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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · पंद्रहवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

पंद्रहवाँ परिच्छेद

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दुर्गा अपने भाई को ढूँढ़ने निकली थी। मोहल्ले में कई जगह खोजा, पर वह कहीं नहीं मिला। अन्नदा राय महाशय के घर के पास आकर उसने सोचा—एक बार यहाँ देख जाऊँ, खुड़ीमाँ से भी भेंट हो जाएगी—

अन्नदा राय के घर में घुसते ही एक हो-हल्ले, चीख-पुकार और रोने-धोने का मिला-जुला शोर उसके कानों में पड़ा। घर के भीतर जाकर वह दरवाज़े के पास खड़ी हो गई। ओसारे के एक कोने में खड़ी अन्नदा राय की विधवा बहन सखी ठाकरुण चीख-चीखकर घर सिर पर उठाए हुए थीं—

—तो क्या मन में ज़रा भी डर है? मैंने बहुत-सी जहाँबाज़ औरतें देखी हैं, पर ऐसी तो बापू, कभी नहीं देखी, पाँव पड़ती हूँ—भला वह यमराज-जैसा स्वामी, ग़ुस्से में आए तो हाड़-मांस एक न रखे—तो क्या थोड़ा सँभलकर नहीं चलना चाहिए? सच ही तो है, आज तीन दिन से कह रहे हैं, धान को ज़रा धूप दिखा दो, ओगो धान को ज़रा धूप दिखा दो—पर बात क्या पल्ले पड़ती है? नहीं, कान में जाती है? किसकी बात कौन सुनता है! गृहस्थ घर की बहू है, धान कूटेगी, काम करेगी, यही तो हम जानते हैं—सो नहीं, दिन-रात पट की बीबी बनी बैठी रहती है!

‘पट की बीबी’ चीज़ को स्पष्ट करने के लिए, अच्छी तरह सज-धजकर जिस तरह बैठा रहना चाहिए, जैसा सखी ठाकरुण का विचार था, उन्होंने यहाँ उसका अभिनय भी कर दिखाया—यह तो बापू, मैंने अपने बाप-जन्म में न कभी देखा, न सुना—

दालान के भीतर से अन्नदा राय की पुत्रवधू नाक के सुर में रोते-रोते बोली—क्या मैं पट की बीबी बनकर सजी-धजी बैठी रहती हूँ! कल जो दस सेर मूँग की दाल भूनी, सारी दोपहर लग गई? दोपहर को खाकर ही शुरू किया था, और जब पाँच बजे की गाड़ी जाने की आवाज़ आई, तब भी मैं खप्पर की आँच पर ही बैठी थी, दो-दो टोकरे दाल भूनते-कूटते—करते-करते जब अँधेरा हो गया तब उठी—वह क्या यों ही हो जाता है? बदन में दर्द हो गया, रात को लगा कि जैसे बुखार ही चढ़ आएगा, ऐसा हाथ-पाँव में दर्द था—पर वह क्या कोई देखता है? ऊपर से सुबह-सुबह बिना किसी दोष के यह मार—क्यों, क्या इस संसार में मैं बैठे-बैठे खाती हूँ?

तभी अन्नदा राय का बेटा गोकुल एक हाथ में पत्तों-समेत कच्चे बाँस की एक डाली और दूसरे हाथ में एक दाँव लिए घर में घुसा। अपनी पत्नी के रोने का अंतिम अंश सुनकर वह गरजकर बोला—अभी भी तुम्हारा जी नहीं भरा—अभी भी तुम्हारी क़िस्मत में बहुत दुःख है, देख रहा हूँ—मेरा ग़ुस्सा मत बढ़ाओ सुबह-सुबह! आज तीन दिन से धान को धूप में डालने के लिए कह-कहकर थक गया—यह जो बादल-बादल हो रहा है, इसके बाद अगर धान में अँखुआ फूट गया, तो तुम्हारा कौन-सा बाप आकर सँभालेगा?....सारे साल का पिंड-पानी कहाँ से जुटेगा?

गोकुल की बहू ने अचानक रोना बंद कर दिया और तेज़ी से ऊँची आवाज़ में बोल उठी—तुम मेरे बाप का नाम लेकर गाली मत दो, कहे देती हूँ—मेरे बाप ने तुम्हारा क्या किया है, जो जब-तब उनके नाम पर जो-जी में आए बकते हो?

उसकी बात पूरी भी न हुई थी कि गोकुल ने हाथ का बाँस नीचे रखकर, दाँव हाथ में लिए एक छलाँग में ओसारे की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए कहा—तो रे! आज या तो तेरा दिन है या मेरा—तेरे बाप के घर का नाज़-नखरा अगर आज मैंने नहीं उतारा तो—

कहीं कोई ख़ून-खराबा न हो जाए, यह देखकर घर के किसान ने आँगन से ही पुकारा—क्या करते हैं दा-ठाकुर—क्या करते हैं, रुकिए, रुकिए—फिर वह दौड़कर ओसारे पर चढ़ गया—दुर्गा भी दौड़कर आई—सखी ठाकरुण भी ओसारे से दालान के भीतर चली गईं—बड़ा हो-हल्ला मच गया। दालान के भीतर गोकुल की पत्नी, पति के उद्यत आक्रमण के सामने पीछे हटकर, मार से बचने के लिए दोनों हाथ उठाए दीवार से पूरी ताक़त से सटकर सिमटकर खड़ी हो गई थी, उसकी आँखों में भय की दृष्टि थी—किसान ने जाते ही गोकुल के हाथ से दाँव छीन लिया; फिर उसे पकड़कर दालान से बाहर लाते-लाते कहने लगा—क्या करते हैं दा-ठाकुर, रुकिए—आह—आइए, नीचे उतरिए।

गोकुल की उम्र पैंतीस-छत्तीस से कम न थी, पर देह वैसी सबल नहीं थी, बलिष्ठ किसान के साथ मलेरिया-दुर्बल शरीर लेकर हाथापाई की कोशिश करने पर कमज़ोरी ही और अधिक प्रकट होगी, यह समझकर वह कहता-कहता नीचे उतरा—देखो तो ज़रा—एक डोल धान, बीज का धान, पानी पाकर अगर अँखुआ गया, तो क्या उसकी रोपाई होगी? आज तीन दिन से कह रहा हूँ—और तेवर तो देखा?—तुम्हारा तेवर मैं—

दुर्गा ने साँस लेकर चैन पाया, लेकिन यह खुड़ीमाँ के साथ आलाप-परिचय, बातचीत का समय नहीं है, यह समझकर वह एक तरह से चुपचाप ही अन्नदा राय के घर से बाहर निकल आई।

पाँचू बाँड़ुज्जे के घर के पास जामुन-तले एक आदमी घटी-बाटी सुधारने बैठा था। लकड़ी के कोयले की भट्ठी में गनगने आग दहक रही थी, मोहल्ले के बहुत-से टूटे-फूटे घटी-बाटी जमा थे। नाटे क़द का आदमी था, पकी-सूखी-सी काया, उम्र का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था, तीस भी हो सकती थी, पचास भी, गले में त्रिकंठी तुलसी की माला, मुँह के दाहिनी ओर एक कटने का निशान—हाथ की कलाई पर रस्सी-जैसी नसें उभरी हुई थीं; पहने हुए थी अधमैली धोती। मोहल्ले के बहुत-से लड़के-लड़कियाँ उसे घेरकर घटी-बाटी सुधरते देख रहे थे। दुर्गा भी गई। उस आदमी ने कहा—क्या चाहिए खुकी?

उसने कहा—कुछ नहीं, देखूँगी।

घर लौटकर माँ से बोली—आज माँ, गोकुल काका ने खुड़ीमाँ को जो मारा है, क्या बताऊँ—फिर उसने शुरू से आख़िर तक सब वर्णन किया।

सर्वजया बोली—गँवार-गोविंद, एक नंबर का चाषा ही तो है!—आह, बेचारी सीधी-सादी बहू ऐसे हाथ और ऐसे घर में पड़ी है—पिटते-पिटते ही ज़िंदगी चली गई।

—मुझे तो बहुत प्यार करती हैं—जब जो कुछ घर में बनता है, मेरे लिए उठाकर रख देती हैं। खुड़ीमाँ का रोना देखकर इतना कष्ट हुआ माँ! सखी ठाकरुण भी अब उलटे खुड़ीमाँ को ही कोस रही थीं—

वह तीन-चार दिन जामुन-तले घटी-बाटी सुधरते देखने गई। वह आदमी उसका घर, बाप का नाम, सब बारीक़ी से पूछता। बोला—तुम्हारे घर का सामान नहीं सुधरवाओगी? ले आओ न खुकी?

दुर्गा ने घर आकर माँ से कहा—हमारे टूटे-फूटे घटी-गागर दोगी माँ, एक बहुत भला आदमी आया है—उस पार के रास्ते पर जामुन-तले बैठकर सुधार रहा है—

उस आदमी ने अपना नाम बताया पीतम—जात का नाकि कसारी था। भट्ठी धौंकते-धौंकते एक-एक बार सीधा होकर बैठता और कहता—जय राधे! राधे गोविंद! सुबह-सुबह उसके पास मोहल्ले के कई लोग आकर जुटते। वह चिमटे से भट्ठी से आग उठाकर लगातार तमाखू भरकर भद्रलोगों के हाथ में देता—देते समय चेहरा विनय से काँचुमाचु कर लेता और गरदन एक ओर झुकाकर कहता—हें हें, तमाखू की इच्छा करें बाबाठाकुर! राधारानी के चरण ही भरोसा हैं!....नारियल की बात तो पूछिए ही मत बाबाठाकुर, पिछले साल जेठ महीने में सोचा कि कुछ पौधे लगा दूँ, आध कट्ठा ज़मीन में छः गंडा पौधे ख़रीदकर लगा दिए—पर मेंढकों के उपद्रव से—एकदम जड़-मूल-समेत...कितने ही रुपए मिट्टी में मिल गए।

मुखुज्जे महाशय सुबह से ही डटे बैठे थे, किसी तरह मीठी बातों से फुसलाकर पीतल का घड़ा मुफ़्त में सुधरवा लेंगे। तमाखू पीते-पीते पिछली बात का सिरा पकड़कर बोले—यही तो हुआ कांड बापू—तो—इस बार भी तो सोचा था कि बीसेक पौधे घर के पीछे—पर ऐसा मलेरिया पकड़ा—तुम्हारे उधर कैसा है हे कारीगर? (वह सुबह से ही उसे कारीगर कहकर बुला रहे थे)।

—परिपूर्ण—आज्ञा, परिपूर्ण—मलेरिया की बात न करें बाबाठाकुर—हड्डियाँ जलाकर खा गया है—यह लीजिए आपका घड़ा, छः पैसे दीजिएगा—

मुखुज्जे महाशय घड़ा हाथ में लेकर उठते हुए बोले—हाँ! इसके लिए भी पैसे—ब्राह्मण को एक चीज़ सुधारकर दे दी कार्तिक महीने के दिन—उस पर भी—

पीतम ने जल्दी से मुखुज्जे महाशय का घड़ा पकड़ लिया और अत्यंत विनीत भाव से हँसकर बोला—आज्ञा नहीं, माफ़ करेंगे बाबाठाकुर, ऐसे ही सुधारकर नहीं दे पाऊँगा—अभी सुबह-सुबह बोहनी भी नहीं हुई है। आज्ञा नहीं—यह नहीं कर पाऊँगा—घड़ा रख जाइए—घर जाकर पैसे भिजवा दीजिएगा—

दुर्गा की माँ ने कहा—देख तो ज़रा—टूटे-फूटे बरतन-बासन के बदले कई बार वे लोग नए बरतन-बासन दे देते हैं—पूछना तो।

पीतम तुरंत राज़ी हो गया। दुर्गा घर से ढो-ढोकर पुराने गागर, घटी-बाटी, घड़ों का एक ढेर उसके पास ले जाकर हाज़िर कर दिया। आधा दिन वह जामुन-तले ही काटती—भट्ठी धौंकना, राँगे का झाल लगाना, बैठी-बैठी देखती। पीतम ने कहा था कि वह उसे एक पीतल की अँगूठी गढ़वा देगा—यह भी कहा था कि सुधारने के पैसे उनसे नहीं लगेंगे। सर्वजया सुनकर बोली—अहा, बड़ा भला आदमी है तो! आने वाले बुधवार को अपू का जन्मदिन है, उससे कहना कि आए—हमारे यहाँ दो दाल-भात प्रसाद पा जाएगा—

बुधवार सुबह उठकर दुर्गा जामुन-तले गई तो देखा कि वह आदमी नहीं है। पूछने पर पता चला कि पिछले दिन शाम के बाद किसी समय वह अपनी दुकान उठाकर चला गया है—भट्ठी के गड्ढे और जली कोयले की राख के सिवा और कोई निशान नहीं था। दुर्गा ने यहाँ-वहाँ खोजा—इससे-उससे पूछा, कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ गया है। डर के मारे दुर्गा का मुँह सूख गया—माँ सुनेगी तो क्या कहेगी। घर के आधे बरतन जो उसके पास थे! उसने दुर्गा से कहा था कि झिकरहाटी के बाज़ार में उसकी कसारी की दुकान है, वहाँ उसने ख़बर भेजी है—उसका भाई एक दिन के भीतर नए बरतन लेकर बस पहुँचा ही चाहता है—आते ही टूटे-फूटे बरतन सब बदल देगा। कहाँ तो वह—और कहाँ उसका भाई! वह कहाँ चला गया, यह दुर्गा बहुत खोजने पर भी नहीं पा सकी। केवल उन्हीं का सामान गया था—दूसरे होशियार लोगों का एक टुकड़ा पीतल भी ग़ायब नहीं हुआ था।

पूरे दिन के बाद शाम के समय दुर्गा ने रोनी सूरत बनाकर माँ को सब बताया। हरिहर परदेस में थे—कौन खोज-खबर करता, कौन देखता। सर्वजया अवाक रह गई! बोली—एक बार अपने राय जेठामशाय से जाकर कह तो! ओ माँ, ऐसी बात तो कभी नहीं सुनी!....हरिहर के घर आने पर झिकरहाटी के बाज़ार में खोज-खबर की गई थी—पीतम नाम के किसी आदमी की वहाँ कसारी की दुकान नहीं थी, न ही उस शक्ल-सूरत का कोई आदमी वहाँ था।

कई महीने बीत गए थे। भादों का महीना था।

अपू दोपहर बाद घूमने जाने का मन बना रहा था, तभी उसकी माँ ने पीछे से पुकारकर कहा—कहाँ निकल रहा है रे अपू?—चावल और चने का भूजा भून रही हूँ, बाहर मत जाना।....अभी खा लेना—

अपू ने सुनकर भी अनसुना कर दिया—हालाँकि वह चावल-चने का भूजा खाना पसंद करता है, इसीलिए माँ उसके लिए भूनने बैठी है, यह वह जानता था—फिर भी वह क्या कर सकता था?—इतनी देर से नीलू के घर पर क्या खेल चल रहा होगा? जब उसने बाहर के दरवाज़े पर पाँव रखा, माँ की पुकार फिर कानों में पड़ी—निकल गया क्या!—ओ अपू, वाह रे देखो तो लड़के का मज़ा! गरमागरम खाएगा—मैं जल्दी से घाट से आकर भूनने लगी—ओ अपू-ऊ-ऊ—

अपू एक दौड़ में नीलू के घर जा पहुँचा। बहुत-से लड़के जुटे थे, अपू के आने से पहले ही खेल ख़त्म हो चुका था। नीलू बोला—चल अपू, दक्खिन के मैदान में चिड़िया के बच्चे देखने चलेगा? अपू के राज़ी होने पर दोनों दक्खिन के मैदान में गए। धान के खेतों के उस पार ही नवाबगंज की पक्की सड़क पूरब-पश्चिम में लंबी होकर जैसे मैदान को बीच से चीरती चली गई थी। गाँव से एक मील से ज़्यादा होगा। अपू इतनी दूर कभी घूमने नहीं आया था—उसे लगा जैसे सारी जानी-पहचानी चीज़ों का घेरा छोड़कर न जाने कितनी दूर नीलू-दा उसे खींच लाया है! थोड़ी ही देर बाद वह बोला, घर चलो नीलू-दा, माँ मुझे डाँटेंगी, शाम हो जाएगी, मैं अकेले गाबतलार के रास्ते से नहीं जा पाऊँगा। तुम घर चलो—

लौटते समय नीलू रास्ता भटक गया। घूम-फिरकर किसी के एक बड़े आम के बाग़ के किनारे से एक रास्ता मिला। शाम होने में अभी कुछ देर थी, आकाश में फिर से बादल घिर रहे थे—ऐसे समय चलते-चलते नीलू अचानक ठिठककर खड़ा हो गया और अपू की कोहनी पर खींचकर सामने की ओर देखते हुए डरी हुई आवाज़ में बोला—ओ भाई अपू!

अपू अपने साथी के डर का कारण न समझकर बोला—क्या हुआ रे नीलू-दा? फिर उसने देखा, जिस पगडंडी से वे चल रहे थे, वह किसी के आँगन में जाकर ख़त्म हो गई थी—आँगन में एक छोटी-सी छप्पर की झोंपड़ी और एक बिलाती आमड़े का पेड़ था। उसके कुछ पूछने से पहले ही नीलू ने डरी हुई आवाज़ में कहा—आतूरी डायन का घर!

अपू का मुँह सूख गया....आतूरी डायन का घर!....शाम के वक़्त वे कहाँ आ पड़े थे! कौन नहीं जानता कि उसी आँगन के पेड़ से चोरी करके बिलाती आमड़ा तोड़ने के अपराध में उस डायन ने जेलेपाड़ा के किसी लड़के की जान निकालकर, अरबी के पत्ते में बाँधकर पानी में डुबो दिया था, बाद में मछली के उसे खा लेने के साथ ही बेचारे की आमड़ा खाने की साध इस जन्म के लिए मिट गई थी! कौन नहीं जानता कि वह चाहे तो आँखों की नज़र से छोटे बच्चों का ख़ून चूसकर उसे छोड़ दे, जिसका ख़ून पिया गया, उसे कुछ पता भी नहीं चलेगा, लेकिन घर जाकर खा-पीकर वह जो बिस्तर पर सोएगा, अगले दिन उठेगा नहीं! कितनी ही सरदी की रातों में रज़ाई के नीचे दुबककर दीदी के मुँह से आतूरी डायन की कहानी सुनते-सुनते उसने कहा था—रात में तू ये सब कहानियाँ मत सुनाया कर दीदी, मुझे डर लगता है,—तू वह कुँचबरण राजकुमारी वाली कहानी सुना तो।

धुँधली दृष्टि से उसने सामने देखने की कोशिश की कि घर में कोई है या नहीं और देखते ही उसका सारा शरीर जैसे जमकर बर्फ़ हो गया....बाड़ के बाँस की आगड़ेर के पास....कोई और नहीं, एकेबारे स्बय़ं आतूरी डायन उनकी—बल्कि जैसे सिर्फ़ उसी की ओर ताकती हुई खड़ी थी!....

जिसका इतना डर था, उसे एकेबारे सामने इस तरह खड़ा देखकर अपू के आगे-पीछे किसी भी ओर क़दम नहीं उठ रहे थे।

आतूरी बुढ़िया ने भौंहें सिकोड़कर, अपने पिचके गालों को और भी लटकाकर, अच्छी तरह ग़ौर करने के अंदाज़ में मुँह थोड़ा आगे बढ़ाकर क़दम-ब-क़दम उनकी ओर बढ़ने लगी। अपू ने देखा कि वह पकड़ा गया है, किसी भी ओर अब भागने का रास्ता नहीं है—चाहे जिस भी कारण से हो, डायन का ग़ुस्सा उसी पर है—अभी उसकी जान निकालकर अरबी के पत्ते में भर देगी!

मुँह का निवाला छोड़कर, माँ की पुकार पर पुकार की उपेक्षा करके वह जो आज माँ का दिल दुखाकर घर से निकला था, उसका यही फल मिलने जा रहा था। उसने असहाय होकर चारों ओर देखते हुए कहा—मैं कुछ नहीं जानता—ओ बुढ़िया मौसी—मैं अब कुछ नहीं करूँगा, मुझे छोड़ दो, मैं इधर फिर कभी नहीं आऊँगा—आज छोड़ दो ओ बुढ़िया मौसी—

नीलू तो डर के मारे लगभग रो ही पड़ा—लेकिन अपू को इतना डर लगा था कि उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।

बुढ़िया बोली—मुझसे क्या डर, ओ मेरे बच्चो? मुझसे क्या डर?....फिर, यह सोचकर कि उससे खूब मज़ाक किया जा रहा है, हँसकर बोली, मैं क्या बच्चों को पकड़ लूँगी? आओ मेरे घर आओ—आमचूर दूँगी, आओ—

आमचूर....डायन बुढ़िया फुसलाकर, बहलाकर घर में ले जाना चाहती है—गए तो बस गए।....डायनें, राक्षसियाँ ऐसे ही फुसलाकर जाल में फँसाती हैं—ऐसी कितनी ही कहानियाँ तो उसने माँ के मुँह से सुनी थीं।

अब वह क्या करे!....उपाय?

बुढ़िया उसकी ओर थोड़ा और आगे आते-आते बोली—क्या डर है ओ मेरे बच्चो? मैं कुछ नहीं कहूँगी, मुझसे क्या डर?

बस, सब ख़त्म! माँ की बात न सुनने का फल मिलने में अब देर नहीं, हाथ बढ़ाकर उन्होंने उसकी जान निकाली और अभी अरबी के पत्ते में भरी! हर पल उसे आशंका हो रही थी कि अभी यह बुढ़िया हँसता हुआ चेहरा बदलकर विकट मूर्ति धारण कर अट्टहास कर उठेगी—राक्षसी रानी की कहानी की तरह! जंगल के अजगर की दृष्टि के जादू में पड़कर हिरण का बच्चा नाकि दूसरी ओर आँखें नहीं फेर पाता, उसकी भी दोनों आँखों की जादू-भरी दृष्टि उसी तरह बुढ़िया के चेहरे पर दृढ़ता से टिकी थी—उसने जकड़ी हुई आवाज़ में बदहवास होकर कहा, ओ बुढ़िया मौसी, मेरी माँ रोएगी, मुझे आज और कुछ मत कहना—मैं तुम्हारे पेड़ से कभी आमड़ा लेने नहीं आया—मेरी माँ रोएगी—

आतंक से वह नीला पड़ गया था....घर, दरवाज़े, पेड़-पौधे, नीलू, चारों ओर जैसे धुँआ-धुँआ। कहीं कोई नहीं....केवल अकेला वह और आतूरी डायन की क्रूर दृष्टि से सनी एक जोड़ी आँखें....और बहुत दूर कहीं जैसे माँ और उसका भूजा खाने के लिए बुलाना!....

पर दूसरे ही क्षण अत्यधिक भय ने उसे एक तरह का मरिया साहस दे दिया, एक अस्पष्ट चीख के साथ वह जान बचाने की बदहवासी में सामने की भाँट, स्योढ़ा, रांगचिता की झाड़ियों को तोड़ता-लाँघता शाम के घिरते अँधेरे में जिधर दो आँखें गईं, भागा—नीलू भी भागा उसके पीछे-पीछे....

इनके डर का कारण न समझकर बुढ़िया ने सोचा—मैं मारने भी नहीं गई, पकड़ने भी नहीं गई—कच्चे बच्चे, क्या जानें मुझे देखकर क्यों डर गए शाम के वक़्त? बच्चा किनका था?

अपू जब घर आया, तब शाम ढल चुकी थी। सर्वजया ने अभी-अभी चूल्हा जलाकर ताड़ के बड़े भूनने का इंतज़ाम किया था, दुर्गा पास बैठकर ताड़ खुरचकर रस निकाल रही थी—बेटे को देखकर बोली—कहाँ था बता तो? उस दोपहर बाद निकला, आज तो कुछ खाया भी नहीं—भूख-प्यास नहीं लगती?

माँ को बताने लायक चीज़ें अपू के मन में ढेर बनकर इस तरह एक साथ बाहर आने की कोशिश कर रही थीं कि आपसी धक्कम-धक्का में एक-दूसरे का निकलने का रास्ता ही एक साथ बंद हो गया और अपू बिलकुल निशब्द हो गया। वह सिर्फ़ बोला—मैं क्या कपड़े बदलूँ माँ? यह मेरा दोपहर वाला कपड़ा है—

फिर उसने आश्चर्य से देखा कि माँ उसे भूजा देने का कोई उत्साह न दिखाकर, ताड़ का रस गाढ़ा है या पतला, यही अत्यंत मनोयोग के साथ जाँच रही है। जाँच पूरी हो जाने पर दुर्गा से बोली—दो-चार तलकर देखती हूँ, नहीं तो, बड़े तख्तपोश के नीचे चावल का आटा है, और दो मुट्ठी ले आना—फिर बेटे की ओर देखकर बोली—ठहर अपू, तुझे गरमागरम तलकर देती हूँ।

अपू बोला—क्यों माँ, चावल-चने का भूजा कहाँ है?

—तो चावल का भूजा तूने खाया कहाँ? इतनी बार बुलाया, तू निकलकर चला गया—ठंडा हो गया, दुर्गा ने खा लिया, तो यह बड़ा तो बस हो ही गया। तलूँगी और दूँगी—

अपू उस दोपहर बाद से मन में जो ताश का घर बना रहा था, एक फूँक में किसी ने उसे एकेबारे ज़मींदोज़ कर दिया। यह है उसकी माँ का प्यार! वह दोपहर बाद घर से निकलने के बाद से लगातार सोच रहा था—माँ न जाने उसके लिए कितना दुःख कर रही होगी। मेरा अपू अभी तक क्यों नहीं आया, उसके लिए इतनी मेहनत से घाट से आकर भूजा बनाया, अहा उसने दो दाने भी नहीं खाए—हाँ, दाय़ पड़िय़ाछे, उसके लिए सोचकर तो माँ की नींद हराम है—माँ तो मज़े से वे सब दीदी को खिलाकर निश्चिंत बैठी है—वही सिर्फ़ इतनी देर से बेकार में सोच-सोचकर मरा जा रहा था।

दुर्गा बोली—माँ जल्दी-जल्दी तलो। बहुत बादल घिर रहे हैं, बारिश आ गई तो और तला नहीं जाएगा,—घर में जो पानी टपकता है!—उस दिन जैसा होगा किन्तु।

देखते-ही-देखते चारों ओर घिरकर आते बादलों की छाया में बाँस के झुरमुटों की चोटी काली पड़ गई। खूब बादल घिरकर आकाश अँधेरा हो गया था, पर बारिश अभी शुरू नहीं हुई थी,—ऐसे समय मन में एक प्रकार का आनंद और कौतूहल होता है—न जाने कैसी भयंकर बारिश आएगी, पृथ्वी को शायद बहा ले जाएगी—अथच बारिश हर बार होती है, पृथ्वी किसी बार भी बह नहीं जाती, फिर भी यह मोह नहीं मिटता! दुर्गा का मन उसी अनजाने आनंद से भर उठा, वह बीच-बीच में दालान के किनारे आकर नीची छत की छाजन से मुँह निकालकर मेघाच्छादित अँधेरे आकाश की ओर देख रही थी।

सर्वजया ने कुछ बड़े तलकर कहा—यह कटोरी में करके उसे दे तो दुग्गा—उसे भूख लगी है, दोपहर बाद से कुछ खाया तो नहीं! यही आख़िरी बात काल हइल—इतनी देर तक अपू जैसे-तैसे था, लेकिन माँ के आख़िरी हिस्से के दुलार-भरे स्वर ने उसके अभिमान का बाँध एकेबारे तोड़ दिया, उसने बड़ों-सहित कटोरी आँगन में फेंककर कहा—मैं नहीं खाऊँगा तुम्हारे बड़े, कभी नहीं खाऊँगा—जाओ—

सर्वजया बेटे का कांड देखकर अवाक रह गई। ग़रीब की गृहस्थी, कितनी मुश्किल से क्या जुटाना पड़ता है, यह वही जानती थी। और यह हतभागा लड़का, दो-दो बार उसी कितनी मुश्किल से जुटाई मुँह की चीज़ को नष्ट करिल! क्षोभ और ग़ुस्से में वह बेटे की ओर देखकर बोली—आज तुझे हुआ क्या है! तेरे नसीब में आज राख लिखी है, जा अब वही गरमागरम खा।

अब अपू की बारी थी। ऐसी बात माँ के मुँह से उसने कभी नहीं सुनी थी। कहाँ वह चाह रहा था कि माँ दो प्यार-भरी बातें कहकर सांत्वना देगी, और कहाँ शाम के समय ऐसी निष्ठुर बात! वह खड़ा होकर बोला, अच्छा माँ, मैंने भूजा नहीं खाया, उससे मेरे मन को कष्ट नहीं होता? मैं क्या दोपहर से नहीं सोच रहा हूँ? मैं—मैं कभी तुम्हारे घर अब नहीं आ रहा हूँ—मैं राख खाऊँगा, क्यों मैं राख खाऊँगा? और दीदी क्या सारे अच्छे-अच्छे चीज़ें खाएगी? मैं नहीं आऊँगा तुम्हारे घर, कभी नहीं आऊँगा।

फिर वह आतूरी बुढ़िया के घर से अभी-अभी जिस तरह अँधेरे, काँटों के जंगल, आम के बाग़ की परवाह न कर भागा था, अभी भी ग़ुस्से में आत्महारा होकर दालान से उतरकर बाहर के आँगन की ओर ठीक उसी तरह मरिया होकर भागा। भाई की अभिमान-भरी दृष्टि, फूला हुआ होंठ और बात करने का ढंग दुर्गा को इतना हास्यकर लगा कि वह हँसते-हँसते लगभग लोट-पोट हो गई।—हि हि—अपू तो—एकदम पागल है माँ, कैसे बोला—फिर भाई के बोलने के ढंग की नकल करके बोली—मैंने भूजा नहीं खाया—हि हि—उससे क्या मुझे कष्ट नहीं होता? एकदम बुद्धू है—ओ अपू, सुन जा ओ अपू-ऊ-ऊ—

अपू दौड़कर चारदीवारी के पास के रास्ते से पीछे के बाँस के बाग़ की ओर भागा। आकाश में बादल अब भी थमे हुए थे; बाँस के झुरमुट के नीचे का हिस्सा झाड़-झंखाड़ से भरी, सुनसान, बरसाती शाम में घुप्प अँधेरा था। सामान्य अवस्था में ऐसी जगह पर इस समय अकेले आने की कल्पना भी वह किसी दिन नहीं कर सकता था। लेकिन इस समय चारों ओर की सुनसानी और अँधेरा, बाँस की झाड़ी में किसी चीज़ की खड़खड़ाहट, पास के सलतेखागी आम के पेड़ पर भूत की कहानियाँ, सब कुछ पूरी तरह भूलकर वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा—मैं तो कभी घर नहीं जाऊँगा!—इस जन्म में और घर नहीं जाऊँगा—

अभिमान का पहला ज़ोर कट जाने पर उसका थोड़ा गा छम्छम् करने लगा—डरते-डरते उसने एक बार दूर के सल्ते-खागी आम के पेड़ की ओर देखा। उसके मन में आया—अभी अगर कोई भूत मुझे उठाकर एकेबारे पेड़ की चोटी पर ले जाए तो कितना अच्छा हो—माँ ढूँढ़-ढूँढ़कर रो-रोकर मर जाए—सोचे, क्यों शाम को राख खा कहा, इसीलिए तो मेरा बच्चा ग़ुस्से में कहाँ अँधेरे में बादल सिर पर लिए निकल गया, और लौटकर नहीं आया। भूत के हाथों मर जाने पर माँ को कैसा कष्ट होगा, इसका उसने कुछ देर तक प्रतिहिंसा के आनंद में उपभोग किया। फिर वहाँ से वह जाकर चारदीवारी के पास के रास्ते पर खड़ा हो गया। उसे डर-डर लग रहा था—सामने की बाँस की झाड़ी में एक येन अस्पष्ट-सी आवाज़ हुई, अपू ने एक बार डरते-डरते आँखें उठाकर देखा। उसकी माँ और दीदी रानू के घर की ओर पुकार रही थीं—ओ अपू-ऊ-ऊ! बाँस की झाड़ी में फिर येन एक आवाज़ हुई। वह मन-ही-मन बड़ी बेचैनी महसूस करने लगा। लेकिन मुश्किल यह थी कि उसे खुशामद न की जाए तो वह ख़ुद इतने ग़ुस्से के सिर पर घर में घुस जाएगा, सचमुच इतना आत्मसम्मान-शून्य वह निश्चय ही नहीं है। इस बार उसकी दीदी रानू के घर की खिड़की से बाहर आ रही थी येन।

वह दौड़कर दरवाज़े के सामने चारदीवारी के कोने पर खड़ा हो गया।

अचानक आते-आते चारदीवारी के पास नज़र पड़ते ही दुर्गा चिल्लाकर बोल उठी, वो खड़ा है माँ!....ये देखो चारदीवारी के पास। फिर वह दौड़कर गई और भाई का हाथ पकड़ लिया। (भागने की कोई ज़रूरत नहीं थी)—ओरे दुष्ट, यहाँ चुपचाप खड़ा रहा जाता है, और मैं और माँ सारी जगह ढूँढ़ रहे हैं, यह देखो। दोनों ने मिलकर उसे पकड़कर घर के भीतर ले गए।

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