इस बार घर से जाते समय हरिहर अपने बेटे को साथ ले चला। बोला, घर पर तो उसे कुछ खाने को मिलता नहीं, बाहर निकलेगा तो ज़रा दूध-घी पाएगा—अब उसकी सेहत सुधरेगी।
अपु ने जन्म से लेकर आज तक कहीं क़दम नहीं रखा था। इसी गाँव का बकुलतला, गोसाईंबाग़ान, चालतेतला, नदी का किनारा, और ज़्यादा-से-ज़्यादा नवाबगंज जाने वाली पक्की सड़क—बस यहीं तक थी उसकी दौड़। कभी-कभी वैशाख या जेठ की भारी गरमी में उसकी माँ शाम को नदी के घाट पर जाकर खड़ी हो जाती। नदी के उस पार, घास के मैदान में बबूल के पेड़ों पर पीले-पीले फूल खिले रहते, गायें चरतीं, मोटी गुलंच-लता से लिपटा सेमल का पेड़ देखकर लगता, मानो कितने ही युगों का पुराना हो। चरवाहे नदी किनारे गायों को पानी पिलाने आते, उनके गाँव का अक्रूर माझी अपनी छोटी-सी डोंगी खेता हुआ मछली पकड़ने के लिए दोय़ाड़ी लगाने जाता, मैदान के बीच-बीच में अमलतास के फूलों के गुच्छे शाम की झिरझिरी हवा में झूमते रहते—ठीक उसी समय, अचानक किसी-किसी दिन, उस पार की हरी-भरी ज़मीन के आख़िर में जहाँ नीला आकाश दूर के गाँव की हरी-भरी वन-रेखा पर आकर झुक गया है, उधर देखते ही उसका मन न जाने कैसा हो जाता—वह सब खोलकर समझाना उसे नहीं आता था। बस, उसकी दीदी के घाट से उठते ही वह कहता—दीदी-दीदी, देख-देख उधर—फिर वह मैदान के छोर की तरफ़ उँगली दिखाकर कहता—वो जो? उस पेड़ के पीछे? कितना दूर है, न?
दुर्गा हँसकर कहती—बहुत दूर—वही दिखा रहा था? धत्, तू भी पागल है एक!
आज उसी अपु ने पहली बार गाँव के बाहर क़दम रखा। कई दिन पहले से ही उत्साह के मारे रातों को उसकी नींद हराम हो गई थी, दिन गिनते-गिनते आख़िर जाने का दिन आ ही गया।
उनके गाँव का रास्ता मुड़कर, नवाबगंज की सड़क को दाहिनी ओर छोड़, मैदान के बाहर आषाढ़ू-दुर्गापुर की कच्ची सड़क से जा मिला। दुर्गापुर की सड़क पर चढ़ते ही उसने पिता से पूछा—बाबा, जिस रास्ते से रेल जाती है, वो रेल की सड़क किस तरफ़ है?
उसके पिता ने कहा—सामने ही पड़ेगी अभी, चलो तो। हम रेल-लाइन पार करके ही जाएँगे—
उस बार उनकी राँगी गाय का बछड़ा खो गया था। कई जगह ढूँढ़ने पर भी दो-तीन दिन तक कहीं नहीं मिला। वह अपनी दीदी के संग दक्खिन के मैदान में बछड़ा खोजने आया था। पौष का महीना था, खेतों में मटर की फलियों में दाने बँध गए थे, वह और उसकी दीदी झुक-झुककर खेतों से मटर की फलियाँ तोड़कर खा रहे थे—उनके सामने कुछ दूर पर नवाबगंज की पक्की सड़क थी, गुड़ से लदी बैलगाड़ियों की क़तारें रास्ते पर कें-कें करती हुई आषाढ़ू के हाट जा रही थीं।
उसकी दीदी पक्की सड़क के उस पार, बहुत दूर धुँधले मैदान की ओर एकटक न जाने क्या देख रही थी, कि अचानक बोल उठी—एक काम करेगा अपु, चल हम लोग रेल की सड़क देखकर आते हैं, चलेगा?
अपु ने विस्मय-भरे स्वर में दीदी के मुँह की ओर ताककर कहा—रेल की सड़क—वो तो बहुत दूर है! वहाँ कैसे जाएगी?
उसकी दीदी बोली—ज़्यादा दूर है क्या! किसने कहा तुझसे—उस पक्की सड़क के उस पार ही तो है—नहीं?
अपु बोला—पास होती तो दिखती न? पक्की सड़क से दिखती है क्या—चल तो दीदी, चलकर देखते हैं।
दोनों ने बहुत देर तक नवाबगंज की सड़क पर चढ़कर दूर तक देखा। उसकी दीदी बोली—बहुत ज़्यादा दूर है, न? नहीं जा पाएँगे—
—कुछ तो दिखता नहीं—इतनी दूर गए तो लौटेंगे कैसे? उसकी अतृप्त दृष्टि लेकिन दूर की ओर ही बँधी थी, मन में लोभ भी था, डर भी था। अचानक उसकी दीदी ने जैसे ठान ही लिया—चल, जाकर देख ही आते हैं अपु, और कितनी दूर होगी? दोपहर से पहले लौट आएँगे। माँ से कह देंगे कि बछड़ा खोजने में देर हो गई—
पहले उन्होंने ज़रा इधर-उधर देखा कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा। फिर पक्की सड़क से उतरकर, भरी दोपहरी में भाई-बहन खेत, बिल, और दलदल लाँघते हुए सीधे दक्खिन की ओर भागे। दौड़, दौड़, दौड़—नवाबगंज की लाल सड़क धीरे-धीरे बहुत पीछे छूट गई—रोयार का मैदान, जलसत्रतला, ठाकुर-झी तालाब बाईं ओर, और दाहिनी ओर दूर-दूर पड़े रह गए—सामने एक छोटा-सा बिल नज़र आने लगा। उसकी दीदी हँसकर उसकी ओर देखते हुए बोली—माँ को पता चला न, तो पीठ की खाल उधेड़ देगी। अपु एक बार हँसा—जैसे सब कुछ दाँव पर लगा दिया हो। फिर दौड़, दौड़, दौड़—जीवन में इस पहली बाधाहीन, सीमाहीन मुक्ति के उल्लास में उनका ताज़ा, तरुण रक्त तब मतवाला हो उठा था—आगे क्या होगा, यह सोचने की फ़ुरसत कहाँ थी?
पर बाद में जो हुआ, वह सुविधाजनक नहीं था। थोड़ी दूर जाकर सामने एक बड़ा-सा दलदल आ गया—होगला और सोला के पौधों से भरा, ऊपर से उसकी दीदी रास्ता भी भूल गई—कोई गाँव भी नज़र नहीं आता—सामने बस धान के खेत, दलदल और बेंत की झाड़ियाँ। घने बेंत-वन के भीतर से जाया नहीं जा सकता, कीचड़-पानी में पाँव धँस जाते, धूप इतनी तेज़ हो गई कि जाड़े में भी उनके बदन से पसीना बहने लगा—काँटों से दीदी के कपड़े जगह-जगह फट गए, अपु को भी दो-तीन बार अपने पाँव से खींच-खींचकर काँटे निकालने पड़े—आख़िर में रेल-सड़क तो दूर, घर लौटना ही मुश्किल हो गया। बहुत दूर आ गए थे, पक्की सड़क भी अब नहीं दिखती थी, पानी लाँघकर और धान के खेत पार कर जब वे बड़ी मुश्किल से दोबारा पक्की सड़क पर पहुँचे, तब दोपहर ढल चुकी थी। घर आकर उसकी दीदी ने टोकरियों-भर झूठ बोलकर तब जाकर अपनी और उसकी पीठ बचाई।
वही रेल की सड़क आज यूँ ही सहज भाव से सामने आ जाएगी—उसके लिए भागना नहीं पड़ेगा, रास्ता नहीं भूलना होगा, डाँट नहीं खानी पड़ेगी!
कुछ दूर जाकर उसने विस्मय से देखा कि नवाबगंज की पक्की सड़क जैसी ही एक ऊँची सड़क मैदान को बीच से चीरती हुई दाएँ-बाएँ बहुत दूर तक चली गई है। लाल-लाल गिट्टियों का ढेर ऊँचा होकर किनारे-किनारे सजा है। सफ़ेद-सफ़ेद लोहे के खंभों पर जैसे एक साथ कई डोरियों का तनाव बँधा हो—जहाँ तक नज़र जाती है, वही सफ़ेद खंभे और डोरियों का तनाव दिखाई दे रहा है—
उसके पिता ने कहा—देखो बेटा, यही है रेल की सड़क—
अपु एक दौड़ में फाटक पार कर सड़क के ऊपर आ चढ़ा। फिर वह रेलपथ के दोनों ओर विस्मय-भरी आँखों से देखने लगा। दो लोहे की पटरियाँ सीधी-सीधी क्यों बिछी हैं? इनके ऊपर से रेलगाड़ी जाती है? क्यों? ज़मीन पर से न जाकर लोहे पर से क्यों जाती है? फिसलकर गिर नहीं जाती? क्यों? इनको तार कहते हैं? उनमें सों-सों की कैसी आवाज़ है? तार में ख़बर जा रही है? कौन ख़बर दे रहा है? कैसे ख़बर देते हैं? उधर क्या स्टेशन है? इधर क्या स्टेशन है?
उसने कहा—बाबा, रेलगाड़ी कब आएगी? मैं रेलगाड़ी देखूँगा बाबा।
रेलगाड़ी अभी कैसे देखोगे?....वो तो दोपहर के समय आएगी, अभी भी दो घंटे की देर है।
—तो क्या हुआ बाबा, मैं देखकर ही जाऊँगा, मैंने कभी नहीं देखी—हाँ बाबा—
—ऐसी ज़िद मत करो, इसीलिए तो तुम्हें कहीं लाना नहीं चाहता—अभी कैसे देखोगे? उस दोपहर एक बजे तक यहीं बैठे रहना होगा, इस कड़ी धूप में, चलो आते वक़्त दिखा दूँगा।
अपु को आख़िरकार आँखों में आँसू भरे अपने पिता के पीछे-पीछे आगे बढ़ना पड़ा।
तुम चले जा रहे हो... तुम्हें कुछ नहीं पता, राह के किनारे तुम्हारी आँखों में क्या पड़ सकता है, तुम्हारी बड़ी-बड़ी भोली आँखें विश्व-भक्षी भूख से चारों ओर को निगलती हुई चल रही हैं—अपने आनंद के इस हिसाब से तुम भी एक देश-अन्वेषक हो। अनजाने के आनंद को पाने के लिए दुनिया घूमनी पड़े, इसका कोई मतलब नहीं। मैं जहाँ और कभी नहीं गया, आज नया क़दम रखा, जिस नदी के जल में नया स्नान किया, जिस गाँव की हवा ने शरीर को ठंडक पहुँचाई, मेरे पहले वहाँ कोई आया था या नहीं, उससे मेरा क्या लेना-देना? मेरी अनुभूति में तो वह एक अनखोजा देश है। मैंने ही आज पहली बार अपने मन, बुद्धि, हृदय से उसकी नवीनता का आस्वादन किया है!
आमडोब! छोटे-छोटे किसानों का गाँव—कैसा नाम है! औरतें आँगन में पुआल काट रही हैं, बकरी बाँध रही हैं, मुर्गियों को भात खिला रही हैं, बड़े लोग पाट सुखा रहे हैं, बाँस काट रहे हैं—देखते-देखते गाँव पीछे छूट गया और एकदम बाहर का मैदान... बिल में जल लबालब भरा है... उड़ि-धान के खेत में बगुले बैठे हैं... नरकुल के पत्तों और खिले हुए फूलों से पानी तक नहीं दिखता।
खलसेमारी के बिल के किनारे घने हरे आउश-धान के खेतों के ऊपर बारिश से धुले भादों के आकाश का नीला विस्तार। सारे क्षितिज पर फैले सूर्यास्त की अपूर्व छटा, तरह-तरह के रंगों के मेघों के पहाड़, मेघों के द्वीप, मेघों के समुद्र, मेघों के स्वप्न-लोक... खुले आकाश से ऐसा परिचय उसका अब तक नहीं हुआ था, मैदान के पार का दूर देश अब उस आठ साल के लड़के के सामने अपना रहस्य-अवगुंठन खोल रहा था।
चलते-चलते बड़ी देर हो गई। उसके पिता ने कहा—तुम बड़े मुँह बाए देखने वाले लड़के हो, जो देखते हो उसी पर मुँह बाए क्यों खड़े रह जाते हो? ज़ोर से चलो।
संध्या के बाद वे गंतव्य स्थान पर पहुँचे। शिष्य का नाम लक्खण महाजन था, बड़ा किसान और खाते-पीते घर का गृहस्थ। बाहर की बड़ी अटचाला में बड़े आदर के साथ उनके रहने का प्रबंध कर दिया।
लक्खण महाजन के छोटे भाई की पत्नी सुबह नहाने के लिए तालाब के घाट पर आई है—पानी में उतरने जा ही रही थी कि तालाब के किनारे नज़र पड़ने पर उसने देखा कि मेंड़ के पास केले के बाग़ में एक अनजाना छोटा लड़का, हाथ में एक पतली टहनी लिए, केले के बाग़ में कभी इधर तो कभी उधर टहल रहा है और पागलों की तरह अपने-आप में बड़बड़ा रहा है। उसने गरदन झुकाकर पास आकर पूछा—तुम किसके घर आए हो, बेटा?
अपु की सारी हेकड़ी बस अपनी माँ के पास ही चलती थी। बाहर वह बेहद मुँहचोर था।
पहले तो अपु के मन में आया कि एक ही झपट्टे में दौड़ लगा दे। फिर सकुचाते हुए बोला—उनके घर—
वधू बोली—बड़ठाकुर के घर? बड़ठाकुर के गुरु महाशय के बेटे हो? ओ!
वधू उसे अपने साथ अपने घर ले गई। उनका घर अलग था—लक्खण महाजन के घर से थोड़ी ही दूर, पर बीच में तालाब पड़ता था।
वधू के व्यवहार से अपु की झिझक जाती रही। वह कमरे में घुसकर कौतूहल से घर की चीज़ें देखने लगा। ओहो, कितनी सारी चीज़ें... उनके घर में ऐसी चीज़ें नहीं हैं। ये लोग तो बहुत बड़े आदमी हैं! कौड़ियों की अल्ना, रंग-बिरंगी झूलती सीकें, ऊन की चिड़िया, काँच की गुड़िया, मिट्टी की गुड़िया, सोले का पेड़—और भी न जाने क्या-क्या!—एक-दो चीज़ें उसने डरते-डरते हाथ में उठाकर उलट-पुलटकर देखीं।
वधू ने अब तक लड़के के चेहरे को ठीक से नहीं देखा था—पास से देखकर लगा कि यह तो अभी बिलकुल बच्चा है, चेहरे का भाव जैसे पाँच साल के बच्चे-सा कच्चा हो। ऐसा सुंदर, अबोध आँखों का भाव उसने आज तक किसी और लड़के की आँखों में नहीं देखा था—ऐसा रंग, ऐसी गढ़न, ऐसा सुंदर मुख, ऐसी तूलिका से खींची हुई-सी बड़ी-बड़ी निष्पाप आँखें—अनजाने लड़के पर वधू को बड़ी ममता हो आई।
अपु बैठकर तरह-तरह की कहानियाँ सुनाने लगा—ख़ासकर कल वाली रेल-सड़क की बात।
थोड़ी देर बाद वधू ने मोहनभोग बनाकर उसे खाने को दिया। एक कटोरी में ढेर-सा मोहनभोग, इतना घी डाला हुआ कि उँगलियाँ घी से लथपथ हो जाएँ। अपु ने ज़रा-सा मुँह में डालकर खाया तो हैरान रह गया—ऐसी अपूर्व चीज़ तो उसने पहले कभी नहीं खाई थी—मोहनभोग में किशमिश क्यों डाली है? उसकी माँ के बनाए मोहनभोग में तो किशमिश नहीं होती? घर पर वह माँ से ज़िद करता—माँ, आज मुझे मोहनभोग बनाकर देना ही होगा!
उसकी माँ हँसकर कहती—अच्छा, दोपहर बाद बना दूँगी—फिर वह सिर्फ़ सूजी को पानी में उबालकर, थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर पुलटिस-जैसा एक पदार्थ तैयार करती और काँसे की सरपुरिया थाली में बड़े प्यार से बेटे को खाने को देती। अपु अब तक वही खुशी-खुशी खाता आया था, मोहनभोग ऐसा भी होता है, यह वह नहीं जानता था। आज लेकिन उसे लगा कि इस मोहनभोग और माँ के बनाए मोहनभोग में आकाश-पाताल का फ़र्क है!... साथ-ही-साथ माँ के लिए करुणा और सहानुभूति से उसका मन भर आया।
शायद उसकी माँ भी नहीं जानती कि इस तरह का मोहनभोग भी होता है!—वह जैसे धुँधले-से रूप में समझ गया कि उसकी माँ ग़रीब है, वे लोग ग़रीब हैं—इसीलिए उनके घर में अच्छा खान-पान नहीं होता।
एक दिन पड़ोस के एक ब्राह्मण परिवार से अपु का न्योता आया। दोपहर में उस घर की एक लड़की आकर अपु को बुला ले गई। उनके रसोईघर के बरामदे में जतन से पीढ़ा बिछाकर और पानी छिड़ककर अपु के लिए खाने की जगह बनाई गई। जो लड़की अपु को बुलाने आई थी, उसका नाम था अमला, ख़ूब गोरा-चिट्टा रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, सुंदर-सा मुखड़ा, उम्र उसकी दीदी जितनी। अमला की माँ ने पास बैठकर उसे खिलाया, अपने हाथ की बनी चंद्रपुलि उसकी पत्तल में दी। खाने के बाद अमला उसे साथ लेकर घर तक पहुँचा गई। उस दिन शाम को खेलते-खेलते अपु के पैर की उँगली अचानक बाग़ की बाड़ के दो बाँसों के बीच फँसकर अटक गई। ताज़े चीरे हुए नए बाँस की बाड़ थी, उँगली कटकर लहुलुहान हो गई, अमला ने दौड़कर आकर अगर पाँव को बाँस की फँक से बाहर न निकाला होता, तो पूरी उँगली ही कट जाती। वह चल नहीं पा रहा था, अमला ने उसे गोद में उठाकर गोला-घर के पास से पत्थरकुची के पत्ते तोड़कर और पीसकर उँगली पर बाँध दिए। कहीं पिता की डाँट न खानी पड़े, इस डर से अपु ने यह बात किसी से नहीं कही।
उस रात सोकर अपु सिर्फ़ अमला के ही सपने देखता रहा। वह अमला की गोद में घूम रहा है, अमला के पास बैठा है, अमला के साथ खेल रहा है, अमला उसकी उँगली पर पट्टी बाँध रही है, वह और अमला रेल-सड़क पर दौड़-भाग रहे हैं—अमला का हँसी-भरा चेहरा नींद के आलम में सारी रात उसके आस-पास ही रहा।
वह घूम-घूमकर बस यही खोजता रहा कि अमला कब आएगी। उसके भी सारे संगी-साथी आ गए, खेल शुरू हो गया, धीरे-धीरे अच्छी-खासी धूप चढ़ आई—लेकिन अमला का कहीं पता न था। घर के भीतर से वधू ने उसे खाने के लिए बुलवा भेजा—वह रोज़ सुबह-शाम अपने हाथों से नाश्ता बनाकर उसे खिलाती थी—खाकर लौटते समय उसने वधू से पूछा—क्या अमला दीदी सुबह आई थीं? नहीं, वह नहीं आई थी। धीरे-धीरे और भी बेला चढ़ने पर खेल खत्म हो गया। उसके पिता ने उसे नहाने के लिए पुकारा।
फिर भी, अमला कहाँ है? अभिमान से उसका मन उफन उठा, अच्छा है, न आए तो न सही! अमला से उसकी जन्म-जन्म की कट्टी—अब अगर वह कभी उससे बात भी करे!
शाम को भी खेल शुरू हुआ, और सब आए—अमला नहीं आई। पाँच-छह लड़के-लड़कियाँ खेलने तो आए थे, पर अप्पू को लगा, वह खेलेगा किसके साथ?
कोई भी उसे अपने लायक़ खेल का साथी नहीं लगा! बुझे मन से वह कुछ देर तक खेलता रहा, फिर भी अमला का कोई अता-पता नहीं।
अगले दिन सुबह अमला आई। अप्पू ने कोई बात नहीं की। अमला जहाँ बैठती, वह उसकी चारदीवारी के पास भी नहीं फटकता, पर बीच-बीच में तिरछी नज़रों से देख लेता कि अमला यह समझ भी पाई है या नहीं कि वह गुस्से में ऐसा कर रहा है। अमला सचमुच पहले तो समझ नहीं पाई थी, बाद में जब उसे लगा कि कुछ-न-कुछ तो हुआ ज़रूर है, तब वह पास जाकर पूछने लगी, क्या हुआ रे खोका, बात क्यों नहीं कर रहा?... क्या हुआ है?
अप्पू इतना-सब नहीं समझता था, उसने अभिमान में होंठ फुलाकर कहा—क्या हुआ, है न! भला कुछ हुआ थोड़े है? कल आई क्यों नहीं?
अमला हैरान होकर बोली—नहीं आई, तो क्या हुआ?—इसीलिए गुस्सा हो गए? अप्पू ने गरदन हिलाकर बताया, ठीक यही बात है। अमला खिलखिलाकर हँस पड़ी और अप्पू का हाथ पकड़कर उसे घर के भीतर ले चली। वहाँ वधू सारी बात सुनकर पहले तो हँसते-हँसते लोटपोट हो गई, फिर होंठों में हँसी दबाकर बोली—तो अमला, अब तो तुम्हारा घर जाना नहीं हो सकता, देख रही हो—और करोगी भी क्या, जब खोका तुम्हें छोड़ ही नहीं सकता, तो यहीं रह जाओ—और कोई चारा नहीं।
वधू की बात के अंदाज़ से अमला न जाने क्या समझ गई और लजाकर विरोध के स्वर में बोली—अच्छा, जाओ तो भाभी—ऐसे करोगी तो मैं फिर कभी तुम्हारे घर—
कुछ देर बाद अप्पू अमला के साथ उसके घर गया। अमला ने अपनी आलमारी खोलकर काँच की बड़ी मेम-गुड़िया, मोम की चिड़िया, पेड़, और न जाने क्या-क्या दिखाया। वे सब कालीगंज के स्नान-यात्रा के मेले से खरीदे गए थे, यह अप्पू ने पूछकर जान लिया।
नए-नए खिलौने—एक रबर का बंदर, तुम जिस तरफ़ भी जाओ, वह तुम्हारी ओर देखकर पलकें झपकाएगा—एक और गुड़िया, जिसका पेट दबाने पर वह मिर्गी के मरीज़ की तरह अचानक हाथ-पैर पटककर खँजड़ी बजाने लगती—और सबसे हैरतअंगेज़ चीज़ थी एक टिन का घोड़ा; रानू दीदी के काका जैसे उनके घर के दालान की घड़ी में चाबी भरते हैं, वैसे ही इसमें चाबी भरकर छोड़ देने पर वह खड़-खड़ करता हुआ फ़र्श पर चलने लगता था—बहुत दूर तक जाता था—ठीक जैसे कोई बिलकुल असली घोड़ा हो।
उसे देखकर अप्पू दंग रह गया। हाथ में उठाकर हैरत से उलट-पलटकर देखता हुआ वह अमला की ओर मुड़कर बोला—यह कैसा घोड़ा है, वाह! बड़ा अनोखा है! यह कहाँ से खरीदा, इसका दाम कितना है?
उसके बाद अमला ने उसे सिंदूर की एक डिबिया खोलकर दिखाई—उसके अंदर लाल रंग की एक छोटी-सी राँग की पत्ती जैसी कोई चीज़ थी। अप्पू ने पूछा—यह क्या है? राँग? अमला हँसकर बोली—राँग क्यों होगा?—सोने का पत्तर नहीं देखा अप्पू? अप्पू ने सोने का पत्तर नहीं देखा था।
क्या सोने का रंग इतना लाल होता है? वह सोने के पत्तर को हिला-डुलाकर अच्छी तरह देखने लगा। अमला के साथ घर लौटते-लौटते वह सोच रहा था—आह, दीदी के पास इनमें से एक भी खिलौना नहीं है—बेचारी सूखे नाटाफल और रेंड़ के बीज बटोरती फिरती है, और बस दूसरों की गुड़िया चुराकर मार खाती है!... उसकी दीदी की उम्र की किसी दूसरी लड़की के पास खिलौनों का इतना बड़ा खज़ाना हो सकता है, यह उसने आज तक कभी नहीं देखा था, आज तुलना करने का मौका पाकर दीदी के लिए बेइंतहा करुणा से उसका मन जैसे पिघल गया। अगर उसके पास पैसे होते तो वह दीदी को एक कलवाला घोड़ा खरीद देता—और एक रबर का बंदर... तुम जिस तरफ़ भी जाओ, वह तुम्हारी ओर देखकर पलकें झपकाता है...।
वधू के पास ताश की एक पुरानी गड्डी थी; ठीक एक गड्डी भी नहीं कहा जा सकता, वह कई गड्डियों के छोड़े हुए पत्ते थे जो एक जगह जमा कर दिए गए थे—अप्पू उन्हें लेकर बीच-बीच में उलट-पुलट करता। रानू दीदी के घर कभी-कभी दोपहर में ताश की महफ़िल जमती थी, वह बैठकर खेल देखा करता था। इक्का, ग़ुलाम, साहब, बीबी—पत्ते पकड़ने को लेकर मार-पीट तक हो जाती—कितना मज़ेदार खेल! वह ताश खेलना नहीं जानता, उसकी माँ, दीदी, कोई नहीं जानता।
कभी-कभी उसकी माँ ताश खेलने जाती, पर कोई उसे अपने साथ बिठाना नहीं चाहता, सब कहते, उसे कुछ खेलना-वेलना नहीं आता; कभी-कभी उसकी माँ खेलने बैठ भी जाती, तो ऐसा भाव दिखाती जैसे वह बड़ी पक्की खिलाड़ी हो—लेकिन थोड़ी ही देर में पोल खुल जाती। कोई कहता, अरे बहू, यह क्या? यहाँ इक्का मारकर बैठ गईं! देखा नहीं, उस हाथ में रंग का ग़ुलाम कट गया?—ठीक तुम्हारी आँखों के सामने? उसकी माँ झटपट अपनी नादानी छिपाने की कोशिश करती, हँसकर कहती, हाँ तो! बड़ी भूल हो गई, ओ ठाकुरझि, बिलकुल ध्यान ही नहीं रहा। फिर वह खेलने लगती, होंठ दबाकर हँसती, इसकी-उसकी ओर देखती, ऐसा भाब दिखाती जैसे उसे सबके हाथ के पत्तों की ख़बर है, इस बार वह कुछ-न-कुछ किए बिना नहीं छोड़ेगी—लेकिन थोड़ी देर बाद ही कोई चकित होकर बोल उठता—यह क्या बहूजी, ज़रा देखूँ? हे भगवान, मेरा क्या होगा! तुम्हारे हाथ में ऐसी बिन्ती थी, और तुमने दिखाई नहीं?—उसकी माँ होंठ दबाकर हँसती और समझदार होने का भाव बनाकर कहती—है, है, उसके पीछे एक बात है!
मैंने जान-बूझकर नहीं दिखाई। असल में वह जानती ही नहीं थी कि बिन्ती किन-किन पत्तों से होती है—उसकी साथिन ग़ुस्से में कहती—उसके पीछे क्या बात है, ज़रा सुनूँ तो? इतनी अच्छी बाज़ी बिगाड़ दी? दो तुम पत्ते सेझो-बहू को, दो, तुम्हें और नहीं खेलना—बहुत हुआ। उसकी माँ अपना अपमान छिपाने के लिए फिर हँस देती—जैसे कुछ हुआ ही नहीं, सब मज़ाक है, वे लोग मज़ाक में कह रहे हैं, और वह भी इसे उसी तरह ले रही है...।
अगर उसे एक गड्डी ताश मिल जाए तो वह, माँ और दीदी खेलेंगे। खाने-पीने के बाद दोपहर में उनके घर की जंगल की तरफ़ वाली वह खिड़की... जिसके किवाड़ों को किसी कीड़े ने काटकर सरसों जैसे बुरादे में बदल दिया है... हिलाने पर झर-झर करके झड़ता है, पुरानी लकड़ी के बुरादे की गंध आती है—खिड़की के पास वाली झाड़ियों से दोपहर की हवा में गंधभेडाली लता की तीखी गंध आती, ओसारे पर कालमेघ के पौधों के जंगल में दीदी का जाना-पहचाना काँचपोका एक बार उड़ता, फिर बैठ जाता, फिर उड़ता, फिर बैठ जाता—उस सूनी दोपहरी में वे तीनों उसी खिड़की के पास चटाई बिछाकर बैठकर अपने मन से ताश खेलेंगे।
किन-किन पत्तों से बिन्ती होती है, यह उन्हें न भी पता हो तो क्या—उनके खेल में बिन्ती न भी दिखा पाएँ तो चलेगा—उसके लिए कोई किसी को उठाकर नहीं भगाएगा, कोई अपमान की बात नहीं कहेगा, कोई हँसी-मज़ाक नहीं उड़ाएगा, जो जैसा खेल पाएगा वैसा ही खेलेगा। बात तो खेलने की है—बिन्ती नहीं भी दिखा पाए तो क्या हुआ!
शाम के बाद वधू के घर अप्पू का न्योता था।
खाने बैठते ही पकवानों और इंतज़ाम का ठाट-बाट देखकर वह दंग रह गया। एक छोटी-सी फूलदार तश्तरी में अलग से नमक और नींबू क्यों? नमक-नींबू तो माँ थाली में ही दे देती है! हर सब्ज़ी के लिए अलग-अलग कटोरियाँ!—और सब्ज़ियाँ भी कितनी! इतने बड़े झींगे का सिर क्या अकेले उसी के लिए है?
लुचियाँ! लुचियाँ!
उसकी और दीदी की सपनों-भरी कामनाओं के उस पार एक परियों के देश की नीली शाम की धुँधली-सी झलक दिखती है... कितनी ही रातों में, दिनों में, ओल के डंठल की चच्चड़ि और लौकी के छेँचकि के साथ भात खाते-खाते, कितने ही नाश्ता-विहीन सुबहों-शामों में, अनमना मन अचानक ललचाई हुई उदास चाल से वहाँ दौड़ जाता है—जहाँ तपती धूप में दोपहर को उनके मुहल्ले का माहिर रसोइया बीरू राय कंधे पर गमछा डाले घूमता है, ताज़ा बने बड़े चूल्हे पर बड़ी-सी लोहे की कड़ाही में घी चढ़ा होता है, लुचियाँ तलने की अद्भुत, मन-लुभावन सुगंध आती है, कितने ही लड़के-लड़कियाँ अच्छे कपड़े पहनकर आते-जाते हैं, गांगुली-बाड़ी के बड़े नाटमन्दिर और जैतून के पेड़ के नीचे गर्मियों के दिन में शतरंज बिछाई जाती है, साल में सिर्फ़ एक दिन उस देश का पता मिलता है—चैत-बैसाख के महीने में रामनवमी या दोल के दिन—उस दिन उनका न्योता होता है उस पार गांगुली-बाड़ी में।
लेकिन आज बिलकुल अप्रत्याशित रूप से उस सुदिन का उदय कैसे हो गया! खाते-खाते उसे बार-बार लग रहा था, उसकी दीदी को ऐसा खाना कभी नहीं मिला!
अगले दिन सुबह फिर खेल शुरू हुआ। अमला के आते ही अप्पू दौड़कर गया और उसका हाथ पकड़ लिया—मैं और अमला दीदी एक तरफ़, और तुम सब एक तरफ़—
कुछ देर खेलने के बाद अप्पू को लगा कि अमला उसे अपनी टीम में लेने के बजाय बिशु को लेने के लिए ज़्यादा उत्सुक है। इसकी असली वजह अप्पू नहीं जानता था—अप्पू बिलकुल कच्चा खिलाड़ी था, उसे टीम में लेने का मतलब ही था हार—बिशु तेज़-तर्रार लड़का था, उसे दौड़कर पकड़ना या खेल में हराना आसान नहीं था। एक बार तो अमला ने साफ़-साफ़ झुँझलाहट भी ज़ाहिर की। अप्पू जी-जान से कोशिश करने लगा कि वह जीते, ताकि अमला ख़ुश हो जाए, लेकिन बहुत कोशिशों के बावजूद वह फिर हार गया।
उस बार टीम बनाते समय अमला का झुकाव बिशु की तरफ़ था।
अप्पू की आँखें भर आईं। खेल उसे अचानक बेस्वाद लगने लगा—अमला बिशु की तरफ़ मुड़कर सारी बातें कर रही थी, हँसी-ख़ुशी सब उसी के साथ थी। थोड़ी देर बाद जब बिशु किसी काम से घर जाने लगा तो अमला ने उससे बार-बार कहा कि वह फिर ज़रूर आए। अप्पू के मन में ज़बरदस्त ईर्ष्या हुई, सारी सुबह एकदम ख़ाली-ख़ाली हो गई। फिर उसने मन-ही-मन सोचा—बिशु खेल छोड़कर जा रहा है—उसके जाने से खिलाड़ी कम हो जाएँगे, इसीलिए अमला दीदी ऐसा कह रही है, मैं जाऊँगा तो मुझे भी कहेगी, उससे भी ज़्यादा कहेगी। अचानक उसने जाने का बहाना करते हुए कहा—देर हो रही है, मैं जाता हूँ, नहाऊँगा। अमला ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल लुहारों के बेटे नाड़ूगोपाल ने कहा—दोपहर बाद फिर आना भाई!
अप्पू कुछ दूर जाकर एक बार पीछे मुड़ा—उसके जाने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा था, खेल पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा था, अमला बड़े उत्साह से खंभे के पास 'बुढ़िया' बनकर खड़ी थी—उसकी तरफ़ मुड़कर देख भी नहीं रही थी।
अप्पू आहत होकर अभिमान में घर पहुँचा, किसी से कोई बात नहीं की।
बड़ी आई अमला दीदी! नहीं देखा उसकी तरफ़—तो क्या हुआ?
दो दिन बाद हरिहर लड़के को लेकर घर लौटा।
अभी कुछ ही दिन तो हुए थे, पर इतने में ही सर्वजया बेटे को देखे बिना और नहीं रह पा रही थी। दुर्गा का खेल भी कई दिनों से ठीक से नहीं जम रहा था, अप्पू के परदेस जाने से कुछ दिन पहले देसी कद्दू के सूखे खोल की नाव को लेकर झगड़ा होने से दोनों में बोलचाल बंद हो गई थी—अब और भी बहुत-से कद्दू के खोल जमा हो गए थे, लेकिन दुर्गा अब उन्हें पानी में तैराने नहीं जाती—क्यों मैंने फ़िज़ूल में इस बात पर झगड़ा करके उसका कान ऐंठ दिया? वह लौटकर तो आए, अब कभी उसके साथ झगड़ा नहीं करूँगी, सारे खिलौने वही ले ले।
घर आकर अप्पू पंद्रह दिनों तक अपनी अद्भुत यात्रा की कहानियाँ सुनाता रहा। कितने आश्चर्यजनक चीज़ें देखी थीं उसने इन कुछ दिनों में! रेल की पटरी, जहाँ से सचमुच की रेलगाड़ी जाती है! मिट्टी के शरीफ़े, पपीते, खीरे—हू-ब-हू असली फल जैसे! वह गुड़िया, जिसका पेट दबाने पर वह मिर्गी के मरीज़ की तरह हाथ-पैर पटककर अचानक खँजड़ी बजाना शुरू कर देती है! अमला दीदी! कितनी दूर गया था वह, कमल के फूलों से भरे कितने ही ताल, कितने अनजाने नए गाँव पार करके कितने ही मैदानों के ऊपर से गुज़रते सूने रास्ते से होते हुए, उस गाँव में जहाँ रास्ते के किनारे लुहार की दुकान पर बाबा उसे पानी पिलाने ले गए थे, तो उन लोगों ने उसे घर के अंदर बुलाकर बड़े जतन से पीढ़ा बिछाकर बिठाया और दूध, चिउड़ा, बताशे खाने को दिए थे! वह कौन-सी कहानी छोड़कर कौन-सी सुनाए!
रेल की पटरी की कहानी सुनकर उसकी दीदी मुग्ध हो जाती, बार-बार पूछती—कितनी बड़ी-बड़ी लोहे की सलाखें देखीं अप्पू? वे बिछी हुई थीं क्या? बहुत लंबी? रेलगाड़ी देखने को मिली? गई क्या?
नहीं—रेलगाड़ी अप्पू ने नहीं देखी थी। बस यही एक चीज़ छूट गई थी—और वह सिर्फ़ बाबा की ग़लती से। कुल चार-पाँच घंटे रेल की पटरी के पास चुपचाप बैठे रहते तो रेलगाड़ी दिख जाती—लेकिन बाबा को वह किसी भी तरह समझा नहीं पाया था।
देर हो जाने की वजह से सर्वजया हड़बड़ी में अनमने भाव से सदर दरवाज़े से घुसकर आँगन में पैर रखते ही, कोई पतली-सी डोरी-जैसी चीज़ उसकी छाती में अटकी और साथ ही कुछ 'पटाक' से टूट जाने की आवाज़ हुई और दोनों तरफ़ से दो चीज़ें ढीली होकर आँगन में गिर पड़ीं। यह सब पलक झपकते ही हो गया, कुछ भी ठीक से देखने या समझने से पहले ही।
थोड़ी ही देर बाद अप्पू घर आया। दरवाज़ा पार करके आँगन में पैर रखते ही वह ठिठककर खड़ा हो गया—उसे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हुआ—यह क्या! अरे, मेरे टेलीग्राफ का तार किसने तोड़ दिया?
क्षति की आकस्मिकता और उसकी विशालता से वह पहले तो कुछ समझ ही नहीं पाया। फिर थोड़ा संभलकर देखा तो आँगन की मिट्टी पर भीगे पैरों के निशान अभी सूखे भी नहीं थे। उसके मन के भीतर से किसी ने पुकारकर कहा—माँ के सिवा और कोई नहीं। कभी और कोई नहीं, ठीक माँ ही। घर में घुसकर उसने देखा, माँ बड़े इत्मीनान से बैठकर कटहल की गुठलियाँ धो रही है। वह अचानक रुक गया और यात्रा-दल के अभिमन्यु की तरह आगे की ओर झुककर, बाँसुरी के सप्तम सुर जैसी खनकती, तीव्र, मीठी आवाज़ में बोला—अच्छा माँ, मैं मेहनत करके वह लताएँ जंगल-बाग़ीचे से खोजकर नहीं लाया था?
सर्वजया ने पीछे मुड़कर हैरानी से पूछा—क्या लाया है? हुआ क्या है?
—मुझे क्या तकलीफ़ नहीं होती? काँटों से मेरे हाथ-पैर नहीं छिल गए क्या?
—पागलों जैसी क्या बातें कर रहा है? हुआ क्या है?
—क्या हुआ है! मैंने इतनी मेहनत से टेलीग्राफ़ का तार टाँगा और उसे तोड़ दिया गया, है न?
—तुम भी न, एक पल भी बिना ऊल-जुलूल काम किए नहीं रह सकते! रास्ते के बीच में क्या टाँग रखा था—क्या जाने टेलीग्राफ़ कि क्या-गिराफ़, मैं जल्दी में आ रही थी, टूट गया—तो अब क्या करूँ बताओ?
फिर वह दोबारा अपने काम में लग गई।
उफ़! कैसी भयानक हृदयहीनता! पहले-पहले वह सोचता था कि उसकी माँ उसे प्यार करती है। हालाँकि उसका यह भ्रम बहुत दिन पहले ही टूट चुका था—फिर भी माँ को इतनी निष्ठुर, पाषाणी के रूप में उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। कल सारा दिन कहाँ नीलमणि जेठा का खंडहर, कहाँ पालितों का बड़ा आम का बाग़, कहाँ प्रसन्न गुरुमहाशय का बाँस-वन—भयानक-भयानक जंगलों में अकेले घूमकर, बड़ी मुश्किल से ऊँची डाल से लटकती गिलोय की लताएँ कितनी मेहनत से उसने जुटाई थीं, अभी रेल-रेल का खेल होता, सब ठीक-ठाक था, और भला...
अचानक वह माँ को कोई बहुत कड़ी, बहुत रूखी, बहुत दिल को छेद देने वाली बात कहना चाहा—और थोड़ी देर खड़े रहकर, शायद कोई और बात न सूझने पर, पहले से भी तीव्र और नीचे सुर में बोला—मैं आज भात नहीं खाऊँगा, जाओ! कभी नहीं खाऊँगा—
उसकी माँ बोली—नहीं खाएगा तो न खा, जा! भात खाकर कौन-सा राजा बना देंगे तुझे? इधर तो रसोई उतारने की सब्र नहीं होती—न खा जा, देखूँगी, भूख लगने पर कौन खाने देता है?
बस! पलक झपकते ही—सब कुछ वहीं था, मैं हूँ, तुम हो—वही उसकी माँ कटहल की गुठलियाँ धो रही है—लेकिन अपू कहाँ? वह जैसे कपूर की तरह उड़ गया! केवल ठीक उसी समय दुर्गा घर में घुसते हुए दरवाज़े के पास उसे तूफ़ान की तरह तेज़ी से बाहर जाते देख हैरान होकर पुकार उठी—ओ अपू, कहाँ जा रहा है ऐसे, क्या हुआ, अपू सुन—ओ अपू सुन तो—
उसकी माँ बोली, मैं नहीं जानती, तुम्हारे ये सब उल्टे-सीधे काण्ड, हड्डी-मांस सब काले पड़ गए—क्या एक चीज़ रास्ते के बीच में टाँग रखी थी, आ रही थी, टूट गई—तो अब क्या होगा? मैंने क्या जान-बूझकर तोड़ा है? उसी पर लड़के का ग़ुस्सा—मैं भात नहीं खाऊँगा—न खा जा, भात खाकर तुम लोग कौन-सा स्वर्ग में घंटा बजा दोगे?
माँ-बेटे के इस रूठने-मनाने के खेल में दुर्गा को ही बीच-बचाव करना पड़ता है—उसने बहुत आवाज़ें लगाने के बाद दोपहर दो बजे के क़रीब भाई को ढूँढ़ निकाला। वह सूखे मुँह, उदास आँखों से उस पार के मुहल्ले में रायों के बाग़ीचे में एक गिरे हुए आम के पेड़ के तने पर बैठा हुआ था।
शाम को अगर कोई अपू के घर आकर उसे देखता तो वह कभी नहीं सोच सकता था कि यह वही अपू है—जो आज सुबह माँ से रूठकर घर-बार छोड़कर चला गया था। आँगन के इस छोर से उस छोर तक तार तना हुआ था। अपू आश्चर्य से देखे जा रहा था, कुछ भी बाक़ी नहीं था, ठीक जैसे एकदम असली रेल की पटरी का तार हो।
वह सत्तू के घर जाकर बोला—सत्तू-दा, मैंने अपने घर के आँगन में टेलीग्राफ़ का तार टाँग रखा है, चलो रेल-रेल खेलें—आओगे?
—तार किसने टाँग दिया रे?
—मैंने ख़ुद टाँगा। दीदी ने लताएँ लाकर दी थीं—
सत्तू बोला—तू खेल जा, मैं अभी नहीं आ सकता—
अपू मन-ही-मन समझ गया, बड़े लड़कों को बुलाकर दल बाँधकर खेल का जुगाड़ करना उसके बस की बात नहीं। कौन उसकी बात सुनेगा? फिर भी वह एक बार और सत्तू के पास गया। निराश मुँह से बरामदे का कोना पकड़कर निरुत्साहित भाव से बोला—चलो न सत्तू-दा, चलोगे? तुम, मैं और दीदी खेलेंगे अब? फिर उसने प्रलोभन देते हुए कहा—मैंने टिकट के लिए इतने सारे चकोतरे के पत्ते तोड़कर रखे हैं। उसने हाथ फैलाकर मात्रा दिखाई।—चलोगे?
सत्तू आना नहीं चाहा। अपू बाहर बहुत संकोची है, वह और कुछ न कहकर घर लौट गया। दुख से उसकी आँखों में आँसू आने ही वाले थे—इतना कहने पर भी सत्तू-दा ने नहीं सुना!
अगले दिन सुबह वह और उसकी दीदी, दोनों ने मिलकर ईंटों से एक बड़ी दुकान बनाई और सामान जुटाने निकल पड़े। दुर्गा को जंगल-झाड़ में उगने वाली चीज़ों की ज़्यादा जानकारी थी—दोनों ने मिलकर नोना के पत्तों का पान, जंगली आलू, फल वाला आलू, राधालता के फूलों की मछली, कुंदरू के परवल, चिचिंडा की बोडी, मिट्टी के ढेलों का सेंधा नमक—और भी न जाने क्या-क्या इकट्ठा करके दुकान सजाने में काफ़ी देर कर दी। अपू बोला—चीनी किस चीज़ की बनाएँगी री दीदी?
दुर्गा बोली—बाँस-तल्ले के रास्ते पर जो टीला है, वहाँ अच्छी बालू है—माँ चावल भूनने के लिए लाती है! वही बालू चल लाते हैं—सफ़ेद चमक रही है, ठीक एकदम चीनी जैसी!
बाँस-वन में चीनी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वे रास्ते के किनारे के जंगल में घुस गए। बहुत ऊँचा एक जंगल, चटका के पेड़ की चोटी पर एक बड़ी लता के घने हरे पर्दे के पीछे, लाल सुर्ख, बड़े-बड़े गोल-गोल से क्या फल झूल रहे थे। अपू और दुर्गा दोनों देखकर दंग रह गए। बहुत कोशिशों के बाद कुछ फल नीचे की ओर लता का एक हिस्सा टूटने से ज़मीन पर गिर पड़े, तो दोनों बड़ी ख़ुशी से एक साथ दौड़कर उन्हें ज़मीन से उठा लिए।
पके हुए फल कुल तीन थे। मुख्य रूप से दुकान सजाने के उद्देश्य से उन्हें दुकान में इस तरह रखा गया कि ग्राहक आए तो सबसे पहले नज़र पड़े। पूरे ज़ोर-शोर से ख़रीद-बिक्री शुरू हो गई। दुर्गा ने ख़ुद ही पान ख़रीदकर दुकान के पान लगभग ख़त्म कर दिए। खेल थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि सदर दरवाज़े से सत्तू को घुसते देख अपू बड़ी ख़ुशी से उसे आगे लेने दौड़ पड़ा—ओ सत्तू-दा, देखो न कैसी दुकान बनी है, कैसे फल हैं देखो, मैं और दीदी तोड़कर लाए हैं—क्या फल हैं बताओ तो? जानते हो?
सत्तू बोला—वो तो मकाल फल है—हमारे बाग़ में कितने थे! सत्तू के आने से अपू जैसे कृतार्थ हो गया। सत्तू-दा उनके घर उतना आता नहीं है—ऊपर से सत्तू-दा बड़े लड़कों के दल का सरगना है। उसके आने से खेल का बचपना जैसे चला गया।
देर तक पूरे ज़ोरों पर खेल चलने के बाद दुर्गा बोली—भाई, मुझे दो मन चावल दो, बहुत महीन वाला, कल मेरी गुड़िया की शादी की पक्की बात है, बहुत लोग खाएँगे—
सत्तू बोला—हमें भी न्योता है, है न?
दुर्गा ने सिर हिलाकर कहा—क्यों नहीं! तुम लोग तो हुए कन्या पक्ष वाले—कल सुबह आकर न्योता देकर ले जाऊँगी—सत्तू-दा, रानू से कहना आज रात को थोड़ा चंदन पीसकर रखे। कल सुबह ले आऊँगी।
दुर्गा की बात ठीक से ख़त्म भी नहीं हुई थी कि सत्तू ने दुकान में बिकने के लिए रखे सामान में से कुछ उठाकर अचानक दरवाज़े की ओर दौड़ लगा दी—साथ ही अपू भी, ओरे दीदी रे—ले गया रे—कहकर अपनी खनकती, तीव्र, मीठी आवाज़ में चीख़ते हुए उसके पीछे-पीछे भागा।
हैरान दुर्गा ठीक से मामला समझ पाती, उससे पहले ही सत्तू और अपू दौड़कर दरवाज़े से बाहर निकल गए! साथ ही खेल-घर की तरफ़ नज़र पड़ते ही दुर्गा ने देखा कि वे तीनों पके मकाल फल में से एक भी नहीं है!
दुर्गा एक दौड़ में दरवाज़े के पास आकर देखी, सत्तू गाबतला के रास्ते पर आगे-आगे और अपू उससे थोड़ी ही दूरी पर पीछे-पीछे दौड़ रहा है। सत्तू की उम्र अपू से तीन-चार साल ज़्यादा है, और वह अपू की तरह दुबला-पतला, लड़कियों जैसा बनावट का लड़का नहीं है—काफ़ी मज़बूत हाथ-पैर वाला और ताक़तवर है—उसके साथ दौड़कर अपू का जीतना मुमकिन नहीं था—फिर भी जो वह पकड़ने-पकड़ने को हो रहा था, उसका एकमात्र कारण यह था कि सत्तू दूसरे का माल चुराकर भाग रहा था और अपू जान की बाज़ी लगाकर दौड़ रहा था।
अचानक दुर्गा ने देखा कि सत्तू दौड़ते-दौड़ते रास्ते में एक बार जैसे नीचे झुककर पीछे मुड़कर देखा—साथ ही अपू भी अचानक रुक गया—सत्तू तब तक दौड़कर नज़रों से ओझल होकर चालते-तल्ले के रास्ते पर जा पहुँचा था।
दुर्गा तब तक दौड़कर अपू के पास पहुँच गई। अपू एकदम आँखें बंद किए, थोड़ा आगे की ओर नीचे झुककर दोनों हाथों से आँखें मल रहा है—दुर्गा बोली—क्या हुआ रे अपू?
अपू ठीक से आँखें खोले बिना ही दर्द-भरी आवाज़ में दोनों हाथों से आँखें मलते-मलते बोला—सत्तू-दा ने आँखों में धूल फेंक दी दीदी—आँखों से कुछ देख नहीं पा रहा हूँ रे—
दुर्गा ने जल्दी से अपू का हाथ हटाकर कहा—हट हट, देखूँ—इस तरह आँखें मत मल, देखूँ तो?
अपू ने तुरंत दोनों हाथ फिर आँखों पर चढ़ाकर बेचैनी से कहा—उँहूँ ओ दीदी, आँखों के अंदर कैसा हो रहा है—मेरी आँखें फूट गईं दीदी—
—देखूँ देखूँ, इस तरह आँखों में हाथ मत दे—हट तो—फिर वह आँचल में फूँक मारकर आँखों को सेंकने लगी। कुछ देर बाद अपू थोड़ी-थोड़ी आँखें खोलकर देखने लगा—दुर्गा ने उसकी पलकें उठाकर कई बार फूँक मारकर कहा—अब ठीक से देख पा रहा है?—अच्छा तू घर जा... मैं उनके घर जाकर उसकी माँ और दादी को सब बताकर आती हूँ—रानू को भी बताऊँगी—अच्छा दुष्ट लड़का है तो—तू जा, मैं अभी आती हूँ।
रानू के पिछवाड़े के दरवाज़े तक पहुँचकर दुर्गा की और आगे जाने की हिम्मत नहीं हुई। वह सेजठाकरुण से डरती है। थोड़ी देर पिछवाड़े के पास खड़े होकर हिचकिचाने के बाद वह घर लौट आई। सदर दरवाज़े से घुसकर उसने देखा, अपू दरवाज़े के बाएँ पल्ले को थोड़ा-सा आगे धकेलकर उसी की आड़ में खड़ा चुपचाप रो रहा है। वह रोने वाला लड़का नहीं है, बड़ी-बड़ी बातों पर वह कभी नहीं रोता—गुस्सा करता है, रूठ जाता है, लेकिन रोता नहीं। दुर्गा समझ गई, आज उसे बहुत दुख हुआ है, इतने प्यारे फल चले गए...ऊपर से आँखों में धूल डालकर इस तरह बेइज़्ज़त किया! अपू का रोना वह सह नहीं पाती—उसके सीने के अंदर कैसा तो होने लगता है।
उसने जाकर भाई का हाथ पकड़ा—सांत्वना के स्वर में बोली, रो मत अपू—आ, मैं तुझे अपनी वो सारी कौड़ियाँ दे दूँगी—आ—आँखों में क्या दर्द और बढ़ रहा है?...देखूँ, कपड़ा क्या फाड़ डाला है?
खाने-पीने के बाद दोपहर को अपू कहीं बाहर न निकलकर घर में ही रहता। बहुत दिनों का जीर्ण-शीर्ण पुराना कोठे वाला घर। सामान, लकड़ी की पुराने ज़माने की संदूक़, कत्थई रंग की पुराने ज़माने की बेंत की पेटियाँ, कौड़ियों की अल्गनी, जलचौकी से घर भरा हुआ था। ऐसी भी पेटियाँ थीं जिन्हें अपू ने कभी खुलते नहीं देखा था, उनमें रखे ऐसे भी हांडी-कलश थे, जिनके अंदर रखी चीज़ों के बारे में वह बिल्कुल अनजान था।
सब मिलाकर घर में पुरानी चीज़ों की एक अजीब पुरानी-पुरानी गंध आती थी—वह किस चीज़ की गंध थी, वह नहीं जानता, लेकिन वह जैसे बहुत पुराने समय की याद दिला देती थी। उस बीते दिनों में अपू नहीं था, लेकिन यह कौड़ियों की अल्गनी थी, वह दादाजी की बेंत की पिटारी थी, वह बड़ी लकड़ी की संदूक़ थी, वह जो अमलतास के पेड़ का सिरा जंगल में से बाहर झाँक रहा है, उस जले-जंगल से भरी जगह पर किन्हीं लोगों का बड़ा चंडीमंडप था, और भी न जाने कितने नामों के कितने लड़के-लड़कियाँ एक दिन इसी घर-आँगन में खेला करते थे, कहाँ वे छाया बनकर विलीन हो गए, कितने काल पहले!
जब वह अकेला घर में रहता, माँ घाट पर जाती, तब उसका बहुत मन करता कि उस बक्से को, बेंत की पिटारी को खोलकर दिन के उजाले में निकालकर देखे कि क्या अद्भुत रहस्य उनके अंदर छिपा है। कमरे की सबसे ऊँची ताक पर लकड़ी की बड़ी तश्तरी में जो ताड़पत्र की पोथियों का ढेर और बही-खाते हैं, पिताजी से पूछकर उसे पता चला था कि वे उसके दादा रामचाँद तर्कालंकार के हैं—उसकी बड़ी इच्छा थी कि अगर ये हाथ की पहुँच में आ जाएँ, तो वह एक बार नीचे उतारकर उन्हें उलट-पुलटकर देखे।
कभी-कभी जंगल के किनारे वाली खिड़की पर बैठकर दोपहर में वह वह फटी हुई काशीदास की महाभारत लेकर पढ़ता, वह ख़ुद ही बहुत अच्छा पढ़ना सीख गया था, पहले की तरह अब मुँह से सुनना नहीं पड़ता, ख़ुद ही पानी की तरह पढ़ लेता था और समझ जाता था।
पढ़ाई में उसकी बुद्धि बहुत तेज़ थी, उसके पिता कभी-कभी उसे गांगुली-बाड़ी के चंडीमंडप में बूढ़ों की महफ़िल में ले जाते, रामायण या पांचाली पढ़ने देकर कहते, पढ़ो तो बेटा, इन्हें एक बार सुना दो तो? बूढ़े लोग बहुत तारीफ़ करते, दीनू चाटुज्जे कहते—और मेरा नाती, इसी तुम्हारे लड़के की उम्र का होगा, दो वर्ण-परिचय फाड़ डाले बाबू, सुनोगे तो विश्वास नहीं करोगे, अभी तक ठीक से अक्षर नहीं पहचाने—बाप का चलन पाया है—ये जो कुछ दिन मैं हूँ रे बाबू, आँखें मूँदते ही हल की मूठ पकड़नी होगी। पुत्र-गर्व से हरिहर का सीना भर जाता। मन-ही-मन सोचता—वह क्या तुम्हारे यहाँ होगा? किया तो उम्र भर सूद का कारोबार। हुआ तो क्या ग़रीब, हज़ार हो, पंडित-वंश तो है, पिताजी ने यूँ ही ताड़पत्र नहीं भर दिए पोथियाँ लिखकर, वंश में एक धारा दे गए हैं, वह कहाँ जाएगी?
उनके घर की खिड़की से कुछ ही हाथ दूर घर की चारदीवारी थी और चारदीवारी के उस पार से ही चारदीवारी से सटकर क्या विशाल खरपतवार का जंगल शुरू हुआ था
खिड़की पर बैठे-बैठे बस नज़र आते हैं हरे-भरे समुद्र की लहरों-से भाँट-सेवड़ा के पेड़ों के माथे, इस डाल से उस डाल तक झूलती न जाने कितनी ही तरह की लताएँ, पुरानी बाँसों की झुरमुट का सिरा, जो अपनी उम्र के बोझ से कहीं अमलतास तो कहीं बन-चालता के पेड़ों पर झुका पड़ा है, और उसके नीचे की काली मिट्टी पर खंजन पंछी का नाच! बड़े-बड़े पेड़-पौधों के नीचे हल्दी, बन-कचू, कड़वे ओल का घना हरा जंगल सूरज की रोशनी की ओर मुँह फेरने के लिए आपस में धक्का-मुक्की करता हुआ जी-जान से लगा है। जीवन के इस युद्ध में जो पौधा हारकर अपने गर्वीले पड़ोसी की छाँह में दब गया है, उसके पत्ते बिबर्ण, मौत की पीली छाया पड़ी डंठल गलने लगी है—उसकी मरणासन्न दृष्टि के सामने शरद्-ऋतु के अन्तिम दिनों की, वन में छिटकी हुई भरपूर झिलमिलाती धूप, परजीवी लताओं के फूलों की व्याकुल, भीनी सुगन्ध में लिपटी यह धरती अपने सारे सौन्दर्य-रहस्य और विस्तार के साथ धीरे-धीरे आँखों से ओझल होती जा रही थी।
उनके घर के पास से ही यह जंगल एक ओर उस कोठी के मैदान तक, तो दूसरी ओर नदी के किनारे तक एक-सा चला गया है। अपू को यह जंगल अनन्त लगता है, वह अपनी दीदी के साथ इस जंगल में कितनी ही दूर तक तो घूम आया है, पर जंगल का छोर उसे कभी नहीं दिखा—बस इसी तरह के तिक्तराज पेड़ों के नीचे से गुज़रता रास्ता, मोटी-मोटी गिलोय की लताओं से लदे, बन-चालता के गुच्छे-के-गुच्छे फल चारों ओर। एक पतली-सी पगडंडी एक आम के बाग़ में आकर ख़त्म हो जाती है, फिर इस पेड़ से उस पेड़ के नीचे से होती हुई, बन-कलमी, नाटा-काँटे, मैना की झाड़ियों के बीच से गुज़रती हुई न जाने कहाँ किस ओर ले जाकर छोड़ देती है, कोई ठिकाना नहीं। बस कहीं बन-धुँधुल की लता शून्य में झूलती है, तो कहीं पुराने शीशम के पेड़ की काई-लगी डाल पर उगी परजीवी लताओं की झाड़ियाँ नज़र आती हैं।
इस वन ने अपनी श्यामल हरियाली के ताज़े स्पर्श से उसके और उसकी दीदी के मन को सहला दिया था। जन्म से ही यह वन उनका सुपरिचित है, हर पल, हर क्षण के मूक आनन्द से प्यास से भरे उनके हृदय को कितने ही विचित्र, कितने ही अपूर्व रसों से भर देता है। वर्षा से ताज़ा हुई घनी हरी झाड़ी के सिरे पर नाटा-काँटे के सुगंधित फूलों की पीली-पीली बालियाँ, ढलते सूरज की छाया में मोटी मैना-काँटे की डाल की फुनगी पर गिलहरी का हल्के-पग आना-जाना, पत्तों-फूलों-फलों की वह बहुतायत; पर सबसे बढ़कर, जब घने वन के किनारे, झाड़-झंखाड़ के बीच किसी अकेली, टेढ़ी-मेढ़ी डाल पर वन का कोई अनजाना पंछी आ बैठता है, तब उसके मन में जो विचित्र, अपूर्व, गम्भीर आनन्द-रस उमड़ता है, उसे वह मुँह से कहकर किसी को समझा नहीं सकता। वह जैसे कोई सपना हो, कोई माया हो, चारों ओर पंछी गीत गाते हैं, झर-झर करके फूल झड़ते हैं, ढलते सूरज की रोशनी और भी घनी, और भी छायादार हो जाती है।
इसी वन के भीतर कहीं एक पुराना, पटा हुआ तालाब है, और उसी के किनारे वह टूटा-फूटा मन्दिर। आजकल जैसे पंचानन्द ठाकुर गाँव के देवता हैं, किसी समय उसी मन्दिर की विशालाक्षी देवी वैसी ही थीं। वे गाँव के मजूमदार वंश की स्थापित देवी थीं। किसी बात में मनोकामना पूरी होने पर उन्होंने देवी के मन्दिर में नरबलि दे दी, जिससे रुष्ट होकर देवी ने स्वप्न में बताया कि वे मन्दिर छोड़कर चली गईं और अब कभी नहीं लौटेंगी। यह बहुत पुरानी बात है, विशालाक्षी की पूजा होते हुए देखने वाला कोई भी व्यक्ति अब जीवित नहीं है। मन्दिर टूट-फूट गया है, मन्दिर के सामने का तालाब पटकर गड़ही बन गया है, चारों ओर जंगल ने उसे ढँक लिया है, और मजूमदार वंश में भी दीया जलाने वाला कोई नहीं बचा।
केवल—यह भी बहुत दिन पहले की बात है—गाँव के स्वरूप चक्रवर्ती दूसरे गाँव से न्योता खाकर लौट रहे थे—सन्ध्या के समय नदी के घाट पर उतरते हुए उन्होंने रास्ते के किनारे एक सुन्दर सोलह बरस की लड़की को खड़े देखा। वह जगह बस्ती से दूर थी, सन्ध्या घिर आई थी, रास्ते में कहीं कोई न था। ऐसे समय में, इस निर्जन वन के किनारे एक कमसिन सुन्दर लड़की को देखकर स्वरूप चक्रवर्ती को बड़ा अचरज हुआ। पर इससे पहले कि वह कुछ कहते, लड़की ने ज़रा-से गर्व से मिली हुई, पर मीठी आवाज़ में कहा—मैं इस गाँव की विशालाक्षी देवी हूँ। गाँव में जल्द ही हैज़े की महामारी शुरू होगी—कह देना कि चतुर्दशी की रात को पंचानन्द-तले एक सौ आठ कुम्हड़ों की बलि देकर काली-पूजा करें। बात समाप्त होते-होते ही हक्का-बक्का स्वरूप चक्रवर्ती की आँखों के सामने ही वह लड़की चारों ओर फैले शीत-सन्ध्या के कुहासे में धीरे-धीरे जैसे विलीन हो गई। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद सचमुच उस बार गाँव में भयंकर हैज़ा फैला था।
ये सब कहानियाँ उसने कितनी ही बार सुनी हैं। खिड़की के पास खड़े होते ही विशालाक्षी ठाकुर की बात उसके मन में उठती है। क्या देवी विशालाक्षी को एक बार देखा नहीं जा सकता? अचानक वह जंगल के रास्ते शायद गिलोय की लता तोड़ रहा हो—और उसी समय—
बहुत सुन्दर दिखती होगी, लाल-किनारी वाली साड़ी पहने, हाथ-गले में माँ दुर्गा की तरह हार-बाजूबन्द।
तुम कौन हो?
—मैं अपू हूँ।
—तुम बड़े अच्छे लड़के हो, क्या वर चाहते हो?
वह बिस्तर पर जाकर लेट जाता है। एक-एक बार हवा के हलके झोंकों के साथ न जाने किन लताओं-पत्तों की तीखी-मीठी गन्ध बह आती है। ठीक दोपहर में, बहुत दूर किसी बड़े पेड़ के ऊपर से कोई चील लम्बी तान में पुकारती है, मानो इस छोटे-से गाँव के अतीत और वर्तमान के सारे छोटे-मोटे दुःख-शान्ति-द्वन्द्व के ऊपर, शरद्-दोपहरी की धूप से भरे, नीले निर्जन आकाश-मार्ग पर, एक उदास, घर-बार से विरक्त पथिक-देवता का सुरीला आलाप हो जो दूर से और दूर होता हुआ विलीन हुआ जा रहा हो।
कब वह सो जाता, उसे पता नहीं चलता। नींद से उठकर देखता है तो दिन बिलकुल ढल चुका है। खिड़की के बाहर सारे वन में छाया उतर आई है, बाँसों की झुरमुट की फुनगियों पर लाल-लाल धूप है।
हर दिन इसी समय, ठीक इसी छाया-भरे तीसरे पहर में, निर्जन वन की ओर ताकते हुए उसके मन में बड़े ही अद्भुत विचार आते हैं। एक अपूर्व ख़ुशी से मन भर उठता है। लगता है, ऐसे लता-पत्तों की मीठी गन्ध से भरे दिन इससे पहले भी कभी एक बार आए थे। उन दिनों के अनुभव किए हुए आनन्द की धुँधली-सी स्मृति आकर इन दिनों को भविष्य की किसी अनिश्चित ख़ुशी की आशा से भर देती है। लगता है जैसे कुछ-न-कुछ घटेगा, ये दिन यूँ ही बेकार नहीं जाएँगे—जैसे कोई बहुत बड़ा आनन्द इनके अन्त में प्रतीक्षा कर रहा है!
इन ढलती दुपहरियों के साथ, जन्म के साथी इस सुपरिचित आनन्द-भरे बहुरूपी वन के साथ कितने ही रहस्यमय, सपनों के देश के सन्देश गुँथे हुए हैं। बाँस की झुरमुट के ऊपर छाये आकाश की ओर ताकते हुए वह देखता है, एक तरुण वीर की उदारता का लाभ उठाकर कोई याचक उसके अक्षय कवच-कुण्डल माँगने के लिए हाथ फैलाए खड़ा है; चावल के आटे का घोल पीकर कहीं का एक छोटा-सा ग़रीब बालक अपने खेलने वाले साथियों के पास 'दूध पिया है' कहकर उल्लास से नाचता है—और वह जो उजाड़ भिटा (पुरानी बसावट) के पास बेल का पेड़ है—वहीं तो शरशय्या पर लेटे हुए वयोवृद्ध वीर भीष्मदेव के मरणासन्न ओठों पर अर्जुन ने तीखे बाण से धरती फोड़कर भोगवती की धारा सींची थी। पहली जवानी में सरयू-तट के फूलों से भरे वन में शिकार करते हुए दशरथ ने मृग के धोखे में जिस जल भरते हुए ग़रीब बालक का वध कर दिया था—वह घटना उस रानू-दीदी के बाग़ में जो बड़ा-सा जामुन का पेड़ है, उसके नीचे जो गड़ही है—उसी के किनारे घटी थी।
उनके घर में एक किताब है, जिसके पन्ने पीले पड़ गए हैं, जिल्द का कुछ हिस्सा नहीं है, नाम लिखा है 'वीरांगना काव्य', पर लेखक का नाम वह नहीं जानता, शुरू के पन्ने फट गए हैं। किताब उसे बहुत अच्छी लगती है—उसमें उसने पढ़ा है—
अदूरे देखिनु ह्रद, से ह्रदेर तीरे
राजरथी एकजन यान गड़ागड़ि।
भग्नऊरु! देखि उच्चे उठि काँदिया
ए कि कुस्वपन नाथ देखाइले मोरे!
कलुईचण्डी व्रत के दिन माँ के साथ गाँव के उत्तरी मैदान में जिस पुराने पटे हुए तालाब के किनारे वह वनभोज करने जाता है—कोई नहीं जानता—चारों ओर वन से घिरा वह छोटा-सा तालाब ही महाभारत का वह द्वैपायन सरोवर है। उस निर्जन मैदान के तालाब के भीतर वह भग्न-जाँघ, अपमानित वीर अकेला पड़ा रहता है, कोई उसे नहीं देखता, कोई उसकी खोज-ख़बर नहीं लेता। उत्तरी मैदान के केले-बैंगन के खेतों से किसान लौट आते हैं, किसी भी ओर मनुष्य का कोई चिह्न नहीं रहता—सोनाडांगा मैदान के पार उस अनखोजी, निर्जन, अनजानी धरती पर जब चाँद-विहीन रात्रि का घना अँधेरा धीरे-धीरे फैलता है, तब हज़ारों-हज़ार साल पुरानी मानव-वेदना कभी ग़रीब पिता के धोखे से मुग्ध हुए अबोध बालक के उल्लास में, तो कभी एक भाग्यहीन, एकाकी, असहाय राजकुमार की तस्वीर में उसकी बढ़ती हुई, उत्सुक मन की सहानुभूति में जाग्रत और सार्थक हो उठती है। उस अज्ञातनामा लेखक की किताब पढ़ते-पढ़ते कितनी ही बार उसकी आँखों की पलकें भीग आई हैं!
उसके बाबा घर पर नहीं हैं। घर पर होते तो उसे एक मन से कमरे में बैठकर दफ़्तर खोलकर पढ़ना पड़ता। दिन बिलकुल ढल जाता, फिर भी छुट्टी नहीं मिलती। उसका मन व्याकुल हो उठता। और कितनी देर बैठकर शुभंकरी आर्या रटता रहेगा? आज क्या वह खेलने नहीं जाएगा? क्या दिन अब बचा भी है? बाबा पर भारी ग़ुस्सा आता, अभिमान होता।
अचानक अप्रत्याशित रूप से छुट्टी हो जाती। किताब-दफ़्तर किसी तरह धप् से एक जगह पटककर वह छाया-भरे आँगन में जाकर ख़ुशी से नाचने लगता।
अपूर्व, अद्भुत तीसरा पहर... घनी छायादार पेड़-पौधों के पास खेल-घर... गिलोय की लताओं का तना हुआ तार... खजूर की डालियों का छप्पर... वन की ओर से ठंडी-ठंडी गन्ध आती है... लाल-लाल धूप की लकीर जेठा-महाशय के उजाड़ चकोतरे के पेड़ की चोटी पर चिक-चिक करती है... चॉकलेटी भूरे रंग के पंखों वाला तेड़ो पंछी बन-कलमी की झाड़ी पर आकर बैठता है... ताज़ी मिट्टी की गन्ध... एक बच्चे की दुनिया भरपूर आनन्द से छलक उठती है, किसे वह कैसे समझाए कि यह कैसा आनन्द है!
सन्ध्या के बाद सर्वजया ने भात चढ़ाया था। अपू बरामदे में चटाई बिछाकर बैठा है। घना अँधेरा है, झींगुरों की एक-तान आवाज़ आ रही है।
अपू ने पूछा—पूजा के और कितने दिन हैं, माँ?
दुर्गा पंसुल पर तरकारी काट रही थी। बोली, और बाईस दिन हैं, है न माँ?
उसने हिसाब ठीक कर रखा है। उसके बाबा घर आएँगे, अपू के लिए, माँ के लिए, और उसके लिए गुड़िया, कपड़े, आलता लाएँगे।
आजकल वह बड़ी हो गई है, इसलिए उसकी माँ उसे दूसरे मुहल्ले में न्योता खाने नहीं जाने देती। पूरी खाने में कैसी लगती है, यह वह लगभग भूल ही गई थी। उजली कोजागरी पूर्णिमा की चाँदनी-भरी रात में, बाँस-वन के उजाले-अँधेरे की जाल-बुनावट वाले रास्ते पर वह आगे-आगे मुहल्ले-मुहल्ले घूमकर लक्ष्मी-पूजा की खील-मुरमुरे आँचल में भरकर ले आती थी। घर-घर में शंख बजते, रास्ते में पूरियाँ तलने की महक आती, शायद मुहल्ले का कोई पूजा के शीतल का नैवेद्य एक थाली में उनके घर भी भेज देता। वह भी बहुत-सी खील-मुरमुरे लाती, उसकी माँ दो दिन तक उन्हें जलपान में खाने को देती, ख़ुद भी खाती। उस बार सेज-ठाकुरानी ने कहा था—भले घर की लड़की क्या फिर चाषा (किसानों) की तरह घर-घर घूमकर खील-मुरमुरे बटोरती फिरेगी? यह सब देखने में ख़राब लगता है... ऐसी और मत भेजना बहू—उसी दिन से वह और नहीं जाती।
दुर्गा बोली—ताश खेलोगे?
—तो जा, उस कमरे से ताश ले आ, ज़रा खेलें—दुर्गा असहाय-सी होकर अपू की ओर देखने लगी।
अपू हँसकर बोला—चल, मैं खड़ा हूँ—
उनकी माँ बोली—अहा-हा, लड़की का डर देखकर तो मैं मरी जा रही हूँ। दिन भर ज़मीन-आसमान एक करके घूमती-फिरती है, तब डर नहीं लगता, और रात में इस कमरे से उस कमरे में जाने में इसके सारे अंग अकड़ जाते हैं!...
यह वही ताश की जोड़ी थी जो अपू शिष्य-बाड़ी से लाया था। ताश के खेल में तीनों की कुशलता बराबर थी। अपू अभी तक सारे रंग नहीं पहचानता—बीच-बीच में हाथ के ताश विरोधी दल की खिलाड़ी माँ को दिखाकर कहता, यह कौन-सा रंग है, रुइतन? देखो न माँ—
दुर्गा का मन आज बहुत ख़ुश है। रात में खाना अक्सर नहीं बनता, दोपहर के बासी भात-तरकारी ही रहते हैं। आज भात चढ़ा है, तरकारी पकेगी, इसी में उसे महानन्द है। आज जैसे कोई उत्सव का दिन हो। अपू बोला—ताश खेलते-खेलते वह कहानी सुनाओ न माँ, वह स्यामलङ्का वाली कहानी?
अचानक वह माँ की गोद में सिर रखकर लेट जाता है। माँ के बदन को सहलाते हुए लाड़-भरे स्वर में कहता है—वह कविता सुनाओ न माँ, वही—स्यामलङ्का बटुना बाटे माटी में लोटें केश।
दुर्गा कहती है—खेलते समय कविता सुनाने से खेल कैसे होगा अपू? उठ—
सर्वजया बोली—दुग्गा, पातालकोंड़ आज कहाँ से मिला री?
—वह जो गोसाइयों का बड़ा बाग़ है न? वहीं। एक बार वह राँगी गाय को ढूँढ़ने तू, मैं और अपू गए थे? वहाँ बहुत खिले थे, किसी को पता नहीं चला माँ, बहुत घना जंगल है न? नहीं तो लोग तोड़कर ले जाते—
अपू बोला—वहाँ गई थी? उफ़, वह तो बहुत घना जंगल है री दीदी!
सर्वजया स्नेह से बार-बार बेटे की ओर देख रही थी। वही कल का अपू—'आ चन्दा आ, खोकन के माथे पर टी-ई-ई-प देकर जा'—कहने पर जो बार-बार कलेर पुतुल (चाबी वाले खिलौने) की तरह चाँद-जैसे माथे को उँगलियों से बँधी हथेली की ओर झुका देता था, वह आज ताश खेलने बैठा है! उसे यह दृश्य बड़ा ही नया-नया लग रहा था। अपू जब खेल नहीं पाता या आशा करके कोई हाथ जीत लेता या फिर अपू के हाथ में ख़राब पत्ते जाकर उसके अपने हाथ में अच्छे पत्ते आ जाते, तो विरोधी दल की खिलाड़ी होकर भी उसके मन में कष्ट होता था।
दुर्गा बोली—आज क्या हुआ है जानती हो माँ—
अपू बोला—जाः, तो मैं तुझसे आड़ी कर लूँगा, कहकर देख—
—कर ले जा आड़ी—सुनो माँ, यह पोस्तदाने का नाम नहीं जानता, आज राजी-लोगों के घर पोस्तदाना धूप में सुखाया था, तो यह बोला, क्या है राजी-दी? राजी बोली, यष्टिमधु, खाकर देख—यह वहीं खड़े-खड़े खा आया माँ, समझ ही नहीं पाया कि पोस्त है—ऐसा बुद्धू है न माँ?
अपू ने मुँह से तो कह दिया, पर वह दीदी से आड़ी नहीं करेगा। वही जिस दिन उसके पके हुए माकाल फल सत्तू-दा लेकर भाग गया था, उस दिन उसकी दीदी ने सारा दिन वन-बाग़ान छानकर सन्ध्या के समय न जाने कहाँ से आँचल में बाँधकर एक रास माकाल फल लाकर उसके सामने खोलकर दिखाए और बोली—अब कैसा हुआ? सुबह तो बड़ा रो रहा था? उस शाम उसे किस चीज़ से ज़्यादा ख़ुशी मिली थी—उन माकाल फलों से, या दीदी के चेहरे से, ख़ासकर उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में भरी ममता-भरी शीतल हँसी से—यह वह नहीं जानता।
—छक्का समझ-बूझकर खेलियो अपू?—दुर्गा बड़ी ख़ुशी के साथ ताश बटोरकर सजाने लगी।...
—किस फूल की गन्ध आ रही है, है न दीदी?
उनकी माँ बोली, उनके जेठा-महाशय के भिटा के पीछे छतिवन का पेड़ है, उसी के फूलों की गन्ध है। अपू और दुर्गा दोनों ने आग्रह-भरे स्वर में पूछा—हाँ माँ, उस छतिवन-तले एक बार बाघ आया था, तुमने बताया था न? लेकिन उसकी माँ जल्दी से ताश फेंककर उठ खड़ी हुई—अरे रे! भात जल गया, जलने की गन्ध आ रही है—भात उतारकर खड़ी हो, बताती हूँ—
खाते-खाते दुर्गा बोली—माँ, पाताल-कंद की तरकारी कितनी स्वादिष्ट बनी है! उसका मुँह स्बर्गीय़ तृप्ति से भर उठा। उसके साथ-ही-साथ अपु भी बोल पड़ा—वाह! खाने में एकदम मांस जैसा है, है न दीदी? माँ, एक जगह कितने सारे पाताल-कंद उगे हुए हैं, मैं तो उन्हें कुकुरमुत्ता समझता था, इसीलिए नहीं तोड़ता था—दोनों की इस उन्मुक्त प्रशंसा से सर्वजया का हृदय गर्व और तृप्ति से भर उठा। फिर भी, उसे कौन-से उपयुक्त साधन मिले थे? लोग भोज में पकाने के लिए मँझली ठकुराइन को बुलाते हैं, ज़रा उसे तो बुलाकर देखें, वो उन्हें बता देगी कि रसोई किसे कहते हैं—हाँ। सर्वजया बोली—अपु के हाथ में पानी डाल दे दुर्गा, ये क्या लड़कों वाली हरकत है? रास्ते के बीचों-बीच मुँह धोएगा? रोज़ ही रात में तुम इसी रास्ते पर—
लेकिन अपु एक क़दम भी हिलना नहीं चाहता, सामने टूटी हुई चारदीवारी की वो दरार, अँधेरा बाँस का जंगल, झाड़-झंखाड़ का अँधेरा जो तोरई के बीज-सा काला है। उजाड़ खंडहर… और न जाने कितनी अनजानी विभीषिकाएँ! उसकी समझ में नहीं आता कि जहाँ जान पर बन आई हो, वहाँ रास्ते पर कुल्ला करना ही क्या इतनी बड़ी बात है?
उसके बाद सब जाकर सो जाते हैं। रात गहरी होती है, सप्तपर्णी के फूलों की तीव्र सुगंध से हेमंत की छुअन लिए, ओस-भीगी रात की हवा भर जाती है। आधी रात को बाँसों के झुरमुट के ऊपर कृष्णपक्ष के चाँद की म्लान चाँदनी उग आती है और ओस से भीगे पेड़-पौधों, डालों-पत्तों पर झिलमिलाती है। रौशनी और अँधेरे के अनूठे मायाजाल में वन का छोर किसी सोई हुई परियों के देश-सा रहस्य-भरा लगता है। सन-सन करती हुई अचानक शायद हवा का एक झोंका अमलतास की डालों को झुलाता, कुंदरू की झाड़ियों के सिरों को कँपाता हुआ बह जाता है।
कभी-कभी इसी समय अपु की नींद खुल जाती थी।
वही देवी जैसे आ गई हों—उस गाँव की विस्मृत अधिष्ठात्री देवी विशालाक्षी।
सुंदर तटों वाली इछामती के अनार के पौधे-से निर्मल जल के किनारे, काई से भरी ठंडी कीचड़ में कितने ही दिन पहले जिनके चरण-चिह्न लुप्त हो गए, तट के प्राचीन सप्तपर्णी के पेड़ ने भी शायद जिन्हें नहीं देखा, उन्हीं लोगों ने कभी पुराने ज़माने में अधिष्ठात्री देवी के मंदिर में फूल-फल-नैवेद्य से पूजा चढ़ाई थी, आजकल के लोग उन्हें कौन जानता है?
लेकिन वो इस गाँव को अभी तक भूली नहीं हैं।
जब गाँव निस्तब्ध हो जाता है, बहुत रात गए, वो वनों में घूम-घूमकर फूल खिलाती हैं, पंछियों के बच्चों की देखभाल करती हैं, चाँदनी रात के अंतिम प्रहर में मधुमक्खियों के छोटे-छोटे छत्तों को जंगली भँवरों, नटकन और पुँइ के फूलों के मीठे मधु से भर देती हैं।
वो जानती हैं कि किस झाड़ी के कोने में अडूसे के फूलों का गुच्छा छिपा है, घने वन के भीतर सप्तपर्णी के फूल कहाँ पेड़ की छाया में सोये हैं, इछामती के किस मोड़ पर हरी काई के बीच-बीच नील पंखुड़ियों वाले करमी के फूलों की भीड़ उमड़ रही है, काँटेदार पेड़ की डालियों के बीच घास के छोटे-से घोंसले में टुनटुनी चिड़िया के बच्चे कहाँ नींद से जाग उठे हैं।
उनके रूप के स्निग्ध आलोक से वन जैसे भर गया है। नीरवता में, चाँदनी में, सुगंध में, धुँधले प्रकाश और अँधेरे के मायाजाल में रात्रि की अनुपम श्री…
पर दिन का उजाला होने से पहले ही वनलक्ष्मी न जाने कहाँ विलीन हो जाती हैं, स्वरूप चक्रवर्ती के बाद उन्हें फिर किसी ने कभी नहीं देखा।
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