बहुत दिनों से गाँव के बूढ़े नरोत्तम दास बाबाजी से अपू की बड़ी घनिष्ठता थी। गांगुली-पाड़े के गौरवर्णी, दिव्यकांति, सदानंद वृद्ध एक मामूली-सी फूस की झोपड़ी में रहते थे। उन्हें ख़ास हो-हल्ला पसंद नहीं था, प्रायः एकांत में ही रहते, और शाम के बाद कभी-कभार गांगुलियों के चंडीमंडप में जाकर बैठ जाते। अपू के बचपन से ही हरिहर उसे अपने साथ लेकर कभी-कभी नरोत्तम दास के पास ले जाया करता था — तभी से दोनों में ख़ूब बनती थी। कभी-कभी अपू जाकर उन वृद्ध के पास हाज़िर हो जाता, पुकारता — दादू, हो क्या?
वृद्ध झटपट अपनी कोठरी से बाहर निकल आते और ताड़ के पत्ते की चटाई दालान में बिछाकर कहते — आओ दादाभाई, आओ, बैठो, बैठो —
दूसरी जगहों पर अपू बड़ा संकोची था, मुँह से बात नहीं निकलती थी — लेकिन इन सरल, शांत-दर्शन वृद्ध के संग वह पूरी तरह निःसंकोच होकर घुल-मिल जाता था। वृद्ध के साथ उसकी बातचीत, खेल के साथियों के साथ की बातचीत की तरह ही घनिष्ठ, बेरोक-टोक और उल्लास-भरी होती! नरोत्तम दास का कोई नहीं था, वृद्ध अकेले ही रहते थे — उनकी ही जाति की एक वैष्णव की बेटी घर का काम-काज करके चली जाती थी। कई बार अपू पूरी दोपहर बैठकर कहानियाँ सुनता और सुनाता। यह बात वह जानता था कि नरोत्तम दास बाबाजी उम्र में उसके बाबा से भी बहुत बड़े हैं, अन्नदा राय से भी बड़े हैं — लेकिन इस वयोवृद्धता के कारण ही अपू को न जाने क्यों लगता कि वे वृद्ध उसके सहपाठी हैं, यहाँ आने पर उसका सारा संकोच, सारी लाज अपने-आप ही दूर हो जाती थी।
बातें करते-करते अपू मन खोलकर हँसता, ऐसी-ऐसी बातें कहता जो दूसरी जगहों पर वह डर के मारे कह नहीं पाता था, कि कहीं कोई बड़े-बूढ़े डाँटकर 'ज़ियादा सयाना लड़का' न कह दें। नरोत्तम दास कहते, दादू, तुम मेरे गौर हो। तुम्हें देखकर मुझे लगता है दादू, मेरे गौर तुम्हारी उम्र में बिलकुल तुम्हारी ही तरह सुंदर, सुश्री, निष्पाप थे — वैसी ही भाव-भीगी आँखें थीं उनकी भी —
किसी और जगह यह बात सुनकर अपू को शायद शर्म आ जाती, पर यहाँ वह हँसकर कहता — दादू, तो फिर अब तुम मुझे उस किताब की तस्वीरें दिखाओ।
वृद्ध घर से 'प्रेमभक्ति-चंद्रिका' निकालकर ले आते। वह उनका अत्यंत प्रिय ग्रंथ था, एकांत में पढ़ते-पढ़ते वे मुग्ध-विभोर हो जाते थे। तस्वीरें कुल दो ही थीं, दिखाना हो जाने पर वृद्ध कहते, मैं मरते समय यह किताब तुम्हें दे जाऊँगा दादू, तुम्हारे हाथों किताब का अपमान नहीं होगा —
उनका एक शिष्य कभी-कभी पद रचकर उन्हें सुनाने आता। वृद्ध बिरक्त होकर कहते, पद बाँधे हैं, अच्छा किया है, पर वो सब मुझे मत सुनाओ बापू। पदकर्ता तो विद्यापति और चंडीदास थे, उनके बाद ये सब मेरे कानों को चुभते हैं — ये सब जाकर कहीं और सुनाओ।
यहाँ सहज, सामान्य, आडंबरहीन जीवन की राह पर मानो मुक्ति की कोई अंतःसलिला धारा बहती रहती थी, अपू का मन उस एहसास को जैसे पकड़ लेता था। उसके लिए वह ताज़ी मिट्टी, पंछी, पेड़-पौधों के साहचर्य जैसा ही अंतरंग और आनंदपूर्ण लगता था, इसीलिए दादू के पास आने का उसका आकर्षण इतना प्रबल था।
लौटते समय अपू नरोत्तम दास के आँगन में लगे पेड़ के नीचे से ढेरों मुचकुंद-चंपा के फूल बीन लाता। उन्हें वह बिस्तर पर रख देता। उसके बाद शाम को दीया जलते ही बाबा के आदेश पर उसे पढ़ने बैठना पड़ता। घंटे-भर से ज़्यादा किसी दिन नहीं पढ़ना पड़ता, लेकिन अपू को लगता कि न जाने कितनी रात हो गई! बाद में छुट्टी पाकर वह सोने जाता, बिस्तर पर लेटता, और लेटते ही आज के दिन के सारे खेल-कूद, दिन-भर के सारे आनंद की स्मृतियों से लबरेज़, बिस्तर पर रखे मुचकुंद-चंपा की गंध उसके थके-हारे तन-मन को सराबोर कर देती, खेल-कूद के बीते क्षणों की याद में उसके विरही बाल-मन को व्याकुल कर जाती। बिस्तर पर औंधे होकर वह फूलों के ढेर में मुँह डुबाकर देर तक सुगंध लेता रहता।
उस दिन उसकी दीदी ने चुपके से कहा — चड़ुईभाति करेगा, अपू?
उनके दरवाज़े के सामने से पाड़े की सभी औरतें कुलुई चंडी के व्रत का वनभोज करने गाँव के पीछे वाले मैदान में जाती थीं, उसकी माँ भी जाती थी। लेकिन उसे साथ लेकर नहीं जाती थी। वहाँ सब अपना-अपना सामान लाते थे। उतने चावल-दाल उनके पास नहीं थे। और वनभोज में जाकर सब न जाने क्या-क्या चीज़ें निकालते थे, बढ़िया चावल, दाल, घी, दूध — और उसकी माँ निकालती थी सिर्फ़ मोटा चावल, मटर-दाल की पिट्ठी, और एकाध बैंगन। पास में ही बैठकर भुवन मुकर्जी की सेजठाकुरानी के लड़के-लड़कियाँ नए ताड़-गुड़ की पाटली से दूध और केला सानकर भात खाते, अपने बच्चों के लिए उसकी माँ का मन तड़प उठता।
उसका अपू भी तो वैसा ही दूध-केला और पाटली सानकर भात खाना पसंद करता है!... शांत खेत के किनारे वाले वन पर रक्तिम संध्या उतर आती, बाँसवन के रास्ते लौटते समय सिर्फ़ बेटे का ही मुँह याद आता।
शांत खेत के किनारे वाले वन पर रक्तिम संध्या उतर आती, बाँसवन के रास्ते लौटते समय सिर्फ़ बेटे का ही मुँह याद आता।
नीलमणि राय की जंगल-भरी पुरानी भिटा के उस पार की थोड़ी-सी जंगली झाड़ियों को दुर्गा ने ख़ुद दरांती से काट-छाँटकर साफ़ किया और भाई से बोली — खड़ा होकर देख तो, इमली के पेड़ के नीचे से माँ आ रही है क्या — मैं जल्दी से चावल निकालकर ले आती हूँ —
एक अच्छी-सी नारियल की कटोरी में दो पल तेल चुपके से तेल के मटके से निकाल लाई। चुराया हुआ माल-असबाब बाहर लाकर भाई के हवाले करते हुए बोली — जल्दी ले जा, दौड़ अपू — वहीं रखकर आ, देखना कहीं गाय-गरू न खा जाए —
तभी मातो की माँ अपने छोटे लड़के को पीछे लिए पिछवाड़े के दरवाज़े से आँगन में घुसी। दुर्गा बोली — इधर कहाँ से आ गईं तमरेज की बहू?
मातो की माँ की उम्र भी बहुत ज़्यादा न थी, देखने में भी बुरी नहीं थी, लेकिन पति की मृत्यु के बाद से ही तंगहाली में पड़कर मैली और दुबली-पतली हो गई थी। बोली — कोठी के मैदान में गई थी लकड़ी बीनने — बैंची की माला लोगी?
दुर्गा तो जंगल-बाग खोजकर ख़ुद ही अक्सर ढेरों बैंची के फल तोड़ लाती थी, उसने सिर हिलाकर मना कर दिया — वह नहीं खरीदेगी।
मातो की माँ बोली — ले लो न दीदी ठकरानी, बड़ी मीठी बैंची है, मधुखाली के बिल के किनारे से तोड़ी है — अँचार से एक माला निकालकर दिखाते हुए बोली — देखो तो कितने बड़े-बड़े हैं! लकड़ी लेकर बाज़ार जाती, बेचती, पैसा मिलता तो बहुत देर हो जाती। मातो को तब तक एक पैसे का मुरमुरा ख़रीद देती। ले लो, एक पैसे में दो मालाएँ दे दूँगी —
दुर्गा राज़ी नहीं हुई, बोली — अपू, लोटे में एक मुट्ठी भुने चावल रखे हैं, लाकर मातो के हाथ में दे तो। वे लोग पिछवाड़े के दरवाज़े से ही दोबारा बाहर निकल गए, तो दोनों भाई-बहन अपना सामान लेकर चल पड़े।
चारों ओर वन से घिरा था। बाहर से दिखाई नहीं देता था। खेलघर की मिट्टी की छोटी-सी हाँड़ी जैसी एक हाँड़ी में दुर्गा ने भात चढ़ाकर कहा — ये देख अपू, एक जगह से कितने बड़े-बड़े जंगली आलू के फल ले आई हूँ। पुँटि लोगों के ताड़ के पेड़ के नीचे एक झाड़ी के ऊपर बहुत सारे लगे हैं, भात में डालूँगी।
...अपू बड़े उत्साह से सूखी लताएँ और टहनियाँ बीनकर लाता। यह उनका पहला वनभोज था। अपू को अब भी जैसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यहाँ सचमुच का भात-तरकारी पकेगी, या खेलघर वाले वनभोज की तरह होगा, जो न जाने कितनी बार हुआ था — धूल का भात, खपरे का आलू-भाजा, कटहल के पत्तों की पूड़ियाँ?
लेकिन कितनी सुंदर बेला थी! कितनी सुंदर जगह थी वनभोज की! चारों तरफ़ जंगली झाड़ियाँ, उधर कुंदरू की लताओं का झूलना, बेल के पेड़ के नीचे जंगल में सेहुँड़ के पेड़ पर फूलों के गुच्छे, अधजली भूरी दूब घास पर खंजन पक्षी नाचते-नाचते दौड़ लगा रहे थे, सुनसान झाड़ियों की ओट में वह निभृत, निराली जगह थी। पहली बसंत के दिनों में झाड़ियों में नई-नई कोंपलें फूट रही थीं, भँटवास के फूलों के गुच्छे उस उजाड़ भिटा को आलोकित किए खिले हुए थे, चकोतरे के पेड़ पर कुछ दिनों के कुहासे में बहुत-से फूल झड़ जाने के बावजूद ऊपर की डालों पर सफ़ेद फूलों के गुच्छे नज़र आ रहे थे।
दुर्गा इन दिनों जैसे इन पेड़-पौधों, रास्ते-घाटों, इस अति-परिचित गाँव के कोने-कोने को बहुत ज़्यादा कसकर पकड़ रही थी। आसन्न विरह के कौन-से विषाद से यह कितना प्रिय गूलर-तल्ले का रास्ता, वह उनके घर के पीछे का बाँसवन, छाँव-भरा नदी का घाट, सब-कुछ आच्छन्न रहता। उसका अपू — उसका सोने का टुकड़ा भाई, जिसे एक पहर न देखे तो वह रह नहीं पाती, मन हूक उठता है — उसे छोड़कर वह कितनी दूर जाएगी!
और अगर वह न लौटी — अगर नितम बुआ की तरह हुआ तो?
इसी भिटा पर नितम बुआ रहती थीं, ब्याह होकर न जाने कब, कहाँ चली गईं, फिर कभी पिता की भिटा पर लौटकर नहीं आईं। बहुत पुरानी बात है — बचपन से कहानी सुनती आ रही है। सब कहते हैं कि ब्याह मुर्शिदाबाद ज़िले में हुआ था, वह कितनी दूर है? कहाँ? अब कोई उनकी ख़बर नहीं लेता; वह हैं भी या नहीं, कोई नहीं जानता। पिता को नितम बुआ ने फिर नहीं देखा, माँ को फिर नहीं देखा, भाई-बहन को भी नहीं। सब एक-एक कर मर गए। हे माँ, इंसान इतना निष्ठुर कैसे हो जाता है! क्यों किसी ने उनकी ख़बर नहीं ली! कितने ही दिन उसने अकेले में इस नितम बुआ के बारे में सोचकर आँसू बहाए हैं! आज अगर वह अचानक लौट आए — इस घोर जंगल-भरे, जनशून्य पिता की भिटा को देखकर क्या सोचेगी?
अगर उसका भी वैसा ही हुआ? अपने बाबा को, माँ को, अपू को छोड़कर — फिर कभी मुलाक़ात नहीं होगी — कभी नहीं, कभी नहीं — इस अपने घर से, गूलर-तल्ले से, घाट के रास्ते से?
सोचते ही शरीर सिहर उठता है, नहीं चाहिए यह सब। न जाने क्यों आजकल उसके मन में आता है कि उसके जीवन में जल्द ही कुछ घटित होगा। कुछ ऐसा उसके जीवन में शीघ्र ही आ रहा है जो फिर कभी नहीं आता। दिन-रात खेल-कूद, काम-काज के बीच-बीच में यह बात उसे अक्सर याद आती है... वह ठीक से समझ नहीं पाती कि वह क्या है, या उसके आने की बात कैसे मन में उठती है, फिर भी लगता है, बस लगता ही रहता है, कि वह आ रहा है... आ रहा है... शीघ्र ही आ रहा है...।
चड़ुईभाति के बीच में ही अपू के घर के आँगन से किसी की पुकार सुनाई दी। दुर्गा बोली — बिनी की आवाज़ है शायद, बुलाकर ले आ तो अपू। थोड़ी देर बाद अपू के पीछे-पीछे दुर्गा की ही हमउम्र एक साँवली लड़की आई — ज़रा-सा हँसकर, मानो कुछ अदब के स्वर में बोली — क्या हो रहा है दुर्गा-दीदी?
दुर्गा बोली — आ न बिनी, चड़ुईभाति कर रहे हैं — बैठ।
लड़की उस पाड़े के कालीनाथ चक्रवर्ती की बेटी थी — तन पर अधमैली साड़ी, हाथों में पतली-पतली काँच की चूड़ियाँ, ज़रा लंबा क़द, चेहरा नितांत सीधा-सादा। उसका बाप जोगी बामन था, इसलिए सामाजिक मामलों में पाड़े में उनका न्योता नहीं होता था, गाँव के एक कोने में बड़े संकोच के साथ वे रहते थे। हालत भी अच्छी नहीं थी। बिनी दुर्गा की ख़ूब फ़रमाइशें पूरी करने लगी।
घूमने निकली थी और अचानक जैसे किसी लाभ के सौदे में आ पड़ी हो, अब ये लोग उसे उस उत्सव का हिस्सेदार मानेंगे या नहीं — ऐसा एक संकोच-मिश्रित उल्लास का भाव उसकी बातचीत और हाव-भाव में प्रकट हो रहा था। दुर्गा बोली — बिनी, दो-चार और सूखी लकड़ियाँ देख तो — आग ठीक से जल नहीं रही —
बिनी तुरंत लकड़ी लाने दौड़ी और थोड़ी देर में सूखी बेल की डालियों का एक गट्ठर लाकर हाज़िर करते हुए बोली — इसमें हो जाएगा दुर्गा-दीदी — या और लाऊँ?... जब दुर्गा ने कहा — बिनी आई है — वह भी तो यहीं खाएगी — दो मुट्ठी चावल और ले आ अपू — तो बिनी का चेहरा ख़ुशी से दमक उठा। थोड़ी देर बाद बिनी पानी लाकर दे गई। बड़े आग्रह से पूछा — क्या-क्या तरकारी है दुर्गा-दीदी?
भात उतारकर दुर्गा ने बचा हुआ तेल डालकर उसमें बैंगन तलने के लिए छोड़ दिए। कुछ देर बाद वह अबाक होकर अपनी छोटी-सी हाँड़ी की ओर देखती रही, फिर अपू को बुलाकर बोली — देख तो अपू, बिलकुल असली बैंगन-भाजे जैसा रंग हो रहा है!
ठीक जैसे माँ का पकाया बैंगन-भाजा हो, है न?
अपू को भी यह मामला आश्चर्यजनक लगा।
उसे भी अब तक जैसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उनके वनभोज में सचमुच का भात, सचमुच का बैंगन-भाजा संभव हो पाएगा! उसके बाद तीनों बड़े आनंद से केले के पत्तों पर खाने बैठे, सिर्फ़ भात और बैंगन-भाजा, और कुछ नहीं।
जब अपू ने मुँह में कौर डाला तो दुर्गा उसी ओर देख रही थी, बड़े चाव से पूछा — कैसा बना है रे बैंगन-भाजा?
अपू बोला — बहुत अच्छा बना है दीदी, पर नमक नहीं हुआ है शायद —
नमक को तो उन्होंने आज रसोई की सामग्री-सूची से बिलकुल ही निकाल दिया था, नमक का झंझट ही नहीं पाला था। लेकिन महा-आनंद में तीनों जंगली आलू के उबले फल और फीके, अधजले बैंगन-भाजे के साथ चड़ुईभाति का भात खाने बैठे। यह दुर्गा की पहली रसोई थी, वह विस्मय-मिश्रित आनंद के साथ अपनी हस्त-कला का आनंद ले रही थी! इस जंगली झाड़ियों के बीच, इन सूखी पत्तों के ढेर के बीच, खजूर के पेड़ के नीचे झड़े हुए खजूर-पत्तों के पास बैठकर सचमुच का भात-तरकारी खाना।
खाते-खाते दुर्गा अपू की ओर देखकर खिल-खिल करके ख़ुशी से हँस पड़ी। ख़ुशी के मारे भात का निवाला जैसे उसके गले में अटक जा रहा था। बिनी खाते-खाते डरते-डरते बोली — थोड़ा तेल है दुर्गा-दी? जंगली आलू के फल भात में सान लेती।
दुर्गा बोली — अपू, दौड़कर थोड़ा तेल ले आ —
जो जीवन सैकड़ों पुलकों का भंडार है, कितने ही आनंद-क्षणों की आलो-ज्योत्स्ना के अवदान से मंडित है, इनकी उस माधुर्यमयी जीवन-यात्रा का तो अभी आरंभ ही हुआ है। अनंत जो जीवन-पथ दूर से भी बहुत दूर, दृष्टि के किसी उस पार तक फैला हुआ है, उस पथ के ये नितांत छोटे-से पथिक-दल हैं, पथ के मोड़ों पर फूलों-फलों से, दुःख-सुख से, इनका स्वागत सर्वथा नवीन है।
आनंद! आनंद! विस्तार का आनंद, जीवन के बीच-बीच जो ओट है, विशाल तुषार-मौलि पर्वत-संकट के उस पार का जो रास्ता दिख नहीं रहा, उसका आनंद! आज का आनंद! सामान्य, बिलकुल सामान्य, छोटी-छोटी तुच्छ चीज़ों का आनंद।
अपू बोला — माँ को क्या कहेगी दीदी? शाम को फिर भात खाएगी?
धत्, माँ को कभी बताऊँगी! देखना शाम को अपने-आप भूख लग जाएगी —
जोगी बामन होने के कारण पाड़े में पानी माँगने पर लोग लोटे से पानी पीने को देते थे; और उसे भी माँजकर देना पड़ता था। बिनी दो-एक बार हिचकिचाकर अपू का गिलास दिखाते हुए बोली — मेरे मुँह में थोड़ा पानी डाल देगा, अपू? प्यास लगी है।
अपू बोला — लो न बिनी-दी, तुम ख़ुद लेकर घूँट-घूँट पियो न!
फिर भी बिनी की जैसे हिम्मत नहीं हुई। दुर्गा बोली — ले न बिनी, गिलास लेकर पी ले न?
खाना-पीना हो जाने पर दुर्गा बोली — हाँड़ी फेंकी नहीं जाएगी, लेकिन। फिर किसी दिन वनभोज करेंगे — क्यों, ठीक है न? उस बेर के पेड़ के ऊपर टाँगकर रख दूँगी।
अपू बोला — हाँ, वहाँ रहेगी क्या? मातो की माँ लकड़ी बीनने आती है, देख लेगी तो ले जाएगी दीदी — बड़ी चोर है —
एक टूटी दीवार के रोशनदान-जैसे सुराख के भीतर दुर्गा ने वह छोटी-सी हाँड़ी रख दी।
अपू का दिल धक्-धक् कर रहा था। उस सुराख के दूसरी तरफ़ एक और छोटा सुराख था, जिसके भीतर अपू ने छिपाकर चुरुट का बक्सा रख दिया है, दीदी अगर उस तरफ़ चली गई तो।
नेड़ा के घर कुछ दिन पहले उसके जीजा और उनका एक दोस्त आया था। कलकत्ते के पास कहीं घर था। बड़े बाबू थे, ख़ूब चुरुट पीते थे। अभी एक पिया, फिर दूसरा पीने लगे। अपू के मन में बड़ी इच्छा हुई थी कि वह भी एक बार चुरुट पीकर देखे, कैसा लगता है। उसने नेड़ा से सलाह करके गाँव के हरीश जोगी की दुकान से तीन पैसे में लाल कागज़ में लिपटे दस चुरुट ख़रीद लिए।
उसी दिन इस घने जंगल में अकेले बैठकर चुपके-चुपके एक सिगरेट सुलगाकर पिया था — अच्छा नहीं लगा, कड़वा-कड़वा, एक अजीब-सी झाँस। दो कश खींचकर वह और नहीं पी सका था; लेकिन अपने हिस्से के बाक़ी चार चुरुट वह फेंक भी नहीं पाया था, नेड़ा के जीजा से मिले एक ख़ाली चुरुट के बक्से में वह चारों उसने उस उजाड़ भिटा के जंगल में टूटी दीवार के सुराख में छिपा रखे थे।
पहला चुरुट पीने वाले दिन, चुरुट पीना ख़त्म हो जाने पर डर के मारे उसका दिल बैठा जा रहा था, कि कहीं मुँह की गंध से माँ को पता न चल जाए। ढेरों पके बेर खाकर, अपनी ही साँस को हथेली पर लेकर कई बार जाँचने के बाद ही उस दिन उसने दोबारा मनुष्य-समाज में प्रवेश किया था। आज तो माल-असबाब सहित रंगे हाथों पकड़े ही जाते!
लेकिन दीदी को दीवार के उस पार जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। इसी तरफ़ काम निपट गया।
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