किंतु इतनी दूर आता कौन? सुनकर दीनू चक्रवर्ती का बड़ा बेटा फणी यह देखने आया था कि माजरा क्या है।
इन्दिर ठाकरुण की मृत्यु के बाद चार-पाँच बरस बीत चुके थे। माघ महीने का अंत था, सर्दी अभी बनी हुई थी। दोनों ओर झाड़-झंखाड़ से घिरी एक सँकरी कच्ची पगडंडी से होते हुए निश्चिन्दिपुर के कुछ लोग सरस्वती पूजा की शाम को गाँव के बाहर वाले मैदान में नीलकंठ पक्षी देखने जा रहे थे।
दल में से एक ने कहा, "क्यों भई हरि, भूषण ग्वाले का वो केले का बागान क्या तुम लोगों ने फिर से पट्टे पर दे दिया है?"
जिस व्यक्ति को संबोधित करके यह कहा गया था, उसे देखकर कोई कह नहीं सकता था कि यह वही दस बरस पहले वाला हरिहर राय है। अब वह अधेड़, पूरा-पूरा गृहस्थ, बाल-बच्चों का बाप हरिहर लगान वसूलने गाँव-गाँव घूमता, पुरखों के ज़माने के यजमानों के घर ढूँढ़-ढूँढ़कर गुरुगिरी चलाता, हाट-बाज़ार में छप्पर छाने वाले के साथ झींगा और परवल का मोल-भाव करता घूमता। पहले के उस बेफ़िक्र, मुक्तप्राण, घुमक्कड़ युवक हरिहर से उसका कोई मेल नहीं था। धीरे-धीरे पश्चिम का वह जीवन बहुत दूर छूट गया था—चुनार के क़िले की चौड़ी प्राचीर पर बैठकर दूर पहाड़ों का सूर्यास्त देखना, केदारनाथ के रास्ते तेजपात के वनों में रात बिताना, शाह क़ासिम सुलेमानी की दरगाह के बाग़ से खट्टे संतरे तोड़कर खाना, पिघली चाँदी की धारा-सी पारदर्शी, उजली, हिम-शीतल स्वर्ग-नदी अलकनंदा, दशाश्वमेध घाट के किनारे की रौनक—कुछ-कुछ याद आता, मानो बहुत दिन पहले देखा कोई सपना हो।
हरिहर हामी भरते हुए कुछ कहने ही वाला था कि पीछे मुड़कर बोला, "लड़का फिर कहाँ रह गया? ओ खोका, खोका-आ-आ!"
रास्ते के मोड़ की ओट से छह-सात साल का एक गोरा-चिट्टा, सुंदर, छरहरे बदन का लड़का दौड़ता हुआ आया और दल के साथ हो लिया। हरिहर बोला, "इतनी ही देर में फिर पीछे रह गए? चलो, आगे बढ़ो।"
लड़के ने कहा, "जंगल के अंदर क्या गया बाबा? बड़े-बड़े कान?"
हरिहर ने सवाल पर कोई ध्यान न देकर नवीन पालित के साथ मछली पकड़ने की योजना बनानी शुरू कर दी।
हरिहर के बेटे ने फिर से उत्सुकता भरे स्वर में पूछा, "क्या दौड़कर गया बाबा जंगल में? बड़े-बड़े कान?"
हरिहर बोला, "क्या जानें बेटा, मैं तो तुम्हारे सवालों का जवाब देते-देते हार गया। जब से निकले हो, बस यही शुरू है—यह क्या है, वो क्या है—जंगल में क्या गया, यह मैंने क्या देखा है? चलो, आगे बढ़ो तो।"
बालक पिता की बात सुनकर आगे-आगे चलने लगा।
नवीन पालित बोला, "एक काम करो हरि, अगर मछली ही पकड़नी है, तो किसी दिन बयँशा के बील में चला जाए—पूरब पाड़ा का नेपाल पाड़ुई जाल डलवा रहा है, रोज़ डेढ़-दो मन निकल रही हैं—पाँच सेर से नीचे की तो कोई मछली ही नहीं! सुना है, एक दिन पिछली रात को बील के एकदम बीच अथाह पानी में साँय-साँय करके ठीक जैसे बछिया रँभाती है—समझे?"
सब लोग एक साथ आगे आकर नवीन पालित के चेहरे की ओर ताकने लगे।
"—बहुत पुरानी बील है, गहरा पानी, देखा तो है तुमने, बीच में पानी मानो काला शीशम घोला हो, कमल के पौधों का जंगल, कोई कहता है राघो बोआल है, कोई कहता है यक्षिणी—जब तक पौ न फटी, तब तक तो साहब, नाव पर बैठे सब लोग थर-थर काँपते रहे।"
बात अच्छी जम गई थी, कि अचानक हरिहर के बेटे ने बड़े उत्साह में पास की एक उलू-घास की झाड़ी की ओर उँगली उठाकर चिल्लाते हुए दौड़ लगाई—"वो जा रहा है बाबा, देखो बाबा, वो गया बाबा, बड़े-बड़े कान, वो!"
उसके पिता ने पीछे से आवाज़ दी, "उँहुँ उँहुँ उँहुँ, काँटे-काँटे-काँटे—" फिर जल्दी से आकर खप से बेटे का हाथ पकड़ लिया और बोला, "आह, तुमने तो बहुत परेशान कर दिया, देख रहा हूँ। सौ बार मना कर रहा हूँ, पर तुम सुनोगे ही नहीं। इसीलिए तो तुम्हें लाना नहीं चाह रहा था।"
बालक ने उत्साह और जिज्ञासा से चमकता चेहरा ऊपर उठाकर पिता की ओर देखा और पूछा, "क्या था बाबा?"
हरिहर बोला, "क्या था, सो मैंने क्या देखा है! सूअर-वूअर होगा—चलो अब, ठीक सड़क के बीच से चलो—"
"—सूअर नहीं बाबा, छोटा-सा तो था!" फिर वह झुककर उस चीज़ की ज़मीन से ऊँचाई दिखाने लगा।
"—चल चल—हाँ, मैं समझ गया, अब दिखाने की ज़रूरत नहीं—चल तो ज़रा!..."
नवीन पालित बोला, "अरे वो तो खरगोश है, खोका, खरगोश। यहाँ खरपतवार की झाड़ियों में खरगोश रहते हैं, वही है।"
बालक ने वर्ण-परिचय में 'ख' से खरगोश की तस्वीर देखी थी, लेकिन वह जीता-जागता इस तरह उछलकर भागता है या उसे अपनी आँखों से देखा भी जा सकता है, यह बात उसने कभी सोची न थी।
खरगोश! जीता-जागता!—एकदम तुम्हारे सामने उछलकर भागता हुआ;—तस्वीर नहीं, काँच का खिलौना नहीं—एकदम कान खड़े किए असली खरगोश! ऐसे ही भँट और बैंची के पेड़ों की झाड़ियों में!—जल-मिट्टी से बनी इस नश्वर पृथ्वी पर यह घटना कैसे संभव हुई, बालक यह किसी भी तरह सोचकर थाह नहीं पा रहा था।
सब लोग वनों से घिरी सँकरी पगडंडी छोड़कर मैदान में आ गए। नदी के किनारे बबूल और जिवल के पेड़ों की ओट में ईंटों के एक बड़े ढेर जैसी चीज़ नज़र आती है, वह पुराने ज़माने की नीलकुठि के भट्ठी-घर का भग्नावशेष है। उस ज़माने में, नीलकुठि के दिनों में, यह निश्चिन्दिपुर 'बंगाल इंडिगो कंसर्न' की हेड कुठि हुआ करती थी, और इस इलाके की चौदह कोठियों पर निश्चिन्दिपुर कुठि का मैनेजर जॉन लार्मर प्रचंड प्रताप से राज करता था। अब कुठि का टूटा हौद, भट्ठी-घर, साहब का बँगला, दफ़्तर—सब जंगल से ढँके ईंटों के ढेर में बदल गए हैं। जिस महाप्रतापी लार्मर साहब के नाम से कभी इस इलाके में बाघ और बकरी एक घाट पानी पीते थे, आजकल दो-एक बहुत बूढ़े लोगों को छोड़कर कोई उसका नाम तक नहीं जानता।
मैदान की झाड़ियाँ उलू-घास, बन-कलमी, अमलतास और बेर के पेड़ों से भरी थीं। कलमी की लताओं ने सारी झाड़ियों की चोटियों को बड़े-बड़े हरे पत्तों से बिछाकर ढक दिया था—उनके भीतर स्निग्ध छाँव थी, जहाँ छोटी ग्वाली, नटकाँटा और नीली वन-अपराजिता के फूल सूरज की ओर मुँह उठाए खिले हुए थे। ढलती बेला की छाँव में वनभूमि की स्निग्ध श्यामल हरियाली, पंछियों का कलरव, चारों ओर प्रकृति के मुक्त हाथों से बिखरी हुई दौलत, किसी राजा के भंडार जैसा दान, कहीं भी ज़रा-सी दरिद्रता का निशान ढूँढ़ने की कोशिश नहीं, कोई मध्यवर्गीय कंजूसी नहीं। दिन ढलने के इंद्रजाल ने खेत, नदी और वन को मायामय बना दिया था।
मैदान में घूमते-घूमते नवीन पालित महाशय यह कहानी सुनाने लगे कि कैसे एक बार उन्होंने इसी मैदान के उत्तरी हिस्से की ज़मीन पर शकरकंद की खेती करके ख़ूब लाभ कमाया था। एक व्यक्ति बोला, "सुन रहा था कि कुठि की ईंटें बिकेंगी, नवाबगंज का मोती दाँ नाकि मोल-भाव कर रहा है।" मोती दाँ की बात पर यह चर्चा छिड़ गई कि कैसे वह मामूली हालत से इतना अमीर बन गया। फिर धीरे-धीरे बात आज के ज़माने की महँगाई, आषाढ़ के बाज़ार में कुंडू लोगों की किराने की दुकान जल जाने, और गाँव के दीनू गांगुली की बेटी की शादी की तारीख़ कब पड़ी है, जैसे कई ज़रूरी समाचारों के आदान-प्रदान तक जा पहुँची।
हरिहर के बेटे ने कहा, "नीलकंठ पक्षी कहाँ है बाबा?"
"—अभी देखो; बबूल के पेड़ पर अभी आकर बैठेंगे—"
बालक मुँह ऊपर उठाकर पास के सभी बबूल के पेड़ों की फुनगियों की ओर देखने लगा। मैदान में इधर-उधर नीचे-नीचे बेर के पेड़ों पर बहुत-से बेर पके हुए थे, बालक आश्चर्य और लालच भरी नज़रों से उधर ताकता रहा। कई बार बेर तोड़ने जाकर उसे पिता की डाँट सुनकर रुकना पड़ा। इतने छोटे पेड़ पर बेर लगते हैं? उनके मोहल्ले में जो बेर का पेड़ है, वह बहुत ऊँचा है, इसलिए इच्छा होने पर भी वह कुछ कर नहीं पाता। भारी अँकुसी दोनों हाथों से जकड़कर भी वह उठा नहीं पाता, और अपथ्य की चीज़ें छिपाकर खाना कितना मुश्किल हो जाता है—यह वह जानता है। ख़बर पाते ही माँ आकर उसे पकड़कर घर ले जाती है और कहती है—"हे भगवान, मेरा क्या होगा! इतने दुष्ट हो गए हो तुम? अभी उस दिन बुखार से उठे हो और आज सीधे बेर के पेड़ के नीचे घूम रहे हो! ज़रा-सी पीठ फेरी नहीं कि देखा घर में नहीं हो! कितने बेर खाए हैं, मुँह दिखा तो ज़रा?"
वह कहता है, "बेर तो नहीं खाए माँ, नीचे एक भी बेर नहीं पड़ा है, मैं क्या तोड़ सकता हूँ?"
फिर वह अपना लाल-लाल मुँह माँ के बहुत पास ले जाकर हाँ कर देता है। उसकी माँ अच्छी तरह देखकर बेटे के मक्खन-सी महक वाले सुंदर मुख को चूमकर कहती है—"कभी मत खाना, समझे खोका! तुम्हारी तबीयत ठीक हो जाए, मैं बेर बीनकर अचार बनाकर मर्तबान में रख दूँगी—वही बैसाख-जेठ में खाना; छिप-छिपकर कभी मत खाना—ठीक है न?"
हरिहर बोला, "कुठि-कुठि कह रहे थे न, वो देखो खोका, साहबों की कुठि, देखी?"
नदी के किनारे का एक बड़ा हिस्सा घेरे हुए पुराने ज़माने की वह कुठि जहाँ प्रागैतिहासिक युग के किसी विशाल हिंसक जंतु के कंकाल-सी पड़ी थी, गतिशील समय का प्रतीक, उस निर्जन सर्द दोपहर ने धीरे-धीरे उस पर अपनी धूसर चादर फैला दी।
कुठि के अहाते से कुछ दूर कुठिवाले लार्मर साहब के एक शिशु-पुत्र की समाधि लावारिस और जंगल से घिरी हालत में पड़ी है। बंगाल इंडिगो कंसर्न की विशाल हेडकुठि के इस एक टुकड़े के अलावा कोई और चिह्न अब साबुत ज़मीन पर खड़ा नहीं है। पास जाने पर बहुत पुराने काले पत्थर की पटिया पर अब भी पढ़ा जा सकता है—
Here lies Edwin Lermor,
The only son of John & Mrs. Lermor,
Born May 13, 1853, Died April 27, 1860.
दूसरे पेड़-पौधों के बीच एक जंगली अमलतास का पेड़ उस पर अपनी शाखाओं और पत्तों की छाया फैलाकर बढ़ गया है, चैत-बैसाख में अढ़ाई-बाँकी के मुहाने से बहती तेज़ हवा में उसके पीले फूलों के गुच्छे दिन-रात उस भूले-बिसरे विदेशी शिशु की टूटी-फूटी समाधि पर ढेरों फूल बरसाते रहते हैं। सब लोग भले ही भूल गए हों, पर वन के पेड़-पौधों ने उस शिशु को अब तक नहीं भुलाया था।
बालक आश्चर्य से चारों ओर ताक रहा था। अपने छह साल के जीवन में यह पहली बार था कि वह घर से इतनी दूर आया था। अब तक नेड़ा लोगों का घर, अपने घर का आँगन, ज़्यादा-से-ज़्यादा रानू दीदी का घर, यही उसकी दुनिया की सीमा थी। बस कभी-कभार अपने मोहल्ले के घाट पर माँ के साथ नहाने आकर वह स्नान-घाट से धुँधला-सा दिखने वाले कुठि के टूटे भट्ठी-घर की ओर ताकता—उँगली से दिखाकर कहता, "माँ, उधर क्या वही कुठि है?" उसने अपने बाबा के मुँह से, दीदी के मुँह से, और मोहल्ले के कितने ही लोगों के मुँह से कुठि के मैदान की बातें सुनी थीं, पर आज वह पहली बार वहाँ आया था! क्या उस खेत के पार माँ के मुँह से सुनी परिकथाओं का वही राज्य है? श्याम-लंका के देश में बेंगमा-बेंगमी के पेड़ के नीचे, जहाँ निर्वासित राजकुमार अपनी बगल में तलवार रखे अकेला सोकर रात काटता है? उधर अब इंसानों की बस्ती नहीं है, दुनिया की आखिरी सीमा यही है। इसके बाद से ही असंभव का देश, अनजान का देश शुरू होता है।
घर लौटते समय उसने रास्ते के किनारे एक नीची झाड़ी से एक चमकीले रंग के फल का गुच्छा तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया। उसके पिता ने कहा, "अरे-अरे, हाथ मत लगाना, हाथ मत लगाना—अलकुशी है, अलकुशी! क्या करते हो तुम बेटा! बहुत तंग किया तुमने, देख रहा हूँ। आज के बाद तुम्हें कहीं साथ लेकर नहीं निकलूँगा, कह दिया—अभी हाथ में खुजली होकर फफोले पड़ जाएँगे—रास्ते के बीच से चलने को इतनी बार कह रहा हूँ—पर तुम सुनोगे ही नहीं।"
"हाथ में खुजली क्यों होगी, बाबा?"
"—खुजली होगी, ज़हर है ज़हर—अलकुशी को कोई हाथ लगाता है भला? उसके रोएँ चुभकर अभी रि-रि करके जलन होगी—तब तुम चिल्लाना शुरू करोगे।"
गाँव के बीच से होते हुए हरिहर बेटे को साथ लिए पिछवाड़े के दरवाज़े से घर में दाख़िल हुआ। सर्वजया पिछवाड़े का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर बाहर आई और बोली—"लो, इतनी रात हो गई! और तुम इन्हें ले गए हो, न तन पर एक दोलाई है, न कुछ!"
हरिहर बोला, "आह, ले जाकर जो मुसीबत हुई! इधर जाता है, उधर जाता है, सँभाले नहीं सँभलता—अलकुशी का फल पकड़कर खींचने चला था।" फिर बेटे की ओर देखकर बोला, "‘कुठि का मैदान देखूँगा, कुठि का मैदान देखूँगा’—क्यों, हो गई कुठि के मैदान की सैर?"
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