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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · पच्चीसवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

पच्चीसवाँ परिच्छेद

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कई दिनों से घमासान वर्षा हो रही थी। अन्नदा राय के चंडीमंडप में संध्या को महफिल जमती। उस दिन वहाँ नीलकुठी की झूठी कहानियों से शुरू होकर बात पुरी के किसी मंदिर के शिखर पर रखे पाँच मन भारी चुंबक पत्थर तक जा पहुँची, जिसके आकर्षण के बल से पास के समुद्र से गुज़रते जहाज़ अक्सर राह भटककर किनारे की डूबी चट्टानों से टकराकर टूट जाते थे—अरब की कहानियों जैसे न जाने कितने किस्से-कहानियों का दौर चल रहा था। श्रोताओं में से किसी के भी उठने की इच्छा न थी, ऐसी अजब-गज़ब कहानियों को छोड़कर किसी का घर जाने का मन नहीं हो रहा था। भूगोल से कहानियों की धारा जल्द ही ज्योतिष पर आ पहुँची। दीन चौधरी कह रहे थे—भृगु संहिता जैसी दूसरी कोई पुस्तक नहीं! आप जाइए, बस अपनी जन्म-राशि बता दीजिए, और वह आपके पिता का नाम, किस कुल में जन्म हुआ, भूत-भविष्य सब बता देगी—आप मिला लीजिएगा—ग्रह और राशि-चक्र के जितने भी योग होते हैं—वे सब उसमें दिए हैं कि नहीं? यहाँ तक कि आपका पिछला जन्म भी—

सब बड़े चाव से सुन रहे थे, लेकिन राममय ने अचानक बाहर की ओर देखकर कहा—नहीं, अब उठना चाहिए, इसके बाद जाना नहीं हो पाएगा—देख नहीं रहे हो—देख नहीं रहे हो माजरा? कोई बड़ा झोंका-वोंका न आए तो बच जाएँ, हाल-चाल बहुत खराब हैं, चलो सब—

बारिश का कोई विराम नहीं था। ज़रा-सा रुकती, और फिर उतनी ही तेज़ी से आ जाती, बौछारों की वजह से चारों ओर धुँआ-धुँआ था।

हरिहर ने कुल पाँच रुपये भेजे थे, उसके बाद न तो कोई पत्र आया, न ही पैसे। उसे भी बहुत दिन हो गए थे—रोज़ सुबह उठकर सर्वजया सोचती कि आज खर्च ज़रूर आएगा। बेटे से कहती, “तू खेलता-कूदता फिरता है इसलिए देख नहीं पाता, डाक-बक्से के पास बैठा रहा कर—डाकिया जैसे ही आए, वैसे ही पूछ लेना—”

अपू कहता—वाह, मैं क्या बैठा नहीं रहता? कल ही तो पूँटी के घर चिट्ठी आई, हमें अखबार देकर गया—पूँटी से जाकर पूछ आओ? कल फिर हमारा अखबार कैसे आया? मैं नहीं रहता हूँ भला?

वर्षा पूरे ज़ोरों पर थी। अपू माँ की बात मानकर राय लोगों के चंडीमंडप में डाकिया की आस में बैठा रहता। साधु कर्मकार के घर की छाल से कबूतरों का झुंड भीगते-भीगते, पंख फड़फड़ाते हुए उड़कर राय लोगों के पश्चिमी घर की कंगनी पर आ बैठता, वह टकटकी लगाए देखता रहता। आकाश की गरज से वह बहुत डरता था। बिजली चमकती तो मन-ही-मन सोचता—देवता कैसी मशाल जला रहे हैं, देखा, अब ठीक गरजेंगे—और फिर वह आँखें मूँदकर कानों में उँगलियाँ डाल लेता।

घर लौटकर देखता कि माँ और दीदी ने पूरी दोपहर भीग-भीगकर ढेरों कचू का साग तोड़ा है और रसोईघर के बरामदे में ढेर लगा दिया है।

अपू बोला—कहाँ से लाईं माँ? उफ़, कितना सारा!

दुर्गा हँसकर बोली—कितना! ऊँ-हूँ! तुम्हें तो बैठे-बैठे बड़ी सुविधा है!... उन्हीं के पोखर के पास जामुन के पेड़ के नीचे से—इतना, एक घुटना पानी! जाओ तो ज़रा?...

सुबह घाट पर जाते हुए नाइन-बहू से भेंट हो गई। सर्वजया ने कपड़े के भीतर से काँसे की एक रिकाबी निकाली और बोली, देखो तो ज़रा चीज़, बहुत अच्छी है—भारी-भरकम नहीं, कुछ नहीं, एकदम फूल-काँसा। तुमने कहा था, सो सोचा कि लेती चलूँ—यह वैसी चीज़ नहीं, यह मेरे ब्याह का दान है—अब ऐसी चीज़ मिलती कहाँ है—

बहुत मोल-भाव के बाद नाइन-बहू ने आँचल से एक अठन्नी खोलकर दी और रिकाबी को कपड़े में छिपा लिया। किसी को पता न चले—सर्वजया ने यह अनुरोध बार-बार किया।

दो-एक दिन में घनघोर वर्षा उतर आई। हु-हु करती पुरवैया हवा, गड्ढे-पोखर सब लबालब भर गए थे—राह-घाट पर घुटने-घुटने पानी, दिन-रात सौं-सौं की आवाज़, बाँस के झुरमुट में आँधी मच जाती—बाँस के सिरे ज़मीन पर लोट जाते—आकाश में कहीं कोई दरार न थी—बीच-बीच में पहले से भी ज़्यादा अँधेरा घिर आता—काले-काले बादलों के झुंड हु-हु करते पूरब से पश्चिम की ओर उड़े जा रहे थे—दूर आकाश में कहीं देवासुरों का महासंग्राम छिड़ गया था, किसी कुशल सेनानायक की चाल पर जल-थल-आकाश को एक साथ ढकते हुए विराट दैत्य-सेना, वाहिनी के पीछे वाहिनी, अक्षौहिणी के पीछे अक्षौहिणी, अदृश्य रथी-महारथियों के नेतृत्व में आँधी के वेग से आगे बढ़ रही थी—प्रज्वलित, अत्युग्र देव-वज्र आग उड़ाता हुआ पलक झपकते विशाल कृष्ण-सेना को इधर-उधर से चीर-फाड़कर छिन्न-भिन्न कर रहा था—और यह फिर कहाँ से रक्तबीज के वंशज कराल कृष्ण-छाया में पृथ्वी और अंतरिक्ष को अंधकारमय करते हुए घिरते आ रहे थे।

महाझंझा!

दिन-रात सौं-सौं की ध्वनि—नदी का जल बढ़ता—न जाने कितनी जगहों पर कितने घर-द्वार ढह गए!... नदी-नाले जल में डूब गए थे—गाय-बछड़े पेड़ों के नीचे, बाँस के झुरमुट में, घर की ओट में खड़े-खड़े बेतरह भीग रहे थे, पंछियों की कहीं कोई आवाज़ न थी! चार-पाँच दिन इसी तरह बीते, बस आँधी का शोर और अविश्रांत वर्षा!—अपू बरामदे में चढ़कर जल्दी-जल्दी अपना भीगा सिर पोंछते हुए बोला—हमारे बाँसवाले बाग में पानी आ गया है दीदी, देखेगी? दुर्गा रजाई ओढ़े लेटी हुई थी—बिना उठे ही बोली, कितना पानी आया है रे?... अपू बोला, तेरा बुखार उतर जाए तो कल देख आना।... इमली के पेड़ के नीचे वाले रास्ते पर घुटने भर पानी! फिर पूछता है—माँ कहाँ है रे?...

घर में एक दाना नहीं था—बस दो मुट्ठी बासी चावल के मुरमुरे पड़े थे। अपू रोने-धोने लगा, नहीं माँ, मुझे क्या भूख नहीं लगती—मैं दो दाने भात खाऊँगा हूँ-ऊँ—

उसकी माँ बोली, मेरा लच्छी, मेरा हीरा—ऐसे क्या करते हैं! अभी तुझे खूब सारे मुरमुरे भूनकर मिला दूँगी—पकाऊँ कैसे, देख नहीं रहा है कैसी सीलन हो गई है?—चूल्हे के अंदर एक चूल्हा पानी जो भरा है? फिर वह कपड़े के भीतर से कुछ निकालकर हँसते हुए दिखाती है—यह देख एक कोई मछली बाँस के बाग में कानों के बल चलती हुई घूम रही थी—बाढ़ का पानी पाकर सब नदी से ऊपर आ रही हैं—बरोजपोता का पोखर भरकर नदी से एक हो गया है न?... इसीलिए सब ऊपर आ रही हैं—

दुर्गा रजाई फेंककर उठ बैठी—हैरान रह गई। बोली, दिखा तो माँ मछली? हाँ माँ, कोई मछली क्या सच में कानों के बल चलती है? और हैं?...

अपू अभी-के-अभी बारिश में सिर भिगोते हुए भागा जाता—बड़ी मुश्किल से उसकी माँ ने उसे रोका।

दुर्गा बोली—ज़रा बुखार उतर जाए तो कल सुबह चलना अपू, तू और मैं बाँस के बाग से मछली पकड़ लाएँगे। फिर वह हैरान होकर सोचती—बाँस के बाग में मछली! कैसे आई? वाह तो!—माँ ने क्या ठीक से ढूँढ़ा है। ढूँढ़तीं तो वहाँ और भी होतीं—देख नहीं पाई कि कोई मछली कानों के बल कैसे चलती है, कल सुबह देखूँगी—सुबह तक बुखार उतर जाएगा—

चारों ओर के वन-बाग को घेरकर संध्या उतरती है। संध्या के मेघों में त्रयोदशी का अँधेरा चारों ओर एक-सा हो गया। दुर्गा जिस बिछौने पर लेटी थी, उसी के एक ओर उसकी माँ और अपू बैठे थे। सर्वजया सोचती—आज अगर अभी-के-अभी नीरेन बाबाजी का एक पत्र आ जाए? क्या पता, ऐसा हो नहीं सकता क्या? नीरेन तो पसंद ही करके गए हैं—न जाने क्या हुआ अभागन के नसीब में! ना, ये सब क्या मेरे नसीब में होगा? तुम भी कैसी हो! ऐसा होता तो फिर चिंता ही क्या थी?

उधर भाई-बहन में ज़ोरदार बहस छिड़ गई। अपू सरककर माँ के पास आ बैठा—ठंडी हवा से बहुत ठंड लग रही थी। हँसकर बोला—माँ—क्या? वही... ‘शामलंका बटना बाटे माटीते लुटाय केश?’...

दुर्गा बोली—‘ततक्षणे मा आमार छेड़े गियेछेन देश’—

अपू बोला—धत! माँ, ऐसा है क्या? ‘ततक्षणे मा आमार छेड़े गियेछेन देश?’—बोलते ही वह दीदी की अज्ञानता पर हँस पड़ा।

सर्वजया की छाती में बेटे की नासमझ खिलखिलाहट भाले की तरह चुभ गई। मन-ही-मन सोचने लगी—सात नहीं, पाँच नहीं—बस यही एक बेटा है—क्या अभागन की क़िस्मत लेकर आई थी—उसके मुँह की एक फ़रमाइश पूरी नहीं कर सकती—घी नहीं, पूड़ी नहीं, सन्देश नहीं—क्या माँगा था, बस दो दाने भात—नमक के साथ!... फिर सोचती—यह टूटा-फूटा घर, तंगी की गृहस्थी—अपू बड़ा हो जाएगा तो यह दुःख नहीं रहेगा—भगवान उसे बड़ा कर दें बस।...

उसके बाद वह बैठे-बैठे कहानियाँ सुनाने लगी, जब वह पहली बार निश्चििन्दिपुर में घर बसाने आई थी, तब एक साल ऐसी ही लगातार वर्षा में नदी का जल इतना बढ़ गया था कि घाट के रास्ते पर मुख़र्जी-बाग के पास बड़ी-बड़ी माल से लदी नावें तक आ गई थीं।

अपू बोला—कितनी बड़ी नाव माँ?

—बहुत बड़ी—वो जो खोट्टा लोगों की चूने की नावें, सजी-माटी की नावें कभी-कभी आती हैं देखी हैं न—उतनी बड़ी—

दुर्गा ने अचानक पूछा—माँ, तुम चार लड़ों वाली चोटी गूँथना जानती हो?

बहुत रात गए सर्वजया की नींद टूट गई—अपू पुकार रहा था—माँ, ओ माँ, उठो—मेरे ऊपर पानी टपक रहा है—

सर्वजया ने उठकर दीया जलाया—बाहर भयानक बारिश का शोर हो रहा था। फूटी छत से घर में हर जगह पानी टपक रहा था। उसने बिछौना सरकाकर बिछाया। दुर्गा तेज़ बुखार में अचेत पड़ी थी—उसकी माँ ने बदन पर हाथ रखकर देखा तो उसकी रजाई भीगकर सराबोर हो गई थी। पुकारकर बोली—दुर्गा—ओ दुर्गा सुन रही है?... ज़रा उठ तो? बिछौना हटा लूँ—ओ दुर्गा—जल्दी कर, एकदम भीग गया सब?...

बच्चे सो गए पर सर्वजया को नींद नहीं आई। अँधेरी रात—यह घनी वर्षा... उसका मन छम-छम करने लगा—डर लग रहा था कि जैसे कुछ होगा... कुछ ज़रूर होगा। छाती के भीतर केमन येन करने लगा। सोचती—उस आदमी का भी क्या हुआ? कोई पत्र भी नहीं आता—पैसे जहन्नुम में जाएँ। ऐसा तो कभी नहीं होता?... उनका शरीर तो ठीक है न? माँ सिद्धेश्वरी, सवा पाँच आने का भोग दूँगी, कोई अच्छी ख़बर ला दो माँ...

दूसरे दिन सुबह की ओर बारिश ज़रा थमी। सर्वजया ने घर से बाहर निकलकर देखा कि बाँस के झुरमुट के बीच का छोटा-सा पोखर पानी से भर गया है। घाट के रास्ते पर निबारन की माँ भीगती हुई कहीं जा रही थी, सर्वजया ने पुकारकर कहा—ओ निबारन की माँ, सुन—फिर लजाते हुए बोली—तूने एक बार कहा था न, बिंदिया वाली चादर के बारे में, अपने बेटे के लिए—तो लेगी क्या?...

निबारन की माँ बोली—है क्या? ज़रा पानी रुकने दो, अपने बेटे को साथ लेकर अभी आती हूँ—नई है माँ-ठाकुरानी, या पुरानी?...

सर्वजया बोली, तू आ तो—अभी देख लेना?... थोड़ी पुरानी है, पर किसी ने ओढ़ी नहीं है—धुली-तह की हुई रखी है—फिर ज़रा रुककर बोली—तुम लोग आजकल चावल नहीं कूट रही हो?...

निबारन की माँ बोली—इस बदली में क्या धान सूखेगा माँ-ठाकुरानी... खाने के लिए दो मुट्ठी ऐसे ही रख दिया है—

सर्वजया बोली—एक काम कर न—वही जाकर मुझे आधा कट्ठा आज दे जाना?... ज़रा पास आकर मिन्नत के लहजे में बोली—बारिश की वजह से बाज़ार से चावल लाने के लिए कोई आदमी नहीं मिल रहा—पैसे लिए-लिए घूम रही हूँ पर कोई राज़ी ही नहीं होता—बड़ी मुश्किल में पड़ गई हूँ माँ—

निबारन की माँ मान गई, बोली—आऊँगी अभी लेकर, पर उस मोटे धान के चावल का भात क्या आप लोग खा पाएँगे माँ-ठाकुरानी?... बहुत मोटा है—

नीम की छाल का काढ़ा अब दुर्गा से और नहीं पिया जाता। उसकी बीमारी एक-सी बनी हुई थी। दवा नहीं, डॉक्टर नहीं, वैद्य नहीं। कहती—एक पैसे के बिस्कुट मँगवा दोगी माँ, नमकीन वाले, मुँह में अच्छे लगते हैं।

साबूदाना तक नहीं जुट रहा, उसके लिए बिस्कुट!!

दोपहर बाद से फिर भयानक बारिश होने लगी। बारिश के साथ आँधी भी जैसे और बढ़ गई—घोर वर्षा से मुखर, निर्जन, जल से लबालब, हु-हु करती पुरवैया हवा बहती, बादलों और अँधेरे में एकाकार भादों की संध्या! फिर वैसे ही काले-काले धुनी हुई रुई जैसे बादल उड़े जा रहे थे... बारिश के शोर से कान बहरे हो रहे थे—दरवाज़े-खिड़कियों से ठंडी हवा के झोंकों के साथ बारिश की बौछारें हु-हु करके घुस रही थीं—फटे बोरे और फटे कपड़े ठूँसे हुए टूटे किवाड़ों की क्या बिसात कि आँधी के भीम आक्रमण के सामने खड़े रह सकें।

देर रात जब सब सो गए तो बारिश और तेज़ हो गई। सर्वजया को नींद नहीं आ रही थी—वह बिछौने पर उठकर बैठ गई। बाहर बस एक-सा हुस्-हुस् पानी बरसने का शब्द; क्रुद्ध दैत्य की तरह गरजता हुआ एक-सा गों-गों की आवाज़ के साथ आँधी का झोंका घर से टकरा रहा था!... जर्जर कोठरी एक-एक झोंके से थर-थर काँप उठती... डर से उसकी जान निकली जा रही थी... गाँव के एक किनारे बाँस के झुरमुट के बीच छोटे-छोटे बच्चों को लेकर वह अकेली, निःसहाय!... मन-ही-मन बोली—हे ठाकुर, मैं मर जाऊँ तो कोई हर्ज नहीं—इनका क्या करूँ?—इस अँधेरी रात में जाऊँ भी तो कहाँ?... बैठे-बैठे सोचने लगी—अच्छा, अगर कोठरी गिरी, तो दालान की दीवार शायद पहले गिरेगी—जैसे ही आवाज़ होगी, वैसे ही पंचशाला के दरवाज़े से इन्हें खींचकर बाहर निकाल लूँगी—

उससे और बैठा नहीं जा रहा था—कई दिनों से वह सिर्फ ओल का साग और कचू का साग उबालकर दिन काट रही थी—खुद उपवास पर उपवास रखकर बच्चों को जो कुछ थोड़ा-बहुत खाना था, खिला रही थी—चिंता और भुखमरी से शरीर कमज़ोर हो गया था, सिर के भीतर केमन येन हो रहा था।

आँधी की गों-गों की आवाज़, बहुत रात गए आँधी और बढ़ गई। बाहर कैसा झोंका आया! क्या उपाय है! एक बड़े झोंके से डरकर वह आँधी का रुख समझने के लिए सँभलकर दालान का दरवाज़ा खोलकर बाहर ओसारे में मुँह निकाला... बारिश की बौछार से कपड़े, बाल सब भीग गए—हु-हु करती एक-सी हवा के शोर में बारिश के गिरने और आँधी का शब्द ढक गया था, बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था—अँधेरे, बादलों, आकाश, हवा और पेड़-पौधों में सब एकाकार था! आँधी-बारिश के शोर में और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।

इस हिंसक अंधकार और क्रूर झंझावाती रात्रि की आत्मा जैसे प्रलयदेव के दूत के रूप में भीम-भयानक वेग से सृष्टि को निगलने के लिए दौड़ी आ रही थी—अंधेरे में, रात में, पेड़-पौधों में, आकाश में, धरती पर उसकी गति के अवरोध से शब्द उठ रहा था—सु-इइइश... सूँ-ऊँ-ऊँ-ऊँइश... इस ध्वनि के पहले हिस्से में जैसे वह विश्वभक्षी दूत पीछे हटकर बल बटोर रहा हो—सू-ऊ-ऊ—और अंतिम हिस्से में पृथ्वी के ऊँचे-नीचे सभी वायुस्तरों को आलोड़ित, मथित करके, वायुमंडल में विशाल तूफ़ान उठाकर अपनी सारी आसुरी शक्ति से सर्वजया की जर्जर कोठरी के पीछे धक्का दे रहा था—इ-इ-इश...! कोठरी डोल-डोल उठती... अब और नहीं टिकेगी। इसमें जैसे कोई अधीरता, अव्यवस्था, भूल-चूक नहीं थी—जैसे दृढ़, अभ्यस्त, प्रणालीबद्ध ढंग से किया जाने वाला कर्तव्य-कार्य हो!... विश्व को एक निश्चित समय के अंदर चूर-चूर करके उड़ा देने का भार जिसने लिया है, युग-युग में ऐसी कितनी ही हँसती-खिलखिलाती सृष्टियों को ध्वस्त कर अनंत आकाश के अंधकार में आतिशबाज़ी की तरह बिखेरकर आई है वह महाशक्तिमान ध्बंसदूत—यह उसका अभ्यस्त कार्य था... इसमें उसकी अधीरता या उन्मत्तता नहीं सजती...

आतंक से सर्वजया ने दरवाज़ा बंद कर दिया... अच्छा, अगर अभी कोई चीज़ घर में घुस आए? कोई आदमी या कोई और जानवर? चारों ओर घने बाँस के जंगल, झाड़ियाँ, लोगों की बस्ती नहीं—हे माँ! पानी की बौछारों से घर बहा जा रहा है... हाथ से छूकर देखा, सोए हुए अपू का शरीर पानी में भीगकर लुगदी हो गया है... वह क्या करे? और कितनी रात बाकी है? उसने बिछौना टटोलकर दियासलाई ढूँढ़ी और केरोसिन की डिबिया जलाई। पुकारा—ओ अपू, उठ तो? पानी टपक रहा है—। अपू नींद में डूबी आँखों से, उलझी हुई आवाज़ में कुछ बोला जो समझ में नहीं आया। फिर पुकारा—अपू? सुन रहा है ओ अपू? उठ तो ज़रा। दुर्गा से बोली—करवट लेकर सो तो दुग्गा। बहुत पानी टपक रहा है—ज़रा सरक, करवट ले तो—

अपू उठकर बैठ गया और नींद में डूबी आँखों से चारों ओर देखने लगा—फिर लेट गया। हुड़ुम् करके भयानक कुछ गिरने की आवाज़ हुई, सर्वजया ने जल्दी से फिर दरवाज़ा खोलकर बाहर की ओर झाँककर देखा—बाँस के बाग की तरफ़ कुछ खाली-खाली दिख रहा था—रसोईघर की दीवार गिर गई थी।...उसकी छाती काँप उठी—अब क्या पुरानी कोठरी की बारी है—? कौन है जिसे वह अब पुकारे? मन-ही-मन बोली—हे ठाकुर, आज की रात किसी तरह कटवा दो, हे ठाकुर, इनके चेहरों की ओर देखो—

तब तक ठीक से भोर नहीं हुई थी, आँधी थम गई थी लेकिन बारिश अब भी हल्की-हल्की पड़ रही थी। पड़ोस के नीलमणि मुख़र्जी की पत्नी गौशाला में गाय की हालत देखने आ रही थीं, तभी पिछवाड़े के दरवाज़े पर बार-बार धक्का सुनकर दरवाज़ा खोला और आश्चर्य से बोलीं, “नयी बहू!...।” सर्वजया ने व्यग्रता से कहा—न’दी, एक बार बड़ठाकुर को बुलाओ तो ज़रा?... एक बार जल्दी से हमारे घर आने को कहो—दुग्गा केमन येन कर रही है!

नीलमणि मुख़र्जी की पत्नी चकित होकर बोलीं—दुग्गा? क्यों, क्या हुआ है दुग्गा का?...

सर्वजया बोली—कई दिनों से तो बुखार हो रहा था, हो रहा है फिर चला जा रहा है—मलेरिया का बुखार, कल शाम से बुखार बहुत तेज़ है—उस पर कल रात का हाल तो तुम जानती ही हो—एक बार जल्दी से बड़ठाकुर को—

उसके बिखरे बाल और रात-भर जागने से लाल-लाल आँखों की दिशाहारा चाहत देखकर नीलमणि मुख़र्जी की पत्नी बोलीं—डर मत बहू—ठहरो, मैं अभी बुला देती हूँ, चलो मैं भी चलती हूँ—कल रात गौशाला की छत भी गिर गई—बाबा, कल रात जैसा हाल तो मैंने कभी नहीं देखा—आखिरी पहर में सब उठकर गाय-वाय हटाकर फिर सोए कि नहीं?... ठहरो, मैं बुलाती हूँ—

थोड़ी देर बाद नीलमणि मुख़र्जी, उनका बड़ा बेटा फणि, पत्नी और दो बेटियाँ, सब अपू के घर आए। रात के अंधकार में वह दैत्य जैसे पूरे गाँव को कुचल, पीस, मथकर आकाश-मार्ग से अंतर्धान हो गया था—टूटी डालियाँ, पत्ते, छप्पर का फूस, कच्ची बाँस की पत्तियाँ, बाँस की कमानियों से रास्ता ढक गया था—आँधी में झुके बाँस ने रास्ता रोक रखा था। फणि बोला—देखा बाबूजी, क्या हाल हुआ है? उस नवाबगंज की पक्की सड़क से विलायती चटका के पेड़ के पत्ते उड़ा लाया है।...नीलमणि मुख़र्जी के छोटे बेटे ने एक मरी हुई चिड़िया बाँस की पत्तियों के ढेर से खींचकर निकाली।

दुर्गा के बिछौने के पास अपू बैठा था। नीलमणि मुख़र्जी ने कमरे में घुसते हुए कहा—क्या हुआ बेटा अपू?

अपू के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। बोला, दीदी कुछ बड़बड़ा रही थी जेठामशाय।

नीलमणि ने बिछौने के पास बैठकर कहा—देखूँ ज़रा हाथ?... बुखार थोड़ा ज़्यादा है, अच्छा कोई डर नहीं—फणि, तुम ज़रा फुर्ती से नवाबगंज चले जाओ तो शरत् डॉक्टर के पास—उन्हें बुलाकर ही लाना। फिर उन्होंने पुकारा—दुर्गा, ओ दुर्गा? दुर्गा अचेतन अवस्था में थी, कोई सुध-बुध नहीं। नीलमणि बोले, ऐं, घर-द्वार की हालत तो बड़ी खराब है? पानी गिरकर कल रात सब बह गया... इसमें बहू की शर्म की भी क्या बात थी—हमारे यहाँ ही उठ आतीं तो क्या होता? हरि का भी अक्ल-ज्ञान इस जीवन में नहीं आया—इस हालत में ऐसे घर की मरम्मत का कोई बंदोबस्त किए बिना क्या कर रहा है, यह भी नहीं पता—इसका सारा जीवन एक-सा ही बीता—

उनकी पत्नी बोलीं—घर क्या सँवारेंगे, घर में खाने को नहीं है, नहीं तो क्या कोई ऐसी मुसीबत में छोड़कर परदेस जाता है? हाय, बेचारी बीमार लड़की कल सारी रात भीगी है—ज़रा-सा पानी गर्म करने को दो—वो खिड़की खोल दे तो फणि?

थोड़ी देर में नवाबगंज से शरत् डॉक्टर आए—देख-सुनकर दवा का इंतज़ाम किया। कह गए कि विशेष डर का कोई कारण नहीं है, बुखार तेज़ है, सिर पर नियमित रूप से पानी की पट्टी देने का बंदोबस्त किया। हरिहर कहाँ है, पता नहीं था, फिर भी उसके पुराने पते पर उसे एक पत्र भेज दिया गया।

अगले दिन आँधी-बारिश थम गई—आकाश के बादल छँटने लगे। नीलमणि मुख़र्जी दोनों समय नियमित रूप से देख-भाल करने लगे। आँधी-बारिश थमने के अगले ही दिन से दुर्गा का बुखार फिर बहुत बढ़ गया। शरत् डॉक्टर को हालत ठीक नहीं लगी। हरिहर को एक और पत्र भेजा गया।

अपू अपनी दीदी के सिर के पास बैठकर पानी की पट्टी दे रहा था। दीदी को दो-एक बार पुकारा—ओ दीदी सुन रही है, कैसी है, ओ दीदी? दुर्गा की अवस्था अचेत-सी थी। होंठ हिल रहे थे, जैसे मन-ही-मन कुछ कह रही हो, घोर में। अपू ने कान के पास मुँह ले जाकर दो-एक बार कोशिश की पर कुछ समझ नहीं पाया।

दोपहर ढलते-ढलते बुखार उतर गया। दुर्गा इतनी देर बाद फिर आँखें खोलकर देख सकी। बहुत कमज़ोर हो गई थी, चिं-चिं करके बोल रही थी, ध्यान से न सुनने पर समझ नहीं आता था कि क्या कह रही है।

माँ घर के काम से उठ गई तो अपू दीदी के पास बैठा रहा। दुर्गा ने आँखें उठाकर उसकी ओर देखा और बोली—कितनी बेला है रे?

अपू बोला—अभी बहुत बेला है—आज धूप निकली है, देखी है दीदी? अभी भी हमारे नारियल के पेड़ की चोटी पर धूप है—

कुछ देर तक दोनों चुप रहे। बहुत दिनों बाद धूप निकलने से अपू को बड़ी खुशी हुई थी। वह खिड़की के बाहर धूप में नहाए पेड़ की चोटी को देखता रहा। थोड़ी देर बाद दुर्गा बोली—सुन अपू—एक बात सुन—

—क्या रे दीदी? फिर वह दीदी के मुँह के और पास अपना मुँह ले गया। —मुझे एक दिन तू रेलगाड़ी दिखाएगा?

—दिखाऊँगा अभी—तू ठीक हो जा, फिर बाबूजी से कहकर हम सब एक दिन गंगा नहाने जाएँगे रेलगाड़ी से—

सारा दिन और रात बीत गई। आँधी-बारिश कभी हुई भी थी, ऐसा लगता ही नहीं था। चारों ओर खिली हुई शरत् की धूप थी।

सुबह दस बजे के करीब नीलमणि मुख़र्जी बहुत दिनों बाद नदी में स्नान करने जाएँगे, यह सोचकर तेल लगाने बैठे थे, तभी उनकी पत्नी की उत्तेजित आवाज़ उनके कानों में पड़ी—ओ जी, एक बार इधर आओ तो जल्दी—अपू के घर की तरफ से जैसे किसी के रोने की आवाज़ आ रही है—

माजरा क्या है, यह देखने सब दौड़ पड़े।

सर्वजया बेटी के मुँह पर झुकी हुई कह रही थी—ओ दुग्गा, आँखें तो खोल—ओ माँ, ठीक से आँखें खोल तो ओ दुग्गा—

नीलमणि मुख़र्जी ने कमरे में घुसकर कहा—क्या हुआ—हटो सब, हटो तो ज़रा—आह, सब हवा रोककर क्यों खड़े हो?

सर्वजया भासुर-समान उस बुज़ुर्ग पड़ोसी की घर में उपस्थिति भूलकर चीख उठी—ओ जी, क्या हो गया, मेरी बेटी ऐसी क्यों कर रही है?

दुर्गा ने फिर आँखें नहीं खोलीं।

आकाश के नीले आवरण को भेदकर बीच-बीच में अनंत की पुकार आती है—पृथ्वी के आँचल से बच्चे चंचल होकर दौड़ पड़ते हैं और अनंत नीलिमा में डूबकर खुद को खो देते हैं—परिचित और लीक से परे किसी पगडंडी-विहीन राह पर—दुर्गा की अशांत, चंचल प्राण-वेला में जीवन की उस सबसे बड़ी, सबसे अनजानी पुकार ने दस्तक दे दी थी!

तब फिर शरत् डॉक्टर को बुलाया गया—बोले—मलेरिया का आखिरी स्टेज और क्या—बहुत तेज़ बुखार के बाद जैसे ही शांति मिली, वैसे ही हार्ट फेल कर गया—ठीक ऐसा ही एक केस हो गया था उस दिन दशघरा में—

आधे घंटे के भीतर पड़ोस के लोगों से आँगन टूट पड़ा।

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