Skip to content
Back to story
पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · तेईसवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

तेईसवाँ परिच्छेद

7.8K 1K 0

यात्रा आरंभ हुई। जगत नहीं, कोई नहीं—सिर्फ अपू है, और सामने नीलमणि हाजरा की यात्रा-मंडली है। संध्या से पहले बेला पर इमन् का आलाप हुआ। वह बेलावादक अच्छा था। गाँव-देहात के लड़के ने कभी ऐसी भली चीज़ सुनी न थी—उदासी में डूबी करुण धुन से अचानक मन कैसा तो करने लगा… याद आया, बाबा अब भी घर पर बैठे वही कुछ लिख रहे होंगे—दीदी आना चाहती थी, पर आ न सकी। पहली बार जब ज़री के पोशाक पहने, टँगे हुए झाड़-फानूस और कौड़ियों के डोमों की रोशनी से सजे मंच पर राजा के मंत्री आने लगे, अपू ने सोचा, ऐसी चीज़ें उसके बाबा ने नहीं देखीं। गाँव के सभी लोग तो मंच पर आ गए हैं, उनके मोहल्ले का कोई भी तो बाकी नहीं! बाबा अब तक क्यों…? लीला तेज़ी से आगे बढ़ने लगी। उस बार उसने बालक-कीर्तन मंडली की यात्रा सुनी थी—वह भी क्या थी, और यह भी क्या है! क्या साज़-सज्जा! क्या चेहरे!…

अचानक पीछे से किसी ने कहा— “खोका, ठीक से दिख रहा है न?…” उसके बाबा कब आकर मंच के सामने बैठ गए, अपू को पता ही नहीं चला। बाबा की ओर मुड़कर वह बोला— “बाबा, दीदी आई है?… शायद चिक के पीछे?”

मंत्री के गुप्त षड्यंत्र के कारण जब राजा राज्य-विहीन होकर पत्नी-पुत्र संग वन को चले, तब करुण सुर में बेला बजने लगा। फिर राजा ने करुण रस को देर तक जमाए रखने के लिए पत्नी-पुत्र का हाथ पकड़कर एक-एक कदम पर रुकना और फिर एक-एक कदम आगे बढ़ना शुरू किया, जैसा कि वास्तविक जगत में कोई भी वनगमन को उद्यत राजा, जब तक कि वह विक्षिप्त न हो, एक समूह के सामने ऐसा नहीं करेगा। विश्वासपात्र राज-सेनापति क्रोध में ऐसे काँपने लगे कि किसी मिर्गी के रोगी को भी उनसे ईर्ष्या हो जाए। अपू अपलक नेत्रों से बैठा देखता रहा, मुग्ध-विस्मित हो गया; ऐसा तो उसने कभी नहीं देखा था!

फिर कहाँ चले गए राजा, कहाँ गईं रानी!… घने, निविड़ वन में केवल राजकुमार अजय और राजकुमारी इंदुलेखा भाई-बहन घूमते रहे! कोई नहीं जो उनके मुख की ओर देखे, कोई नहीं जो निर्जन वन में उन्हें राह दिखाए। छोटे भाई के लिए फल लाने थोड़ी दूर जाकर इंदुलेखा और नहीं लौटी। अजय वन में बहन को खोजता फिरा—फिर नदी के किनारे अचानक उसे इंदुलेखा का मृतदेह मिला—भूख की पीड़ा से विषफल खाकर वह मर गई थी। अजय का करुण गान—कोथा छेड़े गेलि ए बनकांतारे प्राणप्रिय प्राणसाथी रे—सुनकर अपू, जो इतनी देर से मुग्ध आँखों से देख रहा था—और न रह सका, वह सुबक-सुबक कर रो पड़ा।

कलिंगराज के साथ विचित्रकेतु के युद्ध में तलवारबाज़ी क्या थी!… लगता था, या तो झाड़-फानूस चूर-चूर हो जाएँगे, या किसी अभागे दर्शक की आँखें ही चली जाएँगी! शोर मचता— “झाड़ सम्हाल के! झाड़ सम्हालो!…” किंतु अद्भुत युद्ध-कौशल—सब बचाकर निकल गए—धन्य विचित्रकेतु!

बीच में जब बहुत देर तक जोड़ी का लंबा गीत और बेला पर कलाबाज़ी चल रही थी, अपू को उसके बाबा ने बुलाकर कहा— “नींद आ रही है… घर चलोगे खोका?” …नींद! सर्वनाश!… नहीं, वह घर नहीं जाएगा। बाहर बुलाकर उसके बाबा ने कहा— “ये दो पैसे रखो बाबा, कुछ खरीद कर खा लेना, मैं घर गया।” अपू की इच्छा हुई कि वह एक पैसे का पान खरीद कर खाए। पान की दुकान के पास अत्यधिक भीड़ देखकर वह आगे बढ़ा और देखा, एक अद्भुत कांड! सेनापति विचित्रकेतु हथियारबंद अवस्था में ‘बर्ड्स-आई’ सिगरेट खरीदकर सुलगा रहे हैं—उन्हें घेरकर रथयात्रा जैसी भीड़ लगी है। आश्चर्य पर आश्चर्य!… राजकुमार अजय न जाने कहाँ से आकर विचित्रकेतु की कोहनी पर हाथ रखकर बोला— “एक पैसे का पान खिलाओ न किशोरदा?” राजकुमार के प्रति सेनापति की वफ़ादारी का कोई चिह्न न दिखा—हाथ झटककर बोला— “जा! इतने पैसे नहीं हैं—उस बेला जो साबुन हम दोनों ने लगाया, तुमने मुझसे क्या कहा था?” राजकुमार ने पुनः कहा— “खिलाओ न किशोरदा? क्या मैंने तुम्हें कभी कुछ नहीं दिया?” विचित्रकेतु हाथ छुड़ाकर चला गया।

वह अपू का हमउम्र होगा। गोरा-चिट्टा, देखने में सुंदर, गाने का गला बड़ा मधुर। अपू मुग्ध होकर उसकी ओर देखता रहा। बड़ी इच्छा हुई कि उससे जान-पहचान करे। अचानक वह किसी खिंचाव में साहसी होकर आगे बढ़ा—थोड़ी लज्जा के साथ बोला— “पान खाओगे?…” अजय थोड़ा चकित हुआ, बोला— “तुम खिलाओगे? ले आओ न।” दोनों में दोस्ती हो गई। दोस्ती कहना भूल होगी। अपू मुग्ध, अभिभूत हो गया! इसी को तो वह इतने दिनों से मन-ही-मन चाहता आया था—इस राजकुमार अजय को। उसकी माँ की सैकड़ों रूपकथाओं के बीच, बचपन की सैकड़ों स्वप्निल मुग्ध कल्पनाओं के घेरे में, उसके प्राणों ने इसी को चाहा था—यही आँखें, यही मुख, यही कंठ-स्वर! ठीक जैसा वह चाहता था, वैसा ही। अजय ने पूछा— “तुम्हारा घर कहाँ है भाई?… मुझे एक घर में खाने को दिया है, बड़ी देर से खाना देते हैं। तुम्हारे घर में कौन खाता है?…”

खुशी से अपू का सारा शरीर सिहर उठा, वह बोला— “भाई, हमारे घर में एक आदमी खाने आता है, उसे आज मैंने ढोलक बजाते देखा—तुम कल से आना, मैं आकर बुला लाऊँगा—ढोलकवाला चाहे तो उस घर में खा लेगा जहाँ तुम पहले खाते थे।”

कुछ देर दोनों इधर-उधर घूमने के बाद अजय बोला— “मैं चलता हूँ भाई, आख़िरी सीन में मेरा गाना है—मेरा पार्ट कैसा लग रहा है तुम्हें?”

देर रात जब यात्रा समाप्त हुई, अपू घर आया। रास्ते में आते-आते जो जहाँ भी बात कर रहा था, उसे लग रहा था मानो यात्रा का अभिनय हो रहा हो। घर पर उसकी दीदी ने कहा— “ओ अपू, कैसी यात्रा सुनी?…” अपू को लगा, जैसे गहरे, जनशून्य वन में राजकुमारी इंदुलेखा कुछ कह उठी। न जाने कैसा नशा उस पर छा गया था। बड़ी खुशी के साथ वह बोला— “कल से, जो अजय बना था माँ, वह हमारे घर खाने आएगा।”

उसकी माँ बोली— “दोनों खाएँगे? दोनों को कहाँ से…”

अपू बोला— “नहीं, एक तो चला जाएगा, सिर्फ़ अजय खाएगा।”

दुर्गा ने कहा— “कैसी यात्रा थी रे अपू?… ऐसी कभी नहीं देखी—कैसा गाना गाया जब वह राजकुमारी मर गई?…” अपू को तो रात में नींद के नशे में चारों ओर जैसे बेला का संगीत बज रहा था। भोर होने पर थोड़ी देर से उसकी नींद खुली—देर रात सोया था, तृप्ति से नींद नहीं हुई थी, सूरज की तीखी रोशनी आँखों में सुई-सी चुभ रही थी। आँखों में पानी डालने पर जलन होती। किंतु उसके कानों में एक बेला-ढोल-मंजीरे का समवेत वाद्य-संगीत तब भी जैसे बज रहा था—तब भी जैसे वह यात्रा के मंच पर ही बैठा हो।

घाट के रास्ते पर मोहल्ले की औरतें बातें करती हुई जा रही थीं, अपू को लगा कोई धीरावती है, कोई कलिंग देश की महारानी, कोई राजकुमार अजय की माँ वसुमती। दीदी की हर बात में, हाथ-पैर हिलाने की भंगिमा में, राजकुमारी इंदुलेखा जैसे लिपटी हुई थी! कल जो इंदुलेखा बनी थी, वह उस पर अच्छी लग रही थी, किंतु उसके मन-ही-मन राजकुमारी इंदुलेखा की जो प्रतिमा गढ़ी गई थी, वह उसकी दीदी को लेकर थी, वैसा ही गोरा रंग, वैसी ही बड़ी-बड़ी आँखें, वैसा ही सुंदर मुख, वैसे ही सुंदर बाल!

इंदुलेखा अपनी सारी करुणा, स्नेह, माधुरी लेकर किसी पुराने ज़माने के देश के अतीत जीवन के बाद फिर से उसकी दीदी बनकर जैसे लौट आई थी। कल इसीलिए इंदुलेखा की बातों की भंगिमा में, हर पदक्षेप में दीदी ही जैसे फूट-फूटकर बाहर आ रही थी। जब गहरे वन में उसने बड़े स्नेह से छोटे भाई को गले लगाया था, उसे खिलाने के लिए फल लाने जाकर एक निर्जन वन में खो गई थी—अपू को वह एक दिन की मकाल फल वाली घटना ही बार-बार याद आ रही थी।

दोपहर में भोजन के लिए अपू जाकर अजय को बुला लाया। उसकी माँ ने दोनों को एक जगह खाने के लिए बिठाकर अजय का परिचय लेना शुरू किया। वह ब्राह्मण का बेटा था, उसका कोई नहीं था, एक मौसी ने उसे पाला था, वह भी मर गई। आज एक साल से वह यात्रा-मंडली में काम कर रहा है। सर्वजया को उस लड़के पर बड़ा स्नेह हो आया—बार-बार पूछकर उसे खिलाया। खिलाने की सामग्री ज़्यादा कुछ न थी, फिर भी लड़के ने बड़ी खुशी से खाया। उसके बाद दुर्गा ने माँ से चुपके-चुपके कहा— “माँ, उसे कल वाला गाना गाने को कहो न—वही ‘कोथा छेड़े गेलि ए बनकांतारे प्राणप्रिय प्राणसाथी रे’।”

अजय ने गला खोलकर गाना गाया—अपू मुग्ध हो गया—सर्वजया की पलकें भीग आईं। आहा, ऐसे लड़के की माँ नहीं! उसके बाद उसने और भी गाने गाए। सर्वजया ने कहा— “शाम को मुरमुरे भूनूँगी बेटा, तब ज़रूर आकर मुरमुरे खा जाना—लज्जा मत करना—जब मन चाहे आना, अपने घर की तरह, समझे?”

अपू उसे साथ लेकर नदी के किनारे की ओर घूमने गया। वहाँ अजय ने कहा, “भाई, तुम्हारा तो गला मीठा है, एक गाना गाओ न?”… अपू की बड़ी इच्छा हुई कि उसके सामने गाना गाकर वह वाहवाही लूटे। किंतु बड़ा डर लगता है—यह एक यात्रा-मंडली का लड़का है—इसके सामने उसका गाना गाना? नदी किनारे बड़े सेमर के पेड़ के नीचे, आने-जाने वाले रास्ते से कुछ दूर बाँस की झाड़ियों की आड़ में दोनों बैठ गए। अपू ने बड़ी मुश्किल से लज्जा त्यागकर एक गाना गाया—श्रीचरणे भार एकबार गा तोल हे अनंत—दाशू राय के पांचाली का गीत बाबा के मुँह से सुनकर उसने लिख लिया था। अजय चकित हो गया, बोला— “तुम्हारा ऐसा गला है भाई? तो तुम गाते क्यों नहीं?… और एक गाओ।” अपू उत्साहित होकर दूसरा गीत शुरू करता है—खेयार आशे बसे रे मन डुबल बेला खेयार धारे। उसकी दीदी ने न जाने कहाँ से सीखकर गाया था, सुर बड़ा अच्छा लगने पर अपू ने उससे सीख लिया था—घर पर जब कोई नहीं होता, तो वे दोनों कभी-कभी यह गाना गाते थे।

गाना समाप्त होने पर अजय प्रशंसा से उच्छ्बसित हो उठा। बोला— “ऐसा गला हो तो किसी भी मंडली में घुसने पर पंद्रह रुपये महीना देने को तैयार हो जाएँगे, मैं कह रहा हूँ तुमसे—इसके ऊपर थोड़ा और सीख लो।”

घर पर जब कोई नहीं होता, दीदी के सामने गाकर अपू ने कई बार दीदी से पूछा था— “हाँ दीदी, मेरा गला है? गाना होगा?…” दीदी उसे हमेशा आश्वासन देती आई थी। किंतु दीदी का आश्वासन चाहे कितना भी आशाप्रद हो, आज एक संगीत-दक्ष, ख़ास यात्रा-मंडली के नामी, मेडल-प्राप्त गायक के मुँह से यह प्रशंसा की बात सुनकर आनंद में अपू क्या उत्तर दे, यह तय नहीं कर पाया।

बोला— “तुम्हारा वह गाना मुझे सिखाओ न?…” उसके बाद दोनों ने गला मिलाकर वह गाना गाया।

काफ़ी देर हो गई। नदी में छप-छप करती हुई नावें चल रही थीं, नदी के तट के नीचे पानी के किनारे कोई कुछ खोज रहा था, अजय ने कहा— “क्या खोज रहा है भाई?” अपू बोला— “मेंढक के बच्चे खोज रहा है, बंसी से मछली पकड़ेगा।”—फिर बोला— “अच्छा भाई, तुम हमारे यहाँ रहते क्यों नहीं?… कहीं मत जाओ, रहोगे?…”

ऐसी आँखें, ऐसा मीठा कंठ-स्वर! उसके ऊपर, अपू के लिए वह राजकुमार अजय था। किसी वन में भटकते-भटकते एक असहाय, बेघर, रूपवान राजा के बेटे से अचानक मुलाक़ात होकर जन्म-जन्मांतर का दोस्त बन गया है। अब उसे कैसे छोड़ा जा सकता है?

अजय ने भी मन की कई बातें कह डालीं। ऐसा साथी उसे और नहीं मिला। उसने लगभग चालीस रुपये जमा कर लिए हैं। थोड़ा और बड़ा होने पर वह यह मंडली छोड़ देगा। अधिकारी बहुत मारता है।

वह आशुतोष पाल की मंडली में जाएगा—वहाँ बड़ा सुख है, रोज़ रात में पूड़ियाँ मिलती हैं। न खाने पर तीन आने पैसे ख़ुराक के मिलते हैं। यह मंडली छोड़ने पर वह फिर अपू के घर आएगा और उस समय कुछ दिन रहेगा। शाम से कुछ पहले अजय बोला— “चलो भाई, आज फिर अभी मंचन होगा, जल्दी लौटते हैं। अगर ‘परशुराम का दर्प-संहार’ हुआ, तो मैं नियति का पात्र बनूँगा, देखना कैसा एक गाना है।”

और तीन दिन यात्रा हुई। गाँव भर के लोगों के मुँह पर यात्रा के अलावा और कोई बात नहीं। रास्ते, घाट, खेत में गाँव का मल्लाह नाव खेते हुए, ग्वाला गाय चराते हुए यात्रा की लीला के नए सीखे गीत गाता। गाँव की औरतें मंडली के लड़कों को घर बुलाकर, जिसका जो गीत अच्छा लगा, उसके मुँह से वह गीत फ़रमाइश करके सुनतीं। अपू ने और तीन-चार नए गीत सीख लिए। एक दिन वह यात्रा-मंडली के डेरे पर अजय के साथ गया, वहाँ उसे मंडली के सब लोगों ने मिलकर घेर लिया, उसे एक गाना गाना होगा। वहाँ सबने अजय के मुँह से सुना था कि वह बहुत अच्छा गाता है। अपू ने बहुत मान-मनौव्वल के बाद अपनी विद्या अच्छे से ज़ाहिर करने की ख़ातिर एक गाना गा ही दिया। सब उसे पकड़कर अधिकारी के पास ले गए। वहाँ भी उसे एक गाना गाना पड़ा। अधिकारी काले रंग का, तोंद वाला आदमी था, मंच पर जोड़ी बनकर गाता था। गाना सुनकर बोला— “आओ न खोका, मंडली में आओगे?” अपू का सीना आनंद और गर्व से दस हाथ चौड़ा हो गया। और सबने मिलकर उसे घेर लिया— “आओ, चलो तुम्हें हमारी मंडली में ले चलते हैं।” अपू की तो इच्छा हुई कि वह अभी चला जाए। यात्रा-मंडली में काम करना मनुष्य-जीवन का चरम उद्देश्य है, यह बात वह इतने दिनों से क्यों नहीं जानता था, यही तो आश्चर्य की बात है। उसने गुपचुप अजय से कहा— “अच्छा भाई, अभी अगर मैं मंडली में जाऊँ, तो मुझे क्या अभिनय करने देंगे?” अजय बोला— “अभी तो ये सखी-वखी, या किसी बालक का पात्र, ऐसा ही, फिर अच्छे से सीख लेने पर…”

अपू सखी नहीं बनना चाहता—ज़री का मुकुट सिर पर पहनकर वह सेनापति बनेगा, तलवार लटकाएगा, युद्ध करेगा। बड़ा होने पर वह यात्रा-मंडली में जाएगा ही, यही उसके जीवन का ध्रुव लक्ष्य है। अजय ने उसे चुपके से कसौटी-पत्थर के रंग वाले एक छोकरे को दिखाकर कहा, “यह जो देख रहे हो, इसका नाम बिष्टू तेली है। मेरे साथ बिलकुल नहीं बनती, मैं अपने पैसे से माचिस खरीदकर तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ, माचिस उठाकर ले जाता है सिगरेट पीने, और देता नहीं। मैं कहता हूँ रात को डर लगता है, माचिस दे दो। अँधेरे में मन छम-छम करता है, इसीलिए उस दिन माँगा था तो ऐसा एक थप्पड़ मारा! नाचता अच्छा है इसलिए अधिकारी बड़ी ख़ातिर करता है, कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं होती।”

पाँच-एक दिन बाद यात्रा-मंडली का गायन समाप्त होने पर वे रवाना हुए। अजय घर के लड़के की तरह जब-तब आता-जाता था, इन कुछ दिनों में वह जैसे अपू का ही एक और भाई बन गया था। अपू की ही उम्र का छोटा-सा लड़का, संसार में कोई नहीं है सुनकर सर्वजया ने उसे इन कुछ दिनों में अपू की तरह ही स्नेह किया। दुर्गा ने भी उसे अपने भाई की आँखों से देखा—उससे गाना सीख लिया, कितनी कहानियाँ सुनाईं, अपनी बुआ की बातें बताईं, तीनों ने मिलकर आँगन में बड़ा घर बनाकर गंगा-यमुना खेला, खाने के समय ज़बरदस्ती ज़्यादा खाने पर विवश किया। यात्रा-मंडली में रहता है, कौन कहाँ देखता है, कहाँ सोता है, क्या खाता है, आहा कहने वाला कोई नहीं; गृह-संसार का जो स्नेह-स्पर्श शायद जन्म से ही उसके भाग्य में नहीं था, अप्रत्याशित रूप से आज उसका स्वाद पाकर लोभी की तरह वह उसे किसी भी हाल में छोड़कर जाना नहीं चाहता था।

जाते समय उसने अचानक अपनी पोटली खोलकर कष्ट से संचित पाँच रुपये निकालकर सर्वजया के हाथ में देने की कोशिश की। थोड़ी लज्जा के स्वर में बोला— “इन पाँच रुपयों से दीदी की शादी के समय एक अच्छी साड़ी…”

सर्वजया ने कहा— “नहीं बाबा, नहीं—तुमने मुँह से कह दिया यही बहुत है, पैसे नहीं देने होंगे, तुम्हें अभी पैसों की कितनी ज़रूरत है—ब्याह-शादी करके गृहस्थ बनना होगा।”

फिर भी वह किसी तरह नहीं माना। बहुत समझाने पर उसे रोकना पड़ा।

उसके बाद सभी लोग उनके घर के दरवाज़े के सामने कुछ दूर तक उसे पहुँचाने आए। जाते समय वह बार-बार कह गया, दीदी की शादी के समय उसे ज़रूर पत्र दिया जाए।

गूलर के पेड़ की छाया में उसकी सुकुमार बालक-मूर्ति भाँट और सेहुँड़ की झाड़ियों की आड़ में अदृश्य हो गई, तो अचानक सर्वजया के मन में आया, कितना छोटा-सा लड़का है, आहा, इस उम्र में निकला है अपनी रोज़ी-रोटी ख़ुद कमाने। मेरे अपू का अगर ऐसा होता—हे माँ!…

0 Next
Continue to next part Up next चौबीसवाँ परिच्छेद
Previous part

Recommended for you

Comments (0)

Log in to join the conversation.