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पोन्नियिन सेल्वन Matribhasa Hindi · उन्तीसवाँ अध्याय — हमारे सम्मानित अतिथि
A historical fiction-themed illustration for पोन्नियिन सेल्वन

उन्तीसवाँ अध्याय — हमारे सम्मानित अतिथि

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कवियों के जाते ही शयनकक्ष में सहसा एक भारी निस्तब्धता उतर आयी। राजवैद्य समझ गए कि उनकी बारी आ गयी है। वे धीमे पगों से आगे बढ़े, हाथ में एक छोटा-सा कटोरा था, जिसमें काले रंग का कोई औषधीय काढ़ा था — कड़वी लताओं और पुरानी छालों की हल्की गंध फैल रही थी। साम्राज्ञी वानवन महादेवी ने कोमल हाथों से वह कटोरा उठा लिया। वे गर्वित मलयमान वंश की राजकन्या थीं। स्नेहपूर्वक उन्होंने उसे अपने पति के मुख के पास बढ़ाया।

इतनी देर तक छोटे पऴुवेत्तरायर ने बड़ी कठिनाई से अपना धैर्य सँभाले रखा था। अवसर पाते ही वे झपट पड़े। युवा वंदियादेवन का हाथ पकड़कर लगभग खींचते हुए वे तेजी से सम्राट की शय्या के पास पहुँचे।

"प्रभु?" सेनापति ने कसे हुए स्वर में पूछा। "क्या नयी औषधि से कोई लाभ हुआ?"

सुंदर चोल एक क्लांत, विषादपूर्ण मुस्कान के साथ हँसे। "वैद्य को तो इस पर बहुत विश्वास है, मित्र। महारानी को भी। किंतु सच कहूँ तो मुझे कुछ विशेष अनुभव नहीं होता। सेनापति, मैं स्पष्ट कहता हूँ — यह सारा हो-हल्ला केवल समय और शक्ति का अपव्यय है, बड़ा ही करुण। मेरे दिन पूरे हो चुके हैं। मृत्यु के देवता यम मेरी एड़ी पकड़कर खींच रहे हैं। मुझे पता है, इस समय वे मुझे पुरानी राजधानी पऴैयारै में खोज रहे होंगे। और जैसे ही उन्हें ज्ञात होगा कि मैं वहाँ नहीं हूँ, वे तुरंत यहाँ मेरे द्वार पर आकर दस्तक देंगे—"

"ऐसा न कहें, प्रभु," छोटे पऴुवेत्तरायर ने बीच में ही टोका, उनके चेहरे पर सच्ची पीड़ा की छाप थी। "जरा सोचिए, आपकी इन बातों से हमारा मनोबल कितना गिर जाता है! आपके पूर्वज—"

"हाँ, तुम याद दिला रहे हो कि मेरे किसी भी पूर्वज ने मृत्यु से भय नहीं किया। ठीक है। यदि मेरा भी वही भाग्य होता, अपने पूर्वजों की भाँति रणक्षेत्र में वीर-मृत्यु का वरण करने का, तो मैं भी भयभीत न होता, सेनापति। नियति को लेकर कोई अफ़सोस भी न करता। बल्कि दोनों हाथ फैलाकर, उत्सुक हृदय से उसका आलिंगन कर लेता। मेरे चाचा राजादित्य ने तक्कोलम के युद्ध के घोर गर्भ में कूदकर मृत्यु को गले लगाया था। चोल इतिहास के पन्नों पर अपना नाम सदा के लिए अंकित कर दिया था, गौरव का वह आसन पाया था — ‘हस्तीपृष्ठ पर मृत्यु-वरण करने वाले’। और मैं? मुझे शायद एक महान उपाधि मिलेगी — ‘रोगशय्या पर दुर्बल हाथों से यम का स्वागत करने वाले सुंदर चोल’! मेरे एक और चाचा, सम्राट गंडरादित्य, सारा जीवन शिव पेरुमान की आराधना में डूबे रहे। वे मृत्यु से तनिक भी भयभीत नहीं थे। पश्चिमी समुद्र के पार नाना देशों में तीर्थयात्रा पर गए, प्रभु के श्रीचरणों में स्थान पाया, और वह सुंदर पदवी प्राप्त की — ‘पश्चिम में मृत्यु-वरण करने वाले’। मैं ईश्वर के प्रति वैसी किसी भक्ति का दावा नहीं करता, और न ही दूर तीर्थों पर जाने की मेरी अवस्था है। और कितने दिन मुझे इस शय्या पर पड़े रहना होगा, स्वयं के लिए और आसपास के सभी लोगों के लिए एक पीड़ा बनकर — कौन जाने। किंतु हृदय में कुछ कहता है — इस पृथ्वी पर मेरे दिन अब अधिक नहीं हैं।"

"प्रभु, राजवैद्य को विश्वास है कि आपके स्वास्थ्य को कोई संकट नहीं है। ज्योतिषी भी ठीक यही कह रहे हैं।" सेनापति क्षण-भर रुके। पास खड़े तरुण की ओर एक दृष्टि डालते ही उनकी आँखें किंचित सिकुड़ गयीं। "किंतु यह छोकरा कुछ देर पहले किसी संकट की बात नहीं कर रहा था?"

"अरे, कांची का वह छोकरा?" सम्राट ने मुख उठाकर देखा। "हाँ, याद आ रहा है, किसी संकट की बात तो कह रहा था। किस विषय में कह रहे थे, तंबि? मेरी शारीरिक अवस्था को लेकर?"

वल्लभरायन वंदियादेवन सम्राट को देखता रहा। उसका मस्तिष्क तब ग्रीष्म की बिजली की गति से चल रहा था। यदि वह स्वीकार कर लेता कि उसने सचमुच चक्रवर्ती को संकट के विषय में सचेत किया था, तब तो सर्वनाश ही हो जाता। पऴुवेत्तरायर बंधुओं के सारे काले संदेह जाग उठते, और तब वह अपने ऊपर सभी प्रकार के अकल्पनीय संकटों को बुला लेता। ठीक है, उसने सोचा, यदि बुद्धि लगाने का कोई समय है, तो वह अभी है। उसे शब्दों की ध्वनि से ही खेलना होगा। तमिल व्याकरण की एक युक्ति का प्रयोग कर दीर्घ स्वर को ह्रस्व में बदलना होगा — नेडिल को कुरिल में — और मन-ही-मन प्रार्थना करनी होगी कि यह चाल काम कर जाए।

"करुणामय महाराज, आपकी महिमामयी उपस्थिति में विपत्ति की बात कहने वाला मैं कौन होता हूँ?" वंदियादेवन ने अपने अभ्यस्त निश्छल स्वर में कहना आरंभ किया। "हमारे वीर छोटे पऴुवेत्तरायर इस अभेद्य दुर्ग की रक्षा कर रहे हैं। राजवैद्य हर समय उपलब्ध हैं। और यह देखिए, हमारी साम्राज्ञी स्वयं आपके पवित्र शरीर की सेवा कर रही हैं — जो साक्षात् उस महान सावित्री अम्मन के समान हैं, जिस पत्नी ने मृत्यु के हाथों से अपने पति के प्राण छीन लिए थे। यहाँ आपके समक्ष खड़े होने का साहस किस विपत्ति में है? नहीं, प्रभु। मैं तो केवल 'अभयम्! अभयम्!' चिल्लाया था — मैं शरण माँग रहा था, विपत्ति की चेतावनी नहीं दे रहा था। मैं तो केवल आपके महिमामय चरणों में एक प्रार्थना करना चाहता था, आपकी दया, आपकी करुणा की भिक्षा माँग रहा था। मुझे आश्रय दीजिए, करुणामय महाराज। मैं यहाँ सर्वथा एक आगंतुक हूँ, हमारे एक समय के गौरवशाली वानर वंश का अंतिम पुरुष, एकमात्र जीवित प्रतिनिधि। इतने समय तक आपके पुत्र की सेवा में रहा हूँ, उनका मन प्रसन्न रखा है। अब मैं आपसे निवेदन करता हूँ, प्रभु — मेरी इस प्रार्थना पर किंचित विचार करें। मेरे पूर्वज जिस दिव्य भूमि पर शासन करते थे, उसका कम-से-कम एक छोटा-सा अंश मुझे दान में दें। हे राजधिराज, मैं केवल आपके चरणों में लोटकर प्रार्थना कर सकता हूँ — इस अज्ञानी सेवक को एक वरदान दीजिए। अभयम्, महाराज! यह अनाथ आपके आश्रय की भिक्षा चाहता है!"

अंततः साँस लेने के लिए वंदियादेवन रुका। एक-साथ, भावपूर्ण भाषण के बाद उसकी छाती किंचित हाँफ रही थी। छोटे पऴुवेत्तरायर के सिकुड़े हुए, तल्ख चेहरे से स्पष्ट था कि सेनापति को इस लड़के की वाक्पटुता तनिक भी नहीं भायी थी। किंतु सम्राट का जर्जर मुख एक सच्ची मुस्कान से खिल उठा और रानी की आँखें आनंद से सिकुड़ गयीं।

"ऐसा लगता है कि विद्या की देवी ने इस तरुण पर अपनी दिव्य कृपा बरसाई है, जन्म के दिन ही स्वयं अपने हाथों से इसकी जिह्वा पर कुछ लिख दिया था," साम्राज्ञी ने मुग्ध स्वर में कहा, वह स्वर कोमल और प्रशंसा से भरा था। "यह लड़का सचमुच बात करना जानता है, क्यों?"

अच्छा, जब इतनी दूर आ ही गया है, तो अवसर का लाभ उठाने में क्या दोष? क्यों न भाग्य को थोड़ा और परखा जाए, वंदियादेवन ने सोचा।

"करुणामयी महारानी," उसने अपनी उज्ज्वल आँखें साम्राज्ञी की ओर फेरते हुए कहा। "आपसे निवेदन है, थाये — करुणामयी माँ — मेरी आवश्यकता पर ध्यान दें, सम्राट से मेरे पक्ष में कुछ कहें। मैं अनाथ हूँ, इस संसार में मेरा कोई संबंधी नहीं है। इसीलिए आत्म-सम्मान को ताक पर रखकर मुझे स्वयं अपने विषय में कहना पड़ रहा है। हमने अपने महाकाव्यों में सुंदर कथाएँ सुनी हैं — देवी पार्वती अपने प्रभु शिव पेरुमान से, देवी लक्ष्मी अपने पति तिरुमाल से, भक्तों के लिए निवेदन करती थीं। उसी प्रकार, मैं महारानी से विनती करता हूँ, मेरे लिए कुछ कहें। कृपया मेरे पूर्वजों की भूमि से कम-से-कम दस छोटे गाँव मुझे दे दें — मैं स्वयं को अकल्पनीय रूप से भाग्यशाली समझूँगा!"

लड़के के इस सुसंस्कृत, विनम्र, किंतु सर्वथा निर्लज्ज भाषण से मुग्ध होकर सुंदर चोल अपनी हँसी नहीं रोक पाए।

"मुझे यह तरुण बहुत पसंद आ रहा है, सेनापति," सम्राट ने छोटे पऴुवेत्तरायर की ओर मुड़कर कहा। "और देवी की बात करें, तो मुझे लगता है कि वे इसे अपने तीसरे पुत्र के रूप में गोद लेने पर विचार कर रही हैं! इसकी प्रार्थना — क्यों न स्वीकार ही कर ली जाए? इसमें सचमुच कोई बाधा तो नहीं होनी चाहिए, तुम्हारा क्या विचार है?"

"इसमें मेरा मत कहाँ आता है, यह मैं ठीक से नहीं समझ पा रहा हूँ, प्रभु," सेनापति ने कठोर स्वर में उत्तर दिया। "इस समय तो युवराज आदित्य करिकालन की सहमति-असहमति आवश्यक है, है न?"

"प्रभु, मैंने युवराज से निवेदन किया था, किंतु उन्होंने मुझे पऴुवूर के प्रभुओं से पूछने को कहा," वंदियादेवन ने बीच में एक कुशल मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए बात काटी। "अब यहाँ पहुँचा हूँ, और तंजावुर के सेनापति चाहते हैं कि मैं वापस युवराज के पास ही जाऊँ। मैं तो बिल्कुल बीच में फँस गया हूँ।"

"भयभीत न हो, वत्स। हम दोनों पक्षों की बात सुनने का कोई अवसर अवश्य खोज लेंगे," सम्राट ने मृदु स्वर में आश्वासन दिया। फिर उन्होंने अपनी थकी हुई आँखें सेनापति की ओर फेरीं। "यह छोकरा युवराज की ओर से मेरे लिए एक ओलै — एक ताड़पत्र-संदेश — लाया था, यह तो तुम जानते ही हो। उसमें कुछ नया नहीं था, बस। केवल एक समाचार कि वह कांची में एक स्वर्ण-प्रासाद बनवा रहा है। और उसकी बड़ी इच्छा है कि मैं कुछ दिन जाकर वहाँ रहूँ।"

"आपकी जो इच्छा, वही होगा, प्रभु," छोटे पऴुवेत्तरायर का नपा-तुला उत्तर आया।

"अरे, मेरी जो इच्छा है, वह तुम सब करोगे, यह तो मैं जानता ही हूँ। किंतु मेरे ये पाँव… मेरे ये हास्यास्पद दुर्बल पाँव मेरी इच्छा का साथ नहीं देते। इस समय कांची की यात्रा सर्वथा असंभव है। और बंद पालकी में बैठकर, स्त्रियों की भाँति पर्दे में छिपकर जाऊँगा — यह मैं सोच भी नहीं सकता। यह विचार ही घृणित है। मैं अधिक-से-अधिक आदित्य करिकालन को एक उत्तर भेज सकता हूँ, कह सकता हूँ कि वह यहाँ आ जाए।"

"युवराज को तो इस समय कांची में ही रहना चाहिए, है न?" सेनापति ने सूक्ष्म धार वाले स्वर में दबाव डाला। "उत्तर में हमारे शत्रु अब भी शक्तिशाली हैं, हैं न?"

"उन्हें सँभालने के लिए पार्थिवेंद्रन और मलयमान पर्याप्त से अधिक सक्षम हैं। न जाने क्यों, किंतु मेरे हृदय में कुछ फुसफुसाता है — युवराज को अब मेरे पास रहना चाहिए। और केवल वही नहीं। मैं ईऴम में भी एक संदेश भेजना चाहता हूँ, इलंगो को — अर्थात् युवा राजा अरुलमोऴि वर्मन को — कहना चाहता हूँ कि वह भी घर लौट आए। मुझे दोनों की आवश्यकता है, एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करनी है। इसके अतिरिक्त, सेनापति, जब अरुलमोऴि स्वयं यहाँ उपस्थित होगा, तब तुम्हें भी उसे यह बताने का अवसर मिलेगा कि इलंकै में अन्न भेजने पर तुम्हारा इतना तीव्र विरोध क्यों है।"

"क्षमा करें, प्रभु, किंतु ईऴम में अन्न भेजने पर आपत्ति मेरी नहीं, या धनाधिकारी — अर्थात् कोषाध्यक्ष — की भी नहीं है। यह आपत्ति चोल देश के साधारण लोगों की है। हमारे संसाधनों पर इतना खिंचाव देखकर वे विरोध कर रहे हैं। पिछली फसल ने निराश किया है, प्रभु, अपने ही लोगों को खिलाने के लिए चावल बड़ी मुश्किल से है। ऐसी स्थिति में एक के बाद एक जहाज भरकर अनाज ईऴम भेजना — नागरिकों की दृष्टि में यह एक बहुत बड़ा अपव्यय है। फिलहाल वे अपनी आपत्ति को एक धीमी गड़गड़ाहट तक ही सीमित रखे हुए हैं। किंतु शीघ्र ही वह स्वर क्रोधपूर्ण चीत्कार में बदल जाएगा। कौन जाने, वह चीत्कार शायद आपके प्रासाद की मोटी दीवारों को भेदकर आपके कानों तक भी पहुँच जाए!"

"अरुलमोऴि ऐसा कुछ कभी नहीं करेगा, जिस पर उसकी प्रजा इतनी तीव्रता से आपत्ति कर रही हो," सम्राट ने शांत विश्वास के साथ कहा। "फिर भी, एक बार वह आकर हमसे मिल ले तो बहुत अच्छा होगा। पेरिया पऴुवेत्तरायर — अर्थात् बड़े पऴुवेत्तरायर — के लौटते ही हमें यह तय करना होगा कि इलंकै में एक द्रुतगामी दूत भेजा जाए। वे कब लौटेंगे, कुछ जानते हो?"

"आज रात्रि तक, निश्चित रूप से, प्रभु।"

"तो कल मैं कांची में एक उत्तर भेजूँगा। यही छोकरा उसे ले जाएगा, क्या कहते हो?"

"मेरे विचार में इस कार्य के लिए कोई और अधिक उपयुक्त होगा," छोटे पऴुवेत्तरायर ने सहजता से कहा। "यह लड़का कांची से एक ही साँस में दौड़ता हुआ आया है। कुछ दिन दुर्ग में विश्राम करे तो बेहतर होगा।"

"अद्भुत। तो जब तक युवराज नहीं आ जाते, यह हमारा अतिथि बनकर रहेगा।"

ठीक इसी समय साम्राज्ञी उठ खड़ी हुईं। उनके रेशमी वस्त्रों की सरसराहट ने ही यह संकेत दे दिया कि सम्राट की शक्ति समाप्त हो रही है।

"क्षमा करें, प्रभु," छोटे पऴुवेत्तरायर ने तत्काल सिर झुकाकर क्षमा माँगी। "आज मैंने बहुत अधिक समय तक बात कर ली, महारानी को एक मूक चेतावनी देने पर विवश कर दिया।"

"यह तरुण हमारा सम्मानित अतिथि है, सेनापति। देखिएगा, इसे किसी बात का अभाव न हो," मलयमान की कन्या ने ऐसे स्वर में आदेश दिया कि तर्क की कोई गुंजाइश ही न रहे। "आह, यदि सम्राट केवल स्वस्थ होते, तो यह इसी प्रासाद में रह सकता!"

"निश्चिंत रहें, मैं इसका ध्यान रखूँगा, महारानी," छोटे पऴुवेत्तरायर ने वचन दिया, उनकी आँखों में एक अजीब, स्याह चमक थी। "बहुत अच्छी तरह से इसका ध्यान रखूँगा, बिलकुल।"

और यह कहते-कहते उनका मोटा हाथ लगभग अनजाने में ही उन दर्शनीय मूँछों को छूने के लिए उठ गया — उँगलियाँ एक पल के लिए वहाँ ठहरीं, और फिर धीरे-धीरे मूँछों के सिरों को ऐंठने लगीं।

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