ताड़-चिह्न का ज़ोर कितना था, यह वंदियादेवन ने शीघ्र ही जान लिया। उसे बालपन में सुनी उन जादुई अँगूठियों की कथा स्मरण हो आई। भोर का समय था। दुर्ग के फाटक पर भारी भीड़ थी, सब भीतर घुसने का अवसर पाने के लिए हँसमुख धक्कम-पेल कर रहे थे। दूध-दही वाले, ताज़े फल-फूल-सब्ज़ियों के विक्रेता, उनके साथ-साथ नाना प्रकार के शिल्पी, कारीगर और हर तरह के मुंशी। फाटक के प्रहरी अपने महत्त्व को भली-भाँति जानते थे, और यह बात सब पर जताने में भी कोई कसर नहीं रखते थे—विशाल मुख्य द्वार में कटी एक छोटी-सी सँकरी दरार से वे भीड़ को एक-एक करके निचोड़कर भीतर भेज रहे थे। किंतु वंदियादेवन के चिह्न दिखाते ही प्रहरियों ने कमर से झुककर गहरा प्रणाम किया। अत्यंत सम्मान से उसका सत्कार किया, यहाँ तक कि लकड़ी का विशाल फाटक एक पल्ला केवल उसी के लिए खोल दिया गया। इस प्रकार, बड़े ही भव्य अंदाज़ में, वंदियादेवन ने तंजावुर में पग धरा।
आह, उस प्राचीन श्रद्धेय नगरी में पग रखने के उपरांत क्या-क्या घटित होने लगा! कौन जाने, ठीक उस क्षण ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति कैसी थी। किस वस्तु ने इस दिन को अन्य सब दिनों से पृथक कर दिया? एक के पश्चात एक घटनाएँ ऐसी तीव्र, साँस रोक देने वाली शृंखला में घटित होने लगीं, और उनकी छाप ऐसी गहरी पड़ी, कि उसका वह शांत प्रातःकालीन प्रवेश ही अंततः चोल साम्राज्य के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ ले आया। और हमारा तरुण नायक? दुर्ग में पग रखते ही वह कुछ क्षण के लिए केवल विस्मय में निःशब्द खड़ा रह गया। पल्लव राजवंश की वह प्राचीन राजधानी कांची ने वर्षों तक कितने ही आक्रमण सहे थे। उसके भवनों और पुरानी बस्तियों पर एक थकी-हारी, जर्जर काया चढ़ी थी, जो नित्य थोड़ा-थोड़ा कर झड़ रही थी, जिस पर नरम हरी काई जम रही थी। जो दिव्य, अद्भुत नक्काशीदार संरचनाएँ नगर का गौरव थीं, अब लगभग खंडहर हो चुकी थीं। आदित्य करिकालन ने आकर कुछ को नए सिरे से गढ़ने का यथासंभव प्रयास अवश्य किया था, किंतु वे मरम्मत किए हुए भवन भी ऐसे चमकते थे जैसे सूखे पेड़ पर ताज़े फूल खोंस दिए गए हों—जो आसपास की शून्यता को केवल और भी उभार देते थे।
उसकी तुलना में तंजावुर सर्वथा एक भिन्न जगत था। आह, यहाँ की प्रत्येक वस्तु—प्रत्येक मंडप, प्रत्येक भव्य अट्टालिका—आश्चर्यजनक रूप से नवीन, एक ताज़ा, जीवंत शक्ति से दमक रही थी। बड़े-बड़े भवन प्रसन्न मुखों से एक-दूसरे से सटकर खड़े थे। कोई प्रातःकालीन धूप में पूर्ण श्वेत होकर दमक रहा था, तो कोई गर्म, पकी-लाल ईंटों से बना था—देखकर लगता मानो झिलमिलाते मोतियों और हीरों के बीच माणिक जड़े हों। यहाँ की भूमि उर्वर, फलवती थी, अतः अनेक भवनों को अपने रसीले हरे-भरे बागानों पर गर्व था। पुराने विशाल वृक्षों ने सर्वत्र अपनी छायादार शाखाएँ फैला रखी थीं—सुगंधित पुन्नै और अशोक, पवित्र अरसु, लंबे तेन्नै, फैले हुए आल, मज़बूत कटहल और नीम। उनकी पन्ना-हरी पत्तियाँ प्रकाश को सँजोए रखतीं, सैकड़ों प्रकार के हरे रंगों में परिवर्तित होती रहतीं, आँख और प्राण दोनों को शांति देतीं। सचमुच एक स्वर्गीय नगरी थी, मानो स्वयं देवशिल्पी मयन ने इसे स्वप्न में गढ़ा हो। उस स्थान का सौंदर्य और उसकी वह शांत उपस्थिति ऐसी थी कि केवल पथ पर चलने मात्र से मन अचानक आए आनंद के झोंके और एक अद्भुत, अवर्णनीय, किंतु नितांत मधुर गर्व से भर जाता था।
फाटक पर इतने प्रहरी, भीतर प्रवेश की इतनी कड़ाई—यह देखकर वंदियादेवन के मन में न जाने क्यों यह बात बैठ गई थी कि दुर्ग के भीतर का नगर कदाचित सूना और निर्जन होगा। भूल! इससे बड़ी भूल और नहीं हो सकती थी। सड़कें प्राण और उमड़ती भीड़ से मानो फटी पड़ रही थीं। चौड़े पथों पर खटखट शब्द करते हुए घोड़े और सुंदर रथ दौड़ रहे थे। बीच-बीच में मंदिर के हाथियों के भारी-भरकम पदचाप से धरती काँप उठती—वे चलते-फिरते काले टीलों की भाँति राजकीय चाल से पथ पार करते, उनके गले की भारी पीतल की घंटियाँ चारों ओर एक गंभीर, लयबद्ध ढँ-ढँ बिखेर देतीं। दूध, दही, फूल और सब्जीवालों के तीखे स्वर उसके कान फाड़े दे रहे थे। और इस सबके ऊपर आलाचि घंटे का सुनहरा अनुनाद उठता—वह विशाल समय-सूचक घंटा प्रहर की घोषणा करता, और उसके साथ बड़े पेरिगै ढोल की गंभीर गूँज पूर्णतः घुलमिल जाती। कहाँ से कब वाद्ययंत्रों का उज्ज्वल स्वर भेसे आता, कोई भाँप नहीं पाता, और उसके साथ मिलतीं तरुणियों की मधुर, सुरीली तानें। वायु में मानो उत्सव का उल्लास था। एक उत्साह और सरल आनंद जैसे प्रत्येक खुले स्थान को भरे हुए था।
यही तो, उसने सोचा, एक नगर का वास्तविक सार है! एक साम्राज्य की राजधानी—वह साम्राज्य जो द्रुत गति से समग्र विश्व में अपनी सीमाएँ फैला रहा हो—उसका स्वरूप तो ऐसा ही होना चाहिए, ऐसे प्राण और शक्ति से परिपूर्ण कि पथ पर चलते प्रत्येक व्यक्ति में वह संचारित हो जाए।
इतने बड़े नगर में वह कितना दिशाहीन है, यह प्रकट हो जाए—यह वंदियादेवन को सर्वथा स्वीकार न था। राजप्रासाद का मार्ग पूछने के लिए रुकने पर लोग निश्चय ही कौतुकवश उसे सिर से पाँव तक देखते। मन-ही-मन सोचते, “तो तुम यहाँ नए हो, क्यों?” कौन जाने, शायद उसे निरा देहाती भूत ही समझ बैठते! नहीं, वह मार्ग स्वयं खोज निकालेगा। यह ऐसा भी क्या कठिन है।
सड़-सड़! पड़-पड़! बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं की छज्जों से नकशा-अंकित उज्ज्वल पताकाएँ, सुंदर वस्त्रों के ध्वज, और मकर-तोरण फहरा रहे थे—पश्चिम की प्रबल वायु में सब फड़फड़ाकर लहरा रहे थे। गरजते बाघ और सुडौल ताड़-वृक्ष के प्रतीक चारों ओर दिखाई पड़ रहे थे। किंतु सबसे ऊँचा, नगर के अन्य सभी ध्वजों से कहीं लंबा और कहीं अधिक दबदबे वाला, एक विशाल बाघ-ध्वज फहरा रहा था।
वही निश्चय ही सम्राट के प्रासाद का चिह्न है, वंदियादेवन ने अनुमान लगाया। उस ओर दृष्टि टिकाए वह लगभग उसी दिशा में चल पड़ा, मन-ही-मन अगली चालों पर विचार करते हुए। ताड़पत्र तो पहुँचाना ही है, किंतु आदित्य करिकालन का गुप्त मौखिक संदेश पहुँचाना भी उतना ही आवश्यक है। और वह जानता था कि यह सब छोटे पऴुवेत्तरायर की स्पष्ट अनुमति के बिना नहीं होगा। किंतु वह अनुमति मिलेगी कैसे? देवताओं ने कृपा करके दुर्ग का फाटक तो पार करा दिया, किंतु प्रत्येक छोटे-मोटे कार्य के लिए तो दैव-हस्तक्षेप की आशा नहीं की जा सकती। सम्राट से भेंट करने के लिए उसे कोई-न-कोई चतुर फंद रचना ही होगा। किंतु क्या फंद?
उसकी शिराओं में कई पीढ़ियों के वानरों का रक्त गर्म और तीव्र गति से बह रहा था—उसके गर्वित, प्राचीन कुल का—और उनमें बुद्धि की कभी कमी नहीं हुई थी। आह, मेरे चिर-उर्वर मस्तिष्क, उसने स्वयं से कहा, एक उत्तम फंद निकालने में तुम्ही मेरी सहायता करो। लाओ, उस पुरानी कल्पना को खींचकर बाहर निकालो! जीवित रहने के लिए क्या कल्पना की आवश्यकता केवल कवियों-लेखकों को ही होती है? मुझ जैसे लोग, जो राजनीति के गँदले गहरे जल में तैरते हैं, उनके लिए भी तो उतनी ही चतुर बुद्धि चाहिए।
तो, वह कौन-सा अद्भुत फंद रचेगा?
वास्तविकता यह थी कि दुर्ग में चुपके से घुसकर सबसे पहले जो कार्य उसने निपटाए थे, उनमें से एक यह चुपचाप सुनिश्चित करना भी था—कि एक भयंकर वृद्ध योद्धा-स्वामी सचमुच नगर के बाहर हैं या नहीं।
बाहरी प्राचीर के समीप एक प्रहरी से उसने बेपरवाह अंदाज़ में पूछा था, “अच्छा बताओ तो, भइया, पऴुवेत्तरायर नगर लौटे हैं या नहीं, जानते हो?”
“किसकी बात कर रहे हो, तंबि?” प्रहरी ने पलटकर पूछा। “छोटे स्वामी तो यहीं नगर में हैं।”
“अरे, वह तो मैं जानता हूँ! मैं बड़े पऴुवेत्तरायर की बात कर रहा हूँ, वृद्ध स्वामी की। वे हाल ही में मध्यदेश से होकर जा रहे थे, है न?”
“उधर गए थे क्या? यह तो मेरे लिए नई सूचना है,” भाले पर टिककर प्रहरी ने मन की बात कही। “इतना जानता हूँ कि युवती रानी की ढँकी पालकी कल संध्या को लौटाई गई है। किंतु पऴुवूर के स्वामी अभी नहीं लौटे हैं। सुना है, आज रात्रि तक पहुँचेंगे।”
यह समाचार सचमुच बहुत अच्छा था। अर्थात, अवसर की खिड़की अभी खुली थी। अब बस किसी प्रकार सम्राट से भेंट की व्यवस्था करनी थी, और ताड़पत्र उनके हाथों में सौंपना था। किंतु वह भी वह सँभालेगा कैसे?
और तभी, ठीक अगले ही क्षण, उसके मस्तिष्क में एक उज्ज्वल विचार कौंध गया। प्रातःकालीन कुहरे की भाँति सारी चिंताएँ पिघल गईं। मुख पर वही पुराना उत्साही हास्य लौट आया, और आँखें अपनी चिर-परिचित नटखट चमक से नाच उठीं।
सौभाग्य से, राजप्रासाद खोजने के लिए उसे निरुद्देश्य भटकना नहीं पड़ा। उस विशाल बाघ-ध्वज की ओर दृष्टि टिकाए, टेढ़े-मेढ़े पथों पर बढ़ते-बढ़ते उसने देखा कि वह सीधा प्रासाद के फाटक के सम्मुख ही आ खड़ा हुआ है।
और क्या प्रासाद था! स्तंभ भव्य और प्रभावशाली थे, सामने के मंडप को सँभाले हुए नक्काशीदार खंभे इतने अद्भुत थे कि संदेह होता—स्वयं देवराज इंद्र का भी ऐसा सुंदर भवन है या नहीं, अथवा उज्जयिनी के उन किंबदन्ति राजा विक्रमादित्य का। ऊँचे स्तंभों पर खुदे पत्थर के घोड़े इतने सजीव थे, उनकी सज्जा और पिछले पैरों पर खड़े होने की भंगिमा इतनी सटीक थी, कि देखकर लगता था अभी पत्थर से निकलकर उसकी गर्दन पर आ झपटेंगे।
नगर के भीतर से कई चौड़े मार्ग गए थे, अंत में सब आकर प्रासाद के सामने के विशाल प्रांगण में मिल गए थे। प्रत्येक प्रवेश-द्वार की रक्षा के लिए दो-दो घुड़सवार, साथ में पर्याप्त पैदल सैनिक। वंदियादेवन ने ध्यान दिया कि साधारण राहगीर अधिकतर प्रहरियों के निकट जाने का भी साहस नहीं कर रहे थे। दो-एक साहसी लोग कदाचित बेपरवाह भङ्गिते आगे आते, किंतु प्रासाद के प्रवेश-द्वार और फहराती बाघ-पताका की ओर एक लंबी, भयभीत दृष्टि डालकर चतुराई से पीछे हटना ही बुद्धिमानी का कार्य समझते।
कहीं भी थोड़ी भीड़ जुटने का लक्षण दिखते ही सैनिक भाले हिलाकर उन्हें तुरंत तितर-बितर कर देते। जो कुछ क्षण खड़े रह पाते, वे भी सावधान—कभी गला ऊँचा नहीं करते। दबी आवाज़ में फुसफुसाते, जो केवल एक-दूसरे के कानों के लिए होती।
वंदियादेवन, स्वभावानुसार, एक क्षण भी नहीं झिझका। जहाँ दूसरे डगमगाकर मुँह फेर रहे थे, वहाँ वह तीव्र गति से, परम आत्मविश्वास के साथ, सीधा प्रासाद के मार्ग पर चल पड़ा।
किंतु प्रवेश-द्वार पर पहुँचते ही दो घुड़सवारों ने उसका मार्ग रोक लिया, उनके बड़े-बड़े घोड़े इतने निकट झुक आए कि लगभग उसकी देह से अपनी नाक रगड़ने लगे। भारी भालों का एक गुच्छा तीखी धात्विक झनझनाहट के साथ उसकी ओर घूम गया, चमकीले लोहे की नोकों पर उज्ज्वल धूप झिलमिला उठी—अश्वारोहियों के अस्त्र पैदल सैनिकों के अस्त्रों से मिल गए।
किंतु उस जादुई मुहर वाली अँगूठी ने फिर चुपचाप अपना करतब दिखाया। हाथ ऊपर उठाते ही सैनिक मानो पिघल गए। उनका वह रूखा, पतले-आवरण-में-ढका औद्धत्य पल में हवा हो गया। तीन अलग-अलग प्रहरियों ने एक-एक कर झुककर अँगूठी को ध्यान से देखा।
“ठीक है,” एक वृद्ध प्रहरी बड़बड़ाया। “जाने दो इसे।”
तिरछे भाले तुरंत हट गए, और वंदियादेवन एक शाही अंदाज़ में सीधा भीतर चला गया।
फिर भी प्रांगण में प्रवेश कर उसे सोचना पड़ा—इससे वास्तव में लाभ क्या हुआ? अभी और कितनी जाँच-चौकियों और कड़ी परीक्षाओं का सामना करना होगा? और कितनी पूछताछ? इस विस्तृत मायाजाल में छोटे पऴुवेत्तरायर को वह ढूँढ़ेगा भी तो कैसे? संदेह जगाए बिना किससे मार्ग पूछेगा? छोटे स्वामी की स्पष्ट अनुमति के बिना सम्राट तक पहुँचने का कोई मार्ग ही नहीं। और वह अनुमति मिल भी जाए तो—ऐसे विशाल, टेढ़े-मेढ़े प्रासाद-परिसर में शय्याग्रस्त रुग्ण सम्राट को वे रखेंगे भी कहाँ? और वह कभी यह जान भी कैसे पाएगा?
ठीक तभी वंदियादेवन ने अपने पीछे आते हुए लोगों के एक दल के पदचाप और बातों की भुनभुनाहट सुनी। वह रुका, पीछे मुड़कर देखा। बाहरी प्रहरियों के पास एक छोटा-सा जमघट रुका हुआ है, भीतर प्रवेश की अनुमति की प्रतीक्षा में। उनका पहनावा असाधारण रूप से सजीला था—मूल्यवान महीन रेशम के वस्त्र, गले में सुंदर मोतियों की माला, कानों में भारी स्वर्ण-कुंडल। किसी के ललाट पर पवित्र श्वेत भस्म की चौड़ी पट्टी खिंची थी, तो किसी ने चमकीला कुंकुम और चंदन का लेप लगा रखा था, जवाद्दु के साथ मिला हुआ।
पोशाक और उनकी आत्मविश्वासपूर्ण नाटकीय भंगिमा देखकर लगा, ये कवि हैं।
सचमुच वे ही थे।
“राजकवि आ गए हैं! उन्हें जाने दो, कृपा करके!” प्रहरियों में से एक ने—संभवतः उनके नायक ने—पुकारा। एक तरुण सैनिक की ओर मुड़कर जोड़ा, “स्वामी छोटे पऴुवेत्तरायर मध्य मंडप में दरबार लगाए बैठे हैं। इन्हें तुरंत वहाँ पहुँचा दो।”
“श्रद्धेय प्रभुओं,” हँसकर एक अन्य प्रहरी ने परिहास किया, “आज यदि कोई उपहार मिले, तो लौटते में इसी मार्ग से आना कृपा करके। और कुछ न मिले, तो कष्ट करके इधर मत आना!”
दल में सहज हँसी की एक लहर दौड़ गई।
पका फल सीधा दूध की कटोरी में आ गिरा, यह वार्तालाप सुनते हुए वंदियादेवन ने दबे संतोष से सोचा। अब छोटे स्वामी को खोजने के लिए बस इस हँसमुख कवि-दल के पीछे-पीछे ताल मिलाकर चलना है। विशाल गलियारों में घूम-घूमकर हकलाते हुए व्यर्थ में संदेहजनक प्रश्न करने की अब कोई आवश्यकता नहीं। और एक बार उस व्यक्ति के सम्मुख पहुँच जाने पर क्या करना है—क्यों, कंधे पर एक अच्छा-खासा मस्तिष्क तो है, है कि नहीं? उसका वह पुराना मित्र, कल्पना, कोई न कोई मार्ग निकाल ही देगा। साथ में यदि भाग्य का थोड़ा सहारा मिल गया, तब तो कहना ही क्या।
एक क्षण भी नष्ट किए बिना, वंदियादेवन चुपचाप प्रस्थान करते कवि-दल के एकदम अंत में स्वयं को जोड़कर उनके प्रवाह में बहता हुआ महल के अंतःपुर की ओर बढ़ गया।
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