यह बात सर्वजया ने घाट पर मुहल्ले की औरतों के मुँह से सुनी।
आज कई दिनों से नीरेन और अन्नदा राय के बीच, ख़ास तौर पर उनके बेटे गोकुल के साथ, मनमुटाव चल रहा था। कल दोपहर को तो जैसे तूफ़ान ही आ गया — ख़ूब झगड़ा और चीख-पुकार मची। नतीजा यह हुआ कि कल रात ही नीरेन अपना सारा सामान लेकर वहाँ से चला गया। अन्नदा राय की पड़ोसन, यज्ञेश्वर दीघड़ी की पत्नी हरिमति कह रही थीं — सच-झूठ तो राम जानें, कई दिनों से तरह-तरह की बातें तो सुन ही रही हूँ — पर मैं तो बापू विश्वास नहीं करती, बहू वैसी नहीं है। फिर यह भी सुनने में आया कि नीरेन ने छिपकर उसे रुपये दिए थे, बहू ने वो रुपये कहीं भिजवा दिए थे, और नीरेन के हाथ की लिखी रसीद लौटकर गोकुल के हाथ लग गई, ये सब बातें। — ख़ैर छोड़ो बापू, दूसरे की निंदा सुनकर भी क्या होगा? सुना है, नीरेन कह रहा था — आप सब मिलकर एक अकेली पर अत्याचार कर सकते हैं, उसमें कोई दोष नहीं? आप जो चाहें सोचें, बहू-ठाकुरानी बस एक बार हुक़्म दें तो मैं इसी घड़ी उन्हें अपनी खोई हुई माँ की तरह सिर पर बिठाकर ले जाऊँगा। उसके बाद आप लोगों को जो करना हो, कर लीजिएगा। फिर काफ़ी देर तक ख़ूब हो-हल्ला होता रहा — शाम होने से पहले ही उसने ग्वाले के मुहल्ले से एक गाड़ी बुलवाई, सामान लादा और चला गया।
यह सुनकर सर्वजया का दिल बैठ गया। इधर उसने अपने पति से कहकर अन्नदा राय को नीरेन के पिता के पास इस विवाह के संबंध में पत्र लिखने का अनुरोध किया था। नीरेन को दो बार और घर पर न्योता दिया था — लड़का उसे बहुत पसंद आ गया था। हरिहर ने उसे कई बार समझाया था कि नीरेन के पिता बड़े आदमी हैं — क्या वे अपने बेटे का ब्याह उनके घर में करेंगे? पर सर्वजया ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी, उसके मन के किसी कोने में जैसे कोई हिम्मत बँधी थी — यह रिश्ता कोई दूर की कौड़ी नहीं, यह होकर रहेगा। हरिहर को मन-ही-मन विश्वास न होने पर भी पत्नी के अनुरोध पर उसने अन्नदा राय से कई बार तक़ाज़ा किया था। लेकिन अब तो बड़ी मुसीबत आ पड़ी!
इसी बीच एक दिन रास्ते में दुर्गा की भेंट गोकुल की बहू से हो गई। उसने चुपके-चुपके दुर्गा से बहुत-सी बातें कहीं, नीरेन क्यों चला गया, उसी की कहानी। कहते-कहते उसकी आँखें छलक आईं और झर-झर आँसू बहने लगे।
—ऐसी ही झाड़ू-लात खाते-खाते दिन कटेंगे — मेरा कोई नहीं है दुर्गा — भाई भी ऐसा नहीं कि उसके पास जाकर दो घड़ी चैन पा सकूँ, ऐसी कोई जगह ही नहीं —
सहानुभूति से दुर्गा का हृदय भर आया, साथ-ही-साथ अपनी चाची पर लगे कलंक के खिलाफ़ तीव्र विरोध और उसके दुःख में सांत्वना देने वाले कई शब्द अस्पष्ट रूप से उसके मन में उमड़-घुमड़ रहे थे। सारी बातें सँभालकर कह न पाने के कारण बस इतना ही बोली, वह सखी-ठाकुरमाँ जैसी औरत है! कहने दो न उसे, वह क्या कर लेगी? रोओ मत चाची, तुम मेरी अच्छी चाची हो न, मैं रोज़ तुम्हारे पास आया करूँगी —
सर्वजया ने सुना तो बड़े चाव से पूछा — बहू ने कुछ कहा-वहा क्या दुर्गा?... नीरेन के बारे में कोई बात हुई?
दुर्गा ने लजाते हुए कहा — तुम कल घाट पर पूछ लेना न? मुझे नहीं मालूम।
अपु ने एक बार पूछा — चाची से क्या सुना, मास्टर साहब अब नहीं आएँगे? दुर्गा ने डाँटकर कहा — मैं क्या जानूँ — जा!
ढलती धूप में छाया-भरा रास्ता मन में कैसी उदासी जगा रहा था। यह उदासी उसके भाई के लिए थी। उसके साथ ऐसा होता है, कितनी ही बार हुआ है, अगर वह ज़्यादा देर घर पर न रहे, या भाई को न देखे, तो भाई के हज़ारों काल्पनिक दुःखों की बातें सोच-सोचकर मन कैसा तो करने लगता है।
उसका वह दूध-जैसे उजले रंग का, सोने की गुड़िया-जैसा भाई मैला, आधी-फटी-सी धोती पहने घर के दरवाज़े के सामने अकेला आपनमने कौड़ियाँ फेंककर बेगनु-बीची का खेल खेल रहा है। वह उससे पैसे माँगता है यह-वह ख़रीदने के लिए, पर वह दे नहीं पाती — मन में बड़ी तकलीफ़ होती है।
कुछ दिन बाद। भुवन मुख़र्जी के घर रानू की दीदी का ब्याह तो ख़त्म हो गया था, पर अभी भी सारे मेहमान-रिश्तेदार गए नहीं थे। लड़के-बच्चे भी बहुत थे। एक छोटी-सी लड़की से दुर्गा की ख़ूब जान-पहचान हो गई थी, उसका नाम था टुनी। उसके पिता भी आए थे। आज दोपहर के बाद वे अपनी पत्नी और बेटी को कुछ दिनों के लिए यहाँ छोड़कर अपने काम पर चले गए। घंटे-भर बाद, सेजठाकुरानी इस कमरे में कुछ काम कर रही थीं कि टुनी की माँ की आवाज़ उनके कानों में पड़ी। सेजठाकुरानी दालान में आकर बोलीं — क्या हुआ री हँसी, क्या बात है? टुनी की माँ उत्तेजित और बेचैन होकर बिस्तर-तकिया टटोल रही थी, झाँक रही थी, गद्दा उलट-पलट रही थी; बोली — अभी थोड़ी देर पहले मैंने सोने की सिंदूर की वह डिबिया यहीं बिस्तर के पास रखी थी, ठीक यहीं, इतने में खोका झूले में रोने लगा, और ये भी घर से आ गए — उसे उठाना याद ही नहीं रहा, अब मिल ही नहीं रही, पता नहीं कहाँ गई?
सेजठाकुरानी बोलीं — अरे, यह क्या? हाथ में लेकर तो नहीं चली गई? — नहीं दीदीमाँ, यहीं रखकर गई थी। अच्छी तरह याद है, ठीक यहीं।
सबने मिलकर थोड़ी देर चारों तरफ़ ख़ूब ढूँढ़-ढाँढ़ की, पर डिबिया का कोई पता नहीं चला। सेजठाकुरानी ने पूछकर जाना कि दालान में पहले तो इसी घर के बच्चे थे, फिर जब खाने के लिए बुलावा आया तो सब बच्चे खाना खाने चले गए, तब बाहरी लोगों में सिर्फ़ दुर्गा थी। सेजठाकुरानी की छोटी बेटी टेपी ने चुपके-से कहा — हम लोग जैसे ही खाना खाने गए, मैंने देखा कि दुर्गा दीदी पिछवाड़े के दरवाज़े से बाहर जा रही हैं, अभी-अभी फिर आई हैं।
सेजठाकुरानी ने चुपके-चुपके कुछ सलाह की, फिर रूखे स्वर में दुर्गा से बोलीं — डिबिया दे दे दुर्गा, कहाँ रखी है, बोल? अभी निकाल, मैं कहती हूँ —
दुर्गा का मुँह सूखकर ज़रा-सा हो गया था, सेजठाकुरानी के हाव-भाव देखकर उसकी ज़बान जैसे मुँह के अंदर ही जड़ हो गई। उसने अस्पष्ट-सा कुछ कहा जो ठीक से समझ में नहीं आया।
टुनी की माँ इतनी देर से कुछ नहीं बोली थी — सब लोग मिलकर एक भले घर की लड़की को चोर ठहरा रहे थे, यह देखकर वह थोड़ी हैरान रह गई थी, ख़ासकर दुर्गा को वह कुछ दिनों से यहाँ देख रही थी, देखने में अच्छी-सुंदर थी इसलिए दुर्गा उसे पसंद भी थी — वह चोरी करेगी, यह क्या संभव है? वह बोली — शायद इसने नहीं ली है सेज-दी — वह क्यों — सेजठाकुरानी बोलीं — तुम चुप रहो तो! तुम क्या जानो इसे, इसने लिया है या नहीं, यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ —
एक औरत बोली — अगर ले ली है तो निकालकर दे दे, या बता दे कहाँ है — बखेड़ा ख़त्म हो। दे दे, मेरी बच्ची, झूठ क्यों —
दुर्गा जैसे सुध-बुध खो बैठी थी — उसके पाँव थर-थर काँप रहे थे — उसने दीवार का सहारा लेकर खड़े होते हुए कहा — मैं तो नहीं जानती काकीमाँ — मैं तो —
सेजठाकुरानी बोलीं — तेरे कहने से ही मैं मान लूँगी? इसी ने ली है — इसके हाव-भाव देखकर मैं समझ गई हूँ। अच्छा, सीधी तरह से कह रही हूँ, कहाँ रखी है, दे दे, चीज़ दे देगी तो कुछ नहीं कहूँगी — मुझे तो अपनी चीज़ मिलने से मतलब है —
वही पहली वाली मेहमान औरत बोलीं — भले घर की लड़की चोरी करती है, यह तो मैंने कभी नहीं सुना। इसी मुहल्ले में घर है क्या?
सेजठाकुरानी बोलीं — तू सीधी बातों से मानने वाली नहीं है! अब तू मज़ा देखेगी, मेरे घर की चीज़ लेकर हज़म करने चली है — क्या समझ रखा है तूने? — मैं आज तुझे —
फिर उन्होंने दुर्गा का हाथ पकड़कर घसीटते हुए दालान के बीचों-बीच ले आईं और बोलीं, दुर्गा, अभी भी बता, कहाँ रखी है?... नहीं बताएगी?... न, तू तो जानती ही नहीं, तू तो बच्ची है — तू कुछ नहीं जानती — ‘जल्दी बोल, नहीं तो अभी तेरे दाँतों की पूरी पाटी तोड़कर चूर-चूर कर दूँगी!’ बोल जल्दी — बोल, अभी भी कह रही हूँ —
टुनी की माँ हाथ पकड़ने के लिए आगे आ रही थी कि एक मेहमान औरत बोली, रुको न, देख नहीं रही हो, इसी ने ली है। चोर की दवा मार ही है — अभी दे देगी तो मामला ख़त्म, — झूठ-मूठ का क्यों —
दुर्गा के सिर के अंदर सब घूम रहा था। उसने बेबसी से चारों ओर देखा और बड़ी मुश्किल से सूखी ज़बान से लड़खड़ाते हुए कहा — मैं तो नहीं जानती काकीमाँ, वे सब चले गए तो मैं भी तो — बात करते-करते वह डर से सिकुड़कर सेजठाकुरानी की तरफ़ नज़र टिकाए दीवार की ओर सरकने लगी।
फिर सबने मिलकर उसे और कुछ देर समझाया। पर उसकी वही एक रट थी — वह नहीं जानती।
—किसी ने कहा — पक्की चोर है —
टेपी बोली — बाग़ के आमों को तो नीचे गिरने की मोहलत ही नहीं मिलती काकीमाँ —
शायद इस आख़िरी बात ने सेजठाकुरानी के किसी पुराने ज़ख़्म पर चोट कर दी। वह अचानक कड़कती आवाज़ में चीख़ीं — तो ठहर री पाजी, नीच, चोरों की औलाद, तू चीज़ नहीं देगी? मैं देखती हूँ तू देती है कि नहीं देती! बात ख़त्म करने से पहले ही उन्होंने दुर्गा पर झपट्टा मारा और उसका सिर पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से दीवार पर पटकने लगीं। बोल, कहाँ रखी है — बोल, अभी बोल — जल्दी बोल — बोल —
टुनी की माँ जल्दी से दौड़कर आई और सेजठाकुरानी का हाथ पकड़कर बोली, यह क्या कर रही हैं, क्या कर रही हैं सेज-दी — रहने दीजिए मेरी डिबिया — इस तरह क्यों मार रही हैं? — छोड़ दीजिए — बस, हो गया, छोड़िए, छिः! माँ को देखकर टुनी रो पड़ी। वही पहली मेहमान औरत बोलीं — अरे, ख़ून निकल रहा है...
दुर्गा की नाक से झर-झर ख़ून बह रहा था, किसी ने ध्यान नहीं दिया था। उसके कपड़ों का कुछ हिस्सा ख़ून से लाल हो उठा था।
टुनी की माँ बोली — जल्दी से थोड़ा पानी ला टेपी — ओसारे पर बाल्टी में है, देख —
चीख-पुकार और हो-हल्ला सुनकर पास के लोहारों के घर की नौकरानियाँ-बहुएँ देखने आ गईं कि क्या मामला है। रानू की माँ इतनी देर से वहाँ नहीं थीं — दोपहर के खाने-पीने के बाद लोहारों के घर बैठकर गपशप कर रही थीं — वह भी आ गईं।
मार की चोट से दुर्गा का सिर झाँय-झाँय कर रहा था, वह हक्की-बक्की-सी भीड़ में एक बार ताककर न जाने क्या देखने लगी।
पानी आने पर रानू की माँ ने उसकी आँखों-मुँह पर छींटे मारे और उसे पकड़कर बिठाया। उसके सिर में झिमझिमी-सी हो रही थी, वह बदहवास-सी बैठ गई। रानू की माँ बोलीं — इस तरह कोई मारता है भला, सेज-दी?... दुबली-पतली लड़की है — छिः —
—तुम लोग इसे अभी पहचानते नहीं। चोर की दवा मार के सिवा और कुछ नहीं, यह मैं कहे देती हूँ — अभी तो मार का हुआ ही क्या है — अगर चीज़ न मिली तो क्या मैं छोड़ दूँगी? हरि राय मुझे चाहे इसके बाद सूली पर चढ़ा दे —
रानू की माँ बोलीं — हो गया, अब उसे ज़रा सँभलने तो दो सेज-दी — जो कांड किया है तुमने —
टुनी की माँ बोली — हे माँ, इतना कुछ होगा यह जानती तो कौन डिबिया की बात करता?... नहीं चाहिए मुझे अपनी डिबिया — उसे छोड़ दो सेज-दी —
सेजठाकुरानी इतनी आसानी से छोड़तीं या नहीं, कहा नहीं जा सकता, लेकिन लोगों की राय उनके खिलाफ़ जाने लगी थी।... इसलिए उन्हें मुल्ज़िम को छोड़ने के लिए मज़बूर होना पड़ा।
रानू की माँ ने उसे पकड़कर उधर का दरवाज़ा खोला और पिछवाड़े के आँगन में निकाल दिया। बोलीं — आज बड़े ही मनहूस वक़्त पर घर से निकली थी तू! जा, धीरे-धीरे जा — टेपी, पिछवाड़े का दरवाज़ा ठीक से खोल दे —
दुर्गा बदहवास-सी पिछवाड़े के दरवाज़े से बाहर निकल गई, वहाँ मौजूद औरतें और बाक़ी सब उसे जाते हुए देखने लगे।
एक ने कहा — फिर भी क़बूल नहीं किया — देखा तो इसे ज़रा?... आँख से लेकिन एक बूँद आँसू नहीं गिरा —
रानू की माँ बोलीं — आँसू क्या गिरेंगे, डर से सूख गए हैं। आँखों में अब आँसू बचे भी हैं क्या?
इस तरह कोई मारता है भला, सेज-दी
© 2026 Matribhasa Hindi. Public Domain
Comments (0)
Log in to join the conversation.