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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · अट्ठाईसवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

अट्ठाईसवाँ परिच्छेद

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असल में अपु सोया नहीं था, वह जाग रहा था। आँखें मूँदे पड़े-पड़े वह रात में माँ और बाबूजी की सारी बातें सुन रहा था। वे लोग यहाँ का डेरा-डंडा उठाकर काशी जा रहे थे। बाबूजी माँ को बता रहे थे कि इस गाँव के मुकाबले काशी में रहने की कितनी सुविधाएँ हैं। अपनी छोटी उम्र में बाबूजी वहाँ बहुत दिन रहे थे, वहाँ के सभी लोगों से उनका परिचय और दोस्ती थी, सब उन्हें पहचानते और मानते थे। चीज़ें भी सस्ती थीं। उसकी माँ ने बड़ी उत्सुकता दिखाई—उस सोने के देश में किसी को कभी कोई अभाव नहीं होता—यहाँ तो दुख बारहों महीने लगा ही रहता है, हिम्मत करके वहाँ पहुँच जाएँ तो सारे दुख दूर हो जाएँगे। माँ को तो आज जाने को मिल जाए तो आज ही चली जाए, एक दिन भी और रहने की इच्छा नहीं थी। अंत में तय हुआ कि वैशाख के महीने में वे लोग जाएँगे।

गंगानंदपुर के सिद्धेश्वरी मंदिर में सर्वजया की एक पूजा की मनौती थी। तीन कोस दूर पूजा देने कौन जाए—इसीलिए अब तक मनौती पूरी नहीं हुई थी। इस बार यहाँ से जाने से पहले पूजा दे आना ज़रूरी था, लेकिन ढूँढ़ने पर कोई आदमी नहीं मिला। अपु बोला—वह पूजा दे आएगा और उसी गाँव में उसकी पिशीमाँ रहती हैं, उनसे कभी मिलना नहीं हुआ, इसी बहाने उनसे भी मिल आएगा। उसकी माँ बोली—चुप रह, बकवास मत कर। तू अकेला जाएगा भला? यहाँ से लगभग चार कोस का रास्ता है।

अपु माँ से बहस करने लगा—क्या मैं हमेशा ऐसे ही घर में बैठा रहूँगा? कहीं जा नहीं सकता क्या? क्या मेरी आँखें नहीं हैं, कान नहीं हैं, पाँव नहीं हैं?

—सब है, पर आप अकेले जाएँगे उस गंगानंदपुर—बड़े साहसी पुरुष जो ठहरे!

परंतु अंत में अपु की ज़िद के आगे उसे ही भेजना पड़ा।

सोनाडांगा के मैदान का सीना चीरती हुई एक ऊँची कच्ची पगडंडी चली गई थी। रास्ते के दोनों ओर मैदान में केवल आक के फूलों के जंगल थे, फूलों के बोझ से झुकी लंबी-लंबी सफ़ेद डालियाँ दूब की घास पर लोट रही थीं। रास्ते में कोई आदमी नहीं था, दोपहर होने में अब थोड़ी ही देर थी, पेड़-पौधों की छाया छोटी होती जा रही थी। अपु के नंगे पैरों में रेतीली मिट्टी की तपन लग रही थी—उससे बड़ा आराम मिल रहा था। रास्ते के किनारे की जंगली झाड़ियों में कितने ही तरह के फूल खिले थे, साईंबाबला के पेड़ पर नए खिले फूलों की कलियाँ सूरज की ओर मुँह किए थीं, एक छोटे-से पेड़ पर लाल-लाल जंगली गूलर जैसे न जाने कितने फल पककर सुर्ख हो रहे थे, मिट्टी में से धूप में तपी सौंधी-सौंधी गंध उठ रही थी।…वह बीच-बीच में झुककर झाड़ियों के भीतर से ढूँढ़-ढूँढ़कर बैँचि के फल तोड़ रहा था और उनसे अपने हाथ से सिली लाल साटन की कमीज़ की दोनों जेबें भरता जा रहा था।

चलते-चलते उसका मन पुलक से भर उठता। वह किसी से कह नहीं पाता कि उसे कितनी प्रिय है यह मिट्टी की ताज़ी, धूप में तपी गंध, यह छायादार दूब की घास, सूरज की रोशनी में नहाए ये खेत, रास्ते, पेड़-पौधे, पंछी, जंगली झाड़ियाँ, डोलते हुए फूलों और फलों के ये गुच्छे, अलकुशी, बनकलमी, नीली अपराजिता। घर में रहने का उसका ज़रा भी मन नहीं करता; कितना मज़ा आए अगर बाबूजी उससे कहें—बेटा, तुम बस रास्तों पर घूमते-फिरते रहो, तो वह इसी तरह जंगली फूलों से लदी छायादार झाड़ियों के नीचे से, कुहुकती पँखियों वाले दूर के वनों पर आँखें टिकाए, इसी कच्ची पगडंडी पर बस चलता जाए—बस चलता ही जाए।…बीच-बीच में शायद बाँस के झुरमुट की टहनियों में सर-सर की आवाज़, शाम की धूप में बिखरा सोने का सिंदूर और तरह-तरह के रंग-बिरंगे पंछियों के गीत।

अपु का शैशव इसी प्रकृति के घनिष्ठ संपर्क में बीत रहा था। एक ऋतु बीतकर कब दूसरी आ जाती—पेड़-पौधों में, आकाश और हवा में, पंछियों के कलरव में उसकी ख़बर फैल जाती। ऋतु-ऋतु में इछामती के नित-नए बदलते रूपों के प्रति उसकी चेतना जाग उठी थी—कौन-सी ऋतु पेड़-पौधों, जल-थल-आकाश, फूलों-फलों में क्या परिवर्तन लाती है, इसे वह अच्छी तरह पहचानने लगा था। इनके साथ इस घनिष्ठ जुड़ाव से उसे प्रेम था, इनके बिना वह जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता था। यह विराट, अनुपम छवि आँखों के सामने रखकर वह बड़ा हो रहा था। ग्रीष्म की प्रचंड गर्मी और उमस के बाद पूरे क्षितिज पर छाए घने नीले बादलों का गंभीर सुंदर रूप, सांझ की बेला में सोनाडांगा के ऊपर आकाश में कितने ही रंगों के बादलों का खेल, भादों के अंत में खिले कास के फूलों से भरा माधबपुर का दूर तक फैला किनारा, चाँदनी रात में चाँद की किरणों की जाली काटती बाँस की झाड़ियों की छाँव—अपु के खिलते हुए किशोर मन के ताज़े, उत्साह-भरे, निर्मल मानस पर इन सबके अपूर्व विशाल सौंदर्य ने एक अमिट छाप छोड़ दी थी, उसकी कांति-रस की आँखें खोल दी थीं, चुपके-चुपके उसके कानों में अमृत का दीक्षा-मंत्र सुना दिया था।—अपु जीवन में यह शिक्षा कभी नहीं भूला। आजीवन सौंदर्य का पुजारी बने रहने का व्रत, अपने अनजाने में ही, प्रकृति अपने मुक्त रूप में धीरे-धीरे उससे ग्रहण करवा रही थी।…

नतिडांगा के ताल में कुछ लोग मछली पकड़ रहे थे। वह कुछ देर खड़ा होकर देखता रहा। गाँव के भीतर एक काना भिखारी एकतारा बजाकर गाते हुए भीख माँग रहा था—यह गाना तो अपु जानता है—कितनी ही बार गाया है—

‘दिन-दुपहरी चाँद उगा, रात बितानी हुई भारी…’

बोष्टम दादू यह गाना बहुत अच्छा गाते हैं।

हरिशपुर में घुसते ही रास्ते के किनारे एक छोटी-सी छप्पर वाली पाठशाला लगी थी, लड़के सुर में पहाड़े पढ़ रहे थे, वह खड़ा होकर सुनने लगा। गुरुमहाशय की उम्र ज़्यादा नहीं थी, उनके गाँव के प्रसन्न गुरुमहाशय से बहुत कम।

एक और बात उसके मन में बार-बार आ रही थी। अब वह बड़ा हो गया है, छोटा नहीं रहा, छोटा होता तो क्या माँ उसे कहीं अकेले जाने देती?…अब तो बस चलना है, बस सामने बढ़ते जाना है। इसके अलावा, अगले महीने इसी दिन वे लोग कितनी दूर, कहाँ चले जाएँगे। कहाँ है वह काशी—वहाँ!

शाम होते-होते वह गंगानंदपुर पहुँचा। मोहल्ले में पहुँचते ही न जाने कहाँ की सारी लाज ने उसे ऐसा आ घेरा कि वह किसी ओर देख ही नहीं पा रहा था। बड़ी मुश्किल से सामने के रास्ते पर नज़र टिकाए किसी तरह आगे बढ़ता रहा। उसे लगा जैसे सब उसी की ओर देख रहे हैं। वह जो आज आएगा, यह बात जैसे सब जानते हैं; शायद वे सब मन-ही-मन कह रहे हैं—यह देखो, वही जा रहा है, देखो, देखो।…वह जो पोटली में नारियल के लड्डू बाँधकर ले जा रहा है, यह भी जैसे सब जानते हैं। उसके पिशेमशाय कुंज चक्रवर्ती का घर किस तरफ़ है, यह बात तक वह किसी से पूछ न सका।

आख़िरकार एक बूढ़ी औरत को अकेले पाकर उसी से पूछा तो उसने घर दिखा दिया। घर के सामने चारदीवारी थी। आँगन में घुसकर उसे कोई नहीं दिखा। दो-एक बार खाँसा, पर मुँह से बात निकले तब तो! वह चैत की कड़ी धूप में बाहर के आँगन में न जाने कब तक खड़ा रहता, पर थोड़ी देर बाद अठारह-उन्नीस साल की एक साँवली लड़की किसी काम से बाहर आकर जैसे ही बरामदे में पैर रखा, देखा—दरवाज़े के पास कोई अनजाना, सुंदर-सा लड़का हाथ में पोटली लिए सकुचाया-सा खड़ा है। लड़की ने आश्चर्य से पूछा—कौन हो बेटा? कहाँ से आ रहे हो?…अपु अनाड़ी की तरह आगे बढ़कर बड़ी कठिनाई से बोला—मेरा घर…निश्चिन्दिपुर में है, मेरा नाम अ-अपु है।

उसे लग रहा था, न आता तो ही अच्छा होता! शायद उसकी पिशीमाँ उसके इस तरह अचानक आ जाने से नाराज़ हो, शायद सोचे कि कहाँ से एक और आफ़त आ पहुँची!…इसके अलावा—किसे पता था कि अनजानी जगह पर आकर बात करना इतना मुश्किल काम है? उसका माथा पसीने से भीग गया।

लेकिन लड़की तुरंत दौड़कर आई और उसका हाथ पकड़कर बड़े दुलार से उसे बरामदे पर ले गई। उसके माँ-बाप कैसे हैं, यह पूछा। उसकी ठोड़ी पर हाथ फेरकर कितने ही प्यार की बातें कहीं। दीदी को भले ही कभी नहीं देखा था, फिर भी दीदी का नाम लेकर बहुत दुख किया। अपने हाथों से उसकी कमीज़ उतारी, हाथ-मुँह धुलाकर सूखे गमछे से पोंछा और झटपट एक गिलास चीनी का शरबत बनाकर ले आई। पिशी के नाम पर उसने जो सोचा था, यह वैसी नहीं थी, कम उम्र की थी, राजी की दीदी से बस थोड़ी ही बड़ी।

उसकी पिशी भी उसे देखे जा रही थी। बिरादरी के रिश्ते का भतीजा देखने में इतना सुंदर या इतनी कम उम्र का होगा, यह शायद उसकी पिशी को पहले पता नहीं था। इसीलिए जब पड़ोस से एक पड़ोसिन ने आकर अपु का परिचय पूछा तो उसने थोड़े गर्व से कहा—मेरा भतीजा है, निश्चिन्दिपुर में घर है, चचेरे भाई का लड़का है; रिश्ते में बहुत अपना है, पर आना-जाना नहीं है, इसीलिए!…फिर उसने दोबारा गर्व भरी आँखों से अपु की ओर देखा। भाव यह था—देखो मेरे भतीजे का कैसा राजकुमार जैसा रूप है, अब समझो मैं किस दर्जे की—किस खानदान की लड़की हूँ…

शाम को कुंज चक्रवर्ती घर आए। चेहरे पर झुर्रियाँ, डील-डौल कुछ अक्खड़-सा, उम्र का अंदाज़ा लगाना मुश्किल। अपनी पिशी को देखकर उसे जितनी लाज आई थी, पिशेमशाय को देखकर उतना ही डर लगा। बचपन में वह जिन प्रसन्न गुरुमहाशय के पास पढ़ता था, चेहरा कुछ वैसा ही था। उसे लगा, यह आदमी अभी बोल सकता है—बड़े ढीठ लड़के दिखते हो तुम?…

अगले दिन सुबह उठकर अपु मोहल्ले की गलियों में इधर-उधर थोड़ा घूम आया। चारों ओर जंगल-ही-जंगल, खुली ज़मीन—दूब की घास—लगभग थी ही नहीं, ऐसा जंगल। यह एक घर, फिर जंगल से घिरी सँकरी पगडंडी से होकर दूर एक और घर। कई बार लोगों के आँगन के ऊपर से ही रास्ता था। अपनी उम्र के दो-चार लड़कों को खेलते देखा ज़रूर, पर सब उसकी ओर ऐसे मुँह फाड़कर देखते रहे कि उनसे जान-पहचान करने की कोशिश करना तो दूर, वह उनके मुँह की ओर देख भी न सका।

पिशी के घर लौटते समय भी मुसीबत। इतनी सुबह वह माँ के पास चिड़वा, मुरमुरे, लड्डू या बासी भात खाता है। यहाँ क्या ये लोग देंगे? कल रात तो भात खाते समय दूध के साथ संदेश खरीदकर लाए थे। आज अगर वह अभी लौट गया तो शायद वे लोग सोचें कि लड़का बड़ा पेटू है; खाने के लालच में इतनी सुबह घर लौट आया। रोज़-रोज़ खाना क्या अच्छा लगता है?…अब वह क्या करे? नहीं, घर नहीं लौटेगा। थोड़ी देर और रास्तों पर घूम-फिरकर बिल्कुल भात खाने के समय से ज़रा पहले घर जाएगा। पर अनजानी जगह पर इतनी देर तक रास्ते में खड़ा भी कहाँ रहे?

कदम-ब-कदम वह आख़िरकार घर पहुँच ही गया।

छह-सात साल की एक लड़की काँसे की एक कटोरी हाथ में लिए घर में घुसी और आँगन से पुकारकर बोली—लौकी पकाई है जेठीमाँ, मुझे थोड़ी दोगी?…अपु की पिशीमाँ ने कमरे के अंदर से कहा—कौन रे, गुलकी? नहीं, दोपहर को पकाऊँगी, आकर ले जाना…गुलकी कटोरी नीचे रखकर बरामदे के पास खड़ी हो गई। सिर के बाल झाबड़े-झाबड़े, लड़कों के बालों जैसे छोटे। मैला कपड़ा पहने, सिर में तेल नहीं, रंग साँवला। अपु की ओर देखकर, न जाने क्या समझी, एक बार फ़िक् से हँसकर वह कटोरी उठाकर चली गई।

अपु ने पूछा—यह लड़की किसकी है पिशीमाँ?

उसकी पिशी बोली—कौन, गुलकी? उसका घर यहाँ नहीं है—उसके माँ-बाप कोई कहीं नहीं हैं। निबारन मुखुज्जे की बहू—यह जो पड़ोस का घर है, उसकी दूर के रिश्ते की जेठी है—वहीं रहती है।

अगले दिन मोहल्ले का एक लड़का खुद आकर उससे दोस्ती कर गया और साथ लेकर गाँव के सारे मोहल्ले घुमाकर दिखा लाया। घर लौटते समय उसने देखा—वह अनाथ लड़की गुलकी रास्ते के किनारे पाँव फैलाए अकेली बैठी कुछ खा रही है। उसे देखकर जल्दी से आँचल समेटने लगी—आँचल में ढेरों अधपके बकुल के फूल थे। अपु इस बीच पिशीमाँ से उसका और परिचय ले चुका था; निबारन मुखुज्जे की बहू अच्छा बर्ताव नहीं करती, औरत अच्छी नहीं है। पिशीमाँ कह रही थी—जेठी तो नहीं, रणचंडी है, कई-कई दिन खाने को भी नहीं देती, इसके घर उसके घर खाती फिरती है। अपने ही सात बच्चे हैं—उन्हीं को नहीं जुटता, उस पर से यह पराई!…गुलकी को देखकर अपु को ज़रा भी लाज नहीं आई—नन्ही-सी तो लड़की है, अहा, कोई नहीं है इसका! उससे दोस्ती करने की अपु की बड़ी इच्छा हुई। वह पास जाकर बोला—आँचल में क्या छिपा रही है, दिखा तो खुकी?…गुलकी ने अचानक आँचल समेट लिया और फ़िक् से हँसकर नीचे झुककर दौड़ लगा दी। उसकी हरकत देखकर अपु को हँसी आ गई। भागते समय गुलकी के आँचल से बकुल के फल गिरते जा रहे थे, उन्हें बीनते-बीनते वह बोला—गिर गए, सब गिर गए, ले जा अपने बकुल, ओ खुकी, कुछ नहीं कहूँगा, ओ खुकी!…गुलकी तब तक ग़ायब हो चुकी थी।

तालाब में नहाकर आकर वह बैठा ही था कि उसने देखा, पिछवाड़े के दरवाज़े की आड़ से गुलकी एक बार ज़रा-सा झाँकती है और फिर मुँह छिपा लेती है। उससे नज़र मिलते ही गुलकी फ़िक् से हँस पड़ी। अपु खड़ा होकर बोला—रुक, तुझे पकड़ता हूँ एक दौड़ में—कहकर वह पिछवाड़े के दरवाज़े की ओर दौड़ा। गुलकी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और पगडंडी पर सीधा तालाब के किनारे की ओर दौड़ लगा दी। लेकिन अपु से क्या जीत पाती? लाचार होकर रुकते ही अपु ने उसके झाबड़े बालों को मुट्ठी में जकड़कर कहा—बड़ी दौड़ लगा रही थी? मेरे साथ दौड़कर क्या तू जीत पाएगी, खुकी?…गुलकी को पहले डर लगा कि शायद वह उसे मारेगा! लेकिन जब अपु ने बालों की मुट्ठी छोड़कर हँस दिया, तो वह समझ गई कि यह एक खेल है। वह फिर उसी तरह हँस पड़ी।

अपु को बड़ी दया आई। उसकी हँसी में एक ऐसा आभास था जिससे अपु को लगा कि यह उससे दोस्ती करना चाहती है—खेलना चाहती है; लेकिन बच्ची है, बात करना नहीं जानती, इसीलिए इस तरह झाँक-झाँककर, फ़िक् से हँसकर, दौड़कर भागकर—अपनी इच्छा जता रही है। और कोई तरीका उसे मालूम नहीं। यह तो बिल्कुल उसकी दीदी जैसी है! इस उम्र में दीदी शायद ऐसी ही थी—इसी तरह आँचल में बेर-बेल-बैँचि बाँधकर अपने मन में घूमती-फिरती थी, कोई नहीं समझता था, कोई नहीं देखता था, ऐसी ही पेटू—ऐसी ही नासमझ छोटी लड़की!

अपु ने सोचा—इसके साथ कोई नहीं खेलता, मैं ही इसके साथ थोड़ा खेल लूँ। अहा, माँ-बाप की मारी दुखी लड़की, अपने मन में घूमती रहती है! उसने गुलकी के बालों की मुट्ठी छोड़कर उसका हाथ पकड़ लिया, बोला—खेलेगी खुकी? चल उस तालाब के किनारे। नहीं, एक काम कर खुकी, मैं तुझे पकड़ूँगा—और तू भागना; वह कटहल का पेड़ बुढ़िया है। आ—

मुट्ठी छोड़ते ही गुलकी और नहीं रुकी, फिर नीचे झुककर दौड़ लगा दी। अपु चिल्लाकर बोला—अच्छा जा, जा देखूँ कितनी दूर जाएगी—तुझे ज़रूर पकड़ूँगा देखना। अच्छा, गई तो यह देख, कहकर साँस रोककर वह एक दौड़ में भागा—चू-उ-उ-उ। गुलकी ने पीछे मुड़कर अपु को दौड़ते देखा तो अपनी नन्ही शक्ति से जितनी हो सका, दौड़ने की कोशिश की—लेकिन अपु थोड़ी ही दूर दौड़कर उसे पकड़ लिया। बड़ी दौड़ना सीखी है खुकी, हैं न? पर क्या तू मुझसे जीत सकती है? चल, चोर-चौकीदार खेलें—तू चोर बनेगी—यह कटहल का पत्ता चुराकर भागेगी, समझी?…और मैं बनूँगा चौकीदार, तुझे पकड़ूँगा।

गुलकी के मुँह पर हँसी समा नहीं रही थी—शायद वह इतनी देर से मन-ही-मन चाह रही थी कि इस सुंदर लड़के से दोस्ती हो जाए। सिर हिलाकर भरोसा देने के स्वर में बोली—कैंथे के बीज लोगे? अपु ने मन में सोचा, चमारों के गाँव में रहकर इसने ये सब बातें सीखी हैं—जैसे उनके गाँव में ग्वाले या सदगोप के लड़के-लड़कियाँ बात करते हैं।

दोपहर में जब उसकी पिशीमाँ ने बुलाया तो गुलकी पीछे-पीछे आई। अपु के खा लेने पर उसकी पिशी ने पूछा—भात खाएगी गुलकी? अपु की पत्तल पर बैठ जा—मोचे का भरता है—दाल दे रही हूँ। अपु ने सोचा—अहा, पता होता कि वह खाएगी तो दो टुकड़े मछली उसके लिए रख देता। गुलकी ने बिना ना-नुकुर किए निर्लज्ज भाव से खाने बैठ गई। ढेर सारा भात लेकर दाल से साना, फिर बहुत देर तक बैठकर भी उतना भात न खा सकी और पत्तल के किनारे ढेर लगाकर रख दिया। फिर भी उठने का नाम नहीं ले रही थी। अपु की पिशीमाँ हँसकर बोली—और नहीं खाना होगा गुलकी, हाँफ रही है—चल उठ, कितना भात ले लिया देख तो? तेरी तो बस नज़र की भूख है—फिर बोली, जेठीमाँ का हाल देखो—इतनी दोपहरी हो गई, कच्ची बच्ची है—भात खाने को बुलाती भी नहीं? हुआ तो पराया—पर है तो बच्ची ही?…

शनिवार को सिद्धेश्वरी के मंदिर में अपु पूजा देने गया। आचार्य ठाकुर की बहुत लंबी सफ़ेद दाढ़ी छाती पर फैली थी, सुंदर व्यक्तित्व था। उनकी विधवा बेटी बाप के साथ-साथ आती, पूजा का प्रबंध करती, बाप की बड़ी मदद करती थी। लड़की बोली—चार पैसे दक्षिणा क्यों बेटा? इससे तो नहीं होगा, बार की पूजा में दो आने दक्षिणा लगती है। अपु बोला—मेरी माँ ने तो चार पैसे ही दिए हैं, मेरे पास और तो हैं नहीं? लड़की ने कुछ केले और मूली छाँटकर एक पत्ते में लपेटकर उसके हाथ में देते हुए कहा—ठाकुर का प्रसाद इसमें है, बेलपत्र और सिंदूर भी दे दिया, अपने घर की औरतों को देना। अपु ने सोचा—कितने अच्छे लोग हैं ये, मेरे पास पैसे होते तो दो पैसे और दे देता—

पिशीमाँ के घर लौटकर वह बाहर बरामदे में चाँदनी में बैठकर पिशीमाँ से पूजा की बातें कर रहा था कि पड़ोस में गुलकी के घर से अचानक गुलकी के पतले गले की आसमान फाड़ देने वाली चीख सुनाई दी—ओ रे जेठी, ऐसे मत मारो—ओ रे बाबा रे, ओ जेठी, मेरी पीठ कटकर खून निकल रहा है—मत मारो जेठी—साथ ही एक कर्कश आवाज़ की चीख सुनाई दी—हरामज़ादी, बदमाश, चौधरियों के घर गई थी न्योता खाने, इतनी तेरी जीभ लपलपाती है? तेरी जीभ आज मैं कलछुल गरम करके न दागूँ तो कहना—लोगों के घर खा-खाकर घूमेगी और सौ-सौ घरवाले आँखों के अंधे, देख नहीं पाते, कहते हैं कि खाने को नहीं देती—आफ़त-बला कहीं की—तुझे घर में खाने को नहीं मिलता?…तुझे आज मैं—

अपु की पिशीमाँ बोली—देख रहे हो, ताने मार-मारकर, सुना-सुनाकर बोल रही है? सच बात बोलो तो लोगों से दोस्ती नहीं रहती—तभी तुम बुरे हो जाते हो—।

अपु का मन छटपटा रहा था। आँखों में आँसू भर आने से गला रुँध गया था, मुँह से कोई बात नहीं निकल रही थी।

अगले दिन शाम से कुछ पहले ही खाना-पीना निपटाकर अपु ग्वालों के मोहल्ले की ओर चल दिया। पिछले दिन उसके पिशेमशाय ने तय कर दिया था कि इस गाँव से नवाबगंज तंबाकू से लदी गाड़ियाँ जाएँगी, उसी गाड़ी में बैठकर शाम को रवाना हो जाए तो सुबह होते-होते वे उसे निश्चिन्दिपुर के रास्ते पर उतार देंगे।

थोड़ी दूर जाकर ब्राह्मण-मोहल्ले के मोड़ पर गुलकी से भेंट हो गई। वह शाम को खेलकर घर लौट रही थी। अपु बोला—घर जा रहा हूँ रे खुकी आज—दिन भर कहाँ थी? खेलने भी नहीं आई, कुछ नहीं—। फिर गुलकी को अविश्वास से हँसते देख बोला—सच रे, सच कह रहा हूँ, यह देख पोटली, कातिक ग्वाले के घर जाकर गाड़ी पर बैठूँगा—आएगी मेरे साथ थोड़ा दूर तक छोड़ने?

गुलकी पीछे-पीछे बहुत दूर तक चली। ब्राह्मण-मोहल्ला छोड़कर थोड़ा-सा सुनसान मैदान। उसके बाद ग्वालों का मोहल्ला। गुलकी मैदान के किनारे तक आई। अपु की लाल साटन की कमीज़ की ओर उँगली दिखाकर बोली—तुम्हारी यह लाल कमीज़ कितने पैसे की है?

अपु ने हँसकर कहा—दो रुपए की—तू लेगी? गुलकी फ़िक् से हँस दी। मानो कह रही हो, तुम अगर दो तो अभी ले लूँ…

अचानक सामने रास्ते पर नज़र फेरते ही अपु ने देखा, मैदान के अंत में पेड़ों की झुरमुट के बीच से चाँदनी छिटक आई है—और न जाने कैसे उसके मन में आया कि अगले महीने ऐसे ही किसी दिन वे लोग कहाँ, कितनी दूर चले जाएँगे! फिर गुलकी से बोला—और मत आ खुकी, तू चली जा—बहुत दूर आ गई है—तेरे घर पर शायद फिर डाँट पड़ेगी—चली जा खुकी—फिर आया तो मुलाक़ात होगी, ठीक है न? शायद अब न आऊँ, हम लोग वैशाख महीने में काशी चले जाएँगे, वहीं बसेंगे—गुलकी एक बार फिर फ़िक् से हँस दी।

उस दिन पूर्णिमा या चतुर्दशी की कोई तिथि थी। वह इस तरफ़ और कभी नहीं आया था, लेकिन बचपन की इस पहली अकेली विदेश-यात्रा से जुड़ी एक तस्वीर उसके मन में बहुत दिनों तक बसी रही—सुनसान मैदान के सीधे रास्ते पर दूर क्षितिज पर पेड़ों के झुरमुट से पूरा चाँद उग रहा था (या चतुर्दशी का चाँद था, उसे ठीक याद नहीं)। पीछे-पीछे कुछ ही दिनों की परिचित, अनाथ, नासमझ, झाबड़े बालों वाली एक छोटी-सी लड़की उसे विदा करने आई थी।

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