पराए घर में चोरों की तरह यूँ सर्वथा पराधीन होकर रहना सर्वजया के जीवन में यह पहला अवसर था। सुख हो या दुःख, इतने दिनों तक वह अपने घर की अकेली मालकिन थी। उस दरिद्र संसार की राजरानी—वहाँ उसका हुकुम इस विशाल भवन की मालकिनों, बहु-रानियों के हुकुम से कम असर नहीं रखता था। यह तो जैसे हर वक़्त सहमकर रहना, हर पल मन-मरज़ी का ख़याल रखना, किसी और के चेहरे की तरफ़ देखकर राह चलना, कि पान से चूना न खिसक जाए।—छोटे से भी छोटा, और उससे भी तुच्छ!.....यह अब उसके लिए असह्य होता जा रहा था। खटते-खटते मुँह को खून आ जाता—लेकिन यहाँ मेहनत का कोई मोल नहीं। जी-जान से खटो—कोई नाम लेने वाला नहीं। वे जब देंगे तब गर्व से, तिरस्कार से फेंककर देंगे—तुम्हारी मेहनत का मोल चुका रहे हैं, इसलिए बराबर वालों की तरह नहीं देंगे। तुम्हें घुटने टेककर ही लेना होगा।
यह धीरे-धीरे उसके लिए असहनीय होता जा रहा है। लेकिन उपाय क्या है?....बाहर जाने की सुविधा कहाँ? कौन आश्रय देगा? कहाँ जाकर खड़ी होगी?....
क्या जीवन भर ऐसे ही कटेगा? जब तक जिएगी, तब तक? उस बाम्नी मौसी की तरह?...
विवाह के उत्सव का सिलसिला अभी थमा नहीं था, आज स्त्रियों का प्रीतिभोज था, संध्या होते ही निमंत्रित महिलाओं की गाड़ियाँ पिछले फाटक पर आने लगी थीं। भीतर का बड़ा दरवाज़ा पार करते ही सामने स्त्रियों के महल में, दूसरी मंज़िल के बरामदे पर चढ़ने के लिए संगमरमर की चौड़ी सीढ़ियों पर नीले फूलों वाली क़ालीन बिछी थी। पूरे बरामदे और सीढ़ियों पर गैस की रोशनी थी, दूसरी मंज़िल के बरामदे में चढ़ने के मुहाने पर गैस का बड़ा-सा झाड़ जल रहा था। दोनों बहु-रानियाँ और घर की लड़कियाँ स्वागत करके सबको ऊपर भेज रही थीं। निमंत्रित स्त्रियाँ कोई मंद-मंद मुस्कुराती, कोई हँसी की लहरें उठाती, कोई धीर, कोई तेज़, कोई सुंदर, अपूर्व गति-भंगिमा से सीढ़ियाँ चढ़ रही थीं।
अपु बहुत देर से नीचे बरामदे में एक खंभे के पास खड़ा देख रहा था। इस तरह का दृश्य जीवन में उसने पहली बार देखा था, उस दिन विवाह की रात सो जाने के कारण वह कुछ विशेष देख नहीं पाया था। सबसे अच्छी उसे इस घर की लड़की सुजाता लग रही थी। वह क़ालीन-मढ़ी संगमरमर की सीढ़ियों से एक-एक बार उतरकर आती, निमंत्रितों में से किसी की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहती— वाह, ख़ूब मणी-दी? एकदम रात आठ बजे? बकुलबागान वाली भाभी नहीं आईं? अभ्यागता सुंदरी ने हँसकर कहा—गाड़ी सजाए बैठी हूँ शाम छः बजे से....निकलना कोई आसान है बहन, सब तैयार न हों तो....जानती ही हो सब—
सुजाता कंचनफूल के रंग की महँगी चाइना क्रेप की बिना आस्तीन की क़मीज़ से झाँकती अपनी शुभ्र, सुगोल, गदराई बाँह से पीछे से मेहमान को बाँहों में भरकर दुलार के अंदाज़ में उनके दाहिने कंधे पर मुँह रखकर एक साथ ऊपर चढ़ने लगी। चलते-चलते बोली—माँ कह रही थीं कि बकुलबागान वाली भाभी शायद अगले महीने कलकत्ता जाएँगी—बुधवार को माँ गई थीं न—कुछ तय हुआ?
सीढ़ी के ऊपरी पायदान पर मँझली बहु-रानी दिखाई दीं। उम्र कुछ ज़्यादा, शायद तीस के ऊपर, पर अपूर्व सुंदरी। उनके वेश में कोई आडंबर न था, फीके चंपा-रंग की चौड़े लाल पाड़ वाली रेशमी साड़ी का पल्लू सिर के बालों में हीरे की क्लिप से अटका था, सीढ़ी के बड़े झाड़ की रोशनी में गले की पतली सोने की चेन झिलमिला रही थी, सुंदर गठन, कुछ धीर, गंभीर—इस उम्र में भी दूध-और-आलता मिले रंग की आभा अपूर्व थी। महीने भर पहले ही सगे भाई के गुज़र जाने से ज़रा-सी विषाद की छाया उस परिपक्व मुख के सौंदर्य को एक संयत श्री प्रदान कर रही थी।
मणी-दी चढ़ते-चढ़ते मँझली बहु-रानी को सामने देखकर सीढ़ी पर ही खड़ी हो गईं—मँझली भाभी की तबीयत आजकल कैसी रहती है? यही देखिए न, आऊँगी-आऊँगी करके...कल वे लोग एटावा से सब आए, उसी में बहुत रात तक...
इंसान इतने सुंदर भी होते हैं, अपु को यह कल्पना भी न थी। अपु ने इन्हें पहली बार देखा था क्योंकि वह इतने दिन यहाँ थीं नहीं, भाई की मृत्यु के बाद अभी कुछ ही दिन हुए मायके से आई हैं—वह मुग्ध आँखों से, अपलक विस्मय की दृष्टि से देखता रहा। यह रोशनी, चारों ओर सुंदरियों का मेला, महँगे इत्र की धीमी, मन-मतवाली सुगंध, वीणा की झंकार जैसे सुर और हँसी की लहरों से उस पर जैसे एक नशा-सा छा गया। यह सब अगर दिन भर चले तो?.....
मँझली बहु-रानी बहुत देर से देख रही थीं कि सीढ़ी के कोने में एक अपरिचित लड़का खड़ा है। वह सबको पहचानती नहीं थीं—उनके पिता भी बहुत बड़े आदमी थे, वह अक्सर मायके ही रहती थीं। दो पायदान नीचे उतरकर उन्होंने मंद स्वर में पुकारा—बेटा, ऊपर आओ। खड़े क्यों हो? तुम कहाँ से आ रहे हो?....
अपु दूसरी तरफ़ देखकर आगंतुकों के एक दूसरे दल को देख रहा था—अचानक मुड़कर देखा कि मँझली बहु-रानी उसी को बुला रही हैं तो पहले तो चकित रह गया—जैसे विश्वास ही न कर सका। फिर दुनिया-जहान की लाज ने आकर उसे घेर लिया और वह सोचने लगा कि ऊपर चढ़ जाए या भाग खड़ा हो—तभी मँझली बहु-रानी ख़ुद ही उतर आईं—पास आकर बोलीं—कहाँ से आ रहे हो बेटा?....
बड़ी मुश्किल से, बहुत कोशिश के बाद अपु के मुँह से निकला—मैं—मैं—वो—मेरी माँ—इसी घर में रहती हैं— साथ-ही-साथ उसे बहुत डर लगा कि वह यहाँ खड़ा है—न जाने कहाँ का एक बावर्ची का बेटा—यह सुनकर शायद अभी वह किसी को बुलाकर कहेंगी—इसे धक्का मारकर यहाँ से निकाल दो।....
लेकिन मँझली बहु-रानी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया—उन्होंने चकित मुख से कहा—तुम्हारी माँ इसी घर में रहती हैं?....कौन हैं बताओ तो...क्या करती हैं? कितने दिन हुए तुम लोगों को आए?
अपु ने टूटे-फूटे शब्दों में ऊल-जलूल-सा अपना परिचय दिया।
मँझली बहु-रानी ने शायद इन लोगों के बारे में इस बार आकर सुना था—बोलीं—ओह, तो तुम लोग काशी से आए हो?...क्या नाम है तुम्हारा?—उसकी सुंदर, सरल आँखों की ओर देखकर उन्हें शायद उस पर कुछ करुणा हो आई। बोलीं—ऊपर आकर खड़े हो जाओ न—यहाँ क्यों?—ऊपर आओ—
अपु चोर की तरह बहु-रानी के पीछे-पीछे ऊपर जाकर एक कोने से सटकर खड़ा हो गया।
ऊपर स्त्रियों की बड़ी महफ़िल जमी थी, पूरा बरामदा क़ालीन से ढका था। किनारे-किनारे काँच के बड़े-बड़े गमलों में गुलाब के पौधे, एरिका पाम थे। कोने में बड़े बैठकख़ाने का ऑर्गन रखा था। एक युवती कुछ देर मान-मनौवल के बाद ऑर्गन के पास गद्दीदार छोटे स्टूल पर जा बैठीं और दो-एक बार हल्के हाथ से चाबियाँ दबाकर—कुछ देर चुप रहकर मुस्कुराते हुए एक गीत गाने लगीं। युवती देखने में सुश्री नहीं थी, रंग साँवला-सा था, लेकिन गाने का गला बहुत सुंदर था। उसके बाद एक और युवती ने गीत गाया, यह युवती देखने में उतनी अच्छी नहीं थी। मँझली बहु-रानी की बेटी लीला ने गरदन हिलाते-हिलाते एक हास्य-कविता सुनाकर सबको ख़ूब हँसाया। बड़ी सुंदर लड़की थी, माँ की तरह सुश्री। और क्या मीठी हँसी थी!
अपु सोच रहा था कि इस समय उसकी माँ एक बार ऊपर आकर क्यों नहीं देख गई? न जाने माँ किस रसोईघर में पड़ी है, शायद काम कर रही है, ये सब माँ और कहाँ देख पाएगी?
स्त्रियों की महफ़िल चल ही रही थी कि नीचे एक हो-हल्ला मच गया। गिरीश सरकार की आवाज़ ज़ोर से सुनाई दे रही थी।
सदू झाई हँसते-हँसते ऊपर आई और बोली—अभागी!....कांड तो देखो....ही ही....कहता है कि हुक्के के अंदर....ही ही....।।
दो-तीन निमंत्रित महिलाओं ने पूछा—क्या हुआ री? क्या?
—वही ठेके का एक ठाकुर आया था कहीं से....पूरी तलने गया था....सरकारों के भोजन-कक्ष के आँगन में बैठकर पूरी तल रहा था....कहता है मैं बाहर से एक बार....हुक्के के अंदर....ही ही....भरकर चुरा ले जा रहा था....आध सेर से ऊपर....गोमश्ता जी ने पकड़ लिया....रामनिहोर सिंह जो मार मार रहा है...चोटी पकड़कर—
सर्वजया को आज सुबह से साँस लेने की फ़ुरसत नहीं थी।
लगभग दो मन मछली तलने का भार अकेले उसी पर था—सुबह आठ बजे से वह मछली-घर में इसी काम में लगी थी। शोर-शराबा सुनकर वह कमरे से बाहर आई तो देखा कि आँगन-भर लोगों के बीच एक पच्चीस-तीस साल के दुबले-पतले, साँवले रंग के, मैले कपड़े पहने ब्राह्मण के लड़के पर दो-तीन लोग मिलकर कोई घूँसे तो कोई थप्पड़ बरसा रहे थे—वह आदमी ठेके का बावर्ची था, आज के काम के लिए ही बाहर से आया था—वह कथित तौर पर हुक्के में भरकर घी चुराकर ले जा रहा था। उसका वह हुक्का एक तरफ़ छिटका पड़ा था और घी आँगन में एक ओर फैल गया था—मार के ज़ोर से उसकी धोती की काछ खुल गई थी—वह आदमी घबराकर सफ़ाई देने की कोशिश कर रहा था और उन्मत्त जनसमूह को यह समझाने का प्रयास कर रहा था कि हुक्के के भीतर घी मिलना एक बहुत ही स्वाभाविक और नित्य-नैमित्तिक घटना है या इसमें संदेह करने अथवा आश्चर्यचकित होने जैसी कोई बात नहीं है।
बात पूरी करने से पहले ही शंभूनाथ सिंह दरबान ने उसे ऐसा एक धक्का मारा कि वह अस्फुट स्वर में ‘बाप रे’ कहकर दालान के कोने की ओर घूमकर गिर पड़ा और खंभे के कोने में उसका सिर ज़ोर से ‘ठक्’ से टकरा गया और शायद खून भी निकल आया।
सर्वजया ने क्षेमी झाई से पूछा—क्या हुआ क्षेमी-मौसी?....आह, ऐसे कोई मारता है भला?....ब्राह्मण का बेटा है,...
क्षेमी बोली—मारेगा नहीं! हड्डी-पसली एक कर देगा....अभी तो मार पड़ी ही कहाँ है...पुलिस को देगा, बाघ के घर में घोग का बसेरा—
क्षेमी झाई के मुँह की बात मुँह में ही रह गई।
वह ऊपर चढ़ने की सीढ़ी की ओर देखकर ही सहमी-सी खड़ी रह गई। सर्वजया ने मुड़कर देखा कि एक पैंसठ-सत्तर वर्ष की वृद्धा सीढ़ियों से उतर रही हैं, साथ में घर की मालकिन, पीछे दोनों बहु-रानियाँ और इस घर की बेटियाँ अरुणा और सुजाता। सभी नौकर-चाकरों की टोली सहमी हुई अवस्था में सीढ़ी के नीचे बरामदे में क़तार लगाकर खड़ी हो गई—एक-दूसरे की पीठ के पीछे से झाँक-झाँककर देखने लगी। सर्वजया ने क्षेमी झाई से चुपके से कहा, कौन हैं क्षेमी-मौसी? क्षेमी झाई ने फुसफुसाकर कुछ कहा—कहीं की रानी-माँ—सर्वजया ठीक से सुन नहीं पाई।
लेकिन उसे लगा, ठीक ऐसी ही सूरत की एक स्त्री को उसने जैसे पहले कहीं देखा है। मालकिन ने किसी से कहा—पिछवाड़े के फाटक पर इनकी पालकी आई है या नहीं, देखकर आओ। वृद्धा के साथ भी दो-तीन दासियाँ आई थीं, वे पीछे-पीछे थीं। नाना प्रकार के विदाई और सत्कार का आदान-प्रदान हुआ, अनेक विनीत मुस्कानें बिखेरी गईं, अचानक इस घर के नौकर-चाकरों की टोली ज़मीन पर लोटकर प्रणाम करके कुछ देर के लिए जैसे मिट्टी में मिल गई। सर्वजया ने मन-ही-मन सोचा—ये इतने बड़े लोग हैं, जब ये इतनी ख़ातिर कर रहे हैं, तब तो यह कोई ऐरी-गैरी नहीं होगी.....! वृद्धा की सोलह कहारों वाली विशाल पालकी पिछवाड़े के फाटक पर ही इतनी देर से थी, वृद्धा भी पालकी में जा बैठीं। उनके दरबान पालकी के आगे-पीछे खड़े हो गए। उन्हें विदा देकर मालकिन और अन्य युवतियाँ ऊपर चली गईं।
मौसी-माँ ने रोटी-घर में आकर चुपके से कहा—पैसे का खेल है बाबू, देखा न पैसे का आदर? ख़ुद की बहुत बड़ी ज़मींदारी है, दो लाख रुपए दान किए हैं, बंगाल देश के किसी कॉलेज के लिए—पैसे का ही आदर है—और एक मैं हूँ....उनके तो अपने लोगों में से हूँ...कोई पूछता तक नहीं।
लेकिन सर्वजया का मन उस ओर नहीं था। उसे अभी-अभी याद आया है। लगभग ऐसी ही सूरत और ऐसी ही उम्र की— वह उसकी बूढ़ी ननद इन्दिर ठाकरुण, वही फटी साड़ी में गाँठ लगाकर पहनना, टूटी कटोरी में आमड़े के साथ भात, एक तुच्छ-से नोना फल के लिए कितना अपमान, कोई पूछता नहीं, कोई मान नहीं, भरी दोपहरी में उसे घर से निकाल देना, राह में पड़ी वह दीन मृत्यु....।
सर्वजया के आँसू अब बाधा न मान रहे थे।
मनुष्य की अंतर्वेदना मृत्यु के उस पार पहुँचती है या नहीं, सर्वजया नहीं जानती, फिर भी आज वह बार-बार मन-ही-मन क्षमा माँगकर अपनी कच्ची उम्र के अपराध का प्रायश्चित करना चाह रही थी।
© 2026 Matribhasa Hindi. Public Domain
Comments (0)
Log in to join the conversation.