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पोन्नियिन सेल्वन Matribhasa Hindi · इकतीसवाँ अध्याय — “चोर! चोर!”
A historical fiction-themed illustration for पोन्नियिन सेल्वन

इकतीसवाँ अध्याय — “चोर! चोर!”

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चोल सम्राटों के चित्रों के सम्मुख वंदियादेवन बहुत देर तक खड़ा रहा। उसने सिर उठाकर पूरी चित्रशाला पर दृष्टि दौड़ाई। विजयी विजयालय से आरंभ होकर, एक-एक कर यह क्रम परांतक पर समाप्त हुआ था—जिन्हें आज सब प्रेम से सुंदर चोल कहकर पुकारते हैं। चित्रित मुखों को ध्यान से निहारते-निहारते उसके हृदय में एक गहन आनंद जाग उठा। इन महापुरुषों का विशुद्ध साहस, यह वीरता—मुग्ध हुए बिना कैसे रहा जा सकता था! अपने-अपने काल में इन्होंने कैसे अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किए थे। युद्ध की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर, रणक्षेत्र के घोर कोलाहल के बीच मस्तक ऊँचा उठाए, अपने प्राणों की तनिक भी चिंता किए बिना वे लड़े थे। देश-भर में दादियाँ जो पुरानी महाकाव्यों की कथाएँ सुनाती थीं, उनमें भी उसने ऐसे दुस्साहस की गाथाएँ कभी नहीं सुनी थीं। चोल-देश सचमुच भाग्यशाली था, जिसे ऐसे राजवंश का मार्गदर्शन मिला। और कितने ही अन्य देश भाग्यशाली थे, जो आज इस वंश की सत्ता के विशाल छत्र की छाया में निश्चिंत विश्राम कर रहे थे।

सम्राटों की महिमा से वह कुछ क्षण के लिए जैसे चौंधिया-सा गया था। फिर भी, वंदियादेवन की दृष्टि तो तीक्ष्ण थी। चित्रों में एक बारीक बात बार-बार लौटकर आ रही थी—वह उसकी आँखों से छिपी न रह सकी। लगभग प्रत्येक चित्र में चोल सम्राट के पार्श्व में पऴुवूर वंश का कोई-न-कोई व्यक्ति खड़ा दिखाई देता था। वह सदैव वहाँ उपस्थित रहता। असाधारण सहायता प्रदान करता, युद्ध में कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़ा होता, अपनी क्षमता की अंतिम सीमा तक—और कई बार तो क्षमता से भी कहीं परे जाकर—सेवा करता।

तंजाई का दुर्ग जब तक मुत्तरैयरों के अधिकार में था, तब उसकी घेराबंदी कर उसमें सर्वप्रथम प्रवेश करने वाले एक पऴुवेत्तरायर ही थे। थिरुप्पुरंबियम के भयंकर युद्ध में जब महान विजयालय के दोनों पैर निष्क्रिय हो गए और वे असहाय हो पड़े—तो एक पऴुवूर राजा ही दौड़कर आगे आए थे। उन्होंने अपंग सम्राट को अपने समर्थ कंधों पर उठा लिया, ताकि उनके स्वामी वीरता के और भी कार्य कर सकें। आदित्य चोल के राज्याभिषेक के दिन पऴुवूर वंश के एक वंशज ने मुकुट हाथ में लेकर स्वयं उनके मस्तक पर पहनाया था। और जिस दिन उसी आदित्य ने साहस बटोरकर अपने हाथी की पीठ से छलाँग लगाई और अपराजित वर्मन को मृत्यु के घाट उतार दिया, उस दिन एक पऴुवेत्तरायर ने धूल में झुककर सम्राट के पाँव रखने के लिए अपनी पीठ को सीढ़ी बना दिया था। परांतक चक्रवर्ती के युद्धों में भी ये बलिष्ठ, कष्ट-सहिष्णु लोग अग्रिम पंक्ति में रहे—चोलों के ध्वज और व्याघ्र-पताका को गर्व से अनम्य भङ्गिमा में ऊँचा उठाए हुए। जिस दिन राजकुमार राजादित्य रणक्षेत्र में मरणासन्न पड़े थे, उस रक्त-रंजित राजकुमार को धीरे से गोद में उठाकर एक पऴुवेत्तरायर ने ही उन्हें वह एकमात्र शुभ समाचार सुनाया था, “राष्ट्रकूट पीछे हट रहे हैं!” सम्राट अरिंजय और सुंदर चोल को भी इस वंश ने वैसी ही निष्ठावान, अविचल सेवा अर्पित की थी।

पऴुवूर वंश की राजसेवा के इतने स्पष्ट प्रमाण अपनी आँखों के सामने देखकर वंदियादेवन एक प्रकार से अवाक् रह गया। विस्मय में डूबते-डूबते उसे लगा—संपूर्ण चोल-देश पर पऴुवेत्तरायर बंधुओं का जो सर्वग्रासी अधिकार है, उसके पीछे पर्याप्त कारण थे। उनकी मंत्रणा के बिना सुंदर चोल एक भी निर्णय नहीं लेना चाहते—इसमें भी अब आश्चर्य की क्या बात थी।

किंतु ये सभी बातें चाहे कितनी भी प्रशंसनीय क्यों न हों, उनसे भी अधिक स्पष्ट एक और बात थी। वह, वल्लभरायन वंदियादेवन, इस समय बहुत गहरे संकट में फँसा हुआ था। छोटे पऴुवेत्तरायर, कनिष्ठ भ्राता, उस पर गहरा संदेह करते थे—इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं था। वह संदेह अब सत्य सिद्ध होने में बस समय की ही देर थी। ताड़-वृक्ष की मुहर वाली अँगूठी की असलियत एक-न-एक दिन सामने आ ही जाएगी—और तब तो आग में घी पड़ जाएगा! तंजावुर की उन अंधकारमयी, भूमिगत कारा-कोठरियों के विषय में वल्लभरायन ने कई रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानियाँ सुनी थीं; वे कोठरियाँ स्वयं सेनापति की सीधी निगरानी में रहती थीं। वैसे किसी अंधकूप में एक बार फँस जाने पर फिर सूर्य का मुख देखने की आशा नहीं रहती—लंबी विदाई दे देना ही श्रेयस्कर था। सब जानते थे, यदि कोई जीवित निकलता भी तो बस एक बड़बड़ाता, बुद्धिहीन मूर्ख बनकर—चमड़ी और हड्डियों का ढाँचा, सर्वथा ज्ञानशून्य।

आह, ऐसे संकट से वह स्वयं को कैसे मुक्त करेगा? एक बात तो साफ थी—बड़े पऴुवेत्तरायर, ज्येष्ठ भ्राता, के लौटने से पहले ही कोई चतुर युक्ति निकालकर इस पहरेदार-नगर से पलायन करना होगा। पऴुवूर की उस विख्यात सुंदरी तरुणी रानी को एक बार देख लेने की तीव्र इच्छा भी अब हमारे युवा नायक के मन से मिट चुकी थी। उस क्षण अपने अस्तित्व के प्रत्येक तंतु से वह केवल एक ही वस्तु चाहता था—हाथ-पैर और प्राण सलामत लेकर इस शहर और उसकी भयंकर कारा-कोठरियों से भाग निकलना। ओलै भले ही अब उसके पास नहीं था, तथापि कुंदवै पिराट्टि तक अपना संदेश वह अब भी मौखिक रूप से पहुँचा सकता था। और राजकुमारी ने उस पर विश्वास किया या नहीं, इससे किसी को क्या लेना-देना? असली बात थी यहाँ से निकलना। किंतु कैसे? इस दुर्ग-समान नगर से वह निकलेगा भी तो कैसे?

अचानक उसे एक बात याद आ गई। ईश्वर के लिए, उसके उन पुराने वस्त्रों का क्या हुआ? क्षण-भर में जैसे सब कुछ स्पष्ट हो गया। उसके आतिथ्य-परायण नए स्वामियों ने जो उसके धूल-धूसरित वस्त्र जब्त कर लिए, उसे बहुमूल्य चमकीले रेशम से सजा दिया, इतने उत्साह से खिला-पिलाकर सत्कार किया—इसका एक ही अर्थ हो सकता था। वे उसकी जेबें टटोलना चाहते थे! अब सारी बात दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हो गई थी। कुंदवै के लिए भेजा गया वह ओलै निश्चय ही सेनापति के हाथ लग चुका था—इसमें अब क्या संदेह। अब वह समझा, कुछ देर पहले छोटे पऴुवेत्तरायर ने उसका हाथ इतनी दृढ़ता से क्यों पकड़ा था। इसलिए कि यह घुमंतू कवियों के दल में मिलकर कहीं खिसक न जाए। और उसके पीछे इन तीन बलशाली ‘साथियों’ को लगा देने का रहस्य भी अचानक स्फटिक की भाँति पारदर्शी हो गया। अब उसे एक युक्ति चाहिए थी—कोई भी एक, इस भयंकर जाल से निकलने लायक एक युक्ति। बड़े पऴुवेत्तरायर के लौटने से पहले उसे कुछ-न-कुछ करना ही होगा, चाहे जो हो। सोचो, सोचो… अहा, हाँ! युक्ति सूझ गई। नष्ट करने के लिए समय नहीं है; सोचना यानी करना। वह अपना सर्वस्व झोंक देगा। तो, तैयार हो जाओ! वेट्रिवेल! वीरवेल! (विजयी और वीर भाले का आह्वान करता प्राचीन रणघोष)।

वंदियादेवन ने चित्र-मंडप की नक्काशीदार खिड़की से झाँका। सेवकों के एक भारी-भरकम दल से घिरे, घोड़े की पीठ पर छोटे पऴुवेत्तरायर भव्यता से आगे बढ़ रहे थे। अहा, अपना छोटा-सा नाटक आरंभ करने का यही तो उपयुक्त समय है। रुकने के लिए एक क्षण भी नहीं था।

सामने बैठे तीन प्रहरी चोक्काट्टान खेलकर समय काट रहे थे। खेल रोककर वे उठ खड़े हुए—स्वामी के आगमन की खट-खट ध्वनि स्पष्ट ही उनके कानों तक पहुँच चुकी थी।

वंदियादेवन सीधा उनके पास गया, उसका मुख एक बनावटी क्रोध से सहसा काला पड़ गया।

“प्रिय भाइयो, मेरे पुराने वस्त्र कहाँ हैं? कुछ जानते हो?”

“उन गंदे, फटे हुए वस्त्रों का तुम करोगे भी क्या?” उसे सिर से पाँव तक नापते हुए एक सेवक ने पूछा। “स्वामी की आज्ञा मानकर तुम्हें नए, बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहना तो दिए हैं, है न?”

“मुझे यह रेशम नहीं चाहिए। मेरे पुराने वस्त्र शीघ्र लौटा दो, मैं उन्हीं में प्रसन्न हूँ।”

“उन्हें तो हमने धुलने के लिए भेज दिया है। धुल जाने पर तुम्हें लौटा दिए जाएँगे।”

“बिल्कुल नहीं! मुझे मेरे पुराने वस्त्र अभी चाहिए। तुम सब चोर हो! मैंने उनमें कुछ धन छिपाकर रखा था, और तुम लोग स्पष्टतः उसे हड़पने की फिराक में हो। अभी मेरे वस्त्र लौटाओ, वरना—!”

“वरना क्या, तंबि?” होठों पर व्यंग्य की मुस्कान खिलाकर प्रहरी बोला। “हमारा सिर काटकर तंजावुर भेज दोगे, यही न? किंतु हम तो अभी तंजाई में ही हैं, जानते हो? यह बात याद रखो तो अच्छा है।”

“अदेई! मेरे कपड़े अभी लौटाओगे या नहीं?”

“होते तो दे देते, तंबि। सुनो, हमने वह पूरी दुर्गंध वाली गठरी वेट्टारु नदी में फेंक दी है। अब तक तो वह मगरमच्छों के पेट में होगी। और क्या तुमने कभी सुना है कि किसी ने सरीसृप के पेट से कुछ वापस पाया हो?”

“चोर, हरामजादों की टोली!” वंदियादेवन गरज उठा। “इसका मतलब तुम लोग मेरा उपहास कर रहे हो, क्यों? ठहरो, मैं तुम्हारे स्वामी से शिकायत करता हूँ!”

द्वार की ओर बढ़ते हुए वंदियादेवन ने शानदार अभिनय किया। उनमें से एक व्यक्ति फुर्ती से आगे बढ़कर उसका मार्ग रोकने लगा। वानर-योद्धा ने तनिक भी संकोच नहीं किया—उसने उस व्यक्ति के मुँह पर एक ज़ोरदार घूँसा जड़ दिया। प्रहरी चित होकर गिर पड़ा, उसकी नाक से गाढ़ा लाल रक्त बह निकला, और वह ज़ोर-ज़ोर से हाँफने लगा।

दूसरा प्रहरी हाथ फैलाकर वंदियादेवन की ओर दौड़ा—उसका इरादा इस उपद्रवी अतिथि को कुश्ती में पटकने का था, यह स्पष्ट था। हमारे युवा ने झट से बढ़े हुए हाथों में से एक को पकड़ा, प्रतिद्वंद्वी के दोनों पैरों के बीच सफाई से अपना पैर फँसाया और फिर एक झटके में उसे मरोड़ दिया। सैनिक पीड़ा से चीख उठा—“अम्माड़ी!” (पीड़ा में माँ के लिए निकली एक तीव्र चीत्कार)—और एक भारी धप् की आवाज़ के साथ फर्श पर बैठ गया।

तब तक तीसरा प्रहरी लगभग उसकी गर्दन पर आ पहुँचा था। पैरों पर हल्का-सा घूमकर वंदियादेवन ने सैनिक के पेट पर एक सधी हुई, सटीक लात जमा दी। उस व्यक्ति को आघात का पूरा बल अनुभव हुआ, और वह एक भयंकर चीत्कार के साथ भूमि पर जा गिरा।

गिरे हुए तीनों प्रहरी क्षण-भर में सँभल गए। वे हड़बड़ाकर उठे और एक और आक्रमण की तैयारी में वंदियादेवन के चारों ओर चक्कर काटने लगे—किंतु इस बार काफी सावधानी से, यह कहना ही होगा। उसके घूँसों और लातों से वे एक सम्मानजनक दूरी बनाए हुए थे।

इधर महल के द्वार के ठीक सामने घोड़ों की टापें ज़ोर-ज़ोर से सुनाई देने लगीं। वंदियादेवन ने अवसर का लाभ उठाया। उसने तीखे स्वर में चिल्लाना आरंभ किया—“चोर! चोर!”—और अपने संभावित आक्रमणकारियों पर टूट पड़ा।

प्रहरियों ने उसे रोकने का हताश प्रयास किया, किंतु व्यर्थ; वंदियादेवन ने अपनी भयंकर, कान फाड़ देने वाली चीखें बंद नहीं कीं। “चोरों, धोखेबाजों का गिरोह!” उसने मामले को और गरमाने के लिए हुँकार भरी।

छोटे पऴुवेत्तरायर के दृश्य में प्रवेश करने के लिए यह सर्वथा उपयुक्त क्षण था।

“यहाँ यह कैसा कोलाहल है?” सेनापति गरज उठे, उनका स्वर भारी लोहे के फावड़े की तरह उस शोर को चीर गया।

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