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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · तीसरा परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

तीसरा परिच्छेद

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कुछ दिन बाद।

खुकी शाम ढलते ही लेट गई थी। घर में उसकी पीति नहीं थी, आज दो महीने से ऊपर हो गए, एक दिन उसकी माँ से किसी बात पर झगड़ा-झंझट होने के बाद वह रूठकर दूर गाँव में किसी रिश्तेदार के घर चली गई है। माँ का शरीर इतने दिनों से बहुत अस्वस्थ था, इसलिए उसकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था। अभी कल से माँ के सौरी-घर में जाने के बाद से वह कब खाती है, कब सोती है, इस पर किसी का ध्यान नहीं।

खुकी लेटे-लेटे जब तक नींद नहीं आई, पीति के लिए रोती रही। वह रोज़ रात में रोती है। उसके बाद रात गए किसी की बातचीत सुनकर जाग गई और देखा कि कुड़ुनी की माँ दाई रसोईघर के पिछवाड़े खड़ी बातें कर रही है, पड़ोस के नेड़ा की दादी और भी कोई-कोई मौजूद हैं। सब जैसे व्यस्त और चिंतित थे। खुकी कुछ देर जागती रही, फिर लेट गई।

बाँसवन में हवा लगने से सर्र-सर्र की ध्वनि हो रही थी, सौरी-घर में दीया जल रहा था और कोई बातें कर रहा था। बरामदे में चाँदनी फैली थी, ठंडी हवा में थोड़ी देर बाद वह सो गई। कुछ रात गए, नींद में एक अस्पष्ट कोलाहल और शोर सुनकर उसकी नींद फिर टूट गई। उसके पिता कमरे से निकलकर सौरी-घर की ओर दौड़ते हुए व्यग्रता से कह रहे थे — कैसी हैं खुड़ी? क्या हुआ? सौरी-घर के भीतर से उसे एक अजीब-सी आवाज़ सुनाई दी। वह आवाज़ उसकी माँ की थी। अँधेरे में नींद की खुमारी में वह कुछ समझ न सकी और थोड़ी देर चुपचाप बैठी रही। उसे डर-सा लग रहा था। माँ ऐसा क्यों कर रही है? माँ को क्या हुआ?

वह कुछ और देर बैठी रही, पर कुछ समझ न पाने के कारण लेट गई और थोड़ी ही देर में सो गई। कितनी देर बाद, उसे नहीं पता — कहीं बिल्ली के बच्चों की म्याऊँ-म्याऊँ से उसकी नींद टूट गई। उसे चट से याद आया कि पीति के कमरे के बरामदे पर टूटे चूल्हे के अंदर वह शाम को मेनी बिल्ली के बच्चे छिपा आई थी — छोटे, मुलायम-से बच्चे, जिनकी आँखें अभी तक नहीं खुली थीं। उसने सोचा — अरे बाप रे! कहीं उन बच्चों को हुलो बिल्ला आकर खा तो नहीं गया… ज़रूर खा गया होगा।

नींद-भरी आँखों से उठकर वह तेज़ी से अँधेरे में पीति के बरामदे पर गई और चूल्हे के अंदर हाथ डालकर देखा कि बच्चे निश्चिंत होकर सो रहे हैं। हुलो बिल्ले का कहीं कोई निशान नहीं था। फिर वह हैरान-सी होकर लौट आई, लेट गई और थोड़ी ही देर में सो गई।

पर नींद में फिर कहीं बिल्ली के बच्चे म्याऊँ-म्याऊँ कर रहे थे।

अगले दिन उठकर वह आँखें मल ही रही थी कि कुड़ुनी की माँ दाई ने कहा, “ओ खुकी, कल रात तेरा एक भाई हुआ है, देखेगी नहीं? अरे माँ, कल रात इतना हो-हल्ला, इतना कांड हो गया — तू थी कहाँ? जो हुआ था, कालपुर पीर की दरगाह पर सिन्नी चढ़ाने से बड़ी खैर रही रात में।”

खुकी एक दौड़ में सौरी-घर के दरवाज़े तक पहुँची और झाँकने लगी। उसकी माँ सौरी-घर की खजूर-पत्तियों की बाड़ से सटकर सो रही थी। एक नन्हा-सा, एकदम लाल, असंभव रूप से छोटा, लगभग काँच की एक बड़ी गुड़िया से कुछ ही बड़ा-सा जीव, कथरी में लिपटा सो रहा था — वह भी। उपलों की आग के धीमे-धीमे धुएँ में ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। वह कुछ देर खड़ी रही, तभी वह जीव आँखें खोलकर मिचमिचाता हुआ देखने लगा और अपने असंभव रूप से छोटे हाथ हिलाकर नितांत दुर्बल भाव से, अत्यंत क्षीण स्वर में रो उठा। इतनी देर बाद खुकी समझी कि रात में बिल्ली के बच्चों की पुकार जिसे वह समझ रही थी, वह क्या थी। हू-ब-हू बिल्ली के बच्चों की आवाज़ — दूर से सुनने पर कुछ समझने का उपाय नहीं। अचानक उस असहाय, असंभव रूप से छोटे, नितांत नन्हें भाई के लिए दुःख, ममता और सहानुभूति से खुकी का मन भर आया। नेड़ा की दादी और कुड़ुनी की माँ दाई के मना करने पर वह इच्छा होते हुए भी सौरी-घर में घुस नहीं सकी।

माँ के सौरी-घर से बाहर आने पर खुकी नन्हे की छोटी-सी पालकी झुलाते-झुलाते कितने ही गीत और लोरियाँ गाती। साथ-ही-साथ कितनी ही शामों की बातें, पीति की बातें याद आकर उसकी आँखें आँसुओं से भीग जातीं। इस तरह की कितनी ही लोरियाँ पीति सुनाती थी! नन्हे को देखने के लिए पड़ोस के लोग उमड़ पड़ते। सब देखकर कहते, “घर उजालने वाला नन्हा हुआ है, क्या सर पर बाल हैं, क्या रंग है!” आपस में बातें करते-करते जाते — “देखा, नौ-दी? क्या हँसी है!”

खुकी बस यही सोचती कि काश, उसकी पीति एक बार आकर देख लेती! सब देख रहे हैं, और उनकी पीति ही न जाने कहाँ चली गई — क्या अब कभी लौटकर नहीं आएगी? वह बच्ची थी, पर इतना समझती थी कि इस घर में न पिता, न माँ, कोई भी पीति से प्यार नहीं करता, उसे लाने के लिए कोई पहल नहीं करेगा। दिन में पीति के कमरे की ओर देखने से मन उदास हो जाता, कमरे का किवाड़ किसी-किसी दिन खुला ही पड़ा रहता। बरामदे पर चमगादड़ों की बीट जम गई है। आँगन में वैसी झाड़ू भी नहीं लगती, यहाँ-वहाँ कुकुरमाछी के पौधे, वहाँ घुइयाँ के पौधे उग आए हैं — क्या पीति ऐसा होने देती? खुकी की बड़ी-बड़ी आँखें आँसुओं से भर जातीं — वह लोरी, वह सारी कहानियाँ खुकी कैसे भूल सकती है।

उस दिन हरि पालित की बेटी ने आकर उसकी माँ से कहा, “तुम्हारी बुढ़िया को घाट के रास्ते पर देखा, खेत की तरफ से एक लोटा और पोटली हाथ में लिए आ रही है — आकर चक्कोत्ति महाशय के घर में घुसकर बैठी है, जाओ दुर्गा को भेज दो, हाथ पकड़कर बुला लाए, तब जाकर गुस्सा उतरेगा।”

हरि पालित के ही घर में बैठी बुढ़िया तब पड़ोस की औरतों के मुँह से हरिहर के बेटे होने की कहानी सुन रही थी।

“ओ पिती!”

बुढ़िया ने चौंककर देखा, दुर्गा हाँफ रही थी, जैसे बहुत तेज़ी से दौड़कर आई हो। बुढ़िया ने उत्सुकता से दुर्गा को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया — साथ-ही-साथ दुर्गा कूदकर बुढ़िया की गोद में जा गिरी — उसके मुँह पर हँसी थी, पर आँखों में आँसू। आँगन में जो औरतें और बहुएँ मौजूद थीं, उनमें से कई की आँखों में आँसू आ गए। हरि पालित की अनुभवी पत्नी ने कहा — “ले जाओ ठाकुर बहन, यह तुम्हारे पिछले जन्म की बेटी थी, वही बेटी तुम्हारी फिर लौट आई है।”

घर आने पर नन्हे को देखकर तो बुढ़िया हँसते-रोते बेहाल हो गई। कितने दिनों बाद इस आँगन में फिर चाँद उगा था।

बुढ़िया सुबह उठकर बड़ी खुशी से भीतरी आँगन में झाड़ू लगाती, खरपतवार का जंगल साफ़ करती। दुर्गा को लगता, इतने दिनों बाद अब जाकर घर-गृहस्थी ठीक से चल रही है, इतने दिन जैसे कुछ ठीक नहीं था।

दोपहर में भोजन करके बुढ़िया पिछवाड़े बाँसवन के ऊपर बैठकर कूँची काटती। उस तरफ और नदी के किनारे तक लोगों की बस्ती नहीं थी, नदी वैसे बहुत पास नहीं थी, लगभग एक पाव मील दूर — यह सारा इलाका बस बड़े-बड़े आम के बाग़, घने बाँसवन और दूसरे जंगलों से भरा था। कूँची काटते समय दुर्गा आकर पास बैठ जाती, ऊल-जलूल बकती रहती। छोटी-सी एक बोझ कटी हुई कूँची जमा हो जाने पर दुर्गा उसे उठाकर घर के अंदर रख आती। कूँची काटते-काटते दोपहर की अलसाई छाँव में, शीतल बाँसवन की छाया में बुढ़िया के मन में तरह-तरह की बातें आतीं।

कितनी पुरानी बातें थीं सब।

वह तीन बार आए थे — सपने जैसा याद पड़ता है। एक बार वह पोटली में कुछ खाने को लाए थे। विश्वेश्वरी तब दो बरस की थी। सबने कहा, मिश्री — चीनी के डले जैसी। लोटे के पानी में घोलकर उसने भी थोड़ा-सा खाया था। फिर एक आदमी आया — पुराने उस अमरुद के पेड़ के पास ठीक शाम के समय आकर खड़ा हुआ, ससुराल के देश से आया था, एक चिट्ठी। चिट्ठी पढ़ने वाला कोई नहीं था, तभी गोलोक भी पिछले साल मर गया था — ब्रज काका के चंडीमंडप में चौपड़ की महफ़िल में वह ख़ुद वह चिट्ठी लेकर गई थी। उस दिन की बात आज साफ़ याद है — नौ-ज्येठा, मेज-ज्येठा, ब्रज काका, उस पार के पतित राय के भाई — यदु राय, और था गोलोक का साला भजहरि। चिट्ठी पढ़ी सेज-ज्येठा ने। हैरान होकर पूछा — “यह चिट्ठी कौन लाया रे, इन्दिर?” उसके बाद इन्दिर ठाकरुण को घर आकर तुरंत हाथों की चूड़ियाँ और पहली जवानी की साध की चीज़, माँ-बाप की दी हुई चाँदी की पहुँचियाँ उतारकर रखनी पड़ीं और माथे का सिंदूर पोंछकर नदी में स्नान करके आना पड़ा। कितने ज़माने की बात — वह सब सपना हो गया है, फिर भी लगता है जैसे कल की ही बात हो!

निवारण की बात याद आती है — निवारण, निवारण! ब्रज काका का बेटा निवारण! सोलह बरस का लड़का, क्या दमकता हुआ रंग, क्या बाल! वह जो चंडीमंडप लता-झाड़ियों में ढँक गया है, बाँसवन के बीच — उसी कमरे में वह कठिन ज्वर से शय्यागत होकर मरते-मरते भी दो-तीन दिन रहा। हाय, लड़का हरदम पानी-पानी करता था, पर ईशान कविराज ने पानी देने से मना किया था — सौंफ की पोटली बस थोड़ी-थोड़ी चुसाई जा रही थी। निवारण चौथे दिन रात को मर गया, मृत्यु से ज़रा पहले भी वही पानी-पानी उसके मुँह पर रटा था — फिर भी एक बूँद पानी उसके मुँह से नहीं लगाया गया। उस लड़के के मरने के बाद पाँच दिनों तक बड़ी खुड़ी के मुँह में किसी ने पानी नहीं डलवाया — पाँच दिन बाद जेठ रामचाँद चक्कोत्ति ख़ुद भाई की बहू के कमरे में जाकर हाथ जोड़कर बोले, “तू चली गई तो मेरा क्या होगा? इस बुढ़ापे में कहाँ जाऊँगा माँ?” बड़ी खुड़ी एक रईस ख़ानदान की बेटी थीं — जगद्धात्री जैसी रूपवान, वैसी सुंदर बहू उस इलाके में नहीं थी। पति के चरणोदक पिए बिना कभी पानी नहीं पीती थीं — उस ज़माने की गृहिणी, खाना बनाकर रिश्तेदारों-पड़ोसियों को खिलाकर ख़ुद तीसरे पहर थोड़ा-सा खाती थीं। दान-पुण्य, अन्न-वितरण में साक्षात अन्नपूर्णा थीं। लोगों को पकाकर खिलाना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। इसलिए जेठ की बातों से शायद मन के कोमल हिस्से में चोट लगी — उसके बाद वह उठी थीं और पानी भी पिया था, पर ज़्यादा दिन नहीं जी सकीं, बेटे की मौत के साल भर के अंदर ही वह भी बेटे के पीछे चली गईं।

“एक बूँद पानी दे दे माँ — बस ज़रा-सा दे दे —”

“पानी नहीं पीते, छिः बाबा — कविराज महाशय ने मना किया है — पानी नहीं पीते —”

“बस ज़रा-सा — एक घूँट पी लूँ माँ — तेरे पाँव पड़ता हूँ…।”

दोपहर की पंछियों की पुकार में सुदूर पचास बरस के पार से बाँसों की सरसराहट कानों में तैर आती है।

खुकी कहती है — “पिती, तुझे नींद आ रही है? चल, सोएगी।”

हाथ का दाँव रखकर बुढ़िया कहती है — “ये देख, फिर मनहूस झपकी लग रही है — बेवक़्त अब और नहीं सोऊँगी माँ — ये सब ख़त्म कर लूँ — ला तो ज़रा वह बड़ी वाली डंडी?”

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