इन्दिर ठाकरुण को लौटे छह-सात महीने हो चुके थे, पर सर्वजया ने इतने दिनों में बुढ़िया से एक बार भी ढंग से बात नहीं की। आजकल उसे और भी लगता कि वह डायन, सात कुल खाने वाली बुढ़िया को उसकी बेटी उससे भी ज़्यादा प्यार करती है। उसे ईर्ष्या तो होती ही, गुस्सा भी आता। पेट की बेटी को पराया किए दे रही है। दिन में दो बार बातों-बातों में बुढ़िया को समय रहते अपना रास्ता देखने की सलाह इशारों में दे देती। वह रास्ता किस दिशा में है—होश सँभालने से लेकर आज तक सत्तर वर्षों में बुढ़िया को उसका कोई सुराग नहीं मिला था, इतने समय बाद वह कहाँ मिलेगा, यह सोचकर भी वह समझ न पाती।
वर्षा के अंतिम दिनों में बुढ़िया ने आखिरकार एक युक्ति सोची। छह कोस दूर भंडारहाटी में उसके दामाद का घर है। उसके दामाद चंद्र मजुमदार जीवित हैं। दामाद की स्थिति अच्छी है, संपन्न गृहस्थ हैं, हालाँकि बेटी की मृत्यु के साथ ही दामाद से संबंध टूट गया था—आज पैंतीस-छत्तीस साल पुरानी बात है—उसके बाद फिर कभी मिलना-जुलना या ख़बरों का लेन-देन नहीं हुआ। फिर भी अगर वहाँ जाया जाए, तो क्या दामाद थोड़ी-सी शरण देने में आनाकानी करेगा?
शाम होने से पहले भंडारहाटी गाँव में घुसकर एक बड़े चंडीमंडप के सामने गाड़ीवान ने गाड़ी रोक दी। गाड़ीवान की हाँक सुनकर चौबीस-पच्चीस साल का एक युवक आया और बोला—कहाँ की गाड़ी? उसके पीछे-पीछे एक वृद्ध घर के अंदर से पूछते हुए बाहर निकले—कौन राधु? पूछो तो कहाँ से आ रहे हैं?
बुढ़िया पहचान तो गई, पर हैरान रह गई—यही उसका दामाद चंदर है! चालीस साल पहले के उस मज़बूत, दोहरे बदन वाले, सुदर्शन लड़के से इस पके बालों वाले प्रवीण व्यक्ति की मन-ही-मन तुलना करके वह हाँफ-सी उठी। अगले ही पल, हँसी और दुःख के मिले-जुले से एक अजीब भाव में वह विह्वल-सी होकर फूट-फूटकर रो पड़ी। बहुत दिनों बाद बेटी का नाम लेकर रोई। आश्चर्य से हतप्रभ चंद्र मजुमदार पहले तो आकाश-पाताल टटोल रहे थे, फिर मामला समझे और आकर अपनी सास के पैरों की धूल लेकर प्रणाम किया। थोड़ा सँभलकर बुढ़िया ने सिर पर आँचल डालकर टूटी आवाज़ में कहा, तुम्हारे पास आई हूँ बेटा, इतने दिनों बाद—थोड़ी-सी छाँह के लिए—और कितने दिन ही जीऊँगी! इस त्रिभुवन में और कोई नहीं है—इस उम्र में दो मुट्ठी भात और कपड़े के लिए...
मजुमदार महाशय ने बड़े बेटे को गाड़ी से सामान उतारने को कहा और बेटे के साथ सास को घर के अंदर भेज दिया। दूसरी पत्नी की विधवा बेटी और बड़ी बहू ही घर की गृहणियाँ थीं। तीन और बहुएँ थीं। नाती-नातिन भी तीन-चार थे।
ताड़ के तनों के खंभों और आड़ी बल्लियों पर टिके दो विशाल, ऊँचे, आठचाला कमरे सामान, संदूक-पेटियों से भरे हुए थे, पाँव रखने की भी जगह नहीं थी। मजुमदार महाशय की विधवा बेटी का नाम हैमवती था। बहुत अच्छी लड़की थी वह। उसने अपने हाथों से फल काटकर नाश्ता सजाया और बड़े आदर से पास बैठाकर खिलाया; यह-वह पूछने लगी, बोली—नानी, आपने मुझे कभी नहीं देखा, है न? इससे पहले तो कभी इधर पाँव की धूल नहीं दी! गन्ना काट दूँ, नानी? दाँत हैं? पास की रसोई में बच्चे शाम को भात खाने बैठे हो-हल्ला मचा रहे थे। एक चिल्लाकर कह रहा था, ओ माँ देखो, उमि सारी दाल मेरी थाली में डाल रही है!
बहू चिल्ला रही थी, उसके पास खाने क्यों बैठता है? रोज़ कहती हूँ अलग बैठना—ऐ उमि, बहुत बढ़ गई है, है न? लेकिन दस-बारह दिन बीत गए, बुढ़िया को सब कुछ नया-नया सा लगता रहा, वैसी राहत नहीं मिल रही थी—नए ढंग के घर-दरवाज़े, नए रास्ते, नए ढंग की गृहस्थी। मन में ऐसा लगता मानो यह उसका अपना नहीं, सब पराया है। हर शाम को सूना बरामदा और खुकी-खोका के चेहरे याद आते। बीस दिन बाद बुढ़िया जाने के लिए छटपटाने लगी। यहाँ अब मन नहीं लगता। कर्ता की पहली पत्नी की सास का यह अचानक आगमन और उनका मतलब सुनकर बड़ी बहू पहले से ही खुश नहीं थी, उनके जाने से खुश ही हुई, नाखुश नहीं। चंद्र मजुमदार की क्या इच्छा थी, भगवान जानें, लेकिन बड़े बेटे और बड़ी बहू के डर से कुछ कह नहीं पाए।
बहुत दिनों बाद फिर अपने घर के बरामदे में दुर्गा को पास लेकर, खोका को पास लेकर बैठकर, चाँदनी में नहाती नारियल की डालियों का धीमा कंपन देखते-देखते सुख से बुढ़िया को नींद की झपकी आने लगी।
खुकी ने पहले बड़ा मान किया था, बात नहीं करेगी, पास नहीं आएगी। तरह-तरह की बातों से सांत्वना देने के बाद आजकल सुलह हो गई है। बुढ़िया भतीजी के सिर पर प्यार से हाथ फेरकर कहती है, लाल रंग के एक जोड़े ढेंड़ी झुमके हों तो ख़ूब फबें, है न? आजकल क्या चला है—उनको कहते क्या हैं भला...
सर्दी आई। बुढ़िया ओ-पाड़ा के गांगुली घर जाकर बूढ़े रामनाथ गांगुली महाशय से बोली—ओ राम, जाड़ा बहुत पड़ने लगा है—बदन पर एक कपड़ा ऐसा नहीं कि सुबह-शाम थोड़ा ओढ़कर बैठ सकूँ, तो मुझे अगर एक...
राम गांगुली बोले—अच्छा दीदी, किसी दिन आओ, इस महीने तो नहीं हो पाएगा—अगले महीने देखूँगा।
बहुत दिनों तक घूमने-फिरने, चक्कर काटने के बाद एक दिन कुश्तिया के लाल छींट वाली सूती चादर निकालकर हाथ में देते हुए बोले—यह लो दीदी, भारी गरम चीज़ है—साढ़े नौ आने दाम—इससे अच्छी चीज़ और नवाबगंज में नहीं मिलती, बुधवार को लाकर रखी है—खोलकर देखो न?
बुढ़िया को तब भी जैसे विश्वास नहीं हो रहा था। ख़ुशी से मुँह भरकर हँसते हुए उसने उसे खोलकर ओढ़ लिया और बोली—वाह! कैसी मोटी-ताज़ी बढ़िया चादर है—आह, दादा, जीते रहो—कानाई-बलाई जीते रहें, अक्षय परमाइ हो। कंगाल-ग़रीब को कोई नहीं देता, उस अन्नदा से एक ओढ़नी माँग रही हूँ आज तीन साल से, दूँगी-दूँगी कहकर, पर दी नहीं—शौक पूरा कर लूँ, और कितने दिन ही जीना है?
सर्वजया को ख़ुशी से दिखाने पर वह बोली, देखो ठाकुरझी, इस घर से तुम सात दरवाज़े भीख माँगती फिरोगी, यह नहीं होगा, साफ़-साफ़ कह दे रही हूँ। भीख माँगनी है तो अलग बंदोबस्त करो—
बुढ़िया वह बात हज़म कर गई। ऐसी कई बातें उसे दिन में दस बार हज़म करनी पड़ती थीं। पुराने ज़माने की वह कहावत वह अब भी नहीं भूली थी—
लात-झिड़की पाँव तले,
भात-पत्थर छाती का बल—
दुर्गा बड़ी ख़ुश होकर कहती, कितने पैसे दाम, पितीमा? कैसी लाल-लाल है, है न? आश्वासन के स्वर में पिशी कहती, मैं मर जाऊँगी तो तुझे दे जाऊँगी, तू ओढ़ना बड़ी होकर। नई चादर की सोंधी-सोंधी माड़ की गंध बुढ़िया को बड़ी प्रिय लगती, बड़ी शौक़ीन मालूम होती। सुबह चादर ओढ़कर झाड़ू देते समय बीच-बीच में अपनी ओर देख लेती। बिना काम के घाट के रास्ते पर खड़ी रहती, रास्ते से गुज़रती भोली-भाली बहुओं-बेटियों को बुलाकर कहती, कौन जा रहा है? राजी की माँ?—
इतनी देर से?—भूमिका और ज़्यादा न खींचकर, थोड़ा हँसकर अपनी ओढ़नी की ओर देखकर कहती, यह ओढ़नी इस बार ओ-पाड़ा के रामनाथ ने—साढ़े नौ आने दाम—
एक-दो शरारती लड़कियाँ कहतीं—उफ़्, ठाकुमाँ पर लाल कपड़े क्या जँच रहे हैं! ठाकुमाँ का ब्याह है क्या
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