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पोन्नियिन सेल्वन Matribhasa Hindi · अड़तीसवाँ अध्याय — छलनामयी नंदिनी
A historical fiction-themed illustration for पोन्नियिन सेल्वन

अड़तीसवाँ अध्याय — छलनामयी नंदिनी

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आधी रात ढले सदियाँ बीत चुकी थीं, और निशा चुपके-चुपके तीसरे पहर की ओर सरक रही थी। तब जाकर बड़े पऴुवेत्तरायर ने अंततः अपने प्रासाद की राह पकड़ी। सूनी राहों पर पच्छिम की बेचैन हवा साँय-साँय कर रही थी, महीन धूल उड़ाकर नन्हे-नन्हे बगूले बना रही थी। किंतु उस वृद्ध योद्धा के इस्पात-कठोर वक्ष के भीतर जो आँधी उठी थी, उसका प्रकोप कहीं अधिक उन्मत्त था। वह आँधी राह की धूल-गर्द से कहीं अधिक अंधियारी और भयावह चीज़ों को उड़ा रही थी।

आह, अभी-अभी अपने प्यारे भाई से क्या-कुछ नहीं कह आए थे! अब मन भारी हो रहा था, अफ़सोस हो रहा था—इतना निष्ठुर न होते तो अच्छा था। छोटा भाई उन्हें गहरी श्रद्धा की दृष्टि से देखता है, इसमें कोई संदेह नहीं। छोटों की शिकायतें अन्यायपूर्ण भले ही हों, पर उनका जन्म तो उनके प्रति गहरी चिंता और प्रेम से ही हुआ था। फिर भी, वह व्यक्ति भयानक शक्की था। क्यों उसने ईश्वर की दुहाई देकर नंदिनी के सिर इतने जंगली आरोप मढ़ दिए! उन्होंने सोचा, यह तो मनुष्य के स्वभाव का एक जाना-पहचाना जाल है—पहले ख़ुद एक बड़ी भूल कर बैठो, फिर किसी और को बलि का बकरा बनाकर अपनी जान बचाने की कोशिश करो। दुर्बल, रीढ़हीन कायर ही ऐसे छल खोजते हैं। किंतु कालान्तकन जैसा वीर भला उस दीन-हीन फंदे में क्यों पाँव देगा? और यह सब हुआ भी ठीक उस बदमाश छोकरे को मुट्ठी से फिसल जाने देने के तुरंत बाद!

अपनी चूक छिपाने के लिए अपनी ही भ्रातृवधू की ओर उँगली उठाना! एक मनुष्य के साहस और सत्यनिष्ठा के लिए यह भला कैसे कीर्ति ला सकता है, वृद्ध किसी भी तरह समझ नहीं पा रहे थे। ऐसा काम कौन करता है! ख़ैर, उसने अनुचित बातों के लिए कम-से-कम क्षमा तो माँगी। उन दुःखद बातों पर अब और सिर खपाने से कोई लाभ नहीं।

और फिर भी... क्या भाई की बातों में सत्य का एक कण भी नहीं था? इस पकी उम्र में आकर क्या वह एक सुंदर युवती के हाथों ख़ुद को मूर्ख बना बैठे हैं? कुछ ही देर पहले तो उन्होंने ऐसे व्यक्ति को खरी-खोटी सुनाई थी, जो सैकड़ों रक्तरंजित युद्धों में कंधे-से-कंधा मिलाकर उनके साथ लड़ा था। जीवन-भर जो भाई एक-साथ मृत्यु का सामना करता रहा, उसे झिड़क दिया—और यह सब एक जंगल से उठाकर लाई गई लड़की का पक्ष लेने के लिए! क्या वह सचमुच इतनी अटूट निष्ठा के योग्य है? सोचते-सोचते उन्हें याद आया कि लड़की के मूल के बारे में तो वह कुछ भी नहीं जानते। रात के निष्ठुर सत्य के प्रकाश में यह स्वीकार करना ही होगा—उसकी बातचीत, उसकी चाल-ढाल कभी-कभी बड़ी विचित्र लगती है।

छिः, उन्होंने ख़ुद को धिक्कारा। छोटे भाई की वे बेपरवाह बातें उन्हें इस तरह कैसे हिला सकती हैं! नंदिनी के इरादों पर संदेह करना घोर अन्याय है। उसके हर कार्य में तो गहरा, अविचल प्रेम झलकता है। बस एक बार देखने की देर है—कितनी मीठी, कितनी कोमल है उसकी वाणी, कितनी परम श्रद्धा से वह उनकी सेवा करती है! और यदि पत्नी के कर्तव्यों की बात करो—तो क्या पति के राज-काज में उनकी नंदिनी जैसी रुचि रखने वाली कोई पत्नी कभी देखी गई है? वह तो स्वयं कष्ट उठाकर सोच-विचार कर परामर्श देती है, अपनी राय रखती है, हर प्रकार से उनकी सहायता करती है!

ये सब तो छोटी बातें हैं—साठ पार के एक जर्जर बूढ़े से विवाह करने के लिए उसे कितना प्रेम करना पड़ता होगा! स्वर्ग के देवराज देवेंद्र स्वयं ऐसी रूपसी का पाणिग्रहण करने के लिए टूट पड़ते; जिसका लावण्य स्वर्ग की नर्तकियों के हृदय में भी तीव्र ईर्ष्या जगा दे। और इस मर्त्यलोक के राजाओं की तो बात ही छोड़ दो—ऐसी अतुलनीय रूप की स्वामिनी एक रमणी से विवाह करने के सौभाग्य से भला कौन पीछे हटता? स्वयं सम्राट सुंदर चोल अपनी इस क्षीण दृष्टि से उसे एक बार देख लेते तो दूसरी बार सोचते नहीं! और वह हैं कि उस पर संदेह कर रहे हैं। कितना अविश्वसनीय अन्याय!

पुरानी कहानियाँ तो उन्होंने भी सुनी हैं—बुढ़ापे में जिनकी कच्ची उम्र की पत्नियाँ होती हैं, वे जीवन-भर पत्नी के सतीत्व पर व्यर्थ संदेह करके अपने ही बनाए नरक में दिन काटते हैं। ऐसी कितनी ही घटनाओं को सुनकर उन्होंने स्वयं खिलखिलाकर हँसी उड़ाई थी। और आज उसी भयंकर जाल में वह स्वयं फँस गए हैं, मन-ही-मन ख़ुद को ही हँसी का पात्र बना रहे हैं।

फिर भी, चलते-चलते उन्होंने सोचा, कुछ विषयों पर नरमी से पूछने में हानि ही क्या है? उसके कुछ कार्य ऐसे हैं, जिनके विषय में ज़रा हौले से पड़ताल की ही जा सकती है। वह अक्सर उनसे उनकी राजमोहर-अँगूठी माँगा करती है; किसलिए? उस सीलन-भरे, ईश्वर-परित्यक्त लतामंडप में वह इतना समय क्यों बिताती है? और वह रहस्यमय जादू-टोना जानने वाला व्यक्ति कौन है, जो विभिन्न असमय में उससे मिलने आता है—जिन मुलाक़ातों की बात उसने स्वयं अकपटे स्वीकार की है? ओझा की सेवा की उसे आवश्यकता क्यों पड़ती है? ऐसी काली करतूतें करके वह किसका मन जीतना चाहती है?

इन सबके अतिरिक्त एक और प्रश्न भी था—शायद सबसे ज्वलंत प्रश्न: और कितने दिन वह उन्हें अपने पास से दूर रखेगी? विवाह का वास्तविक सुख जिसने आज तक नहीं चखा, ऐसे एक अकृतदार ब्रह्मचारी की तरह वह उन्हें कब तक जीवन बिताने को विवश करेगी? जब भी यह बात उठती, वह अचानक किसी-न-किसी उपवास या पवित्र व्रत की बात निकाल लेती, जो उनके मिलन में बाधा डालता—किंतु एक बार भी उसने खोलकर नहीं बताया कि इस पूजा में ठीक करना क्या होता है! सच कहें तो, यह बात उन धूर्त स्त्रियों की चालाकी जैसी लगती है, जो पति का पास आना सहन नहीं कर पातीं।

ख़ैर, अब और नहीं, उन्होंने मन-ही-मन निश्चय किया। बहुत हुआ, उसकी सनकों के आगे बहुत झुक चुके। आज रात इन सब बातों पर, और जो कुछ भी है, सब पर चर्चा करके अंतिम निर्णय कर लेना होगा—चाहे जो भी हो!

प्रासाद के फाटक पर पहुँचते ही बड़े पऴुवेत्तरायर का उनके घनिष्ठ सहचरों, सेवकों और दासियों ने गर्मजोशी से स्वागत किया। किंतु इधर-उधर आँखें घुमाकर जिसे सबसे अधिक देखना चाहा, वही एक अनुपस्थित थी—उनकी तरुणी रानी, इलैया रानी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि रानी माँ अभी भी बाहर उसी लतामंडप में हैं।

आधी रात ढल जाने पर भी वह वहाँ कौन-सा स्वर्ग-मर्त्य एक कर रही हैं? मन के भीतर क्रोध की एक छोटी-सी चिंगारी जल उठी। क्या उनकी विश्वासपात्र पत्नी उन्हें मूर्ख बना रही है? क्या इस हठीली लड़की ने उन्हें अनदेखा करने का कोई नया बहाना ढूँढ़ निकाला है?

बड़े पऴुवेत्तरायर उद्यान-वीथिका की ओर भागे। स्वामी-प्रभु को क्रोधित करने के इस स्पष्ट प्रयास से वह काफ़ी खीझ उठे थे। दोनों प्रासादों को जोड़ने वाले पाषाण-गलियारे में वह ठीक उसी क्षण पहुँचे, जब नंदिनी एक दासी के साथ लौट रही थी। उन्हें देखते ही वह ठिठक गई, पर बजाय उनकी ओर देखने के, वह स्थिर दृष्टि से बाग़ की ओर ताकती रही—निश्चित रूप से किसी बहुत मनोरंजक वस्तु की ओर—वह बाग़ उस समय स्याही-सा घोर अंधकार में डूबा था।

दासी ने बुद्धिमानी से थोड़ी दूर जाकर प्रतीक्षा की। पऴुवेत्तरायर तरुणी रानी के पास आए। उसने तब भी अपनी सुंदर आँखें उस अंधकारमय, सरसराते पत्तों वाले झुरमुट की ओर खोल रखी थीं—मानो उसे उनके आने का आभास तक न हुआ हो। उसने उनकी उपस्थिति को स्वीकार नहीं किया, न ही यथोचित सम्मान में उनका स्वागत करने के लिए झुकी। और इसी से सारा खेल पलट गया—पऴुवूर के महान अधिपति, जो अपनी पत्नी पर एक उग्र व्याख्यान झाड़ने आए थे, अब उल्टे उसे ही मनाने की अटपटी स्थिति में पड़ गए।

"नंदिनी, मेरी प्राणाधिका, तुम तो खिन्न लग रही हो," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरी ओर क्यों नहीं देख रही हो, मेरा प्यार?"

और उन्होंने अपना वह भारी, युद्ध-चिह्नों से भरा हाथ—जो सामान्यतः वज्र-सा कठोर, अटल रहता था—बड़े धीरे से उसके पतले कंधे पर रख दिया।

उनकी पत्नी ने उस लौह-समान भुजा को दबोचकर एक झटके में कंधे से हटा दिया। वृद्ध योद्धा क्षण-भर के लिए हतप्रभ रह गए। उनके बाग़ के चमेली-पुष्प-सी कोमल, इतनी नरम हथेली में इतनी चौंका देने वाली शक्ति कहाँ से आई?

"तुमने अपनी कोमल हथेली से मुझे धकेल दिया!" उन्होंने कहा, तत्काल मुग्ध होकर। "जीवन मुझे इससे अधिक आशीर्वाद और नहीं दे सकता, मेरी हृदयेश्वरी। उत्तर में विंध्य पर्वत से लेकर दक्षिण समुद्र के तिरुकोनमलै तक कोई योद्धा जो सोचने का साहस नहीं कर सकता, वह तुमने अनायास कर दिखाया। अरी, यही तो मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है। किंतु तुमने अपने इस आकस्मिक क्रोध का कारण अभी तक नहीं बताया। मुझसे बात नहीं करोगी?" उस महान, ऊँचे योद्धा, हज़ारों रक्तरंजित युद्धक्षेत्रों के अनुभवी सैनिक ने विनती की। "मेरे ये अभागे बूढ़े कान तुम्हारे रेशम-से कोमल स्वर के लिए प्यासे हैं, जो जंगली मधु से भी मीठा है, मेरा प्राण।"

"तुम्हें गए कितने दिन हो गए?" नंदिनी ने पूछा, अब भी उनकी ओर न देखते हुए। "चार। पूरे चार दिन तुमने मुझे अकेला छोड़ रखा था!"

उसके सुरीले गले में रुलाई का हल्का-सा आभास था—और बड़े पऴुवेत्तरायर, जिन्होंने सौ धधकती तलवारों और उड़ते भालों के सामने पलक नहीं झपकाई थी, उन्हें लगा कि उनका इस्पाती हृदय मोमबत्ती की लौ पर पिघलते मोम की तरह पिघल रहा है।

"और इसी से तुम इतनी उदास हो गईं, मेरा सोना?" उन्होंने नरम स्वर में पूछा। "मात्र चार दिन मेरी अनुपस्थिति सहन नहीं कर सकीं? किंतु यदि मुझे शीघ्र ही युद्ध पर जाना पड़ा? तब तो महीनों अलग रहना पड़ सकता है। तब क्या करोगी?"

"तुम सोचते हो मैं ऐसी पाषाण-हृदया हूँ, कि तुम युद्ध पर चले जाओगे और मैं महीनों तुमसे दूर पड़ी रहूँगी?" वह चीत्कार कर उठी। "कभी नहीं। मैं तो छाया की तरह तुम्हारे पीछे-पीछे वहाँ जाऊँगी।"

"यह तो बड़ी मज़ेदार बात है!" वह गर्मजोशी से हँस पड़े। "तुम्हें साथ लेकर मैं किस तरह का युद्ध कर पाऊँगा, सोचती हो? प्राणाधिका, इस चौड़े वक्ष ने वर्षों तक कितने ही भयानक आघात सहे हैं! मेरे इन दोनों कंधों पर इतने तीर और भाले खाए हैं कि गिनकर समाप्त नहीं किए जा सकते—चारण-कवि जब मेरी प्रशंसा में गीत रचते हैं, तो कहते हैं कि उन घावों की संख्या चौंसठ है। किंतु तुम... आह, यदि बाग़ का एक साधारण-सा काँटा भी तुम्हारी इस अनुपम कोमल त्वचा में चुभ गया, मेरा प्राण, तो मेरा यह बूढ़ा हृदय टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगा। हज़ारों युद्ध और शस्त्रों का जंगल जो इतने काल में न कर सका, एक काँटा उसे एक पल में कर देगा। भला तुम्हें युद्धक्षेत्र की कीचड़-धूल में कैसे ले जाऊँ?

"क्यों, इस ठंडे, कठोर पत्थर के फ़र्श पर तुम्हें इतनी देर खड़ा देखते हुए भी तो मुझसे सहा नहीं जा रहा! आओ, मेरी रानी, ज़रा आकर अपने उस सुंदर, फूलों से भरे पलंग पर लेटो, ताकि बैठकर मैं तुम्हारे उस अनुपम मुख को निहार सकूँ। यह मत सोचना, सुंदरी, कि इन चार दिनों में केवल तुम्हारा ही मन दुःखी हुआ है। मैं भी पीड़ित हुआ हूँ; तुम्हारी अनुपस्थिति का प्रत्येक क्षण मेरे लिए एक-एक युग था। किंतु अब—आह, अब तो मैं तुम्हारी उस दिव्य आभा को तब तक देख सकूँगा, जब तक यह भयानक आतुरता मिट न जाए!"

और उन्होंने उसके कोमल हाथ अपने रूखे हाथों में जकड़ लिए और धीरे-धीरे उसे कक्ष के भीतर, उस भव्य पलंग की ओर ले चले।

नंदिनी ने आँसू पोंछकर उनकी ओर आँखें उठाईं। पीतल के दीपक का कोमल, काँपता हुआ प्रकाश उसके सुंदर मुख पर पड़ा, उसका सुनहरा वर्ण गर्मजोशी से निखर उठा—और मुख पर जो मोहिनी मुस्कान धीरे-धीरे खिल रही थी, उसे भी आलोकित कर दिया।

चोल साम्राज्य के धनाधिकारी उसकी ओर ताकते रहे, कोमल प्रवाल-से होंठों के बीच से झाँकते छोटे-छोटे मोतियों-जैसे दाँतों को देखकर सर्वथा विभोर। आह, उन्होंने स्नेह में विह्वल होकर सोचा, यदि तीनों भुवन मेरी मुट्ठी में होते, तो इस अनुपम मुख की एक झलक के लिए मैं सब कुछ न्योछावर कर देता। वह ऐश्वर्य मेरे पास नहीं, इसलिए अपना शरीर, अपनी आत्मा, और समस्त सांसारिक संपत्ति उसके उन कोमल चरणों में रखने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं। और फिर भी, उन्हें आश्चर्य हुआ, यह स्वर्गीय सुंदरी उनसे कुछ भी तो नहीं माँगती!

उसके सुंदर रूप का जी-भरकर पान करते हुए ऐसे ही विह्वल, भक्तिपूर्ण विचार उनके मन में खेल रहे थे। कहाँ गए सारे पिछले संकल्प—उसे डाँटने-डपटने, कड़े स्पष्टीकरण माँगने, या गृहस्थी के उचित आचरण पर ज्ञान देने के! सब कुछ वह एकदम भूल गए। अब वह उसके चरणों में लोट जाने को राज़ी थे, छोटे-से-छोटा आदेश भी पूरा करने को तैयार थे। दासता को सामान्यतः हीन ही माना जाता है—किंतु एक सच्ची सुंदरी के प्रति मूर्खतापूर्ण, स्वैच्छिक आत्मसमर्पण जैसा और कुछ भी शायद मनुष्य को उसकी गरिमा और विवेक से इस तरह नग्न नहीं कर सकता।

"आप चार दिन मुझसे दूर थे—फिर भी घर तुरंत क्यों नहीं लौटे?" नंदिनी तीखे स्वर में बोल उठी, उसका मुख अचानक बनावटी मान से दमक उठा, और काली आँखों से केवल शरारत की बिजली-सी कौंध गई। "आपके भाई ही आपके लिए अधिक महत्त्वपूर्ण थे, है न?"

"ऐसी बात नहीं, मेरा सोना। मैं तो तुम्हारे पास आना चाहता था, तीर की तरह सीधा और सच्चा। किंतु उस छोकरे राजकुमार मधुरान्तकन, उस मूर्ख लड़के ने रोक लिया। मुझे यह सुनिश्चित करना पड़ा कि वह किसी की आँखों में पड़े बिना गुप्त सुरंग-मार्ग से सुरक्षित घर लौट गया है। केवल इसी कारण भाई के प्रासाद में इतनी देर हुई।"

"आपकी समस्त शक्तियों के प्रति मेरा असीम आदर है, अय्या," वह कोमल स्वर में बोली। "आपके सभी राजनीतिक कार्यों में मेरी गहरी रुचि है—सच कहूँ तो, उनमें से किसी एक के साथ जुड़ पाना भी मैं असीम सौभाग्य मानती हूँ। आपके प्रत्येक महान उद्यम में विजय देखने के सिवा मेरी और कोई चाह नहीं। और फिर भी, एक बात सोचे बिना नहीं रह पाती—मेरी बंद पालकी में छिपकर एक और पुरुष ने यात्रा की है, और राह का हर स्त्री-पुरुष-बालक सोच रहा है कि मैं आपके साथ का केवल एक हिस्सा हूँ, जहाँ भी आप जाते हैं, साथ चलती हूँ।"

"क्या तुम सोचती हो कि ऐसी स्थिति का मैं स्वयं स्वागत करता हूँ? कदापि नहीं!" उन्होंने आश्वस्त किया। "और फिर भी, हम एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, ख़तरनाक कार्य में लगे हैं। अंततः इसकी सफलता के लिए मुझे अनेक असुविधाएँ सहनी होंगी। इसके अतिरिक्त, मेरा प्यार, तुम निश्चय ही यह नहीं भूली होगी कि मधुरान्तकन को अपनी ही पालकी में ले जाना पहले तुम्हारा ही विचार था? और कोई देख न पाए, इसलिए क़िले में उसके आने-जाने के गुप्त सुरंग-मार्ग की बात भी तो तुम्ही ने कही थी?"

"कही थी," एक छोटी-सी दीर्घश्बास भरकर उसने स्वीकार किया। "और ऐसा करके मुझे तो लगता है, मैंने केवल अपना सामान्य कर्तव्य ही निभाया था। सब प्रकार से पति की सहायता करना ही तो एक अच्छी पत्नी का पवित्र कर्तव्य है, है न? ठीक है, यह छोटी-सी युक्ति मैंने ही निकाली थी—किंतु जब सोचती हूँ कि यह आपके विरुद्ध जाकर क्या हानि कर सकती थी..."

"किंतु तुमने तो केवल इतना ही नहीं किया, है न, मेरा सोना?" वह हँसे, उसके पास आराम से बैठते हुए। "मुझे वह पहले वाला मधुरान्तकन ख़ूब याद है—वह भोला-भाला लड़का, शरीर पर विभूति मले और हाथ में रुद्राक्ष की माला लिए घंटों चुपचाप 'ॐ नमः शिवाय' जपता रहता था। एक नदी-तट के मंदिर से दूसरे नदी-तट के मंदिर तक अंतहीन धूल-भरी तीर्थयात्राएँ करता था—अपनी समान-भक्तिमती माँ का एकदम आदर्श पुत्र! याद है, एक दिन उसे चोल सिंहासन पर दावा करने के लिए राज़ी करने को हमने कितने ही यत्न किए, सब व्यर्थ गए। वह सुनने को ही तैयार नहीं था। किंतु तुम—तुमने उससे मात्र दो बार बात की, और उसने पलक झपकते ही अपना मत बदल दिया! उसे देखकर विश्वास न हो, पर लड़का अब एक विशाल साम्राज्य के स्वप्न देखता है, जो उत्तर में इमयम् पर्वत से लेकर दक्षिण में इलंकै के अंतिम छोर तक विस्तृत हो; स्वर्ग की ऊँचाइयों से लेकर पृथ्वी के एकदम किनारे तक! हमारी योजना के सफल होने तक उससे अब धैर्य नहीं रखा जा रहा; मुझे तो लगता है वह इसी क्षण स्वर्ण-सिंहासन पर चढ़ बैठना चाहता है!"

बड़े पऴुवेत्तरायर रुके, आँखों में एक खिलंदड़ी चमक थी। "सच कहता हूँ, तुमने उस पर क्या जादू कर दिया है, यह मैं नहीं जानता, मेरा प्राण। और जब यह बात उठी ही है... तुम्हारे अपने ही आँचल के नीचे तो न जाने कितनी जादुई युक्तियाँ छिपी लगती हैं; फिर तुम्हें एक और जादू-टोना जानने वाले की सेवा की क्या आवश्यकता है? लोग तो कानाफूसी करते हैं, समझीं..."

"—और उनकी उन बेलगाम जिह्वाओं को काट देना ही तो पति के रूप में आपका दिव्य कर्तव्य है," उसने झट से उत्तर दिया। "ओझा से परामर्श का कारण मैं आपको पहले ही बता चुकी हूँ। यदि कार्यों की भीड़ में आप भूल गए हों, तो एक बार फिर याद दिला दूँ: पऴैयारै की उस तुच्छ नागिन को सबक़ सिखाना ही होगा। आप तो पुरुष हैं, मेरे स्वामी। आप खुले युद्ध में जाते हैं, सम्माननीय योद्धा की तरह अपने मतभेद सुलझाते हैं। 'स्त्री—कितना दुर्बल, असहाय जीव है!'—यही तो आप पुरुष सदा सोचते हैं। हममें से किसी एक के विरुद्ध युद्ध करना आपके गर्वित मन के लिए परम अपमान है। तथापि, मेरे राजा, छाया में रहकर काम करने वाली एक अकेली स्त्री सौ सशस्त्र पुरुषों से भी अधिक भयंकर सर्वनाश कर सकती है।

"नागिन अपनी जात पहचानती है। आप उसका असली रूप कुछ नहीं जानते, किंतु मैं कुंदवै के शैतानी, कुटिल मन को अपने मन की ही भाँति पहचानती हूँ। आह, क्या धृष्टता थी उस डायन की, जो आपको और मुझे ऐसे खुलेआम अपमानित कर गई! यह सब शायद आपके महानुभाव, क्षमाशील मन से अनायास मिट गया होगा, मेरे स्वामी, किंतु मेरे मन से नहीं गया। कभी नहीं, कभी नहीं भूलूँगी उसके वे निष्ठुर, विषैले शब्द, जो उसने मुझसे उस दिन कहे थे, प्रासाद के प्रांगण में सौ बकबक करती लड़कियों के ठीक बीच में: 'समझ नहीं आता कि तुम उस जर्जर बूढ़े से ब्याह करने क्यों चली गईं!' वह हँसी थी। 'बुढ़ापे में उसकी तो शायद मति मारी गई है, पर तुम्हारी बुद्धि को क्या हुआ, सुनूँ तो? तुम्हारी अक़्ल कहाँ भीख माँगने गई थी?' आह, ऐसे हिंसक ताने मैं कैसे भूल जाऊँ?"

"'स्वर्ग से उतरी किसी अप्सरा की भाँति तुम हमारी आँखें चौंधिया देती हो,' उस महान राजकुमारी कुंदवै ने कहा था। 'कोई भी युवा राजकुमार तुम्हारा पाणिग्रहण कर तुम्हें रानी बना पाता तो स्वयं को धन्य समझता। फिर भी तुमने एक बूढ़े, अनाड़ी भैंसे को पति के रूप में क्यों चुना, हतभागिनी, मूर्ख लड़की?' मेरे स्वामी—वे कुत्सित शब्द मैं कभी नहीं भूलूँगी। अपनी अंतिम साँस तक नहीं!"

और यह कहकर नंदिनी करुण स्वर में फफक-फफककर रोने लगी, इस दम-घोंटू, भावुक वर्णन के बाद जैसे लगभग आत्मविस्मृत हो गई हो। गर्म, भारी आँसू उसके सुंदर कपोलों से ढुलक पड़े, और अचानक आई बाढ़ के पानी की तरह उतरकर उसके उद्वेलित वक्ष पर पड़े रेशमी वस्त्र को भिगो दिया।

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