वंदियादेवन उस विषादपूर्ण गुप्त सुरंग में उतरने लगा। वह धीरे-धीरे उतरा, हर पग धरने से पहले सँभलकर—क्योंकि उस घोर काले शून्य में मुँह के बल लुढ़क पड़ना कोई अच्छी बात न थी। पत्थर की सीढ़ियाँ कुछ दूर तक नीचे उतरीं, फिर एक समतल भूमि में जा मिलीं, और फिर से नीचे उतरने लगीं। उसने अपनी दोनों भुजाएँ फैलाईं, इस आशा में कि दीवारें हाथ लग जाएँगी—परंतु शून्य वायु के सिवा कुछ न मिला। सुरंग सचमुच विशाल थी। अब सीढ़ियाँ फिर ऊपर चढ़ने लगीं, अंधकार में हल्का-सा मोड़ लेती हुईं। अप्पप्पा! उसे और कितनी दूर जाना होगा? यह टेढ़ा-मेढ़ा मार्ग और कितना लंबा है, और कितनी देर तक इस स्याह-काले अंधकार में अंधे की भाँति ठोकरें खानी होंगी?
आह—यह फिर क्या? अंधकार जैसे कुछ छँट-सा रहा था। एक अत्यंत क्षीण-सा प्रकाश उसकी आँखों पर पड़ने लगा था। पर यह प्रकाश आ कहाँ से रहा था? क्या यह चाँदनी थी, जो छत में कहीं से छनकर आ रही थी? या किसी विशाल कक्ष की खिड़की की दरार से? या फिर किसी गुप्त कोठरी में जलता हुआ दीपक, जिसका प्रकाश पत्थर की इस क़ैद से पिघलकर बाहर आ रहा था?
नहीं, इनमें से कुछ भी नहीं था। आँखों के सम्मुख यह कैसा जादू हो रहा था? क्या सचमुच ऐसा दृश्य उसकी आँखों के आगे प्रकट हो रहा था, या उसका मस्तिष्क सदा के लिए चकरा गया था?
जिस मंडप से होकर वल्लभरायन आगे बढ़ रहा था, वह सचमुच विशाल आकार में गढ़ा गया था। समूची चट्टान को तराशकर बनाया गया एक अद्भुत तहख़ाना। इसी कारण छत इतनी नीची थी कि बीच-बीच में उसके सिर से छू जाती थी। और वह प्रकाश—वह कोई भटका हुआ चाँद नहीं था, न ही छत या दीवारों की दरारों से छनकर आता कोई विपथगामी दीपक। यह विचित्र प्रकाश-किरणें उन वस्तुओं से आ रही थीं, जो फर्श पर सर्वत्र दीवारों के सहारे छोटे-छोटे ढेरों में पड़ी थीं, और कहीं-कहीं फर्श पर एक अद्भुत बेतरतीबी में बिखरी हुई थीं। आह, उन्होंने कैसा दृश्य रच दिया था!
धरती पर पड़ी उन अलौकिक वस्तुओं से मोतियों जैसी आभा की किरणें छिटककर नाच रही थीं। सुंदर नक्काशीदार मुकुट, जिनमें अद्भुत माणिक, पन्ने और हीरे जड़े थे; उधर मोटी-मोटी स्वर्ण-श्रृंखलाएँ और मोतियों की झिलमिलाती मालाएँ; बहुमूल्य रत्नों की शांत अग्नि में चमकते गले के हार। और वह बड़ा-सा पात्र? हे ईश्वर, वह श्वेत मोतियों से लबालब भरा था, एक कोमल, म्लान दीप्ति में जलता हुआ—तट पर लगे पुन्नै वृक्ष की श्वेत, मनोहारी कलियों के समान। बड़े, गोल, भारी मोती! एक और कोने में एक पात्र स्वर्ण-मुद्राओं से उमड़ रहा था, जो संध्या की अंतिम किरणों की भाँति झिलमिला रही थीं। यहाँ शुद्ध सोने की सिल्लियाँ थीं—सच कहा जाए, तो यह तांजावूर का वही अमूल्य राजकोष था! उसने सोचा, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। वृद्ध बड़े पऴुवेत्तरायर, जो स्वयं कोषाध्यक्ष थे, के अपने प्रासाद के ठीक बगल में स्थित एक उदास महल के नीचे इसे नहीं छिपाया जाएगा तो और कहाँ छिपाया जाएगा। और वंदियादेवन न जाने किस सौभाग्य के बल पर यहाँ आ पहुँचा था। भाग्यलक्ष्मी और नियति देवी—भाग्य की उस देवी—की संयुक्त कृपा ने ही उसे यहाँ उतारा था। लगभग बिना किसी प्रयास के वह चोल देश के सबसे बड़े गुप्त रहस्यों में से एक पर ठोकर खा बैठा था।
अब केवल एक ही कार्य शेष था—इसका सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए, यह निश्चित करना। किंतु यह सब भूल जाओ—उसका मन तो यहाँ से जाना ही नहीं चाहता था। उसकी समस्त सांसारिक कामनाएँ सहसा एक बिंदु पर आकर सिमट गई थीं: इस धन-राशि के बीच अपने दोनों हाथ फिराना। भूख-प्यास अब जैसे अनजाने शब्द बन गए थे; नींद की आवश्यकता भी वह अनुभव नहीं कर पा रहा था। उसकी चौंधियाई आँखों के समक्ष जो कुछ पड़ा था, वह सौ से अधिक अभियानों का प्रतिफल था, हज़ारों चोल सैनिकों द्वारा संचित लूट का माल, उनके स्वेद और रक्त का परिणाम। वह प्रसिद्ध रत्न-भंडार, उन नवनिधियों की कितनी ही महाकाव्यात्मक कथाएँ उसने सुनी थीं—और यहाँ वे सब जैसे उसके चरणों में बिखरी पड़ी थीं! ऐसे कोष से होड़ करने की आशा स्वयं कुबेर—धन के देवता—भी नहीं कर सकते थे। इसे छोड़कर चले जाने की बात भला कौन सह सकता है?
वंदियादेवन उस धन-राशि के मध्य घूमता रहा, स्वयं को खींचकर हटा ले जाने की शक्ति उसमें नहीं थी। एक कोने में रखे उत्कृष्ट नक्काशी वाले मुकुटों पर उसने उँगलियाँ फेरीं, दूसरे कोने से भारी हार उठाए। अगले ही क्षण उन्हें फेंककर वह पीतल के पात्र की ओर लपका, मोतियों की गहराई में हाथ डुबो दिया, और विस्मय से देखा कि वे कैसे कोमलता से उँगलियों के बीच से झर रहे थे। एक और स्वर्ण-मुद्राओं से भरे पात्र में हाथ चलाया, और विशुद्ध आश्चर्य में ताकता रहा।
तभी उसकी दृष्टि एक और वस्तु पर पड़ी। एक कोने में फर्श पर बिखरी, म्लान-सी चमक रही थी। वह जाँच करने के लिए आगे बढ़ा। पहले तो कुछ समझ में नहीं आया, इसलिए वंदियादेवन ने झुककर उस ढेर को ध्यान से देखा। अगले ही पल वह हतप्रभ होकर पीछे हट गया।
अय्यो—हे ईश्वर, यह तो एक कंकाल है! जिसका कभी चर्म और मांस, रक्त और स्नायु, केश, नेत्र, मुख, कर्ण थे—वही एक मनुष्य, अब सूखी हड्डियों के एक ढेर के अतिरिक्त कुछ नहीं था। और—ठहरो, वह जैसे हिल रहा है! क्या उसमें प्राण लौट रहे हैं? क्या वह कुछ क्षण पूर्व छुई गई स्वर्ण-मुद्राओं की भाँति झन-झन, खन-खन कर रहा है? क्या वह—उससे कुछ कहना चाह रहा है?
वल्लभरायन के शरीर का प्रत्येक रोआँ आतंक से खड़ा हो गया। क्या वह अंततः पूरी तरह पागल हो गया था? छि! कदापि नहीं। कंकाल तो सदा के लिए निर्जीव था; वह तो एक चूहा था, जो पसलियों के नीचे से सरककर निकलने का प्रयास कर रहा था। आह, वही तो भागा, ठीक उसके पैरों के ऊपर से। अब उसने भली-भाँति देखा, कंकाल फर्श पर एकदम स्थिर पड़ा था। किंतु एक दृष्टि से यह बात सत्य थी, है न? वह सचमुच उससे कुछ कहना चाहता था। भाग—यहाँ खड़ा मत रह। क्योंकि मैं भी कभी तुम्हारी ही तरह एक मनुष्य था, जीवित, श्वास लेता हुआ एक मनुष्य। किंतु मैं यहाँ अधिक देर तक रह गया, और इस समाधि में खोकर मर गया! अंधकार में धूल में मिल जाना ही अब मेरी नियति है। मेरी भूल मत दुहराना—भागो, भागो!
हड्डियों के उस बूढ़े ढेर ने उसे सचेत करके बिल्कुल ठीक ही किया था। यहाँ रुकने पर निश्चय ही उसे भी यही दशा भोगनी पड़ती। उसे तुरंत निकलना होगा, क्योंकि यदि वह न निकला, तो उसका अंत निश्चित है।
वंदियादेवन ने व्यर्थ ही बाहर निकलने का मार्ग ढूँढ़ा। कोई लाभ न हुआ। भागने का कोई मार्ग जैसे था ही नहीं, यहाँ तक कि जिस मार्ग से वह भीतर आया था, वह भी उसे नहीं मिला। इस शापित भूगर्भ-कोष में वह जिस ओर भी घूमता, अंधकार का दैत्य अपना फैला हुआ मुँह खोले उसका स्वागत करता; छाया-भरे कोने और भी भयानक लगते। और नीचे देखने पर ऐसा लगता मानो वह सीधे नरक में ही फिसलता जा रहा हो; अंधकार जैसे अथाह गहराई में अनंत काल तक उतरता गया हो। जिन सीढ़ियों से वह उतरा था, वे यहीं कहीं होनी चाहिए; केवल ठोकर खाकर उन तक पहुँचना ही शेष था।
वंदियादेवन उस विशाल कक्ष में निरंतर घूमता रहा, इस आशा में कि उसका पाँव उस अंतिम सीढ़ी पर जा पड़ेगा। एक बेचैन चक्कर में वह लगभग स्वर्ण-मुद्राओं के एक और ढेर से जा टकराया। ठिठककर, वह कठोर दृष्टि से एक ऐसी वस्तु को देखता रहा, जो एक जाल जैसी लग रही थी—आह हाँ, मकड़ी का जाल, चमकीला और महीन, सोने पर पतले धागों के तंतु फैलाए हुए। लगभग अनजाने में ही इसने उसके मन में एक विचार का धागा बुन दिया। उसने गाँव के वृद्धों के मुख से प्रायः मनुष्य के तीन महासंकटों के बारे में सुना है: ज़मीन, स्त्री और सोना। ये मोह के जटिल जाल बुनते हैं, इस ताक में रहते हैं कि मनुष्य कब सबसे गंभीर पाप करेगा—ठीक वैसे ही जैसे मकड़ी शिकार के लिए चुपचाप बैठी रहती है। कहीं से एक मक्खी उड़कर आती है, जाल के मोह में मुग्ध होकर उस पर बैठ जाती है—और तभी मकड़ी उस असहाय शिकार को खींचकर समूचा निगल जाती है। यही वे तीन महा-प्रलोभन हैं; इस ताक में रहते हैं कि मनुष्य उनके जाल में उलझ जाए, और एक बार फँसने पर फिर कोई छुटकारा नहीं।
और वंदियादेवन का क्या? क्या आश्चर्य है कि ठीक आज ही वह इन तीनों का सामना कर चुका था! पहले पऴुवूर की तरुणी रानी नंदिनी आई, जिसने अपने असाधारण रूप से उसे फँसाने का प्रयास किया। उससे भी संतुष्ट न होकर, उसने वानर वंश की प्राचीन भूमि-संपत्ति के विषय में धूर्ततापूर्ण बातों का जाल बुनकर उसे वश में करना चाहा, उन्हें उसके लिए छीन लाने की झूठी आशा सामने लटकाकर। और अब, यह तांजावूर की विशाल धन-राशि, अपने झिलमिलाते, चमकीले आकर्षण से उसे जीवित निगल जाने का लोभ दिखा रही है।
पहले दो से तो वह अपनी बुद्धि-विवेक को अक्षुण्ण रखकर बच निकला था; अब उसे तीसरे से भी बचकर निकलना होगा। सच कहा जाए तो विशाल साम्राज्य, संचित धन, एक हठी स्त्री के प्रलोभन—इन सब में वह अपना सिर खपाएगा ही क्यों? यह विशाल, विस्तृत पृथ्वी, जिसकी अद्भुत छत आकाश है, वही तो सभी अर्थों में उसका प्रासाद है। क्या एक प्रसिद्ध प्राचीन श्लोक नहीं है, एक अद्वितीय, संतोषप्रद दर्शन, जो उसने अपने तमिल पूर्वजों के मुख से प्रायः सुना था—"यादुम ऊरे, यावरुम केलिर"—पृथ्वी के सब देश ही मेरा घर हैं, और यहाँ के सभी लोग मेरे अपने हैं?
और सचमुच, पृथ्वी उसी की थी, इसके मनुष्य उसी के मित्र थे। सबसे भेंट करना, अपनी इच्छानुसार एक राज्य से दूसरे राज्य में आनंदपूर्वक कूदते-फाँदते फिरना—इससे उत्तम और क्या हो सकता है? वह उन नदियों के किनारे जीवन व्यतीत करेगा, जो नई बाढ़ के जल से दोनों कूलों को डुबो देती हैं। वह घने वनों में मग्न रहेगा, जहाँ वसंत में वृक्ष नए पत्ते धारण करते हैं, और नाना रंगों तथा पंखों वाले पक्षी आकाश में उड़ते फिरते हैं। वह मुग्ध नेत्रों से हरिण, मयूर और हरे-भरे पर्वतों को देखेगा, जिनके शिखर मेघों को छूते हैं। वह विस्मय में विशाल समुद्र के किनारे खड़ा रहेगा, जब उसकी लहरें रेतीले तटों पर आकर टकराएँगी। वह ऐसे ही जिएगा—जहाँ जो मिलेगा वही खाकर, और जहाँ इच्छा होगी वहीं सोकर। आह, यही तो जीने योग्य जीवन है! कितना अद्भुत संतोषप्रद होगा। हाथ की मुट्ठी में इतनी सरलता से आ जाने वाले ऐसे जीवन को छोड़कर षड्यंत्र, संकट और मृत्यु से भी अधिक भयावह वासनाओं से भरा मार्ग भला कौन चुनना चाहेगा?
किसी-न-किसी प्रकार उसे इस शापित कक्ष से निकलना ही होगा; और फिर, इस विषादपूर्ण प्रासाद, संपूर्ण तांजावूर से। वह फिर कभी स्वयं को उनके चिपचिपे जालों में फँसने नहीं देगा।
किंतु ठहरो। क्या वह किसी द्वार के खुलने की ध्वनि थी? क्या फिर से पदचाप सुनाई दी? आह, इस रात्रि के रहस्यमय घटनाक्रम का क्या कोई अंत नहीं है? या इसके आतंक का, ऐसा ही क्यों न कहें।
इस बार पदचाप जैसे बहुत दूर से आ रही थी—और वह भी दो भिन्न दिशाओं से। उसने कान खड़े कर यथासंभव ध्यान से सुना। आँखों ने चारों ओर की स्याह-काली कालिमा को भेदने का प्रयास किया, कहीं कुछ—चाहे जो भी हो—देखने के लिए व्याकुल।
शीघ्र ही उसे इसका पुरस्कार मिला। जैसे बहुत दूर सजे एक मंच पर कोई कूत्तु—एक नाटक—अभिनीत हो रहा हो, और अभिनेता उस पर हिलती-डुलती छोटी-छोटी मूर्तियों के अतिरिक्त कुछ न हों। जहाँ वह खड़ा था, वहाँ से वंदियादेवन ने काफ़ी दूर से, जैसे कुछ ऊँचे समतल से, इन घटनाओं को घटते देखा।
मंच के एक ओर से एक मशाल प्रकट हुई; दूसरी ओर से एक और मशाल अंधकार का पर्दा हटाती हुई आई। दोनों प्रकाश अटलरूप से एक-दूसरे की ओर बढ़े। पहली मशाल के पीछे प्रकाश में दो काली, हृष्ट-पुष्ट आकृतियाँ उभरीं; दूसरी के पीछे दो और। दूसरे दल में एक लंबा और राजकीय था, दूसरा नाटा और छरहरा। दोनों दल एक-दूसरे के निकट आए, और वंदियादेवन की आँखें उन्हें पहचानने की चेष्टा में जैसे कोटरों से बाहर निकली पड़ रही थीं। बड़ी कठिनाई से वह सफल हुआ। बाईं ओर की आकृतियाँ उसके मित्र कंदमारन और उसके साथी की थीं; दाईं ओर वृद्ध बड़े पऴुवेत्तरायर और उनकी तरुणी रानी नंदिनी थे।
वंदियादेवन ने सोचा, जब ये दोनों दल आमने-सामने होंगे तो क्या होगा? कोई महाविपत्ति? या वे सौहार्दपूर्वक मिलकर एक-दूसरे को मार्ग दे देंगे? दोनों दलों के निकट आते-आते वह उत्सुकता में लगभग साँस लेना भूल गया।
उनके कुछ हक्का-बक्का होकर इधर-उधर चलने से ऐसा लगा, मानो ऐसा आकस्मिक सामना उनके किसी के भी विचार में नहीं था। अंधकार में एक-दूसरे के सम्मुख पड़कर दोनों दल जैसे स्तब्ध, दिशाहीन हो गए थे। किंतु वंदियादेवन की आशंका के विपरीत, सर्वनाश जैसा कुछ नहीं हुआ। बड़े पऴुवेत्तरायर ने कंदमारन से कुछ पूछा, युवक ने धीरे से उत्तर दिया। वल्लभरायन अबश्य उनकी बातों का एक शब्द भी नहीं सुन सका। पऴुवूर-अधिपति ने कोई संकेत करके गुप्त सीढ़ी की ओर उँगली उठाई, जिसके उत्तर में कंदमारन ने गहरी श्रद्धा से सिर झुकाकर नमस्कार किया, फिर सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।
बड़े पऴुवेत्तरायर उसे जाते हुए देखते रहे, फिर कंदमारन के सेवक की ओर एक संकेत किया, जो अब भी जलती हुई मशाल ऊँची किए हुए था। उस व्यक्ति ने भी प्रत्युत्तर में सिर झुकाकर, आदरपूर्वक मुख पर हथेली रखकर आज्ञा स्वीकार की। लगभग तुरंत ही वह कंदमारन के पीछे हो लिया, और पऴुवूर-अधिपति तथा उनकी संगिनी बाईं ओर अपने मार्ग पर आगे बढ़ गए।
यह समस्त घटनाक्रम, किसी रहस्यमय छाया-नाटक या मनमोहक पथ-नाटिका की तरह, केवल कुछ क्षणों में घट गया। और वंदियादेवन के अनुमान से, यह ठीक उसी सीढ़ी के पास घटा, जो तहख़ाने में उतरती थी। आह, कैसा सौभाग्य था कि वह उस सीढ़ी के पास रुका नहीं रहा, बल्कि अंधे की भाँति घूमता हुआ ख़ज़ाने में जा पहुँचा था! इन दोनों दलों के बीच फँस जाने पर कैसी भयंकर स्थिति होती। सौभाग्य से वह उस भाग्य से बच गया था, पूर्णतः सुरक्षित था।
किंतु अब क्या? बाहर निकलने का कोई उपाय तो अभी भी ढूँढ़ना ही होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि कंदमारन, मधुरांतकन को सुरक्षित उसके निवास तक पहुँचाकर अब लौट रहा था। वह, वंदियादेवन, संभवतः अपने मार्ग से भटककर भूल से ख़ज़ाने में घुस आया था। अब अपने मित्र का पीछा करने पर निश्चय ही वह उस द्वार तक पहुँच जाएगा, जो दुर्ग के बाहर खुलता है। और एक बार वहाँ पहुँच जाने पर, वह कोई युक्ति निकालकर बातों के प्रवाह में बाहर निकल ही सकेगा। वह कंदमारन की सहायता भी तो माँग सकता है; या, सबसे बुरी स्थिति में, उसे और उसके सेवक को एक त्वरित हाथापाई में परास्त कर सकता है। किसी भी प्रकार से, इस क्षण कड़म्बूर के राजकुमार का पीछा करना ही उसके लिए सर्वोत्तम मार्ग था।
मशाल पहले तो कक्ष की ओर ही आती प्रतीत हुई। वंदियादेवन ने साँस रोक ली और एकदम स्थिर खड़ा रहा। फिर वह जैसे दूर हटने लगी, और उसके काँपते प्रकाश में उसे वही सीढ़ियाँ दिखाई दीं, जिनसे वह निश्चय ही ख़ज़ाने में उतरा था। वह चुपचाप पैरों से सरकता हुआ उनकी ओर बढ़ा, और चढ़ने लगा—यथासंभव सतर्क रहकर प्रकाश को दृष्टि में रखा, किंतु यह भी सुनिश्चित किया कि मित्र को उसकी उपस्थिति का आभास न हो।
चढ़ते-उतरते हुए वह चकित था कि मार्ग में कितने मोड़ और घुमाव थे, कितनी गलियाँ और अंतहीन चक्कर—जैसे किसी नवागंतुक को भ्रम में डालने के लिए ही बनाए गए हों। हे ईश्वर, अंधकार में इस मार्ग से होकर सुरक्षित बाहर पहुँचने की आशा कोई नहीं कर सकता! कंदमारन चिरंजीवी हो, उसने सोचा। किंतु इस सर्वथा अनजाने में किए गए उपकार का प्रतिदान वल्लभरायन कैसे, कहाँ और कब चुका पाएगा?
वह क्या जानता था कि कुछ ही क्षणों में एक अवसर उपस्थित होने वाला है।
अंततः गुप्त सुरंग का अंतिम सिरा दृष्टिगोचर हुआ। सामने एक विशाल प्रस्तर-दीवार खड़ी थी, जो आश्चर्यजनक ऊँचाई तक सीधी थी। यह सोचना भी लगभग असंभव था कि इसमें कोई प्रवेश-द्वार छिपा हो सकता है—फिर भी एक तो निश्चय ही था, है न?
कंदमारन के पथ-प्रदर्शक ने दाहिने हाथ से मशाल को बाएँ हाथ में ले लिया। फिर खाली हाथ को दीवार पर रखकर उसने कुछ किया—ऐसा लगा जैसे कोई छिपी हुई सिटकनी घुमाई हो। पत्थर में एक दरार प्रकट हुई; एक पतली काली रेखा, जो क्षण-प्रतिक्षण बड़ी होती हुई शीघ्र ही एक पूर्ण वयस्क मनुष्य के आकार तक पहुँच गई। प्रहरी ने उस ओर उँगली से संकेत कर कुछ कहा; कंदमारन ने संक्षिप्त उत्तर देकर द्वार से बाहर पग रखा। दूसरा व्यक्ति अभी भी दुर्ग के भीतर ही खड़ा था; उसकी पीठ अब अंधकार में खड़े दर्शक की आँखों के ठीक सामने थी।
किंतु आह—यह क्या? वह प्रहरी जैसे अपनी कमर में खोंसे हुए एक छोटे, टेढ़े छुरे को बाहर निकाल रहा था, और—हे ईश्वर, उसने कंदमारन की पीठ में छुरा घोंप दिया!
वह अभागा शैतान—जो सरल-विश्वासी मनुष्य की पीठ में छुरा घोंपता है!
वंदियादेवन अपने गुप्त स्थान से छिटककर बाहर आया और आगे झपटा। प्रहरी ने उस हलचल को भाँप लिया और ठीक उसी क्षण घूम खड़ा हुआ। मशाल का काँपता हुआ प्रकाश वल्लभरायन के क्रोधित मुख पर जा पड़ा।
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