दो सहस्र वर्ष पूर्व, महान चोल नरेश करिकाल पेरुवलत्तन ने कावेरी के दोनों तटों पर बाँध उठाकर उस सरिता को धरती से बाँध दिया था। अनेक वर्षों तक जल अपनी सीमाओं में बँधा रहा, कर्तव्यपरायण हो भूमि को सींचता रहा। पर जैसे नदियों की अपनी ऋतुएँ होती हैं, साम्राज्यों के भी अपने मौसम आते हैं। उस दिव्य चोल-राज्य की दीप्ति धूमिल पड़ गई, उनकी शक्ति ज्वार के समान पीछे हट गई। जो लोग परछाइयों में दुबककर धैर्यपूर्वक ठीक ऐसे ही एक क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे—पांड्य, पल्लव, कलप्पाल और वानर—वे अब सिर उठाकर खड़े हो गए।
और कावेरी, अपने कावलन—राजा, राज्य के रक्षक—को खोकर डगमगाती हुई अपने तटबंध तोड़ने लगी। वह दिशाहीन हो गई, अंधों की भाँति बहने लगी, खेत-खलिहानों को डुबो दिया। वह समतल भूमि पर फैलकर ही शांत न होती। कभी-कभी पोन्नि—इसी प्यार के नाम से नदी पुकारी जाती थी—अपना मार्ग ही पूर्णतः बदल लेती। पुरानी नदी-तल एक नई कावेरी बनकर पुनर्जन्म लेती, और फिर नई कावेरी सूखकर पुरानी तल बन जाती। वह अपना प्रवाह-पथ ऐसा आमूल-चूल बदल देती कि सूखी, धूल-भरी भूमि चमत्कारिक रूप से नानसेई बन जाती—उर्वर, जल-भरी कृषि-भूमि—और उथले गड्ढे जल से भरकर विस्तृत सरोवर बन जाते, जिनकी छोटी-छोटी लहरें लोभियों की तरह नव-प्राप्त तटों से आ टकरातीं।
ऐसा ही एक सुंदर सरोवर पऴैयरै के असंख्य राजकीय आवासों के दक्षिण में था। राजप्रासादों से सटा होने के कारण वह चोल-मुकुट में जड़े एक देदीप्यमान रत्न-सा प्रतीत होता था। उसका जन्म कावेरी के मनमौजी स्वभाव से ही हुआ था, बाद में राजाओं ने उस प्राकृतिक खाड़ी को और गहरा किया, तटों को पीछे धकेलकर यह सुनिश्चित किया कि वह वर्ष-भर शीतल, हरे जल से लबालब रहे। सौंदर्य तो था ही, इसके अतिरिक्त यह सरोवर एक और व्यावहारिक कार्य करता था। वह एक विशाल प्राकृतिक खाई था; उसके किनारे-किनारे पंक्तिबद्ध राजकीय आवासों, विशेषकर अंतःपुरों को, बाहरी लोगों की दृष्टि से ओझल रखता था। नौका के बिना जल पार करने का कोई उपाय न था, और उस नौका-गमन का अधिकार भी गिने-चुने लोगों को ही मिलता था—केवल राजपरिवार के घनिष्ठ, विश्वसनीय जनों को।
इस सुंदर सरोवर के तट पर मनोरम उद्यान-वन, राजकीय विहार-उद्यान थे। यहाँ राजसभा की स्त्रियाँ छायादार पथों पर टहलतीं, किसी के देख लेने के किंचित भी भय के बिना हरियाली के विस्तार का आनंद लेतीं। यहाँ एकांत में आकर वे राजप्रासाद के कठोर आचार-व्यवहार के बंधन उतार फेंकती थीं। मयूरियों की भाँति सहसा आनंदोन्माद में नृत्य कर उठतीं, आम्र-कुंज की कोकिलामों की तरह मुक्त कंठ से गीत छेड़ देतीं। शीतल, गहरे जल में उतरकर तैरतीं, छोटी-छोटी काठ की नौकाएँ खेपतीं, और हँसते-हँसते एक-दूसरे पर जल उछालकर क्रीड़ा में मग्न हो जातीं।
एक पुरानी प्रथा थी—जब कोई राजा मृत्यु का वरण करता और नया शासक सिंहासन पर बैठता, तो नया राजा अपने लिए एक नया प्रासाद बनवाता, और दिवंगत राजा की रानियाँ व संतानें निश्चिंत होकर अपने चिर-परिचित कक्षों में ही रहती थीं। पऴैयरै में रानी सेम्बियन मादेवी की भव्य अट्टालिका के पार्श्व में ही राजकुमारी कुंदवै का राजभवन खड़ा था। आकाश की ओर सिर उठाए खड़ा वह भवन अपने निराले वैभव और अद्भुत पाषाण-नक्काशी से किसी को भी चकित कर देता था। यह तो एक दिन स्वयं सम्राट सुंदर चोल का ही आसन था। अब सम्राट ने तांजावुर में अपना दरबार स्थानांतरित कर लिया था, इसलिए उनकी ओर से उनकी प्रिय पुत्री ही पऴैयरै में सर्वाधिकारिणी होकर शासन कर रही थीं।
इस अंचल में फैले समस्त राजकीय उद्यानों में राजकुमारी कुंदवै का उद्यान ही सर्वाधिक नयनाभिराम था। टेढ़े-मेढ़े पथों के किनारे पंक्तिबद्ध होकर बड़े-बड़े, सघन वटवृक्ष खड़े थे, जिनकी असंख्य मोटी जटाएँ स्तंभों की भाँति धरती पर उतर आई थीं। उनकी छाया में छोटे-छोटे सुघड़ झुरमुटों ने स्थान बना लिया था। मधुर सुगंध वाली लताएँ सूर्य के प्रकाश की खोज में मुड़कर उठते हुए सुदृढ़ वृक्ष-स्तंभों से लिपट गई थीं। पुष्पों से लदी लताओं से पूर्णतः ढँके आरामदायक छोटे-छोटे मचान बैठकर जल-दृश्य देखने के लिए उत्तम कोण प्रदान करते थे। कुंदवै और उनकी सखियों का दल अपनी लंबी सुनहरी संध्याओं का अधिकांश समय इसी उद्यान में व्यतीत करता था। कभी एक बड़े समूह में, राजप्रासाद की चटपटी कहानियों का आदान-प्रदान करते हुए ठहाके लगातीं। कभी दो-तीन के छोटे-छोटे गुटों में बँटकर मंद स्वर में गुप्त बातें साझा करतीं। किंतु आजकल यह परिपाटी-सी बन गई थी कि कुंदवै और कोडुम्बालूर की राजकुमारी वानति केवल दोनों ही उद्यान में चली जाती थीं।
ऐसी ही एक अलसाई अपराह्न में, दोनों एक भव्य वटवृक्ष की गहरी छाया में दिखाई दीं। एक सुदृढ़ डाल से बँधी मोटी जंगली लताओं के झूले पर वे धीरे-धीरे झूल रही थीं। जल के ऊपर से स्त्रियों की खनकती हँसी तैरकर आ रही थी, जो मानो पत्र-छाया में छिपे पक्षियों के आनंदित, मधुर कलरव से होड़ ले रही थी। किंतु दोनों राजकुमारियों के पास हँसने का कोई विशेष कारण न था। चारों ओर तैरती यह कोमल, प्रफुल्लित हँसी उनके मन को छू नहीं रही थी। वे किसी गहन चर्चा में भी डूबी नहीं थीं। एक अनमना-सा भाव दोनों की आँखों और मुख पर था।
निकट ही एक मचान से एक नारी-कंठ का मधुर और स्बच्छ स्वर गान में उठा। आज कान्हा का जन्मदिन था, इसलिए वह उन्हीं का गीत गा रही थी। गीत एक चित्र उकेर रहा था—चंद्रमा अपनी कोमल, दुग्ध-धवल रश्मियाँ पृथ्वी पर ढाल रहा है, कान्हा की वंशी का स्वर उष्ण रात्रि की वायु में तैरकर एक तरुणी के कानों तक पहुँच रहा है। उसका हृदय पूर्णतः उनके चरणों में खो चुका है, और वह अद्भुत स्वर उसे केवल क्षत-विक्षत कर रहा है। मधुर वेदना से विदीर्ण होकर वह अपने गहरे दुःख का गीत गाती है, और ऊपर की डाल पर बैठा एक छोटा, हरा शुक उसे सांत्वना देना चाहता है:
नारी:
कौन है यह निष्ठुर, जो बजा रहा वंशी?
निष्ठुर, ऐसी वेदना-भरी चाँदनी रात में?
अकेली मैं, एक कुमारी, फिर भी संगी-हीन,
निष्ठुर, निष्ठुर, ऐसी उपेक्षा मेरी दशा में!
शुक:
वह अपनी वंशी बजाता है, स्वर उसका इतना निर्मल,
कि धरती और आकाश आनंद में नृत्य करते हैं।
क्यों जलाती हो उसे, हरिणी, बंधन और ताने से?
यह कैसा अद्भुत खेल—बताओ तो, क्या हुआ है?
नारी:
स्वागत, स्वागत, मेरी छोटी-सी कली—
सुंदर पुन्नै पुष्पों से गूँथूँ तेरी माला।
क्या तू ही नहीं आया, जब मेरी आत्मा म्लान थी,
हृदय शीतल करने; प्राण मेरे, शांत करने ज्वाला?
शुक:
सच कहता हूँ, आया हूँ बहुत दूर से, सुंदरी,
प्रेम-उदासीन उस कान्हा की ही बात कहने।
दुःख में डूबा है वह, जबसे तूने उसे छोड़ा,
खट्टा हो गया मीठा नवनीत, जबसे प्रेम जागा चित्त में!
अंतिम स्वर के पत्तों में विलीन होते ही राजकुमारी कुंदवै ने बनावटी निराशा में सिर हिलाया। "हमारे इस अद्भुत तमिल देश के भाग्य में भी क्या खूब देवता आए हैं," उन्होंने शुष्क स्वर में टिप्पणी की। "वंशी बजाते हैं, हाँडी-की-हाँडी माखन चट कर जाते हैं, और सारा समय गोपियों के संग धमाचौकड़ी मचाने में बिताते हैं! तो फिर, काम का काम भला कैसे होगा, बताओ तो?"
झूले के दूसरी ओर से कोई उत्तर नहीं आया। कुंदवै ने अपनी संगिनी की ओर मुड़कर देखा।
"क्या हुआ, वानति? इतनी गहरी चुप्पी क्यों? कान्हा की सुंदर वंशी ने तुम्हें भी मूक कर दिया क्या?"
"अक्का?" वानति ने आँखें मिचमिचाईं और धीरे-धीरे अपनी विचार-तंद्रा से जागी, बड़ी बहन के लिए नियत स्नेहिल संबोधन का उपयोग करते हुए। "क्या आप मुझसे कुछ कह रही थीं? क्या पूछा आपने?"
"मैं क्या—हे भगवान, ओ लड़की, तुम्हारी बुद्धि-शुद्धि कहाँ भिक्षा माँगने चली गई?"
"कहीं नहीं, अक्का। वह तो यहीं थी, आपके पास ही।"
"अरे दुष्ट कहीं की! मेरे साथ चालाकी कर रही हो, क्यों? तुम्हारा मन इस उद्यान में है ही नहीं, मेरी बच्ची। बताऊँ, ठीक कहाँ है वह?"
"जब आप इतनी निश्चित हैं, तो बता क्यों नहीं देतीं?"
"और होऊँ भी क्यों नहीं? वह बहुत दूर, इलंकै के युद्ध-क्षेत्र में है। मेरे छोटे भाई के चारों ओर मँडरा रहा है, उस भोले-भाले लड़के अरुलमोऴि वर्मन के चारों ओर, और यह ताना-बाना बुन रहा है कि उसे अपने जादू के जाल में कैसे फँसाया जाए।"
"आधा सच कहा आपने, अक्का," वानति ने नरम स्वर में कहा। "मेरा मन प्रायः इलंकै भाग जाता है, यह मैं मानती हूँ। पर उन्हें जादू के जाल में फँसाने के लिए नहीं। मैं तो बस यही सोचती हूँ कि युद्ध कितना भयंकर होगा। उनका जीवन-यापन कितना कष्टकर होगा, और—आह, कितनी पीड़ा उन्हें सहनी पड़ती होगी! उनके बेचारे शरीर पर कितने घाव हो गए होंगे। कहाँ, कैसे वह खाते-सोते होंगे? बस यही सब सोचती हूँ। युद्ध में उनके सारे कष्टों के इर्द-गिर्द मेरा मन निरंतर चक्कर काटता है, और मैं यहाँ नरम रेशमी गद्दों पर लेटी हूँ, चाँदी की थालियों में अच्छे-अच्छे व्यंजन खा रही हूँ, सोने से लदी हुई हूँ! मैं इसे लगभग सह ही नहीं पाती, अक्का। मेरे यदि पंख होते, तो मैं इसी क्षण समुद्र पार कर इलंकै उड़ जाती!"
"और जाकर क्या करतीं? उनके लिए और अधिक कष्ट का कारण बनतीं, यही तो?"
"कदापि नहीं। मैं हमारे महाकाव्यों की उन महिमामयी नारियों जैसा करती, सुभद्रा और सत्यभामा की तरह। जैसे उन्होंने अपने पति का रथ चलाया था, मैं भी उनका रथ हाँकती। और जब शत्रु उनकी ओर विश्वासघाती तीर चलाते, मैं बीच में आकर खड़ी हो जाती और उन्हें अपनी छाती पर झेल लेती—"
"और यह सारा साहस-कृत्य वह आराम से खड़े-खड़े देखते रहते, यही न?"
"अच्छा… यदि यह सब उन्हें ठीक न लगता, तो मैं शिविर में ही उनके लौटने की प्रतीक्षा करती। मैं उनके थके-हारे घावों पर प्राणदायी मरहम और शीतल लेप लगाती। उनके विश्राम के लिए नरम शय्या बिछाती, उनकी जिह्वा में रुचि जगाने के लिए यथासंभव सर्वोत्तम भोजन बनाती। उनके शरीर की पीड़ा हरने को वीणा बजाती, अपने सुरों में गीत गाकर उन्हें सुला देती…"
"यह सब कभी नहीं होने वाला, वानति," कुंदवै ने कोमल किंतु दृढ़ स्वर में कहा। "उससे बेहतर है कि सत्य को स्वीकार कर लो। चोल पुरुष अपनी स्त्रियों को कभी युद्ध-क्षेत्र में साथ नहीं ले जाते। कभी नहीं।"
"पर क्यों नहीं, अक्का?"
"क्योंकि, मेरी बच्ची, तलवारों या घावों से कहीं अधिक वे हमारी स्त्रियों से डरते हैं!"
"पर क्यों? हम स्त्रियाँ उनका क्या ही कर सकती हैं?"
"उनका तो कुछ नहीं, यह ठीक है। पर सोचकर देखो, यदि हमारे भयंकर शत्रु तुम्हारा यह अद्भुत रूप देखकर अस्त्र-शस्त्र फेंक दें और तुम्हारे चरणों में गिरकर दल-के-दल आत्मसमर्पण कर दें? तब तो हमारे पुरुषों को अपनी वीरता दिखाने का एक अवसर भी नहीं मिलेगा। चोल कभी ऐसे वंश के रूप में नहीं जाने जाना चाहेंगे, जो अपनी स्त्रियों से अपने युद्ध जितवाता हो।"
वानति हँस पड़ी। "क्या ऐसा सचमुच होता है, अक्का? सच कह रही हैं? क्या शत्रु इतने मूर्ख होते हैं कि एक सुंदर स्त्री को देखते ही आत्मसमर्पण कर देंगे?"
"क्यों नहीं, बताओ तो? वानति, मेरी बच्ची—याद है उस तरुण योद्धा की बात, जिसे हमने कुदंदै के ज्योतिषी के घर पर देखा था, और बाद में अरिसिलारु के तट पर?"
"हाँ। उसका क्या?"
"याद है, कैसे वह द्वार की चौखट पर खड़ा था? देखकर लगता था मानो नशे में धुत हो, हमें देखते ही एकदम जड़ हो गया था?"
"याद है बिलकुल। पर 'हमें' देखकर उसके उस धुत-होने पर मुझे थोड़ा मतभेद है, अक्का। यदि स्मृति धोखा न दे रही हो, तो वह आपका ही अद्भुत मुख था, जिसने उसे ऐसा विभोर कर दिया था। हम बाकी लोगों की ओर तो उसने मुड़कर देखा भी नहीं था लगभग।"
कुंदवै मंद-मंद मुस्कुराईं। "तुम तो बड़ी अच्छी कहानियाँ गढ़ने लगी हो, वानति। यह मुझ पर कोई उपहास तो नहीं?"
"नहीं, कदापि नहीं। पर अक्का—मैं आपसे एक बात पूछूँगी। सच-सच उत्तर देंगी, वचन दीजिए तो?"
"पहले तुम्हारा यह अद्भुत प्रश्न सुन तो लूँ, क्यों?"
"अभी-अभी आप उस तरुण योद्धा के विषय में क्यों सोच रही थीं?"
"अरे पगली लड़की! और सोचूँ भी क्यों नहीं, भला?"
"सोचिए न, जितनी इच्छा हो। मैंने तो इस पर आपको कभी दोष नहीं दिया, दिया है क्या? सच कहूँ तो, आप सोचेंगी—यही तो स्वाभाविक है। मैं स्वयं भी उनके विषय में चिंतित थी। उनका क्या हुआ, यह सोचकर।"
"तुम थीं? इसमें तुम्हारी चिंता की क्या बात हुई भला?"
"क्यों नहीं? किसी सुंदर व्यक्ति से एक बार भेंट हो जाए, तो उसे लेकर मन में ऊहापोह तो चलता ही है। उसका क्या हुआ, यह सोचना क्या बिलकुल अस्वाभाविक है?"
"इसमें स्वाभाविकता का लेशमात्र भी नहीं है। और हमें अपनी बुद्धि-शुद्धि को ऐसे अनियंत्रित होकर भटकने भी नहीं देना चाहिए। मन पर लगाम कसकर रखनी होगी—सुनो, वानति! वह देखो, परै बज रही है!"
दूर एक घोषणा-ढोल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, धूल-भरे पथ पर उसकी प्रतिध्वनि गूँज रही थी।
"क्या कह रहा है यह रव?" साँस रोककर फुसफुसाईं कुंदवै। "ध्यान से सुनो तो?"
सचमुच, नगर में एक भारी परै पीटा जा रहा था, और बीच-बीच में एक उद्घोषक का प्रबल, लयबद्ध स्वर उसमें घुल-मिल जाता था। हवा का रुख बदलते ही शब्द उद्यान की चहारदीवारी लाँघकर स्पष्ट सुनाई देने लगे:
ढम! ढम! ढम्-ढम्!
"एक शत्रु-पक्ष का गुप्तचर जाली मुहर वाली अँगूठी लेकर तांजावुर के दुर्ग में घुस आया था! वह राज-गुप्त भेद जानकर भाग निकला है! भागने के हताश प्रयास में उस गुप्तचर ने दो लोगों को गंभीर रूप से घायल भी किया है! एक तरुण, बलिष्ठ गठन का, छलिया असुर इंद्रजीत के समान ही जिसकी बुद्धि और धूर्त कौशल है! उसका नाम वल्लभरायन वंदियादेवन है! जो उसे आश्रय देगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा! जो उसे पकड़कर अधिकारियों के हवाले करेगा, उसे एक सहस्र स्वर्ण-मुद्राओं का पुरस्कार मिलेगा! तांजावुर दुर्ग के सेनापति पऴुवेत्तरायर कलंतक कंतर के परम अधिकार के आदेश से यह घोषणा जारी की जाती है!"
परै फिर पीटा गया, उसकी भारी ध्वनि उष्ण वायु में काँप-काँप उठी।
कुंदवै का छरहरा शरीर काँप उठा; अपराह्न की गर्मी के बावजूद एक अकस्मात् शीतल लहर उनके भीतर दौड़ गई।
"देवी?" एक परिचारिका हाँफती हुई उद्यान के पथ पर दौड़कर आई। "आऴ्वारक्काडियान नंबि नामक एक वैष्णव आपसे भेंट करना चाहते हैं। अति आवश्यक कार्य है, ऐसा वे कह रहे हैं।"
कुंदवै ने अपने रेशमी वस्त्र सँभाले और स्वर को स्थिर किया। "मैं अभी आती हूँ।" वह लता के झूले से उतर पड़ीं और उसे वटवृक्ष के नीचे धीरे-धीरे झूलता हुआ छोड़कर, द्रुत गति से राजप्रासाद की ओर चली गईं।
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