अपु ने यह बात अभी तक किसी को नहीं बताई थी—अपनी दीदी को भी नहीं।
उस दिन भरी दुपहरी में, जब उसने छिपकर अपने बाबा का वह किताबों से लदा लकड़ी का संदूक खोला था, उसी संदूक की एक किताब में उसे इस अद्भुत बात का पता चला था!
आँगन में बाँसों के झुरमुट की परछाई अभी पूरब-पश्चिम में लंबी नहीं हुई थी; ठीक दोपहर में, जैसे सोनाडांगा के उस विशाल मैदान के प्राचीन पीपल के पेड़ की छाया एक ही जगह सिमटकर रह जाती है, वैसे ही एक जगह परछाइयों का एक ढेर जमा था।
एक दिन दोपहर में, बाबा की गैरहाजिरी में, उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और छिपकर किताबों का संदूक खोला। बड़ी अधीरता और उत्सुकता से वह यह किताब और वह किताब खोलकर थोड़ी-थोड़ी तस्वीरें देखने लगा और यह टटोलने लगा कि किस किताब में कोई अच्छी कहानी लिखी है। एक किताब का जिल्द खोलकर देखा तो नाम लिखा था—‘सर्व-दर्शन-संग्रह’। इसका क्या अर्थ है, यह किताब किस विषय पर है, इसका उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा न हुआ। किताब खोलते ही कागज़ खाने वाले कीड़ों का एक झुंड चुपचाप, बदरंग हो चुके संगमरमरी कागज़ के नीचे से निकलकर बेतहाशा जिधर आँखें गईं, सरपट दौड़ पड़ा। अपु ने किताब नाक के पास ले जाकर सूँघी—कैसी पुरानी-पुरानी गंध! मटमैले रंग के मोटे-मोटे पन्नों की यह महक उसे बहुत अच्छी लगती है—इस गंध से बस बाबा की ही याद चली आती थी। जब भी वह यह गंध पाता, न जाने क्यों उसे अपने बाबा की याद आ जाती।
अत्यंत पुरानी, संगमरमरी कागज़ से मढ़ी जिल्द कई जगहों से उखड़ गई थी। इन्हीं पुरानी किताबों पर उसका सबसे ज़्यादा मोह था। इसलिए उसने वह किताब तकिये के नीचे छिपा ली और बाकी किताबें वापस रखकर संदूक बंद कर दिया।
छिप-छिपकर पढ़ते-पढ़ते इसी किताब में एक दिन उसने वह बड़ी अद्भुत बात पढ़ी! अचानक सुनने पर कोई भी चकित रह जाए, पर छपे हुए अक्षरों में उस किताब के भीतर यह बात लिखी थी, उसने खुद पढ़कर देखा। पारे के गुण का वर्णन करते-करते लेखक ने लिखा था कि गिद्ध के अंडे के भीतर पारा भरकर कुछ दिन धूप में रखना होता है, फिर उस अंडे को मुँह में रखकर मनुष्य चाहे तो आकाश-मार्ग में विचरण करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
अपु को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने फिर पढ़ा—और फिर पढ़ा।
बाद में अपनी टूटी डाल वाली पेटी में किताब छिपाकर वह बाहर निकला और उस बात के बारे में सोचते-सोचते हैरान रह गया।
दीदी से पूछता—‘गिद्ध घोंसला कहाँ बनाते हैं, जानती है दीदी?’
उसकी दीदी बता न सकी। उसने मुहल्ले के लड़कों—सत्तू, नीलू, कीनू, पटल, नेड़ा—सबसे पूछा। कोई कहता यहाँ नहीं, उत्तर वाले मैदान में ऊँचे पेड़ की चोटी पर। उसकी माँ डाँटती—‘इस भरी दुपहरी में कहाँ घूमता फिरता है!’ अपु कमरे में घुसकर सोने का बहाना करता, किताब खोलकर उस हिस्से को फिर से पढ़ता—आश्चर्य! उड़ने का इतना आसान उपाय किसी को पता नहीं? शायद यह किताब और किसी के घर में नहीं है, सिर्फ़ उसके बाबा के पास ही है; शायद यह हिस्सा और किसी ने पढ़कर नहीं देखा, इतने दिनों बाद बस उसी की नज़र पड़ी है।
किताब में मुँह गड़ाकर वह फिर से गंध लेता—वही पुरानी-पुरानी महक! इस किताब में जो लिखा है, उसकी सच्चाई पर उसे अब कोई अविश्वास नहीं रहा।
पारे की चिंता नहीं—पारा मतलब पारा, यह वह जानता है। आईने के पीछे पारा लगा होता है, घर में एक टूटा हुआ आईना है, उसका जुगाड़ वह अभी कर लेगा। लेकिन गिद्ध का अंडा अब वह कहाँ पाए?
दोपहर में खाने-पीने के बाद किसी-किसी दिन उसकी दीदी बुलाती—‘आ तो अपु, एक मज़ा देखेगा, आ।’ फिर वह एक मुट्ठी जूठे चावल लेकर घर के पिछवाड़े वाले दरवाज़े के पास बाँस के बगीचे में जाकर आवाज़ लगाती—‘आ जा भूलू-तू-ऊ-ऊ-ऊ।’ आवाज़ देकर दुर्गा हँसते हुए चेहरे से भाई की ओर चुपचाप देखती रहती, मानो अभी उनकी आँखों के सामने किसी अपूर्व रहस्यलोक का द्वार खुलने वाला हो! अचानक न जाने कहाँ से कुत्ता आ पहुँचता तो दुर्गा हाथ उठाकर कह उठती—‘वो आ गया! देखा कहाँ से आया?’—खुशी से वह खिल-खिलकर हँस पड़ती।
रोज़-रोज़ इस कुत्ते को भात खिलाने में दुर्गा को बड़ा आनंद आता।—तुम आवाज़ दो, आस-पास कोई नहीं, चारों तरफ़ सन्नाटा! चावल ज़मीन पर रखकर दुर्गा आँखें मूँद लेती; आशा और कौतूहल की व्याकुलता से छाती धक्-धक् करती; मन-ही-मन सोचती—आज भूलू नहीं आएगा शायद, देखूँ तो ज़रा कहाँ से आता है! आज क्या सुन पाया होगा!
अचानक घनी झाड़ी में एक आहट होती!
पलक झपकते ही, जंगल की लताओं-पत्तियों को चीरता-फाड़ता, हाँफता हुआ भूलू न जाने कहाँ से तारे की गति से आ हाज़िर होता।
बस, दुर्गा के पूरे बदन में जैसे एक लहर-सी दौड़ जाती। विस्मय और कौतुक से उसका मुँह-आँखें चमक उठतीं! मन-ही-मन सोचती—सुन तो लेता है ठीक, पर आता कहाँ से है! अच्छा, कल ज़रा और धीरे-से बुलाकर देखूँगी, तब भी सुन पाएगा?
इसी आनंद को भोगने के लिए वह माँ की डाँट सहकर भी रोज़ खाते समय खुद चाहे थोड़ा कम खाए, पर कुत्ते के लिए अपनी थाली में कुछ चावल बचाकर ज़रूर रखती।
लेकिन अपु को दीदी के कुत्ता बुलाने में क्या मज़ा है, यह समझ नहीं आता था। दीदी के उन लड़कियों वाले मामलों से उसका कोई वास्ता न था। वह बड़ी अधीरता से भोजन में जुटे उस दुबले-पतले कुत्ते की ओर देखता भी नहीं, बस गिद्ध के अंडे के बारे में सोचता रहता।
आख़िरकार सुराग मिला। हीरू नाई के कटहल के पेड़ के नीचे ग्वाले अपनी गायें बाँधकर गृहस्थों के घर तेल-तमाखू माँगने जाते हैं। अपु ने जाकर उनके मुहल्ले के ग्वाले से कहा—‘तुम लोग कितने खेतों-मैदानों में घूमते हो, गिद्ध का घोंसला देखते हो कहीं? मुझे अगर एक गिद्ध का अंडा लाकर दो तो मैं तुम्हें दो पैसे दूँगा।’
चार दिन बाद ही ग्वाले ने उनके घर के सामने आकर उसे पुकारा और कमर की थैली से दो काले रंग के छोटे-छोटे अंडे निकालकर कहा—‘ये देखो ठाकुर, ले आया।’ अपु ने जल्दी से हाथ बढ़ाकर कहा—‘देखूँ।’ फिर आनंद से उन्हें उलटते-पुलटते हुए बोला—‘गिद्ध के अंडे! पक्का तो?’ ग्वाले ने इस संबंध में ढेरों सबूत पेश किए। यह गिद्ध का अंडा है या नहीं, इस बारे में संदेह का कोई कारण ही नहीं है, उसने अपनी जान जोखिम में डालकर न जाने कहाँ के किसी ऊँचे पेड़ की चोटी से इन्हें बटोरा है, लेकिन दो आने से कम में नहीं देगा।
मेहनताना सुनकर अपु की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। बोला, ‘दो पैसे दूँगा, और मेरी कौड़ियाँ लेगा? सारी दे दूँगा, एक टिन की पुड़िया भर कौड़ियाँ—सब। ये इतनी बड़ी-बड़ी सोने जैसी—देखेगा, दिखाऊँ?’
ग्वाला सांसारिक मामलों में अपु से कहीं ज़्यादा होशियार जान पड़ा। वह नकद पैसों के सिवा किसी और चीज़ पर राज़ी न हुआ। बहुत मोल-भाव के बाद बात चार पैसे पर आकर ठहरी। अपु ने दीदी से माँग-जाँचकर दो पैसे जुटाए और उसे चुकाकर दोनों अंडे ले लिए। उसके अलावा ग्वाले ने कुछ कौड़ियाँ भी लीं। ये कौड़ियाँ अपु की जान थीं, किसी और समय वह आधे राजपाट और राजकुमारी के बदले में भी इन कौड़ियों को हाथ से न जाने देता; लेकिन आकाश में उड़ने के आनंद के आगे भला बैंगन-बीज का खेल क्या चीज़!
अंडा हाथ में लेकर उसका मन फूँक मारे हुए रबर के गुब्बारे की तरह हल्का होकर फूल उठा। साथ-ही-साथ जैसे एक संदेह की छाया भी उसके मन में आ पहुँची, जो इतनी देर तक नहीं थी; अंडा हाथ में आने के बाद से ही जैसे कहीं से वह बहुत धुँधली-सी दिखाई देने लगी थी। शाम होने से पहले, अकेले ही नेड़ा के घर के जामुन के पेड़ के कटे ठूँठ पर बैठकर वह सोचने लगा, सचमुच उड़ा जा सकेगा तो! वह उड़कर कहाँ जाएगा? मामा के गाँव? जहाँ बाबा हैं, वहाँ? नदी के उस पार? शालिख और मैना की तरह उस आसमान में जहाँ वह तारा उगा है, वहाँ?
उसी दिन, या उसके अगले दिन। शाम से कुछ पहले दुर्गा दीये की बत्ती के लिए फटा-पुराना कपड़ा ढूँढ़ रही थी। ताक पर रखे हाँड़ी-कलशों के बगल में ठूँसे हुए, बत्ती बनाने वाले फटे-पुराने कपड़ों के ढेर को टटोलते-टटोलते, कि तभी कोई चीज़ ‘ठक’ से उसके पीछे से लुढ़ककर ज़मीन पर जा गिरी। कमरे के भीतर अँधेरा था, ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। दुर्गा ने ज़मीन से उठाकर बाहर आकर कहा—‘ओ माँ, ये किसके दो बड़े-बड़े अंडे यहाँ! ऐ, गिरकर एकदम चूर-चूर हो गए हैं—देखा है माँ, किस चिड़िया ने घर के अंदर अंडे दे दिए!’
उसके बाद जो हुआ, उसकी बात न ही उठाएँ तो अच्छा है। उस रात अपु ने खाना नहीं खाया... रोना-धोना... एक हंगामा खड़ा हो गया। उसकी माँ घाट पर कहानी सुनाती—‘लड़के का जो हाल है, ओ माँ, ऐसी बात तो मैंने कभी नहीं सुनी—सुना है तुमने सेजठाकुरझी, कि गिद्ध के अंडे से आदमी उड़ सकता है—वो जो उनके घर का ग्वाला छोकरा है, बदमाशों का सरगना। उसे न जाने क्या कह दिया, वो कहीं से दो कौवे के या किसके अंडे लाकर बोला—ये लो गिद्ध के अंडे। और इसने उससे चार पैसे देकर खरीदे भी हैं। लड़का जो मेरा भोला है, सो तुमसे क्या कहूँ सेजठाकुरझी—क्या करूँ मैं इस लड़के को लेकर!’
लेकिन बेचारी सर्वजया कैसे जाने, सबने तो ‘सर्व-दर्शन-संग्रह’ नहीं पढ़ा है, और न ही सब लोग पारे के गुण जानते हैं।
वरना आसमान में तो हर कोई उड़ रहा होता।
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