वंदियादेवन की पहली सहज वृत्ति तो यही हुई कि वह कंदमारन को बचाने के लिए दौड़ पड़े। किंतु मस्तिष्क के भीतर से एक ठंडी, यथार्थवादी आवाज़ ने चेताया — ऐसा करने से वह केवल अपने प्रिय मित्र की नियति का ही भागीदार बनेगा, और कुछ नहीं। पहले पहली बाधा दूर करनी होगी — उस दुष्ट प्रहरी से निपटना होगा। फुर्ती से एक ही छलाँग में आगे बढ़कर उसने उस प्रहरी की मोटी गरदन को अपनी बाँहों के पाश में जकड़ लिया। अपने दूसरे हाथ से उसने प्रहरी की मशाल पर झपट्टा मारकर उसे नीचे गिरा दिया। मशाल ठनठनाकर धरती पर गिरी और लुढ़कने लगी, धुआँ उठने लगा, और उसकी पीली लौ धीरे-धीरे क्षीण होकर एक मंद आभा में विलीन हो गई। अपनी पकड़ और कसते हुए, शरीर की सारी शक्ति बटोरकर वंदियादेवन ने एक प्रचंड झोंका दिया। प्रहरी लड़खड़ाया, उसके पाँव उखड़ गए, और वह सिर के बल सीधा गुप्त सुरंग की पथरीली दीवार से जा टकराया। वह भूमि पर ढेर हो गया, एकदम निश्चल, मानो मृत हो। वल्लभरायन सतर्कता से उस पड़े हुए व्यक्ति के पास गया। जब उसने देखा कि प्रहरी सचमुच अचेत है, तब बुद्धिमानी दिखाते हुए उसने सावधानीवश अपने अंगवस्त्र से — कंधे पर लटकते लंबे वस्त्र से — उसके दोनों हाथ बाँध दिए।
एक क्षण के लिए संकट टलते ही वंदियादेवन तेज़ी से कंदमारन के पास पहुँचा। उसने देखा कि उसका मित्र एक विचित्र, असुविधाजनक मुद्रा में पड़ा है — आधा शरीर गुप्त सुरंग के भीतर, और शेष बाहर रात्रि की वायु में। वह विश्वासघाती छुरा अभी भी उसकी पीठ में धँसा हुआ बाहर निकला था, और उसका भारी भाला कुछ दूर धूल में लावारिस पड़ा था। वल्लभरायन ने बाहर क़दम रखा, और धीरे से कंदमारन को पकड़कर खींचते हुए सुरंग के मुँह से पूरी तरह हटा लिया। वह भाला उठाने के लिए पीछे मुड़ा, और ठीक उसी क्षण गुप्त द्वार एक मंद, किंतु निर्णायक ध्वनि के साथ बंद हो गया। विशाल दुर्ग-प्राचीर अब मूक, निर्विकार, गहन छाया में डूबी थी — अपनी प्राचीन गुप्त कथाओं को जिज्ञासु नयनों से छिपाए अडिग खड़ी थी। अकस्मात् चली एक शीतल, तीव्र वायु उसे जैसे उड़ा ले जाना चाहती थी, और उसी हवा ने वंदियादेवन को एक सुखद समाचार भी दिया — कि अंततः वह उस विशाल दुर्ग से बाहर आ गया था। क्षितिज पर विशाल वृक्ष सिर उठाए खड़े थे; उनसे भी ऊँची केवल विशाल प्राचीरें और बुर्ज ही आकाश में उठ रहे थे। चाँदनी बहुत थोड़ी थी — जैसे घने अंधकार को भेदने में उसे बल लगाना पड़ रहा हो।
एक ‘हूँ’ के साथ उसने कंदमारन को कंधे पर लाद लिया, भाला भी उठा लिया, और सावधानी से एक क़दम आगे बढ़ाया। तुरंत ही उसके पाँवों के नीचे से जैसे धरती खिसक गई। वह अकस्मात् एक ढहती हुई ढलान पर फँसकर अंधकार में नीचे की ओर लुढ़कने लगा। उसने हताशा में भाले का कुंद सिरा नरम मिट्टी में गाड़ दिया, और बड़ी चेष्टा के पश्चात् अपने फिसलाव को रोका। एक गहरी साँस लेकर, गरदन बढ़ाकर उसने नीचे के अंधकार में झाँका। ऊँचे वृक्षों और सुउच्च बुर्जों की घनी छाया के बीच से उसे प्रवाहित जल की झिलमिलाहट दिखाई दी। मंद प्रकाश में भी दिख रहा था कि वह जल कितने भयानक वेग से चक्कर काटता हुआ बह रहा था। सौभाग्य था कि उसने एक और असावधान क़दम नहीं उठाया — अन्यथा वह सीधा कलाबाज़ी खाता हुआ उस विपत्ति में जा पड़ता! ईश्वर की निश्चय ही उस पर दृष्टि थी। और उस विश्वासघाती प्रहरी के विषय में अब सोचकर क्या लाभ? वह निस्संदेह अपने स्वामी के भयंकर आदेश का पालन कर रहा था — कडम्बूर के युवा राजकुमार की पीठ में छुरा घोंपकर, प्रमाण मिटाने के लिए उसके शरीर को इस वेगवती बाढ़ में फेंक देना। यदि वंदियादेवन के पाँव इतने मज़बूत न होते, तो अब तक वे दोनों अंधकारमयी नदी के गर्भ में लुढ़क गए होते। और यदि वल्लभरायन किसी प्रकार स्वयं को खींचकर निकाल भी लेता, तो बेचारे कंदमारन को निश्चित ही जल-समाधि मिल जाती।
वानर वंश के इस युवा वंशज ने बदवारु नदी की कथाएँ सुनी थीं — जो नदी तंजावुर दुर्ग की प्राचीर के समीप किसी स्थान पर बहती है। अच्छा, यह निश्चय ही वही नदी है। अभी नदी में पूरी बाढ़ आनी शेष होगी, किंतु प्राचीर के इतने निकट वह सहज ही छद्मपूर्ण ढंग से गहरी हो सकती है। कौन कह सकता है? वंदियादेवन ने गहराई मापने के लिए भाले का लंबा दंड उस वेगवान जल में डुबोया। उसके आतंक को और बढ़ाते हुए, भाला एक बार भी कीचड़-भरी तलहटी को छुए बिना पूरा डूब गया। आह, ये अभागे, रक्तपिपासु दुष्ट! किंतु इस फिसलते तट पर खड़े होकर उन विश्वासघाती मूर्खों को कोसकर समय नष्ट करने की उसकी स्थिति नहीं थी। उसे और कंदमारन को यहाँ से हटना होगा, और वह भी शीघ्र। मित्र का भार कंधे पर थोड़ा-सा सरकाकर, और दूसरे हाथ में भाला कसकर थामे हुए वंदियादेवन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। वह इस फिसलती, खड़ी ढलान पर अपना संतुलन खोए बिना, यथासंभव सतर्कता से आगे बढ़ता रहा। बीच-बीच में घायल मित्र के मुँह से एक हल्की कराह या वेदना-भरी ध्वनि निकल रही थी, जो सच कहें तो, वंदियादेवन के लिए प्राण का एक आश्वस्तिकारक चिह्न ही प्रतीत हो रही थी।
दाँतों- तले दाँत भींचे, इस परिश्रम के कष्ट को सहते हुए वह अंधकार में तब तक आगे बढ़ता रहा, जब तक कि दुर्ग की विशाल पाषाण-प्राचीर अंततः रात्रि में पीछे न छूटने लगी। अब तट के किनारे-किनारे एक जंगली झाड़ सघन होता जा रहा था। पाँवों के नीचे काँटे बिछे थे, जो वस्त्रों में उलझकर यात्रा को अत्यंत असह्य बना रहे थे। किंतु फिर, सामने दृष्टि गड़ाने पर उसे कुछ दिखाई दिया — एक विशाल वृक्ष, जो ठीक नदी के आर-पार पड़ा था! किसी समय वह निश्चय ही एक राजकीय दैत्य रहा होगा, किंतु वेगवान जल ने उसकी जड़ों से मिट्टी धोकर उसे झुका दिया था। वह नदी की चौड़ाई का लगभग आधा भाग घेरे हुए लेटा था।
वंदियादेवन उस मोटी, खुरदरी छाल पर चढ़कर उसके तने के सहारे लड़खड़ाता हुआ आगे बढ़ा। यह कार्य सरल नहीं था — उस तने पर संतुलन साधना, जो तीव्र प्रवाह में रह-रहकर डोल और काँप रहा था। उसकी पत्तों-भरी शाखाएँ घूर्णित जल में असहाय-सी छटपटा रही थीं, और रात्रि की वायु कानों के पास गर्जना कर रही थी। उस गिरे हुए दैत्य के अंतिम छोर पर पहुँचकर उसने पुनः भाला अंधकारमय जल में धँसाया। पहाड़ों के युद्ध-देवता, भगवान मुरुगन की कृपा! यहाँ नदी उतनी गहरी नहीं थी।
उस डोलते वृक्ष से उतरकर वह स्वयं नदी में उतर गया। सावधानी से क़दम रखते हुए, कीचड़-भरी तलहटी के छिपे गड्ढों और टीलों को टटोल-टटोलकर मार्ग खोजते हुए, वह केवल अपनी इच्छाशक्ति के बल पर प्रचंड बाढ़ और कठोर वायु से जूझता रहा। कभी-कभी इस भारी बोझ के दबाव में उसका काँपता शरीर असहाय-सा सिहर उठता, और एक भयंकर क्षण के लिए उसे लगता कि कंदमारन बस उसके हाथों से फिसलकर काली नदी में विलीन हो जाएगा। तथापि, समस्त विपत्तियों का सामना करते हुए वंदियादेवन अंततः दूसरे तट पर रेंगकर चढ़ आया।
कमर तक भीगे वस्त्रों में काँपता हुआ वह कुछ और देर कीचड़-भरे तट पर लड़खड़ाता हुआ चला। कंदमारन जैसे एक दीर्घकाय, भारी शरीर वाले युवक को इतनी दूर तक ढोकर लाना कोई साधारण बात नहीं थी। कुछ ही देर में घने वृक्षों की झाड़ियाँ एक छोटे, निस्तब्ध खुले स्थान में समाप्त हुईं, और वंदियादेवन ने कृतज्ञता-भरे मन से विराम लिया। धीरे-धीरे हाँफते हुए उसने अपना बहुमूल्य बोझ नम घास पर लिटा दिया। पहले तो उसे केवल थोड़ी साँस लेने की आवश्यकता थी, किंतु साथ ही वह यह जानने के लिए भी व्यग्र था कि मित्र के शरीर में अभी प्राण शेष हैं भी या नहीं। अंततः, एक शव को जंगल में घसीटने से क्या लाभ? उससे तो अच्छा था कि वह उस अभागे प्रहरी का ही मार्ग अपनाकर उसे नदी में बहा देता।
किंतु नहीं, कंदमारन अभी जीवित था। कष्टभरी, हाँफती साँसों से उसकी छाती उठ-गिर रही थी, और कलाई के पास एक उथल-पुथल-भरी, तीव्र नाड़ी आश्वस्तिकारक ढंग से धड़क रही थी। यहाँ तक तो ठीक था। पर अब क्या किया जाए? छुरा खींचकर निकालने के विषय में तो सोचा भी नहीं जा सकता; निश्चित ही रक्त का स्रोत फूट पड़ेगा और बेचारे को तत्काल मार डालेगा। नहीं, कंदमारन को इस समय आवश्यकता थी, और वह भी अविलंब, उचित औषधि की। उसके इस घातक घाव का उपचार किसी वैद्य के निपुण हाथों से होना था — और क्या यह सब अंधकार में एक अकेले घुमंतू योद्धा के लिए संभव था?
वंदियादेवन को सहायता की आवश्यकता थी। किंतु इस अर्द्धरात्रि में वह इस संसार में किससे कहे? ठहरो… उसे सेनदन अमुदन का स्मरण हो आया! उस कोमल-हृदय पुष्प-विक्रेता का घर और उद्यान तो ठीक इसी बदवारु नदी के तट पर ही था, है न? निश्चय ही कहीं निकट ही होगा। यदि वंदियादेवन किसी प्रकार उन दोनों को अमुदन की साधारण-सी कुटिया तक खींच ले जा सका, तो संभव है कंदमारन को संघर्ष करके जीवित रहने का एक अवसर मिल जाए। इसके अतिरिक्त, उसके पास खोने को था ही क्या? एक भारी दीर्घश्बास भरकर वंदियादेवन मित्र पर झुका, ताकि उसे पुनः अपने पीड़ाग्रस्त कंधों पर उठा सके। किंतु वह ठिठक गया। कंदमारन की आँखें खुली थीं।
“अरे कंदमारा! तुम्हें चेतना आ गई!” वंदियादेवन के मुख पर आनंद और नितांत विस्मय फैल गया। “मुझे पहचान रहे हो?”
“खूब पहचानता हूँ,” एक दुर्बल, किंतु आश्चर्यजनक रूप से कटु फुसफुसाहट उभरी। “तुम वल्लभरायन हो, इसमें क्या संदेह। ऐसे अद्भुत मित्र को कोई कैसे भूल सकता है? तुम तो उन्हीं में से हो न, जो पीठ में छुरा घोंपते हैं?”
“अय्यो!” पीड़ा का यह उद्गार वंदियादेवन के होठों से फिसल गया, और वे कटु शब्द एक निष्ठुर चाबुक की भाँति उस पर पड़े। “किंतु मैं वह व्यक्ति नहीं हूँ, जिसने—” वह सहसा रुक गया, शब्द उसके गले में अटक गए, जैसे किसी आकस्मिक विचार ने उसे चौंका दिया हो।
“निश्चय ही नहीं हो,” कंदमारन ने खनखनाती आवाज़ में कहा, उसके स्वर से थका हुआ व्यंग्य टपक रहा था। “तुम्हारा छुरा तो बस पंख की भाँति मुझे सहला गया, दुष्ट! तुम ही एकमात्र कारण हो, जिसके लिए मैं पहले उस अंधकारमयी गुप्त सुरंग में उतरा था। मैं चाहता था कि बड़े पऴुवेत्तरायर के लोग तुम्हें पकड़ें, उससे पहले ही मैं तुम तक पहुँच जाऊँ। चाहता था कि कोई और तुम्हें पकड़कर यातना न दे सके। मैंने स्वयं से प्रतिज्ञा की थी कि किसी प्रकार तुम्हें ढूँढ़कर छोटे पऴुवेत्तरायर की दुर्ग-रक्षक सेना में भर्ती करा दूँगा, जहाँ तुम सुरक्षित रहोगे। और यह तुम — उसी मित्र के साथ विश्वासघात कर रहे हो, जो केवल तुम्हारी सहायता करना चाहता था! क्या यही सच्चे मित्र का चिह्न है? भूल गए वे दिन, जब हमने हाथ में हाथ लेकर शपथ ली थी कि एक-दूसरे की रक्षा करेंगे? और अब तुम… तुमने सब समाप्त कर दिया! आह, मैं कितनी आतुरता से तुम्हें बताना चाहता था — कि इस चोल साम्राज्य में कैसे अविश्वसनीय परिवर्तन की लहर आने वाली है। कितना चाहता था तुम्हें सचेत करना… किंतु अब मैं किसी पर विश्वास कैसे करूँ?” एक क्षीण कराह के साथ कंदमारन ने आँखें मूँद लीं, और पुनः चेतना के करुणामय अंधकार में डूब गया। उन शीघ्रता-भरे, क्रुद्ध शब्दों को कहने के प्रयास ने ही उसकी शेष बची अल्प शक्ति को पूर्णतः समाप्त कर दिया था।
“अरे, इस जगत में विश्वास करने योग्य भले लोगों का अभाव नहीं है,” वंदियादेवन उस अचेत युवक के प्रति बुदबुदाया। “और इस पृथ्वी पर कौन बुद्धिमान व्यक्ति पऴुवेत्तरायरों पर विश्वास करेगा, भला?”
तथापि, अपने सारे दंभ के पीछे, उसकी आँखों के कोनों में जलन के साथ गर्म अश्रु उमड़ आए। उसने क्रोध से आँखें झपकाकर उन्हें पोंछ डाला, और सोचा कि अंततः उसने मौन रहकर बुद्धिमानी का ही कार्य किया है। स्वयं को सँभालकर उसने कंदमारन को पुनः अपने थके हुए कंधों पर उठाया और आगे चल पड़ा।
कुछ ही देर में निस्तब्ध वायु में रात्रि में खिलने वाले पुष्पों की भारी, मधुर सुगंध उसे घेरने लगी। सेनदन अमुदन का घर निकट ही है — उसका यह अनुमान ठीक था। कुछ ही क्षणों में वह नंदनवन में — पुष्पों के उस उद्यान में — ठोकर खाकर घुस गया, किंतु आह, उसके प्रथम आगमन और इस बार के आगमन में कितना हृदय-विदारक अंतर था!
अब वह सुंदरता से सजाया गया उद्यान ठीक लंका के उस प्राचीन अशोक-वन जैसा दिख रहा था, जहाँ हनुमान ने अपने दिव्य क्रोध में तांडव मचाया था। यह एक चरम विध्वंस का दृश्य था, ठीक वैसा ही जैसा रामायण के नटखट वानर-कुल ने उस अनुपम मधुवन — उस किंवदंतियों के मधु-उद्यान — को तहस-नहस कर दिया था। दिन के प्रकाश की भाँति स्पष्ट था कि बड़े पऴुवेत्तरायर के कर्त्तव्यपरायण सैनिकों ने उसे खोजते-खोजते इस शांत स्थान पर भी धावा बोला था, और अपनी चिर-परिचित शैली में सर्वत्र विनाश का ढेर लगाकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर गए थे। यह सोचकर वंदियादेवन का हृदय टूट गया कि सेनदन अमुदन और उसकी प्रिय माँ ने इस अद्भुत, उर्वर छोटे से उद्यान को गढ़ने में कितने असंख्य घंटे कितनी ममतामयी देखभाल की होगी। अब सब कुछ ध्वस्त, भग्नावशेष था।
सहसा उस युवा योद्धा को अपनी डाँवाडोल स्थिति का स्मरण हो आया, और चूर्णित पुष्पों के प्रति उसकी समस्त कोमल सहानुभूति लुप्त हो गई। यदि वे अभागे गुप्तचर और प्रहरी अभी भी छाया में दुबके हुए हों? अच्छा, तो फिर उनसे निपटने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। उसने अंधकार में टोह ली, और जब देखा कि उसका विश्वसनीय घोड़ा अभी भी एक मज़बूत वृक्ष से बँधा सुरक्षित खड़ा है, तो उसने मौन कृतज्ञता की प्रार्थना की। किंतु ठहरो… कहीं घोड़े को वहाँ छोड़ जाना ही एक जाल तो नहीं? ख़ैर, कुछ किया नहीं जा सकता — इन अद्भुत मनुष्यों के हाथों में कंदमारन को सौंपकर अपने घोड़े पर बैठकर उड़न-छू हो जाने के अतिरिक्त अब कोई मार्ग नहीं है। ईश्वर की इच्छा हुई, तो पझैय़ारै पहुँचने तक वह नहीं रुकेगा।
वंदियादेवन उस ध्वस्त उद्यान को पार कर दबे पाँव उस छोटी-सी फूस की कुटिया की ओर बढ़ा। द्वार के पास झुककर उसने सेनदन अमुदन को धीरे से झकझोरा — जो उस समय थिण्णै पर अचेत सो रहा था, बैठने के लिए प्रयुक्त उस ऊँचे, मिट्टी के बरामदे पर।
युवक चौंककर हड़बड़ाकर जाग उठा, किंतु इससे पहले कि वह कोई चीत्कार करता, योद्धा ने एक दृढ़, तीव्र हाथ उसके मुख पर रख दिया।
“एकमात्र तुम ही मेरी सहायता कर सकते हो, तंबि,” उसने अंधकार में अत्यावश्यक स्वर में फुसफुसाया। “मैं भयंकर संकट में हूँ। यह मेरा प्रिय मित्र कंदमारन है, कडम्बूर के अधिपति शंबुवरायर का पुत्र। किसी ने इसे छुरा मार दिया है। निकलते हुए देखा, तो साथ ले आया।”
सेनदन अमुदन ने धीरे से योद्धा का हाथ हटा दिया। “अरे, ये दुष्ट!” वह कोमल स्वर में बोला। “इसे भी पीठ में ही छुरा मारा है, वीर योद्धाओं ने!” वह क्षण-भर रुककर सोचने लगा। “मैं जितनी हो सकेगी, इसकी देखभाल करूँगा। तुम्हें खोजने के लिए सैनिकों के कुछ दल यहाँ आए थे, उन्होंने हमारा सुंदर उद्यान एकदम तहस-नहस कर दिया है — देखो, लगभग कुछ भी शेष नहीं है। ख़ैर; यदि तुम बचकर निकल सको, तो और कुछ महत्त्व नहीं रखता। सौभाग्य है कि उन्होंने तुम्हारे घोड़े को हाथ नहीं लगाया — अब उस पर चढ़कर चले जाओ!”
“मेरा भी यही विचार है, तंबि,” वंदियादेवन ने कहा। “किंतु मेरे मित्र के प्राण बचाने के लिए कुछ तो करना चाहिए, है न?”
“उसकी चिंता मत करो; मेरी माँ औषधि-शास्त्र भली-भाँति जानती हैं। ऐसे घाव सँभालने में उनका हाथ सधा हुआ है।”
और यह कहकर सेनदन अमुदन मुड़ा और भारी काठ के द्वार पर धीरे-धीरे दो बार थपकी दी। वह तुरंत खुल गया, और उसकी प्यारी, मूक माँ द्वार की चौखट पर आ खड़ी हुईं। दोनों युवकों ने कंदमारन को धीरे-धीरे घर के भीतर ले जाकर, सावधानी से कूडम में — घर के मध्य के उस खुले बड़े कक्ष में — लिटा दिया।
हाथ में लिए एक तेल के दीपक के मंद प्रकाश में सेनदन अमुदन ने अपनी माँ को एक के बाद एक कई तीव्र हस्त-संकेत किए। ऐसा लगा मानो माँ सब कुछ पूर्णतः समझ गईं। उन्होंने कंदमारन के पीले मुख की ओर तीक्ष्ण दृष्टि से देखा, एक बार पीठ में धँसे उस वीभत्स छुरे पर दृष्टि डाली, और तेज़ी से बाहर चली गईं। क्षण-भर में ही वह कुछ स्वच्छ चिथड़ों और कुछ तीक्ष्ण गंध वाली औषधीय वनस्पतियों के साथ लौटीं। फिर दोनों की ओर एक अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा।
सेनदन अमुदन ने कडम्बूर के राजकुमार को मज़बूती से पकड़ लिया। एक स्थिर साँस लेकर वंदियादेवन ने स्वयं को सँभाला, और मित्र की पीठ में धँसे छुरे पर एक दृढ़ हाथ रखकर उसे खींच निकाला।
घाव से रक्त का फव्वारा छूट पड़ा।
“ओः!” गहरी मूर्च्छा में भी कंदमारन तीव्र वेदना से चीख उठा। वंदियादेवन ने तेज़ी से उसका मुख दबाकर ध्वनि को रोक दिया, और सेनदन अमुदन ने अपनी पूरी शक्ति से रक्त बहते घाव पर दबाव डाला।
मौन निपुणता से कार्य करते हुए अमुदन की माँ ने ताज़ी औषधियों से उस गहरे घाव का उपचार किया। कंदमारन पुनः करुण ढंग से कराह उठा।
ठीक तभी दूर भारी क़दमों की धमक प्रतिध्वनित हुई — कुछ लोग कुटिया की ओर दौड़े आ रहे थे।
“जाओ — अभी!” अमुदन ने चेतावनी दी, उसके स्वर में तनाव था। “शीघ्र!”
वंदियादेवन ने अपना भाला और रक्त-सना छुरा उठाया, फिर द्वार पर आकर ठिठका। “तंबि — तुम मुझ पर विश्वास करते हो?”
“मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ,” अमुदन ने एक मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया। “और तुम भी मुझे प्रिय हो। किंतु — यह क्यों पूछ रहे हो?”
“क्योंकि मुझे तुम्हारी सहायता की पुनः आवश्यकता है। देखो, मैं इस क्षेत्र में नया हूँ, मार्ग ठीक से नहीं जानता। मैं अभी पझैय़ारै पहुँचना चाहता हूँ, कुंदवै देवी के पास एक संदेश पहुँचाने। क्या तुम मुझे थोड़ा मार्ग दिखा सकते हो?”
तुरंत ही सेनदन अमुदन अपनी माँ की ओर मुड़ा और कुछ संकेत किया, जिसके उत्तर में माँ ने दृढ़ता से सिर हिलाकर अपनी सहमति दी। ऐसा लगा कि वह साहसी महिला रात्रि की इस नाटकीय घटना से विशेष विचलित नहीं हुई थी। इसके विपरीत, उसने पुत्र को संकेत से बताया कि वह घायल व्यक्ति की भी भली-भाँति देखभाल करेगी।
वे एक साथ बाहर निकले; वंदियादेवन घोड़े पर सवार हुआ, और सेनदन अमुदन उसके पीछे बैठ गया। वंदियादेवन ने घोड़े को एक मौन, दबी चाल से चलाया, ताकि किंचित भी ध्यान आकर्षित न हो। किंतु कुछ दूर जाने पर, जब वे घर से एक सुरक्षित अंधकार की चादर में आ गए, तब उसने घोड़े को दौड़ा दिया। वह अद्भुत प्राणी शीतल रात्रि की वायु को चीरता हुआ अपने भारी बोझ के साथ पझैय़ारै की ओर उड़ चला।
घोड़े के प्रस्थान करते ही पाँच-छह हृष्ट-पुष्ट सैनिक उस छोटी-सी कुटिया पर टूट पड़े। वे क्रुद्ध मुट्ठियों से मज़बूत काठ के द्वार पर धक्के मारने लगे।
अमुदन की माँ ने शांति से द्वार खोला और चौखट पर एकदम निश्चल खड़ी हो गईं।
“यह जो अभी-अभी हमने ध्वनि सुनी, वह क्या थी?” एक हाँफते हुए सैनिक ने चीखकर पूछा।
अमुदन की माँ ने कुछ अस्पष्ट, घिघियाता हुआ, कातर-सा उत्तर दिया।
“अरे, इस काली-गूँगी से पूछकर क्या लाभ?” दूसरे ने खीझकर कहा। “भीतर जाकर अपनी आँखों से देखना ही अच्छा है।”
“वह तो हमारा मार्ग रोके खड़ी है, है न?”
“और वह फूल वाला छोकरा कहाँ गया?”
“गूँगी को धकेलकर उस कुटिया में घुसो!”
इस पर अमुदन की माँ अपनी विचित्र भाषा में क्रोध से चिल्ला उठीं, और उस व्यक्ति के मुँह पर ही भारी द्वार बंद कर देने का अद्भुत अभिनय किया। चार-पाँच बलशाली सैनिकों ने तुरंत ही काठ के पल्लों पर शरीर से धक्का दिया, जिससे उसे बंद करना उनके लिए सर्वथा असंभव हो गया। वह कुछ और चिल्लाईं, और फिर, सहसा, उन्होंने द्वार छोड़ दिया।
एकदम अप्रस्तुत, दो-तीन सैनिक संतुलन खोकर लगभग लुढ़कते हुए द्वार से भीतर घुस गए, और उनके पाँवों के पास एक-दूसरे पर ढेर हो गए। शेष सैनिक भीतर घुसने की अंधी होड़ में उन्हीं के ऊपर से चलकर चले गए।
“यह रहा वह दुष्ट!” एक चिल्लाया, चटाई पर पड़े शरीर को देखकर।
“अंततः!” दूसरे ने विजयोल्लास में चीखकर कहा। “स्वयं ही आकर हमारे हाथों में पड़ गया, क्यों?”
“भागने से पहले पकड़ो इस दुष्ट को,” एक और ने आदेश दिया। “बाँध दो!”
गूँगी महिला एक ओर खड़ी हाथ हिला-हिलाकर पागलों की तरह घिघिया रही थी।
“हे भगवान — इतना रक्त कैसा?” एक सैनिक पीछे हटकर चिल्लाया।
अमुदन की माँ ने जैसे सहायता करने के भाव से अपना छोटा-सा तेल का दीपक उठाया, और उसकी क्षीण, काँपती लौ में घायल युवक के पीले मुख की ओर उँगली दिखाई।
“बेः! बेः!” वह चीखीं।
“अदेई!” एक सैनिक ने भौंहें सिकोड़कर झुकते हुए देखा। “यह तो कोई और प्रतीत होता है!”
“बेः — बेः!”
“क्या यह वही है, जो कल रात यहाँ आया था?”
“बेः — बेः!”
“तुम्हारा पुत्र कहाँ है, बुढ़िया?”
“बेः — बेः!”
“चुप कर, गूँगी मुर्दा! अदेई — सब लोग इस दुष्ट को ध्यान से देखो। कोई पहचानता है? हैं?”
“यह वह नहीं है,” एक ने कहा।
“निश्चय ही वही है!” दूसरे ने तर्क किया।
“नहीं — कदापि नहीं!”
“बेः — बेः!” महिला दीपक हिलाते हुए आर्तनाद करने लगी।
“सुनो, यह जो कोई भी हो, इसे तुरंत दुर्ग ले जाना होगा। चलो, उठाओ!”
“बेः — बेः — बेः — बेः!”
“चोप, कलमुँही!” — एक सैनिक ने झिड़ककर कहा।
चार बलशाली लोगों ने झुककर कंदमारन को उठा लिया।
“बेः — बेः — बेः — बेः — बेः — बेः!” वह साहसी महिला बिना रुके गला फाड़कर चीखती रहीं।
सहसा द्वार के पास खड़े एक सैनिक ने हाथ उठाया। “ठहरो — क्या वह घोड़े के खुरों की ध्वनि है?”
“ठीक है,” दलपति ने शीघ्र निर्णय लिया। “आधे लोग इसे उठाकर ले चलो — शेष जाकर देखो कि वह कौन है।”
“अरे, यह दुष्ट तो अब कहीं नहीं जा रहा,” दूसरे ने स्मरण कराया। “चलो, सब एक साथ!”
दूसरी बार सोचे बिना, उन्होंने निःसंकोच कंदमारन को पुनः भूमि पर लिटा दिया और एक साथ दौड़कर बाहर निकल गए। और जब वे उस ध्वस्त उद्यान की छाया में विलीन हो रहे थे, अमुदन की माँ का अपार्थिव, विजयी चीत्कार रात्रि के अंधकार तक उनका पीछा करता रहा।
“बेःबेः! बेःबेः! बेःबेः!”
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