बड़ी पिराट्टी सेम्बियन महादेवी के प्रासाद से राजकुमारी कुंदवै के राजभवन तक आऴ्वारक्काडियान का मार्ग पऴैयारै की टेढ़ी-मेढ़ी, धूप-छाँव से भरी गलियों से होकर गया था। भीड़ को धकियाकर आगे बढ़ते हुए जो कुछ उसकी आँखों के सामने आया, उससे उसका मन एक प्रशांत, भीनी-भीनी ऊष्मा से भर उठा। आज कान्नन की जन्म-तिथि थी—आहा, इस नगर के लोग कैसे अद्भुत उत्साह में मग्न थे! उन्होंने अपनी पूरी आत्मा इस उत्सव और पूजा में सौंप दी थी, और हवा जूही के फूलों और जलते कपूर की गंध से भारी हो रही थी। उसके मन में कोई संदेह नहीं था, लेशमात्र भी नहीं—वैष्णव धर्म, अर्थात् विष्णु की आराधना, चोल देश की धरती में गहरी जड़ें जमा चुका था, और यह दिन-प्रतिदिन और भी प्रबल ही होता जाएगा।
और शैव धर्म, अर्थात् शिव की आराधना—उसे यहाँ श्रेष्ठ आसन न मिलता तो आश्चर्य होता। गत सौ वर्षों से चोल राजाओं ने परम भक्ति से देश के कोने-कोने में विशाल शिव-मंदिरों का निर्माण करवाया था। उन मंदिरों के स्तंभों से घिरे मंडपों में तीन महासाधकों का सुन्दर तेवारम संगीत गाया जाता था—शिव को समर्पित प्राचीन तमिल भक्ति-गीत—और वह गान आस्था का अभियान बनकर जन-साधारण तक पहुँचता था। महासमारोह के साथ रथयात्राएँ होतीं, पथ पर हज़ारों लोग उतर आते। किंतु इतने आडम्बर के बाद भी तिरुमाल अथवा उनकी महिमा का मृत्यु-घंट नहीं बजा था। कान्नन—जिन्हें विष्णुमूर्ति का नवम एवं पूर्णतम अवतार कहा जाता है—लोगों की कल्पना पर पूरी तरह छाए हुए थे। उनके कितने ही काण्ड, उनकी दिव्य लीलाएँ, और उनका सम्पूर्ण जीवन जो मथुरा, गोकुल और वृन्दावन के ग्वाल-बालों की बस्तियों के मैदानों और घाटों पर बीता था—इन सबने उन्हें सदा के लिए लोगों के हृदय में बसा दिया था। यहाँ कितनी ही भागवत-मंडलियाँ थीं—भक्ति-गीत गाने वाले गायक-दल—कितने ही पथ-नाटक, कान्नन के जीवन को साकार करने में व्यस्त कितने ही कलाकार, अम्माम्मा! सबका वर्णन कर पाना ही असम्भव था। आऴ्वारक्काडियान जब पिछली बार इस सुन्दर नगर में आया था, तब से वे जैसे वर्षा की घास की भाँति उग आए थे। हर गली के मोड़ पर वे भीड़ जुटा रहे थे, वज्र-गर्जन जैसी तालियाँ और हर्ष-ध्वनियाँ बटोर रहे थे, और उत्सव की घनी हवा में थोड़ी और उन्मादना घोल रहे थे। और फिर भी, नगर के चारों ओर के धूल-भरे गाँवों से अभिनेताओं और गायकों का ताँता लगा ही हुआ था—उत्सुक दर्शकों की ऐसी ऊष्मा के आकर्षण में खिंचे चले आ रहे थे, जैसे दीपक की लौ पर दौड़ते चले आने वाले पतंगों के झुंड।
ऐसा ही एक पथ-नाटक का दल जैसे अभी-अभी पहुँचा था, और धूल पर अपने सीधे-सादे साजो-सामान को सजा रहा था। उनके छोटे-से दल में वसुदेव, देवकी, कृष्णन, बलराम और दुष्ट राजा कंसन थे। उनके गीत, उनके फुर्तीले छोटे-छोटे नृत्य, और उनके चातुर्य-भरे संवाद दूसरों से कहीं बेहतर प्रतीत हुए, और स्वाभाविक रूप से उन्होंने दर्शकों का एक बड़ा घेरा खींच लिया—जिसमें आऴ्वारक्काडियान भी शामिल था। कंसन और बालक कृष्णन तब एक तुमुल वाग्युद्ध में मत्त थे, और वह हृष्ट-पुष्ट वैष्णव अपनी लाठी पर टिककर खड़ा हो उस चमत्कार अभिनय को देखने लगा। कान्नन की भूमिका में एक अत्यन्त निष्ठावान बालक था; अपने निष्ठुर मामा के विरुद्ध वह जितने भी आरोप लगा रहा था, उन्हें ऐसी मन-मोहक तोतली बोली में उच्चारित कर रहा था।
“आओ, मेरे साथ युद्ध करो!” अंत में लड़का चीख उठा, नूपुर बँधा अपना छोटा-सा पैर पटककर।
कंसन ने यथोचित भयंकर क्रोध दिखाकर उत्तर दिया। “अरे, धूर्त, पाजी कहीं के कृष्ण!” वह गरज उठा, एक सचमुच प्रशंसनीय रोष प्रकट करते हुए; उसका गला भीड़ के ऊपर ग्रीष्म के वज्रनाद की भाँति गूँज उठा। “मेरे साथ वह छल-कपट चला रहा है, क्यों? हाः—एक भी नहीं चलेगा! मैं अभी तुझे मार डालूँगा, तुझे और तेरे उस प्यारे भाई बलराम को, और तेरे पिता वसुदेवन को भी। और वह देख, वहाँ खड़ा है एक वैष्णव, सारे शरीर पर चंदन-लेप से बने पवित्र नामम चिह्न—विष्णु-उपासक जो मस्तक पर पुण्य तिलक लगाते हैं? उसे भी मैं गला घोंटकर मार डालूँगा!”
दल को घेरे खड़ी भीड़ एक साथ हमारे आऴ्वारक्काडियान की ओर मुड़ी, और उनके बीच से हँसी की एक लहर दौड़ गई। कृष्णन और बलराम की भूमिका निभाने वाले दोनों अभिनेता भी कौतुक-भरी आँखों से उसकी ओर देखने लगे। दर्शकों में से कुछ लोग हटकर वैष्णव के मुँह के ठीक सामने आकर खीं-खीं कर हँसने लगे। “कें-कें-कें!”
इस खुलेआम व्यंग्य-विद्रूप से तिरुमालै के भीतर अचानक बिरक्तिर एक लहर उमड़ पड़ी। सबसे अधिक इच्छा तो इन हँसते हुए गधों पर अपनी मजबूत लकड़ी की लाठी चला देने और कुछ चुनिंदा घाव जड़ देने की हो रही थी—विशेषकर उस हास्यास्पद कंसन को। किंतु उस दुष्ट का सिर फोड़ने की चेष्टा से क्या लाभ? उसके विश्वस्त प्रहारों में से एक का भी लेशमात्र प्रभाव न होता। कंसन ने अपने खलनायक के वेश के अनुरूप एक विशाल, भारी-भरकम काठ का मुखौटा पहन रखा था, जिसमें एक विकट मूँछ और विभिन्न चटख रंगों में रँगे भयानक बाहर निकले दाँत थे। इसके अतिरिक्त, उत्सव के दिन यहाँ के भले लोगों पर लाठी चलाना उचित भी नहीं होता।
तिरुमालै ने सिर हिलाया, एक छोटी-सी गहरी साँस ली, और अनिच्छा से भीड़ के किनारे से हट आया। किंतु वह जो व्यक्ति कंसन की भूमिका में था—उसने अपने संवादों को कैसे अदा किया था! यह दमदार आवाज़ उसने पहले भी सुनी है, इसमें आऴ्वारक्काडियान को लेशमात्र भी संदेह नहीं था। पर कहाँ? और यह गला था किसका?
धूप से तपी राह पर चलते-चलते, इन छोटी-छोटी पहेलियों पर विचार करते-करते आऴ्वारक्काडियान ने शीघ्र ही एक और बात पर ध्यान दिया: जिन लोगों के पास से वह गुज़र रहा था, उन मनुष्यों में एक क्रमशः फैलता, बेचैन करने वाला बदलाव। कुछ देर पहले का वह उत्साह जैसे उन्होंने अचानक खो दिया था। वे इतनी तेज़ी से तितर-बितर क्यों हो रहे थे? किस बात ने यह आकस्मिक कायापलट कर दिया था? गीत, नृत्य, वह सुमधुर संगीत—सब कुछ थम गया था। इसके बजाय, नगरवासी छोटे-छोटे झुंडों में एकत्र हो गए थे, और आपस में चुपके-चुपके कुछ फुसफुसा रहे थे। क्या थी उनकी गुप्त बातें? और फुसफुसाहट भरी चर्चा समाप्त होते ही वे इतनी जल्दी खिसक क्यों पड़ रहे थे? धड़ाम! धड़ाम! सचमुच, पूरे रास्ते पर भारी लकड़ी के दरवाज़े एक के बाद एक ऐसे धड़ाम-धड़ाम कर बंद क्यों हो रहे थे?
कारण कुछ ही क्षणों में स्पष्ट हो गया। एक परै बज उठी थी, उसकी तीखी, लयबद्ध ताल पर एक घोषणा तैर रही थी—एक गुप्तचर भाग निकला है। यही समाचार कुछ देर बाद स्वयं राजकुमारी कुंदवै को भी कंपा देगा। इस अप्रत्याशित और विषादपूर्ण घोषणा ने नगर की उज्ज्वल उत्सव-धड़कन को पलक झपकते ही बुझा दिया—जैसे किसी ने छोटी-सी आग पर एक बाल्टी पानी उँडेल दिया हो। लोगों के चेहरे सूख गए थे, म्लान पड़ गए थे। जो कोई अकेला राह चल रहा था, या जिसके साथ कोई जान-पहचान का दावा नहीं किया जा सकता था—ऐसे व्यक्ति को वे खुलेआम संदेह की दृष्टि से देख रहे थे। आऴ्वारक्काडियान स्वयं भी पथिकों की कई संशय-भरी दृष्टियों का शिकार हुआ; उसकी आँखों से आँखें मिलते ही वे झटपट हट जाते थे।
तिरुमालैयप्पन ने इस प्रतिक्रिया का कारण भली-भाँति भाँप लिया। मार्ग के किनारे जिन गुप्त झुंडों से वह टकराया था, उनकी चर्चा का विषय उसके कुशाग्र मस्तिष्क ने सहज ही जोड़ लिया। उसके सचेत कानों में पड़े कुछ बिखरे शब्दों ने उसके संदेह को और भी पक्का कर दिया। फुसफुसाहट में चल रही प्रत्येक बातचीत जैसे उन अभागे पऴुवेत्तरायर भाइयों और उनके बढ़ते हुए अत्याचारी शासन के इर्द-गिर्द ही घूम रही थी।
किंतु इस नगर के लोगों और निकटवर्ती ग्रामवासियों को ऐसा लगना स्वाभाविक ही था। वे पऴुवूर के प्रभु ही तो थे जो रुग्ण सम्राट सुंदर चोल को तंजावुर ले गए थे—जबकि यहाँ का यह पऴैयारै उनका प्रिय मूल राज-आसन था। और इसी सम्राट को महाकवियों ने काव्य में अमर कर दिया था: “…पऴैयारै नगर के सुंदर चोल के समकक्ष और कोई नहीं।” प्रभु की अनुपस्थिति में क्या पऴैयारै धीरे-धीरे अपनी ऊष्म दीप्ति नहीं खो रहा था?
लोग कानाफूसी कर रहे थे, यदि सुंदर चोल आज भी यहाँ होते तो यह नगर उत्सव में झिलमिलाता, हज़ार गुना अधिक उज्ज्वल होकर आँखें चौंधिया देता। जो पथ-नाटक के दल अब धूल में बैठकर साधारण लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं, वे अंततः राजप्रासाद के विशाल प्रांगण में एकत्र होते। चक्रवर्ती उन सभी का स्वागत करते, कितने ही गायकों, नर्तकों, पाणरों, अभिनेताओं और कवियों को उनकी योग्यता के अनुसार राजकीय पुरस्कारों से भर देते। आहा, तब तो ऐसा लगता, मानो सारा चोल देश इस नगर में अपनी प्रसन्नता का भाग लेने के लिए उमड़ पड़ा हो। प्रत्येक छोटी दुकान और पसरा ग्राहकों से उमड़ पड़ता, व्यापार सौ गुना होता। और उस रात जब देवता वेणुगोपाल स्वामी नंदिपुर विन्नगर मंदिर से अपनी दिव्य शोभायात्रा आरम्भ करते, तो मार्ग नृत्य, गान, तलवारबाज़ी और सिलम्बट्टम—उस प्राचीन लाठी-खेल की युद्ध-कला—से गूँज उठते। सब अब नष्ट हो गया है, वे बड़बड़ा रहे थे। पऴुवेत्तरायरों ने नष्ट कर दिया है।
क्षोभ यहीं नहीं थमा। पऴैयारै के सुनागरिकों के हृदय में एक और विशाल, पीड़ादायक ज्वाला धधक रही थी। राजपरिवार में जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय थे, वे प्रिय राजकुमार अरुलमोऴि वर्मन अब बहुत दूर इलंकै में एक निराशाजनक, रक्तरंजित युद्ध लड़ रहे थे। पऴैयारै के चार पडैविडु—सैनिक छावनियों—से दस हज़ार लोग उनके साथ समुद्र पार कर गए थे, घने वनों के संकट, भयंकर पशु, विश्वासघाती मौसम और दुर्गम पहाड़ों को सह रहे थे। वे तमिऴहम् के गौरव और शौर्य को अक्षुण्ण रखने, तमिल आत्म-सम्मान का ध्वज ऊँचा उठाए रखने के लिए कटिबद्ध थे। कोडुम्बालूर के साहसी तरुण वेलिर—एक अभिजात्य-सूचक उपाधि—स्वयं एक सैन्य-दल का नेतृत्व करते हुए इलंकै में कूच करके नहीं गए थे क्या, केवल छाती में एक निष्ठुर भाला लेकर रणक्षेत्र में मृत्यु का वरण करने के लिए? क्या उनके दल के शेष लोगों ने भी अंतिम साँस तक लड़कर सम्मानजनक मृत्यु नहीं पाई थी?
और यहाँ, तरुण राजकुमार अरुलमोऴि वर्मन अभी भी अपनी सेना का नेतृत्व कर रहे हैं, उन शोकाकुल आत्माओं को सांत्वना देना चाहते हैं, उनके सम्मानजनक आत्मत्याग को अक्षुण्ण रखने और व्याघ्र-ध्वज को ऊँचा फहराए रखने के लिए लड़ रहे हैं। उधर ये पऴुवेत्तरायर—अत्याचार के अभागे प्रतीक—उन्हें वह खाद्यान्न, वस्त्र, धन और अस्त्र-शस्त्र भेजने से ही जैसे इनकार कर रहे हैं, जो उनके लोगों के जीवित रहने का प्रश्न है! कैसा घोर अन्याय। ऐसी बात किसी ने कभी सुनी है? तो फिर तंजावुर के वे विशाल-विशाल अन्न-भंडार किसलिए हैं, जो चावल से लबालब भरे हैं? वे राजकोष ही किस काम के, जो सौ वर्षों की विजयों से अर्जित स्वर्ण से भरे पड़े हैं? धन और अन्न का क्या मूल्य, यदि चोल योद्धाओं को उनके सबसे अंधकारपूर्ण दुर्दिनों में वह सौंपा न जाए? पऴुवेत्तरायर निश्चय ही मरते समय उस सारी सम्पदा को गठरी में बाँधकर कंधे पर लाद यमलोक—मृत्यु के अधिपति के राज्य—तक ढोकर ले जाने का इरादा तो नहीं कर रहे?
चोल देश के लोगों के मुँह पर ऐसी ही कितनी कड़वी फुसफुसाहटें इन दिनों घूम रही थीं, और तिरुमालैयप्पन यह भली-भाँति जानता था। पऴैयारै के नागरिकों के पास तो स्वाभाविक रूप से सबसे अधिक कारण थे गहरे असंतोष के: नगर के दस हज़ार लोग भले ही इलंकै में युद्ध कर रहे हों, किंतु उनके चिंतित परिवार, उनकी स्त्रियाँ, उनके बच्चे तो अभी भी यहीं रह गए थे, है न? इसलिए, भागे हुए एक गुप्तचर की बात ढोल पीटकर अचानक घोषित की गई, और उसे पकड़ने का कड़ा आदेश भी उन बहु-प्रशंसित पऴुवेत्तरायर भाइयों के नाम से जारी हुआ। तथापि, नगरवासियों ने इन सब बातों को विशेष महत्व नहीं दिया, और देते भी क्यों। उलटे, वह परै उनके लिए अपने समस्त क्षोभ को उगलने का एक नया बहाना बन गया।
गुप्तचर, अच्छा—कई लोग छाया में खड़े होकर आपस में व्यंग्य कर रहे थे। जब महान व्याघ्र-ध्वज इतना ऊँचा फहरा रहा है, उत्तर में बड पेन्नै नदी से लेकर दक्षिण में कुमारी की सीमा तक अपना अप्रतिद्वंद्वी आधिपत्य घोषित कर रहा है—तब किस देश का इतना कलेजा है कि हमारे बीच गुप्तचर भेजे? कौन मूर्ख राजा चोल देश में चुपके से गुप्तचर घुसाने का साहस करेगा? नहीं, नहीं, यह तो बस पऴुवेत्तरायरों की एक और धूर्त, शैतानी चाल है। किसी को नापसंद करते ही वे उसे गुप्तचर का दाग लगा देते हैं और उसे बंदी बनाने का आदेश जारी कर देते हैं! सीधा खींचकर ले जाते हैं अपनी उस कुख्यात अँधेरी कालकोठरी में, इसमें और क्या संदेह। फिर भी, वृद्धजन सावधान कर रहे थे, ये सब हमारे मतलब की बातें नहीं हैं। ये शक्तिशाली लोग हैं, यहाँ जो चाहे करने का उन्हें अंतिम अधिकार है, चाहे वह न्यायपूर्ण हो या अन्यायपूर्ण। इसके अतिरिक्त, किसी को गुप्तचर ठहरा देने का अर्थ है कि कोई भी स्थानीय संस्था, यहाँ तक कि नगर की पंचायत—ग्राम-परिषद—के ज्ञानीजन भी उनसे प्रश्न करने का साहस नहीं कर पाएँगे, है न?
इस प्रकार पऴैयारै के भले लोग अपने परिचितों के बीच कानाफूसी कर रहे थे, दबी, चिंतित आवाज़ में राजकार्य पर चर्चा कर रहे थे। आऴ्वारक्काडियान ने अपने विश्वस्त कानों से जितनी भी छोटी-बड़ी ख़बरें बटोर सकता था, बटोरीं, और शेष को अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से पूरा कर लिया। ऐसा व्यापक असंतोष निश्चय ही अशुभ लक्षण है, उसने सोचा।
यह मामला अंततः सबके लिए कहाँ जाकर रुकेगा, यही सोचते-सोचते आऴ्वारक्काडियान ने देखा कि वह कब राजकुमारी कुंदवै के राजभवन पहुँच चुका है। चोल वंश की सुन्दरी राजकुमारी, इलैया पिराट्टी, संसार के विविध विषयों पर उसके साथ आलाप करने में सदा ही बड़ा आनंद पाती थीं। एक सिद्धहस्त परिव्राजक के रूप में उस वैष्णव की अच्छी-खासी ख्याति थी। जब वह दूर देशों के भ्रमण की रोमांचक कहानियाँ सुनाता, तो राजकुमारी एकदम मंत्रमुग्ध होकर सुनतीं, कितने ही प्रहर उनके आनंद में बीत जाते। कुछ नया या किसी नए के विषय में जानने की कुंदवै को बड़ी उत्सुकता रहती थी। और आऴ्वारक्काडियान बड़े परिश्रम से विभिन्न आऴ्वार पसुरम ढूँढ़कर कंठस्थ करता; उसके उस हृदयस्पर्शी पाठ का भी वह बहुत आनंद लेती थीं। इसलिए उसके लिए उनके द्वार सदैव खुले रहते थे। वह उसका और उसके परिवार का कुशल-क्षेम पूछना नहीं भूलती थीं, मुख प्रसन्न और विनोदपूर्ण रहता था।
आज अबश्य राजकुमारी का सुन्दर मुख और बात करने का ढंग बिल्कुल भिन्न लगा। कुंदवै के भावप्रवण मुख से ही पता चल रहा था कि उनका मन कहीं और उड़ रहा है। बात करते हुए आज वह विचित्र रूप से हकला रही थीं, और उसी से उनके भीतर की गहरी, छिपी हुई एक अस्थिरता पकड़ में आ रही थी। चिरकाल की उस शांत, संयत कुंदवै और आज की इस कुंदवै में कितना स्पष्ट अंतर था।
“क्या समाचार है, तिरुमालै? आशा है तुम कुशल से हो,” उन्होंने स्वागत किया, उनका गला खिंचा हुआ था। “तो—क्या ख़बर है? भेंट क्यों करना चाहते थे?”
“स्वीकार करता हूँ, कोई विशेष प्रयोजन है ऐसा तो नहीं लगता, थाये। क्षमा करें—किंतु सोचा था, रीति के अनुसार आप शायद संसार के विविध विषयों पर मेरे साथ आलाप करना चाहेंगी। कृपया अपराध क्षमा करें। मैं अब चलता हूँ—”
“नहीं, जाओ मत! थोड़ी देर और ठहरो। तुम्हें देखना तो मैं चाहती ही थी—”
“लगभग भूल ही गया था, थाये—किंतु मैं अभी-अभी बड़ी पिराट्टी के पास से आ रहा हूँ, उन्होंने एक आवश्यक संदेश देकर मुझे यहाँ भेजा है। वह आपसे मिलना चाहती हैं।”
“अवश्य। मेरी तो स्वयं ही उनके पास जाने की इच्छा है। किंतु उससे पहले—अपने भ्रमण की बात बताओ। कहाँ-कहाँ थे?”
“दक्षिण में कुमारी से लेकर उत्तर में वेंगडम तक—सर्वत्र।”
“और—लोग किस बारे में बात कर रहे थे?”
“अधिकांश तो चोल-राज्य और उसके ऐश्वर्य की बात कर रहे थे। शीघ्र ही, वे कह रहे थे, चोल-अधिकार उत्तर में गंगा नदी से लेकर हिमालय तक विस्तृत होगा; ऐसी उसकी विपुल शक्ति है…”
“और—?” उन्होंने दबाव डाला।
“पऴुवेत्तरायरों और उनकी वीरता की बहुत चर्चा हो रही है। चोल साम्राज्य के आज के इस वैभव और द्रुत उत्थान का मुख्य कारण, वे कह रहे थे, पऴुवूर के प्रभुओं का अदम्य साहस और—”
“रहने दो,” मृदु स्वर में कुंदवै ने टोका। “और क्या?”
“आपके भाइयों के प्रति गहरी श्रद्धा और स्नेह। विशेषकर राजकुमार अरुलमोऴि वर्मन उनके हृदय में श्रेष्ठ आसन के अधिकारी हैं; उनके प्रति उनका प्रेम शब्दों में नहीं कहा जा सकता।”
“इसमें आश्चर्य की क्या बात है। और कुछ?”
“कई लोग आश्चर्यचकित थे कि चोल सम्राट की प्रिय पुत्री अभी तक अविवाहिता क्यों हैं। मुझसे भी कई बार यह प्रश्न पूछा गया।”
“और तुमने क्या उत्तर दिया?” एक म्लान, कौतुक-भरी मुस्कान उनके होठों को छू गई।
“कि हमारी प्रिय राजकुमारी के योग्य राजकुमार ने अभी इस पृथ्वी पर जन्म ही नहीं लिया है!”
“बाबा—! सच में, तिरुमालै, जो मुझसे विवाह करेगा यदि उसने अभी जन्म ही नहीं लिया है, तो उसके युवा होने तक मैं तो पोपली बुढ़िया हो जाऊँगी! अब मेरी बात रहने दो, यदि कृपा करो। और कुछ है क्या?”
“क्यों नहीं रहेगा? जैसे कि, कई लोग इस समाचार पर परम विस्मय प्रकट कर रहे थे कि वे महान शैव-साधक, परम भक्त मधुरान्तक देवर अचानक दाम्पत्य-जीवन के पवित्र बंधन में बँध गए हैं—”
“और तुम्हारी बहन?” तीखे स्वर में कुंदवै ने पूछा। “जिसके बारे में तुम दावा करते थे कि वह तिरुमाल की एक महान भक्त बनेगी, किंवदंती आण्डाल जैसी एक भक्त-शिरोमणि—भक्तों की मुकुटमणि—वह अब कैसी है?”
“उसका और क्या, थाये? क्या वह अब बड़े पऴुवेत्तरायर की तरुणी रानी नहीं, उनके विशाल प्रासाद और समस्त विपुल सम्पदा की स्वामिनी?”
“सिर्फ उसकी अधिकार-सम्पदा की बात नहीं, सुन रही हूँ कि वह तो पूरे चोल देश की ही एकछत्र शासिका है, है न?”
“ऐसा ही कहा जाता है, थाये—किंतु आज के ऐसे शुभ दिन पर उसके बारे में सोचने क्यों जाएँ? जब आण्डाल की बात उठी ही है, तो आपको बताता हूँ, कुछ दिन श्रीविल्लिपुत्तूर में बिताए थे, और परम सौभाग्य से विष्णु सिद्धर के कुछ दिव्य गीत सीख लेने का अवसर मिला था। सुनो, अम्मा, उन्हीं में से एक गीत; यह कान्नन के जन्म के उस पुण्य क्षण पर रचा गया है:
रंग-बिरंगे महलों से घिरा वह तिरुक्कोट्ठियूर,
जिस क्षण जन्मे कान्नन केशव नाम्बि वहाँ,
कोई रंग बिखेरे, कोई उसे लौटाए,
कान्नन का आँगन रंगों से भर जाए!
दौड़ते आते, लोट जाते, आनंद में गाते वे सारे,
ढूँढ़ते फिरें—कहाँ हैं प्रभु, कहाँ गए हमारे?
कोई गाता, कोई बजाता कितने ही परै,
कोई नाचे—आज यह नगर ही जैसे आयरपाडि बने!
[देखो, भाग्यवानो, कान्नन के जन्म का आनंद! क्योंकि आज के दिन सुन्दर नगरी तिरुक्कोट्ठियूर, जो कितने ही मनोहारी गलियारों और प्रासादों से सुशोभित है, उत्सव में मग्न हो उठती है जब मंदिर-प्रांगण में तेल और रंग बिखेरे जाते हैं। उनके भक्त आनंद में उछलते हैं, दौड़ते हैं; गीत और संगीत से हवा भर जाती है जब वे आँखें भरकर अपने प्रिय प्रभु को देखते हैं—और इसलिए उनके उस परमानंद में हम अपनी आँखों के सामने जैसे आयरपाडि को ही देखते हैं!]
“आज का यह पऴैयारै भी ठीक वैसा ही है, थाये—जैसे उस काल की वह आयरपाडि, जिस ग्वाल-बस्ती में कृष्ण बड़े हुए थे।”
“शायद,” शांत स्वर में कुंदवै ने कहा, उनकी काली आँखें उसके मुख पर कुछ ढूँढ़ रही थीं। “किंतु तिरुमालै—थोड़ी देर पहले क्या तुमने एक और तरह के परै-ढोल की आवाज़ नहीं सुनी? उसके बारे में तुम्हारा क्या विचार है?”
ऐसा लगा, जैसे आऴ्वारक्काडियान इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था।
“हाः, एक गुप्तचर—और वह भी भागा हुआ!” हाथ हिलाकर उसने बात उड़ा दी। “उसे पकड़ने के लिए कोई पुरस्कार भी घोषित कर रहे हैं—किंतु मैं इन सब बातों का क्या जानूँ, अम्मा?”
“नहीं जानते? उसकी पहचान को लेकर तुम्हें ज़रा भी संदेह नहीं?”
“ज़रा-सा है, हाँ—किंतु उसे मुख पर लाने का भी मेरा साहस नहीं होता, थाये। जानती हैं—यहाँ आने के मार्ग में मुझे भी कई प्रतिकूल दृष्टियों का शिकार होना पड़ा है। कोई यदि मुझ पर संदेह कर ले और उस अँधेरी कालकोठरी में खींच ले जाए—!”
“तुम्हें काबू में कर पाना ही असाधारण चातुर्य का काम होगा, तिरुमालै; हमारी प्राचीन कथाओं में जैसा कहते हैं, उसके लिए सींगों वाला मनुष्य लगेगा! तुम जो जानते हो, कहो—परंतु यदि सचमुच चाहो, तभी। तुम निश्चय ही यह तो नहीं सोच रहे हो कि मैं तुम्हें अधिकारियों के हवाले कर सकती हूँ?”
“कृष्ण, कृष्ण! कदापि नहीं। मैंने तो बस एक तरुण योद्धा को देखा था वीर नारायणपुरम् में। उसने कहा कि वह तंजावुर के मार्ग पर है। वहाँ उसका क्या काम है, इस बारे में उसने एक शब्द भी नहीं खोला, किंतु मुझसे ढेरों प्रश्न किए—”
“सच में?” कुंदवै अचानक सीधी होकर बैठ गईं, निस्संग रहने का सारा दिखावा उड़ गया। “कैसा दिखता है वह?” अधीरता उनके सुन्दर कंठ में उतर आई।
“स्पष्टतः ऊँचे वंश का—कहूँगा, रीतिमतो अभिजात। निस्संदेह एक सुन्दर तरुण। तीक्ष्ण बुद्धि और प्रबल शारीरिक शक्ति का स्वामी—”
“उसने तुमसे क्या पूछा?”
“सम्राट के स्वास्थ्य के बारे में, और उनके बाद सिंहासन पर कौन बैठ सकता है। उस राजकुमार के बारे में जो इलंकै में युद्ध में व्यस्त हैं। बाद में पता चला, कुडन्दै के ज्योतिषी को भी उसने ठीक इसी प्रकार की पूछताछ का सामना करवाया था—”
“आह! तो वह ज्योतिषी के पास भी गया था?”
“उस जाने की बात से जैसे कुछ याद आ रहा है—सुना है कि वह वस्तुतः दरवाज़े के बेचारे प्रहरी को धकेलकर बड़े नाटकीय ढंग से भीतर घुसा था। किंतु आपने, सौभाग्य से, उसे पहचाना नहीं कि वह वास्तव में कौन है—”
“तो मेरी अंतरात्मा की अनुभूति सही थी।”
“किस बारे में, अम्मा?”
“मुझे कैसा-कैसा लगा था, कि वह दुस्साहसी तरुण उपद्रव खड़ा करने के लिए ही पका हुआ है…”
“और आप सही सिद्ध हुईं। मेरा संदेह है, वही वह भागा हुआ गुप्तचर है, और जिसे पकड़ने की आशा में पऴुवेत्तरायरों ने परै-घोषणा करवाई है—वह वही है।”
“तिरुमालै—एक काम कर दोगे मेरा?”
“आदेश करें, थाये।”
“यदि कभी भी उस तरुण से तुम्हारी भेंट हो, किसी भी समय—”
“उसे पकड़कर लाकर अपना पुरस्कार माँग लूँ?” आँखों में शरारत की चमक लिए उसने पूछा।
“बिल्कुल नहीं! उसे मेरे पास ले आना। देखो—उसके लिए मेरे पास एक काम है।”
आऴ्वारक्काडियान बहुत देर तक कुंदवै पिराट्टी की ओर देखता रहा, जैसे अचानक एक गहरे विस्मय से आहत हुआ हो।
“उस काम की कोई आवश्यकता होगी, ऐसा मुझे नहीं लगता, थाये। मुझे उसे ढूँढ़ निकालना होगा, यह भी शायद नहीं होगा,” अंत में उसने कहा, उसका स्वर एक भारी, दबे हुए कौतुक से भरा था। “क्योंकि, देखिए—मुझे लगता है, वह स्वयं ही आपको ढूँढ़ निकालेगा।”
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