वैशाख मास के आरंभ में हरिहर ने निश्चिन्दिपुर से अपना बसेरा उठाने का सारा प्रबंध कर लिया। जो सामान साथ ले जाना संभव न था, उसे बेचकर उसने छोटे-मोटे कर्ज़ चुका दिए। उस ज़माने के कटहल की लकड़ी का बना बड़ा तख़्तपोश, संदूक और कई पीढ़ियाँ घर में थीं; ख़बर पाकर दूसरे मुहल्ले से भी ख़रीददार आकर उन्हें सस्ते दाम पर ख़रीद ले गए।
गाँव के बुज़ुर्गों ने आकर हरिहर को समझाने-बुझाने और रोकने की कोशिश की। निश्चिन्चिपुर में दूध और मछली कितने सस्ते हैं या यहाँ कितने कम ख़र्च में गुज़ारा हो जाता है, इसकी एक तुलनात्मक सूची भी उन्होंने ज़बानी ही पेश कर दी। केवल राजकृष्ण भट्टाचार्य अपनी पत्नी के सावित्री-व्रत का निमंत्रण देने आए और काफ़ी देर बातचीत करने के बाद बोले— बेटा, अब देश में है ही क्या जो तुम्हें रहने को कहूँ! और फिर, एक ही जगह कीचड़ में खूँटा गाड़कर पड़े रहना भी किसी काम का नहीं, यह मैं अपने अनुभव से जानता हूँ— मन छोटा हो जाता है, मन का विकास रुक जाता है। देखो, इस बार तो इच्छा है कि भगवान ने दिन दिए तो एक बार चंद्रनाथ की यात्रा कर आऊँ—
राणी यह बात सुनकर अपु के घर आई। अपु से बोली— क्यों रे अपु, तुम लोग यह गाँव छोड़कर चले जाओगे क्या? सच?
अपु बोला— सच है राणी दी, माँ से पूछ लो—
फिर भी राणी को विश्वास नहीं हुआ। अंत में सर्वजया के मुँह से सब सुनकर राणी अवाक् रह गई। अपु को बाहर आँगन में बुलाकर बोली— कब जाएगा रे?
—अगले बुधवार के बाद वाले बुधवार को—
—फिर कभी नहीं आएगा?
राणी की आँखें आँसुओं से भर आईं, बोली— तू ही तो कहता है कि निश्चिन्दिपुर हमारा कितना अच्छा गाँव है, ऐसी नदी, ऐसे खेत कहीं नहीं हैं— उस गाँव को छोड़कर तू जाएगा कैसे?
अपु बोला— मैं क्या करूँ, मैंने तो जाने को नहीं कहा? पिताजी का मन वहाँ बसने का है, यहाँ हमारा गुज़ारा नहीं चलता न? मैं अपनी लिखने वाली कॉपी तुम्हें दे जाऊँगा राणी दी, बड़े होने पर शायद फिर मुलाक़ात हो—
राणी बोली— मेरी कॉपी में कहानी भी तो पूरी नहीं की, कॉपी पर दस्तख़त भी नहीं किए, तू भी कैसा लड़का है अपु?
आँखों के आँसू रोककर राणी तेज़ी से घर से बाहर निकल गई। अपु समझ नहीं पाया कि राणी दी यूँ ही बेवजह क्यों नाराज़ हो रही है! क्या वह अपनी इच्छा से देश छोड़कर जा रहा है?
नहाने के घाट पर पटु के साथ अपु की कितनी ही बातें हुईं। पटु को भी यह बात पता नहीं थी, अपु के मुँह से सब सुनकर उसका मन जैसे बैठ गया। उदास मुँह से बोला— तेरे लिए ख़ुद पानी में उतरकर कितनी मेहनत से काई हटाकर मछलियों के लिए जगह बनाई, एक दिन भी उसमें मछली नहीं पकड़ेगा?
इस बार रामनवमी का डोल, चड़क-पूजा और गोष्ठबिहार कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर ही पड़े। हर साल यह समय अपु के मन को एक अपूर्व, अनियंत्रित आनंद से भर देता था। वह और दीदी इस समय खाना-पीना, सोना सब छोड़ देते थे। अपु की ओर से तो इस बार भी कोई कमी नहीं रही।
चड़क के दिन गाँव की आतुरी बुढ़िया मर गई। जिस नए मैदान में आजकल चड़क का मेला लगता है, उसी के पास आतुरी बुढ़िया का वह दो-छप्पर वाला घर था। बहुत से लोगों को जमा हुआ देखकर वह भी देखने चला गया। एक बार वह आतुरी डायन के डर से बाँस-वन को चीरता हुआ भागा था— तब वह छोटा था— अब उसे वह बात याद आती है तो हँसी आती है। आज उसे लगा कि आतुरी बुढ़िया डायन नहीं थी, कुछ भी नहीं। गाँव के एक छोर पर बस्ती से बाहर अकेली रहती थी— ग़रीब, असहाय, न बेटा था, न बेटी, कोई देखने वाला नहीं था, होता तो क्या आज दिन भर घर के अंदर मरी पड़ी रहती? क्या अंतिम संस्कार के लिए लोग नहीं जुटते? पाँचू मल्लाह के बेटे ने एक हाँड़ी बाहर लाकर उँडेली— एक हाँड़ी भर सूखे आम का अमचूर। आँधी में गिरे आम बीनकर बुढ़िया आमसी-अमचूर बनाकर रख देती और उसे हाट-बाज़ार में बेचकर गुज़ारा करती थी। अपु यह जानता था, क्योंकि पिछले रथ के मेले में भी उसने बुढ़िया को डलिया लगाकर आमसी बेचते देखा था।
चड़क का मेला इस बार कुछ सूना-सूना लग रहा था। पिछले साल भी चड़क के बाज़ार से दीदी नया पटचित्र ख़रीदकर कितनी ख़ुश हुई थी। याद है, उस दिन सुबह दीदी से उसका झगड़ा हुआ था। दोपहर बाद दीदी ने कहा था— पैसे दूँगी अपु, एक ‘सीता-हरण’ का पटचित्र देखना अगर मेले में मिले तो? अपु ने बदला लेने के लिए कहा— जितने सब फीके-फीके, रोने-धोने वाले पटचित्र हैं, वही तुझे ख़रीदने हैं, मैं नहीं ला सकता जा— क्यों, ‘राम-रावण युद्ध’ का एक ख़रीद ले न? उसकी दीदी बोली— तुझे बस युद्ध आर युद्ध— लड़के का जो हाल है! क्यों, देवी-देवताओं के पटचित्र क्या अच्छे नहीं हुए?... दीदी की कला-बोध की शक्ति पर अपु को कभी विश्वास नहीं था।
उनके बाड़े से लगी रांगचिता के लाल फूल जब खिलते हैं, तो उसका चेहरा याद आता है, पंछियों की पुकार में, ताज़े खिले ओड़कोल्मी फूलों के हिलने-डुलने में— दीदी के लिए मन बेचैन हो उठता है। लगता है, जिसके पास दौड़कर जाने से और यह सब बताने से वह ख़ुश होती, वह न जाने कहाँ चली गई है— कितनी दूर!... और कभी नहीं, कभी नहीं— वह यह सब लेकर खेलने आएगी...
मेले के शोरगुल के बीच कोई बहुत सुंदर बाँसुरी बजा रहा है। नई धुन उसे बहुत अच्छी लगती है— उसने ढूँढ़ निकाला— मालपाड़ा का हाराण माल बाँस की बाँसुरियों का एक गट्ठर छीलकर बेचने के लिए लाया है और विज्ञापन के तौर पर एक बाँसुरी ख़ुद बजा रहा है। अपु ने पूछा— एक कितने पैसे की? हाराण माल उसे अच्छी तरह पहचानता था। कितनी ही बार उनके रसोईघर की छप्पर छाई थी। उसने पूछा— सुना है मुन्ना, तुम लोग गाँव छोड़कर जा रहे हो? तो कहाँ जा रहे हो— हैं? अपु ने डेढ़ पैसे में एक पतली बाँस की बाँसुरी ख़रीदी। बोला— कौन-कौन से छेदों पर उँगली रखते हो हाराण काका? ज़रा एक बार दिखा दो तो?
याद है, एक बार बहुत रात गए उसकी नींद टूटी तो वह कुछ देर जागता रहा था। दूर नदी में अँधेरी रात में मछुआरे दीया जलाकर मछली पकड़ने वाले ‘दोना-जाल’ की एकरस, लगातार ठक-ठक की आवाज़ कर रहे थे। तभी उसके कानों में पड़ा, बहुत दूर, जैसे कोठी के मैदान वाले रास्ते की ओर, उतनी रात में कोई खुले गले से गाता हुआ राह चल रहा है। कोठी के मैदान वाले रास्ते पर ज़्यादा रात में कोई चलता नहीं था, फिर भी आधी नींद में कितनी ही बार उसने निशीथ रात्रि की चाँदनी में अनजाने पथिक के कंठ से मधुकान के पद-भंग पदों की तान को दूर से दूर विलीन होते सुना था— लेकिन उस बार जो सुना था, वह बिल्कुल नया था। वह उस धुन को साध नहीं पाया था— अर्ध-जागृति के मोह में वह सुषमा-मयी सुर-लक्ष्मी दो नींदों के बीच के रास्ते से न जाने कहाँ अंतर्धान हो गई थीं, फिर कभी उनका पता नहीं चला— लेकिन अपु क्या उसे कभी भूलेगा?
चड़क देखकर कई गाँवों के किसानों के लड़के-लड़कियाँ रंगीन कपड़े-कमीज़, कोई-कोई नई कोरी साड़ी पहने, पंक्ति बनाकर घर लौट रहे थे। लड़के बाँसुरी बजाते हुए चल रहे थे। गोष्ठबिहार का मेला देखने चार-पाँच कोस दूर से भी लोग आए थे। सरकंडे के पंछी, लकड़ी की गुड़िया, रंगीन काग़ज़ के पंखे, रँगी हुई हाँड़ियाँ, नारियल के रेशे— सभी के हाथ में कोई-न-कोई चीज़ थी। चिनीबास वैष्णव ने मेले में बैंगन-पकौड़ी की दुकान खोली थी, उसकी दुकान से अपु ने दो पैसे की तली-भुनी चीज़ें ख़रीदीं और हाथ में लेकर घर की ओर चल दिया। लौटते-लौटते मन में आया, जहाँ वे लोग जा रहे हैं, क्या वहाँ ऐसा गोष्ठबिहार होता है? शायद वह फिर कभी चड़क का मेला नहीं देख पाएगा! मन में सोचा— वहाँ अगर चड़क नहीं हुआ तो पिताजी से कहूँगा, मुझे मेला देखना है पिताजी, निश्चिन्दिपुर चलिए— नहीं तो दो दिन के लिए आकर चाची के घर रह जाएँगे?
चड़क के अगले दिन सामान बाँधा जाने लगा। कल दोपहर भोजन के बाद रवाना होना था।
शाम के समय रसोईघर के बरामदे में उसकी माँ उसे गरमा-गरम पराँठे सेंककर दे रही थी। नीलमणि चाचा के वीरान घर के नारियल के पेड़ के पत्ते चाँदनी में चमचमा रहे थे— उसे देखकर अपु का मन दुख से भर गया। इतने दिनों से नए देश जाने का जो उत्साह उसके मन में था, जाने का दिन जितना पास आता जा रहा था, आसन्न विरह की गहरी व्यथा से उसके मन का सुर उतना ही करुण होता जा रहा था।
यह उनका घर-द्वार, यह बाँस-वन, सोल्ते-खागी का आम का बाग़, नदी का किनारा, दीदी के साथ वनभोज करने की वह जगह— इन सबसे वह कितना प्यार करता है! क्या वैसा नारियल का पेड़ वहाँ होगा जहाँ वे जा रहे हैं? होश सँभालने से ही वह इस नारियल के पेड़ को यहाँ देख रहा है, चाँदनी रात में पत्ते कितने सुंदर लगते हैं! सामने चाँदनी रात में इसी बरामदे में बैठकर चाँदनी में झिलमिलाती नारियल की डालियों को देखते हुए कितनी ही रातों को दीदी के साथ उसने ‘दस-पचीसी’ खेली है, कितनी बार मन में आया है कि कितना सुंदर देश है उनका यह निश्चिन्चिपुर! जहाँ जा रहे हैं, क्या वहाँ रसोईघर के बरामदे के पास, जंगल के किनारे ऐसा नारियल का पेड़ है? क्या वहाँ वह मछली पकड़ पाएगा, आम बीन पाएगा, नाव खे पाएगा, रेल-रेल खेल पाएगा, क्या कदम-तल्ले के साहब-घाट जैसा घाट उस देश में है? वे लोग तो यहाँ कितने अच्छे से थे, फिर यह सब बेवजह छोड़कर क्यों जाना?
दोपहर में एक काण्ड घट गया।
उसकी माँ सावित्री-व्रत के निमंत्रण पर गई हुई थी, हरिहर पास के कमरे में भोजन करके सो रहा था, अपु घर के अंदर ताक़ पर रखी चीज़ों को उलट-पुलटकर देख रहा था कि क्या ले जाया जा सकता है और क्या नहीं। ऊँची ताक़ पर रखी एक मिट्टी की कलसी हटाने गया तो उसके अंदर से कोई चीज़ लुढ़ककर फ़र्श पर जा गिरी। उसने उसे फ़र्श से उठाकर, उलट-पुलटकर देखा और हैरान रह गया। धूल और मकड़ी के जालों से सनी होने पर भी वह चीज़ क्या थी या उसका इतिहास क्या था, यह समझने में उसे देर न लगी।
वही सोने की छोटी-सी डिबिया, जो पिछले साल सेजठाकुरानी के घर से चोरी हो गई थी।
दोपहर में घर पर कोई नहीं था, डिबिया हाथ में लिए वह काफ़ी देर तक अनमने भाव से खड़ा रहा, वैशाख की दोपहरी की तपी हुई धूप से भरी उस निर्जनता में बाँस-वन की सरसराहट किसी बहुत दूर के संदेश की तरह कानों में आ रही थी। वह अपने-आप से बोला— अभागिन दीदी चोरी करके लाकर उस कलसी के अंदर छिपा रखी थी।
उसने ज़रा-सा सोचा, फिर धीरे-धीरे पिछवाड़े के दरवाज़े के पास जाकर खड़ा हो गया— दूर-दूर तक बाँस-वन जैसे दोपहर की धूप में ऊँघ रहा था, वही शंखचील किसी पेड़ की चोटी पर खींच-खींचकर पुकार रही थी, द्वैपायन झील में छिपे प्राचीन युग के उस पराजित, भाग्यहीन राजकुमार की वेदना-भरी करुण दोपहरी! वह कुछ देर खड़ा रहा, फिर हाथ की डिबिया को एक झटके में गहरे बाँस-वन की ओर फेंक दिया। उसकी दीदी जब भूलो कुत्ते को आवाज़ देती थी, तो जिस घने वन-झुरमुट से भूलो हाँफता-हाँफता दौड़कर आता था, ठीक उसी के पास, सूखी बाँस-पत्तियों के ढेर में, बेंत की झाड़ी के किनारे न जाने कहाँ जाकर वह लुढ़क गई।
मन-ही-मन बोला— पड़ी रहे वहीं, कोई कुछ जान नहीं पाएगा, वहाँ अब कौन जाएगा?
सोने की डिबिया की बात अपु ने किसी को नहीं बताई, कभी नहीं बताई, यहाँ तक कि माँ को भी नहीं।
दोपहर ज़रा ढलने पर हीरू गाड़ीवान की बैलगाड़ी रवाना हुई। सुबह के समय आसमान में थोड़े-बहुत बादल थे, लेकिन दस बजने से पहले ही वे छँट गए और वैशाख की दोपहरी की भरपूर प्रचंड धूप पेड़ों, रास्तों और खेतों पर जैसे आग बरसा रही थी। पटु गाड़ी के पीछे-पीछे काफ़ी दूर तक आ रहा था, बोला— अपु दा, इस बार बारोवारी में अच्छी जात्रा-मंडली का बयाना हुआ है, तू इस बार सुन नहीं पाया—
अपु बोला— तू नाटक की एक पर्ची ज़्यादा ले लेना, मुझे भेज देना—
फिर वही चड़क के मैदान के पास से रास्ता। मेले के निशान के तौर पर पूरे मैदान में कटे हुए डाभ के छिलके बिखरे पड़े थे, कहीं मैदान के एक कोने में किसी ने खाना पकाया था, आग से काली हुई मिट्टी के ढेले और एक तरफ़ कालिख लगी नई हाँड़ी पड़ी थी। हरिहर चुपचाप बैठा था, उसे कुछ अजीब-सा लग रहा था। क्या यह काम अच्छा हुआ? कितने दिनों का पैतृक घर, बगल की उस उजड़ी हुई डीह पर तो सारी धूम-धाम वैसे ही ख़त्म हो चुकी थी, जो एक मिट्टी का दीया टिमटिमा भी रहा था, आज शाम से वह भी हमेशा के लिए बुझ गया। पिता रामचाँद तर्कवागीश स्वर्ग से देखकर क्या सोचेंगे?
गाँव का आख़िरी घर आतुरी बुढ़िया का वही दो-छप्पर वाला मकान था, जब तक वह दिखा, अपु आँखें फाड़े उसी ओर देखता रहा। उसके तुरंत बाद एक बड़े खजूर-बाग़ के पास से गाड़ी गुज़रकर सीधे आषाढ़ू जाने वाली पक्की सड़क पर चढ़ गई। गाँव के समाप्त होते ही सर्वजया को लगा कि जो भी ग़रीबी थी, जो भी हीनता थी, जो भी अपमान था, सब पीछे छूट गया— अब सामने सिर्फ़ नया संसार है, नयी जीवन-यात्रा, नयी संपन्नता!...
धीरे-धीरे धूप ढली— गाड़ी तब सोनाडांगा के मैदान से गुज़र रही थी। हरिहर ने मैदान के बीच एक बड़े बरगद के पेड़ को दिखाकर कहा— वह देखो ठाकुरझि पुकुर के किनारे वाला बरगद का पेड़। सर्वजया ने जल्दी से मुँह बाहर निकालकर देखा। रास्ते से थोड़ी ही दूर पर एक नीची ज़मीन के किनारे विशाल बरगद का पेड़ चारों ओर जटाएँ फैलाए बैठा था। उस बूढ़े ब्राह्मण और उसके बालक पुत्र की कहानी उसने कितनी ही बार सुनी थी। आज से पचास साल पहले उसके श्वसुर के पूर्वज ने ऐसी ही एक शाम को उस बरगद के नीचे उस निरपराध ब्राह्मण और उसके नासमझ बेटे की धन के लोभ में निर्मम हत्या करके पास की उस नीची ज़मीन में, जो उस ज़माने का ठाकुरझि पुकुर था— वहीं गाड़ दिया था। उस लड़के की माँ शायद बेटे के घर लौटने की आस में कितने महीने, कितने साल व्यर्थ प्रतीक्षा करती रही होगी, वह बेटा फिर नहीं लौटा— हे माँ! सर्वजया की आँखें अचानक आँसुओं से धुँधला गईं, गले में जैसे कुछ अटक गया!
सोनाडांगा का मैदान इस इलाक़े का सबसे बड़ा मैदान है। यहाँ-वहाँ वन-झुरमुट, सेमल, बबूल के पेड़, खजूर के पेड़ों से खजूर के गुच्छे लटक रहे हैं, अमलतास के फूलों के गुच्छे झूल रहे हैं, चारों ओर ‘बौ-कथा-कौ’ पपीहे की पुकार। दूर तक फैले मैदान पर अलसी के फूलों के रंग जैसा गहरा नीला आकाश औंधा पड़ा है, दृष्टि कहीं रुकती नहीं, घनी हरी घास से ढके ऊँचे-नीचे मैदान में कहीं खेती नहीं, बस पेड़-पौधों-वन-झुरमुटों की प्रचुरता और उस विशाल मैदान का श्यामल विस्तार, सामने कच्ची मिट्टी का चौड़ा रास्ता किसी गृहत्यागी उदास बाउल की तरह दूर से दूर तक अपनी धुन में बल खाता चला गया है। थोड़ी दूर जाकर बारासे-मधुखाली का बिल पड़ा। किसी प्राचीन काल की नदी सूखकर अपने जीवन-पथ के पदचिह्न छोड़ गई है, उस अंतर्धान हुई नदी का विशाल पाट अब कमल के फूलों से भरा बिल है।
अपु गाड़ी में बैठे-बैठे मैदान और चारों ओर के अपूर्व आकाश का रंग देखता जा रहा था। ढलती बेला के स्वप्न-पटल पर फिर कितनी ही बचपन की कल्पनाओं का आना-जाना! यही तो वह गाँव छोड़कर चला है! अब शायद न जाने कितनी दूर चलेगा, उसका जाना तो अभी शुरू ही हुआ है, इस बार शायद वे सब देश, सपनों में देखे वे अपूर्व जीवन!
हरिहर ने दूर के एक गाँव की ओर उँगली से इशारा करके कहा— वह है धन्चे-पलाशगाछि, उसी के उस पार नाटाबेड़े— वहीं बनबीबी की दरगाह पर श्रावण मास में भारी मेला लगता है, इतने सस्ते कुम्हड़े और कहीं नहीं मिलते।
आषाढ़ू बाज़ार के नीचे नाव से बेत्रवती पार करते समय चाँद निकल आया, चाँदनी की रोशनी में जल चमचमा रहा था। आज आषाढ़ू का हाट था, कुछ हाट करने वाले लोग शोर मचाते हुए उस पार से नाव में इस पार आ रहे थे। अपु की गाड़ी समेत नाव उस पार पहुँची। अपु ने पिता से कहकर आषाढ़ू का बाज़ार देखने के लिए उतरा। छोटा-सा बाज़ार, कतार में खुली दुकानें, सोनार की दुकान से ठुक-ठुक की आवाज़ आ रही थी, खजूर के गुड़ की एक आढ़त के सामने बहुत-सी बैलगाड़ियों की भीड़ थी। माझेरपाड़ा स्टेशन अभी भी लगभग चार कोस दूर था, रास्ता कच्चा होने पर भी काफ़ी चौड़ा था, दोनों ओर नीलकुठी के साहबों के ज़माने के लगाए हुए बरगद, पीपल, शहतूत के पेड़ थे। वैशाख मास के आरंभ में रास्ते के किनारे के बरगद-पीपल की डालियों में कहीं कोयल गा-गाकर बेहाल हो रही थी, सारा रास्ता प्राचीन बरगद की क़तारों की झूलती जटाओं से भरा था। नई कोमल पत्तियों का समूह चाँदनी लगने से पारदर्शी दिख रहा था।
बंगाल का वसंत, चैत्र-वैशाख के खेतों, वनों, बाग़ों में, जहाँ-तहाँ, कोयल की बेतरतीब पुकार में, झुकी डालियों वाले नागकेशर के पेड़ों पर लदे असंख्य फूलों के भार में, वन-फूलों की गंध से भरी, चाँदनी में नहाई दक्षिणी हवा में उल्लास से आनंद-नृत्य करने लगा था। ऐसा अपूर्व वसंत-दृश्य अपु ने जीवन में पहली बार देखा। इस छोटी उम्र में ही उसके मन पर बंगाल के खेतों, नदियों, एकांत वन-प्रांतरों की सामने चाँदनी रात का जो मायावी रूप अंकित हो गया था, उसके उत्तर-जीवन के शिल्पी-जीवन के कल्पना-क्षणों को माधुर्य और प्रेरणा से भर देने के लिए वही श्रेष्ठ उपादान था।
रात लगभग दस बजे स्टेशन पर गाड़ी पहुँची। आज बहुत देर से वह इसी आस में बैठा था कि गाड़ी कब स्टेशन पहुँचेगी, गाड़ी रुकते ही उतरकर वह एक दौड़ में स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर हाज़िर हो गया। शाम साढ़े आठ बजे की ट्रेन बहुत पहले जा चुकी थी, पिता से पूछकर उसे पता चला— पूरी रात में और कोई ट्रेन नहीं है। यह सब हीरू गाड़ीवान के उन दो बैलों के कारण हुआ, नहीं तो वह अभी ट्रेन देख पाता। प्लेटफ़ॉर्म पर तंबाकू की गाँठों का एक ढेर सजा था— रेल के दो आदमी एक लोहे के बक्से जैसी, पर बहुत लंबे डंडे वाली मशीन से तंबाकू की गाँठों को दबाकर कुछ कर रहे थे। चाँदनी पड़कर रेल की पटरियाँ चमचमा रही थीं। उधर रेल लाइन के किनारे एक ऊँचे खंभे पर दो लाल बत्तियाँ, इधर फिर ठीक वैसी ही दो लाल बत्तियाँ। स्टेशन के कमरे में मेज़ के ऊपर चौपाये वाला तेल का लैम्प जल रहा था। जिल्द बँधी खाता-बहियों का ढेर। अपु दरवाज़े के पास जाकर कुछ देर खड़ा देखता रहा, एक छोटी-सी खड़ाऊँ के घुँघरू जैसी चीज़ को दबाकर स्टेशन बाबू खट-खट की आवाज़ कर रहे थे।
स्टेशन! स्टेशन! ज़्यादा देर नहीं, कल सुबह वह रेलगाड़ी सिर्फ़ देखेगा ही नहीं, चढ़ेगा भी!...
प्लेटफ़ॉर्म से हटने का उसका मन नहीं कर रहा था। लेकिन उसके पिता बुलाने आ गए। खड़ाऊँ के घुँघरू जैसी चीज़ ही टेलीग्राफ़ की मशीन थी, उसके पिता ने बताया।
अपु ने लौटकर देखा कि स्टेशन के तालाब के किनारे खाना पकाने की तैयारी हो रही है। एक और गाड़ी पहले से ही वहाँ खड़ी थी। सवारियों में अठारह-उन्नीस साल की एक बहू और एक युवक थे। अपु ने सुना कि बहू हबीबपुर के विश्वास-परिवार की है, भाई के साथ मायके जा रही है।
उसकी माँ से उस बहू की ख़ूब दोस्ती हो गई थी। उसकी माँ खिचड़ी के लिए चावल-दाल धो रही थी, बहू आलू छील रही थी। खाना एक साथ पकेगा।
सुबह साढ़े सात बजे ट्रेन आई। अपु मुँह बाए बहुत देर से गाड़ी देखने के लिए प्लेटफ़ॉर्म के किनारे झुका खड़ा था, उसके पिता ने कहा, मुन्ना, इतना झुककर मत खड़े रहो, इधर हट आओ। एक खलासी भी लोगों को हटा रहा था।
कितनी बड़ी थी ट्रेन! कैसी भयानक आवाज़! सामने इसी को इंजन कहते हैं? उफ़, क्या नज़ारा है!
हबीबपुर की बहू घूँघट खोलकर उत्सुकता से आती हुई ट्रेन की ओर देख रही थी।
गाड़ी में हो-हल्ला करके सारा सामान चढ़ा दिया गया। लकड़ी की बेंचें सब आमने-सामने लगी थीं। गाड़ी का फ़र्श जैसे सीमेंट का बना लग रहा था। ठीक जैसे एक कमरा हो; खिड़की-दरवाज़े सब हू-ब-हू! यह भारी-भरकम गाड़ी, जो आकर खड़ी हुई है, वह फिर चलेगी भी, इस पर अपु को विश्वास नहीं हो रहा था। क्या पता शायद न भी चले; शायद वे लोग अभी कह दें, ओ आप सब उतर जाइए, हमारी गाड़ी आज और नहीं चलेगी! तार की बाड़ के इस पार एक आदमी सिर पर उलु-घास का एक गट्ठर लिए ट्रेन के चले जाने का इंतज़ार कर रहा था, अपु को लगा कि वह आदमी दया का पात्र है! आज के दिन जो गाड़ी पर नहीं चढ़ा, वह जीवित कैसे रहेगा? हीरू गाड़ीवान फाटक के बाहर खड़ा गाड़ी की ओर ताक रहा है।
गाड़ी चली। अद्भुत, अपूर्व हिलकोरे! देखते-ही-देखते माझेरपाड़ा स्टेशन, लोग-बाग, तंबाकू की गाँठें, मुँह बाए खड़े हीरू गाड़ीवान, सबको पीछे छोड़कर गाड़ी बाहर उलु-घास के मैदान में आ गई। पेड़-पौधे सट-सटकर दोनों तरफ़ की खिड़कियों के पास से भागते जा रहे थे— क्या वेग था! इसी का नाम रेलगाड़ी है! उफ़, मैदान को जैसे घुमाकर फेंक रही है! झाड़-झंखाड़, पेड़-पौधे, उलु-घास की झोपड़ियाँ, किसानों के छोटे-छोटे घर, सब एक-दूसरे में मिले जा रहे हैं! गाड़ी के नीचे चक्की-पिसने जैसी एकरस आवाज़ हो रही है, सामने की ओर इंजन की वह कैसी आवाज़ है!
माझेरपाड़ा स्टेशन का डिस्टेंट सिग्नल भी धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा है!...
बहुत दिन पहले का वह दिन!
वह और दीदी जिस दिन दोनों बछड़ा ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैदान-दलदल पार करके बेतहाशा रेल की पटरी देखने दौड़े गए थे। वह दिन— और आज?
वहाँ, जहाँ आसमान के नीचे आषाढ़ू-दुर्गापुर की पक्की सड़क के पेड़ों की क़तार क्रमशः दूर से और दूर होती जा रही है, उसी के उस पार जहाँ उनके गाँव का रास्ता मुड़कर सोनाडांगा के मैदान में चढ़ा है, वहाँ रास्ते के ठीक उसी मोड़ पर, गाँव के छोर पर बूढ़े जामुन के पेड़ के नीचे उसकी दीदी जैसे उदास मुँह लिए खड़ी उनकी रेलगाड़ी की ओर ताक रही है!... उसे कोई साथ लेकर नहीं आया, सब उसे छोड़कर आ गए हैं, दीदी के मरने के बाद भी दोनों के खेलने के रास्तों पर, घाटों पर, बाँस-वन में, आम के बाग़ में, अपु ने दीदी को जैसे इतने दिन पास-पास ही पाया था, दीदी का अदृश्य स्नेह-स्पर्श निश्चिन्दिपुर के टूटे-फूटे कोठे वाले घर के हर कोने में था— लेकिन आज सचमुच दीदी से हमेशा-हमेशा के लिए बिछोह हो गया!...
उसे ऐसा लग रहा था जैसे दीदी से और कोई प्यार नहीं करता था, माँ भी नहीं, कोई नहीं! किसी को उसे छोड़कर आने का दुख नहीं है। अचानक अपु का मन एक विचित्र अनुभूति से भर गया। वह दुख नहीं था, शोक नहीं था, विरह नहीं था, वह क्या था वह नहीं जानता। कितने ही विचार एक पल में मन में आ गए... आतुरी डायन... नदी का घाट... उनका वह कोठे वाला घर... चाल्ते-तल्ले का रास्ता... राणी दी... कितनी ही दोपहरें, कितनी ही शामें... कितने दिनों के कितने हँसी-खेल... पटु... दीदी का चेहरा... दीदी की कितनी अधूरी इच्छाएँ... दीदी अभी भी एकटक देख रही है—
दूसरे ही पल उसके मन की वह अवाक् भाषा आँखों के आँसुओं में प्रकट होकर जैसे बार-बार यही कहना चाह रही थी— मैंने नहीं चाहा दीदी, मैं तुझे भूला नहीं, जान-बूझकर छोड़कर भी नहीं आया— ये लोग मुझे ले जा रहे हैं—
सचमुच वह भूला नहीं था। उत्तर-जीवन में नीले केशों वाली, सागर-मेखला धारण की हुई धरती से उसका बहुत गहरा परिचय हुआ था। लेकिन जब भी गति के रोमांच से उसका पूरा शरीर सिहर उठता था, समुद्र-गामी जहाज़ के डेक से हर पल नीले आकाश के नए-नए मायावी रूप आँखों के सामने आते थे, शायद अंगूर-लताओं से घिरा कोई नीला पर्वत-शिखर समुद्र के विलीन होते क्षितिज में दूर से और दूर क्षीण होता जाता था, दूर का अस्पष्ट, धुँधला-सा दिखने वाला तट किसी प्रतिभाशाली संगीतकार की प्रतिभा के दान की तरह उसके भावप्रवण मन में महामधुर मायाजाल रचता था— तभी, इन सभी क्षणों में, उसे याद आती थी एक घोर वर्षा की रात की, अबिश्रान्त बृष्टि के शोर के बीच एक पुराने कोठे के अँधेरे कमरे में, रोग-शय्या पर पड़ी एक देहाती ग़रीब घर की लड़की की बात—
—अपु, ठीक हो जाऊँगी तो मुझे एक दिन रेलगाड़ी दिखाएगा?
माझेरपाड़ा स्टेशन का डिस्टेंट सिग्नल देखते-ही-देखते दूर, और दूर, अस्पष्ट होते-होते अंत में विलीन हो गया।
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