गाँव में बारोवारी चड़क-पूजा का समय आ पहुँचा। गाँव के वैद्यनाथ मजूमदार चंदे की बही हाथ में लिए घर-घर चंदा उगाहने निकले। हरिहर बोला, "नहीं खुड़ो, इस बार मेरा एक रुपए का चंदा लगाना अन्याय है — एक रुपया देने की मेरी हैसियत कहाँ?" वैद्यनाथ बोले — "ना हे ना, इस बार नीलमणि हाजरा की मंडली आ रही है। ऐसी मंडली तो इस अंचल में किसी ने देखी भी नहीं होगी। इस बार पाल-पाड़ा के बाज़ार में महेश सेकरा का बाल-कीर्तन दल गाएगा, उसके साथ टक्कर तो देनी ही होगी।"
वैद्यनाथ ने ऐसा भाव दिखाया मानो निश्चिन्दिपुर-वासियों का जीवन-मरण इसी प्रतियोगिता की सफलता पर निर्भर कर रहा हो।
अप्पू एक छड़ी खींचता-घसीटता घर में घुसा और बोला, "पक्की छड़ी है बाबा, तुम्हारी बहुत अच्छी कलम बनेगी। तालाब के किनारे बाँस-तल में पड़ी थी, बीन लाया।" फिर वह मुस्कराते हुए उसे थोड़ा ऊपर उठाकर दिखाते हुए बोला, "बनेगी न बाबा तुम्हारी कलम? कैसी पक्की है, है न?"
चड़क में अब ज़्यादा देर नहीं। घर-घर गाजन के संन्यासी नाचने निकले हैं। दुर्गा और अप्पू खाना-पीना, सोना-जागना छोड़कर संन्यासी-दल के पीछे-पीछे मोहल्ले-मोहल्ले घूमते फिरे। दूसरे गृहस्थों के घरों से पुराने कपड़े, चावल, पैसे मिलते, कोई घड़ा भी दे देता — पर ये लोग दो मुट्ठी चावल के सिवा कुछ दे नहीं पाते थे — इसीलिए इनके घर यह दल कभी आता ही नहीं। दस-बारह दिन संन्यासी-नाच के बाद चड़क की पूर्व-रात्रि को नील-पूजा आई।
नील-पूजा के दिन दोपहर बाद एक छोटे-से खजूर के पेड़ पर संन्यासी काँटे तोड़ते हैं — इस बार दुर्गा ने आकर खबर दी कि हर साल वाले उस पेड़ पर इस बार काँटा-भंजन नहीं होगा, नदी के किनारे एक दूसरे पेड़ को संन्यासियों ने पहले से ही तय कर लिया है। मोहल्ले के लड़कों के साथ दल बाँधकर दुर्गा और अप्पू वहाँ जा जुटे। फिर काँटा-भंजन का नाच हो जाने पर सब लोग एक बार चड़क-तले तक घूमने गए। खजूर की डालियों से नील-पूजा का मंडप घेरा गया है — चड़क-तले के मैदान की सेहुँड़-झाड़ी और दूसरी जंगली घास-फूस काटकर साफ़ कर दिया गया है। वहाँ भुवन मुकुर्जी के घर की लड़कियों से भेंट हुई — रानी, पुँटी, टुनू — इनके घर कड़ी निगरानी है, दुर्गा की तरह जहाँ-तहाँ मटरगश्ती करने की इजाज़त नहीं — बड़ी मुश्किल से कह-सुनकर ये लोग चड़क-तले तक आई हैं।
टुनू बोली, "आज रात को संन्यासी श्मशान जगाने जाएँगे।"
रानी बोली, "अहा, सो क्या मैं नहीं जानती? एक जन मुरदा बनेगा। उसे बाँधकर ले जाएँगे श्मशान की उस छातिम-तली में। उसे फिर जिलाएँगे, उसके बाद मुरदे की मुंड लेकर आएँगे — छड़ा कहते-कहते आएँगे — उनके पास सब मंतर हैं।"
दुर्गा बोली, "मैं जानती हूँ उनका छड़ा, सुनेगी? बोलूँ?"
स्वर्ग से आया रथ,
उतरा खेत-तल में,
चौबीस कोटि बाण-वर्षा, शिव के संग चले —
सत्ययुग का मुरदा और आवल युग की माटी,
शिव-शिव बोलो रे भाई, ढाक पर दो काठी।
फिर हँसकर बोली, "कैसी चमत्कार पुतलियाँ बनी हैं इस बार गोष्ठ-बिहार की, नीलू-दा?... दाशू कुम्हार के घर देखकर आई हूँ — नहीं देखी, रानू?"
पुँटी बोली, "सचमुच की मुरदे की मुंडी, रानू-दी?"
"नहीं तो क्या? बहुत रात को अगर आएगी तो देख पाएगी। चल भाई, हम लोग घर चलें — आज की रात अच्छी नहीं — आ रे अप्पू, दुग्गा-दी, आ।"
अप्पू बोला, "क्यों अच्छी नहीं है रानू-दी? आज रात क्या होगा?..."
रानी बोली, "वो सब बातें कहते नहीं — तू घर आ।" अप्पू नहीं गया, लेकिन दुर्गा उनके दल के साथ चली गई। फिर अचानक बादल घिर आए, संध्या का अंधकार बादलों में और भी घना हो गया। अप्पू घर लौट रहा है, रास्ते में कोई नहीं, शाम से ही श्मशान और मुरदे की मुंडी की कहानी सुनकर उसे कुछ-कुछ डर लग रहा है। मोड़ के बाँस-वन के पास आकर लगा कि किसी चीज़ की तीखी गंध आ रही है। वह तेज़ क़दमों से चलने लगा। और थोड़ा आगे जाकर नेड़ा की ठाकुरमाँ से भेंट हुई। नेड़ा की ठाकुरमाँ नील-पूजा का नैवेद्य हाथ में लिए चड़क-तले पूजा देने जा रही है। अप्पू अँधेरे में पहले तो पहचान नहीं पाया, बाद में पहचानकर बोला, "किसकी गंध आ रही है ठाकुरमाँ?"
बुढ़िया बोली, "आज वे सब निकले हैं न?... उसी की गंध है और क्या।"
अप्पू बोला, "कौन ठाकुरमाँ?"
"कौन फिर — शिव के दलबल, संध्या के समय उनका नाम नहीं लेते, राम-राम, राम-राम।" अप्पू के रोंगटे खड़े हो गए। चारों ओर अँधेरी शाम, आकाश में काले बादल, बाँस-वन, श्मशान की गंध, शिव के अनुचर भूत-प्रेत — छोटे बच्चे का मन विस्मय, भय, रहस्य और अनजाने की अनुभूति से भर उठा। उसने आतंक-भरे स्वर में कहा, "मैं घर कैसे जाऊँगा ठाक्'माँ!..."
बुढ़िया झिड़क उठी। "तो इतनी रात करनी ही क्यों थी बापू आज के दिन?... आओ मेरे साथ। नील पूजा की थाली चढ़ा आऊँ, फिर तुम्हें छोड़ आऊँगी। धन्य हो बाबा।"
बारोवारी-तले घास छीलकर, बड़े-बड़े बाँसों का मेहराब बाँधकर शामियाना टाँग दिया गया है। यात्रा-दल आता है, आता है — अभी तक पहुँचा नहीं। शाम बीत जाने पर लोग कहते, कल सुबह की गाड़ी से आएगा, सुबह बीत जाने पर शाम की आस लगी रहती। अप्पू का नहाना-खाना बंद होने की नौबत आ गई है... रात को अप्पू को नींद नहीं आती, बाँध-टूटी बाढ़ की धारा जैसी कौतूहल और खुशी की कैसी प्रबल, अदम्य लहर! बिस्तर पर छटपटाता, करवटें बदलता रहता। यात्रा होगी! यात्रा होगी! यात्रा होगी!
माँ की मनाही है कि इतनी बड़ी लड़की होकर मोहल्ला छोड़कर कहीं न जाए, दुर्गा चुपके-चुपके जाकर देख आती और राजलक्ष्मी के पास आसन-सज्जा और बाँसों पर लटके लाल-नीले काग़ज़ों की नवीनता के बारे में कहानी सुनाती। अप्पू को लगता, जिस पंचानन-तले वह दिन में दो बार कौड़ी-खेल खेलता है, उस तुच्छ, अत्यंत परिचित, सामान्य-सी जगह पर आज या कल नीलमणि हाजरा की मंडली की यात्रा जैसी एक अभूतपूर्व, अवास्तविक घटना घटेगी, क्या यह भी संभव है? उसे इस बात पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।
अचानक सुनने में आया कि आज दोपहर बाद ही दल आएगा। खून की एक लहर जैसे छाती से उछलकर सीधे सिर में चढ़ गई...
कुम्हार-पाड़ा के मोड़ पर दोपहर से ही सब लड़कों के साथ खड़े रहने के बाद दूर एक बैलगाड़ी उसकी आँखों में पड़ी, साज़-सामान के बक्से से लदी गाड़ी — एक, दो, तीन, चार, पाँच गाड़ियाँ! पट्टू एक-एक कर उँगलियों से गिनकर खुशी के स्वर में बोला, "अप्पू-दा, हम लोग इनके पीछे-पीछे इनके डेरे तक जाकर देखें, चलेगा?" साज़ की गाड़ियों के पीछे दल के लोग जा रहे थे, सबके सिर पर माँग निकली हुई, कई के जूते हाथ में। पट्टू एक दाढ़ी वाले आदमी को दिखाकर बोला, "यह शायद राजा बनता है, है न अप्पू-दा?"
आकाश-हवा का रंग बिलकुल बदल गया — अप्पू बड़े उत्साह में घर लौटकर देखता है कि उसके बाबा बरामदे में बैठकर कुछ लिख रहे हैं और गुनगुनाकर गीत गा रहे हैं। वह सोचता है, यात्रा आने की बात उसके बाबा को भी पता चल गई है, इसीलिए इतनी स्फूर्ति है। उत्साह में हाथ हिलाकर कहता है, "साज़-सामान पूरे पाँच गाड़ियों में आया है बाबा! ऐसी मंडली!"
हरिहर शिष्य-गृहस्थों को देने के लिए काग़ज़ पर तावीज़ लिख रहा था, मुँह उठाकर विस्मय के स्वर में बोला, "किसका साज़ रे खोका?" अप्पू आश्चर्यचकित हो जाता है, इतनी बड़ी घटना बाबा को नहीं मालूम! वह बाबा को नितांत कृपा का पात्र समझता है।
सुबह उठकर अप्पू को पढ़ने बैठना पड़ता है। थोड़ी देर बाद वह रोआँसे भाव से कहता है, "मैं बारोवारी-तले जाऊँगा बाबा, सब जा रहे हैं और मैं क्या अब बैठे-बैठे पढूँगा? अभी अगर यात्रा शुरू हो गई तो?"
उसके बाबा कहते हैं, "पढ़ो, पढ़ो, अभी बैठकर पढ़ो, यात्रा शुरू होने पर तो ढोल बजने की आवाज़ सुनाई देगी? तब न हो तो चले जाना।" प्रौढ़ अवस्था का बेटा, खुद हर समय आजकल परदेस में रहता है, थोड़े दिनों के लिए घर आकर बेटे को आँखों से ओझल नहीं करना चाहता। अभिमान और क्रोध में अप्पू की आँखों से आँसू बहने लगते हैं, वह रोती हुई आवाज़ में फिर से शुभंकरी शुरू करता है — "मास माहिनो यार जतो, दिन तार पड़े कतो?"
लेकिन सुबह यात्रा नहीं बैठी, खबर आई कि दोपहर बाद बैठेगी। दोपहर बाद अप्पू माँ के पास जाकर रोआँसे भाव से बाबा के अत्याचारों की कहानी विस्तार से सुनाता है। सर्वजया आकर कहती है, "छोड़ दो न बच्चे को? साल भर का एक दिन है — तुम तो साल में महीनों घर पर नहीं रहते, और क्या एक दिन की पढ़ाई से वह तर्कालंकार ठाकुर बन जाएगा?"
अप्पू को छुट्टी मिल जाती है। सारी दोपहर उसकी बारोवारी-तले कटती है। दोपहर बाद यात्रा बैठने से पहले घर पर कुछ खाने आया। बाबा ओसारे में बैठकर तावीज़ लिख रहा है। दूसरे दिनों इस समय उसे अपने बाबा के पास बैठकर किताब पढ़नी होती। कहीं लड़का बिगड़ न जाए, इस डर से उसके बाबा उसे खुश रखने के लिए तरह-तरह के कौतुक का आयोजन करते। कहते, "खोका, झट से स्लेट पर लिखकर लाओ तो — ऐं: भूत बाप रे!..." अप्पू ऐसी अजीब बातें सुनकर हँसते-हँसते लोटपोट हो जाता, जल्दी से लिखकर लाकर दिखाता। कहता, "बाबा, यह हो जाए तो मैं चला जाऊँगा।..." उसके बाबा कहते, "जाना अभी, जाना अभी, खोका — अच्छा झट से लिखकर लाओ तो..." और एक अजीब बात कहते। अप्पू फिर हँस पड़ता।
आज लेकिन अप्पू को लगा, जैसे बाहर से कोई प्रचंड शक्ति आकर उसे उसके बाबा के पास से हटाकर ले गई है। बाबा निर्जन, छाया-भरी दोपहर में, बाँस-वन से घिरे घर में अकेले बैठे-बैठे लिख रहे हैं, लेकिन ऐसी शक्ति नहीं है जो उसे बिठाकर रख सके। अभी अगर कहें — "खोका, आओ पढ़ने बैठो" — तो जैसे चारों ओर से एक भयानक विरोध का कोलाहल मच जाएगा। सब जैसे कहेंगे — नहीं, नहीं, यह नहीं हो सकता! यह नहीं हो सकता! यात्रा जो बैठी-बैठी है!... किसी उल्लास की प्रबल शक्ति ने उसके बाबा को जैसे नितांत असहाय, निरीह और दुर्बल बना दिया है। सामर्थ्य नहीं कि उसके पढ़ने की बात तक मुँह से निकालें। बाबा के लिए अप्पू का मन कैसा-कैसा करने लगा।
दुर्गा बोली, "अप्पू, तू माँ से कह न कि मैं भी देखने जाऊँगी।" अप्पू बोला, "माँ, दीदी क्यों न आए मेरे साथ? चिक से घेर दिया है, वहीं बैठेगी।" माँ बोली, "अभी रहने दे; मैं उन लोगों के घर की औरतें जाएँगी, उनके साथ जाऊँगी, मेरे साथ जाएगी तब।"
बारोवारी-तले जाते समय दुर्गा ने पीछे से उसे पुकारा, "सुन अप्पू!" फिर वह पास आकर हँसते-हँसते बोली, "हाथ फैला तो!" अप्पू के हाथ फैलाते ही दुर्गा ने उसके हाथ में दो पैसे रखकर उसका हाथ अपने दोनों हाथों के बीच लेकर मुट्ठी बाँध दी और बोली, "दो पैसे की मुड़की खरीदकर खाना, नहीं तो अगर लीची सस्ती बिके तो खरीदकर खाना।" इसके सात-आठ दिन पहले एक दिन अप्पू ने आकर चुपके से दीदी से पूछा था, "तेरे गुड़ियों के बक्से में पैसे हैं? एक देगी?" दुर्गा ने कहा था, "क्या करेगा पैसे का तू?" अप्पू दीदी के मुँह की ओर देखकर थोड़ा हँसकर बोला था, "लीची खाऊँगा।" बात खत्म करके वह फिर लज्जा की हँसी हँसा। सफ़ाई के स्वर में बोला, "बोष्टमों के बाग़ में उन्होंने मचान बाँधा है दीदी, बहुत लीचियाँ तोड़ी हैं, दो टोकरी-ई-ई — एक पैसे की छह, इतनी बड़ी-बड़ी, बिलकुल सिंदूर जैसी लाल, सत्तू ने खरीदीं, साधन ने खरीदीं।" फिर थोड़ा रुककर पूछा, "हैं दीदी?" दुर्गा के गुड़ियों के बक्से में उस दिन कुछ नहीं था, वह कुछ दे नहीं पाई थी। अप्पू को उदास मुँह से जाते देखकर उस दिन उसे बहुत कष्ट हुआ था, इसीलिए कल दोपहर बाद उसने बाबा से दो पैसे चड़क देखने के नाम पर माँग लिए। सोने की डंडी जैसा भाई, मुँह की फ़रमाइश पूरी न कर पाने पर दुर्गा का मन बहुत बेचैन हो जाता है।
अप्पू के चले जाने पर उसकी माँ घाट से आकर बोली, "दुग्गा, एक काम कर तो! रानू लोगों के बाग़ से दो सफेद गंधभेदाली के पत्ते ढूँढ़कर ले आ तो — अप्पू का शरीर कुछ ठीक नहीं है, थोड़ा झोल बनाकर दूँगी!"
माँ की बात सुनकर वह एक दौड़ में रानू लोगों के बाग़ में गई। बाग़ में आदमी-बराबर ऊँची, घनी घास-फूस के जंगल में गंधभेदाली के पत्ते ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मन की मौज में सिर हिलाकर पिशिमा के मुँह से बचपन में सीखी एक छड़ा गुनगुनाने लगी —
हल्दी-वन में, हल्दी-वन में —
नाक की नथनी खो गई,
सुख नहीं है मन में —
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