हरिहर राय के पूर्वजों का मूल निवास यशड़ा-विष्णुपुर था। वहाँ के प्राचीन धनी चौधरी-वंश ने जिन कुछेक ब्राह्मण परिवारों को कर-मुक्त भूमि दान देकर अपने गाँव में बसाया था, हरिहर के पुरखे विष्णुराम राय उन्हीं में से एक थे।
ब्रिटिश शासन ने तब तक देश में अपनी जड़ें मज़बूती से नहीं जमाई थीं। आवागमन के मार्ग घोर विपदाकुल और ठगों, ठैंगाड़ों, जल-दस्युओं आदि से भरे रहते थे। डाकुओं के ये दल प्रायः ग्वाला, बागदी या बाउरी जाति के लोग होते थे। वे अत्यंत बलवान और लाठी तथा भाला चलाने में सुनिपुण थे। कई गाँवों के निर्जन छोर पर उनके द्वारा स्थापित डाकातों की काली के मंदिरों के चिह्न आज भी मौजूद हैं। दिन के उजाले में वे भलेमानुष बनकर घूमते थे, और रात में काली-पूजा करके दूर किसी गाँव में गृहस्थों के घर लूटने निकल पड़ते थे। उस ज़माने में कई समृद्धिशाली गृहस्थ भी डकैती करके धन-संचय किया करते थे। जो लोग प्राचीन बंगाल के इतिहास से परिचित हैं, वे यह भी जानते हैं कि बंगाल के कई ज़मींदारों और सम्पन्न गृहस्थों की सम्पत्ति की नींव, पुरखों द्वारा संचित यही लूटा हुआ धन-रत्न था।
विष्णुराम राय के बेटे बीरू राय की ऐसी ही कुख्याति थी। उनके अधीन वेतन पर काम करने वाले ठैंगाड़े रहते थे। निश्चिंदिपुर गाँव के उत्तर में जो कच्ची सड़क उधर चुआडांगा से निकलकर नवाबगंज होते हुए टाकी तक चली गई है, उसी सड़क के किनारे, दूर-दूर तक फैले सोनाडांगा के विशाल मैदान के बीच, ठाकुरझी नामक एक पुराने ज़माने के बड़े तालाब के पास ही उन ठैंगाड़ों का अड्डा था। तालाब के किनारे एक प्रकांड वटवृक्ष की ओट में वे छिपे रहते थे और निरपराध पथिकों को मारकर उनका सर्वस्व हर लेते थे। ठैंगाड़ों की कार्य-प्रणाली बड़ी अद्भुत थी। वे राह चलते लोगों के सिर पर पहले लाठी का प्रहार करके उसे मार डालते, उसके बाद ही उसके पास धन की खोज करते। मार डालने के बाद ऐसी घटना भी कोई अनोखी नहीं थी कि पता चले, मारे गए व्यक्ति के पास एक धेला भी नहीं था। लाश को तालाब के भीतर ठूँसकर, ठैंगाड़े अपने इस व्यर्थ श्रम की भरपाई अगले शिकार से कर लेने की आशा में, निरीह मुख बनाए तालाब के किनारे पेड़ के नीचे लौट जाते। गाँव के उत्तर में उस विशाल मैदान के बीच वह वटवृक्ष आज भी है, और सड़क के किनारे की एक अपेक्षाकृत नीची भूमि को आज भी ठाकुरझी तालाब कहते हैं। तालाब का कोई विशेष चिह्न अब नहीं बचा है, वह चौदह आना पट चुका है—धान की खेती के समय किसानों के हल की फाल से उस नीची ज़मीन में आज भी कभी-कभी नर-मुंड निकल आते हैं।
सुना जाता है कि पूर्वी देश का एक वृद्ध ब्राह्मण अपने बालक-पुत्र के साथ कालीगंज अंचल से टाकी-श्रीपुर की ओर अपने देश लौट रहा था। कार्तिक मास का अंत था। कन्या के विवाह हेतु धन-संग्रह करने के लिए ब्राह्मण परदेस निकला था, और साथ में कुछ धन और सामान भी था। हरिदासपुर के बाज़ार की चट्टी में रसोई-पानी करके वे दोपहर के कुछ बाद फिर से राह पर निकल पड़े थे। इच्छा थी कि आगे पाँच कोस दूर नवाबगंज बाज़ार की चट्टी में रात्रि-विश्राम करेंगे। मार्ग के संकटों से वे अनभिज्ञ न थे, पर अंदाज़ में कैसी भूल हो गई—कार्तिक के छोटे दिन, नवाबगंज बाज़ार पहुँचने से बहुत पहले ही सोनाडांगा के मैदान में सूरज को डूबता देख वे तेज़ क़दमों से चलने लगे। किंतु ठाकुरझी तालाब के पास आते ही वे ठैंगाड़ों के हाथ पड़ गए।
दस्युओं ने जैसे ही ब्राह्मण के सिर पर लाठी का पहला वार किया, वह प्राण-भय से चीत्कार करता हुआ सड़क छोड़कर मैदान की ओर भागा, और बेटा भी पिता के पीछे-पीछे भागा। लेकिन एक बूढ़ा और दूसरा बालक—ठैंगाड़ों के साथ कितनी देर दौड़ लगा पाते? कुछ ही देर में उन्होंने आकर अपने शिकार को घेर लिया। कहते हैं, उस असहाय ब्राह्मण ने प्रस्ताव रखा कि उसे मार डालें तो कोई हर्ज नहीं, पर उसके पुत्र को जीवन-दान दे दें—वह वंश का एकमात्र पुत्र है, उसके बिना पिंडदान तक लोप हो जाएगा, इत्यादि। संयोगवश, कहते हैं कि उस दिन बीरू राय स्वयं भी उस दल में उपस्थित था। ब्राह्मण के रूप में पहचानकर, प्राणों से भयभीत उस वृद्ध ने उसके हाथ-पैर पकड़कर कम-से-कम पुत्र के प्राण बचाने के लिए बहुत कातर विनती की—किंतु सरल ब्राह्मण यह नहीं समझ सका कि उसके वंश में पिंडदान के लोप हो जाने की आशंका से किसी और के सिर में दर्द क्यों होने लगा; उलटे, उन्हें छोड़ देने पर तो ठैंगाड़ों के दल के लिए दूसरे तरह की आशंका के कारण थे। संध्या के अंधकार में, उस अभागे पिता-पुत्र के शवों को एक साथ, हेमंत की ठंडी रात में ठाकुरझी तालाब के जल में टोकापाना और श्यामाघास के जाल के नीचे दफ़ना देने की व्यवस्था करके बीरू राय घर लौट आया।
इस घटना के बहुत दिन बाद नहीं, ठीक अगले ही बरस पूजा के समय। बंगला सन् १२३८ की बात है। बीरू राय सपरिवार नौका से अपने ससुराल, हलुदबेड़े से लौट रहा था। नकीपुर के नीचे वाली बड़ी खारी नदी पार करके मधुमती में पड़ने के बाद, दो दिन ज्वार का साथ लेकर उन्हें दक्षिण श्रीपुर के पास इच्छामती में पहुँचना होता। वहाँ से गाँव का रास्ता और चार दिन का था।
दिन भर नाव खेने के बाद अपराह्न में टाकी के घाट पर नौका लगी। घर में पूजा होती थी। टाकी के बाज़ार से पूजा की सामग्री ख़रीदकर, रात में वहीं ठहरने के बाद, भोर होते ही नौका छोड़कर सब देश की ओर रवाना हो गए। दो दिन बाद, संध्या के समय धवलचित की बड़ी नहर और इच्छामती के मुहाने पर एक निर्जन चर पर ज्वार की प्रतीक्षा में नौका लगाकर रसोई की तैयारी होने लगी। बड़ा-सा चर था, बीच-बीच में कास की झाड़ियों के सिवा और कोई पेड़-पौधा नहीं। एक स्थान पर मल्लाह और दूसरी जगह बीरू राय की पत्नी ने रसोई चढ़ाई थी। सभी के मन प्रसन्न थे, दो दिन बाद ही देश पहुँच जाएँगे। विशेषकर पूजा निकट थी, उसका आनंद तो था ही।
चाँदनी रात थी। खारे पानी की नदी का जल झिलमिला रहा था। सनसनाती हवा में, चर पर उगे कास के फूलों के गुच्छे आकाश, चाँदनी और मुहाने के जल को एकाकार करते हुए उड़ रहे थे। अचानक किसी चीज़ की आवाज़ सुनकर दो-एक मल्लाह रसोई छोड़कर उठ खड़े हुए और चारों ओर देखने लगे। कास की झाड़ी की ओट में जैसे कोई खलबली मची हो, एक भयभीत कंठ एक बार अस्पष्ट-सा चीख़कर तुरंत ही शांत हो गया हो। उत्सुक मल्लाह यह देखने के लिए कि माजरा क्या है, जैसे ही कास की झाड़ी के पार पहुँचे, कि तभी कोई चीज़ 'धड़ाम' से चर से पानी में जा कूदी। चर का वह हिस्सा निर्जन था—किसी की आँखों को कुछ भी दिखाई न पड़ा।
क्या हुआ, क्या हो गया, यह समझने से पहले ही बाक़ी के मल्लाह भी वहाँ आ पहुँचे। शोरगुल सुनकर बीरू राय आया, उसका चाकर आया। बीरू राय का एकमात्र पुत्र नौका पर था, वह कहाँ है? पता चला कि रसोई में देर होते देख वह कुछ देर पहले चाँदनी में चर पर टहलने निकला था। मल्लाहों के चेहरे सूख गए। इस देश की खारी नदियों के अनुभव से वे समझ गए कि कास-वन की ओट में, रेत के चर पर कोई विशाल मगरमच्छ घात लगाकर लेटा था। वही बीरू राय के पुत्र को ज़मीन से उठाकर ले गया है।
उसके बाद तो जो होना था, वही हुआ। नौका की लग्गी लेकर इधर-उधर खोजा गया, नौका छोड़कर बीच नदी में देर रात तक सब ढूँढ़ते फिरे—उसके बाद रोना-पीटना, हाथ-पैर पटकना। पिछले बरस, देश के ठाकुरझी तालाब के मैदान में लगभग इसी समय जो घटना घटी थी, मानो किसी अदृश्य न्यायकर्ता ने इस साल इच्छामती के इस निर्जन चर पर उस घटना का न्याय-निपटारा कर दिया हो। मूर्ख बीरू राय ने ठोकर खाकर सीखा कि उस अदृश्य धर्माधिकरण के दंड को ठाकुरझी तालाब की श्यामाघास के नीचे छिपाकर धोखा नहीं दिया जा सकता; वह अंधकार में भी अपना मार्ग पहचान लेता है।
घर आकर बीरू राय और अधिक दिन नहीं जिया। इस प्रकार उसके वंश में एक अद्भुत घटना का सूत्रपात हुआ। उसका अपना वंश तो लुप्त हो गया, पर उसके भाई की वंशावली थी। किंतु वंश की ज्येष्ठ संतान कभी जीवित न रहती, बालिग होने से पहले ही किसी-न-किसी रोग से मर जाती। सबने कहा, वंश में ब्रह्म-शाप घुस आया है। हरिहर राय की माता ने तारकेश्वर के दर्शन करने जाकर एक संन्यासी के आगे रो-धोकर एक मादुली पाई थी। चाहे मादुली के गुण से हो, या फिर दो पीढ़ियों के बाद ब्रह्म-शाप का तेज कपूर की तरह उड़ जाने के फलस्वरूप हो, इतनी उम्र तक हरिहर आज भी जीवित है।
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