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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · अठारहवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

अठारहवाँ परिच्छेद

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उस दिन अपू मछुआरों के मोहल्ले में कौड़ियाँ खेलने गया था। दोपहर के दो-ढाई बज रहे थे, धूप बहुत तेज थी। पहले वह तीनकौड़ी मछुआरे के घर गया। तीनकौड़ी का बेटा बंका अमरूद के पेड़ के नीचे बैठकर बाँस की खपच्चियाँ छील रहा था। अपू ने पूछा — अरे, कौड़ियाँ खेलेगा? खेलने की इच्छा तो थी, पर बंका ने कहा कि उसे अभी नाव पर जाना है, खेलने लगा तो बाबूजी डाँटेंगे। वहाँ से वह रामचरण मछुआरे के घर गया। रामचरण बरामदे में बैठा तमाखू पी रहा था। अपू ने कहा — हृदय घर पर है? रामचरण बोला — हृदय से क्या काम है ठाकुर? कौड़ियाँ खेलोगे? अभी जाओ, हृदय घर पर नहीं है।

ठीक दोपहर में घूमते-घूमते अपू का चेहरा लाल हो गया था। और भी कई जगह से निराश होकर वह घूमता हुआ बाबूराम पाड़ुई के घर के पास इमली के पेड़ के नीचे पहुँचा, तो उसका चेहरा खुशी से खिल उठा। इमली के पेड़ के नीचे कौड़ियों का खेल खूब जमा था। सभी मछुआरे मोहल्ले के लड़के थे, केवल ब्राह्मण-टोले का एक लड़का था — पटू। अपू की पटू से ज़्यादा जान-पहचान नहीं थी, क्योंकि पटू का घर जिस मोहल्ले में था, वह अपू के घर से बहुत दूर था। पटू उम्र में अपू से कुछ छोटा था। अपू को याद आया, जिस दिन वह पहली बार प्रसन्न गुरुजी की पाठशाला में भर्ती होने गया था, उसी दिन उसने इस लड़के को शांति से बैठकर ताड़पत्र मुँह में डालकर चबाते देखा था...। अपू ने उसके पास जाकर पूछा — कितनी कौड़ियाँ हैं?...पटू ने कौड़ियों की थैली निकालकर दिखाई। लाल सूत की बुनी हुई एक छोटी-सी थैली — उसे वह बहुत प्रिय थी। बोला, सत्रह लाया हूँ — सात सोने की गोटियाँ; हार गया तो और ले आऊँगा... फिर उसने थैली दिखाकर हँसते हुए कहा — कैसी लग रही है? इस थैली में एक पण कौड़ियाँ आती हैं।

खेल शुरू हुआ। पहले तो पटू हार रहा था, फिर जीतने लगा। कुछ ही दिन पहले पटू ने पाया था कि कौड़ी के खेल में उसका निशाना अचूक हो गया है; इसीलिए वह दिग्विजय की महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित होकर इतनी दूर तक आया था। खेल के नियम के अनुसार पटू ऊपर से हल्के से बड़ी कौड़ी से निशाना साधकर जैसे ही मारता और एक कौड़ी घूमती हुई घर से बाहर निकल जाती, पटू का चेहरा असीम आनंद से खिल उठता। फिर वह जीती हुई कौड़ियाँ उठाकर थैली में डाल लेता और लोभ व आनंद से बार-बार थैली की ओर देखता कि वह भरने में और कितनी बाकी है।

कुछ मछुआरे लड़कों ने आपस में कुछ सलाह की। एक ने पटू से कहा — एक हाथ और दूर से मारना होगा ठाकुर, तुम्हारा निशाना बहुत पक्का है!

पटू बोला, अरे वाह, यह क्यों, निशाना पक्का होना क्या कोई दोष है? तुम लोग भी जीतो न, मैंने तो किसी को मना नहीं किया।

फिर उसने चारों ओर देखा, मछुआरे लड़के सब एक तरफ हो गए थे। पटू ने सोचा — इतनी सारी कौड़ियाँ मैंने आज तक नहीं जीतीं; आज और नहीं खेलता — खेला तो क्या ये कौड़ियाँ घर ले जा पाऊँगा? ऊपर से एक हाथ और दूर से! सब हार जाऊँगा। अचानक उसने कौड़ियों की छोटी थैली हाथ में लेकर कहा — मैं एक हाथ दूर से नहीं खेलूँगा, मैं घर जा रहा हूँ...। फिर मछुआरे लड़कों की भाव-भंगिमा और आँखों की क्रूर दृष्टि देखकर उसने अनजाने में ही अपनी कौड़ियों की थैली को मज़बूत मुट्ठी में भींच लिया।

एक लड़का आगे बढ़कर बोला — ऐसा नहीं होगा ठाकुर, कौड़ियाँ जीतकर भाग जाओगे क्या?... साथ ही उसने अचानक पटू का थैली-समेत हाथ दबोच लिया। पटू ने छुड़ाने की कोशिश की, पर ज़ोर से नहीं छुड़ा सका; उदास चेहरे से बोला — अरे, छोड़ो न मेरा हाथ! — पीछे से किसी ने उसे धक्का मारा; वह गिर तो गया, पर कौड़ियों की थैली नहीं छोड़ी। वह समझ गया था कि इन्हीं को छीनने के लिए इनकी यह कोशिश है! गिरकर उसने जी-जान से थैली को पेट के पास दबाए रखने की कोशिश की; लेकिन एक तो वह बच्चा था, दूसरे शरीर में ताकत भी कम थी, मछुआरे मोहल्ले के बलवान और उम्र में बड़े लड़कों से वह कितनी देर जूझ पाता! हाथ से कौड़ियों की थैली न जाने कब छिटककर दूर जा गिरी थी, कौड़ियाँ चारों तरफ बिखर गईं।

शुरू में पटू की दुर्दशा पर अपू को थोड़ी खुशी न हुई हो, ऐसी बात नहीं, क्योंकि वह भी बहुत-सी कौड़ियाँ हारा था। लेकिन पटू को गिरते देखकर, और ख़ासकर उसे असहाय होकर मार खाते देखकर, उसके सीने में कुछ हो उठा। वह भीड़ को धकेलकर आगे बढ़ा और बोला — बच्चा है, उसे तुम लोग क्यों मार रहे हो? अरे, छोड़ दो — छोड़ो! फिर वह पटू को ज़मीन से उठाने गया, लेकिन पीछे से किसी के घूँसे से उसकी आँखों के आगे थोड़ी देर के लिए अँधेरा छा गया; फिर धक्का-मुक्की में वह भी ज़मीन पर गिर पड़ा।

उस दिन अपू की भी निश्चित रूप से ज़बरदस्त पिटाई होती, क्योंकि उसके जनाने से हाथों-पैरों में कोई ज़ोर नहीं था, लेकिन ठीक समय पर नीरेन के उस रास्ते आ जाने से विपक्षी दल खिसक गया। पटू को बहुत ज़्यादा चोट लगी थी; नीरेन ने उसे ज़मीन से उठाकर उसकी धूल झाड़ी। ज़रा सँभलते ही वह चारों ओर देखने लगा — बिखरी हुई कौड़ियों में से दो-एक को छोड़कर बाकी सब गायब थीं, यहाँ तक कि कौड़ियों की थैली भी। फिर वह अपू के पास सरककर आया और पूछा — अपूदा, तुम्हें ज़्यादा तो नहीं लगी?

इतनी दूर ठीक दोपहर में मछुआरे लड़कों के झुंड में मिलकर कौड़ियाँ खेलने आने के लिए नीरेन ने दोनों को डाँटा। समय बिताने के लिए नीरेन ने मोहल्ले के लड़कों को लेकर अन्नदा राय के चंडीमंडप में एक पाठशाला खोली थी, वहाँ कल से पढ़ने के लिए दोनों से बार-बार कहा। पटू चलते-चलते बस यही सोच रहा था — कितनी सुंदर थी मेरी कौड़ियों की थैली, उस दिन बड़ी मिन्नत से छीबास से ली थी — चली गई! मैं अगर कौड़ियाँ जीतकर और न खेलूँ तो उनका क्या? वह तो मेरी मर्ज़ी है!...

घर में घुसते ही अपू ने दुर्गा से कहा — दीदी, शिवली-तले चाची के पास मैंने एक टेढ़ी-सी टहनी रखी थी, और तूने शायद उसे तोड़कर दो टुकड़े कर दिए हैं?

दुर्गा ने उसे तोड़ा ज़रूर था। — आहा, बड़ी कीमती थी एक टेढ़ी-सी टहनी! तेरी भी ये सब दीवानगी है। बाँस-बाड़ी में खोजने से क्या टहनी और नहीं मिलेगी? टहनियों की क्या कमी है!

अपू ने लज्जित होकर कहा — कमी नहीं है तो क्या? तू लाकर दे देखूँ वैसी ही एक टहनी! मैं इतनी खोज-बीन करके लाऊँगा, और तू सब तोड़-ताड़कर रख देगी — ख़ूब है!

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

दुर्गा बोली — दे दूँगी, जितनी चाहेगा, रोने की क्या बात है?

टेढ़ी-सी टहनी अपू के जीवन में एक अद्भुत चीज़ थी! एक सूखी, हल्की, जड़ की तरफ मोटी — और सिरे की तरफ पतली, टेढ़ी-सी टहनी हाथ में लेते ही अपू का मन रोमांच से सिहर उठता, मन में अद्भुत कल्पनाएँ जागतीं। एक टेढ़ी-सी टहनी हाथ में लेकर वह कभी सारा सवेरा या सारी दोपहर अकेले ही बाँस-बाड़ी के रास्ते या नदी किनारे घूमता रहता; कभी राजकुमार, कभी तमाखू का दुकानदार, कभी यात्री, तो कभी सेनापति, कभी महाभारत का अर्जुन — कल्पना करता और मन-ही-मन बड़बड़ाकर काल्पनिक घटनाएँ, जो उस अवस्था में उसके जीवन में घटतीं तो उसे आनंद होता, कहता जाता। टहनी जितनी मनचाही हल्की और उचित मात्रा में टेढ़ी होती, उसका आनंद और कल्पना भी उतनी ही पूर्णता पाती; लेकिन वैसी टहनी इकट्ठा करना कितना मुश्किल है, यह अपू समझता था। कितनी खोज के बाद एक मिलती थी।

अपू जो टेढ़ी-सी टहनी हाथ में लेकर इस तरह घूमता है, यह बात कोई सुन न पाए, इसके लिए अपू की भरपूर कोशिश रहती। ऐसी हालत में लोग उसे अकेले बड़बड़ाते देखें तो पागल समझेंगे या कुछ और सोचेंगे, इस आशंका से वह जहाँ तक हो सके, भीड़-भाड़ वाली जगहों पर या जहाँ कोई अचानक आ सकता हो, उन दिशाओं में न जाकर नदी किनारे — निर्जन बाँस-बाड़ी के रास्ते — अपने घर के पीछे इमली के पेड़ के नीचे घूमता। इस हालत में उसे कोई न देखे, इस पर उसकी कड़ी नज़र रहती! कभी-कभार अगर कोई आ भी जाता, तो वह तुरंत जीभ काटकर हाथ की टहनी फेंक देता — कहीं कोई कुछ सोच न ले — इस बात पर उसे बड़ी शर्म आती।

सिर्फ उसकी दीदी जानती है। दीदी ने उसे इस हालत में दो-एक बार देख लिया था, सो दीदी से और क्या छिपाना? इसीलिए उसने टेढ़ी-सी टहनी की बात दीदी से साफ़-साफ़ पूछ ली। कोई और होता, तो शर्म के मारे अपू कभी इस बात का ज़िक्र नहीं कर पाता, हालाँकि कोई नहीं जानता कि अपू का उस टेढ़ी-सी टहनी से क्या रहस्यमय संबंध है, फिर भी अपू को लगता है कि सब जानते हैं, कहते ही सब उसे पागल कहकर मज़ाक उड़ाएँगे। कौन समझेगा — एक टेढ़ी-सी टहनी हाथ में मिल जाने पर, वह बिना खाए-पिए नदी किनारे या किसी निर्जन वन-पथ पर कितने अद्भुत आनंद में सारा दिन अकेले बिता सकता है!...

दीदी से अनुरोध किया था — माँ से ये सब मत कहना दीदी!... दुर्गा ने नहीं कहा!

वह जानती है, अपू एक पागल है! उस पर बड़ी ममता आती है, छोटा-सा भोला-भाला, दुलारा भाई है — ये सब। माँ से कहकर क्या होगा?...

मधुसंक्रांति के व्रत से एक दिन पहले सर्वजया ने बेटे से कहा — कल अपने मास्टर साहब को न्योता दे आना — कहना कि दोपहर को यहाँ भोजन करें।

मोटे चावल का भात, पपीते की डालना, गूलर की शुक्तनि, केले के तने का घण्ट, झींगा मछली का झोल, केले के बड़े और खीर।

दुर्गा को उसकी माँ ने परोसने के काम में लगाया है। एकदम अनाड़ी — डरते-डरते इतनी सावधानी से उसने दाल की कटोरी निमंत्रित के सामने रखी — मानो उसे डर हो कि अभी कोई डाँट देगा। इतने मोटे चावल का भात खाने की आदत नीरेन को नहीं थी; इतने कम तेल-घी में पकी सब्ज़ी लोग कैसे खाते हैं, यह वह नहीं जानता था। खीर फीकी, पानी मिले दूध से बनी थी, एक बार मुँह में डालते ही खीर खाने का उसका आधा उत्साह कम हो गया। अपू बड़े हर्ष और उत्साह से खा रहा था; इतना स्वादिष्ट भोजन उनके घर पर दो-एक बार ही बना है — आज उसके लिए एक यादगार उत्सव का दिन है! — आप थोड़ी और खीर लीजिए मास्टर साहब...। वह ख़ुद बार-बार यह-वह अपनी दीदी से माँग रहा था।

घर लौटने पर गोकुल की बहू ने हँसकर कहा — दुग्गा पसंद है क्या देवरजी? ख़ूब सुंदर है देखने-सुनने में। आहा! गरीब के घर की लड़की, बाप के पास पैसा नहीं। किसके हाथ पड़ेगी? — सारी ज़िंदगी पड़ी-पड़ी भुगतेगी। तो तुम उससे शादी क्यों नहीं कर लेते देवरजी, तुम लोगों की ही बराबरी की बिरादरी है — लड़की भी ख़ूब है; भाई-बहन दोनों की कैसी प्यारी-प्यारी, गुड़िया जैसी बनावट है!...

सर्वेक्षण के तंबू से लौटते हुए नीरेन ने उस दिन गाँव के पीछे वाले आम के बाग़ का रास्ता पकड़ा था। एक घने जंगल से घिरे सँकरे रास्ते से आते-आते उसने देखा कि बाग़ के अंदर से एक लड़की सामने के रास्ते पर चढ़ रही है, उसने पहचान लिया — अपू की बहन दुर्गा। पूछा, क्या ख़ुकी, यह बाग़ तुम्हारा है क्या?

दुर्गा ने पीछे मुड़कर देखा और लजा गई, कुछ नहीं बोली।

फिर वह रास्ते के किनारे खड़ी होकर नीरेन को रास्ता देने लगी। नीरेन ने कहा — नहीं-नहीं ख़ुकी, तुम चलो आगे-आगे। तुमसे मिलकर अच्छा ही हुआ। उस तरफ एक तालाब के किनारे जा पहुँचा था, फिर रास्ता ढूँढ़ते-ढूँढ़ते परेशान हो गया। क्या जंगल है तुम्हारे देश में!

दुर्गा चलते-चलते अचानक रुकी और गरदन घुमाकर नीरेन के चेहरे की ओर देखने की कोशिश की। साथ ही उसके कपड़े के अंदर से कुछ फल रास्ते पर गिर पड़े।

नीरेन बोला — कुछ गिर गया ख़ुकी! किस चीज़ के फल हैं ये?

दुर्गा नीचे झुककर फल उठाते-उठाते सकुचाते हुए बोली — कुछ नहीं, माटी का आलू है।

— माटी का आलू? खाने में अच्छा लगता है क्या? कैसे खाते हैं?

यह प्रश्न दुर्गा को बड़ा ही कौतूहलजनक लगा। जो बात एक पाँच साल का बच्चा जानता है, वह चश्मा पहने एक ज्ञानी व्यक्ति नहीं जानता। उसने कहा — यह फल तो खाते नहीं, यह तो कड़वा होता है।

— तो फिर तुम जो —

दुर्गा ने लजाते हुए स्वर में कहा — मैं तो बस ऐसे ही ले जा रही हूँ — खेलने के लिए...। उसे यह बात याद थी कि इसी चश्मा पहने लड़के के साथ उस दिन चाची ने मज़ाक में उसकी शादी की बात छेड़ी थी। उसे बड़ी उत्सुकता हो रही थी कि वह उस लड़के को ठीक से देखे। लेकिन मधुसंक्रांति के व्रत के दिन भी वह ऐसा नहीं कर पाई थी, आज भी न कर सकी।

— अपू को बोलना कि कल सुबह किताबें लेकर जाए — कहोगी न?

दुर्गा ने चलते-चलते सहमति में गरदन हिलाई।

और थोड़ा आगे जाकर बगल का एक रास्ता दिखाकर बोली — इस रास्ते से जाएँगे तो आपके लिए बहुत सीधा पड़ेगा।

नीरेन बोला — अच्छा, मैं अब पहचान जाऊँगा, तुम्हें थोड़ा छोड़ दूँ, तुम अकेली जा सकोगी?

दुर्गा ने उँगली से दिखाकर कहा — वह तो हमारा घर है, थोड़ा आगे जाकर ही, मैं तो — यह ज़रा-सा रास्ता अकेली चली जाऊँगी। आप और —

दुर्गा को इससे पहले नीरेन ने कभी ठीक से नहीं देखा था — आँखों का ऐसा सुंदर भाव उसने केवल इसके भाई अपू में ही देखा था। मानो गाँव के छोर पर आम और बकुल के पेड़ों वाली वीथियों की घनी, श्यामल-स्निग्धता उन बड़ी-बड़ी आँखों में अर्ध-सुप्त हो। अभी सुबह नहीं हुई है, रात के अंत का आलसी अँधेरा अब भी लिपटा हुआ है। फिर भी वह सुबह की याद दिलाता है, कितनी सोई आँखों का जागरण, कितनी कुमारियों का घाट पर जाना, घर-घर में कितने नवीन जागरणों का अमृत-उत्सव — खिड़कियों-खिड़कियों से धूप की सुगंध...

दुर्गा कुछ देर खड़ी रहकर बेचैन-सी होने लगी। नीरेन को लगा कि वह कुछ कहना चाहती है पर याद नहीं कर पा रही है। उसने कहा — नहीं ख़ुकी, तुम्हें थोड़ा और छोड़ दूँ? चलो, तुम्हारे घर के सामने से ही जाता हूँ।

दुर्गा हिचकिचाने लगी, फिर थोड़ा मुसकराई। नीरेन को लगा कि अब वह कुछ कहेगी। पर अगले ही पल दुर्गा ने गरदन हिलाकर उसके साथ जाने से मना कर दिया, और घर का रास्ता पकड़कर चली गई।

दोपहर का समय। छत पर कपड़े उठाने आई गोकुल की बहू ने नीरेन के कमरे के दरवाज़े से झाँककर देखा। गरमी में नीरेन बिस्तर पर लेटे कुछ देर इधर-उधर करवटें बदलने के बाद, नींद की आशा छोड़कर, फ़र्श पर चटाई बिछाकर घर पत्र लिख रहा था।

गोकुल की बहू ने हँसकर कहा — सोए नहीं देवरजी? मैंने सोचा देवरजी सो गए होंगे, आज केले के फूल का घण्ट ज़्यादा नहीं खाया — पत्तल में ही छोड़ आए, उस दिन तो सब खा लिया था?

—आइए भाभी। मोचा घंट खाएँ क्या? सब बंगाली कारस्तानी; जो मिर्च है उसमें, खाते हुए क्या आँखों से दिखता है—कौन-सा घंट है, कौन-सा क्या?

गोकुल की बहू ने कमरे के दरवाज़े की चौखट पर सिर झुकाकर टेका, और अभ्यस्त भाव से मुँह के निचले हिस्से को आँचल से दबाकर खड़ी हो गई।

ईश, देवरजी, बड़ी शहरी चाल दिखा रहे हो! उतनी-सी मिर्च और तुम लोगों के वहाँ कोई नहीं खाता, क्यों?

—माफ़ कीजिएगा भाभी, अगर यह ‘उतनी-सी’ है, तो आप लोगों का ज़्यादा एक बार बिना खाए मैं यहाँ से जा नहीं रहा! जो हो क़िस्मत में—जहाँ बावन वहाँ तिरेपन! दीजिए एक दिन, आँखों की शर्म छोड़कर जितनी मर्ज़ी हो उतनी मिर्च।

—ओ माँ, मेरा क्या होगा! आँखों की शर्म के डर से ही क्या सिल-बट्टे का काम छोड़कर चुपचाप बैठी हूँ, देवरजी? सुनो तो देवरजी की बात—कहते हैं, जहाँ बावन...हँसी के मारे उसकी आँखों में पानी आ गया। कुछ देर बाद सँभलकर बोली—अच्छा, तुम्हारे वहाँ गर्मी कैसी होती है, देवरजी?

—वहाँ, कहाँ? कलकत्ते में या पश्चिम में? पश्चिम में गर्मी कैसी होती है, वह यहाँ से क्या समझेंगी! वह बांग्लादेश में रहकर नहीं समझा जा सकता। बैसाख के महीने में रात को क्या कोई कमरे के अंदर सो सकता है? छत पर शाम को पानी छिड़ककर छत ठंडी करके, उसी पर रात को सोना होता है।

—अच्छा, तुम लोग जहाँ रहते हो, वह यहाँ से कितना दूर है?

—यहाँ से रेल में क़रीब दो दिन का रास्ता है। आज सुबह की गाड़ी में माझेरपाड़ा स्टेशन पर चढ़ें तो कल दोपहर-रात पहुँचेंगे।

—अच्छा देवरजी, सुना है गया-काशी की तरफ़ पहाड़ काटकर रेल ले गए हैं—सच?

—सच। बहुत बड़े-बड़े पहाड़, ऊपर जंगल—उनके भीतर से जब रेलगाड़ी जाती है—एकदम अँधेरा, कुछ दिखाई नहीं देता, गाड़ी के अंदर बत्ती जलानी पड़ती है।

गोकुल की बहू ने उत्सुक होकर कहा—अच्छा, टूटकर गिर नहीं पड़ता?

टूटकर क्यों गिरेगा भाभी? बड़े-बड़े इंजीनियरों ने सुरंग बनाई है, कितना पैसा ख़र्च किया है, गिरते ही बना! यह क्या आप लोगों के रायपाड़ा के घाट की सीढ़ियाँ हैं जो दो वक़्त टूट रही हैं?

इंजीनियर कौन चीज़ है, गोकुल की बहू यह समझ न सकी। बोली—पहाड़ मिट्टी का है या पत्थर का?

—मिट्टी का भी है, पत्थर का भी है। नः भाभी, आप तो एकदम देहाती हैं। अच्छा आप रेलगाड़ी में कितनी दूर गई हैं?

गोकुल की बहू फिर से शरारत-भरी हँसी हँस उठी। आँखें लगभग बंद करके, मुँह थोड़ा-सा ऊपर उठाकर बचकाने अंदाज़ में बोली—ओह, बड़ी दूर गई हूँ, एकदम काशी-गया-मक्का गई हूँ। वही पिछले साल, बुआ सास और सतू की माँ के साथ आड़ंघाटा के युगल-किशोर देखने गई थी। वही मेरे जन्म-भर का कर्म—रेलगाड़ी में चढ़ना!

यह लड़की थोड़े ही समय में मामूली-सा सूत्र पकड़कर अपने चारों ओर हँसी-मज़ाक़ का ऐसा जाल बुन सकती थी—जो नीरेन को अच्छा लगता था। जिस तरह के लोगों के मन में आनंद का ऐसा अक्षय भंडार होता है, जो कारण-अकारण अंतर्निहित आनंद के स्रोत से मन का पात्र उफनकर दूसरों को भी संक्रमित कर देता है, यह गाँव की बहू उसी दल की एक सदस्य थी। आजकल नीरेन मन-ही-मन इसी के आगमन की प्रतीक्षा करता—न आने पर निराश होता; यहाँ तक कि जैसे थोड़ा-सा छिपा हुआ अभिमान भी हो जाता था।

—अच्छा भाभी, आप सब लोग चलिए, एक बार पश्चिम की सैर करा लाऊँ।

—इस घर के लोग सैर करने जाएँगे पश्चिम में! तुम भी जैसे हो देवरजी! तो फिर उत्तर के खेत में बैंगन के खेत की चौकीदारी कौन करेगा?

बात के अंत में वह एक और बार व्यंग्य-मिश्रित शरारत-भरी हँसी हँस उठी। थोड़ी देर बाद गंभीर होकर धीमी आवाज़ में बोली—देखो देवरजी, एक बात रखोगे?

—क्या बात है, पहले कहिए?

—अगर रखोगे तो कहूँ!

—ओह, कोरे काग़ज़ पर दस्तख़त करना मुझसे नहीं होगा, भाभी! जानती हैं, क़ानून पढ़ता हूँ। पहले बात सुनूँगा, फिर बात का जवाब दूँगा।

गोकुल की बहू चौखट छोड़कर कमरे के अंदर आई। कपड़े के भीतर से एक काग़ज़ का पुड़िया निकालकर बोली—ये झुमके रखकर मुझे पाँच रुपये दोगे?

नीरेन ने आश्चर्य के स्वर में कहा—क्यों, बताइए तो?

—वह अभी नहीं बताऊँगी। दोगे, देवरजी?

—पहले बताइए, रुपयों का क्या होगा? नहीं तो लेकिन—

गोकुल की बहू ने धीमी आवाज़ में कहा—मैं एक जगह भेजूँगी। देखो तो इस चिट्ठी के ऊपर का पता अंग्रेज़ी में क्या लिखा है!

नीरेन ने पढ़कर कहा—आपका भाई, न भाभी?

—चुप, चुप, इस घर में किसी से कहना मत। पाँच रुपये माँगकर भेजे हैं, कहाँ से लाऊँगी देवरजी, कितनी पराधीन हूँ, जानते तो हो? इसीलिए सोचा, ये झुमके—पाँच रुपये दे दो जाकर देवरजी—उस अभागे लड़के का भला इस धरती पर है ही कौन?...गोकुल की बहू की आवाज़ आँखों में आए आँसुओं से भारी हो गई।

नीरेन बोला—रुपये मैं दूँगा भाभी, पाँच हों या दस, आप जब चाहें चुका दीजिएगा; लेकिन झुमके मैं नहीं ले सकता—

गोकुल की बहू ने शरारत के अंदाज़ में गर्दन हिलाकर हँसते हुए कहा—वह नहीं होगा देवरजी, वाह! बड़े अच्छे हो तुम! फिर मैं तुम्हारा क़र्ज़ लिए मर जाऊँ और तुम—वह नहीं होगा, यह तो तुम्हें लेना ही होगा। अच्छा देवरजी, नीचे बहुत काम पड़ा है।

—वह तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गई, लेकिन सीढ़ियों तक जाकर ही लौट आई और फिर से धीमी आवाज़ में बोली—लेकिन रुपयों की बात किसी से कहना मत देवरजी! किसी से नहीं—समझे?

दुर्गा कथरी के नीचे से अत्यंत ख़ुशी के साथ पुकारी—अप्पू, ओ अप्पू!

अप्पू जगा हुआ ही था, लेकिन अब तक कोई बात नहीं की थी। बोला—दीदी, खिड़की बंद कर देगी? बड़ी ठंडी हवा आ रही है।

दुर्गा उठकर खिड़की बंद करके बोली—रानू की दीदी की शादी कब है, जानता है? अब लेकिन ज़्यादा देर नहीं। बहुत धूमधाम होगी, अंग्रेज़ी बाजा आएगा। देखा है तूने अंग्रेज़ी बाजा?

हाँ, सब सिर पर टोपी पहनकर बजाते हैं, ये बड़ी-बड़ी बाँसुरी—बहुत बड़ा ढोल, मैंने देखा है—और एक तरह की बाँसुरी बजाते हैं, काली-काली, उतनी बड़ी नहीं, फुलूट बाँसुरी कहते हैं—इतनी बढ़िया बजती है। फुलूट बाँसुरी सुनी है?

दुर्गा एक और बात सोच रही थी।

कल वह दोपहर बाद उस मुहल्ले की चाची के यहाँ घूमने गई थी। इधर-उधर की बातों के बाद चाची ने पूछा, दुग्गा, तेरी देवरजी से कहाँ मुलाक़ात हुई थी रे?

उसने कहा—क्यों चाची?...फिर उसने उस दिन की बात बताई। मज़ाक़ के लहज़े में बोली, रास्ता भटक गए थे चाची—एकदम गढ़ के तालाब में—उस जंगल के अंदर—

चाची हँसकर बोली—मैं कल देवरजी से तेरी बात कर रही थी—कह रही थी—ग़रीब की बेटी है देवरजी, कुछ देने-दिलाने की तो बाप की हैसियत नहीं, पर लड़की बहुत अच्छी है—जैसे इस ज़माने की हो ही न—तो उसे अपना क्यों नहीं लेते? इसीलिए देवरजी तेरे बारे में पूछ-ताछ कर रहे थे—कह रहे थे, घाट के रास्ते में उस दिन कहाँ मुलाक़ात हुई—रास्ता भूलकर देवरजी कहीं जा पहुँचे थे—ये सब। फिर मैं आज तीन दिन से कह रही हूँ कि ससुर जी से कहकर तेरे बाबूजी से कहलवाऊँगी। देवरजी की जैसे रज़ामंदी लगी, तू जैसे उन्हें पसंद आ गई है—

दुर्गा ने गौशाला से बछड़ा निकालकर धूप में बाँधा तो सही, लेकिन दूसरे दिन घर का काम फिर भी थोड़ा-बहुत करती थी, आज उसकी वह इच्छा बिल्कुल नहीं हो रही थी। एक-एक दिन, उसके मन का ऐसा भाव होता है; उस दिन वह किसी भी तरह दायरे में बँधकर नहीं रह पाती—कोई उसे रास्तों-रास्तों, मुहल्लों-मुहल्लों घुमाता फिरता है। आज जैसे हवा कितनी सुंदर है, सुबह न गरम-न ठंडी, कैसी मीठी गंध आ रही है नींबू के फूलों की—जैसे कुछ मन में आता है, वह क्या है, वह कह नहीं सकती।

घर से बाहर निकलकर वह रानू के घर गई। भुवन मुकर्जी संपन्न गृहस्थ हैं, यह उनकी पहली बेटी की शादी है, बड़ी धूमधाम से ही शादी होगी। बाज़ीगर आकर आतिशबाज़ी का मोल-भाव कर रहा है। सीतानाथ उस इलाक़े का मशहूर शहनाई बजाने वाला है, उसे भी बयाना दे दिया गया है, शादी के मौक़े पर जगह-जगह से मेहमानों की टोलियाँ आने लगी हैं। उनके बच्चों से घर का आँगन गुलज़ार है।

दुर्गा के मन में बड़ी ख़ुशी हुई—और कुछ दिन बाद इन्हीं के घर में कितनी आतिशबाज़ी जलेगी। उसने कभी कोई आतिशबाज़ी नहीं देखी, सिर्फ़ एक बार गांगुली के घर फूलदोल में कोई एक बाज़ी देखी थी, हस्सू करके आसमान में उठकर एकदम जैसे बादलों से जा लगती, वहाँ से फिर गिर जाती, कितनी बढ़िया लगती है!...अप्पू कहता है हवाई बाज़ी।

दोपहर के बाद माँ दालान में आँचल बिछाकर ज़रा-सा सो गईं, तो वह सुड़ुत्त से फिर घर से बाहर हो गई। फागुन का मध्य, धूप की तेज़ी चढ़ चुकी है, एक-सी गरम हवा में रानू के बाग़ के बड़े नीम के पेड़ के पीले पत्ते घूमते-घूमते झड़ रहे हैं—कोई कहीं नहीं है, नेड़ा के घर की तरफ़ कोई जैसे एक टिन बजा रहा है। बु-उ-उ-उ करके कोई एक आवाज़ हुई। काँचपोका! दुर्गा ने अपने बहुत अनजाने में ही जल्दी से आँचल मुट्ठी में लपेटा और चौंकी हुई नज़रों से देखने लगी।

काँचपोका नहीं, सुदर्शन कीड़ा।

उसकी मुट्ठी का आँचल अपने-आप खुल गया—उत्सुकता से दबे पाँव वह कीड़े की तरफ़ आने लगी। सामने रास्ते पर बैठा है, पंखों पर सफ़ेद और लाल चंदन की बूँदों जैसे बिंदु-बिंदु दाग़।

सुदर्शन कीड़ा—ठीक कीड़ा नहीं—ठाकुर। दिख जाना बड़े भाग्य की बात है—अपनी माँ के मुँह से, और भी कई लोगों के मुँह से उसने सुना है। उसने सँभलकर धूल पर बैठकर, फिर हाथ एक बार माथे से लगाकर और एक बार कीड़े के पास ले जाकर बार-बार तेज़ी से दोहराने लगी—सुदर्शन, भला-चंगा रखना...सुदर्शन, भला-चंगा रखना...सुदर्शन, भला-चंगा रखना (ठीक यही रूप उसने दूसरों के मुँह से कहते सुना है)। फिर उसने अपनी कुछ बातें मंत्र में जोड़ दीं—अप्पू को अच्छा रखना, माँ को अच्छा रखना, बाबा को अच्छा रखना, उस मुहल्ले की चाची को अच्छा रखना—फिर थोड़ा सोचकर हिचकिचाते हुए बोली—नीरेन बाबू को अच्छा रखना, मेरी शादी वहीं हो जाए सुदर्शन, रानू की दीदी की तरह बाजे-गाजे हों।

भक्त के अर्घ्य की अधिकता से कीड़ा धूल पर बेबस-सा गोल-गोल घूम रहा था, दुर्गा ने मन की साध पूरी करके प्रार्थना समाप्त की और श्रद्धा के साथ बगल से गुज़र गई।

मुहल्ले के अंदर के रास्तों पर सिर के ऊपर पहले फागुन का नीला, यहाँ तक कि बहुत कुछ मोरपंखी रंग का आकाश, पेड़-पौधों की फाँक-फाँक से आँखों में पड़ता है।

शेओड़ा के जंगल के बीच से नदी के घाट का सँकरा रास्ता। पगडंडी के दोनों ओर आम के बाग़ान। गरम हवा आम के बौर की मीठी गंध से, वनों में मधुमक्खियों और काँचपोका की गुंजन से, छाया-गहन आम के बाग़ में कोयल की पुकार से, स्निग्ध हो रही है।

बाग़ानों को पार करके चड़क-तले का मैदान। घास से भरे मैदान में छाया पड़ गई है। दुर्गा झाड़ियों के बीच-बीच में सेंयाकुल ढूँढ़ने लगी—सेंयाकुल अब ज़्यादा नहीं मिलते, जाड़े के अंत में झड़ जाते हैं। उस ऊँचे टीले पर झाड़ी के बीच के एक पेड़ पर कितने ही सेंयाकुल उस दिन भी तो उसने खाए थे, लेकिन अब नहीं हैं, सब झड़ गए हैं, गोलमिर्च जैसे सूखे सेंयाकुल घनी झाड़ी के नीचे बिछे पड़े हैं। शालिख पक्षियों का एक झुंड झाड़ी के अंदर किच-किच कर रहा था, दुर्गा के पास जाते ही उड़ गया।

उसके मन में ख़ुशी की फिर एक ज़बरदस्त लहर आई। उत्सव की निकटता, रानू की दीदी के बासर में रात जागने और गीत सुनने की आशा—

ख़ुशी में उसकी इच्छा हुई कि वह मैदान के इस छोर से उस छोर तक दौड़ती फिरे।

एक बार उसने दोनों हाथ फैलाकर पंखों की तरह लंबे कर दिए और कुछ देर गोल-गोल घूमकर कुछ दूर दौड़ गई। उड़ना चाहती है!...शरीर तो हल्की चीज़ है—हाथ फैलाकर पंखों की तरह हवा काटते-काटते अगर जाया जाता!

सिर्फ़ आवाज़ करने की ख़ुशी में वह सूखे झरे पत्तों के ढेर पर जान-बूझकर ज़ोर-ज़ोर से पाँव रखकर मच-मच आवाज़ करती हुई चली। पत्ते टूटकर सूखी-सूखी धूल मिली, कुछ सोंधी-सोंधी कुछ कड़वी गंध से जगह भर गई।

सामने थोड़ी दूर पर सोनाडांगा के मैदान की तरफ़ जाने वाली कच्ची सड़क। एक बैलगाड़ी कैंच-कैंच की आवाज़ करती हुई मैदान के रास्ते की ओर जा रही है। ताज़ी कटी कंचियों का घेरा बाँधकर उसके ऊपर कथरी और फटी लाल नकशा-किनारे वाली साड़ी लपेटकर छतरी बनाई है। छतरी के अंदर किसी की एक छोटी लड़की एकरस, एक-सा बचकाना अंदाज़ में रोते-रोते जा रही है—किसी गाँव के किसान की बेटी शायद बाप के घर से ससुराल जा रही है।

दुर्गा अवाक होकर एकटक गाड़ी की तरफ़ देखती रही।

शादी के बाद माँ, बाबा, अप्पू—सबको छोड़कर इसी तरह कहीं कितनी दूर चले जाना होगा शायद—जब-तब वहाँ से वे आने देंगे क्या? उसने इतनी देर यह बात सोची नहीं थी—यह बाग़ान, बासक के फूलों की झाड़ी, रांगी गाय, आँगन का कटहल का पेड़, जिन्हें वह इतना प्यार करती है, इन सूखे पत्तों की गंध, घाट का रास्ता, ये सब छोड़कर जाना होगा हमेशा के लिए! छतरी के अंदर की छोटी लड़की शायद इसी दुख में रो रही है।

कच्ची सड़क को छोड़कर एक और छोटा-सा वीरान मैदान पार करते ही नदी।

उस पार के मछुआरे क्या मछली पकड़ रहे हैं? खयरा? इस पार आते तो दो पैसे की मछली खरीदकर घर ले जाती। अप्पू को खयरा मछली खाना बहुत पसंद है।

घर लौटकर शाम के बाद वह बहुत देर तक गुड़ियों का बक्सा सँवारती रही। कमरे के फ़र्श पर उसकी माँ ने तेल भरते हुए काफ़ी मिट्टी का तेल गिरा दिया है, उसकी गंध निकल रही है, हवा जैसे थोड़ी गरम है। गुड़ियों को सँवारना लगभग ख़त्म हो चुका था, अप्पू आकर बोला—तूने मेरे बक्से से छोटा-सा आइना निकाल लिया है क्या दीदी?

हूँ—आइना तो मेरा है—मैंने ही तो पहले देखा था, तख़त के नीचे पड़ा था। जा, मैं आइना अपने बक्से में रखूँगी। बेटा-जात होकर आइना लेकर क्या होगा?

वाह रे, तेरा आइना कैसे? उस मुहल्ले की चाची के घर से माँ तो किसी पूजा के लिए आइना लाई थी, मैंने तो पहले ही माँ से माँग लिया था। नहीं दीदी, दे दे।

बात ख़त्म करते ही वह दीदी के गुड़ियों के बक्से के पास बैठ गया और उसके अंदर आइना ढूँढ़ने लगा।

दुर्गा ने भाई के गाल पर एक चाँटा जड़कर कहा—दुष्ट कहीं का! मैंने गुड़िया जमाकर रखी और ये जनाब उसे तितर-बितर कर रहे हैं। जा, मेरे बक्से को हाथ मत लगाना। नहीं दूँगी मैं अपना आईना।

लेकिन बात पूरी होने से पहले ही अपू उसकी गर्दन पर झपट पड़ा और उसके रूखे बालों का गुच्छा पकड़कर खींचने, नोचने और दाँत गड़ाने लगा—उसे बेहाल कर दिया। रुँधे गले से बोला—तुम मुझे क्यों मारोगी? मुझे चोट नहीं लगती क्या? दो मुझे! माँ से कह दूँगा—तुमने लक्ष्मी की टोकरी से आलता चुराया है।

आलता चुराने की बात पर दुर्गा भड़क उठी। भाई का कान पकड़कर उसे झिंझोड़ते हुए एक के बाद एक कई चाँटे जड़ दिए—आलता लिया है? मैंने आलता लिया है, लक्ष्मी के मारे दुष्ट बंदर! और तुम जो लक्ष्मी की टोकरी से कौड़ियाँ निकालकर छिपा रखी हैं, माँ से नहीं बताऊँगा क्या?

चीख-पुकार और मार-पीट की आवाज़ सुनकर सर्वजया दौड़ी आई।

तब तक दुर्गा ने अपू का कान पकड़कर उसे लगभग ज़मीन पर लिटा दिया था। अपू भी पूरी ताकत से दुर्गा के बालों का गुच्छा मुट्ठी में भींचकर ऐसे खींच रहा था कि दुर्गा का सिर उठाना मुश्किल हो रहा था।

अपू को चोट ज़्यादा लगी थी। वह रोते-रोते बोला—देखो न माँ, मेरा आईना बक्से से निकालकर अपने बक्से में रख लिया है। दे ही नहीं रही। गाल पर ऐसा चाँटा मारा है!

दुर्गा ने विरोध करते हुए कहा—नहीं माँ, देखो न, मैं अपनी गुड़ियों का बक्सा सजा रही थी, और ये आकर सब…

सर्वजया ने आकर बेटी की पीठ पर धम्-धम् करके ज़ोर से कई घूँसे जमा दिए और बोली—बड़ी हो गई है, जब-तब इसके शरीर पर हाथ क्यों लगाती है? इसमें और तुझमें बहुत फर्क है, जानती है? आईना-वाईना तेरे किस काम आएगा, सुनूँ तो ज़रा? बात-बात में चली जाती हैं इसे मारने। मौत आए और क्या! गुड़ियों का बक्सा… रुको!

बात पूरी किए बिना ही उसने बेटी का सजाया हुआ गुड़ियों का बक्सा उठाया और एक झटके में बाहर आँगन में फेंक दिया।

—बड़ी हो गई है, कोई काम-धाम नहीं, बस खाना और गली-गली घूमना! और बस गुड़ियों का बक्सा और गुड़ियों का बक्सा! अभी सब खींचकर बाँस-बगीचे में फेंक आती हूँ। तुम्हारा खेल-तमाशा हमेशा के लिए बंद किए देती हूँ!

दुर्गा के मुँह से एक शब्द न निकला। गुड़ियों का बक्सा उसकी जान था। दिन में दस बार वह उसे सँवारती थी—गुड़िया, राँगता, रंगे हुए कपड़े, शरीफ़ा, कितनी मेहनत से जमा किए हुए गट्टा-फल, टिन से मढ़ा आईना, चिड़िया का घोंसला—सब अँधेरे आँगन में कहाँ-कहाँ बिखर गए। माँ उसके गुड़ियों के बक्से को इस बेरहमी से फेंक सकती है, यह बात उसने कभी सोची भी नहीं थी! कितनी मुश्किल से, कितनी जगहों से जुटाई हुई कितनी चीज़ें थीं उसके अंदर।

कुछ कहने की हिम्मत न करके वह हैरान-सी खड़ी रही।

अपू को भी शायद यह सज़ा कुछ ज़्यादा ही कठोर लगी। वह और कुछ न कहकर चुपचाप जाकर लेट गया।

रात काफ़ी हो चुकी थी। फ़र्श से केरोसिन तेल की गंध आ रही थी, कमरे के अंदर बाँस-बगीचे के मच्छर भिनभिना रहे थे। कुछ देर बैठी रहने के बाद दुर्गा जाकर चुपचाप लेट गई।

टूटी खिड़की से फागुन की चाँदनी बिस्तर पर पड़ रही थी, उजाड़ भिटे की तरफ़ से नींबू के फूलों की भीनी-भीनी महक आ रही थी।

एक बार उसके मन में आया कि उठकर गुड़ियों का बक्सा और बिखरी हुई चीज़ें उठा लाए। कल सुबह क्या मिलेंगी? कितनी मेहनत की चीज़ें थीं! लेकिन हिम्मत नहीं हुई। लाने गई तो माँ कहीं फिर से न मार दे?

काफ़ी देर बीत गई। अचानक उसे अपने शरीर पर किसी का हाथ महसूस हुआ। अपू ने डरते-डरते पुकारा—दीदी? दुर्गा के कुछ जवाब देने से पहले ही अपू तकिये में मुँह छिपाकर फफक-फफककर रो पड़ा—मैं और नहीं करूँगा… मुझसे नाराज़ मत होना दीदी… तेरे पाँव पड़ता हूँ। रोने के आवेग में उसका गला रुँधने लगा।

दुर्गा पहले तो हैरान हुई, फिर उठकर बैठ गई और भाई का रोना रोकने की कोशिश करने लगी। रो मत, चुप-चुप, माँ सुन लेगी तो फिर मुझे डाँटेगी, चुप, रोते नहीं हैं। अच्छा मैं नाराज़ नहीं होऊँगी, मत रो, छिः… चुप!

उसे डर लग रहा था कि अपू का रोना सुनकर माँ कहीं उसे ही न मार बैठे।

बहुत कोशिश करके उसने भाई का रोना बंद कराया। फिर लेटे-लेटे उसे तरह-तरह की कहानियाँ, ख़ासकर रानू की दीदी की शादी की कहानी सुनाने लगी। इधर-उधर की बातों के बाद अपू ने दीदी के शरीर पर हाथ रखकर धीरे से कहा—एक बात कहूँ दीदी? तेरी शादी मास्टर साहब से होगी।

दुर्गा को शर्म आ गई, साथ ही उसे बहुत उत्सुकता भी हुई; लेकिन छोटे भाई के सामने इस बारे में कोई बात करने में उसे संकोच हो रहा था, इसलिए वह चुप रही।

अपू फिर बोला—चाची कह रही थी रानू की माँ से आज शाम को। मास्टर साहब की भी मनाही नहीं है।

उत्सुकता के आवेग में चुप रहना असंभव हो गया। उसने बेपरवाही के लहजे में कहा—हाँ, कह रही थी… जा! तेरी भी सब कैसी-कैसी बातें होती हैं।

अपू लगभग बिस्तर पर उठ बैठा, सच कह रहा हूँ दीदी, तेरी क़सम खाकर कहता हूँ। मैं वहीं खड़ा था, मुझे देखकर ही तो बात उठी। पिताजी से चिट्ठी लिखवाएँगे, जहाँ मास्टर साहब के पिताजी रहते हैं।

—माँ जानती है?

—मैंने सोचा था आकर माँ से पूछूँगा, भूल गया। पूछूँ दीदी? माँ ने शायद नहीं सुना; कल चाची माँ को बुलाकर बताएगी, कह रही थी।

फिर उसने कहा—देखना, तू कितनी रेलगाड़ी पर चढ़ेगी। मास्टर साहब लोग यहाँ से बहुत दूर रहते हैं, रेल से जाना पड़ता है।

दुर्गा चुप रही।

उसने रेलगाड़ी की तस्वीर देखी है—अपू की एक किताब में है। बहुत लंबी, बहुत सारे पहिये, आगे की तरफ़ एक इंजन, जहाँ आग जलती है, धुआँ उड़ता है। रेलगाड़ी सिर से पाँव तक लोहे की होती है, पहिये भी लोहे के—बैलगाड़ी जैसे लकड़ी के पहिये नहीं। रेल की पटरी के किनारे कोई फूस का घर नहीं होता, हो ही नहीं सकता, जल जाएगा। रेलगाड़ी जब चलती है तो उसकी चिमनी से आग निकलती है न! उसने भाई के शरीर पर हाथ फेरते हुए कहा—तुझे भी साथ ले जाऊँगी। उसके बाद दोनों चुपचाप सोने की तैयारी करने लगे। सोते-सोते एक बात बार-बार दुर्गा के मन में आ रही थी—ठाकुर सुदर्शन ने उसकी सुन ली है। आज ही तो उसने सुदर्शन से… ठाकुर की बड़ी दया है—माँ तो ठीक ही कहती है।

अपू बोला—लीला दीदी के लिए कितनी सुंदर साड़ी ख़रीदी गई है, आज लीला दीदी के चाचा शादी के लिए राणाघाट से ख़रीदकर लाए हैं, सेजजेठिमा कह रही थीं—बालुचर की साड़ी।

दुर्गा ने मुस्कुराते हुए कहा—एक कविता जानता है?… बुआ कहती थीं,

बालुचर के बालू के टीले पर एक बात कहूँ—

भैंस के पेट में मोर का बच्चा देख आई सखी।

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