जिस मार्ग से विष्णुपुर प्रदेश से जगत्सिंह जहानाबाद प्रत्यावर्तित हुए थे, उस मार्ग के चिह्न अद्यापि विद्यमान हैं। उसके किंचित् दक्षिण में मान्दारण ग्राम है। मान्दारण सम्प्रति एक लघु ग्राम है, किंतु उस काल में यह एक सौष्ठवशाली नगर था। जिन रमणियों से मंदिर के भीतर जगत्सिंह की भेंट हुई थी, वे मंदिर से प्रस्थान कर इसी ग्राम की ओर अग्रसर हुईं।
गढ़ मानदारण में कतिपय प्राचीन दुर्ग थे, संभवतः इसी कारण उसका नाम मानदारण पड़ा होगा। नगर के मध्य आमोदर नदी प्रवाहित होती थी; एक स्थान पर नदी की गति ऐसी वक्रता को प्राप्त हुई थी कि उसके द्वारा पार्श्वस्थ एक त्रिकोण भूखंड की दो दिशाएँ वेष्टित हो गई थीं; तीसरी ओर मानव-हस्त-निखात एक परिखा थी। इस त्रिकोण भूखंड के अग्रभाग में, जहाँ से नदी की वक्र गति आरंभ हुई है, वहाँ एक विशाल दुर्ग जल से आकाश-मार्ग की ओर उठकर विराजमान था। अट्टालिका आमूल-शिखर पर्यंत कृष्ण-प्रस्तर-निर्मित थी; दोनों ओर नदी का प्रबल प्रवाह दुर्ग-मूल पर प्रहार करता था।
अद्यापि पर्यटक गढ़ मानदारण ग्राम में इस दुर्लंघ्य दुर्ग के विशाल स्तूप देख सकेंगे; संप्रति दुर्ग का केवल निम्न भाग ही विद्यमान है, अट्टालिका काल के कराल स्पर्श से धूलि-राशि हो गई है; तदुपरि तिंतिड़ी, माधवी आदि वृक्ष एवं लताएँ कानन का रूप धारण कर बहुतेरे सर्प, भालू आदि हिंस्र पशुओं को आश्रय प्रदान कर रही हैं। नदी के पार अन्य कतिपय दुर्ग थे।
बंगाल के पठान सम्राटों के शिरोभूषण हुसैन शाह के प्रसिद्ध सेनापति इस्माइल गाज़ी ने इस दुर्ग का निर्माण कराया था। किंतु कालांतर में जयधरसिंह नामक एक हिंदू सैनिक को यह जागीर स्वरूप प्राप्त हुआ। संप्रति वीरेंद्रसिंह नामक जयधरसिंह के एक वंशज यहाँ निवास करते थे।
यौवनकाल में वीरेन्द्रसिंह की अपने पिता के साथ सम्प्रीति नहीं थी। वीरेन्द्रसिंह स्वभावतः दम्भी और अधीर थे, पिता के आदेश का कदाचित् ही पालन करते थे, इसी कारण पिता-पुत्र में सर्वदा विवाद और वाक्कलह होता रहता था। पुत्र के विवाहार्थ वृद्ध भूस्वामी ने निकटस्थ स्वजातीय किसी अन्य भूस्वामी की कन्या के साथ सम्बन्ध स्थिर किया। कन्या का पिता पुत्रहीन था, इसी कारण इस विवाह से वीरेन्द्र की सम्पत्ति-वृद्धि की सम्भावना थी; कन्या भी सुन्दरी थी, सुतरां वृद्ध के विचार में ऐसा सम्बन्ध अत्यन्त आदरणीय प्रतीत हुआ; वे विवाह का उद्योग करने लगे।
किन्तु वीरेन्द्र ने उस सम्बन्ध का आदर न करके निज पल्ली-स्थित एक पति-पुत्रहीना दरिद्रा रमणी की दुहिता से गुप्त रूप से विवाह करके पुनः विवाह करने से अस्वीकृत हो गये। वृद्ध ने रोषपरवश होकर पुत्र को गृह-बहिष्कृत कर दिया; युवा पितृगृह से बहिष्कृत होकर योद्धा-वृत्ति अवलम्बन करने के आशय से दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गये। उनकी सहधर्मिणी उस समय अन्तःसत्त्वा थीं, इसी कारण वे उन्हें अपने साथ नहीं ले जा सके। वे मातृ-कुटीर में रह गईं।
इधर पुत्र के देशांतर चले जाने के उपरांत वृद्ध भूस्वामी के अंतःकरण में पुत्र-वियोग से मनःपीड़ा का संचार होने लगा; गतानुशोचना के वशीभूत होकर वे पुत्र का समाचार मँगवाने में यत्नवान हुए; किंतु यत्न में कृतकार्य न हो सके। पुत्र का पुनरानयन न कर पाने पर, उसके स्थान पर वे पुत्रवधू को दरिद्रा के गृह से सादर निज आलय में ले आए। उपयुक्त काल में वीरेन्द्रसिंह की पत्नी ने एक कन्या को जन्म दिया। कुछ दिनों के पश्चात कन्या की प्रसूता की परलोक-प्राप्ति हो गई।
वीरेंद्र दिल्ली पहुँचकर मुग़ल सम्राट की आज्ञाकारी राजपूत सेना में योद्धा के रूप में वृत हुए; और अल्पकाल में ही अपने गुणों से उच्च पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वीरेंद्रसिंह ने कुछ ही वर्षों में धन तथा यश का संचय करके पिता के परलोकगमन का समाचार प्राप्त किया। तथा अब विदेश-पर्यटन अथवा पराधीन वृत्ति को निष्प्रयोजन समझकर स्वगृह प्रत्यागमन किया। वीरेंद्र के साथ दिल्ली से अनेकानेक सहचर आए थे। उनमें एक परिचारिका और एक परमहंस थे। इस आख्यायिका में इन दोनों का परिचय आवश्यक होगा। परिचारिका का नाम विमला और परमहंस का नाम अभिराम स्वामी।
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