ज्येष्ठ मास के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते सर्वजया ने माँग-जाँचकर किसी तरह अपू के उपनयन का प्रबंध कर लिया। पराया घर, ठाकुर-दालान के बरामदे के कोने में डरते-डरते काम निपटाना पड़ा। बाम्नी मासी ने लड्डू बनाने में मदद की, दो-एक रसोइये-ब्राह्मण-ठाकुर को न्यौता दे आईं। बाहर के प्रतिष्ठित लोगों में वीरू गोमस्ता और दीनू खाँजाची ही आए। उपनयन बीत जाने के कुछ दिन बाद अपू अपने कमरे में बैठा लीला की दी हुई जिल्दवाली ‘मुकुल’ पढ़ रहा था। खुले दरवाज़े से कौन कमरे में घुसा! अपू को अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ, फिर वह बोल उठा — अरे, क्या बात है! कब आईं?
लीला कौतुक और हँसी से भरी आँखों से खड़ी थी। अपू बोला — वाह, बड़ी अच्छी हो तुम! कह कर गईं कि सोमवार को कलकत्ता से आऊँगी, कितने सोमवार बीत गए — लौटने का नाम ही नहीं!
लीला हँसकर फ़र्श पर बैठ गई। बोली — कैसे आती? स्कूल में दाख़िला हो गया है, बाबूजी ने दिलवा दिया है। बाबूजी की तबीयत ख़राब है, अब हम लोग कलकत्ता वाले घर में ही रहेंगे ना? अभी कुछ दिन की छुट्टी है तो माँ के साथ आई हूँ — फिर बुधवार को जाऊँगी।
अपू के मुँह से हँसी ग़ायब हो गई। बोला — अब तुम लोग यहाँ नहीं रहोगी?
लीला बोली — बाबूजी की तबीयत ठीक हो जाएगी तो फिर आएँगे।
फिर वह हँसते हुए बोली — ज़रा आँखें बंद करो तो?
— अपू बोला — क्यों?
— करो ना?
अपू ने आँखें मूँद लीं और साथ ही हाथों में किसी भारी चीज़ का स्पर्श महसूस किया। आँखें खोलते ही लीला खिलखिलाकर हँस पड़ी। एक कार्डबोर्ड का बक्सा उसकी गोद पर था। बक्सा खोलकर लीला ने दिखाया, देसी धोती-चादर और सुर्ख़ रेशम का एक पंजाबी कुर्ता। लीला ने हँसते हुए कहा — माँ ने दिया है — कैसा है? तुम्हारे जनेऊ के लिए।
धोती-चादर, ख़ासकर पंजाबी कुर्ता, बड़ी क़ीमत की चीज़ें थीं। इस्तेमाल करना तो दूर, इस घर में पैर रखने से पहले अपू ने कभी आँखों से भी नहीं देखी थीं।
लीला अपू के चेहरे की ओर देखकर बोली — एक महीने में तुम्हारा चेहरा बदल गया है? और बड़ा दिख रहा है, देखूँ नए ब्राह्मण का जनेऊ? — फिर, कान बिंधवाते हुए दर्द नहीं हुआ? मेरे छोटे ममेरे भाई का भी जनेऊ हुआ ना, वह तो रो पड़ा था।
— अचानक अपू ने ‘मुकुल’ की एक प्रति दिखाकर कहा — यह कहानी पढ़ी है तुमने?
— लीला बोली — क्या है, देखूँ?
अपू पढ़कर सुनाने लगा। समुद्र की तलहटी में कहीं स्पेन का एक धन-रत्नों से भरा जहाज़ दो-तीन सौ वर्ष पहले डूब गया था — आज तक बहुतों ने खोजा, पर कोई जगह का पता नहीं लगा पाया। कहानी अभी-अभी पढ़कर वह बहुत ख़ुश हुआ था।
बोला — कोई निकाल नहीं पाया, जानते हो कितना रुपया है? इकाई, दहाई, सैकड़ा, हज़ार, दस हज़ार, लाख — पचास लाख पाउंड का सोना-चाँदी... एक पाउंड में तेरह रुपये — गुणा करो तो ज़रा? फिर उसने जल्दी से एक काग़ज़ पर हिसाब लगाकर दिखाया — यह देखो, इतना रुपया!... इससे पहले भी वह एक बार हिसाब लगा चुका था। खिले हुए चेहरे से बोला — मैं बड़ा होकर जाऊँगा — जाकर देखूँगा — ठीक निकालूँगा देखना — किसी को अभी तक वहाँ का पता नहीं चला है।
लीला ने संदेह से कहा — तुम जाओगे? किस जगह है, तुम कैसे निकालोगे?
— यह देखो लिखा है, “पोर्तो प्लाता के निकट समुद्रगर्भ में” — ढूँढ निकालूँगा...
वह कहानी पढ़ते ही सोचने लगा था, अच्छा ही हुआ कि कोई नहीं निकाल पाया। सब लोग सब निकाल लेते तो उसके लिए क्या बचता? वह बड़ा होकर फिर क्या उठाता? अब उसके जाने तक वह बचा रहे तो अच्छा!
लीला की उम्र कम थी, पर वह बहुत समझदार थी। सोच-सोचकर बोली — उनके जैसा जहाज़ कहाँ पाओगे? तुम्हें एक अलग जहाज़ चाहिए — उनके जैसा।
— वह हो जाएगा, ख़रीदूँगा। बड़ा होने पर मेरे पास पैसा नहीं होगा क्या?
इस बार शायद लीला को काफ़ी विश्वास हो गया। उसने इस पर और कोई बहस नहीं की।
थोड़ी देर बाद बोली — तुम कलकत्ता गए हो?
अपू ने गर्दन हिलाकर कहा — मैंने कभी नहीं देखा — बहुत बड़ा शहर है? — इससे भी बड़ा?
लीला हँसकर बोली — बहुत, बहुत बड़ा।
— काशी से भी बड़ा?
— काशी मैंने नहीं देखी।
फिर वह अपू को अपने पढ़ने के कमरे में ले आई। एक कॉपी दिखाकर बोली — देखो तो कैसा फूल का पेड़ बनाया है, कैसी है ड्राइंग?
अपू थोड़ी देर बाद बोला — मैं सोने जाता हूँ, सिर में बहुत दर्द हो रहा है।
लीला बोली — रुको, मैं एक मंत्र जानती हूँ सिरदर्द ठीक करने का — देखूँ? फिर वह दोनों हाथों की उँगलियों से माथा इस तरह दबाने लगी कि अपू हँसते हुए बोल उठा — उफ़्, बड़ी गुदगुदी लगती है।
लीला हँसकर बोली — मेरे बड़े ममेरे भाई को एक पहलवान कुश्ती सिखाता है, उसी से सीखा है — अच्छा है ना? ठीक हो गया तो?
कुछ दिन बाद ही लीला लोग फिर कलकत्ता चले गए।
अपू माँ से कह-सुनकर एक छोटे से स्कूल में जाने लगा। जिस बड़ी सड़क के किनारे इनका घर था, वहाँ से कुछ दूर जाकर बाईं ओर एक छोटी गली के अंदर एकमंज़िला मकान में स्कूल था। पाँच-एक मास्टर, टूटी बेंचें, टूटे हत्थे वाली कुर्सियाँ, तेल-कालिख चढ़े ब्लैकबोर्ड, कुछ पुराने नक़्शे — यही स्कूल का सामान था। स्कूल के सामने ही खुली नाली थी, अपू की कक्षा की खिड़की से बाहर झाँकने पर बगल के घर की बिना चूने-रेत के काम वाली नंगी ईंटों की दीवार नज़र आती। वह स्कूल जाते-जाते देखता कि मेहतर नाली साफ़ करते हुए चल रहे हैं, जगह-जगह गंदगी जमा है। दिन भर स्कूल के अंदर एक बंद हवा की गंध रहती, पास वाला एक हिंदुस्तानी भुजियावाला दोपहर के बाद कोयले की आँच देता, कच्चे कोयले के धुएँ की मीठी-मीठी गंध निकलती, अपू के सिर के भीतर कैसा तो करने लगता — स्कूल से बाहर आकर भी वह गंध जाती नहीं थी।
उसका मन नहीं लगता, बिलकुल नहीं लगता। शहर के इस ईंट-सीमेंट के कारख़ाने में उसका दम घुटता है, साँस रुकने लगती है। किसी चीज़ की कमी से प्राण जैसे छटपटाते हैं, पर वह समझ नहीं पाता कि किस चीज़ की कमी है।
रास्ते में घास बहुत कम, पेड़-पौधे ज़्यादा नहीं, दो-एक यहाँ-वहाँ। सुर्खी का रास्ता, पक्की नाली, दो घरों के बीच की जगह में कूड़ा-करकट, गंदा पानी, फटे कपड़े, काग़ज़। एक दिन वह एक सहपाठी के साथ उनके घर गया था। एकमंज़िला खपरैल का घर। तंग आँगन के चारों ओर के कमरों में एक-एक घर किराएदार रहते हैं। दरवाज़े पर पुराने टाट के परदे। कमरों का फ़र्श आँगन से बित्ते भर से ज़्यादा ऊँचा नहीं, इसलिए नमी नहीं जाती। कमरों में रोशनी-हवा का कोई नामोनिशान नहीं। आँगन बुरी तरह गंदा, सभी गृहस्थों ने एक साथ कोयले की आँच दी थी, फिर वही मीठी-मीठी गंध। सब मिलाकर अपू को बहुत बुरा लगा, मन जैसे छोटा, इतना-सा हो गया। उस दिन उन लोगों के बैठने को कहने पर भी वह ज़्यादा देर नहीं रुक पाया, मुख्य सड़क पर आकर ही उसे थोड़ी राहत मिली थी।
घर लौटकर भी वही घुटन, बल्कि और ज़्यादा। यहाँ ईंट-सीमेंट और संगमरमर के पत्थरों से चारों ओर, यहाँ तक कि आँगन भी, पक्का किया हुआ है। अपू मिट्टी देखे बिना नहीं रह पाता, यहाँ जो मिट्टी है भी, वह भी जैसे कुछ और है। जिस मिट्टी से उसका परिचय है — यह वह मिट्टी नहीं लगती। इसके अलावा, इस घर में चलने-फिरने की आज़ादी कहाँ? रहना पड़ता है डर-डरकर, चोर की तरह! कौन क्या कह देगा, ऊँची आवाज़ में बात नहीं कर सकते, डर लगता है।
कभी-कभी अपू दफ़्तरख़ाने में जाकर देखता कि बूढ़ा ख़ाँजाची एक लोहे की सींखचों वाले पिंजरे जैसे कमरे में अँधेरे में बैठा रहता है। कई खुरदुरे जिल्द वाली हिसाब की बही एक तरफ़ ढेर लगी रहती हैं। छोटा-सा लकड़ी का हाथ-बक्सा सामने रखकर बूढ़ा दिन भर एक मैले, चिपचिपे तकिये का सहारा लिए बैठा रहता है। कमरे में इतना अँधेरा कि दिन में भी कभी-कभी अरंडी के तेल का छोटा-सा दीया जलता है। गिरीश गोमस्ता जमा-सचिवालय में बैठता है। नीचे तख़्तपोश पर मैली चादर बिछी है — चारों ओर दो कोनों में कपड़े में बँधे ढेरों दफ़्तर। वह कमरा ख़ाँजाचीख़ाने जितना अँधेरा नहीं, दो-तीन बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ भी हैं, लेकिन तख़्तपोश के नीचे तंबाकू के गुल और फटे काग़ज़ का ढेर और कड़ी-बरगों पर मकड़ी के जाले और केरोसिन की कालिख। जब वीरू मुहर्रिर हाँककर कहता — ओहे रामदयाल, देखो तो, पिछली तौज़ी में बाजा बजाने वाले मद में कितना ख़र्च लिखा है?... तभी न जाने क्यों अपू के मन में गहरी वितृष्णा फिर जाग उठती।
सुबह का वक़्त। अपू ड्योढ़ी के पास आया तो देखा कि घर के लड़के चेयर-गाड़ी को धकेलकर खेल रहे हैं। गाड़ी नई बनकर आई थी, डंडे लगी लोहे की कुर्सी, ऊपर चमड़े की गद्दी, बड़े-बड़े पहिये — चमचमाती दिख रही थी। वह पास आकर खड़ा-खड़ा देख रहा था, रमेन बोला — ए, आकर धकेल तो ज़रा हमें।
यह गाड़ी आने के बाद से ही अपू के मन में इस पर लालच था, ख़ुश होकर बोला — धकेलता हूँ, मुझे एक बार चढ़ने देंगे तो?
रमेन बोला — अच्छा, हो जाएगा, धकेल — ज़ोर से धकेलना।
काफ़ी देर खेलने के बाद रमेन ने अचानक कहा — अच्छा, इस पहर बहुत हो गया — रहने दे अब — फिर गाड़ी लेकर सबको जाते देख अपू बोला — मैं ज़रा-सा नहीं चढ़ूँगा?
रमेन बोला — अच्छा जा-जा, इस पहर और नहीं चढ़ते, ज़्यादा चढ़ने से फिर टूट जाएगी — देखा जाएगा उस पहर।
अपमान से अपू की आँखों में आँसू आ गए। वह इतनी देर से उम्मीद में इन सबको जी-जान से धकेलता रहा था।
बोला — वाह, आपने तो कहा था कि मुझे एक बार अपनी बारी में चढ़ने देंगे? मैंने सबको धकेला — बड़े अच्छे हैं आप! उस दिन भी तो ऐसे ही नहीं चढ़ाया था आख़िर में।
रमेन बोला — क्यों धकेला तूने, नहीं धकेलता तो तेरी मर्ज़ी — जा — किसने कहा तुझे चढ़ने देंगे? गाड़ी ख़रीदने में पैसे नहीं लगते?
उसने कहा — क्यों, आपने भी तो कहा, उस संतू ने भी तो कहा — धकेल-धकेल कर मेरा हाथ दुख गया — और मैं क्या एक बार भी — बड़े अच्छे हैं आप!
रमेन गरम होकर बोला — मैंने नहीं कहा, जा।
संतू बोला — फु-र्र-र्र, — बेवक़ूफ़ देखा है?
कुछ नहीं, अचानक बड़े बाबू के बेटे टेबू ने आकर उसके गले में हाथ डालकर धकेलते हुए कहा — जा-जा — हम नहीं चढ़ाएँगे, हमारी मर्ज़ी — तू अपने घर की तरफ़ जा — इधर क्यों आता है खेलने?
टेबू अपू से उम्र में छोटा था, इसलिए चाहे उसके किए अपमान के कारण हो या सबके मज़ाक़-उपहास के कारण — अपू का दिमाग़ ठिकाने नहीं रहा — उसने झटका देकर गर्दन छुड़ाई और टेबू को एक धक्का मारा, जिससे टेबू घूमकर दीवार पर जा गिरा — माथा दीवार से लगने से थोड़ा कट गया और ख़ून निकलने लगा, साथ ही टेबू ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर रो उठा।
नौकर-चाकर दौड़कर आए, ख़ानसामा-दारबान दौड़कर आए — ऊपर बैठकख़ाने में बड़े बाबू सुबह कचहरी कर रहे थे, वह दलबल के साथ नीचे उतर आए। दस दिशाओं से दस घड़े पानी... हवा... जलपट्टी, हो-हल्ला मच गया!
शोरगुल थोड़ा कम होने पर बड़े बाबू बोले — कहाँ है, किसने मारा है देखूँ? रामनिहोरा सिंह दारबान ने पीछे से धकेलकर अपू को बड़े बाबू के सामने खड़ा कर दिया।
बड़े बाबू बोले — यह कौन है? वही काशी वाली बाम्नी ठाकरुण का बेटा ना?
गिरीश सरकार आगे आकर बोला — बड़ा ही बदमाश लड़का है — और इसकी ढिठाई अगर आप सुनें बाबू, उस बार थिएटर के दिन, बैठा है बिलकुल सबके मुँह के सामने बाबू लोगों की जगह पर, खिसककर बैठने को कहा, तो मुँहज़ोरी पर उतर आया! उस दिन फिर देखा कि उन सेठों के घर के मोड़ पर सड़क पर एक लाल पंजाबी पहनकर बर्ड्सआई सिगरेट पीता हुआ आ रहा था — इसी उम्र में तैयार हो गया है!
बड़े बाबू ने रमेन से कहा — सुबह आज तुम्हारा मास्टर नहीं आया था? पढ़ाई-लिखाई नहीं थी? ए, मेरी बेंत की छड़ी लाना तो कोई? इसके साथ मिलकर खेलने को किसने कहा था तुम लोगों को?
रमेन ने रोनी सूरत बनाकर कहा — यही तो हमारे खेलने के समय आता है, हम क्यों जाएँ, पूछ लीजिए संतू से — आपकी वो तस्वीर वाली अंग्रेज़ी मैगज़ीन की तस्वीरें देखना चाहता है — फिर बड़े बैठकख़ाने में घुसकर यह-वह उलट-पलटकर देखता है।
गिरीश सरकार बोला — देखिए, शौक़ तो देखिए ज़रा!
अब अपू की बारी। बड़े बाबू बोले। इधर आओ — टेबू को क्यों मारा?
डर के मारे अपू की जान पहले ही उड़ चुकी थी, उसने ग़ुस्से में धक्का तो दे दिया था पर इतने बड़े कांड के लिए तैयार नहीं था। उसने जकड़ी हुई ज़बान से बड़ी मुश्किल से उच्चारण किया — टेबू ने मुझे पहले तो — मुझे —
बड़े बाबू ने बात पूरी नहीं करने दी और बोले — टेबू की उम्र कितनी है और तुम्हारी उम्र कितनी, जानते हो?
ठीक से कहना जानता तो अपू की तरफ़ से यह भी कहा जा सकता था कि टेबू की उम्र भले ही कुछ कम हो, पर कामों में वह अपू के जेठामशाय नीलमाणि राय से भी ज़्यादा पका है। कहा जा सकता था कि टेबू और इस घर के सब लड़के बिना वजह जब-तब उसे बंगाली कहकर चिढ़ाते हैं, बेवक़ूफ़ दिखाते हैं, पीछे से सिर पर ठोकते हैं — वह तो बस थोड़ा खेलने चला जाता है, यही उसका अपराध है। लेकिन आँगन-भरे लोगों की भीड़ की जिज्ञासु नज़रों के सामने, ख़ासकर बड़े बाबू से बात करते हुए उसकी ज़बान तालू से चिपक गई थी — वह सिर्फ़ बोला — टेबू ने भी — मुझे यूँ ही — मुझे आकर —
बड़े बाबू गरजकर बोले — स्टूपिड, ढीठ छोकरा — किसने कहा तुम्हें इधर आकर इनके साथ मिलने-जुलने को — लाओ तो बेंत — आगे आओ — आओ।
सपाक् से एक ज़ोरदार चोट पीठ पर पड़ते ही वह किसी हैरत भरी नज़र से बड़े बाबू और उनकी दोबारा उठी हुई बेंत की छड़ी की ओर देखने लगा — जीवन में उसने इससे पहले कभी मार नहीं खाई थी, बाबूजी से भी नहीं — उसका चकराया हुआ मन जैसे पहले तो मार खाने की सच्चाई को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था — फिर उसने कुछ-कुछ अपने-आप ही बेंत को रोकने के लिए दोनों हाथ उठा लिए। लेकिन इस बार उसे इस बात का कोई दुःख नहीं रहा कि अपनी बारी में वह चूक गया। बेंत की सपासप आवाज़ सुनकर टेबू को भी माथे का दर्द भूलकर देखना पड़ा। रसोइये के बेटे की हिम्मत फिर न हो, बड़े बाबू ने इस विषय में उसे अच्छी शिक्षा ही दी। कोई और बेंत होता तो टूट जाता, यह बेंत शायद बहुत महँगा था।
१९२८ के हिसाब से एक पाउंड की क़ीमत भारतीय मुद्रा में १३ रुपये थी।
बड़े बाबू ने हाँफते हुए सुस्ताकर कहा—बुड्ढा-धाड़ी बिगड़ैल छोकरा कहीं का, आज तुम्हें आगाह किए देता हूँ, फिर अगर सुना कि इस घर के किसी लड़के के साथ घुले-मिले हो—तो कान पकड़कर इसी वक्त घर से निकाल दूँगा—फिर किसी की ओर देखकर बोले—देखिए तो धीरेन बाबू, विधवा माँ है, सतीश बाबू मैनेजर काशी से ले आए, सोचा अपनी जात की लड़की है, यहीं रहे—अब ज़रा कांड देखिए, माँ भात पकाती है और ये जनाब पंजाबी पहनकर सिगरेट फूँकते घूमते हैं।
धीरेन बाबू बोले—ये सब तो ऐसे ही होते हैं—इसके बाद कोकेन पिएगा—माँ का बक्सा तोड़ेगा—इसका यही दस्तूर है—ऊपर से काशी का लड़का—
घर के अंदर सारी बातें नहीं पहुँचतीं, पर अपु के पिटने की बात सर्वजया ने सुन ली।
और ज़रा अच्छी तरह ही सुन ली। गृहिणी बोलीं—अगर ऐसा गुंडा लड़का हो तो बेटा—इत्यादि। रोटी-घर से आकर उसने देखा कि अपु स्कूल जा चुका है, माँ से कुछ नहीं कहा, ऐसी बातें वह कभी माँ से कहता भी नहीं था। क्रोध, दुःख और क्षोभ से सर्वजया का पूरा बदन झनझना उठा, मानो पूरे शरीर से आग की लपटें निकल रही हों, कमरे में रहा नहीं गया तो वह बाहर की सँकरी-सी बरसाती में आकर खड़ी हो गई।
उसके अपु के बदन पर हाथ! वो जो अब भी कहता है, माँ, जब तुम रात में सीढ़ियों वाले घर से रसोई-घर की ओर आओगी तो तुम्हें एक दिन ऐसा डराऊँगा?...उसमें कोई बुद्धि है क्या? कितनी चोट लगी होगी, वहाँ कौन उसे समझा होगा, किसने उसका रोना सुना होगा?
सर्वजया का सीना फटकर रुलाई उमड़ पड़ी...
अँधेरी रात...आकाश में दो-एक तारे झिलमिला रहे हैं—अस्तबल के ऊपर आँवले के पेड़ की डालों में हवा उलझती है, दालान के कोने में लोहे के टूटे हौद के पास बैठकर यह बात सोचते-सोचते रुलाई के आवेग में उसका पूरा शरीर काँपने लगा—
—ठाकुर, ठाकुर, वह मेरा बड़ा दुलारा धन है, तुम तो जानते हो कि वह एक पल को भी आँखों से ओझल हो तो मैं स्थिर नहीं रह पाती, जो भी सज़ा देनी है, मुझे दे दो, ठाकुर, उसे कुछ मत कहना, मेरा कलेजा फट जाता है ठाकुर, मैं यह सह नहीं पाऊँगी—
अपु के स्कूल की छुट्टी जल्दी हो गई। उसकी कक्षा के लड़कों ने ज़िद पकड़ ली कि उनके फुटबॉल के खेल में अपु को रेफरी बनना होगा। अपु बड़ा खुश हुआ, फुटबॉल का खेल उसने इस शहर में आने से पहले कभी नहीं देखा था, वह बहुत अच्छा खेल भी नहीं पाता, फिर भी कक्षा के लड़के उसे ही सबसे ज़्यादा पसंद करते थे, खेल में रेफरी बनने के लिए अकसर उसी को बुलाया जाता था।
उसने कहा—मैं घर से वो बड़ी वाली सीटी ले आता हूँ भाई, बक्से में पड़ी है, मैं ठीक चार बजे मैदान में पहुँच जाऊँगा—
रास्ते में आते-आते अपु को सुबह वाली बात याद आ गई। आज सारा दिन वह उसी के बारे में सोचता रहा था। बर्डसाई सिगरेट पीते हुए उस दिन गिरीश सरकार के सामने पड़ गया था, यह बात तो सच थी, लेकिन क्या वह रोज़-रोज़ बर्डसाई पीता है? उस दिन मेझो-बहूरानी की दी हुई लाल पंजाबी पहनकर स्कूल से लौटते हुए उसे अचानक शौक चर्राया था, कि ऐसे पंजाबी पहनकर बाबू लोग बर्डसाई पीते हैं, वह भी एक बार पीएगा। इसलिए नाश्ते के पैसे से बर्डसाई खरीदकर वह सुलगाकर पी रहा था, लेकिन उस एक दिन निश्चिन्दिपुर में छिपकर पीते हुए भी अच्छा नहीं लगा था, और उस दिन भी नहीं लगा। उसे लगा था—धत्! यह न खरीदकर एक पैसे के चने-भुने खरीदता तो कितना अच्छा होता! लोग इसे क्यों खरीदकर पीते हैं, पता नहीं; लेकिन गिरीश सरकार ने बिना जाने-बूझे उसे भला-बुरा क्यों कहा?
किस्मत अच्छी थी कि लीला यहाँ नहीं है। अगर होती और देख लेती तो बड़ी शर्म की बात होती। माँ को भी शायद पता नहीं चला। माँ को पता न चल जाए, इसी डर से तो वह दोपहर में जल्दी स्कूल चला आया था!
लीला कितने दिनों से यहाँ नहीं आई! पिछले साल गई थी, फिर नहीं आई। अब अगर आएगी भी तो क्या वे लोग उसे उससे बात करने देंगे?
घर लौटते ही ड्योढ़ी के पास आकर उसने सुना कि ऊपर बैठकखाने में ग्रामोफोन बज रहा है। आवाज़ कान में पड़ते ही वह खुशी और उत्सुकता से भरी आँखों से मुँह ऊँचा करके दूसरी मंज़िल की खिड़की के नीचे सड़क पर खड़ा हो गया। सड़क से गाने के बोल सब समझ में नहीं आ रहे थे, लेकिन धुन बड़ी प्यारी थी, उसे सुनते-सुनते—स्कूल, खेल, रेफरीगिरी, दोपहर की मार, मन से सब कुछ बिलकुल पुँछ गया।
गाने के सुर में उसका मन अपने-आप न जाने कहाँ उड़ जाता—जैसे तब निश्चिन्दिपुर में नदी किनारे घूमते हुए कितने ही दिन देखता था, उस पार उलूखर के मैदान में छोटे-छोटे लाल फूलों से भरे सेमल के पौधे, उनके पीछे कितनी दूर नीले आकाश की पृष्ठभूमि—मानो खस का मैदान चित्रित हो, लाल फूलों वाले सेमल के पौधे चित्रित हों, सूखी डाल पर बैठा कोई पक्षी भी जैसे चित्र हो। उन सबके पीछे वह देश, बहुत-बहुत दूर का वह देश—कौन-सा देश है उसे पता नहीं, बस मन की खुशी में वह पकड़ में आ जाता था।
जैसे कोई पुकार रहा हो, कितनी दूर से उल्लास-भरे आनंद से पगे किसी परिचित स्वर की पुकार आती है—अपु-ऊ-ऊ-ऊ-ऊ—
मन खुशी से भरकर जवाब देता है—आ-आ-आ-या-आ-आ-आ—उनके छोटे-से कमरे में लौटने पर माँ ने पूछा—जल्दी आ गया आज?
उसने कहा—ऊपर की क्लास के लड़के बॉल के खेल में जीत गए हैं, इसीलिए हाफ-स्कूल हो गया—
उसकी माँ बोली—आ, यहाँ बैठ। कुछ देर बाद उसके बदन पर हाथ फेरते-फेरते, थोड़ा हिचकिचाकर बोली—आज तुझे उन्होंने किसी बात पर बुलाया था क्या, कुछ डाँटा-वांटा?
—नाः, वो टेबू को ज़रा-सी चोट लग गई थी, इसीलिए बड़े बाबू बुलाकर पूछ रहे थे कि क्या हुआ है—बस—
—डाँटा-फटकारा तो नहीं?
—नाः—
उसकी माँ कुछ देर चुप रहकर बोली—एक बात सोच रही हूँ, यहाँ से चला जाएगा?
वह आश्चर्य से माँ के मुँह की ओर देखने लगा। फिर अचानक खुश होकर बोल उठा—कहाँ माँ, निश्चिन्दिपुर? वाह, यह तो बहुत अच्छा है, चलो, मैं वहाँ ठाकुरजी की पूजा करूँगा—जनेऊ तो हो ही गया है—अपना देश है, बड़ा मज़ा आएगा—अब यहाँ नहीं रहेंगे—
सर्वजया बोली—यह बात तो मैं भी दो साल से सोच रही हूँ। तू वहाँ जाने को कह रहा है, पर बता तो वहाँ अब है क्या? एक घर है, सो भी तीन साल से बरसात का पानी झेल रहा है, इतने दिनों में उसका कुछ बचा होगा क्या? मनधाता के ज़माने का पुराना घर—थोड़ी-सी धान की ज़मीन थी, सो भी—जाकर सिर छिपाने की जगह भी नहीं है—दुश्मनों को हँसवाने जाना...कुछ देर चुप रहकर बोली—एक काम किया जा सकता है, चल बल्कि—अच्छा, काशी चलेगा?
कुछ विशेष तय नहीं हुआ। उसकी माँ ने अभी तक खाया नहीं था। स्नान करके वह फिर से रसोई-घर में चली गई। अपु के मन में एक बात आई। उसका गला गाने लायक है, दीदी कहती थी, जात्रा-दल वाले दोस्त ने भी उस बार कहा था। अगर वह किसी जात्रा-दल में चला जाए, तो क्या वे उसे नहीं लेंगे? यहाँ माँ को बड़ा कष्ट है। यहाँ से वह माँ को लेकर चला जाएगा!
उफ़, क्या गरमी है! रसोई-घर के नल से धुआँ कुंडली मारकर उठ रहा है, कार्निस पर धूप...कमरे के भीतर अभी से अँधेरा...अस्तबल में मताबीया साईस कुछ हिंदी में बड़बड़ा रहा है...पत्थर से बँधे फर्श पर घोड़े के खुरों की खट्-खट् आवाज़...नाले की वही गंध...उसका सिर ऐसा दुख रहा है जैसे फट पड़ेगा। उसने सोचा...अभी थोड़ा सो लेता हूँ, फिर उठकर खेलने के मैदान में जाऊँगा—अभी तो तीन ही बजे हैं—अभी धूप बहुत तेज़ है।
बिस्तर पर लेटकर एक ही बात बार-बार उसके मन में आने लगी। इस बात को उसने इतने दिनों तक इस तरह से सोचकर नहीं देखा था। इतने दिन जैसे उसके मन के किसी कोने में हर समय यह बात स्पष्ट रूप से जाग्रत रहती थी कि इन सबके अंत में जैसे उनका गाँव प्रतीक्षा कर रहा है—उनके लिए! यद्यपि वहाँ से चले आते समय लौटने की कोई बात ही नहीं थी—यह वह जानता है, फिर भी यह मोह उसका बिलकुल टूटा नहीं था।
लेकिन आज की तमाम घटनाओं से, विशेषकर माँ और बड़े बाबू की बातों से, उनकी निराश्रयता और गृहहीनता का पहलू उसके सामने बिलकुल स्पष्ट हो गया। क्या वह अब कभी अपने गाँव नहीं लौट पाएगा? —कभी नहीं?—कभी नहीं?
यह परदेस, यह गिरीश सरकार, यह चोर बनकर रहना—या फिर माँ-बेटे का हाथ पकड़कर छिन्न-भिन्न होकर सड़कों पर भटकना—क्या यही सब स्थायी होने के लिए आया है?
अस्तबल में दो साईसों में झगड़ा छिड़ गया है, रसोई-घर की छत पर कौओं का दल भात के लालच में झुंड का झुंड जुट रहा है—कुछ देर बाद उसे लगा, वह एक ही बात कितनी देर से सोच रहा है, एक ही बात। अस्तबल में घोड़े के खुरों की आवाज़ थमी नहीं है...वह जैसे ज़मीन के अंदर कहीं धँसता जा रहा है...बहुत, बहुत ज़मीन के अंदर...नीचे की ओर जैसे कोई खींच रहा है...बड़ा आराम...सिरदर्द नहीं है, बड़ा आराम...
उफ़—कैसी चिलचिलाती धूप है! दीदी भी क्या करती है—इतनी धूप में चड़ुइभाति! वह कह रहा है—दीदी, सो जा, इतनी धूप में चड़ुइभाति?
रानू-दी कानों के पास बैठकर न जाने क्या-क्या बातें, बहुत सारी बातें कहे जा रही है। रानू-दी की छलछले बड़ी-बड़ी आँखें अभिमान से भरी हैं। वह क्या करे? निश्चिन्दिपुर में उनका गुज़ारा नहीं होता न? रानू-दी...या लीला?
हारान काका बाँस की बाँसुरी बेचने के लिए लाकर बजा रहे हैं...बड़ी प्यारी बजाते हैं! उसने पिता से कहा—एक पैसे की बाँस की बाँसुरी खरीदूँगा बाबा, एक पैसा देंगे?...
उसके पिता उसके बड़े-बड़े बाल कानों के पास सँवारते हुए प्यार से कह रहे हैं—तेरी कहानी बहुत अच्छी बनी है, छपकर आए तो मुझे दिखाना खोका?
वह कह रहा है—कोकेन क्या होता है बाबा? गिरीश सरकार ने कहा है कि मैं कोकेन खाऊँगा—पिता के गले में कमल-बीज की माला है। बिलकुल उन कथावाचक की तरह।
उनके माझेरपाड़ा का स्टेशन। लकड़ी के बड़े तख्ते पर लिखा है, मा-झे-र-पा-ड़ा। वह आगे-आगे भारी-सा गट्ठर पीठ पर लिए, माँ पीछे-पीछे। उसके बदन पर लाल पंजाबी है। सारे रास्ते में कैसी छाया है। आकाश में संध्या का तारा उग आया है। पके हुए बड़ के फलों की गंध से भरी हवा।
निश्चिन्दिपुर का रास्ता जैसे खत्म ही नहीं हो रहा...वह चला जा रहा है...चला जा रहा है...चला जा रहा है...वह और माँ...इस रास्ते पर वह कभी अकेला नहीं आया, वह रास्ता पहचान नहीं पा रहा...ओ हँसिया-हाथ वाले काका, सुन रहे हैं, निश्चिन्दिपुर का रास्ता ज़रा बता दीजिए न हमें? यशड़ा-निश्चिन्दिपुर, बेत्रवती के उस पार?
उसकी माँ ने कमरे में घुसकर कहा—अरे, उठ, ओ अपु, अब तो दिन रहा नहीं, कह रहा था कि कहीं खेलने जाएगा?—उठ, उठ।
वह माँ की पुकार पर हड़बड़ाकर बिस्तर पर उठ बैठा और चारों ओर देखने लगा—उफ़, कितना दिन ढल गया है!...धूप तो बिलकुल न जाने कहाँ चढ़ गई है? उसकी माँ बोली—कह रहा था कि कहीं खेलने जाएगा, तो गया क्यों नहीं? बेला-कुबेला पड़े-पड़े कैसी नींद ली है तूने? निकाल दूँ तेरी वह सीटी?
संदूक से निकालकर माँ ने सीटी तो बिस्तर के कोने में रख दी, पर उसने रेफरीगिरी करने जाने का कोई उत्साह नहीं दिखाया। कमरे के भीतर अभी से अँधेरा! उठकर खिड़की के पास आया और अनमने भाव से चुपचाप खड़ा होकर बाहर की ओर देखता रहा। दिन बिलकुल नहीं बचा है। एक असह्य घुटन! अस्तबल के नाले की गंध जैसे और बढ़ गई है। फाटक पर लगी घंटागाड़ी में ठं-ठं करके शायद छः बज रहे हैं।
वह जो अस्तबल के ऊपर आकाश है, उसी के उस पार पूरब में बहुत दूर उनका निश्चिन्दिपुर है।
आज कितने दिनों से उसने निश्चिन्दिपुर नहीं देखा—ती-न बरस! कितना लंबा अरसा।
वह जानता है, निश्चिन्दिपुर उसे दिन-रात हर समय पुकारता है, शाँखारीपुकुर पुकारता है, बाँसों का वन पुकारता है, सोनाडांगा का मैदान पुकारता है, कदमतला का साहब-घाट पुकारता है, देवी विशालाक्षी पुकारती हैं।
उजाड़ भिटे पर मीठे नींबू के फूलों की गंध में, सहजन की छाया-छाया में फिर कब आना-जाना होगा? फिर कब उनके घर के पास वाले सिरीष और अमलतास के वन में पक्षियों का कलरव गूँजेगा?
इतने दिनों में वहाँ उनकी इछामती में बरसात की बाढ़ आ गई होगी। घाट के रास्ते पर सेमल के पेड़ के नीचे तक पानी चढ़ आया होगा। झाड़ियों-झाड़ियों में नाटा-काँटा और बनकलमी के फूल खिल गए होंगे। वन-अपराजिता के नीले फूलों से जंगल का सिर ढँक गया होगा।
उनके गाँव के घाट पर कुँज की झाड़ी के पास राजू काका शायद अब तक अपनी आदत के मुताबिक बेला-कुबेला स्नान करने उतरे होंगे, चालतेपोता के मोड़ पर नए कछार के जंगल के किनारे-किनारे अक्रूर माँझी मछली पकड़ने के लिए दोय़ाड़ी लगा रहा होगा, आज वहाँ हाट का दिन है, ठाकुरझी-तालाब वाले उस वट-वृक्ष के पीछे क्षितिज में कहीं लाल आग के झाग की तरह सूर्य अस्त हो रहा होगा, और उसी के धूल-धूसरित पगडंडी पर गाँव के लड़के पटु, नीलू, तीनू, भोला सब हाट करके लौट रहे होंगे।
इतने में उनके वन से घिरे घर के आँगन में घनी छाया उतर आई होगी, किच्-किच् करके पक्षी चहचहा रहे होंगे, वही मीठी, निश्शब्द, शांत संध्या—वही पीला पक्षी आज भी आकर चहारदीवारी के ऊपर कचनार की डाल पर वैसे ही बैठता होगा, माँ के हाथ के लगाए नींबू के पौधे में शायद अब तक नींबू फल रहे होंगे...
और कुछ देर बाद उनके उस भिटे पर संध्या का अँधेरा घिर आएगा, लेकिन उस संध्या वहाँ कोई साँझ का दीया नहीं जलाएगा, कोई आरती नहीं दिखाएगा, कोई रूपकथा नहीं सुनाएगा। जनहीन भिटे के कालमेघ की झाड़ियों से भरे आँगन में झींगुर बोलेंगे, गहरी रात में पीछे के घने जंगल में जगडूमर के पेड़ पर लक्ष्मी-उल्लू की आवाज़ सुनाई देगी...कोई कभी उस ओर झाँकेगा भी नहीं, घने जंगल में दबे माँ के उस नींबू के पौधे का पता किसी को कभी नहीं चलेगा, उड़-कलमी के फूल खिलकर अपने-आप झड़ जाएँगे, बेर और शरीफे यूँ ही पकेंगे, पीले पंखों वाला तेड़ो पक्षी रो-रोकर फिरेगा।
वन के किनारे वे अपूर्व मायामय संध्याएँ यूँ ही व्यर्थ उतरती रहेंगी, हमेशा। दोपहर में भरे आँगन में लोगों के सामने बिना-विचारे मार खाकर भी उसकी आँखों से एक बूँद आँसू नहीं निकला था, लेकिन अब सूने कमरे की खिड़की पर अकेले-अकेले खड़े होकर अचानक वह फूट-फूटकर रो पड़ा, उमड़ते हुए आँसू झर-झर करके बहकर उसके सुंदर कपोलों को भिगोने लगे, तो आँखें पोंछने के लिए हाथ उठाकर व्याकुल स्वर में मन-ही-मन बोला—भगवान, हमारा निश्चिन्दिपुर लौटना हो जाए—तुम यही करना, हम ठीक निश्चिन्दिपुर पहुँच जाएँ—नहीं तो मैं जीऊँगा नहीं—तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ—
पथ के देवता प्रसन्न होकर हँसते हुए कहते हैं—मूर्ख बालक, मेरा पथ तो तुम्हारे गाँव के बाँस-वन में, ठग वीरू राय के वट-वृक्ष तले या धलचिति के खेवा-घाट की सीमा पर समाप्त नहीं हुआ! तुम्हारे सोनाडांगा का मैदान छोड़कर, इछामती को पार कर, कमल-पुष्पों से भरे मधुखाली के बिल के पास से कतराकर, बेत्रवती की नौका से पार उतरकर, मेरा पथ तो आगे, आगे, बस आगे ही आगे चला गया है...देश छोड़कर परदेस की ओर, सूर्योदय को तजकर सूर्यास्त की दिशा में, ज्ञान की परिधि को लाँघकर अपरिचय के उद्देश्य से...
दिन और रात गुज़र जाते हैं, जन्म और मरण पार हो जाते हैं, मास, वर्ष, मन्वन्तर, महायुग बीतते चले जाते हैं... तुम्हारे मरणधर्मा जीवन-स्वप्नों पर काई और फफूंद की परतें जम जाती हैं, पर मेरा पथ तब भी समाप्त नहीं होता... चलता जाता है... चलता जाता है... चलता जाता है... बस आगे ही बढ़ता चला जाता है...।
इसकी अनिर्वाण वीणा को सुनते हैं केवल अनंत काल और अनंत आकाश...
इस पथ की विचित्र आनंद-यात्रा का अदृश्य तिलक तुम्हारे ललाट पर लगाकर ही तो तुम्हें घर-बार छुड़वा दिया है!...
चलो, आगे बढ़ें।
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