वंदियादेवन का जीवन अधिकांशतः पालार नदी के उत्तर में, सूखी, धूप में तपी धरती पर बीता था। इसलिए तैराकी उसके लिए एक रहस्य ही बनी रही। एक बार बड़ी पेन्नै नदी के तट पर पहरा देते-देते देह को शीतल करने की इच्छा से वह भँवर-भरे जल में उतर पड़ा था, सोचा था कि झटपट एक डुबकी लगाकर बाहर आ जाएगा। समतल भूमि के मनुष्य के लिए नदी से होड़ लगाना कितनी बड़ी मूर्खता हो सकती है, यह समझने में उसे बहुत देर हो गई। शैतानी धारा ने उसे दबोचकर नीचे खींच लिया। वह डूबने-उतराने लगा, चक्कर पर चक्कर काटता रहा; जल के निर्मम शीतल दबाव में हाथ-पैर सुन्न पड़ गए। गहन थकान ने एक भारी चादर की तरह उसे ढँक लिया। उसने स्वयं को समाप्त ही मान लिया था, मन में आया कि बड़ी पेन्नै ही उसकी चिह्नहीन जल-समाधि बनेगी—ठीक उसी क्षण एक भटकी हुई लहर ने उसे अचानक जकड़कर कीचड़ में फेंक दिया। थके-हारे ढेर की तरह तट पर बहकर आने के बाद वंदियादेवन ने इस चमत्कारी रक्षा के लिए जीवन में जितने भी देवताओं के नाम सुने थे, सबके नाम पर स्तुति-गान किया।
उस रात शंबुवराय के प्रासाद के ऊपरी छज्जे पर बिछौने पर लेटे-लेटे वही असहाय अनुभूति तीव्रता से लौट आई। मानो वह फिर से अचानक एक सुन्न कर देने वाले भँवर में जा गिरा हो। बस इस बार यह नदी का जल नहीं था—यह एक विशाल, हिंसक राज-षड्यंत्र की नदी थी। क्या इसके चंगुल से वह उतनी सरलता से निकल पाएगा?
उस रात की गुप्त मंत्रणा में छिपकर जो कुछ उसने सुना था, उसी में वह लगभग बह गया था। महान चोल साम्राज्य को बाहरी शत्रुओं के अंतहीन हमलों से अंततः छुटकारा पाए अभी कुछ ही वर्ष हुए थे। कुछ ही समय हुआ था जब उसके लोग अचानक आक्रमण के भय के बिना शांति की साँस ले पा रहे थे। इस शांत अवस्था के पीछे मुख्य श्रेय युवराज आदित्य करिकालन का ही था। हड्डियों-मज्जा तक वे एक सैनिक थे, युद्ध की धूल-भरी रणनीतियों में माहिर, शत्रु के विरुद्ध रणकौशल में लगभग एक चाणक्य। चोल सेना और संसाधनों का उन्होंने अंतिम बिंदु तक उपयोग किया था। रेट्टै मंडलम के राजा कृष्ण की भारी शृंखलाओं से उन्होंने तोंडै मंडलम के उत्तरी क्षेत्र को पूरी तरह मुक्त करा लिया था।
बाहरी शत्रुओं से तो इस प्रकार निपट लिया गया। किन्तु उन शत्रुओं का क्या होगा जो भीतर से ही साम्राज्य को खा जाना चाहते हैं? वे शायद कहीं अधिक ख़तरनाक थे। चोल कुलों के भीतर ही अभी-अभी जो मूक, कटु संघर्ष फूट पड़ा था, उसका परिणाम कहाँ जाकर रुकेगा? साम्राज्य के मंझे हुए योद्धा, विश्वासपात्र मंत्री, स्थानीय सामंत, उच्चाधिकारी—सभी इस भयंकर षड्यंत्र के भागीदार थे। पऴुवेत्तरायर बंधुओं को ही ले लीजिए। कैसी ख्याति, कैसा अतुलनीय वैभव, कैसी गहरी पैठ वाली सत्ता! स्वयं सम्राट के अतिरिक्त इस देश में और कौन है जो उनकी बराबरी कर सके? और उस अंधकारपूर्ण कक्ष में जो अन्य सरदार और सामंत थे, वे भी क्या कम थे? प्रत्येक अपने-आप में शक्तिशाली, विस्तृत क्षेत्रों और असंख्य जनबल का स्वामी। युद्धक्षेत्र में उनकी न्यायसंगत ख्याति की बात तो छोड़ ही दीजिए। क्या यह उनका पहला जमावड़ा था? या मध्यरात्रि के अंधकार में और भी गुप्त बैठकें हुई थीं, जहाँ राजकुमार मधुरान्तकन ढँकी हुई पालकी में छिपकर चुपचाप आए थे? अहा, इतनी वृद्धावस्था में बड़े पऴुवेत्तरायर का वह विवाह कितना काम का सिद्ध हुआ, अब समझ आ रहा था!
उस संध्या से पहले तक चोल उत्तराधिकार को लेकर वंदियादेवन के मन में संदेह की लेशमात्र छाया भी नहीं पड़ी थी। आदित्य करिकालन ही निर्विवाद युवराज थे, राजा और देश, दोनों की गौरवपूर्ण पसंद। किसी अन्य दिशा से इसका कोई प्रतिद्वंद्वी खड़ा हो सकता है, यह बात उसके मस्तिष्क में ही नहीं आई थी। अन्य नागरिकों की भाँति मधुरान्तकन को वह भी जानता था। दिवंगत राजा कंदरादित्य के उस कोमल पुत्र की कहानी उसने स्नेहपूर्वक सुनी थी, जो मंदिरों की आराधना और संत-साधना में डूबे रहते थे। सिंहासन पर मधुरान्तकन का वास्तविक अधिकार हो सकता है, या उससे भी बुरा—वे स्वयं को एक इच्छुक प्रतिद्वंद्वी मान सकते हैं, ऐसा संदेह एक क्षण के लिए भी उसके मन में नहीं जागा था।
किन्तु अब—उस बैठक में ही किसी एक कंठ के शब्द उधार लेकर कहें तो—न्याय और धर्म की कठोर कसौटी पर क्या उचित था? स्वर्ण-सिंहासन का विधि-सम्मत उत्तराधिकारी कौन था—आदित्य करिकालन, या मधुरान्तकन? रात की हवा की धीमी सरसराहट सुनते हुए लेटे-लेटे वह जितना इस पर विचार करता, उतना ही उसे लगता कि दोनों दावों का पलड़ा बराबर था। यदि वे सचमुच एक-दूसरे के अधिकार को लेकर घमासान युद्ध में उतर पड़े, तो अंततः कौन जीतेगा? और उससे भी बड़ी बात—यदि सब कुछ एक ख़ूनी जंग में जा पहुँचा, तो उसकी अपनी डाँवाडोल स्थिति कहाँ जाकर टिकेगी?
आह, कांची से जिस दिन पहली बार घोड़ा दौड़ाकर निकला था, उस दिन हृदय में कितने मधुर स्वप्न सँजोए थे वंदियादेवन ने! मन-ही-मन कितने भव्य हवाई-दुर्ग बनाए थे, आशा की थी कि युवराज की छत्रछाया में साम्राज्य में एक उच्च सम्मान का पद पाएगा। यहाँ तक कि एक उन्मादपूर्ण क्षण में उसने यह स्वप्न भी स्नेहपूर्वक पाला था—कि पूर्वजों का प्राचीन वानर-राज्य फिर से प्राप्त करेगा, अपने वंश को उसका पुराना, धूमिल पड़ता गौरव लौटाएगा! और अब? अब महान चोल-वृक्ष पर चढ़ने के लिए जो डाली उसने चुनी थी, वही मानो उसके भार से टूटकर चूर-चूर होने को थी।
आरामदायक बिछौने पर बहुत देर तक वंदियादेवन करवटें बदलता रहा, संदेहों और उदास आशंकाओं से बुरी तरह त्रस्त। चौथा पहर आ चुका था, साथ में भोर की फीकी-सी आशा लेकर—तब जाकर अंततः दूसरी बार वह निद्रा में डूबा।
इतनी विकल चिंताओं का जो परिणाम होना था, वही हुआ—सुबह जल्दी नींद नहीं खुली। अगले दिन सुबह जब सूर्य की तीखी लाल किरणें छज्जा पारकर उसे झुलसाने लगीं, तब भी नहीं। अंत में कंदमारन के स्नेहिल हाथ की थपकी कंधे पर पड़ी, तब उसे होश आया। वंदियादेवन चौंककर जाग उठा, पूरी तरह हक्का-बक्का।
"क्या खूब नींद आई?" कडंबूर के राजकुमार ने आनंदपूर्ण आतिथ्य से पूछा। फिर मुखभर मुस्कान के साथ स्वयं ही बोल उठा, "कल रात यहाँ बहुत देर से आया था—किन्तु तुम ऐसी कुंभकर्णी निद्रा में डूबे थे कि तुम्हारी उस अतल तपस्या में विघ्न डालने का मन न हुआ।"
गले में उमड़ते तीखे शब्दों को दबाने के लिए वंदियादेवन को बहुत संयम दिखाना पड़ा। फिर भी उसने उन्हें दबा लिया।
"कुरवै कूत्तु देखने के बाद यहाँ आकर लेट गया था—बस इतना ही स्मरण है, और कुछ नहीं," उसने नरम स्वर में उत्तर दिया। "आह, सूर्य को देखकर तो लगता है कि भोर हुए लगभग एक पूरा पहर बीत चुका है। मुझे अभी तुरंत निकलना होगा। कंदमारन, मित्र, अपने लोगों से कहो कि मेरे घोड़े पर जीन कस दें!"
"वाह, यह तो बड़ी रोचक बात हुई!" कंदमारन हँस पड़ा। "अभी तुरंत निकलना होगा का क्या अर्थ? ऐसी भी क्या शीघ्रता है। कुछ दिन रुक जाओ न। दस दिन रुक जाओ।"
"नहीं मित्र, सच में नहीं रुक सकता। दुःसंवाद मिला है कि तांजावूर में मेरे काका की अवस्था अत्यंत गंभीर है—सुन रहा हूँ कि वे मृत्यु-शय्या पर हैं," अपनी आत्मा से लेशमात्र संकोच किए बिना वंदियादेवन झूठ गढ़ता चला गया। "उन्हें जीवित देख पाना है तो मुझे अभी निकलना होगा।"
"तो वचन दो कि लौटते समय यहाँ रुकोगे।"
"अवश्य। अब कृपा करके मुझे विदा लेने दो।"
"इतनी भयंकर शीघ्रता! कम-से-कम सुबह का भोजन कर लेने तक तो बैठो। कोल्लिडम नदी तक मैं तुम्हारे साथ घोड़े पर चलना चाहता हूँ।"
"किन्तु—वह कैसे सँभालोगे? इतने महत्वपूर्ण अतिथि तुम्हारे ध्यान के लिए आतुर होंगे—"
"तुमसे अधिक महत्वपूर्ण यहाँ मेरे लिए कोई नहीं है!" अचानक होंठ काटकर कंदमारन रुक गया। "यह ठीक है कि इस समय हम अत्यंत सम्मानित अतिथियों का सत्कार कर रहे हैं, परन्तु उनके लिए मेरे पिता गृहस्वामी के रूप में उपस्थित हैं, साथ में प्रासाद-कर्मचारियों की एक छोटी-मोटी सेना भी है। कल रात तुम्हारे साथ एकांत में एक क्षण भी नहीं बिता सका। सोचा था कि कोल्लिडम जाते-जाते हम कुछ बातें कर लेंगे। जब तक ऐसा नहीं कर लेता, मुझे शांति नहीं मिलेगी—और जो भी हो, मैं तुम्हारे साथ चल ही रहा हूँ!"
"तो फिर मुझे कोई आपत्ति नहीं," वंदियादेवन ने सहर्ष स्वीकार किया। "जैसी तुम्हारी इच्छा।"
एक घड़ी पश्चात देखा गया कि दोनों मित्र शंबुवराय के प्रासाद के विशाल फाटक से घोड़ों पर सवार होकर निकल रहे हैं। उनकी गति धीमी, निश्चिंत थी; सुबह की हवा कोमल, शांत थी। बीते दिन की स्मृतियों में दोनों तरुण इतने मग्न थे कि किसी ने भी उस सूखी, सरसराती पश्चिमी हवा पर विशेष ध्यान नहीं दिया—जो शरारत से उनके ऊपर लाल धूल के छोटे-छोटे बादल छिड़क रही थी।
"मात्र एक रात तुम्हारे प्रासाद में रहा हूँ, कंदमारन—किन्तु उससे मेरा बहुत उपकार हुआ है," लगभग एक मील तक घोड़ा दौड़ाने के बाद वंदियादेवन ने सहज भाव से कहा। "परन्तु एक बात का मुझे थोड़ा अफ़सोस रह गया। बड़ी पेन्नै के तट पर जब हम थे, तब तुमने अपनी बहन के अनुपम रूप का कितना अंतहीन, उज्ज्वल वर्णन किया था। किन्तु कल संध्या उसे एक झलक देखने का भी अवसर न मिला! माता के पीछे से जब उसने साहस करके झाँका, तो मुश्किल से उसके मुख का आठवाँ भाग ही आँखों में पड़ा। मित्र, मुझे बड़ा खेद है! तमिल कन्याओं में शालीनता और यथोचित लज्जा होनी चाहिए, यह ठीक है—किन्तु तुम्हारी बहन में यह सब कुछ अधिक ही है, कहना पड़ेगा!"
बात करने की अकस्मात् प्रेरणा से कंदमारन के होंठ काँप उठे—किन्तु एक शब्द भी बाहर न निकला।
"खैर, कोई बात नहीं," मित्र की असहजता को जैसे देखा ही न हो, ऐसा स्वाँग करते हुए वंदियादेवन बोलता रहा। "तुमने तो कृपा करके मुझे लौटते समय कुछ दिन रुकने को कहा ही है। विश्वास रखना, इस संकोची नीरवता को दूर करने के लिए मैं प्रत्येक अवसर का लाभ उठाऊँगा! मेरे साथ थोड़ा जान-पहचान हो जाने पर तुम्हारी बहन फिर माँ के पीछे छिपने का विचार नहीं करेगी, क्यों? अच्छा—उसका सुंदर नाम क्या बताया था तुमने?"
"मणिमेखलै।"
"आह, सचमुच मधुर नाम है! नाम जितना सुंदर और प्रसन्न है, यदि वह भी ठीक वैसी ही हो—"
ठीक इसी स्थान पर कंदमारन ने अचानक उसे रोक दिया, उसका गला कठोर था। "मित्र, मैं तुमसे विनती करता हूँ—मेरी बहन को भूल जाओ। उसे लेकर मैंने जो कुछ भी कहा, वह सब भी भूल जाओ। कृपा करके फिर कभी उसकी चर्चा मत करना!"
"हे भगवान, यह तो बड़ी कलाबाज़ी है! कल शाम जो मुझे जामाता के आदर से अपनाने की इतनी बड़ी-बड़ी बातें कह रहे थे, उसका क्या हुआ?"
"अस्वीकार नहीं करता कि मैंने बहुत-सी मूर्खतापूर्ण बातें की थीं—किन्तु मेरी ख़ातिर उन्हें भूल जाओ। परिस्थितियाँ… बदल गई हैं। मेरे माता-पिता ने उसका विवाह किसी और के साथ निश्चित कर दिया है। मणिमेखलै ने भी एक आज्ञाकारी पुत्री की तरह उसे स्वीकार कर लिया है।"
ख़ूब, बेटी, मन-ही-मन वंदियादेवन ने सोचा। संभावित वर की महान पहचान का अनुमान लगाने में भी विशेष कष्ट नहीं हुआ। उस ढँकी हुई पालकी के गुप्त निवासी, राजकीय मधुरान्तकन के अतिरिक्त अब और कौन उन्हें पसंद आएगा? दिन के प्रकाश की तरह बात स्पष्ट थी—राजकुमार के लिए जितने भी लाभप्रद, रक्त-बंधन से जुड़े संबंध जुटाए जा सकते थे, वे सब जोड़े जा रहे थे। हाँ, बड़े पऴुवेत्तरायर की धूर्तता सचमुच सबसे बढ़कर थी!
"तो तुम्हारे उन प्रख्यात राज-अतिथियों में से ही किसी को उसके पति के रूप में निश्चित किया है?" उसने कोमल स्वर में पूछा। "सच कहूँ कंदमारन, मैं न तो निराश हूँ, न ही बहुत चकित। ऐसी ही किसी बात की मैं आशा कर रहा था—"
"कर रहे थे?" कंदमारन हतप्रभ रह गया।
"ज़रा सोचो मित्र। आशाओं से भरे, एक सुंदर कन्या वाले माता-पिता के लिए एक घर-बार-विहीन अनाथ कभी पहली पसंद नहीं होता। न मेरा अपना कहने को कोई घर है, न देश। मेरे पूर्वज भले ही गर्व से इसी क्षेत्र पर शासन करते रहे हों, किन्तु वर्षों से वे केवल मिट्टी की धूल बन चुके हैं। कोई उच्च-वंश की कन्या मुझे पति रूप में नहीं चाहती—इसमें मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं—"
"रुको, कृपा करो!" सच्ची पीड़ा में कंदमारन चीख उठा। "यदि तुम सचमुच सोचते हो कि मैं और मेरे माता-पिता इतने निम्न, हिसाब-किताब वाले व्यवहार पर उतर सकते हैं… नहीं, हम नहीं उतर सकते। और मामला वैसा है भी नहीं जैसा तुम सोच रहे हो। हमारे इस निर्णय के पीछे बहुत गंभीर कारण हैं। शीघ्र ही तुम समझोगे कि वे कितने आवश्यक थे। इससे अधिक अभी कुछ नहीं कह सकता—किन्तु एक दिन कहूँगा, यही आशा रखता हूँ।"
"अचानक इतने रहस्यमयी क्यों हो रहे हो, कंदमारन? हुआ क्या है, बताओ तो?"
"मुझे क्षमा करो—जानता हूँ कि मूर्खों की तरह पहेलियाँ बुझा रहा हूँ, किन्तु कुछ कर नहीं सकता। मेरी बात पर विश्वास करो, जैसे पहले थे, अभी भी तुम वैसे ही मेरे सबसे प्रिय मित्र हो। अंत में जब समय आएगा, तो सबसे पहले तुम्हारे पास ही अपना हृदय खोलकर सब कहूँगा! तब तक केवल इतना भरोसा रखो कि मैं जो कर रहा हूँ, सही कर रहा हूँ। यह जान लो कि चाहे कोई भी मूल्य चुकाना पड़े, मैं तुम्हारे साथ कभी विश्वासघात नहीं करूँगा।"
"सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई," वंदियादेवन हँसकर बोला। "परन्तु विश्वासघात और भरोसे को लेकर इतनी भारी-भरकम बातों का अर्थ नहीं समझ पा रहा। तुम तो जानते ही हो कि अपनी रक्षा के लिए मैं केवल अपनी अच्छी तलवार और भाले पर ही भरोसा करता हूँ, दूसरों की सनक पर नहीं।"
"शीघ्र ही एक ऐसा दिन आएगा, जब एक महायुद्ध में तुम्हें ठीक वही तलवार और भाला उपयोग में लाने होंगे। और ईश्वर की कृपा से हम एक ही पक्ष में कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़े होंगे। और कौन जाने, तुम्हारे वे उज्ज्वल स्वप्न भी शायद पूरे हो जाएँ—"
"युद्ध? शीघ्र ही युद्ध होने की सोच रहे हो क्या? या दक्षिण जाकर इलंकै की लड़ाई में सम्मिलित होने का विचार बना रहे हो?"
"इलंकै? हे भगवान, उन लोगों ने वहाँ अपनी जो हास्यास्पद दशा कर रखी है, सुनोगे तो हँस पड़ोगे! जानते हो, महान चोल सेना के लिए इतनी दूर से भोजन और अनाज भेजना पड़ता है? सरासर हास्यास्पद है, यह मैं कहे देता हूँ। किन्तु नहीं, यह बात मैं नहीं कह रहा। और मुझसे इससे अधिक कुछ उगलवाने का प्रयत्न मत करना! केवल धैर्य रखो; समय आने पर सब जान जाओगे।"
"जैसी तुम्हारी इच्छा। जो कहना नहीं चाहते, उसकी एक भी बात मुझे बताने की आवश्यकता नहीं," वंदियादेवन ने उसे शांत किया। "आह! वह रही अंततः प्रचंड कोल्लिडम।"
प्रत्येक अश्व-पदक्षेप के साथ महानदी सचमुच दृष्टिगोचर होने लगी; क्षण भर में दोनों मित्र उसके बालूमय तट पर आ पहुँचे। आर्द्र तमिल मास आड़ि सचमुच एक शुभ मुद्रा में आया था। उफनती हुई नदी अपना मटमैला जल लेकर जैसे धरती पर टूट पड़ रही थी।
नदी का पाट इतना विशाल था कि उस पार के ऊँचे वृक्ष धुँधले, छोटी-छोटी झाड़ियों जैसे दिख रहे थे। लाल-भूरे रंग का जल गर्जन करता हुआ, चक्कर काटता हुआ, भँवर बनाता हुआ भागा जा रहा था; प्रचंड धारा गहरे, भूखे घूर्णि खोदती हुई पूर्व में समुद्र से मिलने के अपने व्यग्र, अप्रतिरोध्य पथ पर आनंद में नृत्य कर रही थी।
घोड़े पर बैठे वंदियादेवन उस दृश्य को देखता रहा, सर्वथा मंत्रमुग्ध। उफनती बाढ़ तटों को चीर रही थी, उसने कान लगाकर सुना, टकराते जल के कान-फाड़ू अविराम गर्जन में विभोर हो गया।
नौकाघाट पर एक ही मज़बूत काठ की नाव डोल रही थी। उसके भीतर दो कठोर मुखाकृति वाले व्यक्ति खड़े थे, हाथों में लंबे पतवार। उनसे पहले ही एक यात्री धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रहा था; माथे पर पवित्र भस्म का मोटा लेप देखकर लगा कि वह व्यक्ति शिव की आराधना में गहरा डूबा हुआ है। मल्लाहों में से एक ने अपनी धूप में तपी गर्दन बढ़ाकर नए आगंतुकों की ओर देखा।
"सरकार, हमारे साथ पार चलना है क्या?" उसने जल के गर्जन को चीरकर पुकारा।
"मैं नहीं, केवल यह मित्र," कंदमारन ने उत्तर दिया। "ज़रा ठहरो।"
दोनों मित्र जीन से उतर आए। वंदियादेवन ने अचानक खीझ में जीभ से चुट-चुट की ध्वनि की। "आह, मैं कितना मूर्ख हूँ। इस नन्ही-सी नाव में अपना घोड़ा कैसे चढ़ाऊँगा?"
"बिलकुल आवश्यकता नहीं," कंदमारन हँसा। "देखो, ये रहे मेरे दो आदमी, हमारे पीछे-पीछे घोड़ों पर आ रहे हैं। एक तुम्हारे उस शानदार घोड़े को कडंबूर लौटा ले जाकर विश्राम देगा। और दूसरा नाव में तुम्हारे साथ जाएगा, उस पार जाकर तुम्हारे लिए एक और मज़बूत घोड़ा जुटा देगा।"
"क्या अद्भुत पूर्व-योजना है, कंदमारन! मैं सचमुच मुग्ध हूँ। तुम वास्तव में एक सच्चे मित्र हो।"
"वास्तव में तुमने शायद सोचा होगा कि प्रचंड कोल्लिडम भी छोटी-मोटी पालार या पेन्नै की तरह ही विनीत होगी। तुम्हारे मस्तिष्क में शायद यह नहीं आया होगा कि यहाँ धोती सँभालकर घोड़े को हाँकते हुए उस पार नहीं ले जाया जा सकता।"
"सचमुच नहीं आया था। तुम्हारे चोल देश की इन अनुपम नदियों को कम आँकने के लिए विनम्रतापूर्वक क्षमा चाहता हूँ। हाँ, एक बार इस गरजते हुए जल की ओर देखो तो? यह तो जैसे एक समुद्र ही है!"
विदा का समय हो गया। सुबह की धूप में दोनों मित्रों ने एक-दूसरे का गर्मजोशी से आलिंगन किया।
कीचड़-भरे तट से उतरकर वंदियादेवन ने सावधानी से डोलती नाव में पाँव रखा। कंदमारन के आदमियों में से एक उसके पीछे-पीछे कूद पड़ा। सब कुछ तैयार प्रतीत हुआ; मल्लाहों ने पाँव जमाकर फेनिल जल में अपने भारी काठ के पतवार उतारे।
अचानक दूर से एक तीखे स्वर ने उन्हें पुकारा। "रुको! नाव रोको!"
मल्लाहों ने पतवार रोक दिए, धारा के विरुद्ध नाव को स्थिर बनाए रखा। जिसने पुकारा था, वह धूल के बीच से हड़बड़ाकर तट की ओर दौड़ा आ रहा था।
हाँफते हुए आते उस चेहरे पर दृष्टि पड़ते ही वंदियादेवन ने आऴ्वारक्काडियान नंबि को पहचान लिया। ऐसा लगा कि उसके शैव सहयात्री ने भी उसे पहचान लिया है।
"बढ़ो, अभी बढ़ो!" रुद्राक्ष की माला जकड़कर वह व्यक्ति चीखा। "उस कुतर्की वैष्णव ने यदि इस नाव में पाँव रखा तो मैं एक क्षण भी इसमें नहीं रहूँगा!"
किन्तु उस बेचारे व्यक्ति को छोड़ जाने की बात वंदियादेवन ने सुनी ही नहीं। "कृपा करके पतवार रोकिए," उसने सहज स्वर में मल्लाहों से कहा। "स्थान बहुत है। उसे भी साथ ले लेते हैं।"
कहना न होगा कि उसका उद्देश्य पूरी तरह परोपकार का नहीं था। सच तो यह था कि पिछली रात की अँधेरी, रहस्यमयी घटनाओं के विषय में उस धूर्त नंबि का मुँह खुलवाने की उसकी प्रबल इच्छा थी।
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