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पोन्नियिन सेल्वन Matribhasa Hindi · सत्रहवाँ अध्याय — दौड़ते घोड़े की कहानी
A historical fiction-themed illustration for पोन्नियिन सेल्वन

सत्रहवाँ अध्याय — दौड़ते घोड़े की कहानी

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बात सीधी-सी थी। कुंदवै के भाई राजकुमार थे, महानता ही उनकी नियति थी, मनुष्यों की भीड़ में उनके समकक्ष कोई न था। ऐसे भाई की वधू कौन बनेगी? सर्वश्रेष्ठ कन्या के अतिरिक्त और किसी में वह योग्यता नहीं थी। और वह कन्या वानति ही होगी, यह कुंदवै ने मन-ही-मन निश्चित कर लिया था। किंतु इस मनोरथ के मार्ग में एक छोटा-सा काँटा था। कोडुम्बालूर की राजकुमारी का स्वभाव मधुर तो था, पर एक खोट रह ही जाता था — वह कन्या कुंदवै की पसंद से कहीं ज़्यादा डरपोक थी। जो कन्या एक दिन योद्धाओं में श्रेष्ठ योद्धा से विवाह करेगी, जिसके गर्भ से सम्राटों में श्रेष्ठ सम्राट जन्म लेगा, वह भला एक परछाईं के हिलने से भी भय से काँप उठे! यह चलने नहीं दिया जा सकता था। इसलिए उपाय भी एक ही था — जैसे भी हो, वानति को निर्भीक बनाना होगा। इसी महान उद्देश्य से कुंदवै ने नकली मगरमच्छ के साथ यह छोटा-सा नाटक रचा था। और कोडुम्बालूर की राजकुमारी उनकी सारी आशाओं से आगे निकल गई, परीक्षा में पूर्णतः विजयी होकर निकली।

प्राचीन मंदिर-नगरी कुडंदै से लौटकर राजकुमारियाँ फिर से नौका पर सवार हुईं। नाव कुछ देर छोटी-सी नदी में कोमल धारा के साथ बहती रही। घास-भरे तट, पत्तों के वैभव में खड़े प्राचीन वृक्ष — ऐसे किसी स्थान पर रुक जाना उनका पुराना शौक़ था। तब सखियाँ उतरकर ठंडे जल में जी भरकर क्रीड़ा करती थीं। आज भी वैसा ही हुआ। वे अपने घाघरे सँभालकर नाव से उतरकर उथले पानी में आ गईं।

सहसा एक सखी चीख़ पड़ी। “अय्यो—” सहसा भयभीत होने पर यही पुकार निकलती है—“एक मगरमच्छ!” जिस बड़े वृक्ष के पास वे खड़ी थीं, उसकी दूसरी ओर काँपती उँगली से उसने संकेत किया। “एक मगरमच्छ! अय्यो!” वह फिर चीख़ी। तत्काल ही बाक़ी परिचारिकाएँ भी उसी सुर में सुर मिलाने लगीं, दिखावटी भय से चीखने-चिल्लाने लगीं, और चौंकी हुई टिटहरियों की तरह चारों ओर भाग-दौड़ करने लगीं।

इस आपाधापी में एकमात्र वानति ही स्थिर थी। अचानक मचे इस कोलाहल से वह ज़रा भी विचलित नहीं लग रही थी। कुछ हाथ दूर, मोटे पेड़ की जड़ों पर चढ़ा, जबड़ा फाड़े वह भयंकर शिकारी पड़ा था — फिर भी उस ओर देखकर उसका हृदय तनिक भी नहीं काँपा। अपनी सखियों को भय से थर-थर काँपते देखकर भी वह निर्विकार रही, यद्यपि वे सब तो केवल अपनी नेत्री के निर्देशानुसार अभिनय कर रही थीं।

“अक्का, मगरमच्छ तो असल में तभी ख़तरनाक होता है जब वह पानी में हो,” उसने शांत भाव से कुंदवै को समझाया। “यह तो केवल धरती पर है। कृपा करके दूसरों से कहिए कि इतना भयभीत न हों, कहिए न!”

“वाह, छोटी शैतान कहीं की! तू जानती थी कि यह असली नहीं है, है न?” एक सखी अपने बनावटी भय से बाहर आकर दोष मढ़ने लगी। “किसी ने तुझे सच बता दिया होगा!”

“असली होता तब भी मैं न डरती,” वानति ने एक छोटी, सरल मुस्कान के साथ स्वीकार किया। “जानती हैं—मुझे तो बस दीवार पर दौड़ती छोटी-छिपकलियों और उड़ने वाले तिलचट्टों से डर लगता है।”

ठीक इसी क्षण हमारे तरुण नायक वंदियादेवन पेड़ों की झाड़ियों को चीरता हुआ नदी किनारे आ पहुँचा, एक दुस्साहसी बचाव-कार्य के लिए सर्वथा उद्यत। उसने उस भयंकर मगरमच्छ की ओर एक दृष्टि डाली, हाथ उठाया, और अपना भरोसेमंद भाला सीधा उसकी ओर फेंक मारा। और तभी वह राजसी तरुणी, जिसने उसे इस तरह पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया था, आगे आई। वह सहज पगों से उस जीव के सामने आकर खड़ी हो गई, अपने शरीर से उस मगरमच्छ को ढाल की तरह बचाते हुए, और एक भरी हुई, आश्चर्यजनक रूप से सुरीली आवाज़ में कुछ कहा।

आह—ज्योतिषी के घर पहली बार देखने के बाद से वंदियादेवन के हृदय में जितनी भी गहरी अभिलाषाएँ एकत्र हुई थीं, उनमें से कम-से-कम एक तो आज अद्भुत रूप से पूरी हो गई। उस कन्या ने अंततः अपने मूँगे-जैसे होंठ खोलकर सीधे उससे बात की! तथापि, वह मगरमच्छ अब भी वहीं पड़ा था, और यही बात वंदियादेवन को गहरे सोच में डाल रही थी। वह कन्या उसके सामने ऐसे रक्षा-भाव से खड़ी थी मानो उस ख़तरनाक सरीसृप को बचा रही हो, और कोमल स्वर में उससे अनुरोध कर रही थी कि वह “कष्ट न करे”—सब कुछ कैसा उलझा हुआ था। और वह हिंसक जीव एक इंच भी नहीं हिल रहा था, वह ऐसे अस्वाभाविक रूप से निश्चल कैसे पड़ा था?

इसी बीच वह सुंदरी तरुणी कहती रही। “अय्या, आपने कुडंदै में ज्योतिषी के घर बिना अनुमति के प्रवेश करने के लिए क्षमा माँगी थी—और हम एक शब्द कहे बिना ही वहाँ से चली आईं। आप शायद सोच रहे होंगे कि चोल देश की कन्याएँ अभद्र होती हैं, किंतु इससे बड़ी भूल और कोई नहीं हो सकती। मेरी प्रिय सखी उस समय अस्वस्थ अनुभव कर रही थी, और मैं एकाग्रचित्त होकर केवल उसकी सेवा में लगी थी। मैं वचन देती हूँ, मेरे उस आकस्मिक व्यवहार का एकमात्र यही कारण था—”

आह, कैसी अद्भुत, सुरीली आवाज़! जब वह बोलती है तो मेरा हृदय यूँ अजीब तरह से धड़कने क्यों लगता है? जब वह बोलती है तो मेरा हृदय यूँ अजीब तरह से धड़कने क्यों लगता है? वंदियादेवन ने सोचा। गले में एक भारी-सा गोला अटक गया। मीठी बाँसुरी की तान या वीणा के मधुर स्वर ने भी उसे कभी इस तरह व्याकुल नहीं किया था। गंभीर नाद करने वाला मादलम्—वह चिर-परिचित दो-मुँहा ढोल—अथवा भारी गर्जना करने वाले रणदमामा ने भी उसे कभी ऐसी मौन उन्मत्तता में नहीं जगाया था, अस्तित्व की जड़ों तक ऐसे झकझोर नहीं दिया था! मैं उसे रोक क्यों नहीं पा रहा हूँ? उसने असहाय होकर सोचा। एक शब्द भी मुँह से नहीं निकल रहा, जिह्वा जैसे तालु से चिपक गई है। साँझ की हवा पेड़ों के चौड़े पत्तों में सरसरा नहीं रही थी, और अरिसिलारु का लहरदार पानी भी जैसे अब बह नहीं रहा था। और वह मगरमच्छ—वह इतना आश्चर्यजनक रूप से निश्चल कैसे पड़ा था?

जब उसका तरुण हृदय इस आकस्मिक आवेग के तूफ़ान में डूब-उतर रहा था, वह सुंदरी कन्या तब तक कहती ही जा रही थी। पूरे नदी-तट पर तब एक अद्भुत स्वप्निल-सा भाव छाया था। उसका स्वर मानो कोमल नदी-कुहासे को भेदता हुआ तैरकर वंदियादेवन के कानों तक पहुँच रहा था।

“अय्या, आपकी नीयत सचमुच बहुत नेक थी,” वह कोमल स्वर में कह रही थी। “इस मगरमच्छ के भयंकर, कुचल डालने वाले जबड़ों से हम असहाय कन्याओं को बचाने के लिए आपने उस पर भाला फेंका। और मैं ज़ोर देकर कहती हूँ, आपकी वीरता पर कोई प्रश्न ही नहीं उठता; ऐसा अचूक निशाना सचमुच एक दुर्लभ कीर्ति है!”

कुछ दूर एक वृक्ष की छाया में एकत्र बाक़ी तरुणियाँ इन दोनों को देख रही थीं। सहसा वे सब खुल कर खनकती हुई आनंदमय हँसी में फूट पड़ीं। और ठीक तभी एक आकस्मिक पीड़ा के झटके से वंदियादेवन का सुंदर, धूप-सा उज्ज्वल स्वप्न टूट गया। उस कन्या के सुरीले शब्दों से बुना जादू का जाल उसे चारों ओर से घेरे हुए था; उसके महीन रेशे एक झटके में टूट गए।

उसने अत्यंत तीक्ष्ण दृष्टि से मगरमच्छ की ओर देखा। फिर जबड़ा भींचकर, पेड़ों के पास खिलखिलाकर हँसती हुई उन कन्याओं के पाश से गुज़रता हुआ, वह तेज़ी से उस पड़े हुए जीव की ओर बढ़ा। सरीसृप के कठोर शरीर में गहराई से धँसे अपने भरोसेमंद भाले की लकड़ी की मूठ पर उसने एक दृढ़ हाथ रखा और ज़ोर से खींचा। ऐसे कड़े हाथ के खिंचाव से भाला तो बड़ी सरलता से बाहर आ गया—किंतु पीछे बने मुँह-बाए गड्ढे से यह क्या छिटककर बाहर निकला? गर्म रक्त-मांस के स्थान पर क्या निकला—सूखी रुई और केले के पेड़ के फीके रेशों के मुलायम गुच्छे!

वे कन्याएँ—वे अभागी, सर्वथा हृदयहीन कन्याएँ—फिर से हँस पड़ीं। और इस बार वे तालियाँ पीटने लगीं, नदी-तट पर अशुभ उल्लास में लगभग नाचने लगीं।

वंदियादेवन की उस क्षण तीव्र इच्छा हुई कि यहीं की नरम धरती फट जाए और उसे ज़िंदा निगल ले। अपने घटनापूर्ण जीवन में उसने ऐसी छाती-दहला देने वाली, जलाने वाली लज्जा पहले कभी अनुभव नहीं की थी। इन हँसते चेहरों वाली कन्याओं के सामने उसे ऐसा अपमान सहना पड़ा! कन्याएँ कैसी—ये सब तो छोटी-छोटी पिशाचिनियाँ थीं! उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि इन उपहास करने वाली लड़कियों के साथ अब एक क्षण भी और नहीं।

आह, मेरे भरोसेमंद भाले, अस्त्र की ओर देखकर उसने विषादपूर्ण मन से सोचा, तुम्हें ऐसा घोर अपमान सहना पड़ा! मैं इस कलंक को कैसे धोऊँगा और तुम्हारा उचित प्रतिशोध कैसे लूँगा?

ये सारे अंधकारपूर्ण, व्यथित विचार मात्र कुछ क्षणों में उसके मन के भीतर से गुज़र गए। जिन्होंने उसका उपहास करने का साहस दिखाया, वे यदि पुरुष होते तो बात ही कुछ और होती। तब इस शांत, पत्तों से ढँके तट ने एक भयंकर युद्ध देखा होता; उसे घेरकर हँसने के लिए एक भी व्यक्ति प्राणों सहित न बचता! यह छोटी, सुंदर अरिसिलारु नदी अपने लाल, गाद-भरे जल के स्थान पर उनका रक्त बहाकर महासागर में ले जाती! किंतु ये तो स्त्रियाँ थीं। इनसे दूर चले जाने के सिवा एक योद्धा और कर भी क्या सकता है?

वंदियादेवन शीघ्रता से उनसे दूर हो गया। यहाँ तक कि उसने उस राजसी तरुणी की भी परवाह नहीं की जिसने उसका मन पूरी तरह मोह लिया था। वह ढलवाँ तट पर चढ़कर लगभग उछलते हुए अपने प्रतीक्षा करते घोड़े के पास पहुँचा। स्वामी को आता देख उस कुलीन पशु ने गर्मजोशी से हिनहिनाहट की, किंतु वंदियादेवन के क्रुद्ध, जलते हुए कानों को वह भी ऐसा लगा मानो उसका वफ़ादार घोड़ा भी उस पर हँस रहा हो। जो वह उन कन्याओं के साथ न कर सका, वह उसने उस बेचारे पशु के साथ किया—वह उछलकर उसकी पीठ पर सवार हुआ और चमड़े की लगाम से दो जलते हुए कोड़े जड़ दिए। चौंका हुआ घोड़ा अचानक क्रोध से बिफरकर नदी किनारे के धूल-भरे मार्ग पर लगभग उड़ने-सा लगा, पीछे मिट्टी के ढेले छिटकते गए।

घोड़ा और वह क्रुद्ध तरुण सैनिक प्रचंड वेग से भाग निकले, और कुंदवै स्थिर खड़ी कुछ देर उस दिशा में देखती रहीं। वह विचारमग्न नेत्रों से तब तक देखती रहीं, जब तक कि वे छोटे होते-होते सुनहरी दूरी में विलीन नहीं हो गए। वह चुपचाप तब तक प्रतीक्षा करती रहीं, जब तक कि उनके मार्ग की महीन धूल पूरी तरह बैठ नहीं गई।

तब वह अपनी परिचारिकाओं की ओर मुड़ीं। “सच कहूँ, सखियो—तुम सबको शिष्टाचार का एक अच्छा पाठ पढ़ाना आवश्यक है,” उन्होंने कहा, स्वर कोमल किंतु दृढ़ था। “जब हम केवल आपस में होती हैं, तब तुम जैसा चाहे वैसा आचरण कर सकती हो, यह तुम्हारा अधिकार है। किंतु दूसरों के समक्ष कृपा करके थोड़ा सामान्य शिष्टाचार बनाए रखने का प्रयास करो। और उसके सामने इस तरह खुलकर हँसना तुम्हें बिल्कुल शोभा नहीं देता। एक अपरिचित तरुण के सामने तुम सब ज़रा चुप क्यों नहीं रह सकीं, यह बात मेरी समझ से परे है। कहो तो, अब चोल देश की कन्याओं के शील और व्यवहार के विषय में वह क्या धारणा बनाएगा?”

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