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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · चौंतीसवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

चौंतीसवाँ परिच्छेद

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कुछ दिनों बाद अपू दालान से गुज़र रहा था, कि ऊपर की सीढ़ियों से मँझली बहू-रानी की बेटी लीला उतर रही थी। उसे देखते ही वह बोली, "ज़रा रुको तो! तुम्हारा नाम क्या है—अपू है क्या?"

अपू बोला—"सब अपू कहकर बुलाते हैं—अच्छा नाम श्रीअपूर्वकुमार राय है..."

वह ज़रा अचंभे में पड़ गया। इस घर के लड़के-लड़कियों ने कभी उसे बुलाकर बात नहीं की थी। लीला पास आकर खड़ी हो गई। कैसा सुन्दर मुखड़ा! रानू-दी, अतसी-दी, अमला-दी, सभी देखने में अच्छी थीं, पर तब तक उसने उनसे सुन्दर किसी को देखा ही नहीं था। इस घर में आने के बाद से उसकी पुरानी धारणा एकदम बदल गई थी। ख़ासकर मँझली बहू-रानी जैसी सुन्दर स्त्री की तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लीला भी अपनी माँ की तरह ही सुन्दरी थी—उस दिन जब लीला लड़कियों की महफ़िल में हँसी की कविता सुना रही थी, तब अपू एकटक उसके चेहरे की ओर ही ताकता रह गया था; कविता तो उसने ठीक से सुनी ही नहीं थी।

लीला बोली—"तुम लोग कितने दिन से आए हो हमारे घर? पिछली बार आई थी तो तुम्हें देखा नहीं था?"

—हम फागुन महीने में आए हैं, इसी फागुन में।

—कहाँ से आए हो तुम लोग?

—काशी से। मेरे बाबा वहीं गुज़र गए न—इसीलिए—

अपू को जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। यह सब कुछ उसे अब भी एक सपने जैसा, एक असम्भव-सा वाकया लग रहा था। लीला, मँझली बहू-रानी की बेटी लीला, उसे बुलाकर, खुद ही आगे बढ़कर उससे बातें कर रही है! ख़ुशी से उसका सारा बदन अजीब-सा होने लगा।

लीला बोली—"चलो, मेरे पढ़ने वाले कमरे में बैठते हैं, मास्टर साहब के आने का समय हो गया है—आओ—"

अपू ने पूछा—"मैं जाऊँगा?"

लीला हँसकर बोली—"अरे, कह तो रही हूँ चलो, तुम तो बड़े शर्मीले हो?—आओ—तुमने देखा नहीं मेरा पढ़ने का कमरा? उस पश्चिमी दालान के कोने में?..."

कमरा बहुत बड़ा नहीं था, पर सजा-सजाया था। एक छोटी पत्थर की मेज़ के दोनों ओर चमड़े की गद्दी वाली दो कुर्सियाँ रखी थीं। एक बड़े से चित्र वाला कैलेंडर। हरे काँच के खोल में एक छोटा टाइम-पीस। हरे काँच के खोल में एक छोटा टाइम-पीस। किताबें रखने की एक छोटी दराज़। चार-पाँच मढ़ी हुई तस्वीरें इस दीवार पर, उस दीवार पर। लीला ने एक चमड़े का अटैची केस खोलकर कहा—"यह देखो मेरी जलछवि, मास्टर साहब ने ख़रीदकर दी है, भाग सीख लूँगी तो और देंगे, तुम जलछवि बनाना जानते हो?"

अपू बोला—"तुम भाग नहीं जानतीं?"

—तुम जानते हो? भाग के सवाल किए हैं?

अपू ने बड़ी बेपरवाही से होंठ सिकोड़कर कहा—"कब के!..."

इस भंगिमा में अपू का सुन्दर मुख और भी सुन्दर लगने लगा।

लीला हँस पड़ी—"तुम तो बड़ी मज़ेदार बातें करते हो!" फिर उसने अपू के होंठों के नीचे हाथ रखकर कहा—"यह क्या है? तिल? तुम्हारे मुँह पर बहुत अच्छा लगता है, तिल तुम पर खूब जँच रहा है, तुम्हारी उम्र कितनी है? तेरह? मेरी ग्यारह—तुमसे दो साल छोटी हूँ—"

अपू बोला—"तुमने उस दिन ज़बानी सुनाई थी, एक हँसी की कविता, मुझे बहुत अच्छी लगी।"

—तुम कविता जानते हो?

—जानता हूँ—बाबा की एक किताब है, उसी से सीखी है—

—सुनाओ तो ज़रा?

लीला के गले का स्वर कितना मीठा था, ऐसा स्वर उसने आज तक किसी लड़की का नहीं सुना था। अपू ने गर्दन हिलाकर कहा—

जिसकी ज़िन्दगी कटे खजूर-चटाई पर पुआल बिछाए,

उसे खाट-पलंग, बढ़िया मसहरी भला कैसे भाए?

बात के अन्त में उसने पूछने के अन्दाज़ में गर्दन हिलाई। बोला—"दाशू राय की पांचाली की कविता है, मेरे पास किताब है—"

लीला हँसते-हँसते लोटपोट होने को आ गई। बोली—"तुम तो बड़ी मज़ेदार बातें जानते हो! ऐसा हँसा सकते हो तुम!..."

लीला के मुँह से अपनी तारीफ़ सुनकर अपू की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसने उत्साह भरे स्वर में कहा—"और एक सुनाऊँ? मैं और भी जानता हूँ—" फिर उसने छत की कड़ियों की ओर आँखें उठाकर ज़रा-सा सोचा और फिर गर्दन हिलाकर शुरू किया—

मुनि की चिंता चिंतामणि, और न कोई आशा,

निठल्ले की चिंता ताश और पाशा।

धनी की चिंता धन और निन्यानबे का धक्का,

योगी की चिंता जगन्नाथ, फ़कीर की चिंता मक्का,

गृहस्थ की चिंता, बनी रहे चार छप्परों की ठसका,

शिशु को चिंता सदा माँ की, पशु को चिंता पेट का।।

इस कविता के सारे शब्दों का अर्थ लीला समझ नहीं पाई। पर वह फिर से हँसते-हँसते लोटपोट होने लगी। बोली, "रुको, लिख लूँगी—"

लीला ने अटैची केस से क़लम निकालकर कहा—"बोलो तो ज़रा?"

अपू फिर से सुनाने लगा। थोड़ी देर बाद वह ज़रा हैरान होकर बोला—"स्याही तो ली नहीं, लिख कैसे रही हो?"

लीला बोली—"यह तो फ़ाउंटेन पेन है—इसमें स्याही नहीं लगती, इसके अन्दर भरी हुई है—जानते नहीं?"

लीला ने क़लम अपू के हाथ में थमा दी। अपू ने उसे उलट-पुलटकर देखते हुए कहा—"अरे, यह तो ख़ूब है, इसे तो स्याही में डुबोना ही नहीं पड़ता!"

—नहीं, स्याही भरी रहती है, भरनी पड़ती है—यह देखो, दिखाती हूँ—

—वाह! ख़ूब है तो! देखूँ ज़रा एक बार—

लीला ने क़लम अपू के हाथ में देकर हँसते हुए कहा—"यह मैंने तुम्हें दे ही दिया समझो—हमेशा के लिए—"

अपू हैरान होकर लीला की ओर ताकने लगा। फिर लजाते हुए बोला—"नहीं, मैं नहीं लूँगा—"

लीला बोली—"क्यों?"

—उँहूँ।

—क्यों?

—ना।

लीला थोड़ी दुखी हुई। बोली—"ले लो न?... मैं बाबा से एक और ले लूँगी, तुम यह ले लो, दिखाओ तो अपना हाथ? बस!... अब लौटा नहीं सकते।"

यह सब अपू को बिल्कुल अवास्तविक लग रहा था। उसने कहा—"लेकिन तुम्हें कोई डाँटेगा तो?"

लीला बोली—"फ़ाउंटेन पेन देने के लिए? कोई नहीं डाँटेगा, मैं माँ को बता दूँगी कि अपूर्व को दे दिया—बाबा से एक और ले लूँगी—बाबा की तस्वीर देखोगे?... वो कैलेंडर के पास टँगी है—रुको, उतारती हूँ—"

उसके बाद लीला ने दो-तीन तस्वीरें और दिखाईं। आलमारी से कुछ किताबें निकालकर बोली—"मास्टर साहब ने ख़रीदकर दी हैं—तुम कौन-से स्कूल में पढ़ते हो?"

अपू काशी में जो कुछ दिन स्कूल गया था, उसके बाद फिर मौक़ा नहीं मिला। बोला—"काशी में पढ़ता था, अब नहीं पढ़ता—" यह बात कहने में उसे संकोच हो रहा था, इसीलिए आख़िरी बात उसने ऐसे स्वर में कही, मानो न पढ़कर कोई बड़ी बहादुरी का काम कर रहा हो। एक किताब में बहुत-सी तस्वीरें थीं। अपू बोला—"यह किताब पढ़ने दोगी एक बार?"

लीला बोली—"ले लो न? मेरे पास और भी बहुत-सी तस्वीरों की किताबें हैं, तीन साल की बँधी हुई 'मुकुल' पत्रिकाएँ हैं, माँ के कमरे की आलमारी में, लाकर दूँगी, पढ़ना—"

अपू बोला—"मेरे पास भी किताबें हैं, लाऊँ?"

लीला बोली—"चलो, तुम्हारे कमरे में चलते हैं—"

लीला को अपने कमरे में ले जाते हुए अपू को शर्म आ रही थी। कोई सामान नहीं, फटे हुए तकियों के गिलाफ़, अलना पर ओढ़ने वाला काँथा। फिर भी लीला गई। अपू ने अपना टिन का बक्सा खोला और एक किताब हँसते-हँसते दिखाकर बड़े गर्व से बोला—"मेरी लिखी हुई है, यह देखो, छपे हुए अक्षरों में मेरा नाम लिखा है—"

लीला ने झट से उसके हाथ से लेकर कहा—"देखूँ, देखूँ?"

वही काशी के स्कूल की पत्रिका थी। हरिहर अपने बेटे की कहानी छपी हुई नहीं देख पाया था, उसकी मृत्यु के तीन दिन बाद पत्रिका निकली थी। लीला पढ़ने लगी, अपू उसके बगल में बैठकर, खिले हुए चेहरे से लीला की आँखों की हरकत के साथ-साथ पढ़ी जा रही पंक्तियों को मन-ही-मन दोहराता जा रहा था। पढ़कर ख़त्म करने के बाद लीला ने तारीफ़ भरी नज़रों से कुछ देर अपू के चेहरे की ओर देखा और बोली—"बहुत अच्छी लिखी है, मैं यह ले जाती हूँ, माँ को दिखाऊँगी—"

अपू को बड़ी शर्म आई। बोला—"नहीं—"

लीला ने नहीं सुना। काग़ज़ को हाथ में ही रखे रही। बोली—"निश्चिन्दिपुर लिखा है, निश्चिन्दिपुर कहाँ है?"

—निश्चिन्दिपुर तो हमारा गाँव है—वहीं तो हमारा असली घर है—काशी में तो हम बस साल भर से थे—

तभी छोटी मोक्षदा ने दरवाज़े के पास आकर कमरे में झाँकते हुए कहा—"ओ माँ, दीदीमणि, तुम यहाँ बैठी हो? हाय मेरी क़िस्मत! उधर मास्टर बाबू बैठे-बैठे परेशान हो रहे हैं, मैं ऊपर-नीचे सब कमरे ढूँढ़-ढूँढ़कर—तो कौन जाने कि तुम इस सीलन-भरी घुप्प कोठरी में—चलो, चलो—"

लीला बोली—"जा तू, मैं आ रही हूँ, जा—"

छोटी मोक्षदा बोली—"तो क्या यह बैठने की जगह है? हम ही कहते हैं तो सिर दुखने लगता है—भला वे अस्तबल के खोट्टा लोग घोड़ों की जगह साफ़ करते हैं, कि धोते हैं? उँह-हूँ, कैसी गंध आ रही है देखो तो—चलो दीदीमणि, जल्दी—"

लीला बोली—"नहीं जाऊँगी, जा! मैं आज नहीं पढूँगी, जा कह दे जाकर—किसने कहा है तुमसे यहाँ आकर बक-बक करने को? जा, माँ से कह दे जाकर—"

छोटी मोक्षदा खिसियाकर चली गई। अपू बोला—"तुम्हारी माँ डाँटेंगी नहीं? क्यों उसे ऐसा बोला?"

अगले दिन दोपहर को वह अपने कमरे में सो रहा था। किसी के झकझोरने से नींद टूटी तो आँखें खोलकर देखा—लीला हँसते हुए चेहरे के साथ बिस्तर के पास खड़ी है। वह फ़र्श पर चटाई बिछाकर सो रहा था, लीला घुटनों के बल बैठकर उसे हिलाकर उठा रही थी, अब भी उसी तरह शरारत-भरी बड़ी-बड़ी आँखों से उसकी ओर देख रही थी। हँसते हुए बोली—"ख़ूब है, दोपहर में भला कोई ऐसे सोता है? मैंने बाहर से आवाज़ दी, आकर देखा तो गहरी नींद में हो—"

अपू अँगोछे के छोर से आँखें मलता हुआ जल्दी से उठ बैठा। बोला—"सुबह पढ़ने नहीं आईं? मैंने तो पढ़ने के कमरे-वमरे सब जगह ढूँढा, कोई कहीं नहीं था—"

लीला ने अपू के स्कूल वाली वह पत्रिका उसके हाथ में देकर कहा—"कल रात माँ को पढ़कर सुनाया, माँ ने ख़ुद भी पढ़कर देखा।"

ख़ुशी से अपू का सारा बदन अजीब-सा हो उठा। उसे बहुत शर्म और संकोच महसूस हुआ। मँझली बहू-रानी ने उसकी लिखी कहानी पढ़ी है!

लीला बोली—"आओ मेरे पढ़ने वाले कमरे में, 'सखा-साथी' की जिल्द बँधी हुई लाकर रखी है तुम्हारे लिए—"

अपू ने अलना की ओर देखा। उसका अच्छा वाला कपड़ा अभी तक सूखा नहीं था, जो पहने था उसे पहनकर बाहर नहीं जाया जा सकता था। बोला—"अभी नहीं जाऊँगा—"

लीला ने हैरानी से कहा—"क्यों?"

अपू ने होंठ दबाकर शरारती मुस्कान के साथ गर्दन हिला दी। वह नहीं जानता था कि इस भंगिमा में उसका चेहरा कितना अपूर्व सुन्दर लगता है।

लीला ने मिन्नत-भरे स्वर में कहा—"आओ न, चलो—"

अपू फिर मुँह दबाकर हँस दिया।

—बाबा रे, कितने ज़िद्दी लड़के हो तुम! ना कह दिया तो फिर हाँ होने का कोई उपाय नहीं, क्यों? अच्छा रुको, किताब यहीं—

अपू हँसी रोक नहीं पाया और खिल-खिलाकर हँस पड़ा।

लीला बोली—"इतनी हँसी क्यों? क्या हुआ है बोलो—नहीं, बोलना ही पड़ेगा—ज़रूर—"

अपू ने हँसी-भरी आँखों से सिर्फ़ अलना की ओर इशारा किया, कुछ बोला नहीं।

इस बार लीला समझ गई। अलना के पास जाकर हाथ से छूकर बोली—"थोड़ा-सा तो सूख गया है, तुम बैठो, मैं किताब लाती हूँ—फ़ाउंटेन पेन से लिख रहे हो? कैसी है, अच्छी लिखाई होती है न?"

उसके बाद बहुत देर तक दोनों लीला की लाई हुई किताब देखते रहे। किताब चटाई पर फैलाकर, दोनों अगल-बगल घुटनों के बल बैठकर, किताब पर झुककर तस्वीरें देख रहे थे। लीला के रेशम जैसे चिकने, मुलायम बाल अपू के नंगे बदन को छू रहे थे तो बदन में एक सिहरन-सी दौड़ जाती। अचानक लीला ने किताब से मुँह उठाकर पूछा—"तुम गाना जानते हो?"

अपू ने गर्दन हिलाकर मना किया।

—तो एक गाओ—

—तुम जानती हो?

—थोड़ा-थोड़ा, क्यों, शादी वाले दिन नहीं सुना था?

छोटी मोक्षदा दासी ने कमरे में झाँककर कहा—"ये रहीं दीदीमणि यहाँ। मैंने भी मन में यही सोचा था, ऊपर नहीं हैं, पढ़ने के कमरे में नहीं हैं, तो पक्का—इधर आओ, यह ज़रा-सा दूध पी जाओ, ठंडा हो गया—हाथ में लिए ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गई—"

चाँदी के छोटे गिलास में एक गिलास दूध! लीला बोली—"रखकर जा—बाद में आकर गिलास ले जाना।"

दासी चली गई। थोड़ी देर और किताब की तस्वीरें देखी गईं। एक मौक़ा पाकर लीला ने दूध का गिलास हाथ में उठाकर कहा—"तुम पी लो आधा—"

अपू ने शरमाते हुए कहा—"नहीं।"

—तुम्हारी तो हर बात में बड़ी ख़ुशामद करनी पड़ती है—ऐसे क्यों हो? हमारे यहाँ की मुल्तानी गाय का दूध है—पी लो न—खीर जैसा दूध है, अच्छा लड़का—

अपू ने आँखें सिकोड़कर कहा—"इश! अच्छा लड़का? बड़ा आया... आप आईं फिर—"

लीला ने दूध का गिलास अपू के मुँह से लगाकर गर्दन हिलाते हुए कहा—"अब शरमाने से काम नहीं चलेगा—मैंने आँखें मूँद ली हैं, लो—"

अपू एक घूँट में काफ़ी सारा दूध पीकर मुँह नीचे कर लिया और होंठों के ऊपर लगी दूध की सफ़ेदी जल्दी-जल्दी अँगोछे के छोर से पोंछते-पोंछते हँस पड़ा।

लीला ने गिलास में मुँह लगाकर बाकी दूध ख़त्म कर दिया, फिर वह भी खिल-खिलाकर हँस पड़ी।

—बहुत मीठा दूध है, है न?

—मेरा जूठा क्यों पिया? किसी दूसरे का जूठा खाते हैं भला?

—मेरी मर्ज़ी—थोड़ी देर रुककर बोली—"तुमने कहा था कि जलछवि बनाना जानते हो, ख़ाक जानते हो, आज मेरी कुछ जलछवियाँ बना दोगे?

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