उस दिन की घटना कुछ इस प्रकार घटी।
अपू, पिता के आदेश पर, ताड़पत्र पर सात बार क-ख लिखकर समाप्त करने के बाद सोच रहा था कि अब क्या किया जाए। इसी उधेड़बुन में वह घर के भीतर अपनी दीदी को खोजने चला गया। दुर्गा माँ के डर से सुबह ही नहा-धोकर भीतरी आँगन में पपीते के पेड़ के नीचे पुण्यिपुकुर का व्रत कर रही थी। आँगन में एक छोटा-सा चौकोर गड्ढा खोदकर उसके चारों ओर उसने चना-मटर बिखेर दिया था—गीली मिट्टी में वे अंकुरित हो उठे थे—चारों कोनों पर केले के छोटे-छोटे पौधे रोपकर किनारे-किनारे चावल के घोल से अल्पना बना रही थी—पद्म-लता, चिड़ियाँ, धान की बाली, उगता हुआ सूरज।
दुर्गा बोली—ठहर, बस यह मंत्र बोल लूँ, फिर एक जगह चलेंगे।
—कहाँ री दीदी?
—चल तो, अभी ले चलूँगी, देखना फिर।
फिर सारे आनुषंगिक विधि-विधान पूरे करके वह एक साँस में आबृत्ति करने लगी—
पुण्य-सरोवर पुष्प-हार, कौन पूजे भरी दुपहर?
मैं सती लीलावती, भाई की बहन भाग्यवती—
अपू खड़ा-खड़ा सुन रहा था। उसने मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में हँसकर कहा—इः!
दुर्गा ने छंद रोक दिया और थोड़ी लज्जा-मिश्रित हँसी के साथ बोली—तू ऐसे क्यों कर रहा है? जा यहाँ से—तेरा क्या काम यहाँ? —जा।
अपू हँसता हुआ चला गया। जाते-जाते दोहराता रहा—मैं सती लीलावती, भाई की बहन भाग्यवती, ही-ही—भाई की बहन भाग्यवती—ही-ही—
दुर्गा बोली, तुम्हारी बड़ी… ई हो गई है, है न? माँ से कहकर तुम्हारा मुँह चिढ़ाना निकलवाऊँगी अभी—
व्रत-अनुष्ठान समाप्त करके दुर्गा बोली, चल, गढ़ के तालाब में ढेर सारे सिंघाड़े लगे हैं—भोंदा की माँ कह रही थी, चल तोड़ लाते हैं—
गाँव के एकदम उत्तरी छोर पर, चारों ओर बाँस के झुरमुटों, जंगली झाड़ियों और पुराने आम-कटहल के बागों के बीच से रास्ता गया था। बस्ती से बहुत दूर, जहाँ घना जंगल खत्म होता था, वहीं मैदान के किनारे वह मज़ा हुआ तालाब था। किसी ज़माने में गाँव के आदि-निवासियों, मजुमदार-परिवार के घर के चारों ओर जो गढ़ की खाई थी, उसका बाकी हिस्सा अब भर चुका था—केवल इसी हिस्से में बारहों महीने पानी रहता था, इसी का नाम गढ़ का तालाब था। मजुमदार-परिवार के घर का अब कोई चिह्न बाकी नहीं था।
वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि तालाब में सिंघाड़े तो बहुत थे, पर किनारे के पास कुछ खास नहीं थे, सब पानी में दूर थे। दुर्गा बोली—अपू, एक बाँस की पतली टहनी खोजकर ला तो—उसी से खींचकर लाएँगे।
फिर वह तालाब के किनारे की झाड़ियों में श्योड़ा के पेड़ से पके हुए श्योड़ा के फल तोड़-तोड़कर खाने लगी। अपू जंगल में टहनी खोजते-खोजते उसे देख गया और बोला—ओ दीदी, वह फल मत खा! —धत्—श्योड़ा का फल भी कोई खाता है भला! वह तो चिड़ियाँ खाती हैं—
दुर्गा पके फल को दबाकर बीज निकालते हुए बोली—इधर आ तो—खाकर देख तो—गुड़ जैसा मीठा है। किसने कहा नहीं खाते? मैंने तो कितने ही खाए हैं।
अपू टहनी खोजना छोड़कर दीदी के पास आ गया और बोला—कहते हैं इसे खाने से आदमी पागल हो जाता है? मुझे एक देना तो दीदी—
फिर उसने एक खाया और मुँह बिचकाकर बोला—थोड़ा-थोड़ा कसैला है दीदी—
—तो थोड़ा कसैला नहीं रहेगा? पर है तो मीठा, बता तो—यह कहकर दुर्गा ने बड़ी खुशी से मुट्ठी भर पके फल मुँह में भर लिए।
जन्म से लेकर आज तक इन दोनों ने कभी कोई अच्छी चीज़ खाकर नहीं देखी थी। वे दुनिया में नए-नए आए थे, उनकी जीभ नई थी—वह पृथ्वी के नाना रसों, विशेषकर मीठे रस का स्वाद चखने के लिए लालायित रहती थी। मिठाई-संदेस खरीदकर वह तृप्ति पाने का अवसर उन्हें कभी नहीं मिलता था—विश्व की अनंत संपदा के बीच, जंगल के मामूली पेड़ से मीठा रस निचोड़ते इन भूखे-प्यासे, गरीब घर के बालक-बालिकाओं के लिए ही मानो करुणामयी वन-देवियाँ जंगल के तुच्छ फल-फूलों को मीठे मधु से भरकर रखती हैं।
थोड़ी देर बाद दुर्गा तालाब के पानी में ज़रा-सा उतरकर बोली—कितने सारे कमल के फूल हैं अपू! ठहर, तोड़ती हूँ।
पानी में और उतरकर उसने दो फूलों की लताएँ पकड़कर खींचीं—और किनारे की ओर फेंककर बोली—पकड़ अपू।
अपू बोला—सिंघाड़े तो बहुत गहरे पानी में हैं—वहाँ कैसे जाएगी दीदी?
दुर्गा एक टहनी से दूर पानी में सिंघाड़े के पौधों को खींचने की कोशिश करके हार गई। बोली—तालाब बहुत ढलानवाला है रे—मैं गहरे पानी में फिसलती जा रही हूँ—पहुँचूँ कैसे? तू एक काम कर, पीछे से मेरा आँचल पकड़कर खींच रख, मैं टहनी से सिंघाड़े का वह झुंड खींच लाती हूँ।
वन में एक पीली-सी चिड़िया मयनकाँटा के पेड़ की डाल की फुनगी पर बैठी, पत्तों को नचाती हुई बड़ी प्यारी सीटी दे रही थी। अपू उसे देखता रहा और बोला—यह कौन-सी चिड़िया है री दीदी?
—चिड़िया-विड़िया अभी रहने दे—पकड़ तो ज़रा कसके आँचल को, फिसल जाऊँगी—ज़ोर से—
अपू ने पीछे से आँचल खींचकर पकड़ लिया। दुर्गा पैर-पैर चलकर जितना हो सका आगे गई और टहनी बढ़ाई। कपड़े भीग गए पर पहुँच नहीं पा रही थी—थोड़ा और उतरकर उँगलियों के बस सिरे से टहनी पकड़कर खींचने की कोशिश की। अपू पकड़े-पकड़े जब और ज़ोर नहीं लगा पा रहा था तो पीछे से हँस पड़ा। हँसी के साथ आँचल ढीला पड़ते ही दुर्गा पानी की ओर झुक गई, पर तुरंत ही सँभलकर हँसते हुए बोली—धत्, तू भी किसी काम का लड़का नहीं—पकड़ फिर से।
बड़ी मुश्किल से सिंघाड़ों का एक झुंड पास आया—दुर्गा उत्सुकता से देखने लगी कि कितने सिंघाड़े लगे हैं। फिर उसे किनारे फेंककर बोली, बहुत कच्चे हैं, अभी दूध भी नहीं भरा है इनमें। एक बार और पकड़ तो। अपू ने फिर पीछे से खींचकर पकड़ लिया। थोड़ी देर बाद वह दीदी के झुकने के साथ-साथ खिंचाव के ज़ोर से फिर दो-एक कदम पानी की ओर बढ़ आया—फिर कपड़े भीगते देख ही-ही करके हँस पड़ा।
दुर्गा हँसकर बोली—धत्!
भाई-बहन की खिलखिलाहट से कुछ देर तक तालाब के किनारे का वह निर्जन बाँस-वन गूँजता रहा। दुर्गा बोली—ज़रा भी ज़ोर है तेरे शरीर में! गोबर-गणेश कहीं के!
थोड़ी देर बाद दुर्गा पानी में उतरकर एक बार और कोशिश कर रही थी और अपू किनारे पर खड़ा था, तभी अपू ने पास के एक श्योड़ा के पेड़ की ओर उँगली दिखाकर चिल्लाकर कहा—दीदी, देख यहाँ क्या है!....
फिर वह दौड़कर गया और ज़मीन खोदकर कुछ निकालने लगा।
दुर्गा ने पानी से ही पूछा—क्या है रे?
फिर वह भी पानी से निकलकर भाई के पास आ गई।
अपू तब तक ज़मीन खोदकर कुछ निकाल चुका था और अँगोछे से मिट्टी पोंछकर साफ़ कर रहा था। उसे हाथ में लेकर बड़े उल्लास से दीदी को दिखाकर बोला—देख दीदी, चक्-चक् कर रहा है—क्या चीज़ है रे?
दुर्गा ने हाथ में लेकर देखा—गोल-सी, एक ओर से नुकीली, कई पहलुओं में कटी हुई, चमचमाती कोई चीज़। वह कुछ देर तक बड़ी आग्रह से उसे तरह-तरह से उलट-पलटकर देखती रही।
अचानक कुछ सोचकर उसका रूखे बालों से घिरा चेहरा दमक उठा। उसने डरते-डरते चारों ओर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा। फिर धीरे से बोली—अप्पू, यह शायद हीरा है! चुप रह, चिल्लाना मत।
फिर उसने डरते-डरते एक बार और चारों ओर देख लिया।
अपू अपनी दीदी की ओर अबाक होकर ताकता रहा। हीरा वस्तु उसके लिए अनजान नहीं थी, माँ और दीदी के मुँह से उसने राजकुमारों और राजकुमारियों के हीरे-मोतियों के गहनों की छटा के बारे में कई बार सुना था; पर हीरा चीज़ देखने में कैसी होती है, इस बारे में उसके मन में थोड़ी गलत धारणा थी। उसे लगता था कि हीरा देखने में मछली के अंडे जैसा होता है, पीला-पीला, पर नरम नहीं—सख्त!....
सर्वजया घर पर नहीं थी। पड़ोस से लौटकर आई तो देखा—बेटा-बेटी घर के अंदर के दरवाज़े के पास खड़े हैं। पास जाने पर दुर्गा ने धीरे से कहा—माँ, हम लोगों को एक चीज़ पड़ी मिली है। गढ़ के तालाब पर सिंघाड़े तोड़ने गए थे, वहीं जंगल में यह गड़ी हुई थी।
अपू बोला—मैंने देखकर दीदी को बताया, माँ।
दुर्गा ने आँचल से वह चीज़ निकालकर माँ के हाथ में दी और बोली—देखो तो माँ, यह क्या है?
सर्वजया उसे उलट-पुलटकर देखने लगी। दुर्गा ने धीरे से कहा—माँ, यह पक्का हीरा है—है न?
सर्वजया की भी हीरे के बारे में धारणा उन दोनों से कुछ ज़्यादा स्पष्ट नहीं थी। उसने संदेह-भरे स्वर में पूछा—तुझे कैसे पता कि हीरा है?
दुर्गा बोली—मजुमदार लोग बहुत अमीर थे न माँ? उनके घर के खंडहर वाले जंगल में किसी को मोहरें पड़ी मिली थीं—पीसी कहानी सुनाती थी। यह बिलकुल तालाब के किनारे जंगल में गड़ा था, धूप पड़ते ही चक्-चक् कर रहा था, यह पक्का हीरा है माँ।
सर्वजया बोली—पहले इन्हें आने दो, इन्हें दिखाऊँगी।
दुर्गा बाहर आँगन में आकर उल्लास से भाई से बोली—अगर यह हीरा हुआ न, तो देखना हम लोग अमीर हो जाएँगे।
अपू कुछ न समझकर बेवकूफों की तरह ही-ही करके हँस दिया।
बच्चों के चले जाने पर सर्वजया ने वह चीज़ निकालकर अच्छी तरह देखी।
गोल-सी, धारकटी और पहलुओंवाली, एक सिरा नुकीला—जैसे सिंदूर की डिबिया का ऊपरी ढक्कन। काफ़ी चमकीली। सर्वजया को लगा जैसे वह उसके अंदर कई तरह के रंग देख पा रही है। पर यह काँच तो नहीं है—यह पक्का था। इस तरह का काँच उसने कभी देखा हो, ऐसा तो याद नहीं आता। अचानक जैसे उसके पूरे बदन में कोई लहर-सी दौड़ गई, उसके मन के एक कोने में नाना संदेहों की बाधा को ठेलकर एक गहरी दुराशा ने डरते-डरते झाँका—सचमुच यदि हीरा हुआ, तो?
हीरे के बारे में उसकी धारणा पारस पत्थर या साँप के सिर की मणि जैसी थी। ये सब कहानियों की बातें थीं, असली दुनिया में ज़्यादातर दिखती नहीं; और अगर दिख भी जाएँ, तो शायद दुनिया की सारी दौलत एक टुकड़े हीरे के बदले मिल सकती है।
कुछ देर बाद एक पोटली हाथ में लिए हरिहर घर में घुसा।
सर्वजया बोली—ओ जी, सुनो, इधर आओ तो! देखो तो यह क्या है!
हरिहर ने हाथ में लेकर कहा—कहाँ मिला?
—दुर्गा गढ़ के तालाब पर सिंघाड़े तोड़ने गई थी, उसे पड़ा मिला है। क्या है, बताओ तो?
हरिहर ने कुछ देर उलट-पुलटकर देखा और बोला, काँच है, या फिर कोई पत्थर-वत्थर होगा—इतनी छोटी-सी चीज़ है, ठीक समझ नहीं पा रहा।
सर्वजया के मन में आशा की एक क्षीण रेखा उभरी—अगर काँच होता तो क्या उसके पति पहचान नहीं पाते? फिर उसने धीरे से, जैसे इस डर से कि पति कोई विरोधी तर्क न दे दें, कहा—हीरा तो नहीं है? दुर्गा कह रही थी, मजुमदार-बाड़ी के गढ़ में तो कितने लोगों को क्या-कुछ पड़ा मिला है! अगर हीरा हुआ तो?
—हाँ, हीरा अगर रास्ते-घाट पर मिलने लगता तो फिर चिंता ही क्या थी? तुम भी कमाल करती हो!
पर मन-ही-मन हरिहर को लगा कि यह काँच ही है, लेकिन अगले ही पल सोचा, हो भी तो सकता है। कौन जाने? मजुमदार लोग अमीर थे। क्या अजब कि शायद उनके ही किसी गहने-वहने में कभी जड़ा रहा हो और किसी तरह मिट्टी में दब गया हो। कहते हैं, किस्मत में न हो तो गुप्त धन हाथ में आकर भी पहचाना नहीं जाता—कहीं आखिर में उस गरीब ब्राह्मण की कहानी जैसा हाल न हो!
उसने कहा—अच्छा ठहरो, ज़रा गांगुली-बाड़ी से दिखाकर आता हूँ।
खाना बनाते-बनाते सर्वजया बार-बार मन-ही-मन कहने लगी—दुहाई है ठाकुर, कितने लोगों को तो क्या-कुछ नहीं मिल जाता। घर की यह हालत है—बच्चों का मुँह तो देखो—दुहाई है ठाकुर।
उसका हृदय धक्-धक् कर रहा था।
कुछ देर बाद दुर्गा घर आकर उत्सुकता से बोली—बाबा अभी घर नहीं लौटे, क्यों माँ?
तभी हरिहर घर के भीतर घुसते हुए बोला—हूँ, मैंने तो तभी कहा था कि यह कुछ नहीं है। गांगुली महाशय के दामाद सत्य बाबू कलकत्ता से आए हुए हैं—उन्होंने देखकर कहा, यह एक तरह का बिलौरी काँच है—झाड़-फानूस में लटका रहता है। रास्ते-घाट पर अगर हीरे-जवाहरात मिलने लगते तो—तुम भी कमाल करती हो
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