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पथेर पांचाली Matribhasa Hindi · दसवाँ परिच्छेद
A classic literature-themed illustration for पथेर पांचाली

दसवाँ परिच्छेद

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कई महीने बीत चुके थे।

सर्वजया, भुवन मुखर्जी के घर के कुएँ से पानी भरकर लौटी। पीछे-पीछे अपू माँ का आँचल मुट्ठी में भींचे, उसी घर से चला आ रहा था। सर्वजया ने घड़ा नीचे रखकर कहा — “तू इस तरह मेरे पीछे-पीछे क्यों लगा हुआ है, बता तो? घर-गृहस्थी का काम-धाम निपटा लूँ, तब तो घाट जाऊँगी? काम करने नहीं देगा, क्या?”

अपू बोला — “तो रहने दो काम, तुम दोपहर बाद करना माँ, तुम अभी घाट चलो।” फिर माँ की सहानुभूति पाने की आस में अत्यंत करुण स्वर में बोला — “अच्छा, मुझे क्या भूख नहीं लगती? चार दिन से मैंने कुछ नहीं खाया है!”

“नहीं खाया तो मैं क्या करूँ? धूप में घूम-घूमकर बुखार चढ़ा लेगा, कहने से तुम लोग बात कान में लेते हो क्या? दुनिया जहान का काम करूँगी, तब तो घाट जाऊँगी। बैठी तो हूँ नहीं? चल, ऐसी शैतानी मत कर — तुम्हारी फरमाइशों के मुताबिक काम करना मेरे बस का नहीं है, जा —”

अपू ने माँ का आँचल और ज़ोर से मुट्ठी में भींचकर कहा — “मैं तुम्हें काम करने ही नहीं दूँगा, कभी नहीं! रोज़ ही तो काम करती हो, एक दिन नागा नहीं हो सकता क्या? अभी इसी वक़्त घाट चलो — नहीं, मैं नहीं सुनूँगा… करो तो ज़रा, कैसे काम करोगी?”

सर्वजया ने बेटे की ओर देखकर कहा — “ऐसी ज़िद नहीं करते, छिः — बस हो ही गया, ज़रा-सा सब्र तो कर — घाट जाऊँगी, और दौड़कर आकर तेरे लिए भात चढ़ा दूँगी। शैतानी करने से क्या होगा? छोड़ आँचल, बता तो, परवल की कितनी बड़ियाँ खाएगा?”

घंटे भर बाद अपू बड़े उत्साह से खाने बैठा।

गिलास उठाकर वह ढक्क-ढक्क करके आधा खाली कर गया, फिर दो-एक कौर और खाकर कुछ भात पत्तल के नीचे बिखेर दिया और बचा हुआ पानी ख़त्म करके हाथ उठाकर बैठ गया।

“अरे, खा कहाँ रहा है? कब से तो भात-भात रट रहा था — परवल की बड़ियाँ, परवल की बड़ियाँ — यह तो सब छोड़ दिया, तो फिर खाया क्या?”

सर्वजया ने एक कटोरी में दूध-भात सानकर बेटे को खिलाना शुरू किया। “देखूँ, मुँह खोल — कैसा नसीब है तेरा — न मंडा, न मिठाई, बस दो मुट्ठी भात — और उसे खाने में भी लड़के का जो हाल होता है, देखकर जी भर आता है — रोज़ भात खाने बैठता है तो मुँह सिकुड़ जाता है — क्या खाकर जिएगा? जीने आया भी है? मुझे जलाने ही तो आया है, और क्या — मुँह उधर मत घुमा, छिः — हाँ कर बेटा, मेरे लच्छी — देख, बस यह कौर खा ले, तो हो गया — फिर दोपहर बाद टुनू के घर मनसा-भासान होगा। तुझे पता नहीं है क्या? जल्दी-जल्दी खा ले, फिर हम सब चलेंगे —”

दुर्गा ने घर में क़दम रखा। न जाने कहाँ-कहाँ घूमकर आ रही थी। पैरों में धूल सनी थी, माथे पर बालों का एक गुच्छा सीधा होकर कोई चार अंगुल ऊँचा खड़ा था। वह हर समय अपनी ही धुन में घूमती रहती थी — मुहल्ले के हमउम्र लड़के-लड़कियों के साथ उसका ज़्यादा खेलना-कूदना नहीं था — किस झाड़ी में बैंची पकी है, किसके बाग़ में किस पेड़ पर आम की गुठलियाँ बँधी हैं, किस बाँसवाड़ी में जंगली बेर खाने में मीठे हैं — यह सब उसकी उँगलियों पर रहता था। राह चलते हुए वह हमेशा रास्ते के दोनों ओर सतर्क नज़रों से देखती हुई चलती — कि कहीं कोई काँचपोका तो नहीं बैठा है। अगर कहीं कंटकारी के पेड़ का पका फल दिख गया, तो फ़ौरन अपने खेल-घर के लिए बैंगन बनाने के वास्ते उसे तोड़ने बैठ जाएगी। या शायद रास्ते में ही कहीं बैठकर तरह-तरह के खपड़े फेंककर परख रही होगी कि गंगा-यमुना के खेल में कौन-सा निशाना लगाने के लिए सबसे अच्छा है — और जो खपड़ा जाँच में खरा उतरता, उसे बड़े जतन से आँचल में बाँध लेती। वह हर समय अपनी गुड़ियों के बक्से और खेल-घर के साज़-सामान में महाव्यस्त रहती।

उसने अंदर आकर अपराधी की दृष्टि से माँ की ओर देखा। सर्वजया बोली — “आ गई! आओ, भात तैयार है। खाकर मेरा उद्धार करो — उसके बाद फिर जिस दिशा में निकलना हो, निकल जाना। बैसाख का महीना है, जाकर देखो तो सबकी बेटियाँ साँझ-पूजा कर रही हैं, शिव-पूजा कर रही हैं — और यह इतनी बड़ी धड़िंग लड़की — दिन-रात बस मटरगश्ती। सुबह होते न होते निकली है, और अब यह दोपहर ढल गई, तब घर लौटी है — ज़रा सिर की हालत तो देखो! न थोड़ा तेल लगा है, न कंघी छुआई गई है — कौन कहेगा कि बाम्हन की बेटी है, ठीक जैसे कोई दुले या बागदियों की लड़की हो — ब्याह भी उन्हीं दुले-बागदियों के घर होगा — आँचल में यह कौन-सा धन-दौलत बँधा है — खोल —”

दुर्गा ने डरते-डरते आँचल की गाँठ खोलते हुए कहा — “वो राय-काका के घर के सामने कालकासुंद के पेड़ पर —” फिर ढूँक निगलकर बोली — “ये… बहुत-सी बेनेबऊ थीं, सो…”

बेनेबऊ (एक चिड़िया) की बात सुनकर जिसका हृदय न पिघले, ऐसे पाषाण-जीव भी दुनिया में बहुत हैं। सर्वजया तेलेबेगुने ज्बलिय़ा कहिल — “तेरे बेनेबऊ की ऐसी-तैसी! जितनी राख और भभूत है, सब रात-दिन बाँधकर घूम रही हैं — आज अगर तेरा वह गुड़ियों का बक्सा खींचकर उस बाँस-तले वाले पोखर में न फेंक दूँ तो मेरा नाम नहीं —”

सर्वजया की बात पूरी होने से पहले ही एक काण्ड हो गया। आगे-आगे भुवन मुखर्जी के घर की सेज-ठाकुरानी, उनके पीछे-पीछे उनकी बेटी टुनू और देवर का लड़का सतू, और उनके पीछे चार-पाँच और लड़के-लड़कियाँ सामने के दरवाज़े से घर में घुस आए। सेज-ठाकुरानी ने किसी ओर देखे बिना, घर के किसी भी सदस्य से कोई बात किए बिना, सीधी सनसनाती हुई अंदर के बरामदे पर चढ़ गईं। अपने बेटे की ओर मुड़कर बोलीं — “कहाँ है, ले आ — निकाल गुड़ियों का बक्सा, देखूँ तो ज़रा —”

इससे पहले कि इस घर का कोई कुछ कहता, टुनू और सतू, दोनों ने मिलकर दुर्गा का टीन का गुड़ियों वाला बक्सा कमरे से बाहर खींचकर बरामदे में रख दिया और टुनू ने बक्सा खोलकर थोड़ी देर खोजने के बाद मोतियों की एक माला निकालकर कहा — “यह देखो माँ, मेरी वही माला — उस दिन जो यह खेलने गई थी, उसी दिन चुराकर ले आई है।”

सतू ने बक्से के एक कोने में ढूँढ़कर कुछ आम की गुठलियाँ निकालीं और बोला — “यह देखो जेठी माँ, हमारे सोनामुखी पेड़ के आम तोड़कर ले आई है।”

यह सब इतनी तेज़ी से हुआ या उन लोगों की गतिविधि इस घर के सभी लोगों को इतनी रहस्यमयी लगी कि इतनी देर तक किसी के मुँह से कोई बात ही नहीं निकली। अब जाकर सर्वजया को शब्द सूझे, उसने कहा — “क्या, क्या हुआ खुड़ी माँ? क्या हुआ?” फिर वह रसोई के ओसारे से व्यग्र होकर उठ आई।

“यह देखो न क्या हुआ, कीर्ति तो देखो एक बार — तुम्हारी बेटी उस दिन खेलने जाकर टुनू के गुड़ियों के बक्से से यह मोतियों की माला चुरा लाई है — बेचारी कितने दिनों से ढूँढ़-ढूँढ़कर हैरान है। फिर सतू ने जाकर बताया कि तेरी मोतियों की माला मैंने दुर्गा दीदी के बक्से में देखी है — देखो तो ज़रा कारनामा — तुम्हारी यह बेटी कम है क्या? चोर — पक्की चोर — और यह भी देखो न — बाग़ में आमों की गुठलियाँ पड़ती नहीं कि यह चुराकर ले आती है और बक्से में छिपा लेती है।”

एक साथ दो चोरियों के अचानक इल्ज़ाम से सन्न होकर दुर्गा दीवार के सहारे खड़ी पसीने-पसीने हो रही थी। सर्वजया ने पूछा — “लाई है तू यह माला उनके घर से?”

दुर्गा जवाब देती, उससे पहले ही सेज-बहू बोल पड़ीं — “नहीं लाई तो क्या मैं झूठ बोल रही हूँ! अरे, ये आम ही देख लो न? सोनामुखी आम पहचानती हो कि नहीं? यह भी क्या झूठी बात है?”

सर्वजया ने झेंपकर कहा — “नहीं सेज-खुड़ी, आप झूठ कह रही हैं, यह तो मैंने नहीं कहा! मैं तो बस इससे पूछ रही हूँ।”

सेज-ठाकुरानी ने हाथ झटककर बड़ी तल्ख़ी से कहा — “पूछो या जो मर्ज़ी करो बापू, यह लड़की सीधी नहीं निकलेगी, मैं कहे देती हूँ — इस उम्र में जब चोरी की विद्या धर ली है, तो आगे जो होगा, उसका पता तो चल ही जाएगा! चल रे सतू — ले, आम की गुठलियाँ बाँध ले — इस कुलच्छनी छोकरी के मारे बाग़ के आम आँखों से देखने को भी मयस्सर नहीं! टुनू, माला ले ली न?”

सर्वजया को न जाने क्यों थोड़ा ग़ुस्सा आ गया — झगड़े में वह पीछे हटने वालों में से नहीं थी, बोली — “मोतियों की माला की बात तो मैं नहीं जानती सेज-खुड़ी, लेकिन ये आम की गुठलियाँ, ये इसने तोड़ी हैं या ज़मीन से बीनकर लाई है, इस पर तो इसका नाम नहीं लिखा है सेज-खुड़ी — और बच्ची है, अगर ले भी आई तो —”

सेज-ठाकुरानी आग-बबूला होकर बोलीं — “बातें तो बड़ी काट-काटकर कर रही हो? अच्छा, मान लिया आम की गुठलियों पर नाम नहीं लिखा — पर यह तो बता सकती हो कि तुम्हारे किस बाग़ से ये आई हैं? अरे, उन रुपयों पर भी तो नाम नहीं लिखा था — उन्हें तो हाथ पसारकर ले लिया था? आज एक बरस से ऊपर हो गया, आज देंगे, कल देंगे — दोपहर में आऊँगी, पैसे दे देना — अब मैं और नहीं रख सकती — रुपयों का जुगाड़ करके रखना, मैं कहे देती हूँ।”

दल-बल समेत सेज-ठाकुरानी दरवाज़े से बाहर निकल गईं। सर्वजया ने सुना, रास्ते में किसी के पूछने पर वह काफ़ी ऊँची आवाज़ में कह रही थीं — “अरे, इसी घर की छोकरी, टुनू के बक्से से यह मोतियों की माला चुराकर ले गई और किया क्या कि अपने बक्से में छिपा लिया — और देखो न ये आम — बग़ल में ही बाग़ है, जितना मन किया तोड़ लिया — यही कहने गई थी, तो मुझे ही काट-काटकर सुना रही है (यहाँ सेज-बहू ने सर्वजया के बोलने के अंदाज़ की नक़ल की) — अरे, बच्ची है, ले आई तो ले आई — उस पर क्या तुम्हारा नाम लिखा है? (आवाज़ धीमी करके) माँ ही क्या कम चोर है, जो बेटी को ऐसी तालीम मिली है? पूरा घर ही चोरों का है —”

अपमान और दुख से सर्वजया की आँखों में आँसू आ गए। उसने लौटकर दुर्गा के रूखे बालों का गुच्छा खींचा और दाल-भात सने हाथों से ही दनादन उसकी पीठ पर घूँसों और थप्पड़ों की बरसात करते हुए कहने लगी — “पता नहीं कहाँ से यह आफ़त आ जुटी है — मर जाए तो बला टले — मरती भी नहीं कि मैं बचूँ — कलेजे को ठंडक मिले — निकल मेरे घर से, दूर हो जा — जा, अभी निकल —”

दुर्गा मार खाते-खाते डर के मारे पिछवाड़े के दरवाज़े से भागकर बाहर निकल गई। उसके रूखे बालों के टूटे हुए दो-एक गुच्छे सर्वजया के हाथ में रह गए।

अपू खाते-खाते हैरान होकर यह सारा तमाशा देख रहा था। दीदी मोतियों की माला चुराकर लाई थी या नहीं, यह वह नहीं जानता था — वह मोतियों की माला उसने इससे पहले कभी देखी भी नहीं थी — लेकिन आम की गुठलियाँ चोरी का माल नहीं थीं, यह वह ख़ुद जानता था। कल शाम को दीदी उसे अपने साथ टुनू के बगीचे में आम बीनने ले गई थी और सोनामुखी पेड़ के नीचे ये आम पड़े थे, दीदी ने ही उन्हें बीना था, उसे याद है। कल से कई बार दीदी ने कहा था — “ओ अपू, अबकी बार इन आम की गुठलियों को नमक-मिर्च लगाकर खाएँगे, ठीक है न?” लेकिन माँ के असुविधाजनक रूप से घर पर होने के कारण यह प्रस्ताव अमल में नहीं लाया जा सका था। दीदी की इतनी आशा-भरी चीज़, वे आम, इस तरह वे लोग ले गए, ऊपर से दीदी को इतनी मार भी पड़ी। दीदी के बाल नोंच लेने पर उसे माँ पर बहुत ग़ुस्सा आया। जब भी दीदी के माथे पर रूखे बालों का वह गुच्छा खड़ा होकर हवा में उड़ता है, तो न जाने क्यों, उस पर बहुत ममता उमड़ आती है — मन में एक अजीब-सा ख़याल आता है कि दीदी का यहाँ कोई नहीं है — वह जैसे कहीं और से अकेली चली आई है — उसका कोई साथी यहाँ नहीं है। बस यही मन करता है कि कैसे वह दीदी के सारे दुख दूर कर दे — उसकी सारी कमी पूरी कर दे! वह अपनी दीदी को ज़रा भी कष्ट नहीं होने देगा।

खाना खाने के बाद अपू माँ के डर से घर के अंदर बैठकर पढ़ने लगा। लेकिन उसका मन बार-बार बाहर भागा जा रहा था। जब दोपहर थोड़ी ढली, तो उसने टुनू के घर, पोटली के घर, नेड़ा के घर — एक-एक करके सभी घरों में खोजा — दीदी कहीं नहीं थी। राजकृष्ण पालित की पत्नी घाट से पानी लेकर आ रही थीं — उसने उनसे पूछा — “जेठी माँ, आपने मेरी दीदी को देखा है? उसने आज भात नहीं खाया, कुछ नहीं खाया — माँ ने उसे आज बहुत मारा है — मार खाकर कहीं भाग गई है — आपने देखा है जेठी माँ?”

घर के पास वाले रास्ते से गुज़रते हुए उसने सोचा — कहीं बाँस के बाग़ में तो नहीं बैठी होगी? उधर जाकर उसने सब-कुछ छान मारा। वह पिछवाड़े के दरवाज़े से घर में घुसा तो देखा, घर में कोई नहीं है। उसकी माँ शायद घाट या कहीं और गई थी। घर में शाम की छाया उतर आई थी। सामने के दरवाज़े के पास जो बाँस की झाड़ी झुकी हुई थी, उसकी एक लटकती सूखी टहनी पर उसकी जानी-पहचानी लंबी पूँछ वाली पीली चिड़िया आकर बैठी थी। रोज़ शाम होने से कुछ पहले वह न जाने कहाँ से आकर उसी बाँस की झाड़ी की उसी टहनी पर बैठता है — रोज़… रोज़… रोज़। और भी कितने ही पंछी चारों ओर के वनों में चहचहा रहे थे। नीलमणि राय की उजाड़ भिटा पेड़-पौधों की घनी छाया से भर गई थी। अपू ने बरामदे में खड़े होकर दूर उस पीपल के पेड़ की चोटी की तरफ़ देखा — थोड़ी-थोड़ी सुर्ख़ धूप अभी भी पेड़ के सिर पर लगी थी, सबसे ऊँची डाल पर कोई सफ़ेद-सी चीज़ डोल रही थी, या तो बगुला था, या किसी की कटी पतंग अटककर झूल रही थी — सारा आसमान जैसे छाया और अँधेरे में डूबता जा रहा था। चारों ओर सुनसान था… कोई कहीं नहीं था… नीलमणि राय के उजाड़ भिटा पर अरबी के झुरमुट में काले-घने हरे नए पत्ते चमक रहे थे। उसका मन अचानक हूक-सा उठा। कितना वक़्त हो गया, वह तब से गई है, घर नहीं आई — कहाँ चली गई दीदी?

भुवन मुखर्जी के घर के लड़के-लड़कियाँ मिलकर आँगन में दौड़-भागकर लुका-छिपी खेल रहे थे। रानू उसे देखकर दौड़कर आई — “भाई, अपू आया है… ओ, यह हमारी तरफ़ होगा, आ जा रे अपू।”

अपू ने उसका हाथ छुड़ाकर पूछा — “मैं नहीं खेलूँगा रानू दी, तुमने दीदी को देखा है?”

रानू ने पूछा — “दुर्गा को? नहीं, उसे तो नहीं देखा! बकुल-तले पर तो नहीं है?”

बकुल-तले की बात तो उसे याद ही नहीं आई थी। वहाँ दुर्गा अक्सर रहती तो है। भुवन मुखर्जी के घर से वह बकुल-तले गया। शाम घिर आई थी। बकुल का पेड़ बहुत दूर तक अपनी डालियाँ फैलाए झबरीला-सा खड़ा था — उसके नीचे अँधेरा था। कोई कहीं नहीं था… शायद किसी पेड़-पौधे की आड़ में हो! उसने आवाज़ दी — “दीदी, ओ दीदी! दीदी?”

अँधेरे पेड़ पर बस कुछ बगुले पंख फड़फड़ा रहे थे। अपू ने डरते-डरते ऊपर की ओर देखा। बकुल-तले से थोड़ी दूर पोखर के किनारे खजूर का पेड़ है, अभी अधपके खजूरों का समय है, वहाँ उसकी दीदी कभी-कभी रहती तो है। लेकिन अँधेरा हो गया था, पोखर के दोनों ओर बाँस के जंगल थे, वहाँ जाकर देखने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। बकुल के पेड़ के तने के पास जाकर उसने दो-एक बार ज़ोर से पुकारा — भाँट-सेओड़ा की झाड़ी में कोई जानवर उसकी आवाज़ सुनकर खस-खस करता हुआ पोखर की ओर भाग गया।

घर के रास्ते पर लौटते-लौटते वह अचानक ठिठककर खड़ा हो गया। सामने वही गाब का पेड़ था। अकेले शाम के बाद इस गाब के पेड़ के नीचे से गुज़रना! सर्बनाश! रोंगटे खड़े हो जाते हैं। क्यों उसे इस पेड़ के नीचे से गुज़रने में डर लगता है, वह नहीं जानता। कोई कारण नहीं, बस यूँ ही डर लगता है, और चूँकि कोई कारण नहीं है, इसलिए डर और भी ज़्यादा लगता है। इतनी देर तक वह कभी घर से बाहर नहीं रहा था — आज उसे इसका ध्यान ही नहीं रहा। अगर मन व्यस्त और अनमना न होता, तो वह इस रास्ते से कभी नहीं आता।

अपू कुछ देर अँधेरे गाब-तले की ओर देखता हुआ खड़ा रहा, फिर मुड़ गया। उनके घर जाने का एक और रास्ता था — थोड़ा घूमकर पोटली के घर के आँगन से होकर जाने पर गाब-तले के इस अनजाने भय से छुटकारा मिल सकता था।

पोटली की दादी शाम के वक़्त घर के बरामदे में बच्चों को लेकर हवा में बैठी कहानियाँ सुना रही थीं। पोटली की माँ रसोई में खाना बना रही थीं। आँगन में मचान के नीचे विधु जेलेनी खड़ी होकर मछली बेचने के पैसे माँग रही थी।

अपू बोला — “मैं दीदी को खोजने गया था दादी माँ, बकुल-तले से आ रहा था तो —”

दादी माँ बोलीं — “दुर्गा तो अभी-अभी घर गई है। बस थोड़ी ही देर हुई है गए हुए — दौड़कर जा तो ज़रा — शायद अभी घर पहुँची भी न हो।”

वह एक दौड़ में घर की ओर भागा। पीछे से पोटली की बहन राजी ने चिल्लाकर कहा — “कल सुबह आना अपू — हमने गंगा-यमुना खेलने के लिए नया घर बनाया है! ढेंकीशाल के पीछे, नीम-तले! दुर्गा को बता देना —”

अपने घर के पास पहुँचकर वह अचानक ठिठक गया — दुर्गा दर्द भरी चीख़ मारते हुए घर के दरवाज़े से बाहर भाग रही थी — पीछे-पीछे उसकी माँ हाथ में कुछ लिए मारने के लिए उसे खदेड़ती हुई दौड़ी आ रही थी। दुर्गा गाब-तले वाले रास्ते से भाग गई, माँ ने दरवाज़े से भागती हुई बेटी के पीछे चिल्लाकर कहा — “जा, निकल जा — एकदम हमेशा के लिए जा — फिर कभी इस घर में क़दम मत रखना — बला, आफ़त टल जाए — जाकर छातिमतला में ही छोड़ आती हूँ।”

छातिमतला गाँव का श्मशान था। अपू का पूरा शरीर जैसे जम कर पत्थर-सा सख़्त और भारी हो गया। उसकी माँ अभी-अभी अंदर के घर में घुसकर मिट्टी का दीया बरामदे के किनारे से उठा रही थी। वह दबे पाँव घर में घुसा तो माँ ने उसकी ओर देखकर कहा — “और तुम इतनी रात तक कहाँ थे, सुनूँ ज़रा? आज तो बस नाम के लिए भात खाया है?”

उसके मन में कई सवाल उठ रहे थे। दीदी को फिर मार क्यों पड़ी? वह इतनी देर कहाँ थी? दोपहर में दीदी ने क्या खाया? क्या वह फिर कोई चीज़ चुराकर ले आई थी? लेकिन डर के मारे बिना कुछ बोले वह एक मशीन की गुड़िया की तरह माँ के कहे अनुसार काम करके कमरे में घुस गया। फिर डरते-डरते दीये की लौ तेज़ करके अपनी छोटी-सी किताबों की गठरी निकालकर पढ़ने बैठ गया। वह पढ़ता तो सिर्फ़ तीसरी पोथी था — लेकिन उसकी गठरी में दो मोटी-मोटी भारी अंग्रेज़ी की किताबें, कविराजी दवाओं की सूची, एक पन्ने-फटी दाशु राय की पांचाली, एक १३०३ साल का पुराना पंचांग वगैरह थे। उसने अलग-अलग जगहों से माँगकर ये चीज़ें जुटाई थीं और भले ही वह इन्हें पढ़ नहीं पाता था, पर रोज़ एक बार खोलकर देखता ज़रूर था।

कुछ देर दीवार की ओर ताककर वह कुछ सोचता रहा। फिर एक बार दीये की लौ तेज़ करके उसने पन्ने-फटी दाशु राय की पांचाली खोली और अनमने भाव से पन्ने पलटने लगा, तभी सर्वजया एक कटोरी दूध हाथ में लिए अंदर आई और बोली — “आओ, पी लो तो ज़रा!”

अपू ने बिना कुछ कहे कटोरी उठाकर दूध पीने लगा। किसी और दिन होता तो इतनी आसानी से उसे दूध पीने के लिए मनाना बहुत मुश्किल होता। थोड़ा-सा पीकर ही उसने कटोरी मुँह से हटा ली। सर्वजया बोली — “यह क्या? चलो, पूरा पी जाओ — बस इतना-सा दूध छोड़ दोगे तो क्या खाकर जियोगे —”

अपू ने बिना किसी विरोध के दूध की कटोरी दोबारा मुँह से लगा ली। सर्वजया ने देखा कि वह कटोरी मुँह से लगाए तो है, पर घूँट नहीं भर रहा — कटोरी-समेत उसका हाथ काँप रहा था… फिर बहुत देर तक मुँह से लगाए रखने के बाद अचानक कटोरी नीचे रखकर वह माँ की ओर देखकर डर से रो पड़ा। सर्वजया हैरान होकर बोली — “क्या हुआ रे? क्या हुआ, जीभ काट ली क्या?”

अपू ने माँ की बात पूरी होने का इंतज़ार नहीं किया और डर का बाँध तोड़कर सुबक-सुबक कर रोते हुए बोला — “दीदी के लिए मन बहुत बेचैन है!...”

सर्वजया पल भर चुप बैठी रही, फिर पास आकर बेटे के बदन पर हाथ फेरते हुए शांत स्वर में कहने लगी — “मत रो, ऐसे मत रो, बेटा — वहीं पोटली या नेड़ा के घर बैठी होगी — अँधेरे में कहाँ जाएगी? कम शैतान लड़की है क्या? दोपहर को जो निकली — तो पूरे दिन में फिर उसकी चोटी तक नहीं दिखी — न खाना, न पीना, कहीं उस पाड़े में पालितों के बाग़ में बैठी थी, वहाँ बैठकर कच्चे आम और जामरूल खाए हैं, अभी बुलवाने भेजती हूँ — मत रो ऐसे — फिर से बुखार आ जाएगा — छिः!”

फिर उसने आँचल से बेटे के आँसू पोंछे और बचा हुआ दूध पिलाने के लिए कटोरी उसके मुँह की ओर बढ़ाई — “हाँ कर तो ज़रा, मेरा लच्छी सोना, तेरे बाबूजी आते ही उसे बुला लाएँगे — एकदम पागल है — कहाँ से एक पागल आकर पैदा हो गया है — बस एक घूँट और — हाँ —”

रात काफ़ी हो चुकी थी। उत्तरी कमरे में तख़्त पर अपू और दुर्गा सोए हुए थे। अपू के बगल में उसकी माँ के सोने की जगह खाली थी, क्योंकि माँ अभी तक रसोई का काम निपटाकर नहीं आई थी।

उसके पिताजी भोजन आदि करके बगल के कमरे में बैठकर तमाकू पी रहे थे। पिताजी घर आकर दुर्गा को मुहल्ले से ढूँढ़कर ले आए थे।

घर आने के बाद से दुर्गा ने किसी से कोई बात नहीं की थी। खाना-पीना निपटाकर आकर चुपचाप लेट गई थी। अपू ने दुर्गा के बदन पर हाथ रखकर पूछा — “दीदी, माँ ने शाम को किस चीज़ से मारा था रे? तेरे बाल नोंच लिए थे?”

दुर्गा के मुँह में कोई बात नहीं थी।

उसने दोबारा पूछा — “मुझसे नाराज़ है क्या दीदी? मैंने तो कुछ नहीं किया।”

दुर्गा ने धीरे से कहा — “हाँ, नहीं किया! तो फिर सतू को कैसे पता चला कि मोतियों की माला मेरे बक्से में है?”

अपू विरोध के जोश में उठकर बैठ गया — “नहीं — सच कह रहा हूँ दीदी, तेरी क़सम, मैंने नहीं दिखाया। मुझे तो पता भी नहीं था कि तेरे बक्से में है — कल सतू दोपहर बाद आया था, हम उसके उस बड़े वाले लाल भाँटे से खेल रहे थे — उसके बाद, समझी दीदी, सतू तेरा गुड़ियों का बक्सा खोलकर कुछ देख रहा था — मैंने कहा, भाई, तुम मेरी दीदी के बक्से में हाथ मत लगाओ, दीदी मुझे डाँटेगी — उसी समय उसने देखा होगा —”

फिर उसने दुर्गा के बदन पर हाथ फेरते हुए कहा — “बहुत लगी है क्या, दीदी? माँ ने कहाँ मारा है?”

दुर्गा बोली — “मेरे कान के पास माँ ने जो एक चोट मारी है — ख़ून निकल आया था, अभी भी कन-कन कर रहा है, यहाँ पर, यह देख हाथ रखकर! यह —”

“यहाँ? हाँ रे! कट गया है क्या? थोड़ा दीये का तेल लगा दूँ दीदी?”

“रहने दे — कल दोपहर बाद पालितों के बाग़ में चलेंगे, समझा? कमरख खूब पक गए हैं! इतने बड़े-बड़े, किसी से कहना मत! तू और मैं, बस हम दोनों चुपके से जाएँगे। मैंने आज दोपहर में दो तोड़कर खाए हैं — एकदम गुड़-जैसे मीठे —”

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