जब हरिहर पहली-पहली बार काशी से लौटा था, तो सब कहते थे कि उसका भविष्य बड़ा उज्ज्वल है। उस अंचल में उसके जैसा विद्यावान कोई नहीं था। उसकी विद्या की ख्याति सबकी ज़ुबान पर थी। सब कहते कि वह अब ज़रूर कुछ-न-कुछ करेगा। सर्वजया भी सोचती कि जल्द ही कोई उसे बुलाकर अच्छी नौकरी देगा (नौकरी कौन देता है, इसके बारे में उसकी धारणा धुंध भरे समुद्र की तरह अस्पष्ट थी)। लेकिन महीने-पर-महीने, साल-दर-साल बीतते गए। आधी रात को ज़री की पोशाक पहने कोई घुड़सवार सभा-पंडित का नियुक्ति-पत्र लेकर नहीं आया, न ही अरेबियन नाइट्स के जिन्न ने कोई मणियों-जड़ा माया-महल आसमान से उड़ाकर उनके टूटे-फूटे घर की जगह रख दिया। बल्कि, उस घर के दीमक-खाए किवाड़ दिन-ब-दिन और जर्जर होते गए, शहतीरें और भी झुकने लगीं; जो कुछ पहले था, वह भी अब नहीं बच रहा था। फिर भी उसने पूरी तरह उम्मीद नहीं छोड़ी थी। हरिहर भी परदेस से लौटकर हर बार किसी-न-किसी आशा की बात इस तरह करता, मानो सब कुछ तय हो चुका है, बस थोड़ी-सी देर है, और हालात बदलने ही वाले हैं। पर होता कहाँ था?.....
जीवन बड़ा मधुमय है, सिर्फ़ इसलिए कि इस माधुर्य का ज़्यादातर हिस्सा सपनों और कल्पनाओं से गढ़ा है। भले ही सपने झूठे हों, कल्पना यथार्थ से कोसों दूर हो; भले ही उनके पीछे हमेशा सार्थकता न हो; पर वे ही तो जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। वे आएँ, जीवन में उनका आसन अक्षय हो; तुच्छ है सार्थकता, तुच्छ है लाभ।
हरिहर को घर से गए लगभग दो-तीन महीने हो गए थे। उसने बहुत दिनों से पैसे-कौड़ी, ख़र्च-पानी नहीं भेजा था। दुर्गा की बीमारी कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी। खाती-पीती तो बीमार पड़ जाती, दो दिन ज़रा ठीक रहती, फिर अचानक एक दिन वही हाल हो जाता।
सर्वजया बेटी के विवाह के लिए पति को अक्सर ताक़ीद करती रहती। पति से दो-तीन चिट्ठियाँ नीरेन्द्र के पिता राज्येश्वर बाबू के नाम लिखवा चुकी थी। उस ओर की आशा भी उसने अभी तक नहीं छोड़ी थी। हरिहर कहता, "तुम पागल हो गई हो क्या? ये सब बड़े लोगों की बातें हैं, राज्येश्वर काका क्या अब हमारी ख़बर लेंगे?" फिर भी सर्वजया हार नहीं मानती; कहती, "लिखो न एक चिट्ठी और, लिखकर देखो तो सही — नीरेन तो पसंद कर ही गए हैं।" एक-दो महीने बीत जाते, कोई ख़ास जवाब नहीं आता, तो वह फिर पति को चिट्ठी लिखने की रट लगाने लगती।
इस बार जब हरिहर परदेस गया, तो कह गया था कि इस बार वह यहाँ से उठकर कहीं और बसने का कोई-न-कोई इंतज़ाम करके ही लौटेगा।
गाँव के एक किनारे लीपा-पोता, फूस का छोटा-सा घर, दो-तीन कमरे। गोशाला में हृष्ट-पुष्ट, दूध देने वाली गाय बँधी है, मचान पर पुआल का ढेर, खलिहान में धान भरा है। खेत की मेंड़ पर लगे मटर के ताज़ा, हरे गंध खुली हवा में आँगन से होकर बह रही है। पंछी चहक रहे हैं — नीलकंठ, बया, श्यामा। अपू सुबह उठकर मिट्टी के बड़े भाड़ में दुहे गए फेनिल काले दूध के साथ गरम मुरमुरे का कलेवा करके पढ़ने बैठता है। दुर्गा मलेरिया से नहीं जूझ रही। सभी उसे जानते हैं, सभी आदर करते हैं, आकर पाँवों की धूल लेते हैं। ग़रीब समझकर कोई तिरस्कार नहीं करता।
...बस सपने देखती है, दिन नहीं, रात नहीं, सर्वजया बस सपने देखती है। उसे लगता है, इतने समय बाद अब सचमुच कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। मन के भीतर कोई जैसे कहता है।
इतने दिनों तक क्यों नहीं हुआ? इतने समय बाद क्यों? उस बचपन के दिनों में, जामुन और सहजन के पेड़ों तले घूमते समय से, सेँजुति की अल्पना के मंत्रों के साथ यह साध उसके मन में जुड़ी हुई है — लक्ष्मी के आलता-रँगे पैरों के निशान वाले आँगन में ससुराल का घर-संसार बसाएगी। ऐसा टूटा-फूटा, पुराना कोठा, बाँस का जंगल कौन चाहता था?
दुर्गा कहीं से एक छोटा-सा मानकंद जुगाड़कर ले आई है और रसोईघर में धरना देकर बैठी है। उसकी माँ कहती है, "तुझे हुआ क्या है दुग्गा? आज क्या खाकर भात खाएगी? कल शाम भी तो तुझे बुख़ार आया था?" दुर्गा कहती है, "आने दो माँ, वो भी कोई बुख़ार था — ज़रा-सी तो ठंड लगी थी?...तुम यह मानकंद भात में डालकर दो कौर भात—" उसकी माँ कहती है — "जाः, बीमार होकर तेरी यह खाने की लालसा बहुत बढ़ गई है। आज-कल अगर ठीक रही तो परसों दे दूँगी—"
बहुत मिन्नतें करने के बाद जब माँ नहीं मानी, तो दुर्गा ने मानकंद उठाकर रख दिया। कुछ देर चुपचाप बैठी रही, फिर अपने-आपसे बोली, "आज मैं बिल्कुल ठीक हूँ, आज मुझे बुख़ार नहीं आएगा — दोपहर को दो रोटियाँ और आलू-भुजिया खाऊँगी।" थोड़ी देर बाद जम्हाई आई, वह जानती थी कि यह बुख़ार आने का पूर्व-लक्षण है। फिर भी वह मन को समझाती, "जम्हाई तो यों ही आती है, कितनी बार आती है, बुख़ार नहीं आएगा।" धीरे-धीरे ठंड लगने लगी, धूप में जाकर बैठने की इच्छा हुई। वह धूप में न जाकर मन को तसल्ली देती कि ठंड लगना एक स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है, बुख़ार आने से इसका क्या संबंध?
लेकिन कोई तसल्ली काम नहीं आई। धूप ढलने से पहले ही बुख़ार आ गया। वह छिपकर धूप में जा बैठी, कहीं माँ को पता न चल जाए। उसका मन हूकने लगा, वह सोचने लगी — "बुख़ार-बुख़ार सोचकर ऐसा हो रहा है, सचमुच बुख़ार नहीं आया है—"
सिंदूरी धूप काई-लगी टूटी दीवार पर पड़ रही थी। दोपहर ढलने की छाया गहरी हो रही थी। दुर्गा को लगा कि मन कहीं और लगा लेने से बुख़ार चला जाएगा। अपू से बोली, "बैठ तो ज़रा मेरे पास, आ कहानी सुनाऊँ।"
एक दिन, पिछले साल, घनघोर बरसात की रात में, उसने और अपू ने मिलकर योजना बनाई और पिछली रात को सेजठाकुरानी के बाग़ में ताल गिराने गए थे। अचानक दुर्गा के पैर में 'पट' से एक काँटा चुभ गया। दर्द से पीछे हटकर उसने बायाँ पैर जहाँ रखा, वहाँ बाएँ पैर में भी 'पट' से एक और काँटा!.....सुबह पता चला कि कहीं वे रात में ताल न चुन लें, इसलिए सतू ने तालतल्ले के रास्ते पर सीधा करके कतार से बेल के काँटे गाड़ रखे थे। और एक दिन तो जो हुआ, वह तो आश्चर्यजनक था!
उस दिन कहाँ से एक बूढ़ा बंगाली मुसलमान एक बड़ा, रंग-बिरंगा, काँच-जड़ा टिन का बक्सा लेकर खेल दिखाने आया। वह उस पार जीवन चौधरी के आँगन में खेल दिखा रहा था। दुर्गा पास ही खड़ी थी। उसके पास पैसे नहीं थे। बाकी सब एक-एक पैसा देकर बक्से पर लगे एक नलीचे में से कुछ देख रहे थे।
बूढ़ा मुसलमान बक्सा बजाकर सुर में कह रहा था, "ताज बीबी का रोज़ा देखो, हाथी-बाघ का लड़ाई देखो!" जैसे ही किसी का देखना ख़त्म होता और वह नलीचे से आँख हटाता, दुर्गा उससे बड़े उत्साह से पूछती, "क्या देखा रे उसके अंदर? सब असली हैं?"
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उफ़! उन्होंने क्या अद्भुत चीज़ देखी थी, यह वे बता नहीं पाते थे।....क्या-क्या था वह सब! एक-एक करके सबका देखना हो गया। दुर्गा जाने लगी, तो बूढ़े मुसलमान ने कहा, "देखोगी नहीं खुकी?..." दुर्गा ने सिर हिलाकर कहा, "नाः — मेरे पास पैसे नहीं हैं।"
उस आदमी ने कहा, "आओ आओ खुकी, देख जाओ — पैसे नहीं लगेंगे—"
दुर्गा को थोड़ी शर्म आई, मुँह से बोली, "नाः —" लेकिन आग्रह और कौतूहल से उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
आदमी ने कहा, "आओ आओ, हर्ज़ क्या है?...आओ, देखो—"
दुर्गा चमकीले चेहरे से धीरे-धीरे बक्से के पास आकर खड़ी तो हो गई, पर हिम्मत करके मुँह नलीचे में नहीं लगा पाई। आदमी ने कहा, "इस नली में से झाँको तो ज़रा खुकी?"
दुर्गा ने सिर के उड़ते बालों को कान के पीछे हटाकर झाँका। अगले दस मिनट की बातों का वह कोई वर्णन नहीं कर सकती। असली इंसान तस्वीरों में कैसे दिख सकते हैं? कितने साहब, मेम, घर-बार, युद्ध, उन सब बातों को वह कह नहीं सकती! क्या चीज़ ही उसने देखी थी!
अपू को दिखाने की बड़ी इच्छा होती है, दुर्गा ने कितनी बार ढूँढ़ा, वह खेल फिर कभी नहीं आया।
कहानी ठीक से ख़त्म भी नहीं हो पाती कि दुर्गा बुख़ार की तेज़ी से और बैठ नहीं पाती, उठकर घर के अंदर जाकर काँथा ओढ़कर सो जाती है।
आजकल पिता घर पर नहीं हैं, अपू को ढूँढ़ पाना मुश्किल हो गया है। किताबों-दफ़्तरों में घुन लगने की नौबत आ गई है। सुबह जो वह कौड़ियों की एक पोटली लेकर निकलता है, तो लौटता है सीधे दोपहर ढलने पर खाने के समय। उसकी माँ डाँटती है — "लड़के का सत्यानाश हो रहा है — तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई तो बिल्कुल ठप्प हो गई? इस बार घर आने दो, सारी बातें बता दूँगी, देखना अब तुम—"
अपू डरकर दफ़्तर लेकर बैठता है। किताबों को चारों ओर ख़ूब फैलाता है। माँ से कहता है, "थोड़ा ख़ैर दो माँ, मैं दवात की स्याही में डालूँगा—"
फिर वह बैठकर लिखावट लिखता है और धूप में रखता है। सूखने पर ख़ैर-भीगी स्याही चमकने लगती है — अपू बड़ी ख़ुशी से उसे देखता रहता है — सोचता है — "कल से थोड़ा और ख़ैर डालूँगा — ओः! क्या चमक रहा है देखो तो ज़रा!" पान की डिबिया से माँ से छिपाकर ख़ैर का एक बड़ा टुकड़ा लेकर स्याही की दवात में डाल देता है। फिर लिखकर सुखाने के लिए रखकर बड़े कौतूहल से देखता है कि आज कितना चमचमाता है। मन में आता है — "अच्छा, अगर थोड़ा और डाल दूँ तो?"
एक दिन माँ के हाथों पकड़ा जाता है। माँ कहती है, "लड़के का लिखने से कोई वास्ता नहीं। बस ढेले-के-ढेले ख़ैर रोज़ चाहिए — रख दे ख़ैर—"
पकड़ा जाकर थोड़ा झेंपकर कहता है, "ख़ैर के बिना क्या स्याही बनती है?...मैं क्या यूँ ही—"
— "हाँ, ख़ैर के बिना स्याही कैसे बनेगी? इस दुनिया के सारे लड़के जो पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं — उनके लिए तो दुकान में सेर-सेर ख़ैर रोज़ जुटाई जा रही है न! जाः—"
अपू बैठकर एक खाते में नाटक लिखता है। बहुत कुछ लिखकर उसने खाता लगभग भर दिया है। मंत्री के विश्वासघात से राजा राज्य छोड़कर वन में चले जाते हैं, राजकुमार नीलाम्बर और राजकुमारी अम्बा वन में डाकुओं के हाथ पड़ जाते हैं, घोर युद्ध होता है, फिर राजकुमारी का मृत शरीर नदी के किनारे मिलता है। नाटक में सतू नामक एक जटिल चरित्र के सृजन के कुछ ही समय बाद, बिना किसी ख़ास घातक दोष के वर्णन के, उसे प्राणदंड दे दिया जाता है। नाटक के अंत में राजकुमारी अम्बा का नारद के वरदान से पुनर्जीवित होना या विश्वस्त सेनापति जीवनकेतु के साथ उसका विवाह जैसी घटनाओं पर जो लोग कहते हैं कि पिछले वैशाख में देखे गए यात्रा-नाटक से, नामों के अलावा, मूलतः कोई अंश अलग नहीं है, या यह उसी से हू-ब-हू लिया गया है, वे यह भूल जाते हैं कि अतीत की किसी एक मूक, चाँदनी रात में, निर्जन वास-कक्ष की धुँधली दीप-शैया पर, एक प्राचीन कवि का नीले मेघ-सा दिखने वाला, मोरों की पुकार से गूँजता दूर का वन-प्रदेश का सपना यदि कालिदास को मुक्त मेघ के भ्रमण-वर्णन के लिए प्रेरित कर सकता है, तो उससे क्या?...उस विस्मृत शुभ-यामिनी की वंदना मनुष्य अपने अनजान में हज़ारों वर्षों से करता आ रहा है।
आग से ही आग जलाई जा सकती है, राख के ढेर में मशाल ढूँढ़कर भला कौन मशाल जलाता है?....
दफ़्तर में एक किताब है — किताब का नाम 'चरितमाला', लिखा है, ईश्वरचंद्र विद्यासागर प्रणीत। पुरानी किताब है, उसके पिता को जगह-जगह से बेटे के लिए किताबें इकट्ठा करने की धुन है, कहीं से यह ले आए थे। अपू कभी-कभी थोड़ा-बहुत पढ़ता रहता है। किताब में जिनकी कहानियाँ हैं, वह वैसा ही बनना चाहता है! हाट में आलू बेचने भेजे जाने पर किसान-पुत्र रोस्को बाड़ के किनारे बैठकर बीजगणित का अभ्यास करता था, कागज़ के अभाव में चमड़े के पट्टे पर कुंद कील से हिसाब लगाता था, भेड़िया-पालक डुवाल इधर-उधर घूमते भेड़-दल को मनमाने ढंग से चरने का अवसर देकर एकमन से पेड़ के नीचे बैठकर भू-चित्र-पाठ में मग्न रहता था — वह वैसा ही बनना चाहता है।...'बीजगणित' क्या चीज़ है? वह रोस्को की तरह बीजगणित पढ़ना चाहता है। वह यह लिखावट नहीं लिखना चाहता, धारपात या शुभंकरी उसे अच्छी नहीं लगतीं। वैसी ही निर्जन पेड़-तले, वन की छाया में, या बाड़ के किनारे बैठकर वह "भू-चित्र" (यह चीज़ क्या है?) फैलाकर पढ़ेगा, बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ेगा, वैसा ही पंडित बनेगा। लेकिन कहाँ मिलेंगी उसे वे सब चीज़ें? कहाँ है भू-चित्र, कहाँ है बीजगणित, और कहाँ है लैटिन व्याकरण? — यहाँ तो बस कौड़ी गिनने की आर्या और तीसरी नामता है।
माँ के डाँटने से क्या होगा, जो वह पढ़ना चाहता है, वह यहाँ है कहाँ?
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