समाप्त किया।
यह सब कुछ, स्वभावतः, एक पल में ही घट गया। पऴुवूर के प्रहरी लगभग तुरंत आगे बढ़कर वंदियादेवन को घेर चुके थे। जिसका जीवन तलवार की धार पर कटता है, उसके रक्त में एक सहज बोध घुल-मिल जाता है; उसी बोध से हमारे इस तरुण ने भाँप लिया कि सैनिक उसे घेरकर और निकट आ रहे हैं। उसका हाथ जैसे अपनी ही इच्छा से धीरे-धीरे कमर पर बँधी तलवार की मूठ की ओर बढ़ गया। फिर भी, चाहे प्राण ही क्यों न चले जाते, पालकी की छाया के भीतर से उसकी ओर निहारते उस तरुणी के सुनहरे दीप्त मुख से वह किसी भी भाँति अपनी आँखें नहीं हटा सका।
भीतर जो बैठी थीं, वह कोई राजकुमार नहीं थे—चाहे उसने कितनी ही दृढ़ता से यह क्यों न सोचा हो—बल्कि एक स्त्री थीं। और क्या स्त्री थी! अपने इस छोटे-से जीवन में वंदियादेवन ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसा रूप वास्तव में हो सकता है—ऐसा रूप, जो किसी हल्की गरम संध्या में किसी भी मनुष्य को उसके होश-हवास से बेदखल कर सकता है।
सौभाग्य से, उसके मस्तिष्क का कोई छोटा-सा, विवेकपूर्ण कोना अब भी काम कर रहा था। अचानक एक साहसी विचार उस पर हावी हो गया, और उसने उसी विचार पर भरोसा करने का निश्चय किया। अपना सारा साहस बटोरकर, सही शब्दों को जीभ पर लाने के लिए उसने एक बड़ा प्रयास किया।
“क्षमा करेंगे,” थोड़ा-सा सिर झुकाकर वह बोला, “किंतु मैं पऴुवूर की इलया रानी के करुणामय सान्निध्य में हूँ, है न? आपसे एक बार भेंट हो सके, इसी आशा में तो मैं इतनी दूर से आया हूँ!”
पऴुवूर की तरुण रानी ने अपनी काली, सुंदर आँखें वंदियादेवन पर स्थिर कर दीं। उनके सुनहरे मुख पर एक शांत, छोटी-सी मुस्कान उभरी। जैसे कोई कमल-कली प्रभात के सूर्य के समक्ष अपनी कोमल पंखुड़ियाँ खोले, और भीतर से झिलमिलाते श्वेत मोतियों की पंक्ति दिख जाए। उस विशुद्ध सौंदर्य से वंदियादेवन एक बार फिर अवाक् रह गया। पालकी को घेरे खड़े प्रहरी ठिठक गए, और अपने पैरों पर भार बदलते हुए रानी के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। उन्होंने हाथ से एक हल्का-सा राजकीय संकेत किया, और वे सब एक उचित दूरी पर हटकर खड़े हो गए।
दो सैनिक आगे आए और वंदियादेवन के घोड़े की लगाम पकड़कर खींचने लगे—घोड़ा अब भी छटपटाकर पालकी से टकरा रहा था। युवती ने अपनी दृष्टि फिर उस वानर योद्धा की ओर फेरी—अभिजात वानर कुल का एक तरुण—और वंदियादेवन को लगा जैसे दो तीखे छोटे भाले उसकी छाती में आ चुभे हों।
“मैं ही पऴुवूर की इलया रानी हूँ,” उन्होंने कोमल स्वर में कहा। अहा, उनके कंठ में ऐसा क्या था, जिसने उसे इतना अद्भुत मधुर बना दिया था? वह कौन-सा मीठा, मादक गुण था, जो उसके सिर को लट्टू की भाँति घुमा रहा था? “अभी-अभी तुम कोई शिकायत कर रहे थे, है न?” हल्के, विनोदपूर्ण स्वर में वह कहती रहीं। “मेरे कहारों को लेकर कुछ कह रहे थे?”
काशी की—बनारस के उस पावन नगर की—प्रसिद्ध रेशम की मखमली कोमलता, तेज़ मदिरा की उष्ण मादकता, घने जंगलों के मधु की मीठी सघनता, घोर वर्षा के आकाश में बिजली की आकस्मिक कौंध—क्या एक युवती का कंठस्वर सचमुच इन सभी अद्भुत वस्तुओं को एक साथ धारण कर सकता है?
“क्या कह रहे थे तुम?” उन्होंने पूछा। “मेरे कहारों ने पालकी से तुम्हारे घोड़े को टक्कर मार दी, यही न?”
उनके प्रवाल-जैसे अधरों पर एक क्षीण, परिहासमयी मुस्कान छूकर निकल गई। यह स्पष्ट था कि वह इस पूरी विचित्र परिस्थिति का आनंद ले रही हैं।
उनकी इस खिलंदड़ी प्रतिक्रिया से वंदियादेवन ने अनुभव किया कि उसकी स्वाभाविक प्रसन्नता लौट रही है। “ठीक यही, महारानी,” उसने नाटकीय भंगिमा में हाथ हिलाकर कहा। “उन्होंने ठीक यही किया है। आप स्वयं देखिए, मेरा बेचारा घोड़ा कैसे भय से काँप रहा है!”
“मुझे तो केवल घोड़ा ही भय से काँपता नहीं दिख रहा,” उन्होंने ठिठोली की। “तुम ऐसा करो, दुर्गादेवी के मंदिर के पुजारी से जाकर कहो कि एक मुट्ठी नीम की पत्तियों से तुम्हारी नज़र उतार दें—यह कड़वी पत्ती सदा ही बुरी नज़र को दूर करने के काम आती है।”
तब तक वंदियादेवन अपनी सुध-बुध पूरी तरह पा चुका था। उनकी बात पर वह थोड़ा हँस भी पड़ा। किंतु यह सहज हँसी शायद एक भूल थी। पऴुवूर की रानी का मिज़ाज पलक झपकते ही बदल गया। उनकी दीप्त मुस्कान लुप्त हो गई, और उनका मुख अचानक क्रोध से अंधकारमय हो उठा। जैसे कोई सोने का चाँद भारी तूफ़ानी बादलों के पीछे जा छिपा हो।
“अपनी यह छोटी-मोटी दिल्लगी किसी और के लिए उठाकर रखो,” उन्होंने ठंडे स्वर में कहा। “और मुझे इसका उत्तर दो—तुमने अपना घोड़ा मेरी पालकी से क्यों टकरा दिया? अब सच बताओ, वरना...!”
हमारे युवा मित्र का सौभाग्य था कि उसने एक बहाना पहले से ही सोच रखा था। धूल-भरी राह के चारों ओर एक बार दृष्टि दौड़ाकर उसने अच्छी तरह सुनिश्चित कर लिया कि आसपास कोई छिपकर बात सुनने वाला नहीं है, फिर झुककर उसने अपना स्वर धीमा कर लिया, जैसे कोई अत्यंत गहन रहस्य बाँट रहा हो।
“देवी”—किसी नारी को सम्मान देने का संबोधन—“नंदिनी देवी?” उसने बात आरंभ की। “आऴ्वारक्काडियान नंबि—अर्थात्, तिरुमलै—ने ही आपके लिए एक संदेश देकर मुझ पर विश्वास किया था। उन्होंने कहा था कि मैं आपसे भेंट करूँ, और इसीलिए मुझे यह अनाड़ी-सी छोटी-सी युक्ति सोचनी पड़ी। एक बार फिर, मैं सचमुच क्षमा चाहता हूँ!”
वंदियादेवन तीक्ष्ण दृष्टि से उनके मुख को देख रहा था, यह देखने को उत्सुक कि वह इस अप्रत्याशित समाचार पर कैसी प्रतिक्रिया देती हैं। वह जानता था, यह फलों से लदे आम के पेड़ की डाल पर ढेला फेंकने जैसा था। उसके इस परिश्रम के फलस्वरूप उसे क्या मिलेगा? कोई मीठा, पका फल? या कोई खट्टा, कच्चा आम? या फिर शायद ढेला ही लौटकर उसके सिर पर आ लगेगा, अथवा कोई और कठोर दंड भुगतना पड़ेगा?
तरुण रानी की काली, सुघड़ भौंहें ऊपर की ओर उठ गईं। उनकी सुंदर आँखें बड़ी हो गईं, और आकस्मिक आश्चर्य तथा संदेह के मिश्रण से डबडबाने लगीं। किंतु अगले ही क्षण, ऐसा लगा, उन्होंने अपना मन बना लिया हो।
“ठीक है,” उन्होंने तुरंत कहा। “किंतु धूल-भरी राह के बीच का स्थान इस प्रकार की बातचीत के लिए तनिक भी उपयुक्त नहीं है। कल संध्या के समय, तंजावुर में हमारे प्रासाद में आना। भेंट की अनुमति माँगना, और तब हम इस विषय में और बात करेंगे।”
वंदियादेवन का हृदय आनंद से उछल पड़ा। उसका यह दुस्साहसी जुआ शायद पूरी तरह सफल हो गया था! गाँव की पुरानी कहावत की तरह, कुएँ के ऊपर से वह तीन-चौथाई छलाँग तो पार कर ही चुका था; अब बस शेष था, बिना गिरे अंतिम चौथाई हिस्से को लाँघ जाना।
“किंतु, देवी,” उसने असहाय मुखमुद्रा बनाकर कहा, इस अंतिम छोटी-सी बाधा को पार करने के लिए व्याकुल होकर। “प्रहरी तो मुझे दुर्ग में घुसने ही नहीं देंगे, प्रासाद तो दूर की बात है। मैं आपसे भेंट कैसे करूँगा?”
इलया रानी सहजता से अपने पास रखे एक छोटे-से रेशमी थैले की ओर मुड़ीं। उसे खोलकर उन्होंने हाथी-दाँत की एक नक्काशीदार अँगूठी निकाली। “यह उन्हें दिखाना,” अँगूठी उसकी ओर बढ़ाते हुए वह बोलीं। “तुम्हें तुरंत भीतर आने दिया जाएगा—किले के फाटक पर, और हमारे प्रासाद के द्वार पर, दोनों ही जगहों पर।”
वंदियादेवन ने गहरा, श्रद्धापूर्ण प्रणाम कर वह अँगूठी उनके हाथ से ले ली। हथेली पर आते ही उसने झट से एक बार उस पर दृष्टि डाली; चिकने हाथी-दाँत पर खुदा हुआ वही गर्वीला ताड़ का वृक्ष। धन्यवाद देने के लिए जब उसने मुख उठाया, तब तक पालकी के भारी रेशमी परदे फिर से खींचकर बंद कर दिए गए थे।
आह, क्या अफ़सोस, उसने मन-ही-मन सोचा। ग्रहण के समय राहु भी—पुराणों का वह महान आकाश-सर्प—चंद्रमा को निगलने में कुछ समय तो लेता है, हमें मद्धिम पड़ते प्रकाश का आनंद तो लेने देता है। पर ये दुष्ट परदे तो पलक झपकते ही उनके सुनहरे मुख पर सनसनाते हुए बंद हो गए!
“अब सावधान रहना,” रेशम की ओट से उनका धीमा, सुरीला कंठस्वर आया। “और यहाँ से हमारा पीछा मत करना। यह तुम्हारे लिए अत्यंत संकटपूर्ण होगा। राह पर कुछ देर प्रतीक्षा करो, फिर दुर्ग में प्रवेश करना।”
कहारों ने मोड़ लिया, पालकी आगे बढ़ चली, और सैनिक चारों ओर तेज़ चाल से बढ़ने लगे। वंदियादेवन मार्ग के किनारे खड़ा रहा, हाथ में ढीले-से घोड़े की लगाम थामे, और उस शोभायात्रा को जाते हुए देखता रहा। अपने सौभाग्य पर चकित होते हुए भी वह यह देखे बिना न रह सका—पऴुवूर का एक प्रहरी, वही व्यक्ति जिसने कुछ देर पहले उसे धमकाया था, मार्च करते हुए बार-बार पीछे मुड़कर उसकी ओर गंभीर, अंधकारपूर्ण दृष्टि से देख रहा था।
किंतु उसका मन उस समय नंदिनी के उस अनुपम सौंदर्य से पूरी तरह भरा हुआ था—पऴुवूर की इलया रानी, जो अपनी पालकी में झूलती हुई तंजावुर के पथ पर आगे बढ़ रही थीं। क्या वह सचमुच अभी वहाँ खड़े होकर उनसे बात कर रहा था? वह संक्षिप्त, झिलमिलाती भेंट क्या वास्तव में हुई थी? और उससे भी बड़ी बात—क्या रक्त-मांस के एक जीवित मनुष्य के लिए सचमुच ऐसे आश्चर्यजनक रूप का अधिकारी होना संभव है?
मंदिरों की पुरानी कथाएँ उसने अवश्य सुनी थीं—रंभा, उर्वशी और मेनका जैसी स्वर्गीय नर्तकियों की, उन देव-कन्याओं की, जो देवों की स्वर्ग-सभा में निवास करती थीं। कथावाचक यह वर्णन करना पसंद करते थे कि कैसे उनका दिव्य लावण्य कठोर-से-कठोर तपस्वियों को भी पागल कर सकता था—वे लोग जो संसार त्यागकर कंद-मूल-फल खाकर जीवन व्यतीत करते थे।
इस मर्त्यलोक में भी बड़े पऴुवेत्तरायर और अपनी उस कनिष्ठ पत्नी के प्रति उनके अंधे मोह को लेकर काफ़ी दबी-दबी, परिहासपूर्ण कानाफूसी होती थी। किंतु मार्ग पर खड़े-खड़े वंदियादेवन को समझ आ गया कि इसमें आश्चर्यचकित होने जैसा कुछ भी नहीं था। चोलों के युद्ध-चिह्नों से भरे, रूखे-कठोर कोषाध्यक्ष देखने में सुंदर नहीं थे, यह बात तो उस वृद्ध के सबसे निकट मित्र भी नहीं छिपा सकते थे। किंतु उनकी तरुणी वधू तो निखुँत पूर्णता की एक प्रतिमूर्ति थीं। यदि उनके अधरों पर एक मुस्कान लाने के लिए वह वृद्ध योद्धा स्वर्ग और पृथ्वी, सब कुछ त्यागने को तैयार हो, तो उसे दोष कौन दे सकता था?
मार्ग के किनारे लगभग आधा घंटा अपने मीठे दिवास्वप्नों में डूबे रहने के बाद, अंततः वंदियादेवन फिर से उछलकर जीन पर बैठ गया और घोड़े को धीरे-धीरे तंजावुर के उस विशाल दुर्ग की ओर दौड़ाने लगा। जब वह मुख्य फाटक पर पहुँचा, पश्चिम में संध्या का सूर्य नीचे झुक आया था, और समतल भूमि पर लंबी, सुनहरी छायाएँ डाल रहा था।
तंजावुर का आदि प्राणकेंद्र शायद दुर्ग की ऊँची पाषाणी दीवारों के भीतर सुरक्षित था, किंतु वर्षों-वर्षों में यह नगर उमड़कर बाहर की ओर बढ़ गया था। वाणिज्य और दैनंदिन जीवन की अस्त-व्यस्त उँगलियाँ खाई को लाँघकर बहुत दूर तक फैल गई थीं। बाहरी दीवारों के चारों ओर अब सटे-सटे पथों और गलियों की पंक्तियाँ थीं। हवा में लकड़ी के धुएँ की गंध और गरम घी में तली जीभ-ललचाती मिठाइयों की सुगंध तैर रही थी। व्यस्त लौह-शालाओं और कारखानों से हथौड़ों की निरंतर ठक-ठक की ध्वनि आ रही थी; वहाँ लोग मद्धिम होती रोशनी में परिश्रम कर रहे थे। चौड़े मार्ग मनुष्यों की भीड़ से ठसाठस भरे थे—कोई ख़रीद रहा था, कोई बेच रहा था, कोई मोल-भाव पर झगड़ रहा था, तो कोई आवश्यक कार्य से हड़बड़ी में घर लौट रहा था। मार्ग धीमी गति से चलती बैलगाड़ियों, झमझमाते अश्व-रथों, और पहियों के बीच घूमते आवारा कुत्तों से लगभग अवरुद्ध हो चला था।
इस जीवंत कोलाहल को देखकर वंदियादेवन के मन में अचानक एक बालसुलभ इच्छा जागी—घोड़े को बाँधकर भीड़-भरे बाज़ार में कूद पड़े, और पूरी संध्या इस बात को देखने में बिता दे कि इस विस्तृत नवीन चोल राजधानी के लोग अपना दिन कैसे व्यतीत करते हैं। किंतु एक छोटे-से अफ़सोस की साँस लेकर उसने निश्चय किया कि इसे बाद के लिए उठा रखना होगा। पहले उसे आवश्यक कार्य निपटाने हैं। नगर का यह सहज आमोद-प्रमोद बाद में भी मिल सकता है।
इस अत्यंत विवेकपूर्ण और बड़ों जैसे संकल्प से भरकर वह दुर्ग के उस प्रतापी मुख्य फाटक की ओर बढ़ा—और देखा कि वे दृढ़ता से बंद थे। पहरे पर तैनात प्रहरी चहलक़दमी करते हुए नगरवासियों को मार्ग के किनारे धकेल रहे थे। और, कुछ आश्चर्यजनक रूप से, सदा कोलाहल करने वाली भीड़ बिना कोई शब्द किए उनकी बात मान रही थी। अपने-अपने कार्यों में शीघ्रता करने के बजाय लोग—टोकरियाँ हाथ में लिए पुरुष, थकी हुई स्त्रियाँ, झुके हुए वृद्ध, और बड़ी-बड़ी आँखों वाले बच्चे—धैर्यपूर्वक मार्ग के किनारे प्रतीक्षा कर रहे थे, गरदनें उचकाकर जैसे किसी विशाल शोभायात्रा की आशा में हों।
लकड़ी के फाटक के ठीक सामने का चौड़ा, धूल-भरा प्रांगण चहलक़दमी करते प्रहरियों के अतिरिक्त बिलकुल ख़ाली था। इस सारे हो-हल्ले का क्या कारण था, यह जानने के लिए वंदियादेवन कौतूहल से जल रहा था, किंतु प्रहरियों के पास घोड़ा दौड़ाकर स्पष्टीकरण माँगने की उसकी कोई इच्छा नहीं थी। विशेषकर तब तो बिलकुल नहीं, जब बाक़ी सब इतने चुपचाप हटकर खड़े थे। अभी नाक घुसेड़ने का अर्थ व्यर्थ की बहस और खीझ के अतिरिक्त कुछ नहीं होता, और वह किसी भी तरह से झमेले से बचना चाहता था। सम्राट तक अपना संदेश पहुँचाना ही उसका एकमात्र लक्ष्य था। चिड़चिड़े सैनिकों से झगड़ा मोल लेने का यह समय नहीं था।
इसलिए ऊँची जीन पर से चुपचाप उतरकर वंदियादेवन शांति से मार्ग के किनारे एकत्र हुई भीड़ में घुल-मिल गया, और ध्यान से एक ऐसी अच्छी जगह चुन ली जहाँ से फाटक अब भी दिखाई दे रहा था।
ठीक तभी चमेली और गेंदे की मीठी, भारी सुगंध उसकी नासिका के पास से गुज़री। सिर घुमाकर उसने देखा, एक भला-सा दिखने वाला तरुण दो बड़ी-बड़ी बाँस की टोकरियाँ लिए आ रहा था, जो ताज़े फूलों से लबालब भरी थीं। उसका ललाट और हाथ विभूति से मोटे-मोटे लिपे हुए थे, और गले में भूरे, ऊबड़-खाबड़ रुद्राक्ष की कई लड़ियाँ थीं—देवता के लिए पवित्र वे सूखे बीज। वह एकदम निष्ठावान, कोमल शैव भक्त की छवि था।
“तंबि,” धीरे से उसके कंधे पर थपकी देकर वंदियादेवन ने पूछा। “इस समय सब लोग मार्ग पर क्यों खड़े हैं? क्या किसी शोभायात्रा की प्रतीक्षा हो रही है?”
“आप इस इलाक़े में नए हैं क्या, अय्या?” मुँह उठाकर उस तरुण पुष्प-विक्रेता ने पूछा।
“हाँ,” वंदियादेवन मुस्कुराया। “मैं तोण्डै मंडलम से आया हूँ”—तमिल देश का उत्तरी प्रांत।
“अहा, इसीलिए आप पूछ रहे हैं,” उस तरुण ने सिर हिलाया। “यदि एक बात कहूँ, भाई, तो सबसे अच्छा यही होगा कि आप घोड़े से बिलकुल उतर जाएँ।”
भीड़ में घुलने-मिलने के लिए वंदियादेवन पहले ही उतर चुका था, किंतु लड़के की इस हार्दिक चेतावनी ने उसे उलझन में डाल दिया। धूल-भरे मार्ग पर उसके पास खड़े होकर इस तरुण से बात करना कहीं अधिक सरल था, इसमें कोई संदेह नहीं।
“ऐसा क्यों कहते हो, तंबि? एक आदमी अपने घोड़े पर क्यों न बैठे?”
“वेलक्कार वाहिनी अभी भीतर है, सम्राट को सम्मान अर्पित करने,” उस पुष्प-विक्रेता ने दबी आवाज़ में समझाया—राजा की रक्षा की शपथ में बँधे कुलीन राज-रक्षक। “किसी भी क्षण वे किले से दल-बल के साथ बाहर आएँगे। सब उसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
“उनके मार्च करते हुए जाने को देखने के लिए, यही न?”
“हाँ।”
“तो वह तो मैं जीन पर बैठे-बैठे भी उतनी ही अच्छी तरह देख सकता हूँ, नहीं क्या?”
“देख सकते हैं,” उस तरुण ने धीरे-धीरे कहा। “किंतु यदि वेलक्कार सैनिकों में से किसी ने आपको ऊपर बैठकर उनकी ओर नीची दृष्टि से देखते हुए पा लिया… तो आपके भाग्य में काफ़ी कष्ट लिखा है।”
“कैसा कष्ट?” वंदियादेवन हँस पड़ा। “क्या तुम यह कहना चाहते हो कि वे मेरा घोड़ा चुराने का प्रयास करेंगे?”
“घोड़ा तो ले ही सकते हैं—और सवार को पीट भी सकते हैं, केवल मनोरंजन के लिए। उनका कुछ नहीं कहा जा सकता। वे लोग स्वयं ही अपना विधान हैं।”
“ऐसा है क्या?” वंदियादेवन ने भौंहें सिकोड़ीं। “और तंजावुर के भले लोग यह विचित्र कांड सहन करते हैं?”
भारी टोकरियों को सँभालते हुए उस तरुण ने कंधे उचकाए। “हमारे पास और चारा ही क्या है? आजकल वेलक्कार वाहिनी जो चाहे वही करती है। इस मार्ग पर उन्हीं का कहा क़ानून है। यहाँ तक कि शक्तिशाली पऴुवेत्तरायर भी उन्हें छेड़ने का स्वप्न में भी नहीं सोचते।”
ठीक उसी क्षण दुर्ग की ऊँची पाषाणी दीवारों के पीछे से एक प्रचंड कोलाहल फूट पड़ा। पीतल की तुरहियाँ बज उठीं, और श्वेत शंख उन्मत्त आवेश में गूँज उठे। नगाड़ों और परई की गंभीर, गुरुगम्भीर गर्जना ने एक उन्मादी ताल छेड़ दी—चमड़े से मढ़े वे प्राचीन ढोल—और सैकड़ों कर्कश कंठों ने ऐसी जय-गर्जना की कि जैसे पूरा संध्या-आकाश ही काँप उठा।
इन दुर्धर्ष लोगों के विषय में वंदियादेवन ने अलाव के पास बैठकर कही जाने वाली कई कथाएँ सुनी थीं। चोल देश में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। आधिकारिक रूप से वे राजा के देहरक्षक थे, किंतु साधारण प्रासाद-प्रहरी और एक वेलक्कार योद्धा में बहुत बड़ा अंतर था। इन लोगों ने एक भयानक, अलंघनीय रक्त-शपथ ले रखी थी—अपने प्राण देकर सम्राट की रक्षा करने की। यदि वाहिनी की किसी भी चूक या असावधानी के कारण राजपरिवार को लेशमात्र भी हानि पहुँचती, तो सम्मान की शपथ से बँधे ये सैनिक सीधे दुर्गादेवी के मंदिर जाते, काली पाषाण-प्रतिमा के समक्ष घुटने टेकते, और अपनी ही तलवारों से अपने मस्तक काट डालते।
वंदियादेवन को लगा, जब कोई मनुष्य ऐसी भयानक शपथ लेता है, तो यह स्वाभाविक ही है कि उसे कुछ छोटी-मोटी सुविधाएँ दी जाएँ जो साधारण नगरवासियों को उपलब्ध नहीं हैं—जैसे कि मार्गों पर छाती फुलाकर चलना और लोगों को घोड़ों की पीठ से धकियाकर गिरा देना।
पड़ाड़! पड़ाड़!
एक भारी, केंकड़ाती हुई गड़गड़ाहट के साथ दुर्ग के वे विशाल, लौह-कीलों से जड़े फाटक चौड़े खुल गए।
पहले दो सैनिक बाहर निकले, जो पैर पटकते घोड़ों पर सवार थे, और प्रत्येक के दाहिने हाथ में एक-एक लंबा ध्वज ऊँचा उठा हुआ था। जो प्रतीक वे फहरा रहे थे, वह विचित्र और कुछ असहज करने वाला था। रक्त-लालिमा लिए रेशमी पृष्ठभूमि पर एक स्वर्ण-व्याघ्र, और ठीक उसके नीचे एक राजमुकुट। मुकुट के नीचे एक बलि-वेदी, जिस पर एक कटा हुआ मनुष्य का सिर और एक चौड़ी, वक्र तलवार रखी थी। कुल मिलाकर, हवा में फहराता हुआ एक अत्यंत वीभत्स चित्र।
अश्वारोहियों के ठीक पीछे एक भव्य, कूबड़ वाला वृषभ आया, जिसके दोनों ओर दो भीमकाय पेरिगै बँधे थे—विशाल ढोल। उसके साथ दो बलिष्ठ पुरुष चल रहे थे, जो एक गहरी, गुरुगम्भीर ताल पीट रहे थे जो छाती के भीतर कंपन पैदा कर रही थी। वृषभ के पीछे लगभग पचास लोग मार्च करते हुए चले, जो उन्मत्त होकर छोटे-छोटे ढोल पीट रहे थे—सिरुपरई, पेरुंपरई, और चपटे, झनझनाते तंबट्टम—और पूरे नगर के लिए वाहिनी के आगमन की घोषणा कर रहे थे। पचास और लोग उनके साथ-साथ चल रहे थे, जो छाती फुलाकर विशाल, वक्र पीतल के भोंपुओं में फूँक मार रहे थे, जो गरज रहे थे, बम्! बम्! ब-बम्!
फिर आई स्वयं वाहिनी। एक हज़ार लोग पूर्ण ताल में मार्च कर रहे थे, और उनके भारी बूटों की चोट से सुनहरी धूल के बादल उड़ रहे थे। उनमें से अधिकांश जयघोष कर रहे थे, और उनके कंठ एक विशाल गर्जना में विलीन हो रहे थे, जो संध्या की वायु को कच्ची, उन्मत्त ऊर्जा से झनझना रही थी।
“महाराज परांतक चक्रवर्ती की जय हो, जो विश्व के अधिपति हैं!” दलनायकों ने चीख़कर कहा।
“चिरंजीवी हों! चिरंजीवी हों!” एक हज़ार कंठों ने प्रत्युत्तर में गर्जना की।
“महाराज सुंदर चोल की जय हो!”
“चिरंजीवी हों! चिरंजीवी हों!”
“कोऴि वेंडर दीर्घायु हों!”—प्राचीन चोल राजधानी उरैयूर के प्राचीन स्वामी।
“चिरंजीवी हों! चिरंजीवी हों!”
“तंजावुर के स्वामियों की जय हो!”
“चिरंजीवी हों! चिरंजीवी हों!”
“उस स्वामी की जय हो, जिसने वीर पाण्ड्य को घुटनों पर ला दिया!”
“चिरंजीवी हों! चिरंजीवी हों!”
“उस राजकेसरी की जय हो—राजाओं में सिंह, एक चोल राजकीय उपाधि—जिसने मदुरै, ईऴम और तोण्डै मंडलम को जीता!”
“चिरंजीवी हों! चिरंजीवी हों!”
“करिकाल चोल के महान वंशजों की जय हो!”
“चिरंजीवी हों! चिरंजीवी हों!”
“दुर्गादेवी, महाकाली और परात्परी पराशक्ति की जय हो!”—वह काली, उग्र जननी, और वह परम दिव्य शक्ति।
“जय हो! जय हो!”
“व्याघ्र-ध्वज संपूर्ण विश्व में गर्व से फहराए!”
“जय हो! जय हो!”
“विजयी भाला!”
“वीर भाला!”
हज़ार कंठों से निकली वह रक्त-उत्तेजक जय-गर्जना जो भी सुनता, उसके रोंगटे एक आकस्मिक आवेग से खड़े हो जाते। सैनिकों के उन उत्साहवर्धक नारों को मार्ग के किनारे खड़ी भीड़ ने भी अपना लिया। वृद्ध, किशोर और साधारण नगरवासी—सभी ने उस गरजते हुए समवेत स्वर में अपना कंठ मिला दिया। और इस प्रकार, भक्ति और शक्ति के एक विशाल, उमड़ते ज्वार में बहती हुई, वेलक्कार वाहिनी गर्व से दुर्ग के फाटक से बाहर निकली, बाहरी तंजावुर के धूल-भरे मार्गों पर मार्च करती रही, और धीरे-धीरे घनी होती संध्या में विलीन हो गई।
(जिज्ञासु पाठक के लिए एक कोमल टिप्पणी, ठीक वैसी ही जैसी १९५० में स्वयं कल्कि कृष्णमूर्ति संभवतः जोड़ देते: कहा जाता है कि वेलक्कार वाहिनी को अपना नाम भगवान मुरुगन से मिला था—युद्ध के सुदर्शन देवता—जिनकी एक उपाधि ‘वेलक्कारन’ है—जो भाला धारण करते हैं और भक्तों की रक्षा की शपथ लेते हैं। इस अध्याय में पहले नंदिनी के मोहक सौंदर्य के वर्णन में कल्कि विशाल, पुराने संस्कृत-मूल के शब्दों का प्रयोग करना पसंद करते थे, जैसे मोहनाङ्गी, सुकुमारी, भुबनमोहिनी, और सुन्दराङ्गी। आज वे लहरदार सुरीले नाम विशेष रूप से एक अतीत के युग के अधिकार में हैं, एक मूक स्मारक—कि हमारी कथा और हमारी भाषा कितनी सुंदरता से काल के प्रवाह में यात्रा करती आई है।)
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