दोपहर के बाद राणाघाट स्टेशन पर गाड़ी बदलनी पड़ी। अपु की आँखों में दो-दो बार कोयले की कनी पड़ जाने के बावजूद वह गाड़ी की खिड़की से मुँह बाहर निकाले पूरे दिन बाहर की ओर ही ताकता रहा। स्टेशनों पर उन चीज़ों को क्या कहते हैं? सिगनल? वे गिर क्यों रहे हैं, उठ क्यों रहे हैं? गाड़ी जहाँ आकर लगती है, वह जगह ईंटों से ऊँची-सी चिनी हुई है, ठीक जैसे कोई पक्का चबूतरा हो। उसे प्लैटफ़ॉर्म कहते हैं क्या? लकड़ी के तख़्तों पर बड़े-बड़े अक्षरों में अंग्रेज़ी और बांग्ला में सभी स्टेशनों के नाम लिखे हैं—कुड़ुलगाछी, गोविन्दपुर, बानपुर। गाड़ी छूटने के समय घंटी बजती है—ढंग-ढंग-ढंग-ढंग, चार बार—अपु ने गिना है। लोहे के एक बड़े से चक्के के चारों ओर हत्था लगा है, उसी को घुमाने से सिगनल गिरता है—कुड़ुलगाछी स्टेशन पर अपु ने गौर से देखा था।
सर्वजया इस बार को मिलाकर कुल दो बार ही रेल पर चढ़ी थी। और एक बार न जाने किस ज़माने में—जब वे नए-नए काशी से लौटकर देश में अपनी गृहस्थी बसा रहे थे—ज्येष्ठ महीने में आड़ंघाटा में युगलकिशोर ठाकुर के दर्शन करने गई थी—क्या वह आज की बात है? वह बड़े चाव से स्टेशन-दर-स्टेशन मुँह बाहर निकाल कर लोगों का चढ़ना-उतरना देख रही थी—बहुएँ-बेटियाँ चढ़ रही हैं, उतर रही हैं—कैसी-कैसी सूरतें हैं, कैसे कपड़े-लत्ते, कैसे गहने-पाते। जगन्नाथपुर स्टेशन पर मुरमुरे के बढ़िया लड्डू बिकते देख उसने बेटे से कहा—अपु, मुरमुरे के लड्डू खाएगा? तुझे तो बहुत पसंद हैं, ले लूँ तेरे लिए? स्टेशन पर टेलीग्राफ़ के तार पर कोई चिड़िया बैठकर झूला झूल रही थी, अपु अच्छी तरह से देख-देखकर उँगली से दिखाते हुए बोला—देखो माँ, किसी के घर के पिंजरे से एक मैना भागकर आ गई है!
नैहाटी स्टेशन पर गाड़ी बदलकर जब गंगा के विशाल पुल के ऊपर से गाड़ी गुज़र रही थी तो सूरज डूब रहा था। सर्वजया एकटक निहार रही थी—उस पार से हू-हू करती हवा बह रही है, गंगा के जल में नावें, दोनों किनारों पर कितने अच्छे-अच्छे घर, बाग-बगीचे—ऐसे दृश्य उसने जीवन में कभी नहीं देखे थे। बेटे को दिखाते हुए बोली—देखा अपु, धुएँ वाला जहाज़? फिर उसने हाथ जोड़कर माथे से लगाए और मन-ही-मन बोली—माँ गंगे, तुम्हारे ऊपर से जा रही हूँ, अपराध न लेना माँ, काशी जाकर फूल-बेलपत्र से तुम्हारी पूजा करूँगी, अपु को ठीक रखना, जिस काम के लिए जा रहे हैं वह पूरा हो, वहाँ कोई आसरा मिल जाए माँ—
आनंद और रोमांच से, अनिश्चितता के रहस्य से उसका हृदय डोल रहा था—ऐसी मनोदशा उसने इससे पहले कभी अनुभव नहीं की थी। सुविधा में हो या असुविधा में, अबाध मुक्त जीवन का आनंद उसे यह पहली बार मिला था। उसकी चिरकाल की, बाँसों के बाड़े से घिरी संकुचित ग्रामीण ज़िंदगी में ऐसे सचल दृश्य, ऐसी अनोखी गति का वेग, इतने अनिश्चय के रोमांच से उसका कभी घनिष्ठ परिचय नहीं हुआ था—जिस जीवन ने अपने चारों ओर चहारदीवारी उठाकर ख़ुद को छोटा कर रखा था, वह आज चल पड़ा है, चल पड़ा है, सामने चल पड़ा है—उस पश्चिमी आकाश के डूबते सूरज को लक्ष्य करके—नदी-नाले, देश-विदेश—सबको लाँघता हुआ भागा जा रहा है—इस चलने की वास्तविकता को वह आज अपने हर स्पंदन से अनुभव कर रही थी!—अभी उस दिन, एक साल पहले भी, निश्चिन्दिपुर के घर में कितनी ही रातों को लेटे-लेटे जब वह सोचती कि मौक़ा मिला तो एक बार चाकदह या कालीगंज गंगा-स्नान करने जाएगी, तब वह बात भी संभावना और निश्चय की परिधि से बहुत बाहर की चीज़ लगती थी—और आज!
बैंडेल स्टेशन पर गाड़ी आने से ज़रा पहले सामने की बड़ी लाइन से एक विशाल गाड़ी हू-हू का शब्द करती हुई तूफ़ानी वेग से निकल गई। अपु विस्मय से उस ओर ताकता रह गया। क्या आवाज़ थी!—उफ़्! बैंडेल स्टेशन पहुँचकर वे गाड़ी से उतरे। इधर-उधर इंजन दौड़ रहे हैं, बड़ी-बड़ी मालगाड़ियाँ स्टेशन को कँपाती हुई हर पाँच मिनट पर बिना रुके गुज़र रही हैं। चारों ओर कोलाहल और रेल-पेल—इधर इंजन की सीटी की कान फाड़ देने वाली आवाज़, उधर एक और सवारी गाड़ी छूट रही है, गार्ड हरी झंडी हिला रहा है—शाम के समय स्टेशन के पूरब-पश्चिम में लाइनों के ऊपर इतने सिगनल झुंड के झुंड—लाल, हरी बत्तियाँ जल रही हैं—रेल, इंजन, गाड़ी, लोग-बाग।
कुछ रात हुए, उनकी काशी जाने वाली गाड़ी आकर भयंकर शब्द के साथ प्लैटफ़ॉर्म पर खड़ी हुई। विशाल स्टेशन, भयानक भीड़—सर्वजया जैसे दिशाहीन हो गई—धकियाई हुई, अनभ्यस्त और जकड़े हुए क़दमों से पति के पीछे-पीछे एक डिब्बे के दरवाज़े पर आकर खड़ी हुई तो हरिहर ने बड़ी मुश्किल से उस दुर्जय भीड़ को धकेलते हुए, काँपती हुई पत्नी और बदहवास बेटे को किसी तरह गाड़ी की बेंच पर बिठाया और कुली की मदद से सामान-गठरी चढ़ाई।
भोर के समय सर्वजया की तंद्रा टूट गई। ट्रेन तूफ़ान के वेग से भागी जा रही थी—खेत, मिट्टी, पेड़-पौधे, सब एक में मिलकर भागे जा रहे थे—रात की गाड़ी होने के कारण वे सब एक ही डिब्बे में चढ़ गए थे—हरिहर ने उसे जनाने डिब्बे में नहीं भेजा था। गाड़ी में भीड़ पहले से कम थी—एक-एक बेंच पर एक-एक आदमी पसरकर सो रहा था। ऊपर की बेंच पर एक काबुली खर्राटे भर रहा था। अपु न जाने कब उठकर, मुँह फाड़े खिड़की से बाहर झाँकते हुए एकटक देख रहा था।
हरिहर जागकर बेटे से बोला—उस तरह बाहर की तरफ़ मत ताकते रहो बेटा, अभी आँखों में कोयले की कनी पड़ जाएगी—
कोयले की कनी तो फिर भी एक निरीह चीज़ थी, अगर आँखें ही उखड़कर चली जातीं, तब भी अपु में इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि वह इस समय खिड़की की ओर से आँखें फेर पाता। वह लगभग सारी रात इसी तरह बैठा रहा था। माँ-बाबूजी तो सो रहे थे—उसने जो क्या-क्या देखा है! कितने स्टेशनों पर गाड़ी रुकी नहीं, रोशनी और लोगों समेत पूरा स्टेशन सनसनाती हुई किसी हवाई आतिशबाज़ी की तरह बगल से उड़ता चला जा रहा था—रात में न जाने कब उसे हल्की-सी झपकी आ गई थी, अचानक नींद टूटी तो उसने मुँह बाहर निकालकर देखा कि गहरी रात की चाँदनी में रेलगाड़ी तूफ़ान की गति से किसी नदी के छोटे-से पुल को पार कर रही है—सामने एक बहुत ऊँचा-सा काला टीला, टीले के ऊपर बहुत-से पेड़-पौधे, नदी के जल पर चाँदनी पड़कर चिकचिक् कर उठी, आकाश में सफ़ेद-सफ़ेद बादल—फिर उसी तरह के कई और बड़े-बड़े टीले, और उसी तरह के पेड़-पौधे। उसके बाद एक बड़ा स्टेशन, लोग-बाग, रोशनी—बगल की लाइन पर एक गाड़ी आकर खड़ी थी—एक पानवाले से एक आदमी का कैसा झगड़ा हो गया—स्टेशन पर एक बड़ी घड़ी थी—उसने अपने मास्टर साहब नीरेन बाबू से घड़ी देखना सीखा था, गिन-गिनकर देखा कि रात के तीन बजकर बाईस मिनट हुए हैं। फिर गाड़ी चल पड़ी—फिर कितने ही पेड़, फिर उसी तरह के ऊँचे-ऊँचे टीले—कई बार तो रेल की पटरी के दोनों ओर ही वैसे टीले थे—गाड़ी में सब सो रहे हैं, अगर इन्हें कुछ देखना ही नहीं था तो ये रेलगाड़ी पर चढ़े ही क्यों थे! वह किससे पूछे कि इतने टीले किस चीज़ के हैं? एक-एक बार वह खिड़की से मुँह निकालकर झुकता और ज़मीन की ओर देखकर यह पता लगाने की कोशिश करता कि गाड़ी कितनी तेज़ी से जा रही है—बाल हवा से उड़कर मुँह पर आ जाते, ज़मीन दिखती नहीं, मानो किसी ने मिट्टी पर ढेरों सीधी रेखाएँ खींच दी हों—उफ़्! रेलगाड़ी कितनी तेज़ी से जाती है!—कौतूहल और उत्तेजना में वह कभी इस खिड़की से तो कभी उस खिड़की से मुँह निकालकर देखने लगता।
बीच-बीच में पूरब की ओर तेज़ी से विलीन होते अस्पष्ट चाँदनी से भरे खेतों की ओर देख-देखकर उसके मन में होता, कितनी दूर आ गए हैं वे! यह किस देश के ऊँचे-नीचे खेतों से होकर वे जा रहे हैं?
सुबह की ओर वह फिर ज़रा-सा सो गया था, एक बहुत बड़े स्टेशन पर गाड़ी के सशब्द आकर रुकते ही उसकी तंद्रा टूट गई—प्लैटफ़ॉर्म के पत्थर के फलक पर नाम लिखा था—पटना सिटी।
उसके बाद कितने ही स्टेशन निकल गए। कितने बड़े-बड़े पुल! गाड़ी चली जा रही है, चली जा रही है, लगता है मानो पुल ख़त्म ही नहीं होगा—कितनी तरह के सिगनल, कितने कल-कारख़ाने, किसी स्टेशन के कमरे के अंदर लोहे के एक खंभे पर भोंपू-जैसी कोई चीज़ लगी थी—उसी में मुँह डालकर एक रेल-बाबू कुछ बातें कर रहा था—प्राइवेट नम्बर?...हाँ, अच्छा...सिक्सटी नाइन—सिक्सटी नाइन—हाँ?...उनहत्तर...छह के ऊपर नौ—हाँ-हाँ।
वह हैरान होकर बाबूजी से पूछ बैठा—वह क्या चीज़ है बाबूजी? उसके अंदर मुँह डालकर वैसे क्यों बोल रहे हैं?
तब तक दिन काफ़ी ढल चुका था, ऐसे में हरिहर बोला—अब हम लोग काशी पहुँच जाएँगे, बाईं ओर देखते रहना, गंगा के पुल पर गाड़ी चढ़ते ही काशी दिखाई देगा।
अपु एक बात बहुत देर से सोच रहा था। आज वह सारे रास्ते टेलीग्राफ़ के तार और खंभे देखता हुआ आया है—उस एक बार को छोड़कर, जीवन में उसने पहले कभी इस तरह नहीं देखा था। इस बार अगर उसे रेल-रेल खेलने का मौक़ा मिला तो वह उसी तरह के तार के खंभे लगाएगा। पहले वह कितनी बड़ी भूल करता था! जहाँ वे जा रहे हैं, वहाँ के जंगल में क्या गुलंचलता मिलेगी?
पंद्रह-एक दिन बीत गए हैं। बाँसफाटक गली के एक मझोले-से तिमंज़िले मकान के भूतल पर हरिहर ने डेरा लिया है। किसी भी पुराने परिचित का वह पता नहीं लगा सका। पहले जो लोग जिन जगहों पर थे, अब उन जगहों पर उनका कोई पता नहीं बता पाता। केवल विश्वेश्वर गली का पुराना हलवाई रामगोपाल साहु अभी तक जीवित है।
मकान के ऊपर की मंज़िल पर एक पंजाबी परिवार के साथ रहता है, बीच की मंज़िल पर एक बंगाली व्यापारी रहता है, बाहर का कमरा उसकी दुकान और गोदाम है—आस-पास के दो-तीन कमरों में उसके रसोई और सोने का इंतज़ाम है।
इन पाँच-छह दिनों में सर्वजया ने आसपास की सभी जगहें पति के साथ घूम-घूमकर देखी हैं। सपने में भी उसने कभी ऐसे दृश्यों की कल्पना नहीं की थी—ऐसे मंदिर! ऐसे ठाकुर-देवता! इतने घर-मकान! आड़ंघाटा का युगलकिशोर मंदिर अब तक उसकी नज़र में स्थापत्य कला का चरम उत्कर्ष था—लेकिन विश्वनाथ का मंदिर?—अन्नपूर्णा का मंदिर?—दशाश्वमेध घाट के ऊपर के लाल पत्थर वाले मंदिर?
बीच में एक दिन वह पंजाबी सज्जन की पत्नी के साथ रात में विश्वनाथ की आरती देखने गई थी—वह जो नज़ारा था, उसे वह मुँह से बयान नहीं कर सकती। धूप-धुएँ से मंदिर अँधेरा हो गया—सात-आठ पुजारी एक साथ मंत्र पढ़ने लगे, क्या भीड़, क्या ठाट-बाट, कितने बड़े घरों की महिलाएँ देखने आई थीं, उनकी वेशभूषा की भी क्या बहार थी! कहीं की एक रानी आई थीं—साथ में चार-पाँच नौकरानियाँ। क़ीमती बनारसी साड़ी पहने थीं, सोने के कलगे जड़ा आँचल आरती के पंचप्रदीप की रोशनी में आग की तरह दहक रहा था—क्या कजरारी बड़ी-बड़ी आँखें—क्या भँवें, क्या मुखश्री—असली रानी उसने कभी नहीं देखी थी—कहानियों में ही सुना था—हाँ, रानी जैसी छबि थी ज़रूर। उसने उन्हें ज़्यादा देर तक देखा, या ठाकुर की आरती ज़्यादा देर तक देखी, यह वह नहीं जानती।
ठाकुर-देवता के मंदिर छोड़ भी दें, तो एक-एक रिहायशी मकान ही क्या कम थे!...दुर्गापूजा के न्योते पर निश्चिन्दिपुर के गांगुली-बाड़ी जाकर वह गांगुलियों का नाटमन्दिर, दोमंज़िला मकान, पक्का तालाब-घाट देखकर मन-ही-मन कितनी ईर्ष्या करती थी—याद है, एक बार दुर्गा से कहा था—देखा, बड़े लोगों के घर-द्वार की कैसी लक्ष्मीछिरि होती है?—अब वह जो मकान सड़कों के दोनों ओर देख रही है—उसके सामने गांगुली-बाड़ी—
इतनी गाड़ियाँ-घोड़े एक साथ जाते हुए उसने कभी नहीं देखे थे। और गाड़ियाँ भी कितनी तरह की! आने वाले दिन राणाघाट, नैहाटी में उसने घोड़ा-गाड़ी देखी तो थी, लेकिन इतनी तरह की गाड़ियाँ उसने पहले कभी नहीं देखी थीं। दो पहियों की ही कितनी गाड़ियाँ जाती हैं।...उसका तो मन करता कि रास्ते के किनारे खड़ी होकर दो घड़ी यह सब देखे—लेकिन पंजाबी महिला साथ रहती है, इसलिए शर्म के मारे देख नहीं पाती।
अपु तो बिलकुल हैरान रह गया है। ऐसे काण्ड-कारख़ाने की उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उनके डेरे से दशाश्वमेध घाट ज़्यादा दूर नहीं है, रोज़ शाम को वह वहीं घूमने जाता है। रोज़ ही जैसे चड़क का मेला लगा रहता है। यहाँ गाना हो रहा है, वहाँ कथा हो रही है, उधर कोई रामायण पढ़ रहा है, लोगों की भीड़, हँसते चेहरे, उत्सव—अपु वहाँ बस घूम-घूमकर देखता रहता है और शाम के बाद घर आकर बड़े उत्साह से क़िस्से सुनाता है।
किसी का नौकर एक छोटे-से लड़के की कमर में रस्सी बाँधकर रोज़ घुमाने लाता है, अपु ने उससे दोस्ती कर ली है—उसका नाम पल्टू है, ठीक से बोलना नहीं जानता, भारी चंचल है, इसीलिए कहीं खो न जाए इस डर से घर वालों ने यह जेल-क़ैदी जैसा इंतज़ाम कर रखा है। अपु हँस-हँसकर लोटपोट हो जाता है। नौकर से विनती की थी, लेकिन वह डर के मारे रस्सी खोलने को राज़ी नहीं होता। बंदी नितांत छोटा और अबोध है—इस तरह का व्यवहार कि प्रतिबादयोग्य है, इसका उसे ज्ञान ही नहीं है। घर आने पर सर्वजया रोज़ उसे डाँटती है—अकेले-अकेले उस तरह क्यों जाता है? शहर-बाज़ार की जगह है, अगर रास्ता भूल गया तो?...माँ की आशंका ये सम्पूर्ण भित्तिहीन, यह बात वह दिन में दो बार बड़े जतन से हाथ नचा-नचाकर माँ को समझाता है। काशी आकर हरिहर की आय भी बढ़ी। कुछ जगहों पर भाग-दौड़ करके उसने कुछ मंदिरों में नित्य पुराण-पाठ का काम जुटा लिया। इसके अलावा, एक दिन सर्वजया ने पति से कहा—दशाश्वमेध घाट पर रोज़ शाम को पोथी लेकर बैठते क्यों नहीं? लोग कितने तिकड़म से पैसे कमाते हैं, और आप बस बैठे-बैठे मंसूबे ही बाँधते रहते हैं—
पत्नी की झिड़की खाकर हरिहर 'काशीखण्ड' की पोथी लेकर शाम को दशाश्वमेध घाट पर बैठने लगा। पुराण-पाठ करना उसका कोई नया व्यवसाय नहीं था, देश में यजमान-बाड़ी जाकर कितने व्रत-त्योहारों के मौक़े पर उसने यह काम किया है। पोथी खोलकर सुरीले स्वर में वह वंदना-गान शुरू करता—
बर्हापीडाभिरामं मृगमदतिलकं कुण्डलाक्रान्तगण्डं।..... स्मितसुभगमुखं स्वाधरे न्यस्तवेणुं.....ब्रह्मगोपालवेशम्।
भीड़ बुरी नहीं होती।
डेरे पर लौटकर वह बालू-काग़ज़ पर कुछ लिखता। पत्नी से कहता, सिर्फ़ श्लोक पढ़ते जाओ तो कोई सुनना नहीं चाहता—उस बंगाली कथावाचक के यहाँ मुझसे ज़्यादा भीड़ होती है—सोचा है कुछ पाला लिखबो, उसमें गीत भी होंगे, और कथा-जैसा भी होगा, वरना लोग नहीं जुटते—उस बंगाली से परसों जान-पहचान हुई, देवनागरी का अक्षर-ज्ञान नहीं है, बस छड़ा काटकर औरतों को रिझाकर पैसे ले जाता है...मेरी थाली में कुल छः आना, आठ आना, और उसके यहाँ एक रुपए से कम नहीं...सुनोगी ज़रा, कैसा लिख रहा हूँ।
वह थोड़ा-सा पढ़कर सुनाता। कहता—सोच रहा हूँ उस कथावाचक की पोथी देखकर जंगल का वर्णन लिख लूँगा—पर क्या वह देगा?
—आप किस जगह बैठकर कथा कहते हैं, बताइए तो? एक दिन सुनने जाना होगा—
—चली जाना, षष्ठी मंदिर के नीचे ही बैठता हूँ—कल ही जाना, नया पाला कहूँगा, कल एकादशी भी है, दिन अच्छा है—
—आते समय विश्वेश्वर गली की दुकान से चार पैसे की पानीफल की जलेबी ले आना तो अपु के लिए—उस दिन ऊपर वाली खोट्टा बहू ने कोई पूजा करके मुझे बुलाकर जलपान कराया, बोली, पानीफल की जलेबी है, विश्वेश्वर गली में मिलती है, खाते-खाते सोचा कि अपु को जलेबी बहुत पसंद है—अब उसने जलपान कराया है तो मैं क्या कहकर ले आती—ले आना तो आज चार पैसे की।
कई दिनों से हरिहर की कथा सुनने अच्छी-ख़ासी भीड़ हो रही है। एक बड़ी-सी परात में नारदघाट के कालीबाड़ी की नाइन एक बड़ा-सा सिधा लाकर अपु के आँगन में रख गई। सर्वजया ने हँसकर कहा—आज क्या बार-पूजा थी? वे घर आ रहे हैं, देखा क्या, हाँ नाइन? उसके जाने पर बेटे को बुलाकर बोली—इधर आ अपु—ये देख, तेरी वो नारियल की फोँपल, तुझे पसंद है न? किशमिश, केले, कितने बड़े-बड़े आम हैं, देख, आ खाएगा, दूँ—बैठ यहाँ—
उत्साह पाकर हरिहर ने पुरानी खाता-बहियों का गट्ठर फिर से निकाला। सर्वजया बोली—ध्रुवचरित्र सुनते-सुनते लोगों के कान पक गए, कुछ नया क्यों नहीं शुरू करते? सारा सवेरा और दोपहर बैठकर हरिहर ने एकमन से जड़भरत के उपाख्यान को कथा के पाला के रूप में लिखकर पूरा किया। उसे याद आया, इसी काशी में बैठकर आज से बाईस साल पहले जब उसने गीतगोविंद का पद्यानुवाद किया था, तब उसकी उम्र चौबीस बरस थी। देश जाकर जीवन का उद्देश्य जैसे उसके ख़ुद के सामने और भी स्पष्ट हो उठा था। काशी में इतना नहीं था—देश लौटकर चारों ओर दाशू राय के गीत, दीवानजी के गीत, गोविंद अधिकारी का शुक-सारिका द्वंद्व, लोका धोबी के दल के मोती-जूड़ी के गीतों का विस्तृत प्रचलन और धाक ने उसके मन पर एक नए क़िस्म का प्रभाव डाला था।
रात में पत्नी से क़िस्से कहता, बाज़ार में बारोय़ारी में कबि-गान हो रहा है, समझी? बैठकर सुनता रहा, समझी?...सीधे-सादे पद थे सब...कुछ भी नहीं, ठहरो तो, गृहस्थी ज़रा सँभल जाए, ठीक से बैठूँ—नए तरह का पाला रचूँगा—ये सब तो वही मान्धाता के ज़माने के पद गाते हैं—राजू से कल यही कह रहा था—
बहुत रात गए उठकर, किसी-किसी दिन हरिहर बाहर बरामदे में बैठकर कुछ सोचता, किसी अनिश्चित आनंद से उसका मन पंख की तरह हल्का हो उठता।
कैसा उज्ज्वल भविष्य है उसके सामने!...
झाड़-फानूस की रोशनी से झिलमिलाते बड़े-बड़े जलसों में वह देखता है, देश-देश में, गाँव-गाँव में उसकी छड़ा, गीत, श्यामा-संगीत, पद, रातों-रात गाए जा रहे हैं। कितनी दूर-दूर से खेत-खलिहान लाँघकर लोग खाने की पोटलियाँ बाँधे सुनने के लिए बैठे हैं। गानेर दलेर अधिकारी उसके घर आकर, मनुहार करके पाला माँगकर ले गए हैं।
वाह! बहुत ख़ूब तो! किसकी रची छड़ा है?—"कविगुरु ठाकुर हरु—" हरु ठाकुर की? नहीं। निश्चिन्दिपुर के हरिहर राय महाशय की।
इसी दशाश्वमेध घाट पर बैठकर ही तो बाईस साल पहले मन-ही-मन कितना कुछ बनाया-बिगाड़ा था—फिर न जाने कब वह सब धीरे-धीरे भूल गया, कब धीरे-धीरे नई खाता-बहियों का गट्ठर बक्से के एक उपेक्षित, गुप्त कोने में पनाह लेकर दिन की रोशनी से मुँह छिपाए पड़ा रहा—यौवन का स्वप्न-जाल जीवन-मध्याह्न में कुहासे की तरह क्षितिज में विलीन हो गया।
खोए हुए यौवन की ओर देखने से सीने में एक हूक-सी उठती है, कितनी बातें याद आती हैं—जीवन के उन दिनों को क्या एक बार भी लौटाया नहीं जा सकता?
दशाश्वमेध घाट पर बहुत-से लड़कों के साथ अपु की दोस्ती हो गई है। लेकिन यहाँ उसकी उम्र के सभी लड़के स्कूल में पढ़ते हैं, बस वही है जो अभी तक स्कूल में नहीं पढ़ा। निश्चिन्दिपुर में मछली पकड़कर और नाव पर घूमकर दिन कट जाता था, लेकिन यहाँ हमउम्र लड़कों के सामने यह कहना कि वह कुछ नहीं पढ़ता, शर्म की बात लगती है।
इसके अलावा दशाश्वमेध घाट पर जिन लड़कों से उसकी दोस्ती हुई है, वे सभी खाते-पीते घरों के लड़के हैं। पल्टू के बड़े भाई ने एक दिन बातों-बातों में कहा था कि उसके पिता को बहुत विदेश घूमना पड़ता है। अपु ने कहा था—क्यों, तुम्हारे क्या बहुत यजमान-बाड़ी हैं?
पल्टू का बड़ा भाई आश्चर्य से बोला—यजमान-बाड़ी? किसलिए भाई?...
अपु कोई ठीक-ठाक जवाब दे पाता, उससे पहले ही वह बोला—मेरे बाबूजी कॉन्ट्रैक्टरी करते हैं न? इसके अलावा काँथी में छोटी-सी ज़मींदारी है—लेकिन आजकल क़िस्त देकर बचता ही क्या है?
किसी-किसी शाम अपु दशाश्वमेध घाट पर घूमने जाकर अपने बाबूजी के मुँह से पुराण-पाठ सुनता है। हरिण-शिशु के शिकारी द्वारा मारे जाने पर, उस हरिण-शावक के स्नेह में डूबे राजर्षि भरत की करुण विरह-वेदना और अंत में उनकी मृत्यु की कथा षष्ठी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर एकमन से सुनते-सुनते उसकी आँखों में आँसू आ जाते—उधर जब सिंधु-सौवीर के राजा रहूगण, उनका असली स्वरूप न जानकर, ब्रह्मर्षि भरत को पालकी ढोने वाला नियुक्त करते हैं—तब से कौतूहल और उत्कंठा से उसका हृदय धक्-धक् करने लगता, मन में होता कि अब कुछ घटेगा; ज़रूर घटेगा। कथा के अंत में पूरबी सुर में गाया जाने वाला आशीर्वाद उसे बहुत अच्छा लगता—
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी शस्यशालिनी...
लोकाः सन्तु निरामयाः.....
शाम के समय मंदिरों में शंख-घंटे की ध्वनि के साथ डूबते सूरज की लाल आभा और पूरबी की मूर्च्छना के साथ हरिण-शावक की वियोग-वेदना में व्याकुल राजर्षि का दर्द जैसे घुलमिल जाता है।
घर पर काग़ज़-क़लम बाबूजी से लेकर कहता—मुझे लिख दो न बाबूजी, वो जो आप गाते हो—काले वर्षतु पर्जन्यः?
हरिहर ख़ुश होकर कहता—तू भी सुनता है क्या बेटा?
—मैं तो रोज़ ही रहता हूँ—आप कल जब भरत की माँ के मरने की बात कह रहे थे, मैं तब तो आपके पीछे ही बैठा था—षष्ठी मंदिर की सीढ़ी पर—
—तुझे कैसा लगता है—अच्छा लगता है?
—ख़ू-उ-उ-उ-ब। मैं तो रोज़-रोज़ सुनता हूँ—
लेकिन अपु एक बात छिपा जाता। जिस दिन उसके साथी होते, उस दिन वह बाबूजी की तरफ़ नहीं जाता। उस दिन वह बाबूजी के पास से गुज़र रहा था, उसके बाबूजी ने देखकर पुकारा—बेटा, ओ बेटा—
उसके साथ वाले दोस्त ने पूछा—तुम्हें पहचानते हैं क्या?
अपु ने बस गरदन हिलाकर बताया, हाँ। वह उस दिन बाबूजी के पास नहीं आया। उसके बाबूजी घाट पर कथा-वाचन करते हैं, यह बात कहीं दोस्त जान न जाएँ! उसने पल्टू के दादा को छोड़कर बाकी दोस्तों से कहानी गढ़ दी है कि काशी में उनका घर है, वे काशी में हवा बदलने आए हैं, देश में बहुत बड़ा मकान है, उसके बाबूजी कॉन्ट्रैक्टरी करते हैं, और देश में ज़मींदारी भी है। अंत में कहता—लेकिन ज़मींदारी होने से क्या होगा, क़िस्त देकर बचता ही क्या है?
उसके दोस्तों की उम्र उससे बहुत ज़्यादा नहीं है, इसीलिए शायद उसकी गढ़ी हुई कहानी और उसके कपड़े-लत्तों के बीच का असामंजस्य पकड़ में नहीं आता, ख़ासकर उसके सुंदर चेहरे के कारण सब कुछ मानाइय़ा याय़।
पूर्णिमा के दिन कथावाचक ठाकुर के यहाँ ख़ूब भीड़ हुई। शाम के बाद हरिहर कथा समाप्त करके घाट की मेंड़ पर बैठकर सुस्ता रहा था, कथावाचक ठाकुर जल में हाथ-मुँह धोने उतरा। हरिहर को देखकर बोला—अरे आप भी हैं, देखा तो काण्ड, पूनम का दिन था, सोचा आज का दिन अच्छा है, बामन-भिक्षा लगाऊँ—महीने-महीने इसी काशी में बामन-भिक्षा हो तो पंद्रह सेर, आधा मन चावल पड़ जाता था—आजकल महाशय, महा-बामन-भिक्षा में भी लोग नहीं भीजते—चावल का तो एक दाना नहीं—इधर सिकि-पाँचेक हुआ होगा, उसमें भी दो खोटे दोअन्नी!...महाशय की शिक्षा कहाँ हुई?
—शिक्षा तो यहीं काशी में ही हुई थी, बहुत दिन पहले। पर इतने दिन देश में ही था—इस बार यहाँ आकर डेरा किया है...।
—महाशय का डेरा क्या नज़दीक है?...थोड़ी चाय पिला सकते हैं?...कई दिन से सोच रहा हूँ थोड़ी चाय पीऊँ—ये देखिए न, चादर के कोने में चाय बाँधकर घूमता हूँ, सोचता हूँ किसी हलवाई की दुकान पर थोड़ा गरम पानी कर लूँ...गला बैठ गया है, थोड़ी नमक वाली चाय पीता तो गला...
—हाँ-हाँ, आइए न, यहीं पास में ही मेरा डेरा है—चलिए न? कथावाचक को लेकर हरिहर घर आया।
चाय पीने का चलन तो घर में कभी था ही नहीं। कड़ाही में पानी गरम करके चाय बनी। अपु काँसे के गिलास में चाय और तश्तरी में कुछ नाश्ता कथावाचक के सामने ले आया। नाश्ता देखकर कथावाचक ठाकुर बड़ा ख़ुश हुआ—नाश्ते की उम्मीद उसने नहीं की थी।
—यह बेटा है क्या! वाह, बड़ा अच्छा बेटा है आपका? बड़ा सुंदर दिखता है, वाह—आओ-आओ बेटा, रहो-रहो, कल्याण हो—नमक वाली चाय बनवाई है न महाशय?...देखूँ—
हरिहर ने कहा—आपके क्या बाल-बच्चे सब यहीं हैं—
—संसार ही नहीं है तो बाल-बच्चे?...दस बीघा ज़मीन भी चली गई, अथच ओ मूलेओ हाभात—ज़मीन क'बिघा अगर आज होती—तो क्या आज इतनी दूर आता—आप भी जैसे!...ये सब क्या देश हैं महाशय?...विश्वेश्वर बेशक सिर पर रहें—ऐसी सर्दी गुज़र रही है महाशय—न थोड़ा खजूर का रस, न थोड़ा गुड़-पाटली—मेरे अपने महाशय, दो कोड़ी खजूर के पेड़ हैं—
—महाशय का देश कहाँ है?
—सातखीरा के पास बादुड़े—शीतलकाटी जानते हैं? शीतलकाटी के चक्कत्ति बड़े घराने के हैं—
हरिहर तंबाकू साज़कर, ख़ुद कुछ कश लगाकर कथावाचक ठाकुर के हाथ में देते हुए बोला—लीजिए—कुछ नहीं महाशय, फागुन के महीने की तरफ़ तो जाता ही हूँ—एक बाग़ है, बेच आता हूँ—हम आबार श्रोत्रिय़ किना?...तो ज़मीन दस बीघा थी, वही गिरवी रखकर दहेज जुटाया—ब्याह भी किया,—महाशय, दस साल घर किया—हुआ क्या जानते हैं? शाम को रसोईघर की चाल से कद्दू काटने गई—था महाशय वहाँ साँप मेरे लिए तैयार होकर—हाथ में डस लिया—और मैं उस दिन घर पर था नहीं—किसने वैद्य-कविराज दिखाया, किसने क्या किया—पाटुलि का घाट पार कर रहा हूँ—गाँव का महेश साधुखाँ उस पार से आ रहा है, मुझसे बोला—जल्दी घर जाइए महाशय—आपके घर बड़ा संकट है—क्या संकट, वो बताता नहीं—घर पहुँचकर देखा, पिछली रात ही बहू तो मर चुकी थी! यह हुआ हाल महाशय...ज़मीन की ज़मीन गई—इधर से भी। उसी दिन से सोचा, चलो, देश में रहकर अब होगा भी क्या—कहाँ से लाऊँगा तीन-चार सौ रुपए कि फिर से ब्याह करूँ?...चलो विश्वनाथ के यहाँ...अन्न का कष्ट तो नहीं होगा...आज आठ साल हो गए—एक चचेरा भाई है—ज़मीन-जायदाद जो थोड़ी-बहुत है, क़ब्ज़ा करके बैठा है—कहता है तुम्हारा हिस्सा नहीं—ठीक है बापू, नहीं है तो नहीं है, झमेले में मैं कभी नहीं पड़ूँगा—करो क़ब्ज़ा जो करना है। उठता हूँ महाशय—आपके यहाँ अच्छी चाय पी—आपका लड़का कहाँ गया?...अच्छा लड़का है, ख़ासा लड़का है—
पुराने चमड़े पर ताली लगे कैनवस के जूते की जोड़ी झाड़कर कथावाचक ठाकुर ने पैरों में डाली और दरवाज़े तक आया—जाते-जाते बोला—कल भी लगाऊँगा बामन-भिक्षा—देखूँ क्या होता है—
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