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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · इकतीसवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

इकतीसवाँ परिच्छेद

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हरिहर का डेरा कोई बहुत अच्छा न था। निचली मंज़िल के सीलन-भरे कमरे, सो भी गिनती के बस दो, इतने अँधियारे कि बाहर से सहसा भीतर आने पर कोई चीज़ नज़र ही न पड़े। ऐसे स्थान में सर्वजया कभी न रही थी। उनके देहात वाले पुराने घर में भी धूप और हवा के खेल के लिए बड़े-बड़े दरवाज़े-खिड़कियाँ थीं, उस ज़माने की ऊँची कुरसी वाली कोठरियाँ थीं, खट-खट सूखी रहती थीं। इस डेरे की सीलन-भरी ज़मीन और अँधियारे से सर्वजया का सिर चकराता। अपू तो घर में बिलकुल न रहता, सूरज की रोशनी में पले किसी नन्हे पौधे की तरह उसका मुँह बस उजाले की ओर ही फिरा रहता। निश्चिन्दिपुर के खुले मैदानों, नदी की उजली हवा में पला-बढ़ा, इस बंद कमरे के अँधियारे में उसका जी ऊब उठता, एक पल भी वहाँ टिक न पाता।

काशी देखकर वह कुछ निराश ही हुआ था। बड़े-बड़े घर-मकान होने से क्या होगा, यहाँ जंगल तो ज़रा भी नहीं।

एक दिन शाम के वक़्त कथा-ठाकुर हरिहर के डेरे पर आए। इधर-उधर की बातों के बाद बोले—क्यों, आपके साहबज़ादे दिख नहीं रहे?

हरिहर ने कहा—कहीं खेलने निकला होगा, शायद दशाश्वमेध घाट की तरफ़ ही गया हो—

कथा-ठाकुर अपने दुपट्टे के छोर से कुछ खोलते-खोलते बोले—आपके साहबज़ादे से बड़ी घनिष्ठता हो गई है, महाशय—उस दिन घाट पर पास बुलाकर बैठाया और बहुत देर तक उससे बातें कीं—कौड़ियाँ खेलना उसे बहुत पसंद है, सो ये दो बड़ी-बड़ी समंदर की कौड़ियाँ उस दिन किसी ने व्रत की सीधा में दी थीं, सोचा उसे दे आऊँ—आप रख लीजिए, वह आए तो दे दीजिएगा—

अगहन महीने के अंत में अपू ने पिता से ज़िद की कि वह स्कूल में दाख़िला लेगा। बोला—सब लोग स्कूल में पढ़ते हैं बाबा, मैं भी पढूँगा—गली के मोड़ से ज़रा-सा आगे ही तो अच्छा स्कूल है—

हरिहर ने लड़के को स्कूल में भर्ती करा दिया। था तो छात्रवृत्ति का स्कूल, पर अँग्रेज़ी की भी पढ़ाई होती थी। प्रसन्न गुरु महाशय की पाठशाला छोड़ने के बाद लगभग चार-पाँच बरस बीत चुके थे—यह उसका फिर से किसी और विद्यालय में दाख़िला लेना था।

माघ महीने के बीच में कथा-ठाकुर बालू-कागज़ का एक टुकड़ा हाथ में लिए एक दिन हरिहर के डेरे पर आ पहुँचे। कागज़ का टुकड़ा दिखाकर बोले—देखिए तो महाशय, पढ़कर। ऐसा लिखूँ तो काम बनेगा क्या?

हरिहर ने पढ़कर देखा, काशीवासी रामगोपाल चक्रवर्ती नाम का कोई व्यक्ति कथा-ठाकुर के नाम अपने गाँव की दस बीघा ज़मीन दानपत्र में लिख रहा है, अमुक-अमुक गवाह, स्थान दशाश्वमेध घाट, अमुक तारीख। कथा-ठाकुर बोले—बात क्या है, जानते हैं! हमारे देश में कुमुरे गाँव के रामगोपाल चक्रवर्ती भारी पंडित थे। मरने से साल भर पहले मुझसे बोले, रामधन, तुम्हारा तो कुछ है नहीं, सोच रहा हूँ तुम्हें कोई दस बीघा ज़मीन दान कर दूँ—तुम लोगे क्या? तो मैंने सोचा, सत्-ब्राह्मण हैं, देना चाह रहे हैं, तो हर्ज़ ही क्या है? फिर उन्होंने ज़बानी ही वह ज़मीन मुझे दे दी। दे तो दी—इतने बरस मैंने परवाह नहीं की, काशी में ही रहूँगा, देश-घर में तो रहना नहीं, ज़मीन का क्या होगा? फिर चक्रवर्ती महाशय का देहांत हो गया। ज़मीन का दान ज़बानी का ज़बानी ही रह गया। इतने बरस बाद सोच रहा हूँ, देश जाऊँगा। बाल-बच्चे न हों तो क्या आदमी है, महाशय? आपसे क्या कहूँ, तीन सौ रुपये हाथ में किए हैं—वह भी पेट काटकर, महाशय—और दो सौ रुपये मिल जाएँ तो श्रोत्रिय घर की कन्या मिल सकती है—तो अगर वैसा कुछ हो गया, तब तो ज़मीन की ज़रूरत पड़ेगी न? सोचा, ज़बानी दान को क्या चक्रवर्ती महाशय के बेटे मानेंगे? सोच-विचार कर यह काग़ज़ बैठकर लिखा है—खुद ही लिखा है महाशय, दस्तखत वगैरह सब—दो गवाह, सब मनगढ़ंत। देखें, लिखा हुआ काग़ज़ शायद मान जाएँ। जाकर कहूँगा, यह देखो, तुम्हारे पिता यह ज़मीन दान कर गए हैं—

उठते समय कथा-ठाकुर बोले—अच्छी बात है महाशय, मंगलवार को माघी पूर्णिमा के दिन मैं आपके बेटे को अपने साथ टेओटा के राजा के ठाकुर-बाड़ी ले जाऊँगा, ठीक मान-मंदिर से एकदम सटा हुआ है। हर साल शाम के बाद ब्राह्मण-भोज कराते हैं न। ज़रा गर्व से बोले—मुझे तो हर साल एक न्योते का पत्र भेजते हैं, बड़ा बढ़िया खिलाते हैं, क्या कहने। उस दिन मैं आकर ले जाऊँगा लेकिन।

माघी पूर्णिमा के दिन अंतिम पहर से ही रास्ते पर स्नानार्थियों की भीड़ देखकर सर्वजया दंग रह गई। झुंड के झुंड स्त्री-पुरुष "जय विश्वनाथजी की जय", "बोल बम", "बोल बम" कहते हुए माघ की विकट ठंड की उपेक्षा कर स्नान के लिए चले जा रहे थे। ज़रा दिन चढ़ने पर पंजाबी स्त्री के साथ सर्वजया भी स्नान करने गई—गंगा के घाट का पानी, सीढ़ियाँ, मंदिर, रास्ते, सब उत्सव के वेश में सजे नर-नारियों से भरे थे। पानी में उतरना एक दूभर काम था। षष्ठी के मंदिर पर लाल पताका फहरा रही थी।

शाम से पहले कथा-ठाकुर अपू को लेने आए। सर्वजया ने कहा—जाने भी दो, कोई है नहीं, अपू पर ही जैसे इनका मन अटक गया है, दशाश्वमेध घाट पर उसे बुलाकर पास बैठाकर बातें करते हैं, सुना है एक दिन पपीता भी खरीदकर खिलाया था—जाने दो, आदमी अच्छा है—

अपू पहले कथा-ठाकुर के साथ उनके डेरे पर गया। खपरैल का कमरा, मिट्टी की दीवारों पर कई जगह खड़िया से हिसाब लिखा हुआ था। नमूना:—

सियारसोल की रानी के घर भागवत पाठ....४,

मुसम्मत कुंता का ठाकुर-बाड़ी... वही...... २,

धारक लालजी दोबे का एक दिन का खोराकी... ४,।

कोई ख़ास सामान न था। एक पतली-सी चौकी बिछी थी, एक छोटा-सा टीन का संदूक, एक रस्सी पर टँगा अल्ना, एक जोड़ी खड़ाऊँ। दीवार की कील पर कमल-बीज की एक बड़ी माला टँगी थी।

कथा-ठाकुर ने पूछा—संतरा खाओगे?

अपू ने गर्दन हिलाकर कहा—है आपके पास?

न जाने क्यों इस कथा-ठाकुर के सामने उसे किसी तरह की लाज या संकोच महसूस नहीं हो रहा था। संतरे का छिलका उतारते-उतारते उसने पूछा—"काले वर्षतु पर्जन्यः" जानते हैं आप?

—काले वर्षतु पर्जन्यः? खूब जानता हूँ, रोज़ कहता तो हूँ, सुनना किसी दिन—

—अभी कहिए न एक बार?

कथा-ठाकुर ने सुर में गाया तो, पर अपू को लगा कि उसके बाबा के मुँह से सुनने में और भी अच्छा लगता है, कथा-ठाकुर का गला बड़ा मोटा है।

देश ले जाने के लिए कथा-ठाकुर ने मिट्टी और पत्थर की तरह-तरह की छोटी-मोटी चीज़ें—गुड़िया, खिलौने, शिवलिंग, माला, लकड़ी की कंघियाँ—इकट्ठी कर रखी थीं। अपू को दिखाकर बोले—काशी की चीज़ें हैं, सब कहेंगे क्या लाए हो, दिखाओ! इसीलिए ले जाऊँगा—

कई पतली गलियों को पार कर एक अँधेरे घर के दरवाज़े के सामने आकर कथा-ठाकुर रुक गए। नीचे झुककर दरवाज़े से बड़ी मुश्किल से कथा-ठाकुर के साथ घुसकर अपू को लगा कि घर में कहीं कोई नहीं है, सब सूनसान। कथा-ठाकुर ने दो-एक बार गला खँखारा तो किसी ने दालान की चारपाई से नींद से जागकर उठते हुए मोटी आवाज़ में हिंदी में कुछ पूछा, अपू को समझ नहीं आया। कथा-ठाकुर के परिचय देने के बाद भी लगा कि वह आदमी उन्हें पहचानता भी नहीं, न ही उनके आने की उम्मीद कर रहा था। बाद में वह आदमी जैसे कुछ खीझ के साथ किसी से कुछ पूछने गया। लेकिन लौटने में इतनी देर करने लगा कि अपू को लगा, शायद ये लोग कह देंगे कि तुम्हारा तो न्योता नहीं है, जाओ तुम लोग। जो भी हो, अँधेरे में ठिठुरते हुए पंद्रह मिनट खड़े रहने के बाद वह आदमी लौटकर आया और दालान के एक कोने में आधे-अँधेरे में कुछ साल के पत्ते बिछाकर उन्हें बिठा दिया। एक मोटे पीतल के लोटे में पानी दे गया है। कथा-ठाकुर जैसे डरते-डरते जाकर आसन पर बैठ गए। राजा का घर है, न जाने क्या खिलाएँगे? अधीर आग्रह के साथ अपू लगभग और बीस मिनट पत्तल बिछाए बैठा रहा—किसी का अता-पता नहीं। जब निमंत्रण मिल पाने की निश्चितता के बारे में अपू के मन में फिर से संदेह उठने लगा, ठीक उसी समय परोसने वाले के प्रकट होने जैसी अनहोनी घटी। मोटी-मोटी आटे की पूड़ियाँ और स्वाद-गंधहीन बैंगन का भरता—और अंत में बहुत बड़े-बड़े लड्डू। अपू ने काटने की कोशिश की तो लड्डू में दाँत धँसा नहीं पाया, इतने कठोर थे। कथा-ठाकुर ने ललचाई नज़रों से वे मोटी पूड़ियाँ दस-बारह तक आग्रह के साथ खाईं। बीच-बीच में अपू की ओर देखकर कह रहे थे—पेट भरके खाओ, शर्माना मत, बड़ा अच्छा खिलाते हैं—बढ़िया लड्डू हैं न? दाँतों में अभी भी बहुत ज़ोर है, खूब चबा सकता हूँ।

सौ बरस एक साथ रहने पर भी शायद कोई मेरे हृदय के बाहर ही रह जाता है, अगर न कोई विशेष घटना उसके लिए मेरे हृदय के कपाट खोल दे। आज के इस निमंत्रण में खाने आने का अनादर, यह उपेक्षा, अपू बालक होकर भी समझ गया था। उसके बाद भी इस खाने के लोभ और आनंद से अपू के अंतरतम हृदय पर चोट लगी। उसके मन में आया कि यह कथा-ठाकुर कितना अभागा है। सोचा, कथा-ठाकुर को कभी कुछ खाने को नहीं मिलता, आह! तभी तो यह लड्डू इस तरह खा रहे हैं—एक दिन माँ से कहकर इन्हें घर पर न्योता देकर खिलाऊँगा—

करुणा प्रेम का सबसे कीमती मसाला है, उसकी गाँथनी बड़ी पक्की होती है। उसके बाल-मन में यह परदेसी, दो दिन का परिचित, बंगाली कथा-ठाकुर उसकी दीदी और गुलकी के साथ एक ही माला में पिरो दिया गया, सिर्फ़ एक लड्डू खाने के अधीर लोभ की भंगिमा के कारण।

इसके कुछ ही दिन बाद कथा-ठाकुर देश चले गए। राजघाट स्टेशन पर कथा-ठाकुर के बहुत ज़ोर देने पर हरिहर अपू को साथ लेकर उन्हें गाड़ी में बैठाने गया। हरिहर के मन में आया कि आज से बाईस बरस पहले वह जो करने देश गया था—यह व्यक्ति उसकी वर्तमान आयु से भी कम-से-कम आठ बरस ज़्यादा की उम्र में वही करने, यानी नए सिरे से गृहस्थी बसाने, देश चला है। तो फिर उसकी भी उम्र ऐसी क्या हो गई है? उसके लिए किस काम को करने के लिए समय की कमी हो सकती है?

गाड़ी छूटने पर अपू की आँखों में आँसू आ गए। बालक के प्राण में कभी-कभी बड़े लोगों के लिए स्थायी, सच्चा स्नेह आ जाता है। दुर्लभ होने के कारण ही वह बहुत मूल्यवान होता है।

माघ महीने के अंत के दिनों में एक दिन हरिहर ने सहसा घर में घुसते ही आँगन के किनारे बैठ गया। सर्वजया कुछ कर रही थी, काम छोड़कर जल्दी से उठकर आई और बोली,—क्या हुआ, इस तरह बैठ क्यों गए? पर पति के चेहरे की ओर देखकर उसकी बात मुँह में ही रह गई। हरिहर की दोनों आँखें जपाकुसुम की तरह लाल थीं, दाहिना हाथ जैसे काँप रहा था। सर्वजया ने हाथ पकड़कर उठाना चाहा तो वह नशे में डूबे-से स्वर में बोला—खोका कहाँ गया? खोका?

सर्वजया ने बदन पर हाथ रखकर देखा तो बुखार से उसका बदन दहक रहा था। सँभालकर हाथ पकड़कर कमरे में ले जाकर उसे बिस्तर पर लिटा दिया और बोली—अपू आता ही होगा, उसे ऊपर वाले नंदबाबू बुलाकर ले गए हैं, शायद गोधूलिया के मोड़ पर अपनी दुकान ले गए होंगे—

अपू दुकान नहीं गया था, नंदबाबू के कमरे के सामने छत पर बैठकर किताबें पढ़ रहा था। महीने भर से नंदबाबू के साथ अपू की खूब घनिष्ठता हो गई थी। नंदबाबू की उम्र कितनी है यह ठीक से समझने की उसकी क्षमता न थी, पर वे उसके पिता से छोटे लगते थे। नंदबाबू के ऊपर वाले कमरे में उसने कई किताबें खोज निकाली थीं—जब नंदबाबू कमरे में होते तो वह किताब लेकर छत पर बैठ जाता। लेकिन डर लगता कि कहीं नंदबाबू पढ़ने न देकर किताब छीन न लें, क्योंकि एक दिन ऐसी ही घटना घटी थी। छत के एक कोने में धूप में बैठकर अपू किताब पढ़ रहा था, नंदबाबू कमरे के अंदर कुछ खोजते-खोजते बाहर आए और उसे देखकर डाँटकर बोले—अरे रख दो, तुम्हारा बस बैठे-बैठे यही सब किताबें पढ़ना लगा रहता है, कहाँ की चीज़ कहाँ रखते हो कोई ठीक नहीं, काम के समय मिलती ही नहीं—जाओ, रखो किताब, जाओ—

वह तो घर की किसी और चीज़ को हाथ भी नहीं लगाता, फिर उसे डाँटने का क्या कारण? उसी दिन से वह डर-डरकर किताबें लेता था।

नंदबाबू शाम के समय माँग निकालकर, अच्छे कपड़े पहनकर, शीशी से कोई सुगंध मलकर रोज़ घूमने निकलते हैं। अपू के बदन पर भी एक दिन शीशी से ज़रा-सा छिड़क दिया था, बड़ी भुरभुरी-सी महक थी।

पहले वह शाम के बाद भी नंदबाबू के कमरे में पढ़ने जाता था। लेकिन शाम के बाद नंदबाबू अलमारी से एक बोतल निकालकर लाल-सी कोई दवा पीते हैं। उस समय एक दिन वह कमरे में चला गया तो उसे भारी डाँट पड़ी थी। नंदबाबू के कमरे में चढ़ने की सीढ़ी दूसरी तरफ़ थी—और एक दिन रात में अचानक ऊपर के कमरे में जाकर उसने देखा कि कोई एक स्त्री कमरे के अंदर बैठी है। उसे देखकर नंदबाबू बोले थे—अभी जाओ अपूर्व, यह मेरी साली हैं—देखने आई हैं, अभी चली जाएँगी। लौटते-लौटते उसने सुना था, नंदबाबू कह रहे हैं—वह हमारे नीचे वाले किराएदार का लड़का है, कुछ समझता-बूझता नहीं।

नंदबाबू उससे अक्सर उसकी माँ के बारे में पूछते। कहते—तुम्हारी माँ को बोलकर पान ले आओ तो ज़रा? मेरा नौकर पान साधना नहीं जानता—

अपू माँ से ज़िद करके ऊपर अक्सर पान ले आता। नंदबाबू कभी-कभी कहते—तुम्हारी माँ मेरे बारे में कुछ कहती-सुनती हैं क्या—नहीं?

अपू घर आकर माँ से कहता—नंदबाबू बड़े अच्छे आदमी हैं माँ—तुम्हारे बारे में रोज़ पूछते हैं—

—मेरे बारे में? मेरे बारे में क्या पूछते हैं—

कह रहे थे तुम्हारी माँ को बोलना, मैं उनके बारे में पूछता-पाछता हूँ—बड़े अच्छे आदमी हैं—

—पूछने दे—तू बड़ा पाजी लड़का है, इतना ऊपर के कमरे में क्यों जाता-आता है? शाम को ऊपर बैठकर क्या करता रहता है?

हरिहर का ज्वर कुछ कम हुआ। अपू स्कूल से आकर किताबें रख रहा था। पैरों की आहट पाकर हरिहर बोला—खोका, आओ, बैठो बेटा ज़रा—

अपू बैठकर स्कूल की कहानियाँ सुनाने लगा। हँसकर धीमे स्वर में बोला—अभी दो ही महीने तो स्कूल गया हूँ, और इसी में बाबा, स्कूल में सब लोग बहुत प्यार करते हैं, रोज़-रोज़ मैं फर्स्ट बैठता हूँ—स्कूल में हमारी क्लास वाले एक महीने बाद एक कागज़ छापकर निकालेंगे। मुझे भी उस दल में लिया है—जब निकलेगा तो तुम्हें दिखाऊँगा बाबा—

हरिहर का सीना ममता और वेदना से भर-भर आया। अपू ने एक कागज़ निकालकर कहा—एक लेख लिखा है, कहा है कि कागज़ में छापेंगे, मेरे नाम से। लेकिन जो लोग दो-दो रुपये चंदा देंगे, सिर्फ़ उन्हीं का लेख छापेंगे, यह भी कहा है—दो रुपये दोगे बाबा?

हरिहर ने अधीर आग्रह से बेटे के हाथ से कागज़ लेकर पढ़ना शुरू किया। बेटा लिखता भी है, यह ख़बर उसे न थी। राजकुमार के शिकार की कहानी बड़ी सुंदर गढ़ी थी, हरिहर खुश होकर तकिये के सहारे उठ बैठा, बोला—यह तूने लिखा है खोका?

—मैं तो और भी कितना कुछ लिख चुका हूँ बाबा, भूत की कहानियाँ, राजकुमारी की...घर पर था तो रानू दी की कॉपी में लिख-लिखकर देता था न—

सर्वजया पैसों का नाम सुनते ही देने से हिचकती। पति बीमारी में पड़ा है, इस हाल में जो कुछ है, वह घर के खर्च के लिए भी पूरा नहीं पड़ेगा, क्या ज़रूरत है छपे हुए कागज़ की। हरिहर ने समझा-बुझाकर जब पैसे दिए, तो बोली—दे आओ, आहा, लड़के का लिखा छपकर तो आए, ठीक होकर जब पथ्य लेना शुरू करेंगे तो ठाकुर-बाड़ी में भागवत-पाठ का काम तो पक्का ही है—उसमें भी तो कोई दस रुपए मिल ही जाएँगे—

दो दिन बाद अप्पू निराश मुँह, लाल होंठ फुलाए, पिता के पास चुपके से आकर बोला—नहीं हुआ, बाबा। छापेखाने वालों ने ज़्यादा दाम माँगे हैं, इसलिए आज स्कूल में कह दिया है, चार-चार रुपए चंदा चाहिए।

बेटे के चेहरे पर निराशा का भाव हरिहर के सीने में खच्च से चुभ जाता है। कुछ देर दूसरी बातें करने के बाद वह बोला—देख तो खोका, तेरी माँ कहाँ गई... तकिये के नीचे से चाबियों का गुच्छा निकालकर देते हुए बोला—चुपके से वह लकड़ी का संदूक, जिसमें मेरे सरकंडे के कलमों का गट्ठर है, वह खोल तो ज़रा?... कोने में देख तो कितने रुपए हैं? उसके बाद हरिहर बड़ी सावधानी से संदूक खोलने में लगे पुत्र को ममता-भरी आँखों से देखता रहा। अबोध, नितांत अबोध!... उसका वह सुंदर, चाँद-सा शुभ्र ललाट उसकी माँ का ललाट है, वे आँखें उसकी माँ की आँखें हैं। जब हरिहर ने प्रथम यौवन में विवाह करके पत्नी को घर लाया था, तब नववधू सर्वजया के मुख की जो हँसी थी, ठीक वही हँसी ग्यारह वर्ष के अप्पू के निर्मल, नवीन मुख पर थी।

अकारण ही हरिहर के हृदय में स्नेह का सागर उद्वेलित, उत्ताल हो उठता और आँखों में जल भर आता।

अप्पू जैसे प्रथम वसंत का नव-किसलय हो, उसके मुख का आनंद जैसे प्रभात की नव-अरुण आभा हो, उसकी बड़ी-बड़ी नीली आँखों की चितवन में अपने बीते यौवन-काल के वे असीम स्वप्न, सुनील पहाड़ों पर नवीन शाल-वृक्षों की पाँतों का उल्लास-भरा मर्मर... कूलहीन सागर का दूरागत संगीत-स्वर।

अप्पू ने चुपके से पिता को दिखाते हुए कहा—चार रुपए हैं, बाबा!—हरिहर ने ये रुपए बुरे वक्त के लिए अपने संदूक में छिपाकर रखे थे, पत्नी को पता नहीं था, इसलिए वह निश्चिंत मन से कह सका—ले जा खोका, चंदा दे देना, पर अपनी माँ से कहना मत।

अप्पू ने खुशी के स्वर में कहा—जब छपेगा तो तुम्हें दिखाऊँगा, बाबा, उन्होंने कहा है मेरे नाम से छापेंगे—इस सोमवार के बाद वाले सोमवार को निकलेगा—

अगले दिन सुबह से हरिहर की बीमारी फिर बढ़ गई।

सर्वजया डरकर बेटे से बोली—जा तो, नंद बाबू से कह—एक बार आकर देख जाएँ—

नंद बाबू ने देखकर कहा—एक डॉक्टर को बुलाना होगा, अपूर्व, अपनी माँ से कहो।

दोपहर बाद नंद बाबू ही एक डॉक्टर को साथ लेकर आए। डॉक्टर ने देखकर-सुनकर कहा—ठंड लग गई है, ब्रोंको-निमोनिया है—अच्छी देखभाल चाहिए—नीचे के कमरे में क्या ऐसे ही रहते हैं!... खोका, तुम एक शीशी लेकर मेरे दवाखाने आओ, दवा दूँगा—

अप्पू कई दिन तक दशाश्वमेध घाट पर डॉक्टर के डिस्पेंसरी से दवा लाता रहा।

कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। दिन-प्रतिदिन हरिहर दुर्बल होते जा रहे थे। इधर जो थोड़े-बहुत रुपए थे—विज़िट और पथ्य में खर्च हो गए। डॉक्टर ने कहा, कम-से-कम एक सेर दूध और दूसरे फल न खिलाने पर रोगी कमज़ोर पड़ जाएगा। साढ़े तीन रुपए की एक विलायती पथ्य की व्यवस्था भी दे गया। परदेस की जगह। कोई ऐसा आदमी नहीं जो एक बार देखकर हिम्मत बँधाए, सर्वजया को चारों ओर अँधेरा दिखने लगा।

इस विपत्ति के बीच सर्वजया एक नई विपत्ति में पड़ गई। ऊपर की छत पर खड़े होकर झुककर देखने से रसोईघर दिखता था। इससे पहले भी उसने कभी-कभी नंद बाबू को छत से उसके रसोईघर की ओर ताक-झाँक करते देखा था, पर जब से हरिहर बीमार पड़ा था, नंद बाबू ने यह कुछ ज़्यादा ही बढ़ा दिया था। तरह-तरह के बहानों से वह दिन में दस बार घर में आता—पहले तो अप्पू की आड़ लेकर पूछता था—अब सीधे उसी को संबोधित करके बात करता। पहले-पहल सर्वजया ने कुछ सोचा नहीं—बल्कि विपत्ति के समय यह अनजान व्यक्ति काफ़ी मदद और देखभाल कर रहा है, यह सोचकर मन-ही-मन कृतज्ञ ही थी, किंतु धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि यह जो ज़रूरत से ज़्यादा हो रहा है—यह कहीं कुछ बेढब-सा लग रहा है। नंद बाबू ख़ुद पान खरीदकर लाता और सामने रखकर कहता—नौकरों के हाथ का बना पान... ज़िंदगी बीत गई, भौजाई—एक बार आप तो लगाइए— इसमें भी सर्वजया ने कोई दोष नहीं देखा, बल्कि इस परदेसी, आत्मीय-स्नेह से वंचित व्यक्ति पर मन-ही-मन थोड़ी करुणा ही होती थी—किंतु घनिष्ठता धीरे-धीरे शिष्टाचार की सीमा लाँघने लगी। आजकल पान लाकर कहता—रखिए तो भौजाई! चाहता था जैसे सर्वजया उसके हाथ से ही पान ले। अप्पू तो पागल है—ज़्यादातर समय घर पर मिलता ही नहीं—उधर कमरे में हरिहर अचेत पड़ा रहता है—और ठीक उसी समय नंद बाबू रोगी को देखने घर आएगा!... किसी-न-किसी बहाने इधर-उधर की बातों में आधा घंटा बिताए बिना वह कमरे से नहीं जाता। कहता—कोई डर नहीं भौजाई—मैं ऊपर ही हूँ—अपूर्व रहे न रहे—उस सीढ़ी पर जाकर पुकारिएगा! विपत्ति के समय इतना सोचने-विचारने से... थोड़ा चूना दीजिए तो! डंठल नहीं है?... आहा, उँगली की नोक से ही थोड़ा दे दीजिए न ऐसे ही...

हरिहर को जब भी होश आता, वह बेटे के लिए व्याकुल हो उठता। इधर-उधर देखकर क्षीण स्वर में कहता—खोका कहाँ है! खोका कहाँ है!... सर्वजया कहती—आ रहा है, वह हतच्छाड़ा लड़का क्या पास बैठता है ज़रा भी... निकल गया होगा उसी घाट पर। लड़का घर आता तो कहती—थोड़ी देर पास नहीं बैठ सकता!... खोका खोका करके पागल हुए जा रहे हैं—और खोका को तो जैसे कोई फ़िक्र ही नहीं—जा बैठ जा, शरीर-सिर पर ज़रा हाथ नहीं फेर सकता क्या? बेटा होकर स्वर्ग में घंटा बजाएगा कि नहीं?

अप्पू लज्जित-सा होकर पिता के सिराहने बैठ जाता। लेकिन थोड़ी देर बैठते ही मन में सोचता—ओफ़! कितनी देर बैठा रहूँगा—यह भी ख़ूब है? मुझे क्या ज़रा घूमने या खेलने का भी मन नहीं करता। कँपकँपाती ठंड में पैर सुन्न हो जाते। उसका मन छटपटाता—एक दौड़ में सीधे उस दशाश्वमेध घाट पहुँच जाए। पानी की ठंडक, निर्मल खुली हवा, सुंदर वस्त्रों में सजे स्त्री-पुरुषों की भीड़। पटु... सुबीर... गुलू... पटल—पल्टू का दादा। रामनगर के राजा की वह मय़ूरपङ्खी नाव में आज फिर दौड़ होगी, चार बजे! वह बेचैनी में छटपटाता, पर संकोचवश शाम कर देता, माँ के डर से जाने की हिम्मत नहीं होती।

एक दिन सुबह सर्वजया ने बेटे से कहा—हाँ रे, उस सफ़ेद मकान के पास कौन-सा सत्र है, जानता है?

—उँहूँ—

—तूने यहाँ आकर एक दिन भी सत्र में नहीं खाया? काशी में आने पर सत्र में खाना होता है, जानता नहीं क्या! आज खा आना तो?... देख ही आना?

—काशी में आने पर सत्र में क्यों खाना होता है?

—खाने से पुण्य होता है—आज दशाश्वमेध घाट पर नहाकर वैसे ही सत्र से खाकर आना—समझा!

दिन के बारह बजे सत्र से खाकर अप्पू घर लौटा। उसकी माँ रसोईघर के बरामदे में बैठकर कटोरी में कुछ लेकर खा रही थी—उसे देखकर पहले तो छिपाने की कोशिश की, लेकिन अप्पू बहुत पास आ गया था—छिपाने जाऊँगी तो शक होगा, यह सोचकर सहज स्वर में कहने की कोशिश की—खा आया? कैसा खिलाया रे?

माँ अरहर की भीगी दाल खा रही थी।

—अच्छा नहीं—कद्दू का कोई बेकार-सा घन्ट—बैठे-बैठे परेशान हो गया—बहुत मैले कपड़े पहने लोग वहाँ खाने जाते हैं—मैं अब नहीं जाऊँगा, मुझे पुण्य नहीं चाहिए—वह क्या खा रही हो, माँ? तुम्हारा व्रत है क्या? खाना नहीं बना?

—आज तो मेरा कुलुईचंडी है—ये दो दाने अरहर की भीगी दाल... खाने में बड़ी अच्छी लगती है, मुझे बहुत पसंद है... खाएगा दो दाने शाम को?

रात को भी खाना नहीं बना। उसकी माँ ने कहा—अरहर की भीगी दाल खाकर देख तो ज़रा? अच्छी लगेगी अब—इस पहर पकाया नहीं, खाता ही कितना है, बस चंद दाने चावल ही तो डालता है—वह खाकर क्या और खा पाएगा?

अगले दिन दोपहर को नंद बाबू एक गड्डी पान अप्पू के हाथ में देकर बोला—अपनी माँ से बनवाकर लाओ तो? रोगी के कमरे के बगल वाले कमरे में सर्वजया बैठकर पान लगा रही थी; नंद बाबू जूते की आवाज़ करता हुआ ऊपर से उतरा और रोगी के कमरे में घुसा। और बहुत थोड़ी देर बाद वहाँ से निकलकर उस कमरे में घुस गया जहाँ सर्वजया पान लगा रही थी। सारी रात जागकर बिताने से सर्वजया को झपकी आ रही थी, जूते की आवाज़ से चौंकी तो एकदम सामने नंद बाबू को देखकर वह सहमकर घूँघट खींच लिया। नंद बाबू बोला—पान लग गया भौजाई? सर्वजया ने चुपचाप सजे हुए पान के बीड़े तश्तरी में रखकर सामने की ओर खिसका दिए। नंद बाबू ने एक बीड़ा उठाकर मुँह में डाला और बोला—चूना बहुत कम होता है भौजाई आपके पान में, हटिए तो ज़रा, मैं लेता हूँ—

सर्वजया की गोद के पास ही पान का डिब्बा था। घर में कोई नहीं था, अप्पू कहीं बाहर गया हुआ था। बगल के कमरे में हरिहर दवा के असर से सो रहा था। निस्तब्ध दोपहर। अचानक सर्वजया को लगा जैसे नंद बाबू चूना लेने के बहाने अनावश्यक रूप से—उसके बहुत ज़्यादा पास सटकर आना चाह रहा है—एक अस्पष्ट चीख के साथ वह एक ही पल में उठकर कमरे के बाहर जा खड़ी हुई। बिजली की एक लहर-सी उसके पाँव से सिर तक दौड़ गई। उँगली से सीढ़ी की ओर इशारा करके तीखे स्वर में बोली—चले जाइए अभी ऊपर—फिर कभी नीचे मत आइएगा—नीचे आए तो मैं सिर पटककर जान दे दूँगी—क्यों आते हैं आप? ख़बरदार, फिर कभी मत आइएगा—

सर्वजया बड़ी दुविधा में पड़ गई। परदेस की जगह, घर में यह रोगी—निस्सहाय, हाथ में एक पैसा नहीं, दूर-दूर तक कोई परिचित नहीं, बेटे की उम्र बस ग्यारह साल—वह भी नासमझ, नितांत निर्बोध। और ऊपर से यह सब उत्पात।

ऊपर वाली पंजाबी स्त्री कभी-कभार ही नीचे उतरती थी—एक-आध बार सर्वजया को ऊपर अपने कमरे में ले गई थी, लेकिन पाँच-छह महीने काशी में रहकर भी सर्वजया न तो हिंदी बोल पाती, न ही ठीक से समझ पाती, इसलिए बातचीत बिल्कुल नहीं जमती थी। आज उसके पास जाकर नंद बाबू की घटना शुरू से अंत तक बताकर रो पड़ी। पंजाबी लड़की का नाम सूरजकुँवारी था, पति-पत्नी दोनों पंजाब के रोआलसर ज़िले के रहने वाले थे; पति रेलवे में ओवरसियर का काम करता था। लड़की की उम्र बहुत कम न होने पर भी देखने में कमसिन लगती थी, गौरांगी, बड़ी-बड़ी आँखों वाली, चुस्त, लंबी-छरहरी। वह सब सुनकर बोली—कोई डर नहीं, आप निडर होकर रहिए, अगर फिर कुछ बदमाशी का इरादा देखे तो मुझे बताइएगा, अपने पति से कहकर उसकी नाक कटवाकर ठंडा कर दूँगी।...

घोर दोपहर। कई रातें जागने के बाद सर्वजया ज़मीन पर आँचल बिछाकर लेटकर सो गई थी। उत्तर वाले कमरे की खिड़की से एक फाँक धूप आकर सँकरे आँगन में तिरछी पड़ रही थी। अप्पू ने मिट्टी की हाँडी में गेंदे का पौधा लगाया था, दो-तीन अधखिले गेंदे बड़ी बेरुखी से खिले हुए थे—नीचे एक बिल्ली का बच्चा बैठा था। अप्पू पिता के बिस्तर के पास ही बैठा था। उसके पिता आज सुबह से कुछ बेहतर थे—डॉक्टर ने कहा था कि शायद जीवन की आशा बँध गई है। बेहतर होने पर भी रोगी को बहुत चेतना है, ऐसा नहीं लगता था, बेहोशी की-सी अवस्था थी। उसके पिता ने अचानक आँखें खोलीं और उसकी ओर कुछ देर देखकर कुछ कहा। अप्पू को लगा कि बाबा उसे और पास खिसकने को कह रहे हैं। अप्पू के खिसकने पर हरिहर ने रोग से क्षीण, दुर्बल दोनों हाथों से बेटे का गला पकड़कर चुपचाप उसके मुँह की ओर बहुत देर तक एकटक देखता रहा। अप्पू थोड़ा चकित हुआ, पिता की आँखों में ऐसी दृष्टि उसने कभी नहीं देखी थी।

रात दस बजे सोते हुए अप्पू की नींद किसी आवाज़ से खुल गई। कमरे में धीमी रोशनी जल रही थी—माँ अघोर नींद में सो रही थी, पिता के गले से कई सुरों में अजीब-सी आवाज़ हो रही थी। उसे कुछ डर-सा लगा। कालिख पुती कड़ियाँ, सीली हुई ज़मीन, हाड़ कंपाती ठंड, लकड़ी-कोयले की आग का धुआँ—सब मिलकर जैसे एक दुःस्वप्न। बाबा की बीमारी ठीक हो जाए तो जान बचे।

आखिरी पहर में माँ के धक्के से उसकी नींद टूटी!—अप्पू, ओ अप्पू, उठ! जल्दी जा, ऊपर से हिंदुस्तानी बहू को बुला ला—

अप्पू ने उठकर सुना कि पिता के गले की वह आवाज़ और बढ़ गई है। ऊपर से सूरजकुँवारी के आने के थोड़ी ही देर बाद, रात के चार बजे, हरिहर चल बसा।

बीच बर्षा में, धाराओं से मुखर, कुहासे से घिरे दिन में ऐसा लगता है कि पृथ्वी के वे धूप-खिले दिन स्वप्न थे या सत्य? यही मेघ, यही दुर्दिन, अनंत भविष्य के पथ पर यही चिर-साथी बनकर रह गए—क्षितिज की माया-लीला की तरह चैत्र-वैशाख के जो दिन अतीत में विलीन हो गए—क्या वे फिर कभी लौटकर आते हैं?

चारों ओर से सर्वजया को जैसे किसी घने कुहासे ने घेर लिया। जिसके बीच से न राह दिखती है, न साथी पहचाना जाता है, न यह पता चलता है कि मैं कहाँ हूँ। संदेह होता है कि यह कुहासा शायद दिन चढ़ने पर, धूप निकलने पर भी नहीं छँटेगा, इसके पीछे है आकाश में छाया हुआ फीके धूसर रंग का, दिन भर चलने वाला बेमौसम का बादल।

विपत्ति के दिनों में पंजाबी ओवरसियर ज़ालिम सिंह और उसकी पत्नी ने बहुत मदद की। ज़ालिम सिंह दफ़्तर की छुट्टी करके दाह-संस्कार के लिए लोगों की तलाश में बंगालीटोला के चक्कर काटता रहा। ख़बर पाकर रामकृष्ण मिशन के कुछ सेवक भी आ पहुँचे।

मणिकर्णिका घाट पर संस्कार के बाद शाम को अप्पू स्नान करके ठंडी पछुवा हवा में काँपते-काँपते सीढ़ियों पर चढ़ा। रामकृष्ण मिशन का एक सेवक और नंद बाबू उसे उत्तरीय पहना रहे थे। दिन काफ़ी ढल चुका था, अस्त होते दिगन्त की म्लान रोशनी पत्थर के मंदिरों के शिखरों पर ही बस चिक्चिक् कर रही थी। दिन भर के घटनाक्रम से दिग्भ्रमित अप्पू को लगा कि उसके पिता की परिचित आवाज़ में उत्सुक श्रोताओं के सामने कोई बैठा सस्वर पाठ कर रहा है—

काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी शस्यशालिनी...

लोकाः सन्तु निरामयाः...

जिस बाबा को सब मिलकर आज मणिकर्णिका घाट पर दाह करने लाए थे—रोग से, जीवन के युद्ध में पराजित वह पिता एक स्वप्न-मात्र था—अप्पू उसे नहीं पहचानता, नहीं जानता—उसके चिर-परिचित, सदा से जिसके भरोसे रहा, वह हँसमुख पिता, होश सँभालने के दिन से परिचित, अपने जाने-पहचाने सहज कंठ से, प्रतिदिन की तरह कहीं बैठकर जैसे उदास पूरबी के सुर में मंगलाचरण गा रहा हो—

काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी शस्यशालिनी....

लोकाः सन्तु निरामयाः.....

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