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पोन्नियिन सेल्वन Matribhasa Hindi · अठाईसवाँ अध्याय — लोहे की मुट्ठी
A historical fiction-themed illustration for पोन्नियिन सेल्वन

अठाईसवाँ अध्याय — लोहे की मुट्ठी

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विस्मय की पहली लहर कक्ष के ऊपर से बह गई—जैसे किसी सूखी पहाड़ी जलधारा में अकस्मात बाढ़ आ गई हो। फिर नल्लन सात्तनार का मुँह खुला, कंठ में कुछ दुविधा थी। “तो जिस कवि ने वह गीत रचा था, प्रभु, क्या वह—?”

“वह त्रिलोक के सम्राट हैं, जो इस क्षण तुम्हारे सम्मुख लेटे हैं, जिनमें अपने पाँव तक हिलाने की शक्ति नहीं है,” सुंदर चोल ने धीमे स्वर में बात पूरी की।

“आह!” बंदियों के बीच विस्मय का एक दबा हुआ गुंजन फैल गया। कुछ ने सिर हिलाया, कुछ ने उस विचित्र भाव-भंगिमा में शरीर डोलाया—जैसा तब होता है जब विद्वान व्यक्ति के मुँह में शब्द अटक जाते हैं। और कुछ लोग अपने ही भावों में अभिभूत होकर एकदम स्थिर बैठे रहे।

“सम्मानित बंदियो,” सुंदर चोल ने फिर से तकिये का सहारा लेकर कथा सुनानी आरम्भ की। “एक बार वाक्य के कवियों और पंडितों ने कृपा करके पऴैयारै में मुझसे भेंट की थी—तुममें से कुछ लोग शायद उस दिन वहाँ उपस्थित भी थे। उन्होंने बारी-बारी से मेरे पूर्वजों के गीत गाए, गौरवशाली चोल वंश की महिमा का गान किया। मेरे विषय में भी गाया, उदारतापूर्वक मेरी प्रशंसा की—कहा कि मैंने अमुक वस्तु दान की है, अमुक पर ऐश्वर्य लुटाया है। उस समय मेरे पास ही नन्हीं राजकुमारी कुंदवै खड़ी थी। जब कवि अंततः पुरस्कार लेकर चले गए, तो उसने उनके गीतों की बहुत प्रशंसा की। मैंने मूर्ख की भाँति गर्वित होकर तर्क किया—मैं उनसे कहीं अधिक प्रतिभाशाली हूँ, ठीक उन्हीं की तरह गा सकता हूँ। कहते-कहते अचानक मेरे मस्तिष्क में यह छोटी-सी कविता आ गई, और मैंने उसे रच डाला। फिर मैंने अपनी उस करुणामयी महिमा से पुरस्कार माँगा। मेरी नन्हीं बेटी तब मेरी पीठ पर चढ़ बैठी और बोली, ‘यह रहा तुम्हारा पुरस्कार!’—और मेरे दोनों गालों पर कसकर दो थप्पड़ जड़ दिए! आह, उन थप्पड़ों की जलन आज भी याद है, जैसे कल की ही बात हो। जबकि उसके बाद आठ वर्ष से अधिक बीत चुके हैं…”

“अपूर्व!” एक गुंजन उठा। “सचमुच विस्मयकारी!” एकत्रित कवियों के मुख से विशुद्ध आनंद की ध्वनि फूट पड़ी।

कुंदवै! यह नाम सुनते ही वल्लभरायन वंदियादेवन की रगों में रोमांच की एक सिहरन दौड़ गई। नन्हीं राजकुमारी के रूप, रुचि और प्रखर बुद्धि की न जाने कितनी कथाएँ उसने सुनी थीं। और आज उसके सम्मुख वह भाग्यशाली व्यक्ति मौन लेटे थे, जिनके घर कुंदवै का जन्म हुआ था; पास ही उनकी माता, वृद्धा उदय पिराट्टि बैठी थीं। अपनी प्रिय पुत्री का नाम लेते ही सम्राट का भंगुर कंठ गर्व और आकुलता से कैसा काँप उठा था!

लगभग अनजाने में ही वंदियादेवन का दाहिना हाथ कमर पर लिपटे चौड़े रेशमी कमरबंद की ओर चला गया। उसने धीरे-धीरे उसकी तहों को टटोला। उसके भीतर वह मूल्यवान ओलै सुरक्षित लिपटा होना चाहिए था—जिसे कुंदवै के हाथों तक पहुँचाना था।

उंगलियाँ ठहर गईं, एकदम सुन्न। हृदय के भीतर दहशत से एक भयावह उछाल आया।

अय्यो! ओलै—वह ताड़पत्र तो है ही नहीं! कहाँ गया? क्या फिसलकर कहीं फर्श पर गिर गया? सम्राट के लिए रखे दूसरे ताड़पत्र को निकालते समय क्या यह भी खिसक गया था? तो फिर वह कहाँ है? क्या बाहर आस्थान मंडप में पड़ा है? यदि छोटे पऴुवेत्तरायर के उन कम्बख़्त, लालची हाथों में वह पड़ गया तो? उनके चंगुल में फँसने का अर्थ तो सर्वनाश होगा! इस विपत्ति से वह स्वयं को कैसे उबारेगा?

राजकुमारी का पत्र अनजाने में कहीं खो गया है—यह ज्ञात होते ही राजसभा और कविता-पाठ करते कवि उस युवक के मन से ओझल हो गए। स्थिर बैठना भी दूभर हो गया। चारों ओर चल रही भद्र, पांडित्यपूर्ण चर्चा का एक भी शब्द अब उसके कानों में नहीं पड़ रहा था, और सच कहें तो, उसे अब किसी बात की कोई परवाह भी नहीं थी।

उधर सुंदर चोल अपने मुग्ध बंदियों को सहज भाव से अपनी कथा सुनाए जा रहे थे। “मुझे संदेह है कि कुंदवै ने मेरी यह हास्यास्पद छोटी-सी कविता किसी को सुनाई थी—संभवतः पऴैयारै के तिरुमेत्राळि मंदिर के पुरोहित ईशान भट्टर को। और उन्होंने ही इसे चारों ओर फैला दिया है, ताकि सब मुझ पर हँस सकें!”

“प्रभु, मान लीजिए इसके असली रचयिता आप ही हैं—तो उससे क्या होता है?” नल्लन सात्तनार ने स्निग्ध स्वर में कहा। “यह सचमुच एक अपूर्व छोटी-सी कविता है। आप इस पृथ्वी के सम्राट तो हैं ही, अब काव्यचक्रवर्ती भी हैं!”

“फिर भी,” सम्राट बोले, उनके होठों पर एक विषाद भरी मुस्कान तैर गई, “यदि मैं अब कोई कविता रचूँ, तो केवल इंद्र को हाथी, सूर्य को घोड़ा अथवा शिव पेरुमान को पालकी देकर नहीं रुकूँगा। मार्कण्डेय की वह पुरानी कथा याद है?—वह बालक, जिसने प्राण बचाने के लिए महाप्रभु से गुहार लगाई थी? शिव पेरुमान ने यथासमय उसकी विनती पूरी की। यम को लात मारकर हटा दिया, किंतु देवता के उस भयंकर क्रोध में यम का बेचारा वाहन—वह विशाल काला महिष—प्राण गँवा बैठा। इधर वाहन खोकर यम बेचारे भटक रहे थे, उनकी उस करुण दशा के बारे में सुनकर पऴैयारै के सुंदर चोल ने भी उन्हें एक वाहन दान कर दिया! और अब उसी राजकीय वाहन पर चढ़कर मृत्यु फिर मुझे ही ढूँढ़ रही है। तंजावुर के महासेनापति छोटे पऴुवेत्तरायर भी उसे और उसके मूल्यवान महिष को नहीं रोक पाएँगे, क्यों?”

सम्राट के होठों से ये शांत शब्द झरते ही उदय पिराट्टि के बिबर्ण गालों से आँसू ढुलक पड़े। पास बैठे कवियों में से कुछ, कक्ष के भारी विषाद को सहन न कर पाने के कारण, अपने उत्तरीय की तहों में मुँह छिपाकर सिसकने लगे। केवल छोटे पऴुवेत्तरायर ही थे जो किसी प्रकार का कठोर धैर्य बनाए हुए थे।

“प्रभु, आपकी सेवा में मैं स्वयं यम से भी युद्ध करने को प्रस्तुत हूँ!” सेनापति ने गरजते हुए स्वर में घोषणा की, उनकी ध्वनि कक्ष में गूँज उठी।

“इस विषय में मुझे कोई संदेह नहीं है, सेनापति,” सम्राट ने मृदु स्वर में कहा। “किंतु यह भी जानता हूँ कि उसके विरुद्ध युद्ध जीतने की सामर्थ्य किसी मनुष्य में नहीं है। हम केवल यही प्रार्थना कर सकते हैं कि हमें अपनी नियति का निर्भय होकर सामना करने की शक्ति मिले। क्या तमिल के एक श्रेष्ठ कवि ने यह नहीं गाया था, ‘मैं मृत्यु से नहीं डरता’?”

तत्काल एक कवि उठ खड़ा हुआ। उसने संत अप्पर की वह प्रसिद्ध, मर्मस्पर्शी कविता सुनानी आरम्भ की—जिसमें कवि ने गाया है कि अपनी आस्था के लिए भीषण यातनाएँ सहकर भी वे किंचित भी भय के बिना घोर पीड़ा, यहाँ तक कि मृत्यु का भी वरण करने को तैयार हैं। उसका कंठ निस्तब्ध कक्ष में भर गया:

नामार्क्कुम् कुडियल्लोम्, नमनै अंजोम्

नरगत्तिल् इडर्प्पड़ोम् नडलै यल्लोम्

एम्पोम्, पिनि यरियोम्—

इसी स्थान पर सम्राट ने एक भंगुर हाथ उठाकर उसे रोक दिया। “कैसी भक्ति! कैसा पूर्ण, विशुद्ध विश्वास। आह, जिसने सचमुच ईश्वर की एक झलक देखी हो, वैसे अदम्य प्राण से और कौन गा सकता है! संत अप्पर उस भयंकर शूलै रोग से अत्यंत कष्ट पाते थे—पेट का एक तीव्र, मरोड़ देने वाला रोग; किंतु इरैवन, अर्थात् परमप्रभु शिव, ने उन्हें उस रोग से पूर्णतः स्वस्थ कर दिया था। इसीलिए तो वे ऐसे उल्लास में गाते हैं, घोषणा करते हैं कि वे अब पीड़ा-रोग-मृत्यु किसी से भी नहीं डरते। मेरे प्रिय मित्रों, मुझ जैसे नगण्य जीव की प्रशस्ति में अपनी साँसें व्यर्थ मत करो; उसकी अपेक्षा देवता की महिमा गाने वाली ऐसी सुंदर कविताएँ गाना कहीं उत्तम है। अप्पर, सुंदरर, संबंदर—ऐसे महान ईश्वर-भक्तों ने सुंदर, शुद्ध तमिल में सच्ची भक्ति से भरे हज़ारों गीत गाए हैं। उन सबको एक स्थायी संग्रह में एकत्र किया जा सके तो कितना अद्भुत होगा! क्यों, उन्हें सीखने, गाने और उनमें विभोर होकर स्वयं को खो देने के लिए तो एक पूरा जीवन भी कम पड़ जाएगा!”

“यदि आपकी इच्छा हो, हे राजाधिराज, तो इस पवित्र कार्य को अभी आरम्भ कर सकें तो हम धन्य होंगे,” एक बंदी ने प्रस्ताव रखा।

“नहीं,” सम्राट ने एक गहरी साँस ली, वे अचानक अत्यंत थके हुए लग रहे थे। “मुझे भय है, इतना बड़ा कार्य मेरे शासनकाल में समाप्त नहीं हो पाएगा। बाद में शायद कभी…” उनका स्वर बस हवा में विलीन हो गया, और वे गहरे विचारों में डूब गए।

यह देखकर राजवैद्य दबे पाँव छोटे पऴुवेत्तरायर के पास पहुँचा और सेनापति के कान में दबे, व्याकुल स्वर में कुछ कहा। इन दोनों को कानाफूसी करते देख सुंदर चोल ने अपने श्रोताओं की ओर देखा। उनकी आँखें बड़ी हो गईं, भ्रमित—जैसे वे अभी-अभी एक गहरी तंद्रा से छिटककर बाहर आए हों। उस क्षणिक पल में वे एक जर्जर, करुण जीव लग रहे थे, जिसे मृत्यु के खुले जबड़े से बस एक पल के लिए छीन लाया गया हो।

“प्रभु, आपने संगम युग का एक गीत सुनने की इच्छा व्यक्त की थी,” सेनापति ने मृदु स्वर में स्मरण दिलाया। “ये विद्वान लोग एक कविता-पाठ करके विदा लें, तो कैसा रहेगा?”

“आह हाँ, अवश्य चाहा था,” सम्राट ने एक लंबी साँस लेकर अपने थके हुए ललाट पर हाथ फेरा। “लगता है, देह की भाँति मेरा मन भी चेतना के साथ अपनी लड़ाई हार रहा है। कृपा करो—जारी रखो।”

छोटे पऴुवेत्तरायर के एक त्वरित आदेश के संकेत पर नल्लन सात्तनार उठ खड़ा हुआ।

“हे राजाधिराज, आपके महान पूर्वजों में प्रमुख, और शायद सबसे प्रसिद्ध, महान सम्राट करिकाल पेरुवलत्तान थे—जिन्होंने हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों पर भी अपना व्याघ्र-ध्वज फहराया था। उनके समृद्ध शासनकाल में चोल साम्राज्य की राजधानी सुंदर नगरी पुंपुहार थी—जिसे कावेरिप्पूंपट्टिनम के नाम से भी जाना जाता है। उस विशाल समुद्री बंदरगाह पर इतना प्रचुर धन-धान्य और माल लेकर जहाज़ आते थे कि उनकी गिनती रखना भी एक दुःसाध्य कार्य था। यह प्राचीन संगम युग के, उसी गौरवशाली काल के एक कवि का गीत है। नाना देशों से उस विश्व-प्रसिद्ध बंदरगाह पर पहुँचने वाले सामान के माध्यम से इसमें पुहार के अपार ऐश्वर्य, उसके सुदूर-विस्तृत अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समृद्धि का चित्र अंकित है:

वडमलै पिरंद मणियुम् पोन्नुम्,

कुडमलै पिरंद आरमुम् अकिलुम्

तेन्कडल् मुत्तुम्, कुनकडल् तुकिलुम्

गंगै वारियुम् काविरिप्पयनुम्

ईऴत्तु उणवुम् काऴगत् ताक्कमुम्—

[उत्तर के पहाड़ी देश से आए स्वर्ण और मणि-माणिक्य; पोदिगै के पहाड़ों से चंदन, अकिल अर्थात् सुगंधित अगर और नाना धूप-द्रव्य; दक्षिण समुद्र से मोती और प्रवाल; गंगा और कावेरी जैसी नदियों के तटों की फसलें; ईऴम से आए खाद्यान्न और कड़ारम जैसे सुदूर स्थानों से आए पण्य…]”

ठीक उसी क्षण कवि को सुंदर चोल ने रुकने का संकेत किया। उनके मुख पर एक सूखी हँसी उभरी।

“करिकालन के उस गौरवशाली काल में चोल देश ही ईऴम से खाद्य और अन्न प्राप्त करता था—यही बात मेरे मस्तिष्क में डालने के लिए तुमने इन कवियों को विशेष रूप से यहाँ बुलवाया है, क्यों सेनापति?”

“हाँ, प्रभु,” छोटे पऴुवेत्तरायर का स्वर आया। ऐसे दुर्धर्ष व्यक्ति के हिसाब से वह स्वर उल्लेखनीय रूप से दुर्बल था।

“तुमने अपनी बात समझा दी। इन बंदियों को पुरस्कार दो, और सुरक्षित विदा करो।”

एकत्रित लोगों की ओर मुड़कर तंजावुर के सेनापति ने राजा का विदाई-आदेश सुना दिया। कवियों ने झुककर प्रणाम किया, फिर सभा-कक्ष के म्लान होते प्रकाश में प्रशस्ति-गान करते हुए धीरे-धीरे बाहर जाने लगे। “वाऴि! चिरंजीवी हों!”

पहले से ही थका-हारा, और ऊपर से कुंदवै के लिए रखे ओलै के आकस्मिक, रहस्यमय अंतर्धान से आतंकित वंदियादेवन ने निश्चय किया कि भाग निकलने का यही अचूक अवसर है। बाहर निकलती भीड़ के ठीक बीच में घुल-मिलकर निकल जाने की आशा में वह उस दल की ओर सटकर बढ़ा।

किंतु भाग्य में निराशा बदी थी। फाटक के भारी काठ के द्वार के समीप पहुँचते ही एक बलिष्ठ हाथ ने अकस्मात् आगे बढ़कर लौह-मुष्टि में उसकी कलाई जकड़ ली।

वंदियादेवन यों तो साहसी युवक था। किंतु उस भयंकर पकड़ के दबाव ने उसे भीतर तक कंपा दिया, सिर की चोटी से लेकर पैर के अँगूठे तक एक बर्फीली सिहरन दौड़ गई और उसे वहीं जड़वत कर दिया। उसने धीरे-धीरे आँखें उठाईं—देखा, वह हाथ और किसी का नहीं, स्वयं छोटे पऴुवेत्तरायर का था। दरबारी कवि एक-एक कर सभा-कक्ष से बाहर निकलते गए, और उसे पीछे फँसा छोड़ गए।

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