जीवन एक अनिश्चित यात्रा है, पग-पग पर चकित कर देने वाले मोड़ छिपे रहते हैं। कौन-सी तुच्छ घटना कब एक विशाल काण्ड को जन्म दे देगी, समूची पृथ्वी को उलट-पुलट कर रख देगी, कोई नहीं जानता। हमारे तरुण मित्र वंदियादेवन की नियति में भी उस क्षण कुछ ऐसा ही लिखा जा रहा था। उत्सव की भीड़ को चीरती हुई बड़े पऴुवेत्तरायर की भव्य शोभायात्रा बल खाती हुई आगे बढ़ रही थी, और वह मुँह बाए उसी ओर ताक रहा था। उसका घोड़ा कुछ दूरी पर चुपचाप खड़ा था।
पऴुवूर की शोभायात्रा में पीछे रह गए कुछ सैनिक, जो अपने साथियों से थोड़ा पिछड़ गए थे, जल्द ही उस अकेले खड़े जानवर पर जा टिके।
“अरे,” एक बोल उठा, “उस खच्चर को तो देखो!”
“वह घोड़ा है, खच्चर नहीं, गदहे कहीं के,” दूसरे ने सुधारा।
एक तीसरा कंठ बीच में ही झल्लाकर बोल पड़ा, “तुम दोनों पंडित अपनी व्याकरण की पोथी ज़रा परे रखकर यह क्यों नहीं देखते कि जानवर सचमुच घोड़ा है या गधा?”
“यह काम मुझे खूब भाया,” चौथे व्यक्ति ने सहमति जताई। इतना कहकर वह घोड़े की ओर बढ़ा, और अनाड़ीपन से उसकी पीठ पर चढ़ने का प्रयास करने लगा। उस बुद्धिमान जानवर ने भाँप लिया कि यह रूखा आगंतुक उसका स्वामी नहीं है। एक तीखे झटके से उसने उस आदमी को नीचे पटक दिया और खीझकर तेज़ी से हट गया।
“वाह! वाह! मिज़ाज तो देखो ज़रा!” धूल में गिरे उस सैनिक ने ख़ुद को झाड़ते हुए खिलखिलाकर कहा। “खच्चर ने तो मुझे चढ़ने ही नहीं दिया। भारी संभ्रांत जानवर है — स्वामी के रूप में किसी प्राचीन राजवंश का व्यक्ति चाहता है।” वह रुककर गहराई से सोचने का अभिनय करने लगा। “तब तो तंजावुर के मुत्तरायर वंश के राजकुमार के सिवा और किसी से काम नहीं चलेगा!” इस चुटकी पर आसपास के सैनिक प्रशंसात्मक ठहाकों में फूट पड़े।
इस व्यंग्य के पीछे एक इतिहास था। तंजावुर के मुत्तरायर वंश का सौ वर्ष पूर्व ही समूल नाश कर दिया गया था, और उनके स्थान पर अब चोल साम्राज्य का गर्वीला बाघ-ध्वज विजय-गर्व से फहरा रहा था।
“घोड़े ने क्या सोचा, इससे किसी को क्या?” दल के एक और सदस्य ने जोड़ा। “मैं तो कहता हूँ, हमारा यह थांडवरायन कब के मरे हुए तंजावुर के मुत्तरायरों के किसी भी वंशज से हज़ार गुना बेहतर है!”
“थांडवराया, ज़रा ठीक से देख तो लो कि वह सचमुच घोड़ा है, या मंदिर के उत्सव के लिए बनाया गया नकली पैरों वाला काठ का पुतला,” एक और सैनिक ने ताना कसा। “तुम्हें तो उसने चढ़ने ही नहीं दिया, क्यों?”
“उत्तम विचार है,” थांडवरायन ने सहमति जताते हुए परखने का उपक्रम किया। वह फिर से घोड़े के पास गया और इस बार उसकी पूँछ पकड़कर सहसा एक क्रूर मरोड़ दे दी।
जानवर ने तय कर लिया कि बहुत हुआ, अब और नहीं। उसने विरोध में तीन-चार बार पिछली टाँगें उछालकर लातें मारीं, फिर आतंक में भरकर बेतहाशा भागने लगा।
“अरे, देखो तो कैसे भागता है! तो यह सचमुच का खच्चर है — हम भी क्या ग़लती कर रहे थे!” सैनिक चिल्लाए, इस मनोरंजक तमाशे में पूरी तरह मग्न होकर। उन्होंने तीखी सीटियाँ बजाईं, गला फाड़कर “उई! उई!” चिल्लाए, और जब घोड़ा हड़बड़ाहट में उत्सव की भीड़ में जा घुसा, तो वे भी अंधों की तरह उसके पीछे दौड़ पड़े।
संध्या का आनंद लेने निकले लोग अपनी जान बचाने के लिए हटने की चेष्टा कर रहे थे, क्योंकि आतंकित जानवर भीड़ को धकेलता हुआ अंधाधुंध आगे बढ़ रहा था। अधिकांश तो समय पर बच निकले, पर कुछ अभागे गरजते खुरों के नीचे आकर मामूली रूप से घायल हो गए। कोलाहल में दिशाहीन घोड़ा बस भागता ही रहा।
यह सब कुछ ही क्षणों में घट गया, इससे पहले कि वंदियादेवन होश सँभालकर कुछ कर पाता। आऴ्वारक्काडियान नंबि ने उस तरुण के विचलित मुख को देख लिया था, इसलिए उसने ठीक ही अनुमान लगा लिया कि भागता हुआ घोड़ा उसी का है।
“पऴुवूर के उन गधों की करतूत देखी, तंबि?” वैष्णव का स्वर आश्चर्यजनक रूप से मृदुल था। “अभी-अभी मुझे जो बड़ी सीख देने का वचन दे रहे थे, वह उन्हें क्यों न दे सके?”
यह चिकना-चुपड़ा ताना सीधे निशाने पर जाकर लगा। क्रोध से वंदियादेवन का मुख लाल हो उठा। फिर भी, दाँत भींचकर उसने स्वयं को शांत रखा। पऴुवूर के लोग अपनी पूरी भयावह शक्ति के साथ निकले थे; मार्ग में सैकड़ों लोगों से हाथापाई करने का कोई अर्थ नहीं था। इसके अलावा, वे घोड़े के स्वामी से झगड़ा मोल लेने के लिए पीछे नहीं रुके थे; जानवर को सताकर वे अपनी ही धुन में खिलखिलाते हुए आगे बढ़ चुके थे।
वंदियादेवन ने बुद्धिमानी से अपने घोड़े के पीछे जाने का निश्चय किया। जानवर तब तक अपनी गति धीमी कर हक्का-बक्का-सा रुक गया था। उसके खो जाने का भय विशेष नहीं था; वह जानता था कि घोड़ा भली-भाँति प्रशिक्षित है, वह उससे कभी अधिक दूर नहीं जाएगा। सच तो यह था कि उसके हाथ उन दंभी मूर्खों को एक करारा सबक सिखाने के लिए खुजला रहे थे — किंतु अभी समय नहीं था। उसे एक अच्छे अवसर की प्रतीक्षा करनी होगी, बस।
भीड़-भाड़ से बहुत दूर, एक इमली के बाग की ठंडी छाया में घोड़ा थर-थर काँपता हुआ रुका था। उसके झुके हुए मुख से मानो दुःख झर रहा था, और वंदियादेवन के पास आते ही उसने एक मृदु, करुण हिनहिनाहट की। मुझे उन दुष्ट गुंडों के बीच अकेला क्यों छोड़ गए? — मानो वह यही पूछ रहा हो। वंदियादेवन उसके बिखरे हुए स्नायुओं को शांत करने के कोमल कार्य में लग गया। उसकी गर्म, धूल-भरी पीठ सहलाई, कानों में प्यार से फुसफुसाया, और अंततः जानवर को इतना शांत कर लिया कि उसे पैदल ही वापस बड़े मार्ग पर लाया जा सका।
किंतु भीड़ ने उसे देखते ही आलोचना के बाणों से बींध दिया।
“इस शांत उत्सव में ऐसा अड़ियल जानवर क्यों ले आए हो, छोकरे?” उन्होंने ऊँचे स्वर में शिकायत की। “देखो तो, उसकी लातों से कितने निर्दोष लोगों को कष्ट पहुँचा!”
भीड़ में कुछ अन्य लोग थोड़े अधिक दयालु थे। “इसमें बेचारे लड़के का कोई दोष नहीं,” उन्होंने तर्क दिया। “वह और क्या करता? बेचारा घोड़ा ही क्या करे, कहो? यह तो केवल पऴुवूर के उन उद्धत लोगों की मूर्खता और नीचता है।”
आऴ्वारक्काडियान धैर्यपूर्वक खड़ा प्रतीक्षा कर रहा था। जब वंदियादेवन घोड़े को खींचता हुआ लौटा, तो उस तरुण का मुख एक नई खीझ से सिकुड़ गया। यह झगड़ालू गधा मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ता? उसने मन-ही-मन सोचा।
“किस ओर चले, तंबि?” वैष्णव ने प्रफुल्लित स्वर में पूछा।
“वो — अह — मेरा तो पूरा इरादा पश्चिम जाने का है, फिर दक्षिण की ओर मुड़ूँगा, उसके बाद शायद थोड़ा पूरब का चक्कर लगाकर अंत में फिर दक्षिण-पश्चिम की ओर लौटूँगा,” उस व्यक्ति को भ्रम में डालने की आशा से वंदियादेवन सरपट बोल गया।
“मैंने ठीक वह नहीं पूछा। आज रात कहाँ ठहरने का विचार है?”
“तुम क्यों जानना चाहते हो?”
“नहीं, मतलब यदि कडम्बूर के शंबुवरायर के प्रासाद में ठहरना चाहते हो, तो तुम्हारे लिए मेरे पास एक छोटा-सा काम है।”
“वाह!” तरुण बोल उठा। “तुम कोई काला जादू या मंत्र-तंत्र में माहिर हो क्या? तुम्हें कैसे पता चला कि मैं कहाँ जा रहा हूँ?”
“इसमें किसी जादूगर की महारत नहीं चाहिए,” नंबि ने सहजता से उत्तर दिया। “आज देश के विभिन्न भागों से दर्जनों महत्त्वपूर्ण अतिथि पधार रहे हैं, और वे सभी उसी प्रासाद में ठहरेंगे।”
“ऐसा है क्या?” वंदियादेवन बुदबुदाया, उसके कंठ में विशुद्ध आश्चर्य का रंग था।
“निश्चय ही। यह मत कहना कि तुम यह नहीं जानते थे — वह सुंदर पालकी, राजछत्र, हाथी, घोड़े, ढोल, शंख और तुरहियाँ कडम्बूर राजपरिवार के अतिरिक्त और किसकी हो सकती हैं? वे विशेष रूप से बड़े पऴुवेत्तरायर का स्वागत कर उन्हें अपने प्रासाद में ले जाने के लिए आए थे। उस कद का व्यक्ति इससे कम की आशा भी नहीं करता, और न ही स्वीकार करता है।”
यह तो सचमुच की ख़बर थी। चोल देश के सबसे बड़े, सबसे भयंकर योद्धा के साथ एक ही छत के नीचे रहने का अवसर सरलता से नहीं मिलता। कौन जाने? शायद ईश्वर की कृपा से कोई ऐसा बहाना भी मिल जाए, जिससे सचमुच उस महान व्यक्ति के दर्शन हो जाएँ, और अपना परिचय भी दिया जा सके। यह सब अत्यंत लोभनीय था — यद्यपि मार्ग में पऴुवेत्तरायर के गुंडों के साथ घटी हालिया अप्रिय घटना ने उसकी आशाओं में थोड़ा कड़वा स्वाद घोल दिया था।
इन्हीं विचारों में डूबे वंदियादेवन को आऴ्वारक्काडियान के स्वर ने फिर से अपनी ओर खींचा।
“तंबि — मेरा एक उपकार करोगे?” आऴ्वारक्काडियान के स्वर में एक असंगत-सी मिनति थी।
“मैं तुम्हारा ऐसा क्या उपकार कर सकता हूँ? मैं तो स्वयं इस क्षेत्र में सर्वथा अपरिचित हूँ।”
“तुम्हारी क्षमता से बाहर कुछ नहीं माँगूँगा। केवल आज रात मुझे अपने साथ कडम्बूर प्रासाद में ले चलो।”
“फिर क्यों? क्या वहाँ किसी हठी शैव के मिलने की आशा कर रहे हो? या किसी को घेरकर शिव और तिरुमाल के गुण-अवगुण पर तर्क-वितर्क करने को आतुर हो?”
“बिलकुल नहीं,” नंबि ने कहा, वह लगभग आहत दिख रहा था। “क्या तुम सचमुच सोचते हो कि झगड़ना ही मेरा पेशा है? सुनो, आज रात प्रासाद एक बड़े उत्सव में गूँजेगा। एक विशाल भोज तो होगा ही, उसके बाद नाना प्रकार के भव्य मनोरंजन होंगे — कलियाट्टम (एक भव्य लोकनृत्य), सामियाट्टम (देवताओं के आवेश का नृत्य), एक मनोरम कुरवैकूत्तु (घुमंतुओं का पारंपरिक नृत्य), और असीम नाच-गाना। मैंने कभी ठीक से कूत्तु (पथनाट्य) नहीं देखा, यह एक उत्तम अवसर होगा।”
“वह तो ठीक है — किंतु मैं तुम्हें भीतर कैसे ले जाऊँगा?”
“तुम केवल मुझे अपना सेवक बताकर परिचय करा सकते हो।”
कुछ क्षण पूर्व इस व्यक्ति को लेकर वंदियादेवन के मन में जितने भी संदेह उपजे थे, वे सब पूरी शक्ति से लौट आए, और प्रत्येक क्षण और भी पुष्ट हो रहे थे।
“सुनो, अपनी ये तुच्छ चालें किसी और पर आज़माना,” उसने दृढ़ स्वर में कहा। “मैं इन सबमें फँसने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। तुम जैसे व्यक्ति को सेवक का स्वाँग रचाने से अधिक अप्रिय कार्य मेरे लिए और कोई नहीं, और इस हास्यास्पद बात पर विश्वास ही कौन करेगा? कोई नहीं करेगा, चाहे मैं मूर्खता में तुम्हें साथ ले भी लूँ। इसके अतिरिक्त, भीड़ के बारे में तुम जो कुछ कह रहे हो, उससे तो संदेह होता है कि आज रात मुझे स्वयं वहाँ ठहरने की जगह मिलेगी भी या नहीं।”
“तो — तुम किसी औपचारिक निमंत्रण पर कडम्बूर नहीं जा रहे हो?”
“जा तो रहा हूँ, एक प्रकार से। शंबुवरायर का पुत्र कंदन मारन मेरा बहुत प्रिय मित्र है, उसने बार-बार आग्रह किया था कि जब भी इस क्षेत्र में आऊँ, तो उसके यहाँ अवश्य जाऊँ।”
“बस यही?” नंबि ने भौंहें उठाईं। “तो फिर केवल एक पुराने वचन के भरोसे आज रात प्रासाद में प्रवेश पाना तुम्हारे लिए सरल नहीं होगा!”
कुछ देर वे धूल-भरी राह पर चुपचाप साथ-साथ चलते रहे। संध्या की हवा उष्ण थी, उसमें कुचली हुई पत्तियों और नदी के जल की गंध मिली थी।
“तुम केवल मेरा पीछा क्यों कर रहे हो?” अंततः वंदियादेवन ने पूछा।
“मैं भी तुमसे ठीक यही बात पूछ सकता हूँ। तुम अपने मार्ग पर क्यों नहीं जाते?”
“क्योंकि मैं इस क्षेत्र के मार्ग नहीं जानता, बस। नंबि, क्या तुम भी कडम्बूर जा रहे हो?”
“नहीं — तुमने तो दृढ़ता से मुझे साथ ले जाने से मना कर दिया, है न? मैं तो विण्णगर मंदिर जा रहा हूँ।”
“वीर नारायण पेरुमाल मंदिर, यही न?”
“हाँ।”
“मेरा भी मन हो रहा है कि उसे एक बार देख आऊँ।”
“सच में?” नंबि प्रसन्न दिखा। “मैं तो सोच रहा था कि तुम भी उन लोगों में से हो, जो विष्णु मंदिर में प्रवेश करने पर आपत्ति करते हैं। इसका इतिहास बड़ा अद्भुत, महान और सचमुच पूजा के योग्य है। यहाँ एक भट्टर (मंदिर के पुरोहित) हैं, नाम है ईश्वर मुनिगल, जो देवता की सेवा करते हैं। वे वास्तव में एक महान व्यक्ति हैं।”
“मैंने भी उनके विषय में सुना है,” वंदियादेवन ने कहा। “किंतु मंदिर तो आज भयानक भीड़ से खचाखच भरा दिख रहा है! कोई शुभ अवसर-वसर है क्या?”
“निश्चय ही। आज बारह महान आऴ्वारों (भगवान विष्णु के परम कवि-संत) में से एक, तिरुमाल की श्रेष्ठ भक्त देवी आण्डाल का जन्म-नक्षत्र है। उस पर आज आड़ि पेरुक्कु भी है — इसी से इस उमड़ती भीड़ का पूरा स्पष्टीकरण मिल जाता है। आश्चर्य की कोई बात नहीं, है न?”
आऴ्वारक्काडियान ने अब बात का रुख थोड़ा मोड़ा। “तंबि, कभी आण्डाल का कोई सुंदर गीत सुना है?”
“नहीं, नहीं सुना।”
“सुनना भी मत। कभी नहीं, कभी ऐसा प्रयास भी मत करना!”
“अचानक इतना विद्वेष क्यों?”
“उनके पासुरम (भक्तिगीत) के प्रति मेरा कोई विद्वेष-वितृष्णा नहीं है,” नंबि ने कहा। “मैं तो केवल उनकी सर्वनाशी, अप्रतिरोध्य मोहिनी शक्ति के विषय में सावधान कर रहा था। मेरे भाई, यदि तुम्हारे जीवन में कभी उन अनुपम कविताओं को सुनने का दुर्भाग्य — नहीं, कहूँ सौभाग्य ही — हुआ, तो तुम तत्काल अपने भाले-तलवार फेंक दोगे; रूखा-सूखा सैनिक-जीवन त्याग दोगे, और देश के सभी विण्णगर मंदिरों में आजीवन तीर्थयात्रा पर ही घूमते रहोगे!”
“क्या तुम उनमें से कुछ जानते हो? गा सकते हो?”
“कुछ-एक। परमपूज्य नम्माऴ्वार के कुछ दिव्य पद भी सीखे हैं। मंदिर में जाकर उन्हें गाने का विचार है; इच्छा हो तो सुन सकते हो,” नंबि ने उत्तर दिया। “आह, यह तो हम आ ही गए!”
और सचमुच, वे तब तक वीर नारायणपुर मंदिर के विशाल तोरणद्वार पर पहुँच चुके थे।
(अभी एक क्षण रुककर महान प्रथम परान्तक चोल का स्मरण करना उचित होगा, जो विजयालय चोल के ख्यातिलब्ध पौत्र थे। वे “मदुरै और ईऴम के विजेता कोप्परकेसरी” नामक उस गौरवमयी उपाधि को धारण करते थे — और उन्होंने ही उस प्रबल साम्राज्य की नींव डाली थी, जो बाद में चोल राज्य बना। परान्तक के कोष में कुछ और भी महान उपाधियाँ थीं। वे ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने तिल्लै चित्रम्बलम, महान चिदम्बरम मंदिर को स्नेहपूर्वक शुद्ध स्वर्ण की छत से मढ़ दिया था। चोल सिगामणि, शूर सिगामणि — ये सब उपाधियाँ उनकी थीं, और साथ ही वीर नारायण नाम भी।
उनके समय में उत्तर के रेट्टै मंडलम राज्य के राष्ट्रकूट राजा पर्याप्त भयंकर शक्ति के स्वामी थे। परान्तक ने विवेकपूर्वक यह संदेह किया था कि वे संभवतः चोल भूभाग पर दृष्टि गड़ाए हुए हैं। इसलिए उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र, राजकुमार राजादित्य को एक विशाल, अस्थिर सैन्यदल के साथ तिरुमुनैप्पाड़ि देश में तैनात कर दिया।
राजादित्य व्यावहारिक बुद्धि के तरुण थे, लाखों शक्तिशाली योद्धाओं को निष्क्रिय बिठाए रखना उन्हें पसंद नहीं था। उन्होंने एक अद्भुत युक्ति सोची: कुछ ऐसा किया जाए जिससे स्थानीय विशाल जनसंख्या का वास्तविक हित हो। वे जानते थे कि कोल्लिडम नाम से जानी जाने वाली बेलगाम कावेरी के तटों से उमड़कर प्रचुर मीठा जल प्रतिदिन व्यर्थ ही सागर में जा मिलता है, किसी के काम आए बिना। इसलिए उन्होंने व्यवस्था की कि उनके सैनिक उस जल को रोकने के लिए एक विशाल झील का खनन करेंगे।
अपने प्रिय पिता के सम्मान में इस विशाल जलाशय का नाम उन्होंने वीर नारायण एरि रखा, और उसके तट पर एक विण्णगर मंदिर का निर्माण कराया। (उन दिनों, जानते हो, विष्णु मंदिर या विष्णुगृह को शिष्ट तमिल भाषा में ‘विण्णगरम’ कहना काफी प्रचलित था।) भगवान तिरुमाल — या अन्य नाम से श्रीमान नारायण मूर्ति — क्षीरसागर की सर्पशय्या पर लेटे हुए भी महान रक्षक, सर्वप्राणों के परम पालक थे। उनके नाम पर बने मंदिर इसलिए प्रायः बड़ी-बड़ी झीलों के शीतल, हवादार तटों पर ही उठते थे। इसी कारण इस झील के तट पर भी वीर नारायण मंदिर की यह मनोहर उपस्थिति थी।)
आऴ्वारक्काडियान और वंदियादेवन चुपचाप इस प्राचीन मंदिर के पवित्र, पत्थर-जड़े प्रांगण में प्रविष्ट हुए। गर्भगृह के निकट पहुँचकर वैष्णव ने एक बार गला साफ़ किया, आँखें मूँद लीं, और गाना आरंभ कर दिया।
उसने आण्डाल के कुछ दिव्य पासुरम गाए, प्राचीन पत्थरों पर उसका कंठ स्पष्ट और खरा होकर गूँज उठा, और अंत में उसने नम्माऴ्वार की उस महान रचना को छुआ, जिसे सामान्यतः तमिऴ वेदम् (पवित्र वेदों का तमिल रूप) कहा जाता है:
“पोलिग पोलिग पोलिगपोयित्रु वल्लुयिर चाबमनलियुम् नरगमुम् नैन्दनमनुक्कु इङ्गु यातोऩ्रुम् इल्लैकलियुम् केडुम् कण्डुकोळ्मिन्कडल्वण्णन् भूदङ्गल् मन्मेल्मलियप्पुगुन्दु इसैपाड़िआड़ि उझितराक् कण्डोम्!
कण्टोम् कण्टोम् कण्टोम्कण्णुक्किनियान् कण्टोम्तोण्डीर् एल्लीरुम् वारीर्तोझुतु तोझुतु निऩ्रार्तुम्वण्टार् तन्नन्तुझ़ायान्माधबन् भूदङ्गल् मन्मेल्पण्डान् पाड़ि निऩ्राड़िप्परन्दु तिरिगिऩ्रनवे!”
(देखो, देखो, उस प्रभु की दीप्त करुणा, जो हमें अभिशाप से उबारते हैं; देखो उस प्रकाश को, जो नरक के अंधकार को मिटा देता है; जो हमें मृत्यु के पाश से मुक्त करता है। कलि के अंधकार युग का अंत हो, और जो भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे इस पृथ्वी पर पुनः जागृत होंगे; गाओ और नाचो, विजय का गीत! देखो, देखो, वह दृश्य, जो हमारे हृदय को भर देता है; उनके सेवकों की प्रार्थनाएँ उन तक पहुँचने के लिए उठ रही हैं; हम, जो उनका स्तवन करते हैं, उनकी कृपा के आनंद में खो जाते हैं, जैसे उनकी तुलसी-माला के मधु में मत्त मधुमक्खियाँ!)
गाते-गाते आऴ्वारक्काडियान की आँखों में घने आँसू भर आए, जो गालों पर धीरे-धीरे ढुलक पड़े, उसने स्वयं को पूरी तरह उस दिव्य सौंदर्य के प्रति समर्पित कर दिया। वंदियादेवन ने भी ध्यान से सुना। उसकी आँखों में जल तो नहीं आया, किंतु उसने अनुभव किया कि गीतों के प्राण-स्वरूप उस सरल सौंदर्य और शुद्ध, आडंबरहीन भावना से उसका तरुण हृदय भी पिघल रहा था। आऴ्वारक्काडियान के प्रति उसका दृष्टिकोण गहराई से बदल गया। यह व्यक्ति, उसने मौन श्रद्धा से सोचा, भगवान का एक सच्चा, समर्पित सेवक है।
वह तरुण अकेला नहीं था, और भी कई लोग उस मधुर संगीत में डूब गए थे। मुदलियार (मंदिर के वरिष्ठ अधिकारी) उस सुर में स्वयं को भूल गए, वैसे ही खो गए वे कोमल पुरोहित ईश्वर भट्टर, जिनकी आँखों में जल छलछला रहा था, जो गर्भगृह के पार्श्व में खड़े थे। उनके ठीक बगल में एक नव-किशोर बालक खड़ा था, जिसका एकाग्र ध्यान पूर्णतः गायक वैष्णव पर टिका था।
आऴ्वारक्काडियान ने अपार आवेग में ऐसे दस पासुरम गाए, फिर एक और से अपनी प्रस्तुति समाप्त की:
“कलि वयल तेन्नन् कुरुगूर्कारि मारन् सडगोपन्ओलि पुगऴ आयिरत्तुइप्पतुम्उल्लत्तै मास रुक्कुमे!”
(गाओ इन मधुर गीतों को, हे भक्तगण, जो कुरुगूर के कारि मार सडगोपन ने दिव्य प्रभु के सम्मान में रचे हैं — और तुम्हारा हृदय धुल जाएगा सभी कलंकों से!)
अंततः जब वह रुका, तो बालक अपने पिता की ओर झुककर कानों में कोमल स्वर में कुछ फुसफुसाया। भट्टर सुनने के लिए नीचे झुके थे, फिर सीधे खड़े होकर धीरे-से अपनी आँखें पोंछीं।
“अय्या,” पुरोहित ने नंबि को संबोधित किया। “परमपूज्य नम्माऴ्वार, कुरुगूर के सडगोपन, ने क्या हमारे प्रभु की स्तुति में सहस्र गीत नहीं रचे हैं? क्या तुम वे सभी जानते हो?”
“इस अधम को वह महासौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ,” नंबि ने विनम्रता से उत्तर दिया। “दुःख की बात है, मैं केवल कुछ-एक ही जानता हूँ।”
“कृपया मेरे इस बालक को तुम जो जानते हो, वही सिखा दो,” भट्टर ने अनुरोध किया।
(यह सोचना कितना अद्भुत है कि आने वाले वर्षों में वीर नारायणपुरम की नियति में और भी बहुत गौरव लिखा है। यह नन्हा बालक, भट्टर का पुत्र, जो अब अपने पिता के पास खड़ा नम्माऴ्वार के शुद्ध पासुरम इतने ध्यान से सुन रहा है, जिसका मुखड़ा निर्दोषता और यौवन की उज्ज्वल दीप्ति की एक आदर्श छवि है — वह एक दिन बड़ा होकर महान नादमुनिगल बनेगा। अनेक वैष्णव आचार्यों में वह प्रथम और श्रेष्ठतम होगा। जीवन के उत्तरार्ध में वह कुरुगूर की यात्रा करेगा, जिसे आऴ्वार तिरुनगरी के नाम से भी जाना जाता है, और श्रमसाध्य रूप से नम्माऴ्वार के सभी सहस्र सुंदर पदों को एकत्रित करेगा, तमिऴ वेदम् के रचयिता उस महान भक्त के गौरव में और भी चिरस्थायी ख्याति जोड़ेगा।
नादमुनिगल के अनेक निष्ठावान शिष्य तब इन पदों को सँजोकर संकलित करेंगे, कंठस्थ करेंगे, और देश के सभी मंदिरों में गाएंगे। और उसका महान कार्य यहीं नहीं रुकेगा: नादमुनिगल का अपना पौत्र आलवंदार एक ऐसा जीवन जिएगा, जो नियति से समृद्ध, अपने दादा से भी कहीं अधिक अलौकिक घटनाओं से चिह्नित होगा।
इस शांत नगर पर और भी प्रशंसा बरसेगी: स्वयं महान उदयवर श्री रामानुज एक दिन इस स्थान पर, ऐसी महानता की जन्मभूमि पर, पधारेंगे। वे खड़े होकर विस्मय से उस विशाल वीर नारायणपुरम झील और उसकी चौहत्तर उमड़ती नहरों को देखेंगे। वे भगवान तिरुमाल की उस अंतहीन कृपा और करुणा के बारे में गहराई से सोचेंगे, जो भक्तों पर आशीर्वाद बरसाते हैं ठीक वैसे ही जैसे वे नहरें झील में जीवनदायी जल उँडेलती हैं। यह दर्शन उस संत को एक महान विचार की ओर ले जाएगा — भक्तों के लिए चौहत्तर आचार्य पीठम् (पवित्र वैष्णव केंद्र) स्थापित करने का विचार। कालक्रम में इसी से चौहत्तर सिंहासनाधिपतियों का जन्म होगा, जो बारी-बारी से भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान और कृपा वितरित करेंगे, और एक समृद्ध, अविच्छिन्न परंपरा आरंभ होगी, जो शताब्दियों तक प्रवाहित होती रहेगी।
किंतु ऐसे महिमामय प्रसंग तो भविष्य के गर्भ में हैं, हमारी इस वर्तमान कथा की परिधि में ठीक नहीं आते। उन संत-जीवनों की कथा हम वैष्णव गुरु-परंपरा के सयत्न-संकलित ग्रंथ-समूहों के हाथों में छोड़ते हैं, और लौटते हैं अपने तरुण वंदियादेवन की ओर।)
पूजा समाप्त कर मंदिर की शीतल छाया से बाहर आने के बाद वह वानर योद्धा आऴ्वारक्काडियान की ओर मुड़ा।
“नंबि, तुम्हें मुझे क्षमा करना ही होगा,” उसने कहा, उसके कंठ में सच्चा पश्चाताप था। “मैं लेशमात्र भी नहीं जानता था कि तुम इतने गहरे भक्तिमान व्यक्ति हो, अथवा इन विषयों के इतने बड़े पंडित। मेरी अज्ञानी, हठधर्मी बातें तुम मन में तो नहीं रखोगे?”
“निश्चय ही, तुम्हें मेरी क्षमा मिली,” नंबि ने हल्के-फुल्के स्वर में कहा। “किंतु बताओ तो — मेरा एक छोटा-सा उपकार करोगे?”
“मैंने तो पहले ही कह दिया कि तुम जो चाह रहे थे, वह मैं नहीं कर सकता — और तुम भी तो उस पर सहमत हो गए थे, है न?”
“आह, किंतु अब जो मैं चाहता हूँ, वह बिलकुल अलग बात है। मैं तुम्हें एक छोटी-सी मुड़ी हुई चिट्ठी दूँगा। यदि आज रात भाग्यवश कडम्बूर प्रासाद में ठहरने का अवसर मिल जाए, तो बस उसे एक विशेष व्यक्ति तक पहुँचा देना।”
“ओह? और किसे?”
“उस रमणी को, जो बड़े पऴुवेत्तरायर के पीछे-पीछे आई, वही जो कसकर बंद की हुई पालकी में चल रही थी।”
वंदियादेवन तत्काल भड़क उठा। “नंबि, तुम मुझे समझते क्या हो? क्या मैं सचमुच ऐसा व्यक्ति दिखता हूँ, जो छिप-छिपकर स्त्रियों तक गुप्त चिट्ठियाँ पहुँचाता फिरे? सुनो, यदि तुम्हारे अतिरिक्त किसी और ने मुझसे यह याचना की होती—”
“यदि अनिच्छा है, तंबि, तो रहने दो, छोड़ दो,” नंबि ने सहजता से बात काटी। “इस पर इतना तपने की आवश्यकता नहीं। बात यह है — इस छोटे से कार्य में मेरी सहायता करने पर भविष्य में किसी समय मैं भी शायद तुम्हारी ओर अपना मूल्यवान सहायता का हाथ बढ़ा देता। खैर, जाने दो।”
वंदियादेवन ने और देर नहीं की। एक छलाँग में घोड़े की पीठ पर जा बैठा, एड़ लगाई, और संध्या की धूल को चीरता हुआ तीव्र गति से सरपट दौड़ पड़ा, सीधा कडम्बूर के दुर्ग की ओर।
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