दूर कहीं एक्कालम (लम्बे, मुड़े हुए पीतल के सींग) का उत्सव-नाद आकाश को चीरता हुआ गूँज उठा। पेरिगै गुरु-गंभीर लय में बज उठे, और उनकी गूँज दुर्ग की पुरानी पाषाणी प्राचीरों से टकराकर लौट आई। कोलाहल को भेदकर मनुष्यों के कंठ जय-जयकार और स्वागत-नाद में गूँज उठे। दुर्ग का भारी फाटक प्रचंड शब्द के साथ खुला और फिर बंद हो गया। घोड़ों की टापों की टगबग और हाथियों के भारी-भरकम क़दमों की धम-धम से जैसे धरती काँप उठी।
नंदिनी में आया यह अकस्मात् परिवर्तन वंदियादेवन की आँखों से छिपा न रह सका। बाहर के शब्दों ने स्पष्ट रूप से उनका ध्यान खींच लिया था। इस बात को प्रमाणित करने के लिए ही जैसे, द्वार पर पहरा देती दासी चौंककर खड़ी हुई, और फिर पंजों के बल दबे पाँव अपनी स्वामिनी के पास आई।
“अम्मा, लगता है स्वामी लौट आए हैं—”
“जानती हूँ। अपनी जगह पर जा।” नंदिनी ने शांत स्वर में उसे विदा किया और पुनः वंदियादेवन की ओर मुड़ीं। “कोषाध्यक्ष संभवतः तंजावुर में प्रवेश कर चुके हैं। पहले वे सम्राट से भेंट करेंगे, उनके स्वास्थ्य का समाचार लेंगे। फिर सेनापति से परामर्श करेंगे। उसके बाद सीधे यहीं आएँगे। उनके आने से पहले ही तुम्हें यहाँ से निकलना होगा। अब बताओ—आऴ्वारक्काडियान नंबि ने क्या संदेश भेजा है?”
“अम्मणि, वह कट्टर वैष्णव तो दावा करता है कि आप उसकी बहन हैं,” वंदियादेवन ने एक साहसी दाँव चलने का निश्चय करते हुए कहा। “क्या यह सच है?”
“तुम्हें संदेह है? क्यों?”
“एक सुंदर तोता और एक कुरूप बंदर एक ही माँ की कोख से जन्मे हों—इस बात पर भला कौन विश्वास करेगा?”
नंदिनी मंद, सुरीले कंठ से हँस पड़ीं। “एक तरह से वह ठीक ही कहता है। हम एक साथ ही पले-बढ़े थे, एक ही परिवार के सदस्य थे। मेरे प्रति उसका ऐसा स्नेह था, मानो मैं उसकी सगी छोटी बहन होऊँ। यह सोचकर दुख होता है कि आज मैं उसके लिए कितनी बड़ी निराशा का पात्र बन गई हूँ!”
“आह, तो फिर उनका संदेश सुनिए—उन्होंने मुझसे यह पहुँचाने को कहा है: भगवान कृष्ण आपकी प्रतीक्षा में हैं। इस जगत के साहसी और भक्त वैष्णव आज भी बड़ी उत्कंठा से उस गौरवशाली दृश्य की बाट जोह रहे हैं, जब भगवान कृष्ण से आपका परिणय होगा।”
“वह अब भी इस कल्पना से चिपका हुआ है?” नंदिनी ने एक गहरी, मूक निःश्वास छोड़ी। “यदि उससे फिर कभी भेंट हो, तो मेरी ओर से यह कहना: उस भक्तिमती आंडाल जैसा भाग्य मेरे लिए नहीं है, जिसने स्वयं भगवान से विवाह किया था। उसे कहना कि वह मेरे सारे स्मरण अपने हृदय से उखाड़ फेंके।”
“यह बात मैं एक क्षण के लिए भी नहीं मानूँगा, रानीमाँ।”
“कौन-सी बात?”
“यही कि आप आंडाल के उस भाग्य के योग्य नहीं हैं। बेचारी कन्या को गाना पड़ा, नाचना पड़ा, नाना प्रकार के पुष्पों की सुगंधित मालाएँ गूँथनी पड़ीं, बाढ़ के जल की भाँति आँसू बहाने पड़े, और लगभग हाथ-पैर जोड़कर भगवान से विवाह की मनुहार करनी पड़ी। आपके प्रसंग में यह सब आवश्यक न होगा। भगवान कृष्ण केवल एक बार आपका यह सुंदर मुख देख लें—और वे अपनी पत्नियों रुक्मिणी और सत्यभामा को त्याग देंगे, अपनी प्रियतमा राधा को भुला देंगे, जिन गोपियों के पीछे दिन-रात भागते हैं उन सबको छोड़ देंगे—और आपको सीधा उनके सिंहासन पर बिठा देंगे!”
“अय्या, तुम तो मुखस्तुति (चाटुकारिता) में बड़े प्रवीण हो,” नंदिनी ने पलकों की ओट से उसे देखते हुए कहा। “किंतु यह कौशल मुझे कुछ विशेष भाता नहीं, इससे भय लगता है।”
“मुखस्तुति शब्द का अर्थ तनिक समझा दीजिए, अम्मणि।”
“किसी के मुँह पर ही उसकी प्रशंसा करना, और क्या।”
“तो फिर कृपा करके घूमकर मेरी ओर पीठ करके बैठ जाइए?”
“क्यों?”
“ताकि मैं आपकी पीठ की प्रशंसा कर सकूँ। इस प्रकार की प्रशंसा में तो निश्चय ही कोई दोष नहीं।”
“तुम बातों में बड़े चतुर हो।”
“अब कौन मुखस्तुति में प्रवीण है?”
“तुम ही क्यों नहीं घूमकर मुझे पीठ दिखाते?”
“रणक्षेत्र हो या किसी सुंदरी का सान्निध्य, रानीमाँ,” वंदियादेवन ने भव्य भंगिमा में कहा, “मैं किसी को पीठ नहीं दिखाता—यह मेरा प्रण है। आप चाहें तो मेरे मुँह पर ही मेरी जितनी चाहे प्रशंसा कर सकती हैं।”
नंदिनी खिलखिलाकर हँस पड़ीं। “जो भी कहो, तुम एक जादूगर हो, एक मंत्रवादी। जानते हो, कितने दिनों बाद मैं इस तरह खुलकर हँसी हूँ?”
“किंतु यह बड़ा ही जोखिम भरा काम है, रानीमाँ—आपको इस तरह हँसाना। आपकी हँसी से सरोवर में कमल खिल उठते हैं, और उस सौंदर्य को देख मधुमक्खियाँ मूर्छित हो जाती हैं!”
“तो तुम केवल जादूगर ही नहीं, कवि भी हो?”
“मैं प्रशंसा से पिघलता नहीं, और निंदा से विचलित भी नहीं होता।”
“निंदा?”
“अभी-अभी जो आपने मुझे कवि कहा।”
“उससे क्या?”
“बालपन में लोग मुझे ‘वानरमुख’ कहकर बुलाते थे। बहुत दिनों बाद आज फिर वही पुकार सुनी, और वह भी आपके प्रवाल-अधरों से।”
“तुम्हें इस नाम से बुलाते थे? कौन थे वे रसिक जन?”
“रहने दीजिए उनकी बात। उनमें से कोई अब जीवित नहीं है।”
“जो भी हो—मैं उनके दल में नहीं हूँ। मैं तो केवल यह कहना चाहती थी कि तुम छंद मिलाकर अच्छी कविता कर लेते हो, ऐसा प्रतीत होता है।”
“यह क्षमता मुझमें किंचित है, स्वीकार करता हूँ—किंतु केवल शत्रुओं के विरुद्ध, रानीमाँ। जिनकी मृत्यु तलवार से नहीं बदी होती, वे मेरे शब्दों से मरते हैं!”
“छोटे कवियों में महासिंह! और अब तक तुमने अपना नाम तक नहीं बताया।”
“मेरा नाम वंदियादेवन है। वल्लभरायन मेरी उपाधि है।”
“तो तुम राजवंश से हो?”
“और कोई नहीं, रानीमाँ—उसी प्राचीन वनादिरायर वंश से।”
“और अब तुम्हारा राज्य कहाँ है?”
“सिर पर आकाश और पैरों तले धरती। आप जानती हैं रानीमाँ, आज मैं ही एकचक्राधिपति (समग्र विश्व का एकमात्र सम्राट) हूँ—क्षितिज तक जो कुछ भी दिखाई देता है, सब मेरा है।”
नंदिनी ने कुछ क्षण मौन रहकर, ध्यान से वंदियादेवन को देखा। “किंतु यह सर्वथा असंभव नहीं है,” अंततः वह बोलीं। “तुम अपनी पैतृक भूमि पुनः प्राप्त कर सकते हो, जानते हो।”
“कैसे? जो बाघ के उदर में समा गया, वह क्या लौटकर मिलता है? वे सब तो अब चोल साम्राज्य के अंग हैं।”
“किंतु मैं तुम्हारे लिए उन्हें पुनः प्राप्त करना संभव बना सकती हूँ।”
“दुहाई है, ऐसा मत कीजिएगा, अम्मणि। राजपाट का मोह मुझे कभी विशेष था नहीं। मन में जो थोड़ी-बहुत महत्त्वाकांक्षा पाली भी थी, वह आज सम्राट सुंदर चोल को देखने के उपरांत लुप्त हो गई। एक मुट्ठी अन्न के लिए भी दिन-प्रतिदिन दूसरों का मुँह ताकते रहना—ऐसे जीवन से तो मैं स्वतंत्र रहना ही बेहतर समझूँगा, अपना स्वामी स्वयं बनकर, भले ही यह न पता हो कि अगले पहर का भोजन कहाँ से जुटेगा।”
“बिल्कुल मेरे मन की बात कही!” नंदिनी बोल उठीं। फिर अकस्मात् जैसे कुछ स्मरण हो आया हो। “अच्छा, छोटे पऴुवेत्तरायर के लोग तुम्हारे पीछे क्यों पड़े हैं?”
“उन्हें मेरे विषय में गहरा संदेह हो गया है—लगभग तुम्हारी उस विश्वासपात्र दासी की ही भाँति।”
“ऐसा क्या? किस बात को लेकर?”
“एक तो यह—कि यह ताड़-चिह्न वाली अँगूठी मुझे कहाँ से मिली?”
नंदिनी के सुंदर मुख पर चिंता की एक क्षीण-सी रेखा तैर गई। “और—वह अब कहाँ है?” उन्होंने कुछ रुँधे स्वर में पूछा।
“यहीं है, रानीमाँ। क्या आपने सोचा कि मैं उसे खो दूँगा?” वंदियादेवन ने हाथ बढ़ाकर वह राजचिह्न उन्हें दिखाया।
“तुम्हारे पास वह है, यह उसे कैसे ज्ञात हुआ?”
“मुझे सम्राट सुंदर चोल के दर्शनों की बड़ी अभिलाषा थी—इसी अँगूठी का प्रयोग करके मैं प्रासाद में प्रविष्ट हुआ था। बाद में सेनापति ने जानना चाहा कि यह मेरे हाथ में कैसे आई…”
“और तुमने क्या कहा?” उनके कंठ में अकस्मात् आतंक उभर आया।
“मैंने आपका नाम नहीं लिया, रानीमाँ। केवल यही कहा कि बड़े पऴुवेत्तरायर ने मुझे यह कड़म्बूर में दी थी।”
नंदिनी ने एक गहरी, धीमी निःश्वास छोड़ी। उनके मुख और कंठ से आतंक का भाव कुछ छँट गया। “क्या उसे तुम्हारी बात पर विश्वास हुआ, ऐसा लगता है?”
“पूर्णतः नहीं, संभवतः—अन्यथा वह मेरे पीछे लोग क्यों लगाता? शायद वह मुझे बड़े पऴुवेत्तरायर के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता था, यह देखने के लिए कि इस प्रकार मेरे मुँह से सत्य उगलवाया जा सकता है या नहीं।”
“बड़े पऴुवेत्तरायर से तुम्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं,” नंदिनी किंचित मुस्कुराईं। “मैं देखूँगी कि वे तुम्हें चबा न जाएँ।”
“चोल कोषागार के स्वामी पर आपके प्रभाव को समस्त संसार जानता है, अम्मणि। किंतु इस दुर्ग के बाहर मेरे अनेक अत्यावश्यक कार्य पड़े हैं—इसीलिए पलायन हेतु आपकी सहायता की भिक्षा माँग रहा हूँ।”
“अत्यावश्यक कार्य? कैसे?”
“उनकी गिनती नहीं है, रानीमाँ। उदाहरण के लिए, आऴ्वारक्काडियान नंबि तक आपका उत्तर पहुँचाना है। उनसे क्या कहूँ?”
“यही कि नंदिनी नाम की उनकी कोई बहन कभी थी ही नहीं।”
“यह तो मैं कह दूँगा—यद्यपि वह संभव नहीं होगा।”
“क्या संभव नहीं होगा?”
“आपको भूल पाना। मैंने तो आपको केवल दो बार देखा है, फिर भी आपको मन से निकाल फेंकना कठिन है। और जो व्यक्ति आपको जीवन भर से जानता है, वह ऐसा कर पाएगा—यह आशा आप कैसे कर सकती हैं?”
नंदिनी के गौर मुख पर विजय की एक सूक्ष्म आभा उभर आई। उन्होंने अपनी अपूर्व आँखें वंदियादेवन के मुख पर स्थिर कर दीं; वह तीक्ष्ण दृष्टि एक छोटे भाले की तरह उसके वक्ष में जा चुभी। “और तुम सम्राट के दर्शनों के लिए इतने व्याकुल क्यों थे, सुनूँ तो?”
“जिसके रूप की ख्याति जग-प्रसिद्ध हो, ऐसे व्यक्ति को अपनी आँखों से कौन नहीं देखना चाहेगा? मैंने ऐसे राजाओं के विषय में सुना है, जो साहस और कुलीनता में सर्वश्रेष्ठ होना चाहते थे, साम्राज्य और कीर्ति का विस्तार चाहते थे—और प्रजा से उसी कामना की प्रार्थना करने को कहते थे। किंतु सुंदर चोल के प्रसंग में बौद्ध भिक्षु भगवान बुद्ध के चरणों में कौन-सी विनती रखते हैं, जानती हैं?
‘…सुंदर चोलर् वन्मैयुम् वनप्पुम् तिनमैयुम् उलगिर् सिरंदु वाऴ्गएऩवे!’
वनप्पु! अर्थात् रूप, समझीं आप। जो राजा शौर्य और शक्ति के समान ही रूप के लिए भी प्रशंसित हो, कलियुग के उस मन्मथ को अपनी आँखों से देखने की साध मैं कितने ही महीनों से मन में सँजोए था!”
“हाँ, चक्रवर्ती बड़े अहंकारी पुरुष हैं। और उनकी लाडली पुत्री तो उनसे भी अधिक दंभिनी है—”
“उनकी पुत्री? वह कौन हैं?”
वह उद्धत, अहंकारी छोटी मूर्खा जो पळैयारै में रहती है—अर्थात्, इलैया पिराट्टि कुंदवै देवी।
वंदियादेवन, भाग्यवान अभागे, युवक मन-ही-मन बुदबुदाया। जिस युक्ति की तुम्हें तलाश थी, वह स्वयं ही आँखों के सम्मुख आ गई है। बुद्धि से काम लो, वत्स।
अब तक नंदिनी शय्या पर अलस लावण्य की मूर्ति बनी लेटी थीं। अब वह अकस्मात् सीधी होकर बैठ गईं। “अय्या, मेरा एक प्रस्ताव है। मानोगे?”
“कहिए, अम्मणि।”
“चलो एक सौदा करें, यदि तुम सहमत हो—तुम मेरी सहायता करो, और बदले में मैं तुम्हारी सहायता करूँगी। क्या कहते हो?”
“रानीमाँ—आप चोल साम्राज्य के कोषाध्यक्ष की रानी हैं, इस देश के सबसे सामर्थ्यवान पुरुषों में से एक हैं वह। इस देश में ऐसा कुछ भी नहीं जो आप न कर सकें। और मेरा तो लेशमात्र भी प्रभाव नहीं। मैं आपकी सहायता भला कैसे करूँगा?”
ये शब्द आन्तरिक थे, या किसी कुशल दरबारी के कोरे वाक्-चातुर्य—यह समझने के लिए नंदिनी ने अपनी सुंदर आँखों की संपूर्ण शक्ति उस पर केंद्रित कर दी, मानो सीधे उसके हृदय के भीतर तक झाँक रही हों। वंदियादेवन किंचित भी काँपे बिना सीधा उनकी ओर देखता रहा।
“इस समय मुझे एक विश्वसनीय सहायक की बड़ी आवश्यकता है। एक निष्ठावान, समर्पित व्यक्ति। यदि मैं तुम्हें इस प्रासाद में नौकरी दूँ—तो क्या तुम स्वीकार करोगे?”
“दुख की बात है, कि ठीक यही कार्यभार मैं एक अन्य रानीमाँ से ले चुका हूँ। यदि वे किसी कारणवश मेरी सेवाएँ लौटा देती हैं, तो मैं सहर्ष आपको अपनी सेवाएँ अर्पित कर दूँगा।”
“कोई और स्त्री? कौन है वह, जो मुझसे स्पर्धा करने का साहस करती है?”
वही, जिन्हें आपने अभी कुछ देर पहले इतने स्नेह से स्मरण किया था—इलैया पिराट्टि कुंदवै देवी।
“असंभव—मिथ्या, सब मिथ्या! यह नहीं हो सकता, मैं विश्वास नहीं करूँगी। तुम मुझसे परिहास कर रहे हो—!”
“रानीमाँ, इस ओलै को इतने लोग जब्त करके पढ़ चुके हैं कि यदि आप भी पढ़ लें तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा।” यह कहकर वंदियादेवन ने आदित्य करिकालन द्वारा कुंदवै को लिखा वह तालपत्र आगे बढ़ा दिया।
नंदिनी ने ओलै लिया, उसे दीपक के मंद प्रकाश में रखा, और एक भी शब्द कहे बिना लेख पढ़ा। पढ़ना समाप्त होते ही उनकी आँखें बिजली की तरह कौंध उठीं, उनसे क्रोध की चिनगारियाँ फूट निकलीं—वंदियादेवन को ऐसा लगा जैसे किसी भयंकर नाग के फन के भीतर से उसकी द्विशाखित जिह्वा लपलपा उठी हो। अनिच्छा के होते हुए भी उस उष्ण कक्ष में वह सिहर उठा।
“अय्या,” युवक की ओर मुड़ते हुए वह बोलीं, और उनका मुख तथा शरीर अकस्मात् एक महिमा से भर गया। “तुम अपने प्राण लेकर अक्षत अवस्था में इस दुर्ग से पलायन करना चाहते हो, है न?”
“जी, अम्मा। इसीलिए तो आपकी करुणा की भिक्षा माँग रहा हूँ।”
“संभव है मैं करूँ—किंतु एक शर्त पर।”
“कहिए।”
“तुम अपना ओलै कुंदवै को पहुँचा दो—किंतु उसका उत्तर, चाहे जो भी हो, तुम्हें मेरे पास लेकर आना होगा। स्वीकार है?”
“यह बड़ी ही संकटपूर्ण शर्त है, रानीमाँ।”
“अभी कुछ देर पहले ही तो गर्व से कह रहे थे कि तुम संकट से कभी भयभीत नहीं होते?”
“वह तो ठीक है—किंतु सिर झुकाकर संकट में कूदने के लिए कुछ पुरस्कार तो मिलना चाहिए, क्यों?”
“पुरस्कार? अर्थात् तुम प्रोत्साहन चाहते हो? अवश्य मिलेगा। ऐसा पुरस्कार, जिसकी तुमने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी। वह पुरस्कार, जिसके लिए चोल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली पुरुष स्वयं बड़े पऴुवेत्तरायर भी वर्षों से व्यग्र प्रतीक्षा कर रहे हैं—एक प्रकार से तपस्या कर रहे हैं, किंतु उन्हें फल नहीं मिला। यदि तुम यह कार्य करने को उद्यत हो, तो वह पुरस्कार—तुम्हारा होगा।”
और नंदिनी ने पुनः अपनी अपूर्व आँखें उस पर स्थिर कर दीं, उस पारदर्शी दृष्टि में अवरुद्ध श्वास वाले प्रेम की संपूर्ण प्रतिज्ञा थी। वह उस दिव्य मोहनास्त्र का संधान कर रही थीं, जो ‘पुरुष’ कहलाने योग्य किसी भी व्यक्ति को विध्वंसक वेग से धराशायी कर सकता था। बेचारा वंदियादेवन उनके सम्मुख जड़वत खड़ा रहा, उसका सिर बोध-बुद्धि से परे घूम रहा था।
ठहर, मेरे हृदय—दृढ़ रह, वह अपने-आपसे अस्त-व्यस्त होकर बुदबुदाया। स्वयं को मत भूलना, अपना विवेक मत खो देना!
और, जैसे स्वयं रात्रि ही आवश्यकता के क्षण में उसकी सहायता को आ गई हो—ठीक उसी समय एक उल्लू अपने सबसे कर्कश, भयावह स्वर में बोल उठा। एक बार—दो बार—तीन बार—नियमित अंतराल पर वे ध्वनियाँ आईं। वंदियादेवन के हाथों के रोएँ खड़े हो गए। एक शीतल सिहरन उसके शरीर में दौड़ गई।
नंदिनी ने उस पार के उद्यान की ओर देखा, जिधर से वह ध्वनि आ रही थी। “लगता है, असली मंत्रवादी आ गया है,” उन्होंने मंद स्वर में कहा। फिर पुनः वंदियादेवन की ओर मुड़ीं। “यद्यपि अब मुझे उसकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है—तथापि मैं उससे बात करूँगी। क्या पता, वह किसी प्रकार तुम्हारे पलायन में सहायक हो सके। अब मेरे कहे अनुसार चलो, और स्वयं को अंधकार में छिपा लो।”
और उन्होंने ठीक उस दिशा में संकेत किया, जो उस दिशा के सर्वथा विपरीत थी जहाँ उनकी दासी तैनात थी।
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