छोटे पऴुवेत्तरायर की सेवा में नियुक्त दो बलशाली प्रहरियों को दोनों ओर लिए, तरुण वंदियादेवन बड़े ठाट-बाट से तंजावुर महानगर की सैर करने निकला। यह बात दिन के उजाले की तरह साफ़ थी कि ये दोनों साथी केवल इस बात पर नज़र रखने के लिए साथ आए थे कि वह कहीं भाग न जाए। दुर्ग के फाटक पर होंठ सिए खड़े प्रहरियों को देखकर भी यह स्पष्ट हो गया था कि कड़ा आदेश जारी हो चुका था—उस दिन किसी को भी शहर से बाहर एक क़दम भी रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
फिर भी वंदियादेवन ने मन-ही-मन ठान लिया था कि आधी रात से पहले ही वह वहाँ से चंपत हो जाएगा। उसे निकलना ही होगा। अन्यथा, बड़े भाई, यानी बड़े पऴुवेत्तरायर से सामना होने का वह भयंकर परिणाम उसके भाग्य में लिखा है। देरी करने का अर्थ था संकट को न्योता देना, प्राण लेकर निकलने की संभावना को और भी धूमिल कर देना। वह एक के बाद एक राह पकड़कर अनमने भाव से घूम रहा था, दृश्य देखने के लिए रुकता, और उसका बेचैन मन उस समय भागने के दर्ज़नों उपाय रच रहा था। पहला काम—इन दोनों दैत्याकार साथियों के चंगुल से निकलना; दूसरा काम—स्वयं दुर्ग से ही चंपत हो जाना। पर वह यह सब करेगा कैसे? बहुत सिर खपाने पर भी कोई ऐसी तरकीब कारगर न लगी, जो एक साथ दोनों काम कर दे। प्रहरियों को वश में करना उसके लिए कोई कठिन कार्य न था; पलक झपकते ही उन्हें कंधे के ऊपर से पटककर भीड़ में विलीन हो जाने जैसी फुर्ती उसमें थी। लेकिन जाकर खड़ा कहाँ होगा?
सब जानते थे कि पऴुवेत्तरायर बंधुओं ने तंजावुर दुर्ग को अविश्वसनीय रूप से अभेद्य बना दिया था। लोग कहते थे कि उनकी स्पष्ट अनुमति के बिना हवा का एक झोंका भी फाटक से होकर अंदर नहीं घुस सकता था। उसी सुबह तो स्वयं सम्राट ने कहा था कि इसकी सीमा लाँघने का विचार करने से तो स्वयं यमराज भी भय से काँप उठेंगे। वह—अकेला एक लड़का—कैसे इसका सामना करेगा? प्रहरियों के शरीर पर एक बार उँगली रखने भर की देर थी कि वे तुरंत चीत्कार कर उठते। पलक झपकते ही उसे शहर की सबसे सीलन भरी कालकोठरी में डाल दिया जाता, या फिर वहीं के वहीं उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाता। इसलिए प्रहरियों से झगड़ा मोल लेना कोई समाधान नहीं था। उसे सावधानी से योजना बनाकर भागना था—पहले इन लोगों से, फिर इस अभागे शहर से।
अच्छा, क्या नमक के मोल का कोई भी प्राचीन दुर्ग कभी एक गुप्त सुरंग के बिना बना है? बल्कि दुर्ग जितना सुदृढ़ होता है, छिपी सुरंग होने की संभावना भी उतनी ही अधिक होती है। लेकिन वह उसे खोजेगा कैसे? ऐसा गुप्त रहस्य जानता ही कौन है, और यदि कोई जानता भी हो, तो वह वंदियादेवन को बताने का कष्ट क्यों करेगा?
चलते-चलते, एक के बाद एक निराशाजनक तरकीबें मन-ही-मन सोचते-सोचते उसका ध्यान पऴुवूर की तरुण रानी पर जा टिका। आह, इस विशाल पत्थर की दीवारों से घिरी जगह में यदि कोई उसकी ओर जीवन-रूपी रस्सी फेंक सकता था, तो वह वही कोमल हृदया महिला थी। यह एक जुआ अवश्य था, फिर भी शायद मित्र आऴ्वारक्काडियान नंबि का नाम लेकर वह उनकी कृपा प्राप्त कर सकता था। उसके बाद तो मामला सहजता से आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन पहले उसे, बिना किसी को यह आभास दिए कि वह इन टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में कुछ खोज रहा है, बड़े पऴुवेत्तरायर के भव्य प्रासाद को ढूँढ़ निकालना था। और यदि ढूँढ़ भी लिया, तो इन भारी-भरकम क़दमों वाले साथियों से पीछा छुड़ाना था—जिन्हें रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए कि वह इऴैया रानी से मिलना चाहता है। ज़रा-सी भी भनक पाते ही वे सीधे छोटे पऴुवेत्तरायर के पास ख़बर लेकर दौड़ पड़ते, और तब सचमुच सब समाप्त हो जाता। लेकिन आह, यह एक और रोंगटे खड़े कर देने वाला विचार था—जब वंदियादेवन उनके प्रासाद के चारों ओर चुपके-चुपके घूम रहा हो, ठीक तभी यदि स्वयं बड़े पऴुवेत्तरायर घर लौट आएँ? यह तो केवल सिंह की माँद में घुसना नहीं होता; यह तो सिंह के खुले जबड़े में ही अपना सिर दे देना होता।
देखने में लग रहा था कि वह शहर के रंगीन दृश्यों में पूरी तरह खोया हुआ है, पर वंदियादेवन ने अपनी आँखें पैनी और जिह्वा सक्रिय रखी थी। उसके मुख से प्रश्नों की एक अंतहीन, प्रफुल्ल धारा झर रही थी।
"वह क्या है?"
"और यह?"
"वह जो उधर है, वह किसका ऐसा भव्य प्रासाद है?"
"यह ऊँचा भवन किसलिए है?"
"क्या वह किसी मंदिर का गोपुरम् है?"
"और यह सुंदर अट्टालिका?"
प्रत्येक प्रश्न के बाद उसके कान खड़े हो जाते—कि अभी प्रहरी बुदबुदाएँगे, "यह बड़े पऴुवेत्तरायर का प्रासाद है," या "यह पऴुवूर की इऴैया रानी की अट्टालिका है।" बारीकियों के लिए भूखी उसकी आँखें चारों ओर घूम रही थीं। और इतना सब देखने के बीच एक काम की बात उसके मन में स्थायी रूप से बैठ गई—तंजावुर भले ही अपने चौड़े, धूप से चमकते राजमार्गों पर गर्व करता हो, जहाँ व्यस्त लोग और रंग-बिरंगी गाड़ियों की भीड़ रहती थी; लेकिन उसने कई सँकरी गलियाँ, शांत कोने, छोटे-छोटे घुमावदार रास्ते और पुराने वृक्षों की घनी छाया से भरे विस्तृत उद्यान भी छिपा रखे थे।
वैसी ही किसी छायादार गली में दौड़कर घुस जाना, किसी पेड़ की खुरदरी छाल पर चढ़कर किसी बड़े, पत्तों से भरे बाग़ीचे वाले घर में उतर पड़ना—बहुत कठिन नहीं होगा, वंदियादेवन ने सोचा। एक व्यक्ति आराम से एक-दो दिन छिपा रह सकता है। लेकिन असली युक्ति थी किसी की नज़र में आए बिना निकल जाना, और ऐसी व्यवस्था करना कि वे उसे खोजने के लिए पूरा शहर न छान मारें। यदि छोटे पऴुवेत्तरायर ने अपनी असंख्य सैनिकों की टुकड़ियाँ भेजकर बाक़ायदा तलाशी अभियान चलाया, तो भागना सर्वथा असंभव हो जाएगा।
एक और मार्ग भी वंदियादेवन के सामने खुला था—किसी के घर जाकर आश्रय की भिक्षा माँगना। और इस विशाल नगर में उस सुंदरी इऴैया रानी के अतिरिक्त उस पर दया ही कौन करेगा? बस अपनी जीवंत कल्पना की पूरी शक्ति का उपयोग करके उसे एक ऐसी काल्पनिक कहानी गढ़नी होगी, जिसे सुनकर उन पर विश्वास करने के सिवा और कोई चारा न रहे। और इन सब का पहला चरण था—इन प्रहरियों के चंगुल से भागना।
अहा, यह फिर कैसा कोलाहल है? कौन चिल्ला रहा है? ये लोग कौन हैं, और ऐसी भारी धूल उड़ाती भीड़ बनाकर सड़क पर तेज़ी से क्यों भागे जा रहे हैं? ईश्वर को धन्यवाद—इस क्षण देवता उस पर मुस्कुरा रहे हैं, इसमें अब क्या संदेह! क्योंकि यह लीजिए, उसकी आँखों के सामने ही उपस्थित हो गया एक उत्तम भ्रम, भागने के लिए जैसी तरकीब की उसे आवश्यकता थी, ठीक वैसी ही।
वंदियादेवन एक ऐसे चौराहे पर आ पहुँचा था, जहाँ कई सँकरी गलियाँ एक चौड़े राजमार्ग में आकर मिलती थीं। और वहीं उसका सामना एक विशाल, कोलाहलपूर्ण भीड़ से हुआ। पीतल के करताल बजाते, ज़ोर-ज़ोर से ढोल पीटते हुए वे आगे बढ़ रहे थे, गला फाड़कर ऐसा विजय-संगीत गा रहे थे मानो संध्या का आकाश चीर देंगे। अनुमान लगाना कठिन नहीं था—यह वही प्रसिद्ध वेऌअक्कार सैन्यदल था, जो राजा से भेंट करके दुर्ग से बाहर निकल रहा था। केवल इनके बीच घुल-मिल जाने से कैसा रहेगा? अदृश्य हो जाने का इससे बेहतर उपाय और क्या हो सकता है।
वह भली-भाँति जानता था कि उसके वे मुँह फुलाए प्रहरी उसे इतनी आसानी से चले जाने नहीं देंगे; वे सीधे इस अव्यवस्थित सैन्यदल के भीतर ही कूद पड़ेंगे। और दुर्ग के उस विशाल फाटक से निकलना भी कोई सरल बात नहीं थी। द्वाररक्षक इतने मूर्ख नहीं थे कि एक अजनबी को यूँ ही चलकर बाहर जाने दें। वे उसे रोकेंगे ही। लेकिन सच कहें तो, उसके सामने उपाय ही क्या था? ऐसे ईश्वर-प्रदत्त अवसर को हाथ से जाने देना तो स्वयं को मूर्ख सिद्ध करना होता।
अपनी भूमिका निभाने के लिए आँखें बड़ी-बड़ी करके, निर्दोष मुख बनाकर उसने साथियों की ओर मुड़कर पूछा कि यह कूच करते लोग कौन हैं और यहाँ क्या कर रहे हैं। उन्होंने रूखेपन से बताया कि यह वेऌअक्कार सैन्यदल है। सुनते ही वंदियादेवन हाँफती हुई उत्तेजना में बड़बड़ाने लगा। वह कहने लगा कि ऐसे साहसी सैन्यदल में सम्मिलित होने के अतिरिक्त वह और कुछ नहीं चाहता। उसे इनके पास जाना ही होगा, बिल्कुल निकट से इन्हें देखना ही होगा! और यह कहकर वह धीरे-धीरे उस कोलाहलपूर्ण दल के भीतर घुसने लगा। कुछ ही देर बाद हाथ उठाकर उसने उदासीन भाव से घोषणा की कि वह उन लोगों को देखने के लिए मरा जा रहा है, जो शोभायात्रा के आगे तारै और तप्पट्टै (लंबी घुमावदार तुरहियाँ और चपटे ढोल) बजा रहे हैं। प्रहरियों के आपत्ति करने से पहले ही वह उस घूमती हुई भीड़ में कूद पड़ा।
सैन्यदल आगे बढ़ता रहा, वंदियादेवन भी उनके साथ चलता रहा। वह आगे-पीछे नाचने लगा, इधर-उधर झूमने लगा, और इतने उत्साह से विजय-गान में अपना स्वर ऊँचा करने लगा कि अनुभवी सैनिकों के गले भी दब गए। कुछ लोगों ने उसकी ओर विचित्र दृष्टि से देखा—यह हुल्लड़बाज़ छोकरा कौन है? किसी ने सोचा, यह गाँव का कोई पागल है, जो कूच देखकर आपे से बाहर हो गया है; किसी ने केवल आनंदित होकर हँस दिया, यह मानकर कि उसने उदारतापूर्वक स्थानीय ताड़ी पी रखी है। किंतु किसी ने भी उसे रोकने या धकेलकर हटाने का प्रयास नहीं किया।
इधर उसके साथी भीड़ के किनारे-किनारे असहजता से चक्कर काट रहे थे। हो-हल्ले में मस्त, मनमौजी वेऌअक्कार लोगों के साथ वे किसी झमेले में पड़ना बिल्कुल नहीं चाहते थे। उन्होंने स्वयं को यह कहकर सांत्वना दी कि यह मूर्ख छोकरा निश्चय ही मार्ग में थोड़ा और आगे जाकर कहीं-न-कहीं भीड़ से बाहर आ जाएगा। इसलिए वे सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए बीच-बीच में चिंतित आँखों से धूल के बीच से झाँककर उसे देखते रहे।
ठीक उसी क्षण एक युवती, सिर पर सुगंधित दही की एक टोकरी सँभाले, सैन्यदल को जाने देने के लिए एक छोटी-सी गली के मुहाने पर रुकी। बड़े ही प्रफुल्लित मिज़ाज में एक सैनिक डगमगाते हुए उसकी ओर बढ़ा।
"मुझे बड़ी प्यास लगी है, छोटी माँ," उसने दाँत निकालकर हँसते हुए कहा। "क्या तुम्हारा थोड़ा दही खा सकता हूँ?"
"दही नहीं," युवती ने तपाक से उत्तर दिया, उसकी आँखें चमक उठीं, वह ज़रा भी नहीं दबी। "लेकिन तुम्हारे गाल पर दो ज़ोरदार थप्पड़ ज़रूर जड़ सकती हूँ!"
"अच्छा?" सैनिक हँसकर एक क़दम और आगे बढ़ा। "तो फिर वही दो मुझे दे दो!"
जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, युवती चौंके हुए हिरण की तरह उछलकर पीछे हट गई, टोकरी गिराई और भाग खड़ी हुई। हुँकार भरते हुए सैनिक उसके पीछे भागा। यह तमाशा देखकर दो और सैनिक पंक्ति छोड़कर अपने साथी के पीछे दौड़ पड़े। शीघ्र ही सभी धावक चिल्लाते, हाँक लगाते हुए उस सँकरी गली में अंधों की तरह दौड़ने लगे। बाकी भीड़ को कोई अंदाज़ा नहीं था कि कोलाहल किस बात का है, बस इतना समझ गए कि कोई मज़ेदार घटना घट रही है।
इस छोटे-से नाटक को अपनी आँखों के सामने घटित होते देख वंदियादेवन ने पलक झपकते ही अपना मन बना लिया। अब तक तो हम अपने इस तरुण को भली-भाँति पहचानते हैं—उसके लिए सोचना और करना एक ही बात थी। ‘दुविधा’ शब्द का उसके साहसिक जीवन में कोई स्थान नहीं था। और एक बार मन बना लेने के बाद रुककर सोचना उसके स्वभाव के विरुद्ध था। इसलिए वह हंगामे के भीतर कूद पड़ा।
"पकड़ो! पकड़ो!" उसने गला फाड़कर चिल्लाया, और शोभायात्रा से निकलकर दही-विक्रेता का पीछा करते सैनिकों के पीछे दौड़ते हुए कहने लगा। "पकड़ो उसे! दबोचो!"
वह फुर्तीली लड़की कुछ दूर दौड़कर एक आश्चर्यजनक रूप से सँकरी गली में ओझल हो गई। हाँफते हुए उसका पीछा करने वाले लोग जब अंततः हड़बड़ाकर उस गली में घुसे, तो लड़की का कहीं अता-पता नहीं था। वह मानो हवा में विलीन हो गई थी! साँस लेने के लिए दीवार से टेक लगाकर सैनिकों ने तय किया कि आज शाम के लिए पर्याप्त मनोरंजन हो चुका है। अपनी हार पर हँसते हुए उन्होंने पीछा छोड़ दिया और अपने दल की ओर धीरे-धीरे लौट चले।
वंदियादेवन ने अबश्य वैसा कुछ नहीं किया। वह दौड़ता ही रहा। दही-विक्रेता वाली गली में तेज़ी से आगे बढ़ा, दो-तीन और तीखे मोड़ घूमा, नीचे झुकी हुई डालियों के नीचे से निकल गया। सैन्यदल का शोरगुल जब पूरी तरह शांत हो गया, तभी उसने अपनी गति धीमी की और शांत चाल से चलने लगा।
हम तो जानते ही हैं, है न, कि वेऌअक्कार सैन्यदल सामान्यतः सूर्यास्त के ठीक पहले ही दुर्ग से बाहर निकलता था? इन सँकरी, घुमावदार गलियों में दिन और भी पहले ढल जाता था, और छाया पहले ही घनी और गहरी हो चुकी थी। कभी वंदियादेवन ने देखा कि वह दोनों ओर ऊँची मादिल (शहरपनाह) वाली गली से गुज़र रहा है; कभी वह लताओं से लिपटी सादी-सी काँटेदार झाड़ियों की बाड़ के पास से निकल गया। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। एक क्षण के लिए भी वह नहीं रुका, और न ही इस बात की विशेष चिंता की कि वह किस दिशा में जा रहा है। सबसे अधिक उलझन भरी गलियों का जाल भी अंत में जाकर दुर्ग की बाहरी दीवार पर ही तो मिलेगा। गंतव्य पर पहुँचकर वह तय करेगा कि आगे क्या करना है। अंततः, एक दर्जन चतुर तरकीबें सोचने के लिए उसके सामने पूरी एक लंबी रात पड़ी थी।
शहर पर रात कोमलता से उतरी, और उसके अनुमान के अनुसार ही, वंदियादेवन का मार्ग अंत में एक ठोस दीवार पर अचानक समाप्त हो गया। वास्तव में, इतना अँधेरा था कि जब ठंडे पत्थर से उसकी नाक धीरे से टकराई, तभी उसे पता चला कि वह एक बंद गली के छोर पर आ पहुँचा है। उस घोर अंधकार में दीवार कितनी ऊँची या कितनी चौड़ी थी, इसका ठीक-ठीक अनुमान नहीं हो पा रहा था। क्या पता, शायद यह स्वयं दुर्ग की ही विशाल बाहरी प्राचीर हो। उस स्थिति में, इसके नीचे बैठकर प्रतीक्षा करने से बेहतर और कुछ नहीं था। शीघ्र ही चंद्रमा उगेगा, और उसका मोतियों जैसा प्रकाश उसे मार्ग दिखाएगा।
यहाँ नीरवता थी, सूखी मिट्टी और पुराने पत्तों की गंध थी। उसे लगा, पूरे तंजावुर में इससे बेहतर छिपने की जगह और कोई नहीं। उसके वे मूर्ख साथी अब तक निश्चय ही वह बुरी ख़बर लेकर छोटे पऴुवेत्तरायर के पास डगमगाते हुए लौट गए होंगे। क्रुद्ध सेनापति ने निश्चित रूप से तुरंत ही खोजी दल भेज दिए होंगे। शायद वे यह भी संदेह करेंगे कि वंदियादेवन वेऌअक्कार सैन्यदल के साथ फाटक से निकल गया है। वे मुँह फुलाए सैनिक उसे खोजने के लिए शहर के भीतर-बाहर राजमार्गों पर अनगिनत चक्कर काट रहे होंगे—इस चित्र की कल्पना करके उसे बड़ा सुकून मिला।
वे चाहें तो निराशा में अपने बाल नोचें, उसने चुपके से मुस्कुराते हुए सोचा। खोज-खोजकर अपने पैर थका लें, जब तक कि वे हार मानने को विवश न हो जाएँ। मैं उन सबको मूर्ख बनाकर इस विशाल दुर्ग से उनकी नाक के नीचे से निकल जाऊँगा, वरना मेरा नाम वंदियादेवन ही नहीं—और मैं प्रसिद्ध वानर-वंश का सच्चा सपूत भी नहीं!
उगता हुआ चंद्रमा अबश्य अपने साथ कुछ समस्याएँ भी लाएगा। वह कोमल प्रकाश जैसे उसके काम आएगा, वैसे ही पऴुवेत्तरायर के सैनिकों के भी काम आएगा। वे शायद इस स्थान तक उसे खोज निकालें—निकालें तो! उससे उनका विशेष लाभ नहीं होगा। इस घने उद्यान की छाया में विलीन हो जाने पर वे तरुण वंदियादेवन की एक फुसफुसाहट तक नहीं खोज पाएँगे।
ठंडे, खुरदरे पत्थर से टेक लगाकर वह नीचे की ओर सरक गया, जब तक कि आराम से ज़मीन पर बैठ नहीं गया। दिन भर इधर-उधर दौड़ने की कठिन कसरत, उस पर यौवन की स्वाभाविक थकान—दोनों ने मिलकर शीघ्र ही उसकी पलकें भारी कर दीं। पास के पेड़ों की डालियों पर एक कोमल पश्चिमी हवा ने झूला झुलाया। पत्ते सरसराकर एक-दूसरे से रगड़ खाने लगे, और नरम ‘सर्र-सर्र’ ध्वनि की एक लोरी-सी फुसफुसाकर गाने लगे, जिसने उसके भागते हुए विचारों को शांत कर दिया। कुछ ही मिनटों में वंदियादेवन गहरी नींद में डूब गया।
अंततः जब उसकी नींद खुली, तो चंद्रमा क्षितिज को पार कर पूर्वी आकाश पर अविचल रूप से चढ़ रहा था। फीकी रुपहली रोशनी पेड़ों की शाखाओं के बीच से छनकर ज़मीन पर चित्तियाँ बना रही थी, और वंदियादेवन अपने आस-पास का थोड़ा-बहुत अनुमान लगा पा रहा था। उसने आँखें मलीं, दिन की उन अव्यवस्थित घटनाओं को याद किया, और सच कहें तो चकित ही हुआ—कि ऐसी परिस्थिति में भी वह इतनी निश्चिंतता से सो सका!
लेकिन उससे भी अधिक चकित उसे अपनी नींद टूटने के कारण ने किया। ठीक किस चीज़ ने उसे जगा दिया था? क्या किसी का स्वर था? वह मनुष्य का था, या किसी बेचैन पशु का? क्या कोई निशाचर पक्षी अपने साथी को पुकार रहा था? वह शपथ लेकर कह सकता था कि उसने एक स्वर सुना है।
गरदन मोड़कर वंदियादेवन ने कटी-फटी चाँदनी में झाँकते हुए अपने सिर के ऊपर उठी हुई दीवार की ऊँचाई का अनुमान लगाने का प्रयास किया। वह दुर्ग की मुख्य प्राचीर जितनी ऊँची प्रतीत नहीं हो रही थी; वे तो सामान्यतः विशाल, भयभीत कर देने वाली होती हैं। तो क्या किसी बड़ी दीवार के भीतर एक छोटी दीवार है? या यह केवल किसी धनी अभिजात के बाग़ की सीमा है?
ऊपर की ओर देखते ही वंदियादेवन उठ खड़ा हुआ—और अचानक उसका हृदय ज़ोर से धक से कर उठा। पेट में जैसे गाँठ पड़ गई हो और वह स्थायी रूप से गले में आकर अटक गई हो। एक संक्षिप्त, भयंकर क्षण के लिए वह साँस भी नहीं ले पाया।
वह रहा, दीवार के ठीक ऊपर एक डाल पर बैठा है—ईश्वर के नाम पर, वह क्या है? बेताल (वृक्षों पर वास करने वाले प्रेत और पिशाच) के बारे में बचपन में सुनी हर रोंगटे खड़ी कर देने वाली कहानी एक ठंडी लहर की तरह उसके मन में लौट आई। लेकिन—क्या भूत मनुष्य के कंठ से बात करते हैं? वह भी एक युवती के कंठ से? यदि यह प्रेतात्मा है भी, तो आश्चर्यजनक रूप से वाचाल प्रेतात्मा है। वंदियादेवन ने निश्चय किया कि किसी अनुचित निर्णय पर पहुँचने से पहले वह ध्यान से सुनेगा।
"क्या हुआ, अय्या?" स्वर आया, स्वच्छ और स्पष्ट। "दीवार से टेक लगाकर सो ही गए क्या? तुम्हें और कितनी बार पुकारना पड़ेगा, भला?"
अहा—यह कोई भटकता हुआ वृक्ष-पिशाच नहीं है। यह रक्त-मांस की एक युवती है, जो शांति से एक डाल पर बैठी है। क्या यह सब कोई मिथ्या स्वप्न है? वास्तविक जीवन में निश्चय ही ऐसा नहीं होता!
"क्या हास्यास्पद बात है—!" छाया के भीतर से वह लड़की बड़बड़ाई। "तुम अभी भी आधे सोए हुए लग रहे हो। लो, मैं एक सीढ़ी नीचे उतार रही हूँ। सावधानी से ऊपर आना, समझे? कहीं पैर फिसलने से गरदन न तुड़वा लेना।"
एक और हल्की सरसराहट की ध्वनि के साथ उसने अपने पास से एक पतला बाँस का यंत्र खींचा, दीवार के ऊपर से उतारा और धीरे से पत्थर के सहारे टिका दिया।
इनमें से किसी भी बात का वंदियादेवन के लिए कोई अर्थ नहीं निकल रहा था। लेकिन ईश्वर-प्रदत्त अवसर—जो लगभग उसकी गोद में ही आ गिरा था—ऐसे दुर्लभ अवसर से उसने भला कब मुँह मोड़ा है? जो होना होगा, होगा, और भाग्य उसकी ओर जो भी फेंके, उसका सामना करने के लिए वह पूरी तरह तैयार था। अभी तो सीढ़ी चढ़ना ही मुख्य कार्य है। और उसके बाद जो आएगा—दीवार के शीर्ष पर पहुँचकर उसी का सामना करेगा।
लगभग तीन-चौथाई चढ़ जाने पर युवती फिर बोल उठी, उसके स्वर में कुछ अधीरता का स्पर्श था।
"तुम्हारे जैसा विलंब करते मैंने और किसी को नहीं देखा। उधर इऴैया रानी तुम्हारी अंतहीन प्रतीक्षा कर रही हैं, और तुम यहाँ प्रासाद की दीवार से टेक लगाकर खर्राटे भर रहे हो!"
इस झटके से वंदियादेवन लगभग सीढ़ी से गिर ही पड़ा था। सौभाग्य से, बिल्कुल अंतिम क्षण में उसकी उँगलियों ने टटोलकर एक उभरे हुए पत्थर को पकड़ लिया। इऴैया रानी! इसका मतलब निश्चय ही—यह भव्य प्रासाद पऴुवूर की छोटी रानी के सिवा और किसका हो सकता है? लेकिन ईश्वर के नाम पर, उस युवती को कैसे पता चला कि वह, वंदियादेवन, उनके बाग़ की दीवार के नीचे दुबका बैठा है? ऐसी चीज़ें देखने के लिए उनके पास निश्चय ही कोई अद्भुत काला जादू है! उन्हें देखकर तो लगता है कि वे उससे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं, है न? या फिर—और यह एक सिहरन पैदा करने वाला विचार था—वह अभी-अभी किसी और के लिए उतारी गई सीढ़ी पर चढ़ आया है?
इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। वंदियादेवन ने एक क़दम आगे बढ़ा दिया था, लौटने का कोई मार्ग नहीं था। वह इस विचित्र मामले के अंत तक देखकर ही छोड़ेगा, और वह अंत अब बहुत दूर नहीं था। दीवार के शिखर पर पहुँचते ही युवती ने एक छोटा, मज़बूत हाथ बढ़ाकर उसे ऊपर खींच लिया।
उज्ज्वल चाँदनी पूरी तरह उसके मुख पर आ पड़ी। लेकिन अब तक वंदियादेवन की चकित होने की क्षमता ही समाप्त हो चुकी थी। अन्यथा, यह समझने के बाद कि पेड़ पर बैठी यह लड़की कोई और नहीं, बल्कि कुछ घंटे पहले वेऌअक्कार के प्रहरियों द्वारा पीछा की गई वही सुंदर छोटी दही-विक्रेता है—वह दीवार पर अपना संतुलन कैसे बनाए रख पाता? सच तो यह है कि ऐसे दिन के बाद अब कोई भी चीज़—चाहे वह कितनी भी विचित्र या असंभव क्यों न हो—उसे और चकित नहीं कर सकती थी।
"अब आओ," उसने तीखे स्वर में फुसफुसाया। "क्या उसी दीवार पर दुबके बैठे हमेशा घूरते रहोगे? सीढ़ी ऊपर खींचो और जल्दी नीचे उतरो!"
और गिलहरी की-सी फुर्ती से वह युवती पेड़ के तने के सहारे दूसरी ओर उतर गई। वंदियादेवन ने एक आज्ञाकारी बालक की तरह उसकी बात मानी। उसने अनुभव किया कि उसके पैर नरम घास पर आ टिके हैं। ऐसा लगा जैसे वह एक विस्तृत, सुसज्जित बाग़ में उतर आया है। दूर, वृक्षों के ऊपर सिर उठाए एक भव्य प्रासाद के सुंदर गोपुरम्, घुमावदार कंगूरे और ऊँचे शिखर—मोतियों जैसी चाँदनी में झिलमिला रहे थे, मानो किसी परिकथा के लोक से उभर आए हों।
यह किसका बाग़ीचा है, यह विनम्रतापूर्वक पूछने के इरादे से उसने गला साफ़ किया, लेकिन युवती के एक ज़ोरदार "चुप!" के साथ उसे तुरंत रुकना पड़ा। होंठों पर एक उँगली दबाकर उसने उसकी ओर एक चेतावनी-भरी तीखी दृष्टि डाली, फिर मुड़कर चुपचाप छाया के भीतर चलने लगी।
वंदियादेवन ने एक गहरी साँस ली, मन-ही-मन मुस्कुराया, और चुपचाप उसके पीछे हो लिया।
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