अब हम लौटते हैं आऴ्वारक्काडियान के पास — अथवा उनके अधिक सम्मानजनक नाम, तिरुमलैयप्पर के पास — जिन्हें हम कोल्लिडम नदी के कीचड़-भरे तट पर विवश खड़े छोड़ आए थे। देखें, भाग्य ने उनके लिए क्या संजो रखा था। वे वहाँ खड़े देख रहे थे कि धूल धीरे-धीरे बैठ रही थी, और वंदियादेवन घोड़े पर उछलकर सवार हुआ और कुडंदै के मार्ग पर सरपट दौड़ता हुआ निकल गया।
"छोकरा बड़ा शातिर है," नंबि अपनी ठुड्डी को चिंतामग्न हो खुजलाते हुए, मन-ही-मन बुदबुदाए। "मैं चाहे कितनी ही कुशलता से फंदा क्यों न बिछाऊँ, वह गीली बाम मछली की भाँति सवालों के जाल से फिसल जाता है। इतनी मशक्कत के बाद भी उसके स्वामी या उसके अभियान के विषय में — एक भी बात नहीं जान सका। और कडंबूर की उस मध्यरात्रि-सभा में उसकी भूमिका क्या थी? क्या वह सचमुच वहाँ था भी? पहले जितना जानता था, अब भी उससे एक बाल बराबर अधिक नहीं जानता। खैर," उन्होंने स्वयं को सांत्वना दी, "कम-से-कम उसे कुडंदै की ओर रवाना तो कर सका। मैं जहाँ सफल न हो सका, वहाँ शायद कुडंदै का ज्योतिषी ही उसके पेट से सच उगलवा ले।"
"क्या आप इस अरसु वृक्ष से बातें कर रहे हैं, स्वामी?" ठीक कान के पास एक स्वर सुनाई दिया। "या अपने-आप से ही बतिया रहे हैं?"
नंबि चौंककर उछल पड़े और पलटकर देखा। धूल के बीच कडंबूर का वही सैनिक खड़ा था — ठीक वही व्यक्ति, जो वंदियादेवन का घोड़ा ले आया था।
"अरे, तुम हो, भाई," आऴ्वारक्काडियान ने तुरंत स्वयं को सँभाल लिया। "तुम्हें निराश करते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा, पर मैं न तो इस वृक्ष से बातें कर रहा था, न स्वयं से। मैं तो इस पेड़ की डालियों में बसे भूत से बतिया रहा था।" उन्होंने अरसु वृक्ष के तने पर स्नेह से एक थपकी दी। "जानते हो, हम पुराने मित्र हैं।"
"सच में?" सैनिक ने एक भौंह उठाई। "आपका वह भूत शैव है या वैष्णव?"
"मजेदार बात है, अभी-अभी मैं उससे यही प्रश्न पूछ रहा था, किंतु मेरे उत्तर पाने से पहले ही वह दुष्टात्मा फुर्र से उड़ गया। खैर, उसे जाने दो — तुम्हारा नाम क्या है, भाई?"
"जानकर क्या करेंगे, स्वामी?"
"उस उफनती नदी के बीच हमारी नौका को उलटने से तुमने ही तो बचाया था, है न? तो तुम्हें और तुम्हारे परिवार को अपनी प्रार्थनाओं में स्मरण करना मेरा पवित्र कर्तव्य है।"
"मेरा… मेरा नाम इडुंबनकारी है, स्वामी," उस व्यक्ति ने थोड़ी असहजता से हकलाते हुए कहा।
"इडुंबनकारी… अरे, यह नाम तो कहीं सुना-सुना सा लगता है।"
ठीक उसी क्षण इडुंबनकारी ने एक विचित्र हरकत की। अँगुुलियाँ फैलाकर हथेली ज़मीन की ओर की, एक हाथ के ऊपर दूसरा हाथ रखा, और दोनों अँगूठे अगल-बगल हिलाने लगा। इस पूरे समय उसकी दृष्टि नंबि के मुख पर टिकी रही।
"मैं तुम्हारी बात ठीक से समझा नहीं," तिरुमलैयप्पर ने नितांत भोला मुख बनाकर कहा। "यह कैसा संकेत है, मित्र?"
इडुंबनकारी का रूखा चेहरा काला पड़ गया, उसकी भौंहें सिकुड़कर एक हो गईं। "मैं? मैंने तो कुछ नहीं किया।"
"निश्चय ही किया, सौ बार किया। ठीक उसी भंगिमा में जैसे हमारी भरतनाट्यम की मंदिर-नर्तकियाँ भगवान तिरुमाल के प्रथम अवतार को दर्शाती हैं, तुमने उसी तरह दोनों हाथ जोड़े थे, है न?"
"तिरुमाल का अवतार? मैं सच में नहीं जानता कि आप क्या कह रहे हैं, स्वामी।"
"नहीं? क्या आश्चर्य है! यह तो मत्स्यावतार है — वह महामत्स्य।"
"मत्स्य — क्या आपका आशय केवल एक मछली से है?"
"ठीक यही। एक मछली।"
"अरे बाबा, आपकी आँखें तो बड़ी अनोखी हैं!" इडुंबनकारी ने एक बनावटी हँसी हँसी। "पहले आपने खाली पेड़ में भूत देखा, और अब मेरे खाली हाथों में मछली! लगता है आजकल आप कुछ ज़्यादा ही मछली-वछली खा रहे हैं, क्यों स्वामी?"
"छिः! ऐसी धृष्टता से बात मत करो, भाई," नंबि ने मृदु स्वर में डाँटा। "खैर, जो भी हो — याद है, हमारे साथ नदी पार करने वाला वह तुनकमिज़ाज शैव? देखा क्या वह किस ओर गया?"
"क्यों नहीं देखूँगा? घोड़ा लाने जाते समय वह तो पूरे रास्ते मेरे साथ ही चला, और आपको जितनी भी भद्दी गालियाँ हो सकती थीं, सब दीं।"
"यदि थोड़ा विस्तार से बताओ तो…"
"उसने कहा, यदि फिर कभी आप उसे दिख गए तो वह आपकी शिखा मुँड़वाकर आपको एकदम टकला कर देगा।"
"अहा, तो उसने नाई का काम भी पकड़ लिया है, देखता हूँ?"
"और उसने सौगंध खाई है कि आपके मस्तक पर तिरुमाल के पवित्र चिह्न—उस नामम्—का अंतिम निशान तक मिटाकर, उसके बदले सिर से पाँव तक आपको शिव पेरुमान की पवित्र श्वेत भस्म से पोत देगा!"
"हा! तब तो मुझे अपने इस पुराने प्रिय मित्र से एक बार फिर मिलना ही पड़ेगा। और तुम अब कहाँ चले, भाई? क्या हमारा मार्ग एक ही दिशा में हो सकता है?"
"अरे नहीं-नहीं, स्वामी। क्यों होगा? मुझे अभी कोल्लिडम पार कर कडंबूर लौटना है। देर हुई तो स्वामी निश्चय ही मेरी आँखें निकाल लेंगे।"
"तब तो तुम्हें शीघ्रता करनी चाहिए। देखो, मल्लाह बस नौका खोलने ही वाला है।"
इडुंबनकारी ने कंधे के ऊपर से झाँककर देखा, नंबि ठीक कह रहे थे। "ठीक है, स्वामी। तो मैं विदा लेता हूँ।"
वह नौकाघाट की ओर धीरे-धीरे चलने लगा। आधा मार्ग जाकर उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। किंतु आऴ्वारक्काडियान कभी समय व्यर्थ करने वालों में से नहीं थे — उन्होंने भी अपनी एक करामात दिखा दी थी। आश्चर्यजनक फुर्ती से अरसु वृक्ष के खुरदरे तने पर चढ़कर, पेड़ की सबसे घनी, पत्तों-भरी डालियों के बीच भली-भाँति दुबककर बैठ गए थे। इडुंबनकारी ने वृक्ष के नीचे की खाली जगह को मुँह बाए देखा, उस वैष्णव का कोई चिह्न तक न पाकर वह एकदम हक्का-बक्का रह गया।
जल के किनारे एक मल्लाह ने दोनों हाथ जोड़कर पुकारा, "उस पार जाएँगे क्या?"
"अगली नौका से जाऊँगा शायद," इडुंबनकारी ने बुदबुदाते हुए कहा। "तुम जा सकते हो।"
"ठीक है!" मल्लाह ने लंबा बाँस का लट्ठा उठाते हुए खीझकर कहा, "जिस तरह आप तेज़ी से चले आ रहे थे, मैंने तो सोचा आपको पार जाने की बड़ी जल्दी है! आपको लेने के लिए ही तो रुका था!" पथिकों के पागलपन पर सिर हिलाते हुए उसने घूमती हुई नदी में अपनी भारी नौका खेनी आरंभ कर दी।
तो मेरा अनुमान ठीक था, पत्तों की ओट से नीचे की ओर देखते हुए तिरुमलै ने सोचा, ठीक एक मोटे-ताज़े, तृप्त उल्लू की भाँति। यह धूर्त कडंबूर नहीं लौट रहा है। हमारे इडुंबनकारी की झोली में कुछ चालें छिपी हैं, देखता हूँ। मैं यहीं रहकर देखता हूँ कि यह किस ओर जाता है। मैंने अपनी आँखों से देखा, इसने मछली का चिह्न दिखाया। इसका क्या अर्थ है? मछली भला किसका प्रतीक है, हैं? ठहरो-ठहरो — मछली तो पांड्य ध्वज का सुविख्यात चिह्न है। तो वही क्यों नहीं? अहा, हो भी तो सकता है! यदि ऐसा है, तो मुझे थोड़ा और धैर्य रखना होगा। पुरानी कहावत ही तो है — धैर्य से राज्य मिलता है, अधीरता के भाग्य में केवल वनवास बदा है। यद्यपि आजकल जो चल रहा है, उसमें इन विश्वासघाती मनुष्यों के देश पर शासन करने से कहीं बेहतर है कि पेड़-पौधों और पशुओं पर राज किया जाए। खैर, बैठकर देखा ही जाए।
इस प्रकार तिरुमलै ने वृक्ष के उस अदृश्य भूत से अपने मन की बातें बुदबुदाईं। उनके धैर्य का पुरस्कार शीघ्र ही मिला। जैसा उन्होंने संदेह किया था, ठीक वैसा ही हुआ — इडुंबनकारी अगली नौका पर नहीं चढ़ा। बल्कि धीरे-धीरे चलकर वापस आया, और पूरे समय अरसु वृक्ष की ओर तीखी नज़रों से ताकता रहा। उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम — चारों ओर उसने भली-भाँति दृष्टि दौड़ाई, मानो यह सुनिश्चित करना चाहता हो कि आऴ्वारक्काडियान सचमुच चले गए हैं, फिर स्वयं ही वृक्ष के नीचे आ पहुँचा। एक बार और तेज़ी से चारों ओर देखकर वह वृक्ष के नीचे की घास पर आराम से बैठ गया। जिस तरह वह बार-बार भयभीत आँखों से इधर-उधर देख रहा था, उससे लगा कि वह किसी — अथवा किसी वस्तु — की प्रतीक्षा में है। केवल एक ही स्थान पर देखने का विचार उसके मस्तिष्क में नहीं आया — सीधा ऊपर। यद्यपि वह देखता भी तो कुछ देख पाता या नहीं, इसमें संदेह है। तिरुमलै ने पत्तों की आड़ में स्वयं को इतनी निपुणता से छिपा रखा था कि उनके बाल या त्वचा का कोई पता नहीं चल सकता था।
दोपहर के निस्तब्ध ताप में पूरी एक नाड़िगै बीत गई। ऊपर डालियों में नंबि के पैरों में झुनझुनी होने लगी थी। वृक्ष के इस संकरे घेरे में वे और कितनी देर सह सकेंगे, यह वे नहीं जानते थे, किंतु इडुंबनकारी के हिलने का कोई लक्षण नहीं था। तिरुमलै ने विकल्पों पर विचार किया। उस व्यक्ति की नज़र बचाकर नीचे उतरने का कोई उपाय नहीं था; चाहे वे कितनी ही चुपचाप दूसरी ओर से उतरने का प्रयास करें, एक छोटी-सी सरसराहट या एक सूखी टहनी के चटखने की ध्वनि उसके कानों तक पहुँच ही जाएगी। इडुंबनकारी के कान बनबिलाव की भाँति तेज़ थे, और उसकी कमर में एक दुष्ट छोटा-सा छुरा भी खोंसा हुआ था। कौन कह सकता है, कि वह उसे सीधा तिरुमलै के सीने में न उतार दे?
तो फिर और किया ही क्या जा सकता है? क्या वे इडुंबनकारी की गर्दन पर सीधे कूद पड़ें, उसी तरह हाऊ-माऊ चिल्लाते हुए जैसे इस वृक्ष में वास करने वाले कथित भूत को करना चाहिए? हो सकता है कि वह व्यक्ति धोखा खा जाए — और केवल आतंक के मारे मूर्च्छित भी हो सकता है। या फिर तिरुमलै को अपनी जान बचाने के लिए बेतहाशा दौड़ लगानी पड़ सकती है।
ठीक जब उनकी असहजता सहनशक्ति से बाहर होने लगी, तभी जैसे उनकी तपस्या का अंत हुआ। दक्षिण-पश्चिम दिशा से — जो मार्ग कुडंदै से आता था — एक व्यक्ति तीव्र गति से वृक्ष की ओर बढ़ रहा था। किसी मूक अंतर्दृष्टि ने तिरुमलै को बता दिया कि इतनी देर से इडुंबनकारी ठीक इसी व्यक्ति की प्रतीक्षा कर रहा था।
उन्होंने ठीक ही सोचा था। उस व्यक्ति के निकट आते ही इडुंबनकारी उछलकर खड़ा हो गया। नवागंतुक ने तुरंत इडुंबनकारी की कुछ देर पहले वाली हस्त-मुद्रा का अनुकरण किया — एक हाथ के ऊपर दूसरा हाथ, अँगूठे हिलाकर तैरती मछली का आकार। इडुंबनकारी ने भी हू-ब-हू वैसा ही किया।
"तुम्हारा नाम?" उस व्यक्ति ने पूछा।
"इडुंबनकारी। और तुम्हारा?"
"सोमन सांबवन।"
"मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था।"
"मैं भी। वास्तव में तुमसे मिलने ही आया हूँ।"
"हम कौन-सा मार्ग पकड़ेंगे?"
"पश्चिम का, और कौन-सा।"
"कहाँ जाएँगे?"
"शत्रु के पल्लिप्पडै में।" (पल्लिप्पडै का अर्थ है किसी महान राजा या वीर योद्धा की समाधि पर बना स्मृति-मंदिर या समाधि-स्थल।)
"क्या तुम तिरुप्पुरंबियम के निकट उस पुराने स्मृति-सौध की बात कर रहे हो—"
"चुप!" सोमन सांबवन फुसफुसाकर बोला, और चारों ओर की झाड़ियों पर कड़ी दृष्टि डाली। "कोई छिपकर सुन रहा हो तो?"
"बिलकुल नहीं — मैंने भली-भाँति देख लिया है।"
"इधर-उधर किसी के छिपे होने की कोई संभावना तो नहीं?"
"कतई नहीं।"
"तो अब प्रस्थान किया जाए," सोमन सांबवन ने कहा। "मैं इधर के मार्ग अधिक नहीं जानता, इसलिए तुम्हें ही आगे-आगे चलकर मार्ग दिखाना होगा। जाओ, आगे चलो — मैं ठीक पीछे रहूँगा। बस… कुछ पग चलने के बाद रुककर देख लेना कि मैं पीछे आ रहा हूँ या नहीं।"
"मार्ग बहुत अच्छा नहीं है," इडुंबनकारी ने सचेत किया। "जंगल के भीतर से गया है, नुकीले पत्थरों और काँटों से भरा। सँभलकर चलना होगा।"
"कोई बात नहीं; चलो, आगे बढ़ो। और याद रखना — मार्ग जंगल का ही क्यों न हो, किसी को देखते ही तुरंत स्वयं को छिपा लेना। समझे?"
"हाँ-हाँ, समझ गया!"
इडुंबनकारी कोल्लिडम के रेतीले तट के सहारे पश्चिम की ओर चल पड़ा, और सोमन सांबवन थोड़ी दूरी बनाए हुए उसके पीछे हो लिया।
आऴ्वारक्काडियान इतनी देर तक वृक्ष के ऊपर ही बैठे रहे, गहन जिज्ञासा से सब सुन और देख रहे थे। आह, सचमुच कितना भयंकर समय है, पैरों की पिंडलियों में प्राण लौटाते हुए उन्होंने सोचा। भगवान ने मुझे कितना अकल्पनीय अवसर दिया है, कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण जानने का! अब मेरा कार्य है कि इसका बुद्धि से उपयोग करूँ, और यह जान लूँ कि ये लोग क्या षड्यंत्र रच रहे हैं। कडंबूर में तो थोड़ी निराशा ही हुई — वहाँ मैं अधिक कुछ भाँप नहीं सका। अब… अहा, अब जितनी भी सूचनाएँ जुटाई जा सकती हैं, मैं सब जुटाकर ही रहूँगा।
ये लोग तिरुप्पुरंबियम के पल्लिप्पडै में जा रहे हैं। उस पुराने गंग राजा पृथ्वीपति के स्मृति-सौध के अतिरिक्त और कौन-सा होगा? वह तो सौ वर्ष पूर्व बना था; अब खंडहर हो चुका है, इसमें आश्चर्य क्या। इसके अतिरिक्त वह घने जंगल के भीतर है, गाँव भी काफी दूर है। किंतु ये दोनों व्यक्ति एक मृत राजा के स्मृति-सौध के टूटे-फूटे खंडहर में बैठकर बात करने के लिए इतना लंबा मार्ग तय करके जंगल में क्यों जा रहे हैं? जो कहना था, वह तो आराम से यहीं कहा जा सकता था। तो क्या और भी कोई उनके साथ आकर मिलेगा? पर क्यों? और उनमें से एक ने 'शत्रु का पल्लिप्पडै' जैसा कुछ क्यों कहा? पृथ्वीपति फिर किसके शत्रु थे? अहा, मैं जो सोच रहा हूँ, वह निश्चय ही न हो! फिर भी अपनी आँखों से देखे बिना नहीं मानूँगा।
ये लोग कोल्लिडम के किनारे का मार्ग पकड़ रहे हैं। मैं मन्नि नदी के किनारे का रास्ता चुनता हूँ। सच कहूँ तो, वह मार्ग इससे कहीं अधिक जंगलों से ढँका है — किंतु जंगल, पहाड़, लाठी, पत्थर, ढेले—ये सब भला मेरे लिए कब कुछ थे? उलटे मुझ से ही अधिक भयभीत होना चाहिए!
यह सब और बहुत कुछ अपने मन में बुदबुदाते हुए आऴ्वारक्काडियान अंततः वृक्ष से नीचे उतरे। शरीर को तानकर एक अँगड़ाई ली, फिर स्थिर पगों से दक्षिण की ओर चलकर बलखाती हुई मन्नि नदी के पास पहुँचे, और उसके तट के सहारे बाईं ओर मुड़कर तेज़ी से चलने लगे। घने, भारी जंगल के भीतर से, अनगिनत झाड़ियों से ढँके मार्ग को पार करते हुए वे चलते रहे — मार्ग में एक भी मनुष्य नहीं मिला। घंटों बाद अंततः वे तिरुप्पुरंबियम के उस ध्वस्त मंदिर-सौध पर जा पहुँचे। वृक्षों पर संध्या की कोमल छाया उतर आई थी, और सूर्य निःशब्द क्षितिज के नीचे डूब रहा था।
(अब आपको शायद स्मरण होगा कि इस अध्याय के आरंभ में हमारे नंबि ने सोचा था कि वंदियादेवन बड़ा ही फिसलन-भरा व्यक्ति है। ऐसी धूर्तता के लिए एक पुरानी, बड़ी सुंदर तमिल कहावत है — यदि आप एक टट्टी बनाएँ — मोटी, घनी बुनी हुई डालियों की बाड़ — और उससे उसका मार्ग रोकना चाहें, तो ऐसा छैला फिर भी स्वयं को इतना सिकोड़ लेगा कि द्वार की चौखट पर बने कोलम—चावल के आटे की ज्यामितीय आकृतियों—की महीन, चूर्ण-जैसी रेखाओं के बीच से भी आराम से फिसलकर निकल जाएगा। कोई किसी के हाथ नहीं आता — यह कहने का एक अद्भुत ढंग है। और वंदियादेवन, नंबि के असीम सिरदर्द का कारण बनकर, निःसंदेह इस अद्भुत गुण का स्वामी था।)
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