खोका अब कोई दस महीने का हो चला था। दुबला-पतला बदन, मुँह असाधारण रूप से नन्हा-सा। नीचे के मसूड़े पर बस दो ही दाँत निकले थे। जब-तब, बिना किसी कारण के, वह अपने उन्हीं दो दूध-दाँतों वाले मसूड़े निकालकर हँस देता। लोग कहते—बहू, तुम्हारे खोका की हँसी तो जैसे ठेके की है। खोका को एक बार छेड़ भर दो, फिर ख़ैर नहीं, वह ख़ुद-ब-ख़ुद पागलों की तरह इतना हँसना शुरू कर देगा कि उसकी माँ को कहना पड़ता—अच्छा खोकन, अब बस करो, आज बहुत हँस लिए, बहुत ज़्यादा हँस लिए—थोड़ा कल के लिए भी बचाकर रखो। उसने बस दो ही बातें कहनी सीखी थीं! मन में सुख हो तो मुँह से कहता जे-जे—जे—जे और दूध-दाँत निकालकर हँस देता। मन में दुःख हो तो कहता, ना-ना-ना-ना और बेढंगे तरीक़े से चीख़-चीख़कर रोने लगता। जो कुछ सामने पाता, उसी पर अपने उन दो नए दाँतों की मज़बूती परखने लगता—मिट्टी का ढेला, लकड़ी का टुकड़ा, माँ का आँचल; दूध पिलाने बिठाओ तो कभी-कभी वह अचानक कांसे की झिनुकी को बड़े आनंद से अपने नए दाँतों से ज़ोर से जकड़ लेता। उसकी माँ खिलखिलाकर हँस पड़ती और कहती—यह क्या, अरे ओ खोका, झिनुकी को क्यों दाँतों में दबा लिया?—छोड़, छोड़—अरे, क्या करता है, तेरे पास कुल जमा दो ही दाँत तो हैं—टूट गए तो हँसेगा कैसे, सुना ज़रा? खोका फिर भी नहीं छोड़ता। उसकी माँ मुँह के भीतर उँगली डालकर बड़ी मुश्किल से झिनुकी को छुड़ाती।
खुकी पर हर समय भरोसा नहीं किया जा सकता था, इसलिए रसोईघर का बरामदा थोड़ा ऊँचा कर, उसे बाँस की खपच्चियों से घेरकर, उसी के भीतर खोका को बिठाकर उसकी माँ अपने काम-काज करती। खोका उस कटघरे में किसी फ़ौजदारी मुक़दमे के क़ैदी की तरह बंद रहकर कभी अपने-आप हँसता, अदृश्य श्रोताओं को अपनी अबूझ भाषा में कुछ सुनाता, तो कभी खपच्चियों की बाड़ पकड़कर खड़ा होकर बाँस के जंगल की ओर ताकता रहता। जब उसकी माँ घाट से नहाकर लौटती—माँ के गीले कपड़ों की आहट पाते ही खोका खेल से मुँह उठाकर इधर-उधर देखने लगता और माँ को देखते ही मुँह भरकर हँस देता और खपच्चियों की बाड़ पकड़कर खड़ा हो जाता। उसकी माँ कहती—यह क्या, ओ माँ, अभी तो काजल लगाकर मुँह पोंछकर गई थी, और तू एकदम हाँड़ी पोंछने वाला पंछी बनकर बैठा है? देखूँ, इधर आ। ज़ोर से नाक-मुँह रगड़कर काजल छुड़ाने की कोशिश में खोका का लाल-गुलाबी चेहरा एकदम सिंदूरी हो उठता—वह घोर आपत्ति जताते हुए क्रोध से कहता, जे-जे-जे—जे, पर उसकी माँ सुनती नहीं।
इसके बाद माँ के हाथ में गमछा देखते ही खोका खलभलाकर घुटनों के बल एक ओर भागने लगता। किसी-किसी दिन घाट से आकर सर्वजया कहती—खोकन बोले टु-उ-उ! झूमो तो खोका? झूमो झूमो खोकन झूमो! खोका फ़ौरन बैठकर आगे-पीछे ज़ोर-ज़ोर से झूमने लगता और मन के सुख में अपने नन्हे हाथ हिलाकर गाना शुरू कर देता—
(गीत)
जे-ए-ए-जे-जे-जे-ए-ए-ई
जे—जे-जे—जे—ए
जे—जे—जे--जे—जे—जे
उसकी माँ कहती, अच्छा बस, अब और मत झूमो खोका, हो गया, हो गया, बहुत हुआ। कभी-कभी काम करते-करते सर्वजया कान लगाकर सुनती कि खोका के कटघरे के भीतर से कोई आवाज़ नहीं आ रही—जैसे वह एकदम चुप हो गया हो! उसका कलेजा धक् से रह जाता—कहीं सियार तो नहीं उठा ले गया? वह दौड़कर आती तो देखती कि खोका, जैसे टोकरी से औंधाई चम्पा के फूलों का ढेर हो, मिट्टी पर बेढंगे तरीक़े से अपना नन्हा हाथ टिकाए न जाने कब सो गया है, चारों ओर से ललची चींटियाँ, मक्खियाँ और सुरसुरी चींटियों का दल बड़े लोभ से दौड़ा चला आ रहा है, खोका के पतले-पतले लाल होंठ नींद में जैसे ज़रा-ज़रा काँप रहे हैं, नींद में ही वह जैसे बीच-बीच में ढूँक निगलकर ज़ोर-ज़ोर से साँस ले रहा है—लगा जैसे जाग उठा, फिर तुरंत ही ऐसी नींद सो गया है कि साँस की आवाज़ भी नहीं मिल रही।
सुबह से शाम और शाम से बहुत रात तक उनका बाँस के झुरमुट के किनारे वाला वह निर्जन घर दस महीने के शिशु के अर्थहीन आनंद-गीत और अबोध खिलखिलाहटों से गूँजता रहता।
माँ बेटे को स्नेह से पाल-पोसकर बड़ा करती है, युग-युग से माँ की गौरव-गाथा इसीलिए हर जन-मन की वाणी में व्यक्त हुई है। किंतु शिशु जो माँ को देता है, क्या वह कुछ कम है? वह निःस्व आता है, पर उसकी मन मोह लेने वाली हँसी, शैशव की सरलता, चाँद को सानकर गढ़ा गया मुखड़ा, अधूरी, ऊल-जलूल बातों का दाम कौन देता है? यही तो उसका ऐश्वर्य है, इसी के बदले में वह सेवा लेता है, भिक्षुक की तरह ख़ाली हाथ नहीं लेता।
किसी-किसी दिन जब हरिहर बाज़ार का हिसाब या अपना लिखा-पढ़ी का काम लेकर व्यस्त रहता—सर्वजया बेटे को ले जाकर कहती, अजी, लड़के को ज़रा पकड़ोगे? लड़की न जाने कहाँ निकल गई है—ठाकुरजी घाट गई हैं… पकड़ो तो ज़रा! मैं नहाऊँगी या लड़के को गोद में लिए बैठी रहूँगी? हरिहर कहता—उँहूँ, यह झमेला अभी यहाँ मत लाओ, बहुत व्यस्त हूँ। सर्वजया नाराज़ होकर लड़के को वहीं पटककर चली जाती। हरिहर हिसाब-किताब लिखते-लिखते अचानक देखता कि लड़का उसकी चट्टी का एक पाँव मुँह में डालकर चबा रहा है! हरिहर जूता छीनकर कहता—आह, देखो तो, एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया, मैं एक काम में लगा हूँ!
अचानक एक गौरैया आकर बरामदे के किनारे बैठ गई। खोका पिता के मुँह की ओर देखकर अचरज से उस दिशा में इशारा करके हाथ हिलाते हुए बोला—जे-जे—जे-जे।
हरिहर की सारी झुँझलाहट दूर हो गई और मन में गहरी ममता उमड़ आई।
बहुत दिन पहले की एक रात याद आ जाती है।
पश्चिम से नया-नया लौटकर उस दिन वह गाँव के सभी लोगों की सलाह पर अपनी पत्नी को लाने ससुराल गया था। दोपहर के बाद ससुराल के गाँव के घाट पर नाव पहुँची। विवाह के बाद वह सिर्फ़ एक बार यहाँ आया था, रास्ते-घाट याद नहीं थे, लोगों से पूछ-पूछकर वह ससुराल के दरवाज़े पर पहुँचा। उसके पुकारने पर एक गोरी, छरहरी युवती यह देखने के लिए बाहर दरवाज़े पर आई कि कौन पुकार रहा है, और उससे आँखें मिलते ही झट से हटकर घर के भीतर चली गई—हरिहर सोचने लगा, यह लड़की कौन है? कहीं उसकी पत्नी तो नहीं? क्या वह इतनी बड़ी हो गई है?
रात में पता चला। सर्वजया, ग़रीबी से बचाकर रखी हुई अपनी माँ की एक लाल पाड़ वाली मटके की साड़ी पहने बहुत रात गए कमरे में आई। हरिहर उसे देखकर चकित रह गया। दस बरस पहले की उस बालिका-पत्नी का अब इस सुंदरी युवती में कुछ भी शेष न था—जैसे किसी ने उसे तोड़कर नए सिरे से गढ़ा हो। चेहरे का वह भोलापन तो नहीं था, पर उसकी जगह जो सौंदर्य खिला था, वह कुछ बहुत सुलभ नहीं है, यह समझने में हरिहर को देर न लगी। हाथ-पैर की बनावट, चाल-ढाल, सब कुछ सधा हुआ और नया था।
कमरे में घुसते ही सर्वजया पहले तो सकपका गई। हालाँकि वह बड़ी हो गई थी, पर अब तक पति से मिलना-जुलना एक तरह से हुआ ही नहीं था। नवविवाहिता की वह लाज जैसे उसे नए सिरे से जकड़ रही थी। हरिहर ने ही पहले बात छेड़ी। पत्नी का दाहिना हाथ अपने हाथ में लेकर उसे बिस्तर पर बिठाते हुए बोला, यहाँ बैठो, अच्छी हो?
सर्वजया मंद-मंद मुस्कुराई। लाज जैसे कुछ कम हो गई। बोली—इतने दिनों बाद याद आई क्या? अच्छा, यह तो बताओ, इतने दिन कहाँ ग़ायब थे? फिर वह हँसकर बोली—क्यों, क्या ख़ता की थी मैंने, बताओ तो?
पत्नी की बातों में ठेठ देहात का जो खिंचाव और अंदाज़ था, वह हरिहर को नया और बड़ा मीठा लगा। बाद में उसने ध्यान से देखा कि पत्नी के हाथों में कुछ कौड़ियों और काँच की चूड़ियों के सिवा कोई और गहना नहीं है। ग़रीब घर की लड़की है, देने वाला कोई नहीं, इतने दिन ख़बर न लेकर उसने बड़ा अन्याय किया है। सर्वजया भी पति को देख रही थी। आज दिन भर में वह चार-पाँच बार आड़ से झाँककर देख चुकी थी—स्वस्थ यौवन ने हरिहर के सुगठित शरीर को जो वीरोचित भंगिमा दी थी, वह बंगाल के देहात में अमूमन आँखों में नहीं पड़ती। माँ-बाप की बातों से आज उसने सुना था कि उसका पति पश्चिम से ख़ूब पढ़-लिखकर आया है, रुपए-पैसे के मामले में भी दो पैसे न कमाए हों, ऐसा नहीं है। इतने दिनों बाद उसके दुःख दूर हुए, भगवान ने शायद इतने दिनों बाद मुँह उठाकर देखा है। सभी कहते थे कि उसका पति संन्यासी हो गया है—अब कभी नहीं लौटेगा। मन-ही-मन इस बात पर विश्वास न करते हुए भी पति का लौटना इतने समय तक उसके लिए एक दुराशा-जैसा ही लगता था। कितनी रातें उसने गहरी चिंता में जागकर काटी थीं, गाँव के विवाह-उपनयन के उत्सवों में ठीक से शामिल नहीं हो पाती थी—सभी ‘अहा’ कहते, ख़ुद से सहानुभूति जताते; अभिमान से उसकी आँखों में आँसू आ जाते—अछूते यौवन की सुनहरी कल्पनाएँ इतने दिन बस आड़े-तिरछे, एकांत रातों में आँखों के पानी में झरती रहीं, किसी के आगे मुँह खोलकर कुछ कहा नहीं, पर बैठे-बैठे कितनी बार सोचती—यही तो घर के हालात हैं, अगर सचमुच पति लौटकर नहीं आए, तो माँ-बाप के मरने के बाद वह कहाँ जाएगी—कौन आसरा देगा?
इतने दिनों बाद किनारा मिला।
हरिहर ने हँसकर पूछा—अच्छा, जब तुमने मुझे उस वक़्त दरवाज़े के बाहर देखा—तब पहचान लिया था? सच बोलना लेकिन—
सर्वजया हँसकर बोली—ना, क्यों पहचानूँगी भला! पहले तो ठीक से समझ नहीं पाई, फिर तुरंत ही— —अंदाज़े से—
—अंदाज़े से नहीं जी, अंदाज़े से नहीं—सच-सच! देखा नहीं, तुरंत सिर पर आँचल डालकर घर में घुस गई? फिर ज़रा चुप रहकर उसने दोबारा पूछा, अच्छा, तुम बताओ तो, मुझे पहचान पाए थे? बोलो तो, मेरी क़सम खाकर?
तरह-तरह की काम की और बेकाम की बातों में रात बढ़ती गई। दिवंगत बड़े भाई की बात उठी तो सर्वजया की आँखों के आँसू और न रुके। हरिहर ने पूछा, बीणा की शादी कहाँ हुई? छोटी साली का नाम वह नहीं जानता था, आज ही ससुर के मुँह से सुना था।
—उसकी शादी हुई कुड़ुले-विनोदपुर में—वही जो बड़ी नदी है, क्या कहते हैं? मधुमती। उसी मधुमती के किनारे।
एक प्रश्न बार-बार सर्वजया के मन में आ रहा था—पति उसे लेकर जाएँगे तो? या, बस देखकर फिर चले जाएँगे उसी काशी-गया? कहते-कहते भी मुँह खोलकर वह बात किसी भी तरह पूछ न सकी—उसके मन के भीतर जैसे किसी ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया—न ले जाएँ तो न सही! यह भी क्या कि ख़ुद पूछो, क्यों इतना छोटा बना जाए?
हरिहर ने समस्या का समाधान ख़ुद ही कर दिया। बोला—कल चलो तुम्हें घर ले चलूँ, निश्चिन्दिपुर।
सर्वजया की छाती में जैसे धड़ाम से ढेंकी का मूसल आ गिरा हो—संभलकर मुँह से बोली—कल ही क्यों? इतने दिनों बाद आए हो—दो दिन रुको न? माँ-बाप क्या तुम्हें अभी छोड़ देंगे? परसों फिर मेरी बकुलफूल के घर तुम्हारा न्योता है—
—कौन तुम्हारी बकुलफूल?…
—इसी गाँव में घर है—इस पाड़े में, और शादी हुई है उस पाड़े में। फिर वह दोबारा हँसकर बोली, कल सुबह वह तुम्हें देखने आएगी, कह गई है—
बातों का सिलसिला उसी तरह चलता रहा—रात गहरी हो गई। घर के पास ही सहजन के पेड़ पर कोई रात-जगा पंछी अजीब-सी आवाज़ में बोल रहा था। हरिहर को लगा कि बंगाल के इस एकांत देहाती छोर पर बाँस के झुरमुट की छाया में एक स्नेह-भरा घर का कोना जब उसके आने की आस में महीनों-महीनों, बरसों-बरस स्वागत की सज्जा सजाए प्रतीक्षा करता रहा, वह किस चीज़ की खोज में तब पश्चिम के बंजर, अनजाने रेगिस्तानों और पहाड़ों के बीच बेघर, बेसहारा की तरह भटकता फिर रहा था! रात-जगा पंछी एक ही धुन में बोले जा रहा था, बाहर की चाँदनी धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जा रही थी। एक हिसाब से यह रात उसे बड़ी रहस्यमयी लग रही थी, सामने उनके नए जीवन का जो पथ सुदूर भविष्य में चला गया है—आज की रात से ही उसकी शुरुआत है। कौन जाने वह जीवन कैसा होगा? कौन जाने जीवन-लक्ष्मी ने उनके उस अनिश्चित भविष्य के पाथेय के रूप में कौन-सी डलिया सजा रखी है?
दोनों के ही मन में शायद बहुत कुछ अस्पष्ट रूप से एक ही भाव जाग रहा था। दोनों चुपचाप खिड़की के बाहर की चाँदनी रात की ओर ताकते रहे।
तब कहाँ था इस शिशु का अता-पता?
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