गाँव के अन्नदा राय महाशय हाल ही में बड़ी विपदा में पड़ गए हैं।
गाँव में ज़मीन की पैमाइश का काम जो शुरू हुआ, तो उत्तरी मैदान में खेमे तन गए। पैमाइश के बड़े अफ़सर ने मैदान के बीच, नदी के किनारे अपना दफ़्तर खोल लिया है, और अपने साथ ढेरों छोटे-मोटे अमले भी ले आए हैं। गाँव के सभी भद्रजन कुछ-न-कुछ ज़मीन-जायदाद के मालिक थे; पुरखों की अर्जित की हुई इन सम्पत्तियों के निरापद तट पर जीवन-नौका का लंगर गाड़कर जड़ पदार्थ की भाँति उद्यमहीन, गतिहीन, निष्क्रिय अवस्था में उनके दिन एक तरह से बड़े आराम से कट रहे थे, लेकिन अबकी बार सभी थोड़ी मुसीबत में पड़ गए हैं। राम शायद श्याम की ज़मीन पर बेखटके अपना हक़ जमाए बैठा था, यदु दस बीघे का लगान देकर बारह बीघे पर निर्विरोध कब्ज़ा किए हुए था—अब तक जो कुछ भी पूरी शांति से सम्पन्न हो रहा था, अब उन सबमें बखेड़ा खड़ा हो गया।
विपदा यों तो एक तरह से सबकी थी, पर अन्नदा राय की विपदा कुछ अलग ही क़िस्म की, या कि ज़रा ज़्यादा गंभीर थी। उनका एक ज्ञाति-भाई (एक ही वंश का भाई) बहुत दिनों से परदेस में रह रहा था। इतने दिनों तक वे उस परदेसी भाई के आम-कटहल के बाग़ और ज़मीन का निर्विघ्न भोग कर रहे थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि पैमाइश के समय अगर दाँव लगा तो सारी-की-सारी, या कम-से-कम उसका कुछ हिस्सा तो अपने नाम लिखवा ही लेंगे, लेकिन न जाने गाँव के किस आदमी ने उस परदेसी भाई को क्या चिट्ठी लिख मारी—जिसका नतीजा यह हुआ कि आज दस दिन हुए, उस भाई का बड़ा बेटा पैमाइश के समय जायदाद की देखभाल करने के लिए आ पहुँचा है। मुँह का निवाला तो गया ही, उसके अलावा और भी मुसीबतें थीं। उस रिश्तेदार के हिस्से के कमरे ही घर में सबसे अच्छे थे, राय महाशय पिछले बीस बरस से उन पर ख़ुद क़ब्ज़ा जमाए बैठे थे, अब वे छोड़ने पड़े हैं—वह लड़का शौक़ीन मिज़ाज का कॉलेजिया है, एक कमरे में सोता है, एक में पढ़ाई-लिखाई करता है—ऊपर वाले कमरे से संदूक, गिरवी रखे माल, काग़ज़-पत्र सब हटाने पड़े हैं। नीचे के जिस कमरे में पालितपाड़ा से सस्ते दाम पर ख़रीदी गईं कड़ियाँ-बर्गे रखे थे, वह कमरा भी जल्द ही छोड़ देना होगा।
दोपहर ढल चुकी थी। अन्नदा राय के चंडीमंडप में मोहल्ले के कुछ लोग आ जुटे थे—इसी समय चौसर-पासे की महफ़िल जमती है। लेकिन आज अभी तक काम निबटा नहीं था। अन्नदा राय एक-एक करके आए हुए क़र्ज़दारों को विदा कर रहे थे।
आँगन में ओसारे के ठीक नीचे एक कमसिन किसान-बहू, एक छोटे बच्चे को साथ लिए, घूँघट काढ़े बहुत देर से बैठी थी। अब अपनी बारी आई समझकर वह उठ खड़ी हुई। राय महाशय ने सिर थोड़ा-सा आगे झुकाकर, चश्मे के ऊपर से उसकी ओर ताकते हुए कहा—कौन? तेरा क्या काम है फिर?
किसान-बहू आँचल की खूँट खोलते-खोलते धीमी आवाज़ में बोली—मैं बड़ी मुश्किल से कुछ रुपयों का जुगाड़ कर पाई हूँ, मेरे ये रुपये ले लें... और कोठरी की चाबी खोल दें, बड़ी तकलीफ़ से गुज़र रही हूँ मालिक ठाकुर, क्या बताऊँ—
अन्नदा राय का चेहरा खिल उठा। बोले—हरि, ज़रा इसके रुपये गिन तो। बही-खाते में देख—तारीख़, सूद, एक बार फिर से हिसाब कर तो!
किसान-बहू ने आँचल की खूँट से रुपये निकालकर हरिहर के सामने ओसारे के किनारे रख दिए। हरिहर ने गिनकर कहा—पाँच रुपये?
राय महाशय बोले—अच्छा—जमा कर लो—उसके बाद, और रुपये कहाँ हैं?
—अभी तो यही लीजिए, बाद में दे दूँगी—मैं मजूरी करके—सब चुका दूँगी, अभी यही लेकर मेरी कोठरी की चाबी खोल दीजिए, मैं अपने बच्चे को दो निवाले खिलाकर पहले जिला तो लूँ, उसके बाद घर की छत जो टपक रही है, सो देखा जाएगा—
वह ऐसे इत्मीनान से बात कर रही थी मानो कोठरी की चाबी उसके हाथ आ ही गई हो। राय महाशय को पहचानने में उसे अभी देर थी।
राय महाशय ने बात पूरी भी न करने दी और बोल उठे—ओहो, इस औरत के तो नखरे ही बड़े हैं, सूद-मूल मिलाकर चालीस रुपये के क़रीब बक़ाया है—पाँच रुपये ले आई है, कहती है कोठरी खोल दो! छोटे लोगों के तो ढंग ही निराले होते हैं। जा, अभी दोपहर में दिक़्क़त मत कर—
वह किसान-बहू चंडीमंडप में किसी और के लिए अपरिचित नहीं थी। दीनू भट्टाचार्य को आँखों से ठीक से दिखता नहीं था, बोले—कौन है रे अन्नदा?
—अरे, उस पार के तमरेज की बहू है। चार दिन हुए न, तमरेज मर गया? सूद-मूल मिलाकर चालीस रुपये बाक़ी हैं, इसीलिए उसके मरने के दिन ही दोपहर बाद से कोठरी में ताला डाल रखा है। अब आई है, कोठरी खुलवा दीजिए—यह कर दीजिए—वह कर दीजिए—
पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाती तो भी तमरेज की बहू को इतना बड़ा झटका न लगता—अब जाकर उसे मामला कुछ-कुछ समझ में आया। आगे बढ़कर बोली—ऐसी बात न कहें मालिक ठाकुर, मेरे छोकरे का एक चाँदी का निमफल था, पिछले साल ही बनवाया था! वही भोंदा सुनार की दुकान पर बेचा तो पाँच रुपये मिले—बच्चे की चीज़ बेचने का मन तो नहीं था, पर क्या करती, अभी दो निवाले खिलाकर जान तो बचाऊँ, सोचा बाद में मालिक मोहलत देंगे तो अपने लाल को मैं फिर से निमफल बनवा दूँगी। तो दीजिए मालिक ठाकुर, चाबी दे दीजिए—
—जा जा—अभी जा—ये सब रुपये-पैसे के मामले क्या नाक रगड़ने से निबटते हैं? नहीं निबटते। यह तू क्या समझेगी, तेरा ख़ाविंद होता तो समझता, जा अभी दिक़्क़त मत कर—ये पाँच रुपये तेरे नाम पर जमा हो गए—बाक़ी रुपये लेकर आ, तब देखा जाएगा—
अन्नदा राय चश्मा उतारकर ख़ोल में रखते-रखते उठ खड़े हुए और घर के भीतर जाने को हुए। तमरेज की बहू ने व्याकुल स्वर में कहा—कहाँ जा रहे हैं मालिक ठाकुर, मेरे छोकरे का कोई उपाय तो करते जाइए, अरे मैं उसे खिलाऊँगी क्या, एक पैसे का मुरमुरा ख़रीदने को भी पैसा नहीं है—मेरी कोठरी नहीं खोलते तो न सही, मेरे रुपये तो मुझे लौटा दीजिए!
राय महाशय मुँह बिचकाकर बोले—जा जा, साँझ के वक़्त किच-किच मत कर—एक मुट्ठी रुपये पानी में जा रहे हैं, उसका कोई ख़याल नहीं, कोठरी खोल दो, रुपये लौटा दो—है भी क्या तेरी कोठरी में? मुश्किल से चार शली धान, उससे क्या क़र्ज़ चुकता होगा? ये पाँच रुपये भी वसूल हो गए, मैं अपने रुपये नहीं देखूँगा! इनके बेटे क्या खाएँगे, वह बता दो—बेटा क्या खाएगा, यह मैं क्या जानूँ? जा, हो सके तो नालिश करके खुलवा ले जा!
राय महाशय के घर के भीतर चले जाने पर दीनू भट्टाचार्य बोले—क्यों री बहू, तमरेज को गए कितने दिन हुए—सो तो—
—बुधवार के दिन, बाबा ठाकुर, हाट से भांगन मछली लाए थे, प्याज़ डालकर पकाया—भात परोसा—भले-चंगे आदमी ने ख़ूब अच्छी तरह खाया—खाकर बोले, मुझे ठंड लग रही है, कथरी ओढ़ा दो, ओढ़ा दी—हाय माँ, पौ फटते-न-फटते देखा कि आदमी में कोई सुध-बुध ही नहीं है, दोपहर होते-न-होते मुझे रास्ते पर बिठाकर—मेरे छोकरे को रास्ते पर बिठाकर—आँसुओं से उसका गला रुँध गया। मिन्नत के स्वर में बोली—आप लोग ज़रा कहिए—कहकर कोठरी की चाबी दिलवा दीजिए, घर-गृहस्थी में बड़ी तकलीफ़ आ गई है—क़र्ज़ क्या मैं बाक़ी रखूँगी—जैसे भी हो।
इसी समय नए आए हुए ज्ञाति-पुत्र के आ जाने से बातचीत रुक गई। दीनू बोले—आओ हे नीरेन बाबाजी, मैदान की तरफ़ टहलने गए थे क्या? समझे हे, यही तुम्हारे बाप-दादा का देश है, कैसा देखा, बताओ?
नीरेन ज़रा-सा हँसा। उसकी उम्र इक्कीस-बाईस से ज़्यादा नहीं थी, शरीर ख़ासा मज़बूत, क़द-काठी सुंदर। कलकत्ते के कॉलेज में क़ानून पढ़ता था, बेहद चुप रहने वाले स्वभाव का आदमी था—पिता के भेजने पर देखने-सुनने तो आया था, पर कामकाज वह कुछ न देखता था, न समझता था; दिन-रात नॉवेल पढ़कर और बंदूक चलाकर काटता था। साथ में एक बंदूक लाया था, शिकार का शौक़ बहुत था।
नीरेन ऊपर अपने कमरे में घुसने गया तो देखा, गोकुल की पत्नी कमरे के फ़र्श पर बैठी फ़र्श से कुछ बीन रही है। दरवाज़े के पास जाते ही उसकी नज़र पड़ी, उसका क़ीमती विलायती लैंप फ़र्श पर रखा था। उसका काँच का डोम टूटकर चूर-चूर हो गया था, सारे फ़र्श पर काँच बिखरा था। दरवाज़े पर जूतों की आहट पाकर गोकुल की पत्नी चौंककर पीछे मुड़ी, वह आँचल फैलाकर फ़र्श से काँच के टुकड़े बीन-बीनकर उठा रही थी। भाव से लग रहा था कि रोज़ की तरह कमरा साफ़ करने आई होगी, लैंप जलाने गई होगी और किसी तरह तोड़ बैठी, और लैंप के मालिक के आने से पहले ही ख़ुद ही जुर्म के निशान जल्दी-जल्दी मिटा देने की कोशिश में थी कि अचानक रंगे हाथ पकड़ी जाकर बेहद लज्जित हो गई। अपराधिन के संकोच का भार हल्का करने के लिए ही नीरेन हँसकर बोल उठा—अरे भाभीजी, आप तो लैंप तोड़कर बैठी हैं? ये देखिए, पकड़ी गईं! जानती हैं न, मैं क़ानून पढ़ता हूँ। अच्छा, अब ज़रा-सी चाय बनाकर ले आइए तो भाभीजी, झटपट, देखूँ तो कैसी काम की हैं आप। ठहरिए, लैंप जला लूँ, ख़ैरियत है कि बक्से में एक और डोम है।
गोकुल की पत्नी ने लजाते हुए स्वर में कहा, दियासलाई लाऊँ ठाकुरपो?
नीरेन ने मज़ाक़ के लहज़े में कहा—दियासलाई लाई नहीं थीं तो लैंप उतारकर कर क्या रही थीं, सुनूँ तो?
बहू अब हँस पड़ी, धीमे स्वर में बोली—कालिख जमी थी, सोचा ज़रा पोंछ दूँ, पर जैसे ही काँच उतारने गई, क्या जानूँ ये सब अँग्रेज़ी कल वाले लैंप— बात पूरी न करके वह दोबारा लजाकर हँसती हुई नीचे भाग गई।
नीरेन को आए दस-बारह दिन ही हुए थे, रिश्ते में भाभी होने पर भी गोकुल की पत्नी से उसका विशेष परिचय नहीं था। काँच टूटने की उस शाम से दोनों के बीच नए परिचय का संकोच जाता रहा। नीरेन एक संपन्न पिता का पुत्र था, ऊपर से बंगाल के देहात में वह पहली बार आया था, इस अकेले, आनंदहीन परदेस में दिन काटे नहीं कट रहे थे। हमउम्र भाभी के साथ परिचय की राह आसान हो जाने के बाद से सुबह-शाम चाय पीने का समय सहज आदान-प्रदान के माधुर्य से आनंदपूर्ण हो उठा!...
दोपहर को उस दिन दुर्गा घूमने आई। रसोई के दरवाज़े पर झाँककर बोली—क्या पका रही हो खुड़ीमाँ? बहू ने कहा—आ जा माँ, आ, ज़रा हाथ बँटाएगी? अकेले अब मुझसे हो नहीं रहा।...दुर्गा बीच-बीच में जब भी आती, खुड़ीमाँ के काम में मदद करती। वह मछली काटते-काटते बोली—हाँ खुड़ीमाँ, ये केकड़े कहाँ से मिले? ये केकड़े तो कोई खाता नहीं।
—क्यों नहीं खाता री, धत्! विधु जेलनी कह गई कि ये केकड़े सब खाते हैं।
—हाँ खुड़ीमाँ, अरे माँ रे, तुमने ख़रीदे?
—ख़रीदे ही तो, इतने सारे पाँच पैसे में दे गई विधु।
दुर्गा ने कुछ नहीं कहा। मन-ही-मन सोचा—खुड़ीमाँ की और सब बातें तो अच्छी हैं, बस थोड़ी-सी भोली हैं! ये केकड़े भला पैसे देकर ख़रीदता भी कौन है, और खाता भी कौन है? सीधी-सादी समझकर विधु ठग ले गई। साथ-ही-साथ इस भोली-भाली खुड़ीमाँ के लिए उसका स्नेह और भी गहरा हो गया।
उस दिन सुना था कि गोकुल-काका ने खुड़ीमाँ के सिर पर खड़ाऊँ से मारा था—स्वर्ण ग्वालिन उनके घर पर यही क़िस्सा सुना रही थी। वह भी उस दिन नदी के घाट पर नहाने गई थी। खुड़ीमाँ नहाने आई तो सिर डुबोकर नहीं नहाई, कहीं जलन न हो। उस दिन दुख से उसका कलेजा फटा जा रहा था; लेकिन उसने कुछ कहा नहीं, कहीं खुड़ीमाँ झेंप न जाए—एक घाट लोगों के सामने शर्मिंदा न हो। फिर भी राय-जेठी ने पूछ ही लिया था, बहू, नहाई नहीं?...खुड़ीमाँ ने हँसकर जवाब दिया, आज नहीं नहाऊँगी दीदीमाँ, तबीयत ठीक नहीं है।...
खुड़ीमाँ ने सोचा था कि उसके मार खाने की बात शायद कोई नहीं जानता। लेकिन खुड़ीमाँ के घाट से उठकर जाते ही राय-जेठी बोली—देखा बहू को, गोकल्या ने कैसे मारा है, सिर के बालों में ख़ून एकदम सूखकर चिपक गया है।...राय-जेठी ने बड़ा अन्याय किया। जानती हो बापू, तो फिर पूछना ही क्यों, और सबको बताना ही क्यों?...
मछली धोकर रखते हुए चले जाने के समय दुर्गा ने डरते-डरते कहा—खुड़ीमाँ, तुम्हारे यहाँ चिउड़ा बनाने वाला धान है? माँ कह रही थी, अपू ने चिउड़ा खाने की ज़िद की है, पर हमारे यहाँ तो इस बार धान ख़रीदा नहीं गया।...गोकुल की बहू ने चुपके से कहा—दोपहर के बाद आना।...दालान की तरफ़ इशारा करके कहा—जब सो जाएँ तब आना!
दुर्गा ने पूछा—खुड़ीमाँ, तुम्हारे घर कौन आया है, मैंने तो एक दिन भी नहीं देखा।
—ठाकुरपो को नहीं देखा? अभी नहीं है, कहीं बाहर गया है, दोपहर ढले आना, दिख जाएगा।...फिर गोकुल की बहू हँसकर बोली—तेरे साथ ठाकुरपो का ब्याह हो जाए तो क्या ख़ूब जमेगा।
दुर्गा लाज से लाल होकर बोली—दूर!
गोकुल की बहू फिर हँसकर बोली—क्यों री, दूर क्यों? क्यों, हमारी लड़की क्या ख़राब है? देखूँ तो?...उसने दुर्गा की ठोड़ी पर हाथ रखकर उसका चेहरा ज़रा-सा ऊँचा उठाकर कहा—देख तो ज़रा, ऐसी दुर्गा-प्रतिमा जैसी सुंदर मुखड़ी? तो क्या हुआ अगर बाप के पास पैसे नहीं हैं?
दुर्गा ने झटका देकर ख़ुद को छुड़ा लिया और कहा—जाओ, खुड़ीमाँ भी न जाने क्या...इसके बाद वह एक तरह से दौड़ती हुई ही पिछवाड़े के दरवाज़े से बाहर निकल गई। जाते-जाते वह सोच रही थी—खुड़ीमाँ की और सब बातें तो अच्छी हैं, बस थोड़ी-सी भोली हैं, नहीं तो देखो न...? दूर!...
दुर्गा के जाते-न-जाते स्वर्ण ग्वालिन दूध दुहने आ गई। बहू ने कमरे से ही कहा—ओ सन्नो, मेरे हाथ भरे हैं, बछड़ा बाहर आँगन में पिटूली के पेड़ से बँधा है—ले आ, और ओसारे पर लोटा माँजकर रखा है, देख ले।
सखी ठकरुण का तब तक पूजा-आन्हिक समाप्त हुआ। वह बाहर आकर उत्तर दिशा में स्थित काली-मंदिर की ओर मुँह करके प्रणाम करते-करते खींच-खींचकर, सस्वर पाठ के अंदाज़ में कहने लगीं—दुहाई माँ सिद्धेश्वरी, दिन देना माँ, भवसागर पार कराना माँ—माँ रक्षकाली, रक्षा करना, माँ-गो!
गोकुल की बहू ने रसोई से पुकारा—ओ पीसीमाँ, नारियल के लड्डू रख दिए हैं, दो खाकर पानी पी लीजिए।
अचानक सखी ठकरुण ने ओसारे से आवाज़ दी—बहू, ज़रा इधर आकर देख तो।
स्वर सुनते ही गोकुल की बहू के प्राण सूख गए। सखी ठकरुण से वह यमराज की तरह डरती थी। माया-दया के वितरण के मामले में भगवान ने सखी ठकरुण के प्रति कोई पक्षपात नहीं दिखाया था—यह बात निस्संदेह कही जा सकती है। ओसारे के कोने में ढेर लगे माँजे हुए बरतनों के ऊपर झुककर, उँगली से दिखाते हुए बोलीं—देख तो अपनी आँखों से, देख पा रही है? एकदम साफ़ पानी का दाग़, देखा तो? यहीं से सन्नो ने लोटा उठाया है, और फिर उस सूद का छुआ जूठा बरतन रसोई में ले जाकर सारे जहान को भ्रष्ट कर दिया! हाः! जात-धरम सब गया!
सखी ठकरुण हताश होकर ओसारे पर बैठ गईं। मानो किसी लायक बेटे की मृत्यु का समाचार पाने पर भी वह इससे ज़्यादा हताश न हो सकतीं।
अभागी, कंगले घर की लड़की लाओ तो ऐसा ही होता है, भले घर की रीत सीखेगी कहाँ से—जानेगी भी कहाँ से? बरतन माँजे तो देखा नहीं कि जूठन गई कि रह गई? तीन पहर दिन चढ़ आया है, सोचा ज़रा मुँह में पानी डालूँ! सूद का जूठा, अभी-के-अभी नहाकर मरना पड़ता—ख़ैरियत रही कि लोटा छुआ नहीं!
गोकुल की बहू उदास मुँह लिए खड़ी सोच रही थी—क्यों मरने को उस मुँहजली सन्नो से लोटा उठाने को कहा, ख़ुद ही दे देती तो अच्छा होता—
सखी ठकरुण ने मुँह बिचकाकर कहा—ढीठ की तरह खड़ी क्या है? जा, हाँड़ी-कुंडी फेंक दे जाकर। बरतन-बासन फिर से माँजकर ला। रसोई में गोबर लीपकर नहाकर आ। जितनी अलच्छ्मी घर की लड़कियाँ जुटकर इस संसार को सत्यानाश कर गईं।...सखी ठकरुण गुस्से में गर-गर करती हुई कमरे में घुस गईं, बाहर की तेज़ धूप उनसे सही नहीं जा रही थी।
हुक़्म के मुताबिक़ सारे काम निपटाते-निपटाते दिन बिलकुल ढल गया। वह जब दोबारा नहाने के लिए नदी पर गई, तब धूप, भूख-प्यास और मेहनत से उसका मुँह सूखकर छोटा-सा हो गया था।
घाट पर दोपहर ढलने की छाया ख़ूब घनी थी, उस पार के बड़े सेमल के पेड़ पर धूप चमक रही थी। नदी के मोड़ पर एक पालवाली नाव डाँड खेते हुए मोड़ घूम रही थी। पतवार के पास एक आदमी खड़ा कपड़ा सुखा रहा था, कपड़ा उसने छोड़ दिया था, हवा में झंडे की तरह उड़ रहा था। बीच नदी में एक बड़े कछुए ने मुँह निकालकर साँस ली और फिर डूब गया—सों-ओं-ओं-भस्!
नदी के जल से कैसी एक ठंडी-ठंडी गंध आती है, छोटी-सी नदी; उस पार के टापू पर एक पनकौड़ी मछली पकड़ने वाली बाँस की द्वाड़ी पर बैठी है।
इस समय रोज़ उसे अपने बचपन की बातें याद आती हैं—
पनकौड़ी, ओ पनकौड़ी, किनारे पर आ बैठ...
गोकुल की बहू कुछ देर तक उस पनकौड़ी की ओर देखती रही। माँ का चेहरा याद आता है। संसार में और कोई नहीं है जो उसकी ओर देखे। माँ की क्या मरने की उम्र हुई थी? ग़रीब मायके में बस एक गाँजाखोर भाई है, वह कहाँ, कब रहता है—उसका कोई ठिकाना नहीं। पिछले साल पूजा के समय यहाँ आकर चार दिन रहा था। वह छिप-छिपकर भाई को अपने बक्से से जो भी थोड़ी-बहुत जमा-पूँजी थी—चवन्नी-दुअन्नी—निकालकर देती रही। बाद में एक दिन वह अचानक यहाँ से ग़ायब हो गया। उसके चले जाने पर पता चला कि एक काबुली शॉल बेचने वाले से एक शॉल उधार ख़रीदकर उसकी बही में अपने बहनोई का नाम लिखवा दिया है। उसे लेकर ख़ूब हो-हल्ला हुआ। मायके की ढेरों आलोचनाएँ, ढेरों अपमान! उस भाई की तब से और कोई ख़बर नहीं।
बेसहारा, बंजारे-से भाई के लिए शाम को काम के बीच मन में हूक-सी उठती है। सूने मैदान के रास्ते की ओर देखकर लगता है, घर-बिहीन वह पथिक भाई शायद दूर किसी सुनसान, अँधेरे, कच्चे रास्ते पर अकेला कहीं चला जा रहा है, रात को सिर छिपाने की जगह नहीं, उसकी ओर देखने वाला कोई इंसान नहीं।...
सीने के भीतर एक सैलाब उमड़ पड़ता, आँखों के आँसुओं में छाया-भरी नदी का जल, मैदान, घाट, उस पार का सेमल का पेड़, मोड़ पर खड़ी बड़ी-सी नाव—सब कुछ धुँधला जाता।
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