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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · सत्ताइसवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

सत्ताइसवाँ परिच्छेद

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देखते-देखते दिन कट गए। सर्दी का मौसम भी अब ढलान पर था।

दुर्गा की मृत्यु के बाद से सर्वजया लगातार अपने पति पर यह गाँव छोड़कर चले जाने का दबाव डाल रही थी, हरिहर ने भी जगह-जगह कोशिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन कहीं कोई सुविधा नहीं हो पाई। अब तो सर्वजया ने एक तरह से वह उम्मीद ही छोड़ दी थी। इसी बीच, पिछली सर्दियों में हरिहर के गोतिया भाई नीलमाणि राय की विधवा पत्नी यहाँ आई हैं और अपना पुश्तैनी घर जंगल से घिर जाने के कारण भुवन मुखुज्जे के मकान में आ ठहरी हैं। हरिहर ने अपनी भौजाई को अपने घर ठहराने का बहुत आग्रह दिखाया था, पर नीलमाणि राय की पत्नी राज़ी नहीं हुईं। इस समय उनके साथ उनकी बेटी अतसी और छोटा बेटा सुनील आए हैं। बड़ा बेटा सुरेश कलकत्ते के स्कूल में पढ़ता है, वह गर्मियों की छुट्टियों से पहले यहाँ नहीं आ सकेगा। अतसी की उम्र कोई चौदह बरस है, सुनील की आठ। सुनील देखने में उतना अच्छा नहीं है; लेकिन अतसी काफ़ी सुश्री है, हालाँकि बहुत सुंदर नहीं कहा जा सकता। फिर भी, ये लोग हमेशा लाहौर में रहे हैं, नीलमाणि राय वहीं कमिसारियेट में नौकरी करते थे, बच्चों का जन्म और लालन-पालन वहीं हुआ; इसलिए पश्चिमी प्रांत की तरह उनके हर अंग में एक सुगठित स्वास्थ्य झलकता है।

जब वे लोग यहाँ पहली बार आए, तो सर्वजया ने अपनी अमीर जेठानी से मेल-जोल बढ़ाने की कोशिश की थी। जब उसे पता चला कि सुनील की माँ नक़द और कंपनी के कागज़ात मिलाकर दस हज़ार रुपयों की मालकिन हैं, तो उसका हृदय जेठानी के प्रति सम्मान से भर गया। उसने आगे बढ़कर जान-पहचान जमाने की कम कोशिश नहीं की, लेकिन अंत में सर्वजया चाहे कितनी भी नासमझ हो, यह समझ गई कि सुनील की माँ उसे ज़्यादा भाव देने को तैयार नहीं हैं। उनके पति ने हमेशा बड़ी नौकरी की थी, वह और उनके बच्चे एक अलग तरह की ज़िंदगी जीने के आदी थे। शुरू से ही उन्होंने हरिहर के ग़रीब गोतिया-परिवार से एक ऐसा फ़ासला बनाकर चलना शुरू किया कि सर्वजया को ख़ुद ही पीछे हटने पर विवश होना पड़ा। बातों में, व्यवहार में, काम में, हर छोटी-बड़ी बात में वह यह जताती रहती थीं कि सर्वजया किसी भी तरह उनके बराबर घुलने-मिलने के लायक नहीं है। उनकी बातचीत, पहनावे, चाल-ढाल में यह भाव लगातार प्रकट होता कि वे एक संपन्न घराने के लोग हैं। बच्चे हमेशा फ़िटफ़ाट सजे रहते हैं, कपड़ों पर ज़रा भी मैल नहीं लगने पाता, बाल हमेशा कंघी किए हुए, अतसी के गले में हार, हाथों में सोने की चूड़ियाँ, कानों में सोने की बालियाँ, सुबह चाय और नाश्ता किए बिना कोई कहीं बाहर नहीं निकलता, साथ में एक पश्चिमी नौकर है, वही घर के सारे काम करता है—कुल मिलाकर हर मामले में सर्वजया के ग़रीब घर-संसार की चाल-ढाल से उनके तौर-तरीक़ों में बहुत अंतर था।

सुनील की माँ अपने बेटे को गाँव के किसी भी लड़के के साथ ज़्यादा घुलने-मिलने नहीं देतीं, अपू के साथ भी नहीं—कहीं देहात के इन अशिक्षित, असभ्य लड़के-लड़कियों की संगत में पड़कर उनके बच्चे बिगड़ न जाएँ। वह इस गाँव में बसने के लिए नहीं आई हैं, उनका उद्देश्य तो ज़मीन की पैमाइश के समय अपनी जायदाद की देख-रेख करना है। भुवन मुखुज्जे इनके कुछ कर्ज़दार हैं, उसी नाते उन्होंने पश्चिम वाले हिस्से में दो कमरे इनके लिए छोड़ दिए हैं, खाना-पीना भी इनका अलग ही होता है। भुवन मुखुज्जे के परिवार के साथ व्यवहार में सुनील की माँ का कोई फ़र्क़ नहीं दिखता; क्योंकि भुवन मुखुज्जे के पास पैसा है, लेकिन सर्वजया को तो वह इंसान ही नहीं समझतीं।

दोल के समय नीलमाणि राय का बड़ा बेटा सुरेश कलकत्ते से आकर कोई दस दिन घर पर रहा। सुरेश अपू की ही उम्र का है, अँग्रेज़ी स्कूल की पाँचवीं कक्षा में पढ़ता है। देखने में बहुत गोरा नहीं, उज्ज्वल श्यामवर्ण है। नियमित व्यायाम करने के कारण शरीर काफ़ी बलिष्ठ और सेहतमंद है। अपू से उम्र में सिर्फ़ एक साल बड़ा होने पर भी क़द-काठी और बनावट में पंद्रह-सोलह साल के लड़के जैसा दिखता है। सुरेश भी इस पाड़े के लड़कों से ज़्यादा नहीं मिलता। उस पाड़े में गांगुली-बाड़ी के रामनाथ गांगुली का बेटा उसका सहपाठी है। गांगुली-बाड़ी में रामनवमी और दोल का बड़ा उत्सव होता है, उसी मौक़े पर वह भी अपने मामा के घर घूमने आया है। सुरेश अपना ज़्यादातर समय वहीं बिताता है, गाँव के किसी और लड़के को वह शायद घुलने-मिलने के क़ाबिल नहीं समझता।

वह वीरान ढूह, जो जंगल से घिरकर घर के बगल में पड़ा रहता था, जिसे वह होश सँभालने के बाद से देख रहा है, ये लोग उसी ढूह के वासी हैं। इस नाते इन लोगों के प्रति अपू का एक विचित्र आकर्षण था।

उसका हमउम्र सुरेश कलकत्ते में पढ़ता है—छुट्टियों में घर आने पर उससे जान-पहचान करने के लिए वह कई दिनों से प्रतीक्षा में था। लेकिन सुरेश ने आकर उससे ज़्यादा मेल-जोल नहीं बढ़ाया, ऊपर से सुरेश की चाल-ढाल, बातचीत का अंदाज़ ऐसा था कि वह मानो हर क़दम पर यही जताना चाहता था कि गाँव के लड़कों से वह कहीं ज़्यादा ऊँचा है। हमउम्र होने पर भी मुखचोर अपू यह देखकर और भी डर गया और पास नहीं फटकता था।

अपू अब तक किसी स्कूल में नहीं गया था, जब सुरेश ने उससे पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा तो उसने कहा, मैं घर पर बाबा के पास पढ़ता हूँ। दोल के दिन गांगुलियों के तालाब के पक्के घाट पर, जामुन के पेड़ के नीचे बैठकर सुरेश गाँव के लड़कों से किसी दिग्विजयी नैयायिक पंडित की तरह यह-वह सवाल कर रहा था। अपू से बोला—बता तो, इंडिया की बाउंड्री क्या है? जिओग्राफी जानता है?

अपू नहीं बता सका। सुरेश ने फिर पूछा, हिसाब क्या-क्या किया है? डेसिमल फ़्रैक्शन हल कर सकता है?

अपू इतना सब नहीं जानता। न जाने तो क्या, उसके उस टीन के बक्से में क्या कम किताबें हैं? एक नित्यकर्मपद्धति, एक पुरानी प्राकृतिक भूगोल, एक शुभंकरी, पन्ने फटी वीरांगना काव्य की एक प्रति, माँ वाली महाभारत—यही सब। उसने ये सारी किताबें पढ़ी हैं—कई बार पढ़ चुकने पर भी फिर पढ़ता है। उसके बाबा अक्सर यहाँ-वहाँ से माँग-जाँचकर किताबें ले आते हैं; बेटा ख़ूब पढ़ेगा, पंडित बनेगा, उसे इंसान बनाना है, इस विषय में जैसे किसी ज्वर के रोगी की होती है, वैसी ही एक अदम्य, कभी न बुझने वाली प्यास थी उनमें। लेकिन उनके पास पैसे नहीं हैं, दूर के स्कूल के बोर्डिंग में रखकर पढ़ाने की हैसियत बिलकुल नहीं है, ख़ुद भी बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। फिर भी, जब तक वह घर पर रहते हैं, अपने पास बिठाकर बेटे को यह-वह पढ़ाते हैं, तरह-तरह की कहानियाँ सुनाते हैं, बेटे को हिसाब सिखाने के लिए ख़ुद एक शुभंकरी की मदद से बचपन की पढ़ी-भुलाई विद्या को दोबारा ताज़ा करके तब बेटे को हिसाब हल कराते हैं। जिससे भी उन्हें लगता है कि बेटे का ज्ञान बढ़ेगा, वही चीज़ या तो बेटे को पढ़ने देते हैं, या फिर पढ़कर सुनाते हैं। वह बहुत दिनों से 'बंगवासी' के ग्राहक थे, कई सालों के पुराने 'बंगवासी' उनके घर में जमा थे, बेटा बड़ा होने पर पढ़ेगा, यह सोचकर हरिहर ने उन्हें सँभालकर बंडल बाँधकर रख दिया था, अब वे काम आ रहे हैं। पैसे न दे पाने के कारण नया अख़बार अब उनके यहाँ नहीं आता, अख़बार वालों ने अख़बार देना बंद कर दिया है। बेटा इस 'बंगवासी' अख़बार के लिए कैसा पागल है, शनिवार को सुबह-सुबह खेल-कूद छोड़कर कैसे वह भुवन मुखुज्जे के चंडीमंडप में डाक-बक्से के पास डाकिया की उम्मीद में मुँह बाए बैठा रहता है—हरिहर यह अच्छी तरह जानते हैं, इसीलिए बेटे की इतनी प्यारी चीज़ न जुटा पाने के कारण उनके सीने के अंदर एक टीस-सी उठती है।

अपू फिर भी पुराने 'बंगवासी' पढ़कर बहुत-सी कहानियाँ सीख गया है। पटू को सुनाता है—ल्यूका और राफ़ेल, मार्टीनिक द्वीप का ज्वालामुखी, सोना बनाने वाले जादूगर की कहानी, और भी कितनी ही बातें। लेकिन स्कूल की पढ़ाई-लिखाई उसकी कुछ भी नहीं होती। हिसाब में मुश्किल से भाग तक जानता है, न इतिहास, न व्याकरण, ज्यामिति-परिमिति का नाम भी नहीं सुना, अँग्रेज़ी की दौड़ फ़र्स्ट बुक के शुरुआती पन्नों तक ही है।

बेटे के भविष्य के बारे में उसकी माँ की धारणा कुछ अलग थी। सर्वजया देहात की लड़की है। बेटा स्कूल में पढ़कर आदमी बनेगा, यह ऊँची आशा उसमें नहीं है। उसके जान-पहचान के दायरे में किसी ने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा था। उनकी जो यजमानियाँ हैं, बेटा कुछ और बड़ा होकर उन घरों में आना-जाना करेगा, उन यजमानियों को बनाए रखेगा, यही उसकी सबसे बड़ी आशा थी। एक और आशा सर्वजया रखती है। गाँव के पुरोहित दीनू भट्टाचार्य बूढ़े हो गए हैं। बेटे भी कोई लायक नहीं हैं। रानी की माँ, गोकुल की बहू, गांगुली-बाड़ी की बड़ी बहू, सभी ने यह राय दी है कि वे इसके बाद अपू से ही पूजा-पाठ करवाएंगी, दीनू भट्टाचार्य के न रहने पर उनके गाँजाखोर बेटे भोम्बल के बजाय यह निष्पाप, सरल, सुंदर-सा लड़का गाँव की मनसा-पूजा और लक्ष्मी-पूजा में उनके आयोजनों का साथी बनेगा, गाँव की औरतें यही चाहती हैं! अपू को सभी प्यार करते हैं। घाट पर, रास्ते में पड़ोसिनों के मुँह से यह इच्छा ज़ाहिर होते सर्वजया ने कई बार सुना है और इस समय यही उसकी सबसे ऊँची आशा है। वह ग़रीब घर की बेटी है, ग़रीब घर की बहू, इससे परे किसी उज्ज्वल भविष्य की उसे कल्पना नहीं। अगर यह हो जाता है, तो मानो वह भोर के सपने को अपनी मुट्ठी में पा लेगी।

एक दिन यह बात भुवन मुखुज्जे के घर पर उठी थी। दोपहर बाद वहाँ ताश की महफ़िल में पाड़े की कई औरतें मौजूद थीं। सर्वजया सबका मन रखने के भाव से बोली—ये बड़ी खुड़ी हैं, ठकुमा हैं, मेज-दी हैं, इन सबकी अगर दया हुई तो मेरा अपू अगले फागुन में जनेऊ पहनकर गाँव की पूजा में हाथ लगा सकता है। फिर मुझे उसकी क्या चिंता? आठ-दस घर यजमानी हैं, और अगर माँ सिद्धेश्वरी की इच्छा हुई और गांगुली-बाड़ी की पूजा बँध गई तो बस—

सुनील की माँ होंठ भींचकर मुस्कुराईं। उनका बेटा सुरेश बड़ा होकर क़ानून पढ़ेगा और उनके चचेरे भाई जो पटना के बड़े वकील हैं, उनके पास जाकर वकालत करेगा। सुरेश के वे मामा निःसंतान हैं और बहुत नामी वकील हैं। उनकी अभी से इच्छा है कि सुरेश को अपने पास रखकर पढ़ाएँ-लिखाएँ—लेकिन सुनील की माँ पराए घर में बेटे को क्यों रखने जाएँगी, इत्यादि ख़बरें नासमझ सर्वजया की तरह चिल्ला-चिल्लाकर बताए बिना ही, इससे पहले बातों-बातों में वह सबको समझा चुकी थीं।

भुवन मुखुज्जे के घर से बाहर आकर सर्वजया ने बेटे से कहा—एक बात सुन—फिर धीरे-से बोली—अपनी जेठानी के पास जाकर कहना कि, जेठीमा, मेरे पास जूते नहीं हैं—मुझे एक जोड़ी जूते ख़रीदकर नहीं देंगी?

अपू बोला, क्यों माँ?

—कहना न, बड़े लोग हैं वो, माँगने पर शायद एक अच्छी-सी जोड़ी दे दें—देखा नहीं जैसे उस सुरेश के पैरों में हैं? तेरे पैरों पर वैसे ही लाल जूते बहुत अच्छे लगेंगे—

अपू ने शरमाते हुए कहा—मुझे बड़ी लाज आती है, मैं नहीं कह पाऊँगा—न जाने क्या सोचेंगी—मैं… सर्वजया ग़ुस्से में बोली—तो इसमें लाज की क्या बात है!… अपने ही लोग हैं—कहना न—उससे क्या? —हूँ… उँह… मैं नहीं कह पाऊँगा माँ। मैं जेठीमा के सामने बात नहीं कर पाता…

सर्वजया ने बिगड़कर कहा—सो तो तू कर ही नहीं पाएगा! तेरी सारी होशियारी तो बस घर के कोने में ही है—नंगे पैर घूमता फिर रहा है, दो साल से पैरों में जूते नहीं हैं, वह अच्छा है। बड़े लोग हैं, माँगता तो शायद ख़रीदकर दे ही देते—पर तेरे मुँह से तो बोल ही नहीं फूटेंगे—मुखचोरों का राजा कहीं का—

पूर्णिमा के दिन रानियों के घर सत्यनारायण की पूजा का प्रसाद लाने अपू वहाँ गया। रानी ने उसे बुलाकर मुस्कुराते हुए कहा—तू तो पहले हमारे घर कितना आता था, आजकल क्यों नहीं आता रे?

—क्यों नहीं आऊँगा रानू-दी,—आता तो हूँ? रानी ने उलाहने के स्वर में कहा—आता है! ख़ाक आता है! मैं तेरी कितनी याद करती हूँ। तू याद करता है मुझे, हम लोगों को?

—नहीं क्या! वाह रे—माँ से पूछकर देखो तो?

इसके सिवा कोई और संतोषजनक जवाब उसे नहीं सूझा। रानी उसे वहीं खड़ा रखकर ख़ुद जाकर उसके लिए फल, प्रसाद और संदेश ले आई और उसके हाथ में दे दिए। हँसकर बोली,—थाली समेत ले जा, मैं कल आकर खुड़ीमा से ले आऊँगी—

रानी के चेहरे की हँसी से अपू के मन में उसके प्रति एक गहरा भरोसा जागा। रानू-दी आजकल कितनी सुंदर हो गई हैं, रानू-दी जैसी सुंदर लड़की उसने आज तक कोई और नहीं देखी। अतसी-दी हमेशा सजी-धजी तो रहती हैं, पर देखने में रानू-दी के सामने कहीं नहीं ठहरतीं। इसके अलावा, अपू जानता है कि इस गाँव की लड़कियों में रानू-दी जैसा मन किसी का नहीं है। दीदी के बाद अगर वह किसी को प्यार करता था, तो वह रानू-दी ही थीं। रानू-दी का भी उस पर झुकाव है, यह क्या अपू नहीं जानता?

वह थाली उठाकर चलने लगा तो थोड़ा हिचकिचाकर बोला—रानू-दी, तुम्हारे इस पश्चिम वाले कमरे की आलमारी में जो किताबें हैं, सतु-दा पढ़ने नहीं देते। एक दोगी पढ़ने? पढ़कर ही लौटा जाऊँगा।

रानी बोली—कौन-सी किताब, मैं तो नहीं जानती, ठहर मैं देखती हूँ—

सतु पहले तो किसी तरह राज़ी नहीं हुआ, आख़िर में बोला—अच्छा, पढ़ने दूँगा, अगर एक काम करे। हमारे खेत वाले तालाब से रोज़ मछलियाँ चोरी हो रही हैं—जेठा-मशाय ने मुझसे कहा है कि वहाँ जाकर दोपहर में पहरा दूँ—मेरा वहाँ अकेले मन नहीं लगता, तू अगर मेरी जगह चला जाए तो किताब पढ़ने दूँगा—

रानी ने विरोध करते हुए कहा—वाह रे! यह छोटा-सा बच्चा उस जंगल में बैठकर मछलियों पर पहरा देगा भला? तुम जैसा बूढ़ा लड़का तो दे नहीं सकता, और यह जाएगा? जाओ, तुम्हें किताब देने की ज़रूरत नहीं, मैं बाबा से माँगकर दूँगी—

लेकिन अपू राज़ी हो गया। रानी के बाबा भुवन मुखुज्जे परदेस में रहते हैं, उनके आने में बहुत देर थी, पर इन किताबों पर उसका बड़ा लोभ था। इन्हें पढ़ने के लालच में वह कितने ही दिन ललचाई नज़रों से सतु के पश्चिम वाले कमरे में आता-जाता रहा है। एक-दो किताबें थोड़ी-बहुत पढ़ी भी हैं। लेकिन सतु ख़ुद तो पढ़ता नहीं, उसे भी पढ़ने नहीं देता। नायक के ठीक संकटमय क्षण में ही हाथ से किताब छीनकर कहता है—रख दे अपू, ये सब छोटे काका की किताबें हैं, फट जाएँगी, दे।

अपू के तो हाथ जैसे स्वर्ग लग गया।

हर दोपहर वह आलमारी से एक-एक कर किताबें चुनता और सतू से माँगकर ले जाता। फिर बाँसों के झुरमुट की छाँह में, सेओड़ा की कुछ कच्ची डालियाँ बिछा, उन पर औंधे लेटकर पूरी तन्मयता से पढ़ता। किताबें बहुत थीं—प्रणय-प्रतिमा, सरोज-सरोजिनी, कुसुम-कुमारी, सचित्र यौवन-योगिनी नाटक, दस्यु-दुहिता, प्रेम-परिणाम या अमृते-गरल, गोपेश्वर की गुप्त कथा...वह कितनों के नाम गिनाएगा! एक-एक कर वह कोई किताब उठाता, और उसे समाप्त किए बिना छोड़ नहीं पाता था। आँखें चौंधिया जातीं, कनपटियाँ टीसने लगतीं; तालाब के किनारे की उस निर्जन बाँसवाड़ी की छाया न जाने कब लंबी होकर उस पंक-भरे पोखर के जलकुम्भी-समूह पर उतर आती, उसे ख़याल ही न रहता कि वेला किस पहर ढल गई!

क्या कहानी थी! सरोजिनी को साथ लेकर सरोज नाव से मुर्शिदाबाद जा रहे थे, कि राह में नवाब के आदमियों ने नाव लूटकर उन्हें बंदी बना लिया। नवाब के हुक्म से सरोज को प्राणदंड मिला, और सरोजिनी को एक अँधेरे कमरे में ताला बंद करके रख दिया गया। आधी रात को कोठरी का दरवाज़ा खुला, नवाब ने नशे में धुत्त होकर कमरे में प्रवेश किया और बोला—'सुंदरी, मेरे हुक्म से सरोज मर चुका है, अब और क्यों...' इत्यादि। सरोजिनी ने दर्प से गरदन मोड़कर कहा—'रे पिशाच, राजपूत रमणी को तूने अब तक पहचाना नहीं, इस देह में प्राण रहते...' इत्यादि। तभी किसी के भीम-पदप्रहार से कारागार की खिड़की टूटकर गिर पड़ी! नवाब ने चौंककर देखा—एक जटाजूटधारी, तेजःपुंज-कलेवर संन्यासी, और साथ में यमदूत जैसे बलशाली चार-पाँच लोग। संन्यासी ने रोष-कषायित नेत्रों से नवाब की ओर देखकर कहा—'हे नराधम, रक्षक होकर भक्षक बनता है?' फिर सरोजिनी की ओर देखकर बोले—'मा, मैं तुम्हारे पति का गुरु हूँ—योगानंद स्वामी। तुम्हारे पति के प्राण नहीं गए हैं, मेरे कमंडलु के जल से उसने पुनर्जीवन पा लिया है। अब तुम मेरे आश्रम चलो मा, वत्स सरोज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।'...ग्रंथकार की लेखन-कला सुंदर थी—सरोज के इस विस्मयकारी पुनर्जीवन को और भी विस्तार से उभारने के लिए वे अगले अध्याय के प्रति पाठक की जिज्ञासा को उद्दीप्त करते हुए कहते हैं—'चलिए पाठक, अब हम देखें कि वध्यभूमि में सरोज का प्रादंड होने के बाद किस उपाय से उसका पुनर्जीवन संभव हुआ...' इत्यादि।

एक-एक अध्याय समाप्त कर अपू की आँखें धुँधला जातीं—जैसे गले में कुछ अटक गया हो। वह आकाश की ओर देखकर एक-दो मिनट कुछ सोचता रहता—आनंद, विस्मय और उत्तेजना में उसके दोनों कानों से जैसे आग की लपटें निकलने लगतीं। वह रुँधे हुए श्वास से अगले अध्याय में मन लगाता। संध्या हो जाती, चारों ओर छायाएँ लंबी हो आतीं, सिर पर बाँस के झुरमुट में न जाने कितनी चिड़ियों का कलरव शुरू हो जाता, पर वह उठूँ-उठूँ करके भी किताब के पन्नों से बस एक इंच ऊपर आँखें गड़ाए पढ़ता रहता—जब तक अक्षर पहचाने जा सकते थे।

ऐसी किताबें तो उसने कभी नहीं पढ़ी थीं! कहाँ लगती थीं इनके आगे सीता के वनवास और डूब जाने वाली कहानियाँ?

घर आने पर उसकी माँ डाँटती—तू भी कैसा भोंदू लड़का है? दूसरे की मछली की चौकीदारी करने चला जाता है उस अकेले वन में, बस एक किताब पढ़ने के लालच में? अच्छा बेवकूफ़ बनाया है तुझे।

लेकिन इस भोंदू अपू को लाभ जिस दिशा से मिलता था, उसकी माँ को उस दिशा का कोई अनुमान ही न था। आजकल उसे दो किताबें मिली थीं—'महाराष्ट्र जीवन-प्रभात' और 'राजपूत जीवन-संध्या'।...दीमकों की बाँबी और बेंत की झाड़ियों की पृष्ठभूमि में दोपहर का मायावी दृश्य एक-एक कर बदलता जाता—जेलेखा नदी के किनारे बैठकर घायल नरेन की सेवा-सुश्रुषा कर रही है, औरंगज़ेब के दरबार में ख़ुद को पाँच-हज़ारी मनसबदारों के बीच पाकर शिवाजी क्रोध से फूलकर सोच रहे हैं—शिवाजी पाँच-हज़ारी? एक बार पूना तो जाओ, शिवाजी की फ़ौज में कितने पाँच-हज़ारी मनसबदार हैं, गिनकर आना!...

राजपूताने के मरु-पर्वतों में, दिल्ली-आगरा के रंगमहलों में, शीशमहलों में, ओढ़नी-पेशवाज़ पहने सुंदरियों के झुंड के साथ उसका सारा दिन कटता। यह कौन-सा संसार था—जहाँ केवल चाँदनी थी, तलवारों के खेल थे, सुंदर चेहरों की मित्रता थी, आहेरिया-उत्सव में लंबा भाला हाथ में लेकर घोड़े पर चढ़, ऊसर घाटियों और मक्के के खेतों को पार कर सरपट दौड़ना था?...

वीर जो कर सकता है, राजपूत जो कर सकता है, मनुष्य जो कर सकता है—प्रतापसिंह ने वह सब किया था। हल्दीघाटी के पर्वतीय पथ के हर पाषाण-फलक पर उसकी कहानी लिखी है। देवार के रणक्षेत्र में बारह सहस्र राजपूतों के हृदय-रक्त से उसकी कहानी अक्षय महिमा में लिखी है।

बहुत दिनों बाद भी, बूढ़े योद्धा जाड़े की रातों में अलाव के पास बैठकर अपने पोते-पोतियों को हल्दीघाटी की अद्भुत वीरता की कहानियाँ सुनाते थे।...

एक अदृश्य हाथ से फेंका हुआ भाला आया।—अपू इसी गाँव की चिर-श्यामल वनभूमि की छाया में, लताओं की सघनता में, भीगी मिट्टी की गंध में पला-बढ़ा था—फिर भी वह राजपूताना के भील-प्रदेश या अरावली-मेवाड़ के हर एक स्थान को जानता था, नाहरा मग्रो की अपूर्व वन्य सुंदरता को वह भली-भाँति पहचानता था...पर्वत से उतरते हुए शस्त्रपाणि तेजसिंह की मूर्ति कितनी सुंदर लगती है मन को!...

"उस छप्पन प्रदेश में बहुत दिनों तक, उस भील गाँव की निर्जन कंदराओं और ऊँचे शिखरों पर, आधी रात के समय एक रमणी-कंठ से निकला गीत सुनाई पड़ता था। बिलकुल भोर में निर्जन मैदानों में, राहगीरों को कभी-कभी एक रमणी का पांडुर मुख और चंचल नयन दिखाई देते थे; लोग कहते थे कि कोई विश्राम-शून्य, उद्विग्न वनदेवी होगी"...उस गीत की अस्पष्ट, करुण मूर्च्छना जैसे अपू के कानों में बाँस के झुरमुट के पीछे से तैरकर आ रही थी!...

कमलमीर, सूर्यगढ़ का युद्ध, सेनापति शाहबाज़ खाँ, सुंदरी नूरजहाँ, पुष्पकुमारी, वन्य भील-प्रदेश, वीर बालक चंदनसिंह—दूर, बहुत दूर की कल्पनाएँ। फिर भी कितनी निकट, कितनी वास्तविक लगती थीं। राजपूताने के मरुस्थल और नीली अरावली के ऊँचे पर्वतों के शिखर-शिखर पर चिनार के वृक्षों में फूल खिलकर झड़ चुके थे, देवी मेवाड़-लक्ष्मी के आलता-रंगे रक्त-पदचिह्न बनास और बरी नदियों के तटों के शिलाखंडों पर, झरनों के पत्थरों पर, बाजरे और ज्वार के खेतों और महुए के वनों में अंकित थे।...

चित्तौड़ की रक्षा न हो सकी! राणा अमरसिंह ने बादशाह का सम्मान स्वीकार कर लिया। सर्वहारा पिता प्रतापसिंह, जिन्होंने पच्चीस वर्षों तक वनों और पर्वतों में भीलों की सेना लेकर युद्ध किया था, उन्होंने व्यथा-क्षुब्ध चित्त से कहाँ से यह सब देखा होगा?...

गर्म आँसुओं से तालाब, दीमकों की बाँबी, बेंत की झाड़ी, बाँस का झुरमुट—सब कुछ धुँधला जाता।

उस दिन दोपहर में उसके पिता ने एक काग़ज़ का लिफ़ाफ़ा दिखाकर हँसते हुए कहा, "देखो तो बेटा, यह क्या है, बताओ तो भला?"

अपू जल्दी से बिस्तर पर उठकर बैठ गया; उत्साह भरे स्वर में पूछा, "अख़बार? है न बाबा?" उस दिन रामकवच लिखकर बिहारी घोष की सास से जो तीन रुपए मिले थे, हरिहर ने पत्नी से छिपाकर उन्हीं में से दो रुपए अख़बार के दाम भेज दिए थे। पत्नी को पता चलता तो घर की पाँच दूसरी ज़रूरतों के मुँह से उन दो रुपयों को किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकता था।

अपू ने पिता के हाथ से जल्दी से काग़ज़ का लिफ़ाफ़ा लेकर खोला। हाँ—अख़बार ही तो था! वही बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा 'बंगवासी', वही नए कागज़ की गंध, वही छपाई, वही सब कुछ—जिसके लिए साल भर पहले वह तीर्थ के कौए की तरह अधीर आग्रह से भुवन मुहुर्ये के चंडीमंडप के डाक-बक्से के पास हर शनिवार को डाकिया की प्रतीक्षा में मुँह बाए बैठा रहता था! अख़बार! अख़बार! न जाने क्या-क्या नई ख़बरें दी होंगी? क्या-क्या अनजानी बातें लिखी हैं इसके बड़े-बड़े पन्नों में?

हरिहर को लगा—दो रुपयों के बदले बेटे के चेहरे पर जो आनंद की हँसी उसने खिला दी है, उसकी तुलना में किसी गिरवी रखी बाली को छुड़ाने का आत्म-संतोष भी अधिक न होता।

अपू कुछ देर पढ़कर बोला, "देखो बाबा, एक 'विलायत-यात्री' की चिट्ठी छपी है, आज से ही नई शुरू हुई है। बड़े सही वक़्त पर हमारा अख़बार आया—है न बाबा?"

फिर भी उसके मन में दुःख रह गया कि पिछले साल अख़बार अचानक बंद हो जाने से जापानी मकड़ी-असुर की कहानी का अंतिम भाग वह पढ़ नहीं पाया था, राइको के राजसभा में जाने के बाद उसका क्या हुआ, यह वह जान न सका था।...

एक दिन रानी ने कहा, "अरे, तू अपनी कॉपी में क्या लिख रहा है?"

अपू ने विस्मय से कहा, "कौन-सी कॉपी में? तुम्हें कैसे..."

"मैं क्या उस दिन दोपहर में तुम लोगों के घर नहीं गई थी? तू था नहीं, खुड़ी-माँ के साथ कितनी देर बैठकर बातें कीं। क्यों, खुड़ी-माँ ने तुझे बताया नहीं? तभी मैंने तेरी किताबों के दफ़्तर में तेरी वह लाल वाली कॉपी देखी, उसमें तूने कुछ लिखा है—मेरा नाम है, और देवी सिंह या ऐसा ही कुछ—"

अपू लज्जा से लाल होकर बोला, "वह एक कहानी है।"

"क्या कहानी है रे? मुझे पढ़कर सुनानी पड़ेगी किन्तु।"

अगले दिन रानी ने एक छोटी, जिल्द बँधी कॉपी अपू के हाथ में देकर कहा, "इसमें तू मुझे एक कहानी लिख दे—एकदम बढ़िया सी। देगा न? अतसी कह रही थी कि तू अच्छा लिख लेता है! लिख दे, मैं अतसी को दिखाऊँगी।..."

अपू रात में बैठकर कॉपी लिखता। माँ से कहता, "थोड़ा-सा तेल और दे दो न माँ। बस यह ज़रा-सा लिख लूँ आज।..." उसकी माँ कहती, "आज रात अब और मत पढ़—बस दो चुल्लू तेल है, कल फिर खाना किससे पकाऊँगी? यहीं पका रही हूँ, इसी रोशनी में बैठकर पढ़ ले।"—अपू झगड़ा करता।

माँ डाँटती—"ऐ हे, लड़के को रात होते ही लिखने-पढ़ने का चाव चढ़ता है—दिन भर तो चोटी का बाल भी देखने को नहीं मिलता। सुबह क्या करता है? जा, तेल नहीं दूँगी।"

अंत में अपू चूल्हे के पास लकड़ी की आग की रोशनी में कॉपी लेकर बैठ जाता। सर्वजया सोचती—अपू थोड़ा और बड़ा हो जाए तो मैं उसकी अच्छी-सी शादी कर दूँगी। इस भिटे पर नया पक्का घर उठेगा। अगले साल जनेऊ करवा दूँ, फिर अगर गांगुली-बाड़ी की पूजा बंध गई तो—

...चार-पाँच दिन बाद जब उसने रानी के हाथ में कॉपी लौटाई, तो रानी ने आग्रह से कॉपी खोलते-खोलते कहा, "लिख दिया?"

अपू ने हँसते हुए कहा, "खोलकर देखो तो?"

रानी ने देखकर ख़ुशी के स्वर में कहा, "ओहो, बहुत लिखा है तूने तो रे! रुक, अतसी को बुलाकर दिखाती हूँ।" अतसी ने देखकर कहा, "अपू ने लिखा है या कुछ और—ईश! यह सब तो किताब से देखकर लिखा है।"

अपू ने प्रतिवाद के स्वर में कहा, "ईश, किताब से देखकर भला! मैं तो कहानी बनाता हूँ—पटू से पूछना अतसी-दी! उसे शाम को नदी किनारे बैठकर कितनी कहानियाँ बनाकर सुनाता हूँ कि नहीं?"

रानी बोली, "नहीं भाई, उसी ने लिखा है, मैं जानती हूँ। वह ऐसे ही लिखता है। क्या बढ़िया जात्रा का पाला लिखा था कॉपी में, मुझे पढ़कर सुनाया था।..." फिर अपू से बोली, "अपना नाम नहीं लिखा? नाम लिख दे।"

अपू इस बार कुछ झेंपते हुए बोला कि कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है, हो जाएगी तो नाम लिख देगा। 'सचित्र यौवन-योगिनी' नाटक की तर्ज पर कहानी शुरू तो कर दी थी, पर अंत कैसा होगा, यह वह सोच नहीं पाया था; फिर भी, अगर कॉपी ज़्यादा दिन उसके पास रहती, तो रानी-दी और ख़ासकर अतसी-दी कहीं उसकी कवि-प्रतिभा पर संदेह न करने लगें, इस डर से उसने अधूरी ही लौटा दी थी।...

उसके पिता घर पर नहीं थे। सुबह उठकर वह अपने गाँव के अन्य लोगों के साथ बगल के गाँव में आद्यश्राद्ध के निमंत्रण में गया। सुनील भी उसके साथ गया। कई गाँवों के फलाहारी ब्राह्मणों के दल पाँच-छह कोस दूर से भी पैदल चलकर आए थे। कोई-कोई व्यक्ति अपने साथ पाँच-छह बच्चे लेकर आया था; सबको सुविधानुसार बिठाने में एक दंगा होते-होते बचा। हर एक की पत्तल पर चार-चार पूड़ियाँ परोसने के बाद जब परोसने वाले बैंगन-भाजा लेकर आए, तो देखा कि किसी की पत्तल में पूड़ी है ही नहीं—सबने उठाकर पास रखे अँगोछे या चादर पर रख ली है!...एक छोटा-सा लड़का, जो इतनी बातें नहीं समझता था, पत्तल की पूड़ी तोड़ने जा रहा था—कि उसके बाप विश्वेश्वर भट्टाचार्य ने झपट्टा मारकर लड़के की पत्तल से पूड़ियाँ उठा लीं और पास की चादर पर रखते हुए बोले, "इन्हें रख दे न! अभी फिर देंगे, तब खा लेना।"

उसके बाद कुछ देर तक भयंकर शोरगुल होता रहा—"पूड़ी की टोकरी इस पंक्ति में भेजो", "कद्दू तो मेरी पत्तल में बिलकुल नहीं पड़ा", "अरे भाई, गरम-गरम देखकर देना", "महाशय, ज़रा हाथ से छूकर देखिए क्या दिया है, निरी कच्ची मैदा है"...इत्यादि। छाँदा की मात्रा को लेकर आयोजकों से ब्राह्मणों का तुमुल विवाद छिड़ गया! कोई चिल्लाकर कह रहा था—"तो फिर ऐसे मौक़ों पर भद्र-लोगों को न्योता नहीं देना चाहिए। पच्चीस पूड़ियाँ तो छाँदा का बँधा-बँधाया हिसाब है—यह तो बल्लाल सेन के ज़माने से तय है। नहीं चाहिए तुम्हारा छाँदा, कंदर्प मजूमदार ऐसी जगह कभी—"

आयोजकों ने हाथ-पैर जोड़कर कंदर्प मजूमदार को प्रसन्न किया।

अपू भी एक पोटली छाँदा बाँधकर लाया। सर्वजया जल्दी से बाहर आकर हँसते हुए बोली, "ओ माँ, यह तो कितना ले आया है—देखूँ, खोल तो? पूड़ी, पनतुआ, गजा—कितना कुछ है रे! ढँककर रख देती हूँ, सुबह खा लेना।"

अपू बोला, "तुम्हें भी किन्तु खाना होगा माँ—तुम्हारे लिए मैंने दो बार माँगकर पनतुआ लिया है।"

सर्वजया बोली, "हाँ रे, तूने क्या यह कहा कि मेरी माँ खाएगी, दीजिए?—तू तो एकदम भोंदू लड़का है।"

अपू ने गरदन और हाथ हिलाकर कहा, "हाँ, भला मैं ऐसे बोलता हूँ! मैंने ऐसे कहा कि उन्हें लगा मैं ही खाऊँगा।" सर्वजया ने ख़ुशी से पोटली उठाई और घर में ले गई।

कुछ देर बाद अपू सुनील के घर गया। उनके घर के ओसारे पर पाँव रखते ही उसने सुना, सुनील की माँ सुनील से कह रही थीं, "यह सब क्यों ढोकर ले आया घर में? किसने कहा था तुझे लाने को?" सुनील ने भी सबकी देखादेखी छाँदा बाँधा था, बोला, "क्यों माँ, सबने तो लिया—अपू भी तो लाया है।"

सुनील की माँ बोलीं, "अपू क्यों नहीं लाएगा—वह तो फलाहारी बाभन का बेटा है! इसके बाद वह ठाकुर-पूजा करके और छाँदा बाँधकर ही घूमेगा—यही तो उनका खानदानी चलन है। उसकी माँ भी वैसी ही भुक्खड़ है। इसीलिए मैं तब तुम लोगों को लेकर इस गाँव में आना नहीं चाहती थी। कुसंग में पड़कर सारी कुशिक्षाएँ मिल रही हैं! जा, यह सब अपू को बुलाकर दे आ—जा; नहीं तो फेंक आ जाकर। न्योता दिया था, न्योता खा लिया—छोटे लोगों की तरह यह सब बाँधकर लाने की क्या ज़रूरत थी!"

अपू डर के मारे और सुनील के घर में नहीं घुसा। घर लौटते-लौटते वह सोचने लगा—जिस चीज़ को पाकर उसकी माँ इतनी खुश हुई, उसे देखकर जेठाई माँ इतनी नाराज़ क्यों हो गईं? क्या वह खाना मिट्टी का ढेला था, जो उसे फेंक देना पड़ता? क्या उसकी माँ भुक्खड़ है? क्या वह फलाहारी बाभन का बेटा है? वाह रे, जेठाई माँ ने तो जैसे बहुत पनतुआ-गजा खाया है, उसकी माँ को तो यह सब कुछ खाने को नहीं मिलता। और उसने ख़ुद ही यह सब कितनी बार खाया है? जो बात सुनील के लिए ग़लत थी, वही बात उसके लिए ग़लत कैसे हो सकती है

पढ़ाई-लिखाई में उसका मन कुछ खास लगता नहीं था, वह बस यही सब करता फिरता। फलाहार करना, छाँदा बाँधना, पिता के साथ यजमानों के घर जाना, मछली पकड़ना। वही छोटा-सा लड़का पोटू—जो एक बार मल्लाह-पाड़े में कौड़ियाँ खेलते हुए पिट गया था—इन सब कामों में अपू का संगी था। आजकल वह और बड़ा हो गया है, क़द में लंबा हो गया है, हर समय अपू-दा के साथ-साथ घूमता है। वह उस पाड़े से इस पाड़े सिर्फ़ अपू-दा के साथ खेलने आता है, और किसी के साथ ज़्यादा घुलता-मिलता नहीं। उसे बचाने के चक्कर में अपू-दा ने मल्लाहों के लड़कों से जो मार खाई थी, वह बात वह अब तक भूला नहीं था।

मछली पकड़ने का अपू को ज़बरदस्त शौक़ था। सोनाडांगा के मैदान के नीचे इछामती के किनारे, काँचिकाटा खाल के मुहाने पर बंसी में खूब मछलियाँ फँसती थीं। वह अक्सर वहीं जाकर नदी के किनारे एक बड़े छातिम के पेड़ के नीचे मछली पकड़ने बैठता। वह जगह उसे बहुत भाती थी, एकदम सुनसान, दोनों तरफ नदी के तट पर न जाने कितने पेड़-पौधे नदी के जल पर झुके हुए थे, उस पार घना हरा उलू-वन, बीच-बीच में लताओं से झुके हुए क़दम और सेमल के पेड़, बैंगनी रंग के बन-कलमी फूलों से ढकी झाड़ियाँ, दूर माधवपुर गाँव का बाँसों का जंगल, पक्षियों की चहक से गूँजती वन की छाया और उलू-वन की हरियाली में घुली-मिली एक स्निग्ध, शांत एकांत!

बचपन में उस पहले दिन कोठी के मैदान में आने के बाद से इस मैदान, वन और नदी ने उस पर कैसा जादू कर दिया था! बंसी डालकर छातिम के पेड़ की छाया में बैठे-बैठे चारों ओर देखते ही उसका मन एक अद्भुत रोमांच से भर उठता। मछली फँसे या न फँसे, जब भी दोपहर ढलने की घनी छाया मैदान के किनारे खजूर की झाड़ियों की पकी-अधपकी खजूरों की गंध से भर उठती, स्निग्ध हवा में चारों ओर से 'बऊ-कथा-कओ' और पपीहे की पुकार तैरकर आती, डालियों पर अभ्रक और अबीर बिखेरते हुए सूर्यदेव सोनाडांगा के मैदान के उस ठेंगाड़े-बड़गद के पीछे ढल जाते, नदी का जल काला हो जाता, गंगा-शालिखों का दल कलरव करता हुआ अपने घोंसलों को लौटता, तभी उसका मन विभोर हो उठता, रोमांच-भरी आँखों से वह चारों ओर देखता; मन में आता—मछली न भी मिले, तो भी वह रोज़-रोज़ यहीं आकर बैठेगा, ठीक इसी बड़े छातिम के पेड़ के नीचे।

मछली अक्सर मिलती नहीं थी, सरकंडे का फ़ातना स्थिर जल में घड़ी-दर-घड़ी वात-रहित निष्कंप दीपशिखा की तरह अचल बना रहता। इतनी देर एक जगह बैठे रहने का धीरज उसमें था नहीं, वह इधर-उधर छटपटाता फिरता, झाड़ियों में पक्षियों के घोंसलों की खोज करता, लौटकर आता तो शायद नज़र पड़ती कि फ़ातना ज़रा-ज़रा हिल रहा है! बंसी उठाकर कहता—धत्! झेंया मछलियों का झुंड लग गया है, यहाँ कुछ नहीं होगा।...फिर वहाँ से बंसी उठाकर ज़रा दूर, काई की सतह के पास जाकर चारा डालता। पानी का गहरा काला रंग देखकर लगता कि बड़ी रोहू या कतला अभी-के-अभी चारा निगल लेगी! भ्रम टूटने में ज़्यादा देर नहीं लगती, सरकंडे का फ़ातना निर्विकल्प समाधि की अवस्था को प्राप्त हो जाता।...

कभी-कभी वह कोई-न-कोई किताब साथ ले आता और बैठ जाता।

बंसी डालकर किताब खोलकर पढ़ने लगता। सुरेश से वह निचली कक्षा की एक तस्वीरों वाली अंग्रेज़ी किताब और उसकी अर्थ-पुस्तक माँग लाया था। अंग्रेज़ी तो वह समझ नहीं पाता था, अर्थ-पुस्तक देखकर कहानी का हिंदी समझ लेता और अंग्रेज़ी किताब में सिर्फ़ तस्वीरें देखता। दूर देश की बातें और हर तरह की महानता की कहानियाँ बचपन से ही उसके मन को बहुत आंदोलित करती थीं, इस किताब में उस तरह की कई कहानियाँ थीं। कहीं किसी खुले मैदान में एक यात्री भयंकर बर्फ़ीले तूफ़ान में रास्ता भटककर चक्कर काटते-काटते ठंड से प्राण गँवा देता है, अनजान महासमुद्र में नाव खेकर क्रिस्टोफ़र कोलंबस ने कैसे अमेरिका की खोज की—ऐसी ही सब कहानियाँ। जिन दो अंग्रेज़ बालक-बालिकाओं ने समुद्र-तट की चट्टान पर गंगा-चिल्ली के घोंसले से अंडे जमा करने जाकर ख़ुद को मुसीबत में डाल लिया था, जो साहसी बालिका प्रास्कोविया लपूलफ़ अपने निर्वासित पिता की सज़ा माफ़ करवाने की आशा में सुनसान, बर्फ़ से ढके मैदानों के रास्ते सुदूर साइबेरिया से अकेली निकल पड़ी थी—उन्हें वह देखते ही पहचान लेगा, ऐसा उसे लगता।

सर फ़िलिप सिडनी की छोटी-सी कहानी पढ़कर उसकी दोनों आँखें आँसुओं से भर जातीं। वह सुरेश के पास जाकर पूछता—सुरेश-दा, यह कहानी जानते हो तुम? ज़रा विस्तार से सुनाओ न?

सुरेश कहता—ओह, जूटफेन की लड़ाई की बात!

अपू हैरान होकर कहता—क्या सुरेश-दा? जूटफेन! कहाँ है वह?

सुरेश इससे ज़्यादा और कुछ बता नहीं पाता था।...

महीने-भर बाद एक दिन।

मछली पकड़ते हुए एक बड़ी सरपुँटी मछली न जाने कैसे उसकी बंसी में फँस गई।

लालच में आकर अपू ने वह जगह फिर नहीं छोड़ी—पेड़ की डालियाँ और पत्ते तोड़कर बिछौना बनाकर बैठ गया।

धीरे-धीरे दिन ढलता गया, नदी-किनारे के मैदान में फिर वही अद्भुत नीरवता, उस पार के दियाड़ के मैदान के पार सुदूर तक फैले हरे उलू-वन में काँस की झाड़ियों पर, क़दम और सेमल के पेड़ों की चोटियों पर फिर से उसके बचपन के रोमांच के शुभ क्षणों का अत्यंत परिचित, पुराना साथी—ढलती दोपहर की घुलती-मिलती आख़िरी धूप!

'बंगवासी' में 'विलायत-यात्री की चिट्ठी' में पढ़ी वह सुंदर कहानी उसे याद आ जाती है...

उसने सुरेश-दा के अंग्रेज़ी नक़्शे में भूमध्यसागर कहाँ है, यह देखा था, उसी के उस पार फ्रांस देश है, यह वह जानता है। कितने समय पहले फ्रांस की धरती पर विदेशी सेना काबिज़ हो गई थी, देश संकट में था, राजा शक्तिहीन था, चारों ओर अराजकता और लूट-पाट मची थी! राष्ट्र के इस घोर अपमान के दिनों में, लोरेन प्रांत के एक छोटे-से गाँव में एक निर्धन किसान की बेटी अपने पिता की भेड़ों को चराने जाती, और भेड़ों के झुंड को इधर-उधर छोड़कर एकांत ग्रामीण चरागाह में घास पर बैठकर अपनी सुनीली आँखें आकाश की ओर उठाकर एकांत में देश की दुर्दशा पर सोचती है। दिन-पर-दिन ऐसा सोचते-सोचते उसके निष्पाप कुँवारे मन में यह भाव जागा कि कोई उससे कह रहा है—तुम फ्रांस की रक्षा करने वाली हो, तुम जाकर राज-सेना को इकट्ठा करो, हथियार उठाओ, देश और जाति के उद्धार का भार तुम्हारे हाथों में है। देवी मेरी उसकी प्रेरणा थीं—दूर स्वर्ग से उनका बुलावा दिन-पर-दिन आता रहा। उसके बाद नई शक्ति से भरी फ्रांसीसी सेना ने कैसे शत्रु-दल को देश से खदेड़ दिया, कैसे उस भावमयी कुमारी ने स्वयं हथियार उठाकर देश के राजा को सिंहासन पर बैठाया, फिर अज्ञानी-अंधे लोगों ने कैसे उसे डायन का आरोप लगाकर ज़िंदा जला दिया, ये सारी बातें उसने आज पढ़ी थीं।

इस ढलती दोपहर में, इस शांत नदी के किनारे, कहानी के बारे में सोचते-सोचते उसका मन किस अद्भुत भाव से भर जाता है! कुमारी के युद्ध की बात, जीत की बात, और दूसरी सब बातें वह उतनी नहीं सोचता। लेकिन जो तस्वीर उसके मन में बार-बार आती है, वह है—बस, सुनसान मैदान में विचारमग्न बालिका और चारों ओर अपनी मर्ज़ी से विचरता भेड़ों का झुंड, नीचे हरी-भरी घास, सिर के ऊपर खुला नीला आकाश। एक ओर दुर्धर्ष विदेशी शत्रु, क्रूरता, विजय-लालसा का दंभ, रक्त की धाराएँ—तो दूसरी ओर एक भोली, दिव्य-भावमयी, नीली आँखों वाली गाँव की लड़की। यह चित्र उसके बढ़ते हुए बाल-मन को मुग्ध कर देता है।

और भी तस्वीरें मन में आती हैं। कितनी दूर नीले समंदर से घिरा मार्टिनिक द्वीप। चारों तरफ गन्ने के खेत, सिर के ऊपर नीला आकाश, दूर-दूर तक बस नीला आकाश और नीला समंदर!—बस नीला और नीला! और भी न जाने क्या-क्या, जिसे समझाया नहीं जा सकता, बताया नहीं जा सकता।

वह बंसी समेटकर घर की ओर जाने की तैयारी करता है। नदी के किनारे-किनारे सिर झुकाए बबूल और साईं-बबूल के वन नदी के स्निग्ध काले जल में अपने फूलों का भार झरा रहे हैं। सोनाडांगा के मैदान के बीच ठेंगाड़े-बड़गद के पीछे विशाल रक्तवर्ण सूर्य ढल चुका था—मानो किसी देव-शिशु ने अलका के ज्वलंत, फेनिल सोने के समंदर से फूँक मारकर एक बुलबुला उठाया हो और खेल-खेल में उसे आकाश में उड़ा दिया हो, और अभी-अभी वह पश्चिम के क्षितिज पर धरती के वनों में उतर रहा हो!

पीछे से किसी ने उसकी आँखें भींच लीं। उसने ज़ोर लगाकर हाथ से आँखें छुड़ाईं तो पोटू खिलखिलाकर हँसता हुआ सामने आ गया और बोला—तुझे ढूँढ़-ढूँढ़कर कहीं नहीं पाया, अपू-दा; फिर सोचा कि तू ज़रूर मछली पकड़ने आया होगा, इसलिए चला आया। मछली नहीं मिली?...एक भी नहीं? चल, ऐसा करते हैं, एक नाव खोलकर घूम आते हैं—चलेगा?

क़दमतला में साहब के घाट पर दूर-दूर देशों से नावें आती हैं, गोलपत्तों से लदी, धान से लदी, सीपियों से लदी नावें क़तार में बँधी हैं। नदी में मल्लाहों की सीपियाँ निकालने वाली नावों पर बड़ा जाल डाला गया है। इस समय हर साल वे दक्षिण से सीपियाँ निकालने आते हैं; नदी के बीच में नाव-से-नाव जोड़कर खड़ी कर रखी हैं। अपू किनारे पर बैठा देख रहा था, एक साँवला-सा आदमी बार-बार डुबकी लगाकर सीपियाँ ढूँढ़ रहा है और थोड़ी देर बाद नाव के पास उभरकर हाथ की थैली से दो-चार चुनी हुई सीपियों को बालू-कीचड़ के ढेर से छानकर नाव की खोल में फेंक रहा है। अपू ने ख़ुशी से पोटू को उँगली से दिखाकर कहा—देख रहा है पोटू, कितनी देर तक डुबकी लगाए रहता है। आ, गिनते हैं, एक-दो करके! तू रह सकता है इतनी देर डूबा हुआ?...

नदी का दूब-घास से ढका तट ढलानदार होकर पानी के किनारे तक उतर गया है, यहाँ-वहाँ लदी हुई नावों के खूँटे गड़े हैं—लंगर डाले हुए। वे न जाने कितने देशों से आए हैं, कितनी बड़ी-बड़ी नदियाँ और नहरें पार करके, बड़े-बड़े खारे नदों के ज्वार-भाटे और तूफ़ान झेलकर घूमते हैं। अपू का मन होता कि वह मल्लाहों के पास बैठकर उन सब देशों की कहानियाँ सुने। उसका मन बस नदियों-नदियों, समंदरों-समंदरों में घूमने को करता है, और कुछ वह नहीं चाहता। सुरेश की किताब में अलग-अलग देशों के नाविकों की बातें पढ़ने के बाद से यही इच्छा उसके मन में प्रबल हो उठी थी! पोटू और वह नाव के पास जाकर मोलभाव करते—ओ माझी, यह गोलपत्ता एक पाटी कितने की?...तुम्हारी यह धान की नाव कहाँ की है, ओ माझी?...झालकाठि की? वह किस तरफ़ है, यहाँ से कितनी दूर?...

पोटू बोला—अपू-दा, चल इमलीतले के घाट पर एक डोंगी देखते हैं, ज़रा घूम आएँ चल।

दोनों ने इमलीतले के घाट से एक छोटी-सी डोंगी खोली, उसे एक धक्का देकर डोंगी पर चढ़ बैठे। नदी के जल से ठंडी, नम गंध उठ रही थी, जलकुंभी के गुच्छों पर जल-पक्षी बैठे थे, चर के किनारे-किनारे किसान पटोल के खेतों की निराई कर रहे थे, कोई घास काटकर गट्ठर बाँध रहा था, चालतेपोता के मोड़ पर तट की घनी झाड़ियों में गंगा-शालिखों का दल कलरव कर रहा था, ढलती बेला में पूरब के आकाश पर तरह-तरह के मेघ-समूह।

पोटू बोला—अपू-दा, एक गाना गाओ न? वही उस दिन वाला गाना!

अपू बोला—वह नहीं। पिताजी से एक बहुत अच्छे गाने का सुर सीख लिया है। वही गाऊँगा, लेकिन ज़रा और उधर चलकर भाई, यहाँ किनारे पर वे सब लोग हैं—यहाँ नहीं।

—तू बड़ा शर्मीला है, अपू-दा। कहाँ हैं लोग, कितनी दूर, और तुझे गाना गाने में—धत्, वही सुना!

थोड़ा आगे जाकर अपू ने गाना शुरू किया। पोटू बाँस की खपच्ची वाली पतवार उठाकर नाव के गलही पर चुपचाप बैठकर ध्यान से सुनने लगा; नाव खेने की ज़रूरत नहीं थी, धारा में अपने-आप बहती हुई डोंगी घूमते-घूमते ला-भाँगा के बड़े मोड़ की तरफ़ चली। अपू का गाना ख़त्म होने पर पोटू ने एक गाना शुरू किया। इस बार अपू नाव खे रहा था। नाव कम दूर नहीं आई थी—ला-भाँगा का मोड़ नज़र आने लगा था। अचानक पोटू ने ईशान कोण की ओर उँगली दिखाकर कहा—ओ अपू-दा, देख तो कैसे बादल उठे हैं! अभी आँधी आई समझ—नाव लौटाएगा क्या?

अपू बोला—आने दे आँधी, आँधी में ही तो नाव चलाने और गाने में मज़ा आता है, चल और आगे चलते हैं।

बात करते-करते घने काले बादल माधवपुर के मैदान की ओर से उठकर सारे आकाश में फैल गए, उनकी काली छाया ने नदी के जल को ढँक दिया। पोटू उत्सुक आँखों से आकाश की ओर देखता रहा। बहुत दूर से एक सों-सों की आवाज़ उठी, एक अस्पष्ट शोर के साथ बहुत-से पक्षियों का कलरव सुनाई दिया, ठंडी हवा बही, भीगी मिट्टी की गंध तैर आई। पंख वाले आक के बीज मैदान की ओर से अनगिनत उड़कर आने लगे, देखते-ही-देखते पेड़-पौधे सिर पटककर, झूमकर, टूटकर भयानक काल-बैसाखी की आँधी में घिर गए।

नदी का पानी गहरा काला हो गया, किनारे के साईं-बबूल और बड़े-बड़े छातिम के पेड़ों की डालियाँ टूटकर गिरने को हो गईं, सफ़ेद बगुलों का दल काले आकाश के नीचे लंबी पाँत बनाकर उड़कर भाग गया! अपू का सीना फूल उठा, उत्साह और उत्तेजना में उसने पतवार छोड़कर चारों ओर आँधी का खेल देखना शुरू कर दिया, पोटू ने अँगोछा खोलकर आँधी के मुँह पर पाल की तरह उड़ाया तो हवा के ज़ोर से वह फूल उठा!

पोटू बोला—बड़ी ज़ोर की हवा है अपू-दा, सामने और नाव नहीं जाएगी। लेकिन अगर उलट गई तो? क़िस्मत अच्छी है कि सुनील को साथ नहीं लाए!

लेकिन अपू पोटू की बात नहीं सुन रहा था, उस तरफ़ उसके कान नहीं थे—मन भी नहीं था। वह नाव के गलही पर बैठा एकटक आँधी में क्षुब्ध नदी और आकाश की ओर देख रहा था। उसके चारों ओर काली नदी का नाचता हुआ जल, उड़ते बगुलों का दल, तूफ़ानी बादलों का समूह, दक्षिण देश के मल्लाहों की सीपियों के ढेर, धारा में बहती जलकुंभी की बेलें—सब जैसे मिट जाता है! वह स्वयं को 'बंगवासी' पत्र के उसी विलायत-यात्री के रूप में कल्पना करने लगता है! कलकत्ता से उसका जहाज़ छूट चुका है; बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर सागरद्वीप को पीछे छोड़कर, समुद्र के बीच के कितने ही अनजाने छोटे-छोटे द्वीपों को पार कर, सिंहल-तट की श्याम-सुंदर नारियल-वन की शोभा देखते-देखते, कितने ही अद्भुत देशों के नीले पहाड़ों को दूर क्षितिज पर रखकर, सूर्यास्त की लाल रोशनी में नहाता हुआ, नए-नए देशों के नए-नए दृश्यों के परिवर्तन के बीच वह चला जा रहा है!—चला जा रहा है!—चला जा रहा है!

इसी इछामती के जल की तरह ही काला, गहरा, क्षुब्ध है दूर के उस अनदेखे समुद्र का वक्ष; इसी तरह के हरे-भरे वन और झाड़ियाँ अरब सागर के उस द्वीप पर भी हैं। वहाँ इसी तरह शाम को पेड़ के नीचे बैठकर, अदन बंदरगाह के उस विलायत-यात्री की तरह वह किसी रूपसी अरबी लड़की के हाथ से एक गिलास पानी माँगकर पिएगा। चालतेपोता के मोड़ की तरफ़ देखने पर अख़बार में वर्णित जहाज़ के पीछे उड़ते हुए उन जलचर पक्षियों के झुंड को वह मानो एकदम साफ़-साफ़ देख पाता है!..

वह उन सब जगहों पर जाएगा, वह सब कुछ देखेगा, विलायत जाएगा, जापान जाएगा, व्यापार-यात्रा पर निकलेगा, बड़ा सौदागर बनेगा, लगातार देश-विदेश, समंदर-दर-समंदर घूमता फिरेगा, बड़े-बड़े ख़तरों से जूझेगा; चीन-सागर के बीच आज की इस मन-मतवाली कालवैशाखी जैसी ही किसी विकराल आँधी में जब उसका जहाज़ डूबने-डूबने को होगा, तब वह भी ‘मेरा अद्भुत भ्रमण’ में पढ़े नाविकों की तरह जीवन-रक्षक डोंगी पर सवार हो, डूबी-चट्टानों से लगे घोंघे-सीपियाँ भून-भूनकर खाते हुए अथाह सागर में निकल पड़ेगा! वह जो माधवपुर गाँव के बाँसों के झुरमुट के ऊपर तूतिया रंग के बादलों का पहाड़ कुछ देर पहले झुका हुआ था—उसी के उस पार वे सारे नीले समंदर, अनजाने किनारे, नारियल के कुंज, ज्वालामुखी, बर्फ़बारी वाले मैदान, ज़ेलेखा, सरयू, ग्रेस डार्लिंग, ज़ुत्फ़ेन, समुद्री चिड़ियों के अंडे बटोरते वे सुंदर अंग्रेज़ लड़के-लड़कियाँ, सुनहला जादूगर बॉटगर, निर्जन प्रांत में विचारमग्न लोरेन की वह नीली आँखों वाली गाँव की बाला जोन—और भी न जाने क्या-क्या है! उसके टिन के बक्से की कुछ किताबें, रानू-दीदी के घर की किताबें, सुरेश-दादा से माँगकर लाई हुई किताब, पुराने ‘बंगवासी’ अख़बार के पन्ने, उसे उन्हीं सब देशों की बातें बताते हैं; उन देशों में कहीं कोई-न-कोई उसके लिए प्रतीक्षा कर रहा है। वहाँ से उसके लिए भी बुलावा आएगा एक दिन—वह भी जाएगा!

यह बात तो उसके ख़याल में ही नहीं आती कि वे देश कितनी दूर हैं, कौन उसे ले जाएगा, उसका जाना आख़िर संभव भी कैसे होगा! और कुछ दिनों बाद घर-घर ठाकुर-पूजा करके जिसे अपना संसार चलाना होगा, रात में जिसे पढ़ने के तेल के लिए माँ की डाँट खानी पड़ती है, इतनी उम्र तक जिसने स्कूल का मुँह नहीं देखा, अच्छे कपड़े, अच्छी चीज़ें किसे कहते हैं, यह जो जानता तक नहीं—उस मूर्ख, गुमनाम, साधन-संपत्तिहीन देहाती बालक को जीवन के इस विराट आनंद-यज्ञ में शामिल होने के लिए भला कौन बुलाएगा?

ये सब प्रश्न यदि मन में जागते भी, तो शायद उसकी तरुण-कल्पना का रथवेग—उसके आशा-भरे जीवन-पथ का वह दुर्दमनीय मोह, सारे भय, सारे संशयों पर विजय पा लेता; किंतु ये सब बातें तो उसके मन में उठती ही नहीं। बस यही लगता है— बड़ा होते ही सब हो जाएगा, आगे बढ़ते ही सारे अवसर और सुविधाएँ राह में पड़ी मिल जाएँगी... बस अब बड़ा होने भर की देर है! वह जब बड़ा हो जाएगा तो उसे अवसर मिलेगा, दिशा-दिशा से उसके लिए सादर निमंत्रण आएँगे, वह जगत को जानने, मनुष्य को पहचानने की दिग्विजय पर जाएगा।

रंगीन भविष्य-जीवन के सपनों में डूबे-डूबे उसका बाकी का रास्ता कट जाता है। अब पानी नहीं बरस रहा था, आँधी काले बादलों के झुंड को उड़ाकर आकाश साफ़ कर रही थी। इमली-तल्ले के घाट पर डोंगी के लगते ही उसका ध्यान टूटता है; नाव बाँधकर वह पटू के आगे-आगे बाँसों के वन वाले रास्ते पर उल्लास में सीटी बजाता हुआ घर की ओर चल पड़ता है। वह भी अपनी माँ और दीदी की तरह सपने देखना सीख गया था।

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