गाँव के प्रसन्न गुरु महाशय घर पर ही एक किराने की दुकान चलाते थे। और दुकान के ही पहलू में उनकी पाठशाला सजती थी। बेंत के सिवा पाठशाला में शिक्षा-दान के लिए विशेष उपकरणों की बहुतायत न थी। पर इस बेंत पर अभिभावकों का विश्वास भी गुरु महाशय से कुछ कम न था। इसीलिए उन्होंने गुरु महाशय से कह भी रखा था कि लड़कों के बस पाँव न लँगड़ाएँ और आँखें न फूटें, केवल इतनी-सी बात का ध्यान रखकर वह जितनी चाहे बेंत चला सकते हैं। गुरु महाशय भी अपनी शिक्षा-दान की उपयुक्त क्षमता और उपकरणों के अभाव को एकमात्र बेंत के सहारे पूरा करने की चेष्टा में इस क़दर बेपरवाही से बेंत चलाते थे कि छात्रगण पाँव लँगड़ाने और आँखें फूटने की दुर्घटना से किसी तरह बस जान बचाकर ही निकल पाते थे।
पूस महीने के दिन थे। अपू सुबह लिहाफ़ ओढ़े, धूप निकलने की प्रतीक्षा में बिस्तर पर लेटा हुआ था। माँ ने आकर पुकारा—अप्पू, उठ जल्दी कर, आज तुझे पाठशाला पढ़ने जाना है। कैसी-कैसी किताबें आएँगी तेरे लिए, स्लेट! हाँ, उठ, मुँह-हाथ धो ले, तेरे बाबू तुझे साथ ले जाकर पाठशाला में छोड़ आएँगे।
पाठशाला का नाम सुनकर अपू ने नींद से अभी-अभी जागी आँखें उठाकर अविश्वास-भरी दृष्टि से माँ के चेहरे की ओर ताका। उसकी धारणा थी कि जो लड़के दुष्ट होते हैं, माँ की बात नहीं सुनते, भाई-बहनों से मारपीट करते हैं, सिर्फ़ उन्हीं को पाठशाला भेजा जाता है। लेकिन उसने तो कभी ऐसा कुछ नहीं किया, तो फिर वह पाठशाला क्यों जाएगा?
कुछ देर बाद सर्वजया ने फिर आकर कहा—उठ अप्पू, मुँह-हाथ धो ले, मैं तुझे ढेर सारे मुरमुरे बाँध दूँगी, पाठशाला में बैठे-बैठे खाना, मेरे लच्छी, मेरे माणिक!
माँ की बात के उत्तर में उसने अविश्वास के स्वर में कहा—इः! फिर माँ की ओर देखकर जीभ निकाली और आँखें मूँदकर एक अजीब-सी मुँह बना ली, उठने का कोई लक्षण न दिखाया।
लेकिन अंत में बाबू के आ जाने से अपू की ज़्यादा आनाकानी न चली, जाना ही पड़ा। माँ पर अभिमान के मारे उसकी आँखों में आँसू भर आए थे, खाना बाँधते समय बोला—मैं कभी घर नहीं लौटूँगा, देख लेना!
—षट्-षट्! घर नहीं लौटेगा क्या! ऐसी बात नहीं कहते, छी! फिर उसकी ठोड़ी पर हाथ रखकर चूम लिया और बोली—खूब विद्या हो, अच्छी तरह लिखाई-पढ़ाई सीखो, तब देखना तुम कितनी बड़ी नौकरी करोगे, कितने पैसे होंगे तुम्हारे, कोई डर नहीं।—ओ जी, तुम गुरु महाशय से कह देना कि इसे कुछ न कहें।
पाठशाला पहुँचाकर हरिहर ने कहा—छुट्टी होने के समय मैं फिर आकर तुम्हें घर ले जाऊँगा, अप्पू। बैठे-बैठे लिखो, गुरु महाशय की बात सुनो, दुष्टता मत करना! कुछ देर बाद पीछे मुड़कर अपू ने देखा, बाबू धीरे-धीरे रास्ते के मोड़ पर अदृश्य हो गए। अथाह सागर!
वह बहुत देर तक मुँह नीचा किए बैठा रहा। फिर डरते-डरते मुँह उठाकर देखा, गुरु महाशय दुकान के मचान पर बैठे तराज़ू में सेंधा नमक तौलकर किसी को दे रहे हैं, कई बड़े-बड़े लड़के अपनी-अपनी चटाई पर बैठे तरह-तरह के कुत्सित स्वरों में कुछ पढ़ रहे हैं और भयानक रूप से झूम रहे हैं। उससे ज़रा छोटा एक लड़का खंभे से टेक लगाए अपने-आप में मगन तालपत्र मुँह में डालकर चबा रहा है। और एक बड़ा लड़का, जिसके गाल पर एक मस्सा था, वह दुकान के मचान के नीचे देखकर कुछ ताड़ रहा है। उसके सामने दो लड़के बैठे स्लेट पर एक घर बनाकर कुछ कर रहे थे। एक चुपके-चुपके कह रहा था, मैंने यह ढैरा दिया, दूसरा लड़का कह रहा था, यह मेरा गोल्ला, साथ-ही-साथ उसकी स्लेट पर लकीरें खिंच रही थीं और बीच-बीच में वे कनखियों से सामान बेच रहे गुरु महाशय की ओर देख लेते थे। अपू अपनी स्लेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में वर्तनी लिखने लगा। कितनी देर बाद, ठीक पता नहीं, गुरु महाशय ने अचानक कहा—ऐ फणे, स्लेट पर यह सब क्या हो रहा है रे? सामने बैठे दोनों लड़कों ने फ़ौरन स्लेट छिपा ली, लेकिन गुरु महाशय की बाज़-जैसी नज़र से बचना बड़ा मुश्किल था, उन्होंने कहा, ऐ सते, फणे की स्लेट लेकर आ तो! उनके मुँह से बात पूरी भी न हुई कि बड़े मस्से वाले लड़के ने झपट्टा मारकर स्लेट उठा ली और दुकान के मचान पर हाज़िर कर दिया।
—हूँ, यह सब क्या लिखा जा रहा है स्लेट पर?—सते, पकड़ के ला तो दोनों को, कान पकड़ के ला!
जिस तरह बड़े लड़के ने झपट्टा मारकर स्लेट छीनी थी, और जिस तरह विपत्ति में फँसे चेहरे लिए सामने वाले दोनों लड़के क़दम-दर-क़दम गुरु महाशय के पास जा रहे थे, उसे देखकर अपू को अचानक बड़ी हँसी आ गई, वह फिक् करके हँस पड़ा। फिर कुछ देर हँसी दबाए रखने के बाद दोबारा फिक्-फिक् करके हँस उठा।
गुरु महाशय बोले, हँसता कौन है? हँस क्यों रहे हो बच्चा, यह कोई नाट्यशाला है? हैं? यह नाट्यशाला है क्या?
नाट्यशाला क्या होती है, अपू यह समझ न पाया, लेकिन डर के मारे उसका मुँह सूख गया।
—सते, एक साबुत ईंट ले आ तो इमली के पेड़ के नीचे से, ख़ूब बड़ी-सी देखकर?
अपू डर से जड़ हो गया, उसका गला काठ हो गया, लेकिन जब ईंट लाई गई तो उसने देखा कि ईंट की व्यवस्था उसके लिए नहीं, बल्कि उन दोनों लड़कों के लिए है। उम्र कम होने के कारण हो या नया दाख़िला होने के कारण, गुरु महाशय ने उस बार उसे बख़्श दिया।
पाठशाला दोपहर बाद बैठती थी। कुल मिलाकर आठ-दस लड़के-लड़कियाँ पढ़ने आते थे। सभी घर से छोटी-छोटी चटाइयाँ लाकर बिछाकर बैठते; अपू के पास चटाई नहीं थी, वह घर से एक जीर्ण क़ालीन का आसन लाता था। जिस कमरे में पाठशाला होती थी, उसकी किसी भी तरफ़ बाड़ या दीवार कुछ नहीं थी, चारों तरफ़ से खुला था; कमरे के बीच क़तार में छात्र बैठते। पाठशाला के कमरे के चारों ओर वन था, पीछे की ओर गुरु महाशय के पुरखों के ज़माने का बाग़। अपराह्न की ताज़ी गर्म धूप चकोतरे, गाभ और पेयाराफूली आम के पेड़ के बीच से छनकर पाठशाला के कमरे के बाँस के खंभों के पायों पर आ पड़ती थी। पास में किसी और तरफ़ कोई घर नहीं था, सिर्फ़ वन और बाग़ान, एक तरफ़ आने-जाने का एक सँकरा रास्ता।
आठ-दस लड़के-लड़कियों में सभी बेतरह झूम-झूमकर तरह-तरह के सुरों में पाठ रटते थे; बीच-बीच में गुरु महाशय की आवाज़ सुनाई देती—ऐ कैबला, उसकी स्लेट की तरफ़ झाँककर क्या देख रहा है? कान मरोड़कर फाड़ दूँगा एकदम! नूटू, तुम्हें कितनी बार धोती भिगोनी पड़ेगी? फिर अगर देखा कि धोती भिगोने उठे हो...
गुरु महाशय एक खंभे का सहारा लेकर एक तालपत्र की चटाई पर बैठे रहते। सिर के तेल से बाँस के खंभे का वह हिस्सा जहाँ वह टेक लगाते थे, पक गया था। दोपहर बाद अक्सर गाँव के दीनू पालित या राजू राय उनके साथ गपशप करने आ जाते।
पढ़ाई-लिखाई से ज़्यादा यह गपशप सुनना अपू को कहीं अच्छा लगता था। राजू राय महाशय बताते कि कैसे उन्होंने प्रथम यौवन में ‘वाणिज्ये वसते लक्ष्मीः’ का स्मरण कर आषाढ़ के हाट में तमाखू की दुकान खोली थी। अपू चकित होकर सुनता। कितना अच्छा लगता होगा—अपनी छोटी-सी दुकान का झाँप उठाकर बैठना, दाँव से तमाखू काटना, फिर रात में नदी पर जाना, छोटी-सी हाँड़ी में मछली का झोल-भात पकाना, शायद बीच-बीच में अपनी वह महाभारत वाली किताब या बाबू की वह दाशू राय की पांचाली मिट्टी के दीये के सामने खोलकर बैठे-बैठे पढ़ना! बाहर अँधेरे में बरसाती रात में टिप-टिप बारिश हो रही है, कोई कहीं नहीं है, पीछे के डोबा (गड्ढे) में मेंढक टर्रा रहे हैं—कितना सुंदर! बड़ा होकर वह तमाखू की दुकान करेगा।
यही गपशप किसी-किसी दिन भाव और कल्पना के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच जाती, जिस दिन गाँव के उस पाड़े के राजकृष्ण सान्याल महाशय आते। कोई भी कहानी हो, चाहे कितनी ही मामूली क्यों न हो, उसे सजाकर कहने की उनकी क्षमता असाधारण थी।
सान्याल महाशय को देश-भ्रमण का व्यसन था। कहाँ द्वारका, कहाँ सावित्री पहाड़, कहाँ चंद्रनाथ, वह भी अकेले देखकर उन्हें तृप्ति नहीं होती थी, हर बार स्त्री-पुत्र को लेकर जाते और ख़र्च-पानी करके सर्वस्व गँवाकर लौटते। बड़े आराम से अपनी चंडीमंडप में बैठे थेला हुक्का पी रहे हैं, ऐसा लगता मानो सान्याल महाशय जैसे नितांत घरेलू, पुराने ढंग के, देहात के ढेर सारा अवकाश पाए गृहस्थ और कोई नहीं, पैतृक चंडीमंडप में जड़ें जमाकर बैठ गए हैं। अचानक एक दिन देखा गया कि सदर दरवाज़े पर ताला बंद है, घर में किसी जीव-प्राणी की आहट नहीं। मामला क्या है? सान्याल महाशय सपरिवार विंध्याचल या चंद्रनाथ भ्रमण पर गए हैं।
बहुत दिनों तक कोई अता-पता नहीं, अचानक एक दिन दोपहर को ठुक-ठुक की आवाज़ सुनकर लोगों ने विस्मय से देखा, दो बैलगाड़ियों में लदकर सान्याल महाशय सपरिवार विदेश से लौट आए हैं और लोगों को बुलाकर घुटनों तक ऊँची जल-बिछुटी और अर्जुन के पेड़ों का जंगल कटवाते-कटवाते घर में घुस रहे हैं।
एक मोटी लाठी हाथ में लिए वह लंबे-लंबे डग भरते हुए पाठशाला में उपस्थित होते—ये रहे प्रसन्न, कैसे हो, ख़ूब जाल बिछाकर बैठे हो! कितनी मक्खियाँ फँसीं?
पहाड़े रटते अपू का मुँह तुरंत असीम आनंद से उज्ज्वल हो उठता। सान्याल महाशय जहाँ तालपत्र की चटाई खींचकर बैठते, वह उत्साह में हाथ-भर ज़मीन उधर खिसक जाता। स्लेट-किताब समेटकर एक तरफ़ रख देता, मानो आज छुट्टी हो गई हो, और पढ़ाई-लिखाई की ज़रूरत नहीं; साथ-ही-साथ उसकी बड़ी-बड़ी उत्सुक आँखें कहानी के हर शब्द को अकाल के भूखे की तरह निगल जातीं।
कुठी के मैदान के रास्ते में जिस जगह को अब नालताकुड़ी का जोल कहते हैं, वहाँ पहले—बहुत काल पहले—गाँव के मति हाजरा का भाई चंदी हाजरा जंगल में पेड़ काटने गया था। वर्षाकाल था—यहाँ-वहाँ बारिश के पानी के ज़ोर से मिट्टी धँस गई थी, अचानक चंदी हाजरा ने देखा कि एक जगह जैसे किसी पीतल की हाँड़ी का काना (किनारा) मिट्टी से ज़रा-सा बाहर निकला हुआ है। उसने तुरंत खोदकर निकाल लिया। घर आकर देखा तो एक हाँड़ी पुराने ज़माने के रुपयों से भरी है। उसे पाकर चंदी हाजरा कुछ दिन ख़ूब बाबूगिरी करता फिरा—यह सब सान्याल महाशय ने अपनी आँखों से देखा था।
किसी-किसी दिन रेल-भ्रमण की कहानी छिड़ती। कहाँ सावित्री पहाड़ है, उस पर चढ़ने में उनकी पत्नी को कैसी तकलीफ़ हुई थी, नाभिगया में पिंड देने जाकर पंडे से हाथापाई की नौबत आ गई थी। कहीं एक जगह एक बहुत अच्छी मिठाई मिलती है, सान्याल महाशय ने नाम बताया—पेड़ा। नाम सुनकर अपू को बड़ी हँसी आई थी—बड़ा होकर वह पेड़ा ख़रीदकर खाएगा।
और एक दिन सान्याल महाशय किसी जगह की कहानी सुना रहे थे। उस जगह पर कहते हैं पहले बहुत लोगों की बस्ती थी, शाम के समय इमली के जंगल के बीच से होकर वह वहाँ गए थे—सान्याल महाशय बार-बार जिस चीज़ को देखने जाते थे, उसका नाम बता रहे थे—"चिका-मसजिद"। वह क्या चीज़ है, यह पहले वह समझ नहीं पाया था, बाद में बातचीत के ढंग से समझा कि कोई टूटा-फूटा पुराना घर है। लगभग अँधेरा हो आया था—उनके घुसते ही चमगादड़ों का एक झुंड सांय करके उड़कर बाहर निकल गया।
अपू अच्छी तरह कल्पना कर सकता है—चारों ओर अँधेरा इमली का जंगल, कोई कहीं नहीं है, टूटा-फूटा पुराना दरवाज़ा, जैसे ही वह घुसा वैसे ही सांय करके चमगादड़ों का दल भाग गया—रानू के घर के पश्चिम वाले चोर-कोठरी जैसे अँधेरे कमरे की तरह।
किस देश में सान्याल महाशय ने एक फ़क़ीर को देखा था, वह एक पीपल के पेड़ के नीचे रहता था। एक चिलम गाँजा पाने पर वह ख़ुश होकर कहता—अच्छा, कौन-सा फल तुम लोग खाना चाहते हो, बोलो। फिर इच्छित फल का नाम बताने पर वह सामने के किसी भी पेड़ को दिखाकर कहता—जाओ, वहाँ जाकर ले आओ। लोग जाकर देखते तो शायद आम के पेड़ पर अनार फले हुए हैं या अमरुद के पेड़ से केले की घौद लटक रही है।
राजू राय कहते—वह सब मंतर-तंतर का खेल और क्या! उस बार मेरे एक मामा—
दीनू पालित बात काटकर कहते—मंतर की बात जब उठा ही दी, तो एक कहानी सुनो। कहानी नहीं, मेरी आँखों देखी है। बेलेडांगा के बुधो गाड़ीवान को तुम लोगों में से किसी ने देखा है? राजू, तुमने न देखा हो, राजकृष्ण भैया, तुमने तो ख़ूब देखा होगा। लकड़ी की, रस्सी बँधी एक तरह की खड़ाऊँ पहनकर... बूढ़ा हमेशा हमारे लोहार की दुकान पर हल का फाल गढ़वाने आता था। सौ साल की उम्र में मरा, और मरे हुए भी आज पच्चीस साल से ऊपर हो गए। जवान उम्र में हम उसकी कलाई की ताक़त के आगे टिक नहीं पाते थे।
एक बार—बहुत पुरानी बात है—मेरी उम्र तब यही कोई उन्नीस-बीस साल की थी, चाकदा से गंगा-स्नान करके बैलगाड़ी से लौट रहा था। बुधो गाड़ीवान की गाड़ी—गाड़ी में मैं, मेरी चाची, और अनंत मुख़र्जी का भतीजा राम, जो आजकल उठकर खुलना में बस गया है।
कानसोना के मैदान के पास पहुँचते-पहुँचते लगभग दिन ढल गया। तब उन तरफ़ कैसा डर-भय था, यह तो राजकृष्ण भैया तुम जानते ही होगे। एक तो मैदान का रास्ता, साथ में औरतों का दल, कुछ रुपए-पैसे भी थे—बड़ी चिंता हुई। आजकल जहाँ नया गाँव बस गया है—उसी के बराबर आकर हुआ क्या, जानते हो? चार हृष्ट-पुष्ट-से, स्याह काले लोग आकर गाड़ी के पिछले बाँस को दोनों तरफ़ से पकड़ लिए। दो इधर, दो उधर।
यह देखकर तो महाशय मेरे मुँह से आवाज़ ही न निकले, किसी तरह गाड़ी के अंदर बैठा हूँ, इधर वे भी गाड़ी का बाँस पकड़े साथ-ही-साथ आ रहे हैं, साथ-ही-साथ आ रहे हैं, साथ-ही-साथ आ रहे हैं। बुधो गाड़ीवान देखूँ तो पिट-पिट करके पीछे की ओर ताक रहा है। इशारा करके हमें बात करने से मना कर दिया। ख़ूब है!
इधर गाड़ी बिलकुल नवाबगंज थाने के क़रीब आ पहुँची।
बाज़ार दिख रहा है, तब उन लोगों ने कहा—उस्ताद जी, हमसे भूल हो गई, हम समझ नहीं पाए, छोड़ दो। बुधो गाड़ीवान बोला—सो नहीं होगा बेटों। आज सबको थाने ले जाकर बँधवा दूँगा। बहुत मिन्नत-समाजत के बाद बुधो बोला—अच्छा जा, छोड़ दिया इस बार, लेकिन फिर कभी ऐसा मत करना। तब वे बुधो गाड़ीवान के पैरों की धूल लेकर चले गए। मेरी आँखों देखी बात है। मंतर के ज़ोर से उन्होंने जो आकर बाँस पकड़ा, तो बस पकड़े ही रह गए—और छुड़ाने की सामर्थ्य नहीं—चले जा रहे हैं गाड़ी के साथ! एकदम कील से जड़ दिए गए थे। समझे बापू? मंतर-तंतर की बात—
कहानी कहते-कहते दिन ढल जाता। पाठशाला के चारों ओर के वन-जंगलों में अपराह्न की लालिमा-भरी धूप तिरछी होकर पड़ती। कटहल के पेड़, गूलर के पेड़ की डाल पर झूलती गिलोय की लता पर टुनटुनी चिड़िया मुँह ऊँचा किए बैठी झूलती रहती। पाठशाला के कमरे में वन की गंध के साथ लताओं-पत्तों की चटाई, फटी-पुरानी किताबें-दफ़्तर, पाठशाला का मिट्टी का फ़र्श और दाँव से कटी तीखी तमाखू का धुआँ, सब मिलकर एक जटिल गंध की सृष्टि करते।
उस गाँव की छाया-भरी कच्ची राहों पर एक मुग्ध देहाती बालक की छवि अंकित है।
किताबें-दफ़्तर बगल में दबाए वह अपनी दीदी के पीछे-पीछे साजी-मिट्टी से धुले, सिलाई किए हुए कपड़े पहने पाठशाला से लौट रहा है, उसके छोटे-से सिर के रेशम-जैसे नरम, चिकने, सुखद-स्पर्श बालों को उसकी माँ ने यत्न से सँवार दिया है—उसकी बड़ी-बड़ी सुंदर आँखों में कैसी तो एक हैरान-सी चाहत है—मानो उन्होंने इस कौन-से अद्भुत जगत में नई-नई आँखें खोलकर देखते-देखते दिशा खो दी हो।
पेड़-पौधों से घिरा बस इतना-सा ही उसका परिचित देश है—यहीं माँ रोज़ हाथ से खिलाती है, बाल सँवार देती है, दीदी कपड़े पहना देती है, इस घेरे से बाहर निकलते ही उसके चारों ओर अपरिचय का अथाह सागर लहराता है! उसका शिशु-मन थाह नहीं पाता।
वह जो बाग़ के उस तरफ़ बाँस का वन है—उसके बगल से जो सँकरा रास्ता उस तरफ़ कहाँ चला गया है—तुम अगर सीधे-सीधे उस रास्ते पर चलते जाओ तो शाँखारीपुकुर (शंखारी-पोखर) के किनारे किसी अज्ञात गुप्त धन के देश में पहुँच जाओगे—बड़े पेड़ के नीचे वहाँ बारिश के पानी से मिट्टी धँस गई है—कितनी ही मोहरों से भरी हाँड़ियाँ-कलशियाँ बाहर झाँक रही हैं, अँधेरे वन-झुरमुटों के नीचे, कचु (कच्चू), ओल (ओल) और बन-कलमी (जंगली करमी) के चमकीले हरे पत्तों की आड़ में छिपी—कोई नहीं जानता कहाँ।
एक दिन पाठशाला में ऐसी एक घटना हुई, जो उसके जीवन का एक नया अनुभव थी।
उस दिन दोपहर बाद पाठशाला में और किसी के उपस्थित न होने से कोई गपशप नहीं हुई, पढ़ाई-लिखाई हो रही थी—वह जाकर बैठ गया और शिशुबोधक पढ़ने लगा—तभी गुरु महाशय बोले—स्लेट लो, श्रुतलेख लिखो—
मुँह-ज़बानी बोलने पर भी अपू समझ गया था कि गुरु महाशय अपनी बात नहीं कह रहे हैं, रटा-रटाया बोल रहे हैं, जैसे वह दाशू राय की पांचाली की तुकबंदियाँ रटकर बोलता है।
सुनते-सुनते उसे लगा कि इतनी सारी सुंदर बातें एक साथ, एक के बाद एक उसने कभी नहीं सुनी थीं। वह ‘उन सब’ बातों का अर्थ नहीं समझ रहा था, लेकिन अनजाने शब्दों और ललित पदों की ध्वनि, झंकार में गुँथा एक अपरिचित शब्द-संगीत, अनभ्यस्त शिशु-कर्णों को अपूर्व लगा और सब बातों का अर्थ न समझने के कारण ही कुहासे में घिरे अस्पष्ट शब्द-समूह के पीछे से एक अनोखे देश की तस्वीर बार-बार झाँक रही थी।
बड़ा होकर स्कूल में पढ़ते समय उसने खोज निकाला था कि बचपन का यह रटा हुआ श्रुतलेख कहाँ है—
“यही वह जनस्थान-मध्यवर्ती प्रस्रवण-गिरि है। इसका शिखर-देश आकाश-पथ में सतत-समीर-सञ्चरमाण-जलधर-पटल-संयोग से निरन्तर निबिड़ नीलिमा से अलंकृत है—अधित्यका-प्रदेश घने-सघन वन-पादपों से समाच्छन्न होने के कारण स्निग्ध, शीतल और रमणीय है... पाददेश में प्रसन्न-सलिला गोदावरी तरंग-विस्तार करके...”।
वह ठीक-ठीक कह नहीं सकता, समझा नहीं सकता, लेकिन वह जानता है—उसे लगता है, अक्सर ही लगता है, कि कोई दो साल पहले कुठी के मैदान में सरस्वती पूजा के दिन जब वह नीलकंठ पक्षी देखने गया था, उस दिन मैदान के किनारे-किनारे एक रास्ते को उसने दूर कहीं जाते देखा था। उस रास्ते के दोनों ओर कितने ही अनजाने पक्षी, अनजाने पेड़-पौधे, अनजाने वन-झुरमुट थे—बहुत देर तक उस दिन वह उस रास्ते की ओर एकटक देखता रहा था। मैदान के उस पार वह रास्ता कहाँ चला गया है, यह सोचकर वह कोई कूल-किनारा न पा सका था।
उसके बाबू ने कहा था—वह सोनाडांगा मैदान का रास्ता है, माधवपुर, दशघरा होकर उस धलचित के खेवाघाट में जाकर मिला है।
धलचित के खेवाघाट में नहीं, वह जानता था, वह रास्ता और भी बहुत दूर गया है; रामायण-महाभारत के देश में।
उस पीपल के पेड़ की सबसे ऊँची डाल की ओर देखने से जिसकी याद आती है—उसी बहुत दूर के देश की।
श्रुतलेख सुनते-सुनते उसे दो साल पहले देखे उस रास्ते की ही बात याद आ गई। उसी रास्ते के उस पार बहुत दूर कहीं वह जनस्थान-मध्यवर्ती प्रस्रवण-पर्वत है! वन-झुरमुटों की स्निग्ध गंध में, न-जानने की छाया में उतरती झिलमिलाती संध्या में, उस स्वप्नलोक की छवि ने उसे चकित कर दिया। कितनी दूर है वह प्रस्रवण-गिरि का उन्नत शिखर, आकाश-पथ में सतत-सञ्चरमाण मेघमाला से जिसका प्रशांत, नीला सौंदर्य सर्वदा ढका रहता है?
वह बड़ा होकर जाकर देखेगा।
लेकिन वह बेंत के काँटों से भरा तट, वह बहुरंगी रेतीले किनारों वाली गोदावरी, वह श्यामल जनस्थान, नीली मेघमाला से घिरा वह अपूर्व शैल-प्रदेश, रामायण में वर्णित किसी देश में नहीं था। वाल्मीकि या भवभूति भी उनके सृष्टिकर्ता नहीं थे। केवल अतीत के दिनों की किसी पक्षियों से गुंजित ग्राम्य संध्या में एक मुग्ध-मति देहाती बालक की अपरिणत शिशु-कल्पना के देश में वे वास्तविक थे, एकदम खरे, अति-सुपरिचित। पृथ्वी की सतह पर जिनका भौगोलिक अस्तित्व कभी संभव नहीं था, सिर्फ़ एक अनभिज्ञ शैशव-मन में ही उस कल्प-जगत के प्रस्रवण-पर्वत ने अपनी सतत-सञ्चरमाण मेघ-जाल से ढकी नीली शिखरमाला का स्वप्न लेकर अक्षय आसन जमा लिया
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